16. एक कड़वी असफलता के बाद मैंने क्या पाया
2013 में, पुलिस ने फोन की निगरानी के जरिए मुझे गिरफ्तार कर लिया। उसने मुझे ऊपरी अगुआओं की तस्वीरें दिखाईं और उन्हें पहचानने को कहा और जब मैंने बोलने से इनकार कर दिया तो उसने यह कहकर मुझे धमकाने और डराने की कोशिश की कि वह मुझे एकांत कोठरी में डाल देगी और यातना देगी। परमेश्वर के मार्गदर्शन की बदौलत ही मुझे डर नहीं लगा। इसके बाद, मैं पुलिस की हर पूछताछ के दौरान प्रार्थना करके और परमेश्वर पर निर्भर रहकर अडिग रही और मैंने अपने भाई-बहनों से गद्दारी नहीं की। बाद में, मुझे तीन साल की कैद की सजा दे दी गई।
अप्रैल 2014 में, मुझे अपनी सज़ा काटने के लिए एक महिला जेल में भेजा गया। जेल के इकाई प्रमुख ने मुझसे पश्चात्ताप पत्र लिखने और यह कसम खाने को कहा कि अब मैं परमेश्वर में विश्वास नहीं करूँगी, लेकिन मैंने यह लिखने से इनकार कर दिया और इसके बजाय उसे परमेश्वर की गवाही दी। मेरा अडिग रुख देखकर वह मुझे दूसरी कैदियों से सताता, पिटवाता और गालियाँ दिलाता था और मुझे एक दिन में बारह घंटे एक छोटी-सी कोठरी में बिना हिले-डुले खड़ा रखता था। खड़े-खड़े मेरी टाँगें और पाँव सुन्न पड़ गए और सूज गए और हर मिनट एक घंटे जैसा लगता था। मेरी पीड़ा देखकर कैदियों ने यह कहते हुए मेरा मज़ाक उड़ाया : “अपने परमेश्वर से कहो कि वह तुम्हें एक गरुड़ बना दे ताकि तुम यहाँ से उड़कर बाहर चली जाओ!” मैंने मन-ही-मन परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह इस यातना से पार पाने में मेरा मार्गदर्शन करे और मैं उसे धोखा न दूँ। परमेश्वर के मार्गदर्शन के कारण मैं सहन कर गई। एक दिन, जेल के अधिकारियों ने मुझे जवाब देने के लिए दस सवाल दिए, वे सभी परमेश्वर को नकारने और उसकी बदनामी करने वाले थे। इसने मुझे आग बबूला कर दिया : “ये दानव वाकई झूठ गढ़ने में माहिर हैं! मुझे परमेश्वर की गवाही देनी है और उसके नाम को कलंकित नहीं होने देना है।” इसलिए मैंने प्रश्नों के उत्तर देने के इस मौके का इस्तेमाल परमेश्वर के वचनों के जरिए उनकी भ्रांतियों का खंडन करने के लिए किया। नतीजतन, इससे जेल के अधिकारी नाराज़ हो गए, और उन्होंने तीन दिन तक मुझे दोपहर का खाना नहीं दिया। कभी-कभी, भूख से मुझे चक्कर आते तो मैं मन-ही-मन परमेश्वर को पुकारती, और उससे आग्रह करती थी कि वह मेरी आस्था बढ़ाए और मुझे अडिग रखे। मुझे प्रभु यीशु के वचन याद आए : “मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा” (मत्ती 4:4)। परमेश्वर के वचनों पर मनन करने से मुझे अब उतनी भूख महसूस नहीं हुई।
मेरी रिहाई से छह महीने पहले ऊपर के अधिकारियों ने जेल इकाई पर यह कहते हुए दबाव डाला कि जेल के पूरे वार्ड में सिर्फ मैं ही थी जिसका मत-परिवर्तन नहीं हुआ था और जेल की प्रतिष्ठा पर धब्बा लगने से बचाने के लिए इस बार मेरा मन-परिवर्तन करना ही होगा। इसके बाद, उन्होंने मुझे एक और दौर की शारीरिक यातना दी। शून्य से लगभग बीस डिग्री नीचे के तापमान में, उन्होंने मुझे गुसलखाने में खड़ा किया और मेरे ऊपर, यहाँ तक कि मेरे कानों में भी पानी डाला। मेरा पूरा शरीर भीग गया था, फिर भी उन्होंने मुझे कपड़े बदलने नहीं दिए। बाद में वे मुझे एक छोटी-सी कोठरी में ले गए और उन्होंने “तीन कथनों” पर हस्ताक्षर करवाने के लिए मुझ पर दो हत्यारिनों से दबाव डलवाया। उन्होंने धमकी दी कि अगर मैंने इनकार किया, तो वे मुझे एक ऐसे गलियारे में ले जाएँगी जहाँ कोई निगरानी कैमरा नहीं है, मुझे पीट-पीटकर मार डालेंगी, और फिर कह देंगी कि मेरी मौत स्वाभाविक कारणों से हुई है। मेरे दिल में उथल-पुथल मची हुई थी : “अगर मैं हस्ताक्षर करती हूँ तो मैं परमेश्वर को धोखा दे रही हूँगी, लेकिन अगर नहीं करती हूँ तो वे मुझे यातना देने के नए तरीके ढूँढ़ेंगी। क्या होगा अगर उन्होंने मुझे पीट-पीटकर मार डाला?” मैंने पहले एक कैदी को यह कहते सुना था कि यहाँ एक कैदी मर गई थी, और उन्होंने लाश को एक मरे हुए कुत्ते की तरह घसीटकर बाहर फेंक दिया था। बस इस ख्याल ने ही मुझे डर से भर दिया। अगर मुझे पीट-पीटकर मार डाला गया, तो मेरे पास उद्धार पाने का कोई मौका नहीं बचेगा। फिर मैंने सोचा, “क्या मैं तीन कथनों पर हस्ताक्षर न करके विनियमों का बस कठोरता से पालन कर रही हूँ? परमेश्वर इंसान के दिल को देखता है, सिर्फ उसके बाहरी व्यवहार को नहीं। मैं परमेश्वर को सचमुच धोखा देना नहीं चाहती हूँ; मैं तो बस बड़े लाल अजगर से निपटने के लिए बुद्धि का इस्तेमाल कर रही हूँगी।” इसलिए, मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर कर दिए। लेकिन जिस पल मैंने हस्ताक्षर किए, मेरा दिल अंधकार से भर गया। फिर भी मैं खुद को दिलासा देती रही, “मैं सचमुच परमेश्वर को धोखा नहीं दे रही हूँ; मैं तो बस बड़े लाल अजगर से निपटने के लिए बुद्धि का इस्तेमाल कर रही हूँ।” मैंने उनसे यह भी कहा, “मैं सच में इस पर हस्ताक्षर नहीं कर रही हूँ। मैं तो बस तुम्हारे कार्य में सहयोग कर रही हूँ।”
जून 2016 में, मैं जेल से रिहा हो गई। बाद में मैंने एक धर्मोपदेश से सुना कि जिन्होंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए थे उन्होंने पशु की छाप पाई थी और नरक के द्वार खोल दिए थे। मैंने अचानक खुद को पंगु महसूस किया, मानो आसमान काला पड़ गया हो। मुझे आखिरकार एहसास हुआ कि तीन कथनों पर हस्ताक्षर करना कितना गंभीर था और यह परमेश्वर के स्वभाव को नाराज़ करता था। मुझे उम्मीद नहीं थी कि इतने सालों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, मेरी आस्था की यात्रा धोखे के साथ खत्म हो गई थी। उस पल मेरे दिल में जो पीड़ा और निराशा थी वह शब्दों में बयां नहीं की जा सकती थी। अपनी अत्यधिक पीड़ा में, मैंने सब कुछ खत्म करने के लिए एक इमारत से कूदने के बारे में भी सोचा। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “मैं उन लोगों पर अब और दया नहीं करूँगा, जिन्होंने क्लेश के समय में मेरे प्रति रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी दूर तक ही है। इसके अतिरिक्त, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो और ऐसे लोगों के साथ जुड़ना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं जो अपने मित्रों के हितों के साथ गद्दारी करते हैं। चाहे जो भी व्यक्ति हो, मेरा यही स्वभाव है। मुझे तुम लोगों को बता देना चाहिए : जो कोई भी पूरी तरह से मेरा दिल तोड़ता है, उसे दूसरी बार मुझसे क्षमा प्राप्त नहीं होगी, और जो कोई मेरे प्रति वफादार रहा है, वह सदैव मेरे हृदय में बना रहेगा” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो)। परमेश्वर के वचनों पर मनन करते हुए, मुझे अपने दिल में छुरा घोंपने जैसा दर्द महसूस हुआ। परमेश्वर का स्वभाव अपमान बर्दाश्त नहीं करता है और जो कोई भी परमेश्वर से विश्वासघात करता है उसे फिर कभी उसकी दया नहीं मिलेगी। मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर करके परमेश्वर के स्वभाव को नाराज़ किया था, और मुझे लगा कि मेरी आस्था का मार्ग खत्म हो गया है और परमेश्वर अब मुझ जैसे किसी को नहीं बचाएगा। अपने किए बुरे कर्म के बारे में सोचकर, मेरा दिल असहनीय रूप से दुखने लगा, और मैं अपने अपराध की भरपाई के लिए फिर से कैद होने की कामना करने लगी। उस दौरान, मैं एक चलती-फिरती लाश की तरह थी। मैं हर दिन बेसुध-सी रहती, और मुझे परमेश्वर से प्रार्थना करने में भी बहुत शर्म आती थी।
एक दिन, मैंने परमेश्वर के घर द्वारा निर्मित एक फिल्म में एक भाई को देखा, जिसके साथ मैंने कभी सहयोग किया था, और मुझे और भी ज़्यादा दुख और अपराध-बोध हुआ। हम दोनों परमेश्वर में विश्वास करते थे, फिर भी वह उसकी गवाही देने का अपना कर्तव्य निभा रहा था, जबकि मुझे हटा दिया गया था और दंडित किया जाना था। मुझे इस चीज के लिए खुद से और भी ज़्यादा नफरत हुई कि मैंने पहले सत्य का अनुसरण नहीं किया, और मुझे लगा कि मैं मरने के लायक हूँ और जीने के योग्य नहीं हूँ। मैं बस हर दिन बस जैसे-तैसे जीना चाहती थी और अगर मैं किसी दिन मर गई तो यह परमेश्वर की धार्मिकता होगी। रात में मैं बिस्तर पर लेटी करवटें बदलती रही, सो नहीं पा रही थी, और मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “जब लोग मेरे खिलाफ विद्रोह करते हैं, तो मैं उन्हें उनके विद्रोह में से अपने आप को ज्ञात करवाता हूँ। उनकी पुरानी प्रकृति और अपनी दया के आलोक में, मैं उन्हें मृत्यु प्रदान करने के बजाय पश्चात्ताप करने और नई शुरुआत करने देता हूँ” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 14)। “क्या ऐसा हो सकता है कि तुम्हारे नसीब को वास्तव में बदला नहीं जा सकता? क्या तुम इस तरह के कड़वे अफसोस के साथ मरने के लिए तैयार हो?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य का सार और उसकी पहचान)। मैंने साफ महसूस किया कि परमेश्वर ने मुझे त्यागा नहीं है और वह अब भी मुझे पुकारने के लिए अपने वचनों का उपयोग कर रहा है, यह उम्मीद कर रहा है कि मैं उसके सामने पश्चात्ताप करूँगी। परमेश्वर के दयालु वचन एक गर्म कोमल धारा की तरह महसूस हुए, और उन्होंने मेरे दिल को गर्मजोशी से भर दिया। परमेश्वर यह नहीं देखना चाहता था कि मैं नकारात्मकता और गलतफहमी में रहूँ, निराशा में डूब जाऊँ और खुद को त्याग दूँ। परमेश्वर चाहता था कि मैं अपनी असफलता से उठूँ और अपने पतन के मूल कारण पर विचार करूँ। मैंने इस बारे में सोचा कि कैसे परमेश्वर ने कहा था कि नीनवे के लोगों के पश्चात्ताप ने उसकी दया प्राप्त की थी। परमेश्वर यह उम्मीद भी करता था कि मैं पश्चात्ताप कर सकूँ, एक नई शुरुआत कर सकूँ और फिर से आस्था के मार्ग पर चल सकूँ। मैंने परमेश्वर के प्रेम और उद्धार को महसूस किया, और मेरा दिल उसके प्रति कृतज्ञता से भर गया। इसलिए मैं घुटनों के बल झुक गई और मैंने प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैंने तुम्हें धोखा दिया और तुम्हारा दिल तोड़ा। लेकिन तुमने मुझे बचाना नहीं छोड़ा है और तुमने मुझे अब भी पश्चात्ताप करने का मौका दिया है। तुम्हारा धन्यवाद! हे परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करने को तैयार हूँ। कृपया आत्म-चिंतन करने और खुद को जानने में मेरा मार्गदर्शन करो।”
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और मुझे खुद के बारे में कुछ ज्ञान मिला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जो लोग क्लेश के मध्य में हैं वे पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के मार्गदर्शन से रहित हैं, किंतु जिन्हें सच में जीत लिया गया है और जो सच में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं वे अंततः डटे रहेंगे; ये वे लोग हैं जिनमें मानवता है, और जो सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं। परमेश्वर चाहे जो करे, ये विजयी लोग दर्शनों से वंचित नहीं होंगे और ये अभी भी अपनी गवाही को गँवाए बिना सत्य को अभ्यास में लाएँगे। ये वे लोग हैं जो अंततः महाक्लेश से उभरेंगे। भले ही जो लोग केवल खानापूर्ति करते हैं वे आज भी मुफ्तखोरी कर सकते हों, किंतु अंतिम क्लेश से बच निकलने में कोई सक्षम नहीं है और अंतिम परीक्षा से कोई नहीं बच सकता। जो लोग विजय प्राप्त करते हैं, उनके लिए ऐसा क्लेश जबरदस्त शोधन है; किंतु केवल खानापूर्ति करने वालों के लिए यह पूरी तरह से उन्हें हटाए जाने का कार्य है। जिनके दिलों में परमेश्वर है, उनका चाहे किसी भी प्रकार से परीक्षण क्यों न किया जाए, उनकी निष्ठा अपरिवर्तित रहती है; किंतु जिनके दिलों में परमेश्वर नहीं है, वे अपनी देह के लिए परमेश्वर का कार्य लाभदायक न रहने पर परमेश्वर के बारे में अपना दृष्टिकोण बदल लेते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर को छोड़कर चले जाते हैं। वे ऐसे लोग हैं जो अंत में दृढ़ नहीं रहेंगे, जो केवल परमेश्वर की आशीषों की तलाश करते हैं और परमेश्वर के लिए खुद को खपाने और उसके प्रति समर्पण करने की कोई इच्छा नहीं रखते। ऐसे सभी नीच लोगों को तब ‘बाहर निकाल दिया जाएगा’ जब परमेश्वर का काम समाप्त हो जाएगा और उन पर बिल्कुल भी कोई दया नहीं दिखाई जाएगी। जिन लोगों में मानवता नहीं है, उनमें परमेश्वर के लिए बिल्कुल भी सच्चा प्रेम नहीं होता। जब परिवेश आरामदायक होता है या उनके पास कुछ प्राप्त करने का अवसर होता है, तो वे परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी होते हैं, लेकिन एक बार जब उनकी इच्छाएँ बाधित होती हैं या अंततः वे धराशायी हो जाती हैं, तो वे तुरंत विद्रोह में उठ खड़े होते हैं। यहाँ तक कि सिर्फ एक रात के अंतराल में, वे एक मुस्कुराते हुए, ‘दयालु’ व्यक्ति से एक जंगली दिखने वाले जल्लाद में बदल जाते हैं, बिना किसी तुक या कारण के अप्रत्याशित रूप से अपने कल के उपकारी के साथ अपने घातक दुश्मन की तरह पेश आते हैं। यदि इन दुष्ट राक्षसों को जो बिना पलक झपकाए मारते हैं, बहिष्कृत नहीं किया जाता, तो क्या वे एक गंभीर अंतर्निहित खतरा नहीं बन जाएँगे?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास)। परमेश्वर के वचनों पर मनन करते हुए मुझे एहसास हुआ कि मैं एक स्वार्थी और नीच इंसान रही हूँ। हत्यारिनों की धमकी का सामना करते हुए, मुझे डर लगने लगा कि अगर मैं मार दी गई, तो मैं बचाई नहीं जाऊँगी, इसलिए मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर कर दिए और परमेश्वर को धोखा दे दिया। मैं आमतौर पर अपने मुँह से कहती थी कि मैं परमेश्वर को धोखा नहीं दूँगी चाहे कोई और दे दे और मैं खुद को ऐसा इंसान भी समझती थी जो सच में परमेश्वर में विश्वास करता है। लेकिन जब मेरी जान खतरे में थी, तो खुद को बचाने के लिए, मैंने अपनी जान बचाई और परमेश्वर को धोखा दे दिया। मुझमें किस तरह से कोई मानवता थी? मैं किस तरह से परमेश्वर में सचमुच विश्वास करती थी? केवल वे लोग, जो बड़े लाल अजगर की यातनाओं के दौरान, परमेश्वर की गवाही देने के लिए सारी पीड़ा सह सकते हैं, मानवता वाले लोग हैं और ऐसे लोग हैं जो सच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं। मैंने इस बारे में सोचा कि कैसे अंत के दिनों में परमेश्वर के अनुग्रह से मैं उन लोगों में से एक बनी थी जो उसमें विश्वास करते हैं। परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, मैंने इस सच्चाई को समझा कि शैतान द्वारा मानवता को कैसे भ्रष्ट किया गया और मानवता को बचाने की परमेश्वर की 6,000 साल की प्रबंधन योजना को भी समझा। परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, मैंने कुछ सच्चाइयों को समझा और कई चीजों की असलियत को जाना, और यह परमेश्वर के वचन ही थे जिन्होंने मुझे जेल में सबसे कठिन और दर्दनाक दिनों से निकलने में मदद की। मैंने परमेश्वर से बहुत कुछ पाया था, लेकिन जब परमेश्वर चाहता था कि मैं गवाही दूँ, तो मैंने खुद को बचाने के लिए तीन कथनों पर हस्ताक्षर करके उसे धोखा दे दिया। मैंने विश्वासघात का इतना बड़ा कृत्य किया था और मैं सचमुच श्रापित होने के लायक थी! उस पल, मुझे आखिरकार एहसास हो गया कि अपनी वर्षों की आस्था में मैंने सत्य और जीवन बिल्कुल भी प्राप्त नहीं किया था। मैं बस बेजान भूसी थी, तो मैं गिरने से कैसे बच सकती थी? इन चीजों का एहसास होने पर मैंने चाहा कि मैं ऊपर उठने का प्रयास करूँ और अब उतनी नकारात्मक न रहूँ और मैंने पश्चात्ताप करने के लिए बार-बार परमेश्वर से प्रार्थना की। चाहे मेरा परिणाम कुछ भी हो, मैं एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने और सत्य का अनुसरण करने का प्रयास करने को तैयार थी।
फरवरी 2018 में, मैंने पाठ-आधारित कर्तव्य सँभाले और मैं बहुत कृतज्ञ महसूस कर रही थी, मैं अपना कर्तव्य ठीक से निभाना और अपने पिछले अपराध की भरपाई करना चाहती थी। अपने कर्तव्य करते समय, जब भी मैं अपने किए विश्वासघात के बारे में सोचती, तो मेरा दिल दुखने लगता, और यह मेरे दिल में चुभे एक काँटे जैसा महसूस होता, जो मुझे बहुत दर्द और अपराध-बोध देता था। कभी-कभी, मैं खुद से पूछती, “मुझे लगता था कि जब मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए तो मैं पुलिस से निपटने के लिए बुद्धि का उपयोग कर रही थी, लेकिन परमेश्वर इसे कैसे देखता है?” मुझे प्रभु यीशु के वचन याद आए : “जो कोई मनुष्यों के सामने मेरा इन्कार करेगा, उस से मैं भी अपने स्वर्गीय पिता के सामने इन्कार करूँगा” (मत्ती 10:33)। चूँकि मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए और शैतान के सामने परमेश्वर को नकारा और धोखा दिया, इसलिए परमेश्वर ने मुझे ऐसे व्यक्ति के रूप में स्वीकार नहीं किया जो उसमें विश्वास करता है, क्योंकि मेरी “बुद्धि” सत्य के सामने नहीं टिकती और बस मुझे और दूसरों को धोखा दे रही थी। बुद्धि एक सकारात्मक चीज है जो परमेश्वर से आती है, और इसका उपयोग करना एक ऐसा अभ्यास है जो परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करता है। लेकिन मैंने “बुद्धि” का इस्तेमाल खुद को बचाने के लिए किया; इसकी प्रकृति ही परमेश्वर के साथ विश्वासघात थी। जो मनुष्यों के सामने परमेश्वर को नकारते और धोखा देते हैं, वे परमेश्वर द्वारा निंदित किए जाते हैं और परमेश्वर अपने साथ लोगों के विश्वासघात से अत्यंत घृणा करता है। परमेश्वर यह चाहता है कि लोग शैतान के सामने उसकी गवाही दें, हमेशा उसके नाम को कायम रखें और कभी उसे न नकारें। लेकिन मेरी तथाकथित “बुद्धि” तो बस अपनी जान बचाने और एक अपमानजनक अस्तित्व को खींचने का एक बहाना थी। इन बातों का एहसास होने पर, मुझे खुद से और भी ज़्यादा नफरत हुई, और मैंने मन-ही-मन चुपके से कसम खाई कि भविष्य में जब ऐसी ही स्थितियों का सामना करते हुए मैं अपनी गवाही में अडिग रहूँगी और फिर कभी अपनी जान बचाने की कोशिश नहीं करूँगी।
बाद में, मैं अपने मन में यह भी विचार करती, “मैं असफल क्यों हुई? क्यों कुछ भाई-बहन कठोर यातना सह सके और अडिग रहे, यहाँ तक कि मौत की कगार तक भी उन्होंने परमेश्वर को धोखा नहीं दिया, जबकि मैंने उसे धोखा दे दिया? मेरी असफलता की जड़ क्या थी?” चिंतन करने पर मुझे एहसास हुआ कि मैं अपने जीवन को बहुत ही अधिक महत्व देती थी। मैंने मृत्यु के भय से परमेश्वर को धोखा दिया था और अपनी गवाही खो दी थी। एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और मुझे समझ में आ गया कि मृत्यु का सामना कैसे करना है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “प्रभु यीशु के उन शिष्यों की मौत कैसे हुई? उनमें ऐसे शिष्य थे जिन्हें पत्थरों से मार डाला गया, घोड़े से बाँध कर घसीटा गया, सूली पर उलटा लटका दिया गया, पाँच घोड़ों से खिंचवाकर उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए—विभिन्न रूपों की मौत उन पर टूटी। उनकी मृत्यु का कारण क्या था? क्या ऐसा है कि उन्होंने कुछ गलत काम किया और फिर उन्हें कानून के जरिए सजा दी गई? नहीं। उन्होंने प्रभु के सुसमाचार का प्रसार किया, लेकिन दुनिया के लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया और इसके बजाय उनकी निंदा की, उन्हें पीटा और उन्हें कोसा, यहाँ तक कि उन्हें मार डाला—इस तरह वे शहीद हुए। ... वास्तव में, उनके शरीर इसी तरह मृत्यु को प्राप्त हुए और चल बसे; यह मानव संसार से प्रस्थान का उनका अपना तरीका था, तो भी इसका यह अर्थ नहीं था कि उनका परिणाम भी वैसा ही था। उनके निधन और प्रस्थान का तरीका चाहे जो भी रहा हो या यह चाहे जैसे भी हुआ हो, लेकिन परमेश्वर ने उन जीवनों के, उन सृजित प्राणियों के अंतिम परिणाम इस तरह निर्धारित नहीं किए थे। यह ऐसी बात है जो तुम्हें स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए। इसके विपरीत, यह सटीक तौर पर वह तरीका था जिससे उन्होंने इस संसार की घोर निंदा की और परमेश्वर के कर्मों की गवाही दी। इन सृजित प्राणियों ने अपने सर्वाधिक बहुमूल्य जीवन का उपयोग किया—उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण का उपयोग—परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने के लिए किया, परमेश्वर के महान सामर्थ्य की गवाही देने के लिए किया और शैतान तथा इस संसार के समक्ष यह घोषणा करने के लिए किया कि परमेश्वर के कर्म सही हैं, प्रभु यीशु परमेश्वर है, वह प्रभु है और परमेश्वर का देहधारी शरीर है। यहाँ तक कि अपने जीवन के बिल्कुल अंतिम क्षण तक उन्होंने प्रभु यीशु का नाम कभी नहीं नकारा। क्या यह इस संसार को दोषी ठहराने का एक रूप नहीं था? उन्होंने अपने जीवन का उपयोग संसार के समक्ष यह घोषणा करने, मनुष्यों के सामने यह साबित करने के लिए किया कि प्रभु यीशु प्रभु है, प्रभु यीशु मसीह है, वह परमेश्वर का देहधारी है, कि उसने समस्त मानवजाति के छुटकारे के लिए जो कार्य किया वही मानवजाति को जीवित रख पाया है—यह सच्चाई कभी बदलने वाली नहीं है। जो लोग प्रभु यीशु के सुसमाचार का प्रसार करने के लिए शहीद हुए, उन्होंने किस सीमा तक अपना कर्तव्य निभाया? क्या यह अंतिम सीमा तक किया गया था? यह अंतिम सीमा कैसे परिलक्षित होती थी? (उन्होंने अपना जीवन अर्पित किया।) यह सही है, उन्होंने अपने जीवन से कीमत चुकाई। परिवार, सम्पदा, और इस जीवन की भौतिक वस्तुएँ, सभी बाहरी चीजें हैं; स्वयं से संबंधित एकमात्र चीज जीवन है। प्रत्येक जीवित व्यक्ति के लिए जीवन सबसे अधिक सँजोने योग्य है, सबसे बहुमूल्य है और संयोग से ये लोग मानवजाति के प्रति परमेश्वर के प्रेम की पुष्टि और गवाही के रूप में अपनी सबसे बहुमूल्य वस्तु अर्पित कर सके। अपनी मृत्यु तक उन्होंने परमेश्वर के नाम को नहीं नकारा, न ही परमेश्वर के कार्य को नकारा, और उन्होंने जीवन के अपने अंतिम क्षणों का उपयोग इस तथ्य के अस्तित्व की गवाही देने के लिए किया—क्या यह गवाही का सर्वोच्च रूप नहीं है? यह अपना कर्तव्य निभाने का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा है; अपना उत्तरदायित्व इसी तरह पूरा किया जाता है। जब शैतान ने उन्हें धमकाया और आतंकित किया, और अंत में जब उसने उनसे उनके प्राणों की कीमत भी वसूल ली, तब भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारी नहीं छोड़ी। यही अपना कर्तव्य भरसक निभाना होता है। इससे मेरा क्या आशय है? क्या मेरा आशय यह है कि तुम लोग भी परमेश्वर की गवाही देने और उसके सुसमाचार का प्रसार करने के लिए इसी तरीके का उपयोग करो? तुम्हें अनिवार्य रूप से ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है, किन्तु तुम्हें समझना होगा कि यह तुम्हारा दायित्व है, यदि परमेश्वर ऐसा चाहे, तो तुम्हें इसे कुछ ऐसा मानकर स्वीकार करना चाहिए जिसे करने को तुम कर्तव्यबद्ध हो” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सुसमाचार का प्रचार करना वह कर्तव्य है जिसे निभाना सभी विश्वासियों का दायित्व है)। परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल को छू लिया। प्रभु यीशु का अनुसरण करने वाले शिष्य प्रभु के सुसमाचार का प्रसार करने के लिए तमाम तरह से शहीद हुए; उनकी मौत इस दुष्ट पीढ़ी पर एक न्याय थी, और उन्होंने अपनी जान की कीमत पर परमेश्वर की गवाही दी। यह शैतान के लिए सबसे बड़ा अपमान है। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी की, वे सच्चे सृजित प्राणी थे, और परमेश्वर ने उन्हें स्वीकृति दी। भले ही उनके शरीर मर गए, पर उनकी आत्माएँ परमेश्वर के पास लौट गईं। जो अपनी जान बचाना चाहते हैं और मौत से डरते हैं, वे भले ही जीवित रहें, पर वे बेजान चलती-फिरती लाशों जैसे हैं और मरने के बाद भी उन्हें अनंत दंड सहना पड़ता है। जैसा कि प्रभु यीशु ने कहा : “क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिये अपना प्राण खोएगा, वह उसे पाएगा” (मत्ती 16:25)। जब भी मैं पीछे मुड़कर देखती कि कैसे मैंने मौत के खतरे का सामना करते हुए खुद को बचाने के लिए परमेश्वर को धोखा दिया, तो मेरा दिल अपराध-बोध से दुखता था और मेरी आत्मा बहुत तड़पती थी। यह दर्द शारीरिक पीड़ा से कहीं ज़्यादा बुरा था। मैं यह भी समझ गई कि एक व्यक्ति का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है, और कि बड़ा लाल अजगर मेरे जीवन या मृत्यु का फैसला नहीं कर सकता। अगर किसी दिन बड़े लाल अजगर द्वारा मुझे सताकर मार डाला जाता है, तो वह भी परमेश्वर की अनुमति से होगा और उसके द्वारा पूर्वनियत होगा। मुझे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए मरना सार्थक है।
दिसंबर 2023 की एक रात, मुझे ऊपर के अगुआओं का एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि वे उन लोगों की जाँच करने जा रहे हैं जिन्होंने पहले तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए थे। जब मैंने पत्र देखा, तो मैं हक्की-बक्की रह गई, और मैंने सोचा कि मैंने कैसे तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए थे। खासकर परमेश्वर के उन वचनों को देखने के बाद, जिनमें कहा गया था : “क्या ‘तीन कथन’ पर हस्ताक्षर करने वाले लोग वही नहीं हैं जिन्होंने बम विस्फोट करके अपने चीथड़े उड़ा दिए?” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (5))। मुझे लगा कि मैं सचमुच खत्म हो गई हूँ और मेरा आस्था का जीवन समाप्त हो गया है। मैं निराश महसूस कर रही थी। मैं जानती थी कि तीन कथनों पर हस्ताक्षर करके और परमेश्वर को धोखा देकर, मैं नरक और दंड के लिए नियत थी। मुझे लगा कि परमेश्वर का घर मेरे साथ चाहे जैसे भी निपटे, वह न्यायोचित होगा और कि मौत भी मेरे लिए जायज़ सज़ा होगी। उस रात मुझमें अपने कार्य की समस्याओं से निपटने की भी ताकत नहीं थी। मुझमें बिल्कुल भी ताकत नहीं बची थी, और मैंने पूरी रात एक शब्द भी नहीं कहा। अगले कुछ दिनों तक, मैं न खा सकी, न सो सकी, और जब भी मैं अपने अपराध के बारे में सोचती तो मुझे लगता कि मेरा कोई अच्छा परिणाम और गंतव्य नहीं है। मैं बहुत दुखी महसूस कर रही थी, और मेरा किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था। मैं बस इंतज़ार कर रही थी कि कलीसिया कब मुझे सूचित करेगी कि मुझे बाहर निकाल दिया गया है। अपनी पीड़ा और निराशा में मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, उससे विनती की कि वह अपना इरादा समझने के लिए मुझे प्रबुद्ध करे और मार्गदर्शन दे।
अगले दिन मैंने एक अनुभवजन्य गवाही के वीडियो में उद्धृत परमेश्वर के वचनों का एक अंश देखा और परमेश्वर के इरादों की कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “ज्यादातर लोगों के कुछ अपराध किए हैं और खुद पर कुछ दाग लगाए हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों ने परमेश्वर का विरोध किया है और ईशनिंदा की बातें कही हैं; कुछ लोगों ने परमेश्वर का आदेश नकार दिया है और अपना कर्तव्य करने से इनकार किया है और परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिए गए हैं; कुछ लोगों ने प्रलोभन सामने आने पर परमेश्वर को धोखा दिया है; कुछ लोगों ने गिरफ्तार होने पर ‘तीन कथन’ पर हस्ताक्षर करके परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है; कुछ ने भेंटें चुरा ली हैं; कुछ ने भेंटें बरबाद कर दी हैं; कुछ ने अक्सर कलीसियाई जीवन को बाधित किया है और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान पहुँचाया है; कुछ ने गुट बनाए हैं और दूसरों को सताया है, जिससे कलीसिया अस्त-व्यस्त हो गई है; कुछ ने अक्सर धारणाएँ और मृत्यु फैलाकर भाई-बहनों को नुकसान पहुँचाया है; और कुछ लोग विपरीत लिंग के साथ अनैतिक संबंध और व्यभिचार में लिप्त रहे हैं और उन लोगों का भयानक प्रभाव पड़ा है। जाहिर है, हर किसी के अपने अपराध और दाग हैं। लेकिन कुछ लोग सत्य स्वीकार कर पश्चात्ताप कर पाते हैं, जबकि दूसरे सत्य को स्वीकार नहीं कर पाते और पश्चात्ताप करने के बजाय मरना पसंद करते हैं। इसलिए उनके साथ उनके प्रकृति सार और उनकी निरंतर अभिव्यक्तियों के अनुसार बर्ताव किया जाना चाहिए। जो पश्चात्ताप कर सकते हैं, वे वो लोग होते हैं जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं; लेकिन जो वास्तव में पश्चात्ताप न करने वाले होते हैं, उन्हें जैसा भी उचित लगे, निकाल दिया जाना चाहिए या निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। कुछ लोग बुरे हैं, कुछ अज्ञानी और मूर्ख हैं और कुछ जानवर हैं। हर कोई अलग होता है। कुछ बुरे लोगों पर बुरी आत्माएँ सवार होती हैं, जबकि अन्य दानव शैतान के सेवक होते हैं। उनमें से कुछ की प्रकृति विशेष रूप से क्रूर होती है, जबकि कुछ की प्रकृति विशेष रूप से कपटी होती है, कुछ प्रकृति से धन के विशेष लोभी होते हैं और अन्य प्रकृति से यौन व्यभिचार का आनंद लेते हैं। प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति की अभिव्यक्तियाँ अलग-अलग होती हैं, इसलिए सभी लोगों का मूल्यांकन उनकी प्रकृति और निरंतर अभिव्यक्तियों के अनुसार व्यापक रूप से किया जाना चाहिए। ... प्रत्येक व्यक्ति के साथ परमेश्वर का निपटने का तरीका उस समय की वास्तविक परिस्थितियों और पृष्ठभूमि के साथ-साथ उस व्यक्ति के क्रियाकलापों और व्यवहार और उसके प्रकृति सार पर आधारित होता है। परमेश्वर कभी किसी के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार नहीं करता। यही परमेश्वर की धार्मिकता है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों पर मनन करते हुए मैं अत्यंत भावुक हो गई। परमेश्वर का घर लोगों के साथ सिद्धांतों के अनुसार निपटता है और परमेश्वर के स्वभाव में प्रताप और क्रोध भी है और करुणा और दया भी है। मैंने तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए थे और ईशनिंदा का पाप किया था, जो इस जीवन और आने वाले संसार में अक्षम्य है। परमेश्वर को धोखा देने के बाद मेरा दिल अंधकारमय था और मैं अनवरत पीड़ा में गोते खा रही थी, एक चलती-फिरती लाश की तरह जी रही थी। यह परमेश्वर की धार्मिकता थी। लेकिन परमेश्वर ने मुझे त्यागा नहीं और उसने अपने वचनों के माध्यम से मुझे प्रबुद्ध किया और मार्गदर्शन दिया, मुझे नकारात्मकता और गलतफहमी से बाहर निकलने दिया। मैंने महसूस किया कि परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के भीतर परमेश्वर की दया और उद्धार भी है। परमेश्वर लोगों के परिणाम उनके क्रियाकलापों की पृष्ठभूमि, उनके प्रकृति सार और निरंतर व्यवहार के आधार पर तय करता है, साथ ही इस आधार पर कि उन्होंने सच में पश्चात्ताप किया है या नहीं। जब मैं पकड़ी गई और सताई गई थी, उस समय को याद करते हुए, और जब मेरी जान को खतरा था, तो शारीरिक कमज़ोरी के एक पल में, मैंने परमेश्वर को धोखा दे दिया, और बाद में, मैं पछतावे और अपराध-बोध से भर गई थी। कलीसिया ने देखा कि मुझे अपनी और पश्चात्ताप की कुछ समझ थी और उसने मुझे अपना कर्तव्य निभाने का मौका दिया। तब से मैंने अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने की लगातार भरसक कोशिश की है। इसके विपरीत, जिन लोगों ने तीन कथनों पर हस्ताक्षर किए थे, उनमें से, जिन्हें बाहर निकाल दिया गया, वे अपने कर्तव्यों में लगातार खराब प्रदर्शन करते थे, और परमेश्वर को धोखा देने के बाद, उन्होंने न तो सच में पश्चात्ताप किया और न ही अपने कर्तव्यों को ठीक से निभाया। ऐसे लोग वे हैं जिन्हें परमेश्वर प्रकट करता और हटा देता है। परमेश्वर ने कहा कि जो लोग तीन कथनों पर हस्ताक्षर करते हैं, वे टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाते हैं, और घातक पाप करते हैं। लेकिन परमेश्वर लोगों से उनके प्रकृति सार और पश्चात्ताप के आधार पर पेश आता है। तीन कथनों पर हस्ताक्षर करने के बाद मैंने अपने दिल में गहरा पश्चात्ताप और आत्म-धिक्कार महसूस किया था। परमेश्वर ने मेरा न्याय करने और मुझे ताड़ना देने के लिए अपने वचनों का इस्तेमाल किया, मुझे यह मौका दिया कि मैं तीन कथनों पर हस्ताक्षर करने की प्रकृति और परिणामों को समझ लूँ, यह जान लूँ कि परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव अपमान के प्रति असहिष्णु है, परमेश्वर का भय मानने वाला दिल विकसित कर लूँ और सच्चा पश्चात्ताप कर लूँ। इसने मुझे वह पूरी तरह अनुभव करने दिया जो परमेश्वर ने इसमें कहा था : “परमेश्वर की दया और सहनशीलता प्राप्त करना मुश्किल नहीं है—लेकिन मनुष्य के लिए सच्चा पश्चात्ताप हासिल करना मुश्किल है” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II)।
फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा जो बिल्कुल मेरी दशा से संबंधित था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सभी लोग आशीषें, पुरस्कार और मुकुट पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। क्या हर व्यक्ति के दिल में यह इरादा नहीं होता? वास्तव में, हर व्यक्ति के दिल में यही होता है। यह एक तथ्य है। यद्यपि लोग अक्सर इसके बारे में बात नहीं करते और यहाँ तक कि आशीषें प्राप्त करने के अपने इरादे और इच्छा को छिपाते भी हैं, यह इच्छा, यह इरादा और उद्देश्य जो लोगों के दिलों में गहराई तक निहित है, कभी भी डगमगाया नहीं है। चाहे लोग कितना भी आध्यात्मिक सिद्धांत समझें, उनके पास कोई भी अनुभवजन्य ज्ञान हो, वे कोई भी कर्तव्य कर सकते हों, वे कितना भी कष्ट सहें या वे कितनी भी कीमत चुकाएँ, वे कभी भी आशीषें प्राप्त करने के उस इरादे को नहीं छोड़ते जो उनके दिलों में गहराई से छिपा हुआ है, वे हमेशा चुपचाप इसकी सेवा में मेहनत और भाग-दौड़ करते रहते हैं। क्या यही वह चीज नहीं है जो लोगों के दिलों में सबसे गहराई में दबी हुई है? आशीषें प्राप्त करने के इस इरादे के बिना, तुम लोगों को कैसा महसूस होगा? तुम किस रवैये से अपना कर्तव्य निभाओगे और परमेश्वर का अनुसरण करोगे? यदि आशीषें प्राप्त करने का यह इरादा जो उनके दिलों में छिपा है, पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाए तो लोगों का क्या होगा? यह संभव है कि बहुत-से लोग नकारात्मक हो जाएँगे, कुछ लोग अपने कर्तव्यों में उत्साहहीन हो जाएँगे और परमेश्वर में अपने विश्वास में रुचि खो देंगे। वे ऐसे लगने लगेंगे जैसे उन्होंने अपनी आत्मा खो दी हो और ऐसा प्रतीत होगा जैसे उनके दिल छीन लिए गए हों। इसीलिए मैं कहता हूँ कि आशीषें प्राप्त करने का इरादा कुछ ऐसा है जो लोगों के दिलों में गहराई से छिपा हुआ है। शायद अपना कर्तव्य करते हुए या कलीसिया का जीवन जीते हुए उन्हें लगता है कि उन्होंने कुछ सत्य समझ लिए हैं और वे अपने परिवारों को त्यागने और खुद को खुशी-खुशी परमेश्वर के लिए खपाने में सक्षम हैं, अब उन्हें आशीष प्राप्त करने के अपने इरादे का ज्ञान है, वे इस इरादे को छोड़ चुके हैं और अब उससे नियंत्रित या बाधित नहीं होते। फिर वे सोचते हैं कि उनमें अब आशीष पाने का इरादा नहीं रहा, लेकिन परमेश्वर ऐसा नहीं सोचता है। लोग मामलों को केवल सतही तौर पर देखते हैं। परीक्षणों के बिना, वे अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं। अगर वे कलीसिया नहीं छोड़ते या परमेश्वर के नाम को नहीं नकारते और परमेश्वर के लिए खुद को खपाने में लगे रहते हैं, तो वे मानते हैं कि वे बदल गए हैं। उन्हें लगता है कि वे अब अपने कर्तव्य निर्वहन में अपने उत्साह या क्षणिक आवेगों से संचालित नहीं होते हैं। इसके बजाय, वे मानते हैं कि वे सत्य का अनुसरण कर सकते हैं, अपना कर्तव्य करते हुए लगातार सत्य की तलाश और अभ्यास कर सकते हैं, ताकि उनके भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध हो सकें और वे कुछ वास्तविक बदलाव हासिल कर सकें। लेकिन जब सीधे उनकी मंजिल और परिणाम से संबंधित कोई बात हो जाती है, तो उनकी अभिव्यक्तियाँ क्या होती हैं? उनकी सच्चाई पूरी तरह से प्रकट हो जाती है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन संवृद्धि के छह संकेतक)। परमेश्वर ने मेरी सटीक दशा को उजागर किया। इन वर्षों के दौरान, मैं सोचती थी कि मैं आशीषों का अनुसरण करना बंद कर चुकी हूँ, लेकिन आशीषों की इच्छा मेरे दिल में गहराई से छिपी हुई थी और अगर तथ्यों का प्रकाशन न होता, तो मैं अब भी यही सोचती कि मैं इस संबंध में बदल गई हूँ। इन वर्षों के दौरान, परमेश्वर की दया के कारण मैं कलीसिया में अपने कर्तव्य निभाती आ रही हूँ, इसलिए मैं अब भी झूठी आशा पाले हुए थी, यह सोचती थी कि हो सकता है परमेश्वर मुझे क्षमा कर चुका हो। मैं अपने कर्तव्यों में पीड़ा सहती थी और कीमत चुकाती थी, कर्तव्यों में जुटे रहने के लिए बीमारी सह रही थी और इसलिए मुझे लगता कि मैं परमेश्वर के प्रति वफादार हूँ। लेकिन जब मैंने देखा कि तीन कथनों पर हस्ताक्षर करने वालों का परिणाम नरक है, तो मैं पंगु हो गई और आशीष पाने की अपनी उम्मीदें पूरी तरह चकनाचूर होते देखकर मैं अपने कर्तव्य निभाने की इच्छा खो बैठी और यहाँ तक कि मैं कलीसिया के कार्य से निपटना नहीं चाहती थी। तथ्यों का सामना करते हुए, मैंने देखा कि मैं अब भी परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश कर रही थी, और कि मैंने कर्तव्य में सिर्फ आशीषों के लिए दुख उठाया था। मैंने देखा कि आशीष पाने का मेरा इरादा कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए था। मैंने परमेश्वर के प्रकाशन के लिए उसका धन्यवाद किया; इस प्रकाशन ने मुझे मेरा ज्ञान कराया और सत्य का अनुसरण करने के मेरे संकल्प को भी प्रेरित किया। उसके बाद, मैंने खुद को परमेश्वर को सौंपने का संकल्प लिया, और मैं जानती थी कि परमेश्वर मेरे साथ जैसे भी पेश आए, मुझे बस समर्पण करना था और जो कर्तव्य मुझे निभाने चाहिए थे उन्हें अच्छे से निभाना था। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैंने जो अपराध किए हैं उन्हें देखते हुए, मुझे बहुत पहले ही दूर कर दिया जाना चाहिए था। इन वर्षों में, मैंने तुम्हारे वचनों के इतने सिंचन और भरण-पोषण का मुफ्त में आनंद लिया है, और मैंने बहुत कुछ पाया है। अगर तुम अब मुझे निष्कासित भी कर दो, तो भी मैं तुम्हारा धन्यवाद करूँगी। हे परमेश्वर! मैं हमेशा तुम्हारा अनुसरण करना चाहती हूँ, और अब मैं किसी आशीष की इच्छा नहीं करूँगी।” मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “मैं किसी आशीष के लिए याचना नहीं करता; मैं तो सिर्फ इतनी याचना करता हूँ कि मैं उस मार्ग पर चल सकूँ, जिस पर मुझे परमेश्वर के इरादों के अनुसार चलना अनिवार्य है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मार्ग ... (6))। परमेश्वर के वचनों पर मनन करते हुए, मेरे आँसू अपने आप बह निकले। मेरा दिल परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता से भर गया, और मेरी आत्मा ने ऐसी मुक्ति महसूस की जैसी पहले कभी नहीं की थी।
एक दिन, मुझे ऊपर के अगुआओं का एक पत्र मिला। मेरे तीन कथनों पर हस्ताक्षर करने की पृष्ठभूमि और मेरी आस्था में अपने कर्तव्यों के लगातार निर्वहन को ध्यान में रखते हुए उन्होंने मुझे पश्चात्ताप करने का मौका दिया और उन्होंने मुझे शांत मन से अपने कर्तव्य निभाने को कहा। जब मुझे पत्र मिला, तो मैं बहुत द्रवित हो उठी। मैंने महसूस किया कि लोगों के प्रति परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव न्याय और उद्धार है और यह सब इसलिए है ताकि मैं सत्य का अनुसरण करने के सही मार्ग पर चल सकूँ। उस पल, परमेश्वर के बारे में मेरी गलतफहमियाँ दूर हो गईं। साथ ही, मुझे अपनी धोखेबाजी और परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों की समझ की कमी से भी नफरत हुई, और मुझे और भी अधिक एहसास हुआ कि उसने अपने दिल का कितना खून मुझमें लगाया है। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, तुम लोगों को ताड़ना देता है और तुम्हें दोषी ठहराता है, लेकिन तुम्हें यह जानना चाहिए कि तुम्हें दोषी इसलिए ठहराया जाता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको। वह दोषी ठहराता है, शाप देता है, न्याय करता और ताड़ना देता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो सके और उससे भी बढ़कर तुम अपनी कीमत जान सको और यह देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धार्मिक और उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं और वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है और यह कि वह धार्मिक परमेश्वर है, जो मनुष्य को प्यार करता है और उसे बचाता है और जो उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना भी देता है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष को परे रखना चाहिए और मनुष्य का उद्धार लाने का परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए)। मैंने परमेश्वर के वचन का यह अंश पहले कई बार पढ़ा था, लेकिन मैंने इसे कभी सच में नहीं समझा था। अब इस अनुभव के बाद मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर जो करता है उसमें लोगों के प्रति कोई नफरत नहीं होती है। परमेश्वर चाहे जैसे भी कार्य करे, भले ही इसमें निंदा या श्राप शामिल हो, यह लोगों को शुद्ध करने, उन्हें भ्रष्ट स्वभावों की बाधाओं और बंधनों से मुक्त करने और लोगों को शैतान की शक्ति से बचाने के लिए है। लोगों पर परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का प्रकट होना उनके लिए सबसे बड़ा उद्धार है। मैं सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करने को तैयार हूँ। चाहे मेरा जो परिणाम हो, भले ही मैं सृष्टिकर्ता के लिए सिर्फ श्रम कर सकूँ, मैं तैयार और संतुष्ट हूँ। परमेश्वर का धन्यवाद!