15. एक बिक्री प्रबंधक का चुनाव

ये च्यो, यूनाइटेड किंगडम

मेरा जन्म दक्षिणी चीन के एक छोटे से कस्बे में हुआ था। मेरे पिता उस इलाके के एक जाने-माने डॉक्टर थे और हमारा परिवार काफी संपन्न था। बचपन से ही मेरा जीवन स्तर अपने हमउम्र बच्चों से बेहतर था, जिससे मेरे अंदर श्रेष्ठता की भावना आ गई थी। जब से मुझे याद है, मेरे पिता अक्सर मुझे सिखाते थे, “सबसे महान इंसान बनने के लिए व्यक्ति को सबसे बड़ी कठिनाइयाँ सहनी होंगी।” मैंने अपने पिता के गाँव से आकर कस्बे में अपनी जगह बनाने के सफर की कहानी सुनी थी, देखा था कि कैसे लोग मेरे पिता की खुशामद करने के लिए हमेशा हमारे घर आते-जाते रहते हैं और यह भी देखा था कि वे जहाँ भी जाते हैं, लोग उनकी कितनी तारीफ करते हैं और गर्मजोशी से उनका स्वागत करते हैं। अपने बचपन की नादानी में, मैं धीरे-धीरे दूसरों से ऊपर उठने के महत्व को समझने लगी और मैंने ठान लिया कि मैं एक ऐसी रुतबे वाली इंसान बनूँगी, जिसकी दूसरे तारीफ करें और जिसे सम्मान दें। लेकिन जब मैं 12 साल की थी, तो मेरे पिता को कथित अवैध सौदेबाजी करने के चलते जेल हो गई और हमारा घर, जहाँ कभी चहल-पहल रहती थी, अचानक वीरान हो गया। मेरी माँ, मेरी बहन और मैं, हम तीनों एक-दूसरे के सहारे रह गईं। जो लोग कभी हमसे इतनी गर्मजोशी से मिलते थे, वे अब कहीं नजर नहीं आते थे। खासकर अपनी माँ को पैसे उधार लेने के लिए दर-दर भटकते और तकलीफ सहते देखकर मेरा मन निराशा से भर जाता और मैंने ठान लिया कि मैं लगन से पढ़ाई करूँगी और कामयाब होकर रहूँगी, ताकि मैं दूसरों से ऊँची उठकर एक ऐसा जीवन जी सकूँ जिससे लोग ईर्ष्या करें, जिसकी प्रशंसा करें और हम अपना खोया हुआ सम्मान वापस पा सकें। मेरी मेहनत रंग लाई और आखिरकार मेरा विश्वविद्यालय में दाखिला हो गया। लेकिन फिर भी मैंने खुद को ढील देने की हिम्मत नहीं की। मेरे पिता के ये शब्द, “सबसे महान इंसान बनने के लिए व्यक्ति को सबसे बड़ी कठिनाइयाँ सहनी होंगी,” मुझे लगातार हिम्मत देते रहे। मुझे यकीन था कि अगर मैं मेहनत करती रही, तो एक दिन मैं सफल होऊँगी और प्रसिद्धि और लाभ दोनों हासिल करूँगी।

2006 में विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद, मैं अकेले शंघाई आई और एक कंपनी में बिक्री का काम करने लगी। ज्यादा से ज्यादा ऑर्डर पाने के लिए, मैं नियमित रूप से ग्राहकों से मिलने दूसरे शहरों में जाती थी। सफर में जी मिचलाने की वजह से, अलग-अलग शहरों की यात्रा मुझे बुरी तरह थका देती थी और बस से उतरने के बाद, मुझे ग्राहकों से मिलने के लिए अपनी सारी हिम्मत जुटानी पड़ती थी। शारीरिक थकावट के अलावा, काम के सिलसिले में होने वाली कारोबारी मुलाकातों और सहकर्मियों-ग्राहकों से निपटने में मैं और भी ज्यादा थक जाती थी। ग्राहकों के ऑर्डर पक्के करने के लिए, मैंने “थिक ब्लैक थ्योरी” और “द वे ऑफ द वुल्फ” किताबें खरीदीं। इन किताबों से मैंने इस इंडस्ट्री के कई छिपे हुए नियम और दुनियादारी निभाने के तौर-तरीके सीखे। बाद में, अपने काम में, मैं अपने सहकर्मियों से आगे निकलने के लिए, उनसे सामने और पीठ पीछे, दोनों तरह से मुकाबला करने लगी। बाहर मैं न केवल ग्राहकों की चापलूसी करती, बल्कि उन्हें रिश्वत देती और गुपचुप सौदेबाजी भी करती थी। शुरू-शुरू में, मैं इन सब कामों को लेकर बहुत बेचैन रहती थी—अगर ये बातें खुल जातीं, तो न केवल कंपनी की बदनामी होती, बल्कि मुझे जेल भी हो सकती थी, इसलिए मैं हर दिन घबराहट में जीती थी। जब दबाव बहुत बढ़ जाता, तो अक्सर आधी रात को बुरे सपनों से मेरी नींद टूट जाती थी। मैं हर दिन एक लगातार डर और बेचैनी में जीती थी। कभी-कभी, देर रात में, जब चारों तरफ सन्नाटा होता, तो मैं सोचती, “बिक्री के काम में दबाव बहुत ज्यादा है; शायद मुझे कोई और काम कर लेना चाहिए।” लेकिन फिर मैं मन में सोचती, “सबसे महान इंसान बनने के लिए व्यक्ति को सबसे बड़ी कठिनाइयाँ सहनी होंगी।” और मैं खुद को हिम्मत बँधाती, “अगर मुझे कामयाब होना है, तो यह दर्द तो सहना ही होगा; वरना, इतने प्रतिभाशाली लोगों से भरे इस महानगर में मैं कब सफलता और शोहरत हासिल कर पाऊँगी?” इसलिए मैं डटी रही। दो साल बाद, मैं कार्यस्थल में एक नौसिखिया से अपनी टीम की बिक्री चैंपियन बन गई। मेरे अधिकारी न केवल मुझे महत्व देने लगे और मेरे सहकर्मी मुझसे जलने लगे, बल्कि मेरी तनख्वाह भी अच्छी-खासी बढ़ती जा रही थी और आखिरकार मैं अपनी इच्छानुसार एक कार्यालय की कर्मचारी वाला जीवन जी रही थी। मेरी माँ ने खुश होकर मुझसे कहा, “मेरी बच्ची, हमारे मुश्किल दिन आखिरकार खत्म हो गए। अब जब तुमने खुद को साबित कर दिया है, तो हमें किसी के दबाने का डर नहीं रहेगा। मुझे लगता है अब मैं सिर उठाकर जी सकती हूँ। तुम और मेहनत करती रहना!” मैंने मन ही मन ठान लिया, “मुझे शंघाई में सिर्फ घर और गाड़ी ही नहीं खरीदनी है, बल्कि इस इंडस्ट्री की अगुआ बनना है, ताकि मैं एक लंबे समय तक सम्मानजनक जीवन जी सकूँ।”

2008 में, शादी के कुछ ही समय बाद, मेरे सास-ससुर ने मुझे अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का सुसमाचार सुनाया। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं मानवता को बचाने के परमेश्वर के तीन-चरणों वाले कार्य से बहुत प्रभावित हुई। खासकर जब मैंने देखा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचन सत्य हैं और उन्होंने ऐसे कई रहस्यों का खुलासा किया है जिन्हें इंसान नहीं जानता था, तो मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों की ओर खिंची चली गई और मैंने अपने पति के साथ सुसमाचार स्वीकार कर लिया। परमेश्वर को पाने के बाद, हम एक साथ इकट्ठा होते, परमेश्वर के वचन पढ़ते और परमेश्वर की स्तुति में भजन गाते थे। भाई-बहन भी हमारे साथ अपनी अनुभवजन्य समझ बाँटते थे। मैंने देखा कि वे सब कितने पवित्र और सरल है, उन लोगों से बिल्कुल अलग, जिनसे मैं काम पर मिलती-जुलती हूँ। उनके बीच कोई चापलूसी या पीठ पीछे बुराई नहीं थी और वे दिल से बात करते थे। मुझे उनके साथ मेलजोल में खुशी मिलती थी और परमेश्वर के वचनों पर इकट्ठा होकर संगति करने में भी।

जून 2008 में, मैंने और मेरे पति ने कर्ज लेकर एक घर खरीदा, तो मेरे सहकर्मी, सहपाठी और परिवार के सभी लोग हमें ईर्ष्या से देखने लगे। खासकर जब हमारे पड़ोसियों को पता चला कि हम बाहर से आकर सिर्फ दो साल में घर खरीदने वाले लोग हैं, तो वे और भी ज्यादा हमारी प्रशंसा और आदर करने लगे। मुझे मन ही मन बहुत अच्छा लगा, यह सोचकर कि मैं उस ऊँचे जीवन के और करीब पहुँच रही थी जिसका मैंने हमेशा सपना देखा था। बाद में, मेरी तरक्की हुई, मेरे बिजनेस कार्ड पर मेरा पद बदलकर बिक्री प्रबंधक हो गया और मेरा ऑफिस भी एक छोटे से कोने से हटकर एक अधिक प्रमुख और अलग जगह पर स्थानांतरित हो गया। सहकर्मी सम्मान से सिर झुकाकर मेरा अभिवादन करते और ग्राहक भी मुझे प्रबंधक ये कहकर बुलाते थे। मैं तनकर चलती थी और मुझे अचानक महसूस हुआ कि मैं बाकियों से अलग हूँ और मुझे खुद को दूसरों से ऊँचा समझने का यह एहसास बहुत अच्छा लगता था। उस समय, सभाओं में जाने के अलावा मैं अपना लगभग सारा समय काम में ही लगाती थी। मैं बस यही सोचती रहती थी कि जल्दी से पैसे कमाकर कर्ज चुका दूँ, ताकि मैं एक बड़ा घर खरीद सकूँ और अपनी माँ को हमारे साथ रहने के लिए ला सकूँ, जिससे वे भी हमारे साथ इस ऊँचे जीवन का आनंद ले सकें। जैसे-जैसे कंपनी बड़ी होती गई, उसके नियम-कानून और भी सख्त और जटिल होते गए और बिक्री प्रबंधक होने के नाते, मुझे कंपनी की तरह-तरह की मूल्यांकन गतिविधियों में हिस्सा लेना पड़ता था और उन्हें पूरा करना पड़ता था। इस हाल में, मैं एक दुविधा में फँस गई : अगर मैं कंपनी में अपना काम अच्छे से करती, तो मेरे कलीसियाई जीवन में रुकावट आती, लेकिन अगर मैं कलीसियाई जीवन जीती, तो मेरे काम का नुकसान होता और अगर मैं अपना काम ठीक से न करती, तो मेरा यह शानदार जीवन निश्चित रूप से हाथ से चला जाता। शुरू में तो मैं सभाओं में जाती रही, लेकिन एक दिन मैंने सहकर्मियों को यह कहते सुना कि मेरे अधीन काम करने वाले लोग आपस में यह बात करते हैं कि मैं रोज समय पर ऑफिस से चली जाती हूँ और मुझमें एक लीडर वाली कोई बात नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि मैंने यह पद जरूर अधिकारियों की चापलूसी करके और कोई तिकड़म लगाकर हासिल किया है। ये बातें सुनकर मैं बहुत परेशान और बेचैन हो गई और सोचने लगी, “आजकल बाजार में मुकाबला बहुत कड़ा है। अगर मैं इस पद को बनाए रखने के लिए और मेहनत नहीं करती, तो शायद किसी दिन कोई और मेरी जगह ले लेगा और यह प्रतिष्ठित, सम्मानित और ईर्ष्या करने लायक नौकरी और जीवन, जिसे पाने के लिए मैंने इतनी मेहनत की है, सब खत्म हो जाएगा। नहीं, ऐसा नहीं होने देना है। मुझे कुछ ठोस करके दिखाना होगा।” उसके बाद, मैंने अपनी सुबह की भक्ति का समय कम कर दिया और कभी-कभी तो मेरे पास भक्ति के लिए समय ही नहीं होता था और मैं बस जल्दी से काम पर चली जाती थी। काम के बाद अगर कोई सभा नहीं होती, तो मैं कंपनी में रुककर ओवरटाइम करने की कोशिश करती थी। इसके अलावा, मैं अधिकारियों और ग्राहकों के साथ होने वाली हर दावत में शामिल होने की कोशिश करती और उनके साथ जबरदस्ती मुस्कुराती थी। सच कहूँ तो, मैं जानती थी कि मैं जो कर रही हूँ वह परमेश्वर के इरादे के मुताबिक नहीं है और इस तरह दूसरों की चापलूसी करने पर मुझे खुद से घिन आती थी, लेकिन जब मैं सोचती कि अपना पद बचाने का यही एकमात्र तरीका है, तो मुझे यह सब करते रहना पड़ता था।

उस दौरान, मैं लगभग हमेशा सभाओं में ऐन वक्त पर पहुँचती थी और कई बार तो ऐसा भी हुआ कि काम के सिलसिले में कई-कई दिनों की यात्रा के कारण मैं सभाओं में जा ही नहीं पाई। जब भी भाई-बहन मेरी दशा के बारे में पूछते, तो मुझे बहुत अपराध-बोध होता, लेकिन मैं कुछ कर नहीं सकती थी। लंबे समय की अनियमित दिनचर्या और मानसिक दबाव के कारण मेरी सेहत गिरने लगी। पहले तो सिर्फ मेरे बाल झड़े, लेकिन बाद में मेरा वजन लगातार बढ़ने लगा और मेरी पिंडलियाँ बैंगनी रंग के धब्बों से भर गईं। अस्पताल जाकर जाँच करवाने पर पता चला कि मुझे हाई कोलेस्ट्रॉल और एलर्जिक परपूरा है। डॉक्टर ने कहा कि मेरी बीमारी का मेरे काम से गहरा नाता है, काम के भारी दबाव और अनियमित दिनचर्या ने मेरी प्रतिरक्षा प्रणाली को गड़बड़ा दिया है और खासकर, लगातार कारोबारी मनोरंजन और गलत खान-पान से मेरी चयापचय-क्रिया खराब हो गई है। उन्होंने कहा कि अगर मैं इसी तरह जीती रही और मेरी मानसिक हालत ऐसी ही रही, तो मेरी हालत और बिगड़ेगी, दिल और रक्त वाहिकाओं की बीमारियाँ हो जाएँगी और यहाँ तक कि मेरी जान को भी खतरा हो सकता है। मुझे अपनी सेहत की चिंता तो हुई, लेकिन मैं खुद को बेबस महसूस कर रही थी और सोच रही थी, “आज के समाज में दूसरों से ऊपर उठने के लिए कीमत तो चुकानी ही पड़ती है; कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। अगर किसी दिन मुझ पर कोई दबाव नहीं रहा और मुझे सामाजिक आयोजनों में नहीं जाना पड़ा, तो यकीनन मैं इस ऊँचे पद पर भी नहीं रहूँगी। अभी तो मैं जवान हूँ, मेरा शरीर यह सब झेल लेगा, पहले मैं इस दौर से निकल जाऊँ।”

अप्रैल 2009 में एक दिन, एक कलीसिया अगुआ ने मुझसे पूछा, “क्या तुम नए लोगों को सींचने का कर्तव्य करना चाहोगी?” मैंने सोचा कि अपना कर्तव्य निभाना हर सृजित प्राणी की जिम्मेदारी है और कर्तव्य के जरिए इंसान और ज्यादा सत्य समझ सकता है, इसलिए मैं खुशी-खुशी राजी हो गई। लेकिन जब मुझे पता चला कि लगभग हर रात सभा होगी, तो मैं हिचकिचाई और सोचने लगी, “कंपनी लगातार इस बात का मूल्यांकन करती है कि हम ग्राहकों से कितनी बार मिलते हैं और विभाग की बिक्री का मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी भी मेरी ही है। अगर मैं रोज सभाओं में जाऊँगी, तो अपना काम कैसे करूँगी? अगर मैंने टीम को ठीक से नहीं सँभाला और बिक्री के लक्ष्य पूरे नहीं हुए, तो मैं निश्चित रूप से बिक्री प्रबंधक के पद पर नहीं रह पाऊँगी। तो क्या प्रबंधक का पद और यह स्थिर, आरामदायक जीवन, जिसे मैंने इतनी मेहनत से पाया है, यूँ ही खत्म नहीं हो जाएगा? क्या भविष्य में आगे बढ़ना और भी मुश्किल नहीं हो जाएगा?” यह सोचकर, मैंने बहन से कहा, “मुझे इस बारे में थोड़ा और सोचना होगा।” अगले कुछ दिनों तक मैं इसी मामले पर सोच-विचार करती रही। मैं रातों को ठीक से सो नहीं पाती थी और मेरा मन उलझन और परेशानी से भरा रहता था।

एक सभा के दौरान, मैंने अपनी यह परेशानी भाई-बहनों को बताई और हमने परमेश्वर के वचन पढ़े : “मनुष्य, जो ऐसी गंदी भूमि में जन्मा, समाज द्वारा गंभीर हद तक संक्रमित हो गया है, वह सामंती नैतिकता से अनुकूलित कर दिया गया है और उसने ‘उच्चतर शिक्षा संस्थानों’ की शिक्षा प्राप्त की है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन को लेकर घटिया दृष्टिकोण, सांसारिक आचरण के घृणित फलसफे, नितांत मूल्यहीन अस्तित्व, नीच तौर-तरीके और दैनिक जीवन—ये सभी चीजें मनुष्य के हृदय में गंभीर घुसपैठ करती रही हैं, उसकी अंतरात्मा को गंभीरता से नुकसान पहुँचाती और उस पर गंभीर प्रहार करती रही हैं। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से अधिक से अधिक दूर हो रहा है और परमेश्वर का अधिक से अधिक विरोधी हो गया है। दिन-प्रतिदिन मनुष्य का स्वभाव और अधिक निर्दयी हो रहा है और एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग करता हो, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रति समर्पण करता हो और ऐसा व्यक्ति तो और भी नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रकटन की खोज करता हो। इसके बजाय, इंसान शैतान की सत्ता में अपने दिल के तृप्त होने तक सुख का अनुसरण करता है और कीचड़ में अपनी देह को बेहिचक भ्रष्ट करता है। जो लोग अंधकार में जीते हैं उनमें सत्य सुनने के बाद भी इसका अभ्यास करने की कोई इच्छा नहीं होती है और यह देखने के बाद भी कि परमेश्वर पहले ही प्रकट हो चुका है वे खोजने की ओर उन्मुख नहीं होते हैं। ऐसी भ्रष्ट मानवजाति के पास उद्धार की कोई गुंजाइश कैसे हो सकती है? ऐसी पतित मानवजाति रोशनी में कैसे जी सकती है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है)। “दसियों, हजारों, लाखों वर्षों से लेकर अब तक लोग इसी तरह अपना समय बरबाद करते आ रहे हैं, किसी ने भी समस्त मानव जीवन में सबसे शानदार जीवन का निर्माण नहीं किया है, वे केवल इस अँधेरी दुनिया में एक-दूसरे की हत्या, प्रसिद्धि और लाभ की दौड़ और एक-दूसरे के खिलाफ साजिशें रचने में लगे रहते हैं। किसने कभी परमेश्वर के इरादे जानने का प्रयास किया है? क्या किसी ने कभी परमेश्वर के कार्य पर ध्यान दिया है? वे सभी लोग, जिन पर अंधकार ने प्रभाव जमा लिया है, वह एक लंबे अरसे से उनकी मानव प्रकृति बन गया है, इसलिए परमेश्वर के कार्य को करना काफी कठिन हो गया है, यहाँ तक कि जो परमेश्वर ने लोगों को आज सौंपा है, उस पर वे ध्यान भी देना नहीं चाहते(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (3))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं गहरी सोच में डूब गई। पीछे मुड़कर देखती हूँ तो मैं बचपन से ही “भीड़ से ऊपर उठो और अपने पूर्वजों का नाम करो,” “आदमी ऊपर की ओर जाने के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है,” और “सबसे महान इंसान बनने के लिए व्यक्ति को सबसे बड़ी कठिनाइयाँ सहनी होंगी” जैसे विचारों से प्रभावित रही थी। मैंने ठान लिया था कि बड़ी होकर मैं सबसे अलग दिखूँगी, नाम कमाऊँगी और दूसरों से बेहतर जीवन जियूँगी। यह सब पाने के लिए, मैंने अपने छात्र जीवन में देर-देर रात तक पढ़ाई की और नौकरी में आने के बाद, अपनी जगह बनाने के लिए मैंने अपने सिद्धांतों से समझौता किया, ऑर्डर पाने के लिए ग्राहकों के साथ गुपचुप सौदेबाजी का सहारा लिया। मैं हर समय इस बात को लेकर चिंतित रहती थी कि कहीं मेरी हरकतें उजागर न हो जाएँ और मेरी इज्जत मिट्टी में न मिल जाए और इस भारी दबाव ने मेरे तन और मन को निचोड़कर रख दिया था। जब मुझे वह ऊँची तनख्वाह और पद मिला जिसका मैंने हमेशा सपना देखा था और मैंने अपने आस-पास के लोगों की प्रशंसा और ईर्ष्या हासिल कर ली, तो अपना पद पक्का करने के लिए, मैं अपने सहकर्मियों के खिलाफ साजिशें रचती रही और उनसे मुकाबला करती रही, ग्राहकों और अधिकारियों की चापलूसी करती रही और हर दिन मैंने खुद को सामाजिक आयोजनों में डुबोए रखा। लंबे समय तक अनियमित दिनचर्या और गलत जीवनशैली के कारण मेरा शरीर खतरे के संकेत देने लगा था। लेकिन प्रसिद्धि और लाभ की खातिर, मैंने रुकने की हिम्मत नहीं की। भले ही मैं जानती थी कि दूसरों की खुशामद और चापलूसी झूठ से भरी हैं और यह भी जानती थी कि परमेश्वर को मेरे धोखे भरे काम और झूठ पसंद नहीं हैं, फिर भी मैं प्रसिद्धि और लाभ के पीछे भागना छोड़ नहीं पा रही थी। भले ही इसके लिए मुझे अपनी सेहत कुर्बान करनी पड़े, सभाओं को छोड़ना पड़े और अपने आध्यात्मिक विकास में रुकावट डालनी पड़े, मैंने अपने काम को सँभालकर रखने को ही प्राथमिकता दी, जिस वजह से मैं हर दिन दर्द और तड़प में जीती रही। तब मैंने सोचा, “ऊँचा पद या ज्यादा दौलत होने का आखिर फायदा ही क्या है?” मैंने मशहूर हस्तियों, अमीर लोगों और अपनी जान-पहचान वालों के बारे में सोचा, जो प्रसिद्धि, लाभ और रुतबा पाने के बाद, अपने मन के खालीपन की वजह से रोमांच की तलाश में रहते थे। उनमें से कुछ ने जानबूझकर कानून तोड़ा और जेल गए, कुछ ने नैतिक नियमों का उल्लंघन किया, जिससे उनके परिवार टूट गए और उनकी इज्जत बर्बाद हो गई और कुछ ने तो आत्महत्या तक कर ली, ऐसा रास्ता चुना जहाँ से वापसी संभव नहीं थी। मेरे पिता इसका एक जीता-जागता उदाहरण थे। एक समय था जब उनकी अपार महिमा थी और लोग उनकी खूब तारीफ और प्रशंसा करते थे, लेकिन उनके लालच ने उन्हें बुरी प्रवृत्तियों की ओर आगे बढ़ाया और आखिर में, उन्होंने अपने कारोबार में कानून तोड़ा और जेल चले गए। मैंने देखा कि प्रसिद्धि, लाभ और रुतबा वे साधन हैं जिनका इस्तेमाल शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए करता है। उस पल, मुझे एहसास हुआ कि भले ही मैं परमेश्वर में विश्वास करती थी, लेकिन असल में मैं अब भी शैतान के वश में थी। शैतान मुझे लुभाने और तड़पाने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल कर रहा था, जिस वजह से मैं बिना किसी ईमानदारी, सम्मान और यहाँ तक कि बुनियादी जमीर के जी रही थी। मुझे एहसास हुआ कि प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के पीछे भागना मुझे सिर्फ भटकाएगा, मुझे नैतिक पतन की ओर ले जाएगा और अंत में मैं परमेश्वर को छोड़ दूँगी, उसके साथ विश्वासघात करूँगी और उद्धार पाने का अपना मौका खो दूँगी।

बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े : “जो स्त्री-पुरुष व्यक्तिगत प्रसिद्धि और लाभ का आनंद लेते हैं और लोगों के बीच निजी रुतबा तलाशते हैं; जिन लोगों को कोई मलाल नहीं है और जो पाप में फँसे हुए हैं—क्या वे तमाम लोग उद्धार से परे नहीं हैं?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (7))। “तुम लोग उन्हीं परिस्थितियों में हो जिनमें मैं हूँ, लेकिन तुम लोग मैल से ढके हो; तुम्हारे पास उन मनुष्यों की मूल समानता का छोटे से छोटा अंश भी नहीं है, जिन्हें शुरुआत में बनाया गया था। इतना ही नहीं, चूँकि तुम लोग रोज़ाना उन अशुद्ध आत्माओं की नकल करते हो, और वही करते हो जो वे करती हैं और वही कहते हो जो वे कहती हैं, इसलिए तुम लोगों के समस्त अंग—यहाँ तक कि तुम लोगों की जीभ और होंठ भी—उनके गंदे पानी से इस क़दर भीगे हुए हैं कि तुम लोग पूरी तरह से दाग़ों से ढँके हुए हो, और तुम्हारा एक भी अंग ऐसा नहीं है जिसका उपयोग मेरे कार्य के लिए किया जा सके। यह बहुत हृदय-विदारक है! तुम लोग घोड़ों और मवेशियों की ऐसी दुनिया में रहते हो, फिर भी तुम लोगों को वास्तव में परेशानी महसूस नहीं होती; तुम लोग आनंद से भरे हुए हो और आज़ादी तथा आसानी से जीते हो। तुम लोग उस गंदे पानी में तैर रहे हो, फिर भी तुम्हें वास्तव में इस बात का एहसास नहीं है कि तुम इस तरह की दुर्दशा में गिर चुके हो। हर दिन तुम अशुद्ध आत्माओं के साहचर्य में रहते हो, ‘मल-मूत्र’ के साथ व्यवहार करते हो और तुम्हारा जीवन बहुत भद्दा है; तुम वास्तव में इस बात से अवगत नहीं हो कि तुम बिल्कुल भी मनुष्यों की दुनिया में नहीं रहते और तुम अपने नियंत्रण में नहीं हो। क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारा जीवन बहुत पहले ही अशुद्ध आत्माओं द्वारा रौंद दिया गया था या कि तुम्हारा चरित्र बहुत पहले ही गंदे पानी से मैला कर दिया गया था? क्या तुम्हें लगता है कि तुम एक सांसारिक स्वर्ग में रह रहे हो और तुम खुशियों के बीच में हो? क्या तुम नहीं जानते कि तुमने अपना जीवन अशुद्ध आत्माओं के साथ बिताया है, और तुम हर उस चीज़ के साथ सह-अस्तित्व में रहे हो जो उन्होंने तुम्हारे लिए तैयार की है? तुम्हारे जीने के ढंग का कोई अर्थ कैसे हो सकता है? तुम्हारे जीवन का कोई मूल्य कैसे हो सकता है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि जो लोग प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के पीछे भागने के लिए कोई भी तरीका अपनाते हैं, वे परमेश्वर की नजरों में दुष्ट और अपवित्र हैं और उनका उद्धार नहीं हो सकता। मैंने दुनिया की मशहूर हस्तियों, राजनेताओं और बड़े-बड़े उद्योगपतियों के बारे में सोचा। उनमें से ज्यादातर लोगों में सामाजिक व्यवहार-कुशलता तो बहुत अच्छी होती है और उनके स्व-आचरण के तरीके भी बहुत चालाकी भरे होते हैं। हालाँकि वे बाहर से बहुत आकर्षक और ईर्ष्या करने लायक दिखते हैं, पर उनके काम भ्रष्ट, गिरे हुए, धोखेबाजी से भरे और दुष्टतापूर्ण होते हैं और वे ऐसे ही लोग हैं जिन्हें परमेश्वर अशुद्ध आत्माओं के रूप में उजागर करता है। मैंने सोचा कि कैसे इन सालों में मैंने प्रसिद्धि, लाभ और रुतबा पाने के लिए अपने कार्यस्थल पर तरह-तरह की सामाजिक चालें सीखी थीं—चाहे वह गुपचुप सौदेबाजी करना और ग्राहकों को रिश्वत देना हो, या फिर अधिकारियों और ग्राहकों की चापलूसी और खुशामद करना हो—ये सब धोखेबाजी के तरीके थे, ये लोगों को धोखा देने और उनसे गलत काम करवाने की चालें थीं। क्या मैंने भी उन अशुद्ध आत्माओं की तरह गलत काम करना नहीं सीख लिया था? मेरे कामों और उन अशुद्ध आत्माओं के कामों में भला क्या फर्क रह गया था? यह एहसास होते ही, मैं डर और दहशत से काँप उठी। परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है जो बुराई से घृणा करता है और उसका राज्य किसी भी अशुद्धता को स्वीकार नहीं करता। अगर मैंने पश्चात्ताप नहीं किया और प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के इसी भँवर में फँसी रही, फिर चाहे मैं कितना भी ऊँचा पद या कितने भी बड़े भौतिक सुख क्यों न पा लूँ, मैं परमेश्वर द्वारा शापित ही रहूँगी और अंत में उद्धार पाने का अपना मौका पूरी तरह से खो दूँगी।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “मेरी दया उन पर अभिव्यक्त होती है जो मुझसे प्रेम करते हैं और स्वयं का त्याग करते हैं। इस बीच, कुकर्मियों को मिला दंड निश्चित रूप से मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण है, और उससे भी बढ़कर, मेरे क्रोध की गवाही है। जब आपदा आएगी, तो मेरा विरोध करने वाले सभी अकाल और महामारी के शिकार हो जाएँगे और विलाप करेंगे। जिन्होंने कई वर्षों तक मेरा अनुसरण किया है, लेकिन सभी तरह के बुरे कर्म किए हैं, वे अपने पापों का फल भुगतने से नहीं बचेंगे; वे भी लाखों वर्षों में कभी-कभार ही दिखने वाली आपदा में डुबा दिए जाएँगे, और वे लगातार आतंक और भय की स्थिति में जिएँगे। और मेरे वे अनुयायी, जिन्होंने मेरे प्रति परम निष्ठा दर्शाई है, मेरी शक्ति की प्रशंसा करते हुए उसका आनंद लेंगे और उसका गुणगान करेंगे। वे बेफिक्र खुशी की अवर्णनीय मनोदशा का अनुभव करेंगे और ऐसे आनंद में रहेंगे जो मैंने मानवजाति को पहले कभी प्रदान नहीं किया है। क्योंकि मैं मनुष्य के अच्छे कर्मों को सँजोकर रखता हूँ और उसके बुरे कर्मों से घृणा करता हूँ। जबसे मैंने पहली बार मानवजाति की अगुआई करनी आरंभ की, तबसे मैं उत्सुकतापूर्वक मनुष्यों के ऐसे समूह को पाने की आशा करता रहा हूँ, जो मेरे साथ एकचित्त हों। इस बीच मैं उन लोगों को कभी नहीं भूलता, जो मेरे साथ एकचित्त नहीं हैं; अपने हृदय में मैं हमेशा उनसे नफरत करता हूँ, उन्हें कुकर्मों के जवाब देने को मजबूर करने के अवसर की प्रतीक्षा करता हूँ, जो कुछ ऐसा है जिसे देखकर मुझे खुशी होगी। अब अंततः मेरा दिन आ गया है, और मुझे अब और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है!(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे समझाया कि जो लोग अंत में परमेश्वर की आशीषें पा सकते हैं, वे वही हैं जो सत्य को पाते हैं और परमेश्वर के साथ एक दिल और एक मन के हो जाते हैं। आज परमेश्वर ने मुझे अपना कर्तव्य करने का जो मौका दिया है, वह इसलिए है ताकि मैं सत्य पा सकूँ, परमेश्वर को जानने की कोशिश कर सकूँ और अंत में परमेश्वर का उद्धार पा सकूँ। अगर मैं सिर्फ प्रसिद्धि और लाभ के पीछे भागने पर ही ध्यान देती और सत्य का अनुसरण करने और अच्छे कर्म तैयार करने के लिए अपने कर्तव्य पूरे करने पर ध्यान नहीं देती, तो मैं उद्धार पाने का मौका गँवा देती। इस मोड़ पर, मैं आखिरकार परमेश्वर का इरादा समझ गई और मुझे एहसास हुआ कि कर्तव्य करने का यह मौका देकर परमेश्वर मुझे बचा रहा है, वह मुझे प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के दलदल से निकलने में मदद कर रहा है। मैंने उसकी प्रबुद्धता के लिए परमेश्वर को धन्यवाद दिया और मेरा दिल बहुत हल्का हो गया। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, तुम्हारे वचनों की प्रबुद्धता के लिए तुम्हारा धन्यवाद। अब मैं न तो काम की मुश्किलों के बारे में सोचूँगी और न ही रुतबे के फायदे-नुकसान के बारे में। मैं तुम्हारी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने और अपना कर्तव्य करने को तैयार हूँ।” बाद में, मैंने नए लोगों को सींचने का कर्तव्य स्वीकार कर लिया। दिन में मैं कंपनी में काम करती और काम के बाद, भाई-बहनों के साथ इकट्ठा होकर परमेश्वर के वचनों पर संगति करती थी और मैंने कंपनी के सामाजिक आयोजनों में जाना लगभग बंद ही कर दिया था। हालाँकि मेरा कर्तव्य थोड़ा मुश्किल और थकाऊ था, पर मेरा दिल शांत और खुश था। मैंने सोचा भी नहीं था कि लगातार कई महीनों तक, न केवल मेरी टीम का प्रदर्शन लक्ष्यों को पूरा करता रहा, बल्कि जिन ग्राहकों से मैं सिर्फ फोन पर बात करती थी, उन्होंने भी कई ऑर्डर दे दिए और मेरे बॉस ने तो कंपनी की एक बैठक में मेरा नाम लेकर मेरी तारीफ भी की। मैं बहुत उत्साहित और खुश थी और मैंने देखा कि इन सब चीजों के पीछे परमेश्वर का हाथ है जो सब कुछ आयोजित कर रहा है और सब पर अपनी संप्रभुता रख रहा है।

14 नवंबर, 2009 को, मुझे कलीसिया अगुआ के रूप में चुना गया। मैं जानती थी कि यह सत्य वास्तविकताओं को समझने और उनमें प्रवेश करने का एक शानदार मौका है और मैं परमेश्वर को निराश नहीं कर सकती थी। एक अगुआ का कर्तव्य बहुत व्यस्तता भरा था और उसे अच्छी तरह से करने के लिए मैं साथ-साथ नौकरी नहीं कर सकती थी, इसलिए मैं जानती थी कि अब मुझे इस्तीफा दे देना चाहिए। जैसे ही मैंने इस्तीफा देने की हिम्मत जुटाई, कंपनी ने एक नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया था कि वे हम जैसे वरिष्ठ कर्मचारियों के लिए स्थानीय निवास परमिट बनवा सकते हैं और मेरे मामले में, मैं सीधे स्थानीय आवासीय पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकती थी। यह फायदा देखकर, मेरा मन थोड़ा डगमगा गया। मैंने सोचा, “आवासीय पंजीकरण पाना तो बाहर से आए बहुत-से लोगों का सपना होता है! इससे न केवल मुझे बेहतर जीवन और सामाजिक सुरक्षा के लाभ मिलेंगे, बल्कि समाज में मेरा रुतबा भी बढ़ेगा और ज्यादा लोग मेरा सम्मान करेंगे। यह एक बहुत ही दुर्लभ और मुश्किल से मिलने वाला मौका है! अगर मैंने इस्तीफा दे दिया, तो मुझे ऐसा अच्छा मौका फिर कभी नहीं मिलेगा। शायद मुझे आवासीय पंजीकरण पूरा होने तक इंतजार करना चाहिए और फिर इस्तीफा देना चाहिए?” लेकिन फिर मैंने लोगों को बचाने के परमेश्वर के अत्यावश्यक इरादे के बारे में सोचा और मुझे एहसास हुआ कि अगर मैं प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के लिए योजना बनाती रही, तो मैं परमेश्वर को निराश करूँगी। घर लौटकर, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे उसका इरादा समझने और सही चुनाव करने में मेरा मार्गदर्शन करने को कहा। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “मानवजाति के सदस्यों और धर्मनिष्ठ ईसाइयों के रूप में हम सबकी जिम्मेदारी और दायित्व है कि हम अपने मन और शरीर को परमेश्वर के आदेश की पूर्ति करने के लिए अर्पित करें, क्योंकि हमारा संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर से आया है और यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण अस्तित्व में है। यदि हमारा मन और शरीर परमेश्वर के आदेश और मानवजाति के न्यायसंगत कार्य को समर्पित नहीं है, तो हमारी आत्माएँ उन लोगों के सामने शर्मिंदा महसूस करेंगी जो परमेश्वर के आदेश के लिए शहीद हुए थे, और परमेश्वर के सामने तो और भी अधिक शर्मिंदा होंगी जिसने हमें सब कुछ प्रदान किया है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है)। “अगर तुम अपना हृदय, शरीर और अपना समस्त वास्तविक प्रेम परमेश्वर को समर्पित कर सकते हो, उन्हें उसके सामने रख सकते हो, उसके प्रति पूरी तरह से समर्पण कर सकते हो, उसके इरादों के प्रति पूर्णतः विचारशील हो सकते हो और देह के लिए, परिवार के लिए नहीं और अपनी इच्छाओं के लिए काम नहीं करते हो, बल्कि परमेश्वर के घर के हितों के लिए काम करते हो, परमेश्वर के वचन को हर चीज में अपने सिद्धांत और नींव के रूप में ले सकते हो, तो ऐसा करने से तुम्हारे इरादे और परिप्रेक्ष्य सब सही होंगे और तब तुम ऐसे व्यक्ति होगे जो परमेश्वर की उपस्थिति में उसकी स्वीकृति प्राप्त करता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले लोग वे होते हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं)। “मैं तुमसे अभी भी यही माँग करता हूँ कि तुम अपने पूरे अस्तित्व को मेरे संपूर्ण कार्य के लिए अर्पित कर दो; और इससे भी अधिक तुम मेरे द्वारा तुम पर किए गए संपूर्ण कार्य का स्पष्ट रूप से भेद पहचान लो और इसे सटीकता से देख लो और अपनी पूरी ऊर्जा खपा दो ताकि मेरा कार्य और बड़े नतीजे हासिल कर सके। यही चीज तुम्हें समझ लेनी चाहिए। एक-दूसरे से होड़ लेने, वैकल्पिक योजना तलाशने या अपनी देह के लिए आराम तलाशने से बाज आओ ताकि मेरे कार्य में विलंब करने और अपने अद्भुत भविष्य में बाधा डालने से बच सको। ऐसा करने से तुम्हें सुरक्षा मिलनी तो दूर रही, तुम खुद पर केवल बरबादी ले आओगे। क्या यह तुम्हारी मूर्खता नहीं होगी?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे लगा जैसे मैं परमेश्वर की पुकार सुन रही हूँ। परमेश्वर चाहता है कि हम अपनी पूरी ताकत सत्य का अनुसरण करने और अपने कर्तव्य निभाने में लगाएँ और वह हमसे एक सार्थक जीवन जीने की कोशिश करने की उम्मीद करता है। अगर मैं अपनी नौकरी छोड़ दूँ, तो शायद मेरी आर्थिक हालत पहले जैसी अच्छी नहीं रहेगी और समाज में मेरा रुतबा भी उतना ऊँचा नहीं रहेगा, लेकिन मैं परमेश्वर के घर में रह सकती हूँ, हर दिन उसके वचनों का सिंचन और पोषण पा सकती हूँ और मैं भाई-बहनों के साथ मिलकर कर्तव्य निभा सकती हूँ और उनके साथ सत्य का अनुसरण कर सकती हूँ। अपने कर्तव्यों के जरिए, मैं सत्य समझ सकती हूँ, शैतान के भ्रष्ट स्वभाव को उतार फेंक सकती हूँ और परमेश्वर का उद्धार पा सकती हूँ। यही जीवन का सही रास्ता है और सबसे सार्थक जीवन है। उस पल, मुझे लगा जैसे परमेश्वर मेरे चुनाव, मेरे जवाब का इंतजार कर रहा है। परमेश्वर के वचनों ने मेरा दिल छू लिया और मैंने परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए खुशी-खुशी सब कुछ छोड़ने का संकल्प ले लिया। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं देखती हूँ कि मुझमें कोई सत्य नहीं है और मेरे दिल में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है। आवासीय पंजीकरण पाने के लिए, मैं फिर से प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के जाल में लगभग फँस ही गई थी। तुम्हारा धन्यवाद कि तुम्हारे वचनों ने मेरी रक्षा की और यह समझाया कि मुझे सौंपा गया कर्तव्य मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम है और यह एहसास दिलाया कि सत्य का अनुसरण करना और अपना कर्तव्य पूरा करना ही सबसे सार्थक है। मैं तुम्हें एक संतोषजनक जवाब देना चाहती हूँ।” और इस तरह, कंपनी को मैंने अपना इस्तीफा सौंप दिया। कंपनी के अधिकारी मुझे रुकने के लिए मनाते रहे, लेकिन मेरा इरादा नहीं बदला। परमेश्वर की सुरक्षा से, मैं उस प्रलोभन पर काबू पा सकी।

जिस पल मैं कंपनी से निकली, मैंने नीले आसमान और हरे-भरे पेड़ों को निहारा और मुझे ऐसी खुशी मिली जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। मुझे लगा जैसे मैं एक छोटी चिड़िया हूँ जो पिंजरे से निकलकर, आजादी से फिर से आसमान में उड़ रही है और मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया जो मुझे बहुत प्रिय है : “जब लोगों के सही जीवन-लक्ष्य होते हैं, जब वे सत्य का अनुसरण करने में सक्षम होते हैं और सत्य के अनुसार आचरण करते हैं, जब वे पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं और उसके वचनों के अनुसार जीते हैं, जब वे अपने दिल की गहराई तक स्थिर और रोशन महसूस करते हैं, जब उनके दिल अँधेरे से मुक्त होते हैं और वे पूरी तरह से स्वतंत्र और मुक्त होकर परमेश्वर की उपस्थिति में जीते हैं, तभी उन्हें एक सच्चा मानव-जीवन प्राप्त होता है और केवल ऐसे लोगों में ही सत्य और मानवता होती है। इसके अलावा, जो भी सत्य तुमने समझे और प्राप्त किए हैं, वे सभी परमेश्वर के वचनों से और स्वयं परमेश्वर से आए हैं। जब तुम सर्वोच्च परमेश्वर—सृष्टिकर्ता—का अनुमोदन प्राप्त करते हो और वह कहता है कि तुम एक मानक स्तर के सृजित प्राणी हो और तुम मानव के समान जीते हो, तब तुम्हारा जीवन सबसे अधिक सार्थक होगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें)। केवल परमेश्वर में विश्वास करके और उसकी आराधना करके, सत्य का अनुसरण करके, शैतान के अंधकारमय प्रभाव से निकलकर और परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीकर ही, हम सबसे कीमती जीवन जी सकते हैं और तभी हमारे दिलों को सच्ची शांति और सुकून मिल सकता है। ये परमेश्वर के वचन ही थे जिन्होंने मुझे सही चुनाव करने की राह दिखाई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

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