31. मैंने अपनी हीन भावनाओं के समाधान का मार्ग पाया
जब मैं बच्ची थी मेरे माता-पिता अपनी रोज़ी-रोटी कमाने में व्यस्त रहते थे और उनके पास मेरी देखभाल करने का समय नहीं था, इसलिए उन्होंने मुझे पालन-पोषण के लिए मेरी नानी के घर भेज दिया। यह उस समय की बात है जब परिवार नियोजन जनगणना चल रही थी और चूँकि मेरा नाम नानी के घर में दर्ज नहीं था, इसलिए जुर्माने से बचने के लिए, जब भी गाँव में परिवार नियोजन की जाँच होती तो मेरी नानी मुझे ले जाती थी और कहीं छिपा देती थी। पड़ोसी मेरा मज़ाक उड़ाते थे कि मेरा कोई घरेलू पंजीकरण नहीं है, वे मुझे “बिना पहचान वाली” कहते और कहते कि मैं बिना माँ की बच्ची हूँ। हालाँकि मैं बच्ची ही थी, फिर भी मैं समझ सकती थी कि वे मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं। मुझे बहुत दुख होता था। मैं न तो उनसे मिलना चाहती थी और न ही दूसरे बच्चों के साथ खेलना चाहती थी। ज़्यादातर समय, मैं घर में ही बंद होकर अकेले टीवी देखती रहती, या फिर अपनी नानी के साथ खेलती थी। मेरा बचपन काफी दबा हुआ और नीरस था। बाद में, जब मैं स्कूल जाने की उम्र की हुई, तो मेरे माता-पिता मुझे घर वापस ले आए। चूँकि मैं अंतर्मुखी थी, बात करना पसंद नहीं करती थी और लोगों का अभिवादन भी नहीं करती थी, इसलिए मेरी माँ कहती थी कि मैं मंद हूँ और अपनी छोटी बहन जितनी होशियार नहीं हूँ। मुझे भी लगता था कि मुझमें बहुत कमी है, इसलिए मैं लोगों से बात करने की और भी कम इच्छुक हो गई। धीरे-धीरे, मुझे दूसरों से बात करने में मुश्किल होने लगी, और दूसरों से बात करते समय, मुझे समझ नहीं आता था कि क्या कहूँ या बातचीत कैसे शुरू करूँ। कभी-कभी मेरे मन में कुछ बातें और विचार होते थे जिन्हें मैं व्यक्त करना चाहती थी, लेकिन जब मैं बोलती, तो घबराहट और डर के कारण मैं बड़बड़ाने लगती थी। खासकर जब मैं बड़े समूहों में अपरिचित लोगों से बात करती, तो मैं इतनी घबरा जाती थी कि मेरा चेहरा लाल हो जाता था। इसलिए जब भी घर पर रिश्तेदार आते या मुझे किसी दावत में जाना होता, तो मैं हमेशा बचने की कोशिश करती, और अगर मैं मना नहीं कर पाती थी तो बस एक कोने में चुपचाप बैठ जाती थी और दूसरों को हँसते-बोलते देखती रहती थी।
परमेश्वर को पा लेने के बाद भी मैं ऐसी ही थी। मुझे एक बार एक सभा की याद है, मैंने देखा कि उसमें 50 या 60 लोग शामिल हुए हैं। मैं तुरंत सहम गई, और इतने सारे लोगों के बीच, मैंने बोलने की हिम्मत नहीं की। मैं अपनी बात ठीक से कह नहीं पाती थी, इसलिए मुझे लगा कि अगर मैं अस्पष्ट रूप से बोलूँगी या दूसरे समझ नहीं पाएँगे, तो यह बहुत अजीब और शर्मनाक होगा। इसलिए हर बार जब पर्यवेक्षक मुझसे संगति करने के लिए कहता था तो मैं चुप रहकर बस सुनती रहती थी। कभी-कभी जब मैं भाई-बहनों के साथ पेशेवर कौशलों का अध्ययन करती थी तो पर्यवेक्षक हमसे अपने-अपने विचार साझा करने के लिए कहता था और मैं घबरा जाती और संगति करने की हिम्मत नहीं कर पाती, मुझे डर लगता कि मैं स्पष्ट रूप से नहीं बोल पाऊँगी। कुछ बार, पर्यवेक्षक द्वारा पुकारे जाने के बाद मेरे पास संगति करने के अलावा कोई चारा नहीं होता था और संगति करते समय, मैं इतनी घबरा जाती थी कि मेरी आवाज़ बदल जाती थी, और जितना मैं बोलती, मेरा चेहरा उतना ही गर्म होता जाता था। अंत में, मैं स्पष्ट रूप से नहीं बोल पाती थी और बहुत शर्मिंदा महसूस करती थी। मैंने सोचा, “मैं इतनी बेकार क्यों हूँ? मैं सिर्फ अपने विचार ही तो बता रही हूँ, तो यह इतना मुश्किल और घबराहट भरा क्यों है? मैं ठीक से बोल भी नहीं सकती, मैं कैसी मूर्ख हूँ!” अपनी सहयोगी बहनों को इतने सहज और धाराप्रवाह ढंग से संगति करते देखकर मुझे बहुत ईर्ष्या होती थी, “मुझमें ऐसा आत्मविश्वास और साहस क्यों नहीं है? मेरे लिए बोलना या अपने विचार व्यक्त करना इतना मुश्किल क्यों है?” बाद में पर्यवेक्षक ने मुझे एक टीम अगुआ बना दिया। मैंने मन में सोचा, “मैं अंतर्मुखी हूँ और मेरा भाषा कौशल अच्छा नहीं हूँ और जब बहुत सारे लोग होते हैं तो मैं बोलने की हिम्मत नहीं करती हूँ। अगर भाई-बहनों के पास सवाल हुए और मैं उन्हें स्पष्ट रूप से जवाब नहीं दे पाई तो क्या होगा? क्या यह बहुत अजीब नहीं होगा?” मैं बस यह चाहती थी कि पर्यवेक्षक किसी और को ढूँढ़ लें और मैं चुपचाप एक टीम सदस्य बनी रहूँ तो बेहतर है। लेकिन मुझे डर था कि अगर मैंने कर्तव्य अस्वीकार कर दिया तो पर्यवेक्षक मेरे बारे में गलत सोचेगा, इसलिए मैंने वह विचार छोड़ दिया। बाद में भाई-बहनों के काम के बारे में पूछताछ करते समय भी मैं डरी रहती थी, और जब वे मुझसे सवाल पूछते, तो मैं हमेशा चाहती थी कि दूसरे जवाब दें, क्योंकि मुझे डर था कि मैं बातें स्पष्ट रूप से नहीं समझा पाऊँगी या उनकी समस्याओं का समाधान नहीं कर पाऊँगी। जब मैं इससे बच नहीं पाती, तो मैं खुद को मज़बूर करके कुछ शब्द कह देती, लेकिन मैं फिर भी बहुत घबराई रहती थी। खुद को इस तरह देखकर, मैं बहुत कुंठा महसूस करती, और मुझे एहसास हुआ कि यह दशा दूसरों के साथ मेरे सामान्य संवाद और मेरे कर्तव्य निभाने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। अगर मैंने इसे जल्द ही नहीं बदला, तो मैं अपने कर्तव्यों में अधिकाधिक निष्क्रिय होती जाऊँगी और इससे निश्चित रूप से काम में देरी होगी। इसलिए मैंने अपने मसलों का समाधान करने के लिए सचेत होकर सत्य खोजा।
एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े। परमेश्वर कहता है : “कायर लोगों के साथ चाहे जो भी हो जाए, जब किसी कठिनाई से उनका सामना होता है, वे पीछे हट जाते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं? एक तो यह उनकी हीनभावना के कारण होता है। चूँकि वे हीन महसूस करते हैं, इसलिए वे लोगों के सामने जाने की हिम्मत नहीं करते, वो दायित्व और जिम्मेदारियाँ भी नहीं उठा सकते जो उन्हें उठानी चाहिए, न ही वो काम अपने कंधों पर ले सकते हैं जो वे वास्तव में अपनी क्षमता और काबिलियत के दायरे में और अपनी मानवता के अनुभव के दायरे में संपन्न करने में सक्षम हैं। यह हीनभावना उनकी मानवता के हर पहलू को प्रभावित करती है, यह उनकी सत्यनिष्ठा को प्रभावित करती है और यकीनन यह उनके व्यक्तित्व को भी प्रभावित करती है। जब वे दूसरे लोगों के आसपास होते हैं, वे विरले ही अपने विचार व्यक्त करते हैं और तुम शायद ही कभी उन्हें अपने दृष्टिकोण या राय को स्पष्ट करते सुनते हो। जब उनका सामना किसी मसले से होता है तो वे बोलने की हिम्मत नहीं करते, बल्कि खुद को सिकोड़ लेते हैं और पीछे हट जाते हैं। थोड़े-से लोगों के बीच तो वे बैठने का साहस दिखाते हैं, लेकिन जब ज्यादा लोग होते हैं, तो वे अंधेरे कोने में दुबक जाते हैं, दूसरे लोगों के बीच आने की हिम्मत नहीं करते। जब कभी वे यह दिखाने के लिए कि उनकी सोच सही है, सकारात्मक और सक्रिय रूप से कुछ कहना और अपने विचार और राय व्यक्त करना चाहते हैं, तब उनमें ऐसा करने की भी हिम्मत नहीं होती। जब कभी उनके मन में ऐसे विचार आते हैं, उनकी हीनभावना एक ही बार में उफन पड़ती है, उन पर नियंत्रण कर उन्हें दबा देती है और कहती है, ‘कुछ मत कहो, तुम किसी काम के नहीं हो। अपने विचार व्यक्त मत करो, अपने तक ही रखो। अगर तुम सचमुच अपने दिल की कोई बात कहना चाहते हो, तो कंप्यूटर पर लिखकर उस बारे में खुद ही मनन करो। तुम्हें इस बारे में किसी और को जानने नहीं देना चाहिए। तुमने कुछ गलत कह दिया तो क्या होगा? यह बड़ी शर्मिंदगी की बात होगी!’ यह आवाज तुमसे कहती रहती है, यह मत करो, वह मत करो, यह मत बोलो, वह मत बोलो, जिस वजह से तुम्हें अपनी हर बात निगलनी पड़ती है। जब तुम ऐसी कोई बात कहना चाहते हो जिस पर तुमने मन-ही-मन बहुत मनन किया है, तब तुम पीछे हट जाते हो, कहने की हिम्मत नहीं करते या कहने में शर्मिंदा महसूस करते हो, यह सोचते हो कि तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, और अगर ऐसा कर देते हो, तो तुम्हें लगता है कि तुमने कोई नियम तोड़ा है या कानून का उल्लंघन किया है। और जब किसी दिन तुम सक्रिय होकर अपने विचार व्यक्त कर देते हो, तो भीतर गहराई में बेहद बेचैन और विचलित हो जाते हो। भले ही अत्यधिक बेचैनी की यह भावना धीरे-धीरे धूमिल हो जाती है, फिर भी तुम्हारी हीनभावना तुम्हारे उन विचारों, इरादों और योजनाओं का धीरे-धीरे गला घोंट देती है जो तुम अपने विचार व्यक्त करना चाहने, एक सामान्य व्यक्ति बनना चाहने और हर किसी की तरह बनना चाहने के लिए रखते हो। जो लोग तुम्हें नहीं समझते उन्हें लगता है कि तुम कम बोलने वाले, शांत, संकोची व्यक्तित्व वाले, भीड़ में अलग न दिखने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति हो। जब तुम बहुत-से दूसरे लोगों के सामने बोलते हो, तो तुम्हें शर्मिंदगी महसूस होती है, और तुम्हारा चेहरा लाल हो जाता है; तुम थोड़े अंतर्मुखी हो, वास्तव में सिर्फ तुम्हीं जानते हो कि तुम हीनभावना से ग्रस्त हो। ... यूँ तो इस भावना को भ्रष्ट स्वभाव नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह पहले ही बहुत गंभीर नकारात्मक प्रभाव डाल चुकी है; यह उनकी मानवता को गंभीर नुकसान पहुँचाती है, उनकी विविध भावनाओं, और उनकी सामान्य मानवता की बातों और कार्यों पर बहुत नकारात्मक प्रभाव डालती है जिसके अत्यंत गंभीर परिणाम होते हैं। इसका गौण प्रभाव है उनके व्यक्तित्व, उनकी अभिरुचियों और उनकी महत्वाकांक्षाओं को प्रभावित करना; इसका प्रमुख प्रभाव है जीवन के उनके उद्देश्यों और दिशा को प्रभावित करना। इस हीनभावना को तुम चाहे इसके कारणों, इसकी प्रक्रिया और व्यक्ति पर होने वाले इसके परिणामों में से जिस भी पहलू से देख लो, क्या यह ऐसी चीज नहीं है जिसे लोगों को त्याग देना चाहिए? (हाँ।)” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (1))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं वास्तव में हीन भावना महसूस करती हूँ। परमेश्वर ने हीन भावना की जिस दशा और अभिव्यक्तियों को उजागर किया था वे सब मुझमें दिखती थीं। मेरा दिल हीनता की भावनाओं से बँधा हुआ था, और मुझे हमेशा लगता था कि मैं कई मायनों में अच्छी नहीं हूँ। लोगों से मिलते-जुलते समय जब बहुत सारे लोग होते थे तो मैं बोलने से डरती थी या मैं एक कोने में छिप जाती थी और चुप रहती थी। अपने कर्तव्यों में, जब भी मुझे अपने विचार व्यक्त करने की ज़रूरत होती थी तो मैं न चाहते हुए भी घबरा जाती थी और मेरे विचार इस बारे में नहीं होते थे कि अपने कर्तव्य अच्छे से निभाने के लिए हर एक के साथ कैसे सहयोग करूँ बल्कि, मुझे लगता था कि मेरा भाषाई कौशल पर्याप्त नहीं है, मैं पते की बात नहीं करती हूँ और मैं चाहती थी कि दूसरे ही संगति करें। जब कुछ मुद्दों पर मेरी कोई राय या विचार होते, तो मैं हिचकिचाती रहती, सोचती, “मुझे बोलना चाहिए या नहीं? क्या मेरी राय सही है? क्या दूसरे मुझसे सहमत होंगे? छोड़ो भी, बेहतर है मैं न ही बोलूँ। बस दूसरों के दृष्टिकोण सुनना ही सबसे अच्छा है।” मैं अक्सर इन विचारों से प्रभावित रहती थी, मानो मेरा मुँह सिल गया हो और गला अवरुद्ध हो गया हो, जिस कारण मैं बहुत सी स्थितियों में अपने दृष्टिकोण और पक्ष नहीं रख पाती थी। पर्यवेक्षक ने मुझसे एक टीम अगुआ बनने को कहा और मैं जानती थी कि यह कर्तव्य ले चुकने के बाद मुझे अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए, लेकिन हर बार जब मुझे कार्य के बारे में पूछना होता था तो मेरे मुँह से शब्द नहीं निकल पाते थे, मुझे यह चिंता होती थी कि मैं बातें स्पष्ट रूप से नहीं समझा पाऊँगी और दूसरे समझेंगे नहीं। यह वास्तव में लज्जाजनक होगा! इसलिए मैं हमेशा यह चाहती थी कि कोई बोलने में बेहतर व्यक्ति भाई-बहनों के सवालों के जवाब दे और मैं एक ओर से बस सुनती और सहमत होती रहूँगी। नतीजतन, मैं अपनी वे जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कर सकी जो मुझे करनी चाहिए थीं, और मैं अपने कर्तव्यों में और भी निष्क्रिय होती गई। हीनता की इस नकारात्मक भावना का मुझ पर वास्तव में बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा, जिससे मैं और भी डरपोक और निष्क्रिय हो गई, और यहाँ तक कि दूसरों के साथ सामान्य रूप से संवाद भी नहीं कर पाती थी। मैंने अपनी ज़िम्मेदारी की भावना और आगे बढ़ने का जज़्बा खो दिया, और मैंने अधिकाधिक अपने बारे में नकारात्मक रूप से राय बनाई और अपने बारे में फैसले दिए और मेरी पीछे हटने की इच्छा और बलवती होती गई। मैंने देखा कि हीनता की इन भावनाओं से बँधे और विवश होकर जीना कैसा पीड़ादायक था।
इसके बाद मैंने इस मसले के समाधान खोजे और मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “सतह पर तो हीनभावना एक भावना है जो लोगों में अभिव्यक्त होती है; लेकिन दरअसल इसका मूल कारण शैतान की भ्रष्टता, लोगों के जीवन का परिवेश, और लोगों के अपने वस्तुनिष्ठ कारण हैं। पूरी मानवजाति उस बुरे की शक्ति के अधीन है, शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट की जा चुकी है, और कोई भी अगली पीढ़ी को सत्य के अनुसार, परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं सिखाता; इसके बजाय वे शैतान से आई चीजों के अनुसार सिखाते हैं। इसलिए, लोगों के स्वभाव और सार को भ्रष्ट करने के अलावा अगली पीढ़ी और मानवजाति को शैतान की चीजों की शिक्षा देने का परिणाम यह है कि इससे लोगों में नकारात्मक भावनाएँ पैदा होती हैं। यदि पैदा हुई नकारात्मक भावनाएँ अस्थाई हों, तो उनका व्यक्ति के जीवन पर अत्यधिक असर नहीं होगा। लेकिन यदि नकारात्मक भावना व्यक्ति के अंतरतम और अंतरात्मा में गहरे पैठ जाए और अमिट रूप से चिपक जाए, यदि वह इसे भुलाने या इससे मुक्त होने में पूरी तरह असमर्थ हो जाए, तो यह उसके हर फैसले, हर प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों से पेश आने के तरीके, सिद्धांत के प्रमुख मामलों से सामना होने पर विकल्प चुनने और जीवन में उसके द्वारा अपनाए जाने वाले मार्ग को अनिवार्य रूप से प्रभावित करेगी—यह है वह प्रभाव जो प्रत्येक व्यक्ति पर वास्तविक मानव समाज डालता है। दूसरा पहलू है लोगों के अपने वस्तुनिष्ठ कारण। यानी, बड़े होते समय लोगों द्वारा प्राप्त शिक्षा और सीख, उनकी हर सोच और विचार के साथ-साथ वे आचरण के जो तरीके स्वीकारते हैं, और साथ ही विभिन्न इंसानी कहावतें, सब-कुछ शैतान से ही आते हैं, इस हद तक कि लोगों का जिन मसलों से सामना होता है, उनको सही परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण से संभालने और दूर करने की क्षमता उनमें नहीं होती। इसलिए अनजाने में ही इस अप्रिय माहौल के प्रभाव में, और इससे उत्पीड़ित और नियंत्रित होते हुए मनुष्य सिवा इसके कुछ और नहीं कर सकता कि वह विभिन्न नकारात्मक भावनाएँ विकसित कर ले और इनका इस्तेमाल उन समस्याओं का प्रतिरोध करने की कोशिश में करे जिन्हें हल करने, बदलने या दूर करने कोई भी क्षमता उसमें नहीं है। उदाहरण के रूप में हीनभावना के भाव को ही लेते हैं। तुम्हारे माता-पिता, शिक्षकों, तुम्हारे बड़े-बुजुर्गों और तुम्हारे आसपास के दूसरे लोगों के पास तुम्हारी काबिलियत, मानवता और सत्यनिष्ठा का एक अवास्तविक आकलन होता है, और अंततः यह तुम्हारे साथ जो करता है वह है तुम पर हमला, तुम्हारा उत्पीड़न, तुम्हारा दम घोटना, तुम्हें जंजीर में जकड़ना और तुम्हें बाँधना। आखिर जब तुममें और अधिक प्रतिरोध करने की शक्ति नहीं होती है तो तुम्हारे पास एक ऐसा जीवन चुनने के सिवा कोई और विकल्प नहीं बचता कि तुम खामोशी से अपमान और निरादर स्वीकारते रहो, अपनी समझ के विरुद्ध जाकर खामोशी से इस प्रकार की अनुचित और अन्यायपूर्ण वास्तविकता को स्वीकारते रहो। जब तुम इस वास्तविकता को स्वीकार करते हो तो आखिरकार तुममें जो भावनाएँ पैदा होती हैं, वे सुखद, संतुष्टिप्रद, सकारात्मक या प्रगतिशील नहीं होतीं; तुम मानव जीवन के सटीक और सही लक्ष्यों का अनुसरण करना तो दूर रहा, तुम और अधिक अभिप्रेरणा और दिशा सहित भी नहीं जीते, बल्कि तुम्हारे भीतर एक गहन हीनभावना का भाव पैदा हो जाता है। जब तुममें यह भावना पैदा होती है तो तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास अब कोई रास्ता नहीं रहा। जब तुम्हारा सामना किसी ऐसे मसले से होता है जिस पर तुमसे दृष्टिकोण व्यक्त करने की अपेक्षा की जाती है तो तुम अपने अंतरतम में न जाने कितनी बार विचार करोगे कि तुम क्या कहना चाहते हो और कौन-सा दृष्टिकोण व्यक्त करना चाहते हो, फिर भी तुम इसे पुरजोर ढंग से कह डालने का साहस नहीं जुटा पाते हो। जब कोई ठीक वही दृष्टिकोण व्यक्त कर देता है जो तुम्हारा है तो तुम अपने भीतर इस बात की पुष्टि महसूस होने दोगे कि तुम दूसरे लोगों से बदतर नहीं हो। लेकिन जब वही स्थिति दोबारा आती है तो तुम अभी भी खुद से कहते हो, ‘मैं हल्केपन में नहीं बोल सकता, कुछ भी उतावलेपन में नहीं कर सकता या खुद को हँसी का पात्र नहीं बना सकता। मैं अच्छा नहीं हूँ, बेवकूफ हूँ, मूर्ख हूँ, जड़बुद्धि हूँ। मुझे सीखने की जरूरत है कि कैसे छुपकर रहूँ और बस सुनूँ, बोलूँ नहीं।’ इससे हम देख सकते हैं कि हीनभावना का भाव पैदा होने के बिंदु से लेकर उसके व्यक्ति के अंतरतम में गहराई से पैठने तक क्या व्यक्ति को अपनी स्वतंत्र इच्छा और परमेश्वर के दिए वैध अधिकारों से वंचित नहीं किया गया है? (हाँ।) उसे इन चीजों से वंचित कर दिया गया है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (1))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं यह चिंतन करने लगी कि मैं क्यों इतनी डरपोक हूँ और मुझमें हीनता की ऐसी भावनाएँ क्यों हैं और मैं अपने अतीत के बारे में सोचे बिना नहीं रह सकी। जब मैं छोटी थी तो परिवार नियोजन की जनगणना से बचने के लिए मेरा पालन-पोषण मेरी नानी के घर पर हुआ और मुझे अक्सर अपनी नानी के साथ भागना और छिपना पड़ता था। इसका मेरे दिल पर बुरा असर पड़ा और मैं सचमुच डरपोक बन गई। चूँकि मेरे माता-पिता आस-पास नहीं थे, पड़ोस की एक चाची मुझे “बिना पहचान वाली” कहकर मेरा मज़ाक उड़ाती थी और मेरी उम्र के बच्चे भी मुझे बिना माँ की बच्ची कहकर चिढ़ाते थे। ऐसा लगता था जैसे मैं एक धूसर, धूपविहीन आसमान तले जी रही हूँ और मैं बहुत अकेला और दबा हुआ महसूस करती थी, सोचती थी कि मैं दूसरे बच्चों से अलग हूँ। उनके पास उनके माता और पिता दोनों होते थे, लेकिन मेरे पास नहीं। यह सब होने पर मैं बाहर जाना पसंद नहीं करती थी, मैं लोगों से मिलने से डरती थी और मैं अधिकाधिक चुप रहने वाली बन गई। स्कूल जाना शुरू करने के बाद चूँकि मैं डरपोक थी और मुझमें सुरक्षा की भावना की कमी थी, इसलिए मैं छुट्टी के दौरान अपने सहपाठियों से शायद ही कभी बात करती थी। मैं उन्हें कक्षा के बाद बातें करते, हँसते और खेलते हुए देखती, लेकिन मैं केवल उन्हें देख और उनसे जल सकती थी, हमेशा यह महसूस करती थी कि मैं उनसे अलग हूँ। एक अनुभव जिसने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी, वह एक चीनी भाषा की कक्षा के दौरान हुआ। चूँकि एक सवाल का जवाब देते समय मेरी आवाज़ बहुत धीमी थी, तो शिक्षिका ने व्यंग्यात्मक ढंग से कहा, “मुझे तुम्हारे लिए एक मेगाफोन लाना पड़ेगा,” और जैसे ही उन्होंने यह कहा, पूरी कक्षा ठहाके लगाकर हँस पड़ी। उस पल, मुझे लगा कि मैं पूरी कक्षा के लिए मज़ाक का पात्र बन गई हूँ, और मैं बस अपना चेहरा छिपाना चाहती थी। मेरे औसत अंकों और शिक्षिका की नापसंदगी के कारण और फिर इस तरह मज़ाक उड़ाए जाने के बाद मेरे आत्म-सम्मान को गंभीर चोट पहुँची। जब मैं अपने माता-पिता के घर लौटी तो मैंने देखा कि वे अक्सर झगड़ते थे और मैं और भी ज़्यादा दबा हुआ और अकेला महसूस करने लगी। चूँकि मैं लंबे समय तक इस भावनात्मक दशा में फँसी रही, इसलिए मुझे बहुत से विचारों और भावनाओं को खुद दिल में दबाना पड़ता था। चूँकि मैं हमेशा चुप रहती थी और लोगों या स्थितियों को सँभालते समय अजीब लगती थी, तो मेरे माता-पिता मुझ पर गुस्सा होते और बेबस हो जाते, और मुझसे कहते : “क्या तुम मूर्ख हो? तुम ठीक से बोल भी नहीं सकती हो, मानो तुम्हारी जुबान सिली हुई हो?” समय के साथ, मैं यह मानने लगी कि मैं किसी काम की नहीं हूँ और मैं बोलने में अच्छी नहीं हूँ, और ये मूल्यांकन मुझ पर एक ठप्पे की तरह चिपक गए, जिससे मेरे अंदर हीन भावना ने पक्की जड़ जमा ली। इस हद तक कि, जब मुझे अपने कर्तव्यों में अपने विचार व्यक्त करने की ज़रूरत होती, तो मेरे पास स्पष्ट राय और विचार होते थे, लेकिन मैं बोलने से बहुत डरती थी, हमेशा इस बात से डरती थी कि मेरी बातें अनुपयुक्त हो सकती हैं और इसलिए उन्हें अस्वीकार कर दिया जाएगा, जिससे मैं और भी बुरी दिखूँगी। लेकिन असल में, बाद में मेरे बहुत सारे दृष्टिकोण और सुझाव उपयुक्त और विचार करने योग्य साबित हुए। इन बातों पर विचार करने पर, मैं अपनी हीनता की भावनाओं के कारणों को और अधिक स्पष्ट रूप से समझने लगी। बाहरी परिस्थितियों के प्रभाव के कारण, मैंने अपने बारे में लगातार नकारात्मक रूप से राय बनाई थी और फैसले दिए थे, और समय के साथ, मैंने अपनी पहल खो दी, और दूसरों के साथ बातचीत करने और अपना कर्तव्य निभाने, दोनों ही मामलों में मैं और ज़्यादा निष्क्रिय और डरपोक होती चली गई।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “तुममें हीनभावना का भाव किसी भी स्थिति के कारण, या किसी भी व्यक्ति या घटना के कारण पैदा हुआ हो, तुम्हें अपनी काबिलियत, खूबियों, प्रतिभाओं और अपने चरित्र की सही समझ होनी चाहिए। हीन महसूस करना सही नहीं है, न ही श्रेष्ठ महसूस करना सही है—ये दोनों ही नकारात्मक भावनाएँ हैं। हीनभावना तुम्हारे कार्यों, तुम्हारी सोच को बाँध सकती है, तुम्हारे विचारों और दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकती है। इसी तरह, ऊँचे होने की भावना का भी यही नकारात्मक प्रभाव होता है। इसलिए, हीनता हो या कोई और नकारात्मक भावना, तुम्हें उन व्याख्याओं के प्रति सही समझ रखनी चाहिए जिनके कारण यह भावना पैदा होती है। अव्वल तो तुम्हें समझ लेना चाहिए कि ये व्याख्याएँ गलत हैं, और चाहे ये तुम्हारी काबिलियत, प्रतिभा या तुम्हारे चरित्र के बारे में हों, तुम्हारे बारे में किए गए उनके आकलन और निष्कर्ष हमेशा गलत होते हैं। तो फिर तुम स्वयं का सही आकलन कर स्वयं को कैसे जान सकते हो, और हीनभावना के भाव से कैसे दूर हो सकते हो? तुम्हें स्वयं के बारे में ज्ञान प्राप्त करने, अपनी मानवता, योग्यता, प्रतिभा और खूबियों के बारे में जानने के लिए परमेश्वर के वचनों को आधार बनाना चाहिए। ... ऐसी स्थिति में, तुम्हें सही आकलन करना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के अनुसार खुद को सही मापना चाहिए। तुमने जो सीखा है और जिसमें तुम्हारी खूबियाँ हैं, उसे तय करना चाहिए, और जाकर वह काम करना चाहिए जो तुम कर सकते हो; वे काम जो तुम नहीं कर सकते, तुम्हारी जो कमियाँ और खामियाँ हैं, उनके बारे में आत्म-चिंतन कर उन्हें जानना चाहिए, और सही आकलन कर जानना चाहिए कि तुम्हारी योग्यता क्या है, यह अच्छी है या नहीं। अगर तुम अपनी समस्याओं को नहीं समझ सकते या उनका स्पष्ट ज्ञान नहीं पा सकते हो तो फिर अपने आसपास के उन लोगों से पूछो जिनमें तुम्हारा आकलन करने की समझ है। उनकी बातें सही हों या न हों, उनसे कम-से-कम तुम्हें एक संदर्भ मिल जाएगा जो तुम्हें इस योग्य बनाएगा कि स्वयं की बुनियादी परख या निरूपण कर सको। फिर तुम हीनभावना के नकारात्मक भाव की बुनियादी समस्या को सुलझा सकते हो और धीरे-धीरे इससे उबर सकते हो। हीनभावनाओं का भाव सुलझाना आसान है अगर कोई इसका भेद पहचान ले, इसके प्रति जागरूक हो जाए और सत्य खोजे” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (1))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे अपनी हीनता की भावनाओं को छोड़ने का रास्ता मिल गया। वह था परमेश्वर के वचनों के आधार पर अपना सही और निष्पक्ष रूप से मूल्यांकन करना। मैं लगातार इन पुरानी यादों में डूबी नहीं रह सकती थी, अतीत के सायों और दूसरों के मेरे बारे में गलत मूल्यांकनों से विवश नहीं रह सकती थी, यहाँ तक कि इन चीज़ों को अपने विचारों और जीवन को नियंत्रित करने नहीं दे सकती थी। मुझे परमेश्वर के वचनों के अनुसार खुद को मापना और मूल्यांकन करना चाहिए, और अपनी ताकतों और कमजोरियों को सही ढंग से देखना चाहिए। मैं अपने बारे में वस्तुपरक राय बनाने के लिए अपने आस-पास के लोगों के मूल्यांकनों पर भी विचार कर सकती थी। मुझे याद आया कि जिन भाई-बहनों के साथ मैं सहयोग करती थी, वे मेरा मूल्यांकन कैसे करते थे। वे कहते थे कि मेरी काबिलियत ठीकठाक है, मेरी समझ विकृत नहीं है स्थितियों का सामना करते समय मेरे पास अपने विचार होते हैं और अपने कर्तव्यों में मेरे पास बोझ और जिम्मेदारी की भावना होती है। मैंने देखा कि यूँ तो मैं बहुत काबिल और चतुर नहीं थी और मुझमें बहुत ऊँची काबिलियत नहीं थी, लेकिन मैं कोई कम काबिलियत या बिना विचारों वाली इंसान नहीं थी। इसके अलावा, भाई-बहन मुझे अंतर्मुखी और बोलने में कमजोर होने के कारण नापसंद नहीं करते थे। बल्कि, जब मैं घबरा जाती थी और स्पष्ट रूप से नहीं बोल पाती थी तो मैं जो कहने की कोशिश कर रही होती थी वे उसे स्पष्ट करने और उसमें जोड़ने में मदद करते थे। इससे मुझे भाई-बहनों के बीच सच्ची मदद महसूस हुई, जिसमें कोई नीचा दिखाना न था और नापसंदगी नहीं थी।
बाद में मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सामान्य मानवता में रहने वाले लोग कई शारीरिक प्रवृत्तियों और शारीरिक आवश्यकताओं से भी प्रतिबंधित होते हैं। ... कभी-कभी लोग भावनाओं और शारीरिक आवश्यकताओं से बेबस हो सकते हैं और कभी-कभी वे शारीरिक प्रवृत्तियों या समय और व्यक्तित्व के प्रतिबंधों के अधीन हो सकते हैं—यह सामान्य और प्राकृतिक है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बचपन से ही काफी अंतर्मुखी होते हैं; वे बात करना पसंद नहीं करते हैं और दूसरों से मेलजोल रखने में उन्हें दिक्कतें आती हैं। यहाँ तक कि तीस या चालीस वर्ष के वयस्क हो जाने के बाद भी वे इस व्यक्तित्व से उबर नहीं पाते हैं : वे अभी भी बोलने में कुशल या संप्रेषण में अच्छे नहीं होते, न ही वे दूसरों के साथ मेलजोल रखने में अच्छे होते हैं। अगुआ बनने के बाद उनके व्यक्तित्व का यह गुण उनके कार्य को कुछ हद तक सीमित और बाधित करता है, और उन्हें अक्सर इसके कारण तनाव और हताशा होती है जिससे वे बहुत बेबस महसूस करते हैं। अंतर्मुखी होना और बात करना पसंद नहीं करना सामान्य मानवता की अभिव्यक्तियाँ हैं। चूँकि ये सामान्य मानवता की अभिव्यक्तियाँ हैं, तो क्या उन्हें परमेश्वर के प्रति अपराध माना जाता है? नहीं, ये अपराध नहीं हैं और परमेश्वर उनके साथ सही तरह से व्यवहार करेगा। चाहे तुम्हारी समस्याएँ, दोष या खामियाँ कुछ भी हों, इनमें से कोई भी चीज परमेश्वर की नजर में मुद्दा नहीं है। परमेश्वर सिर्फ यह देखता है कि तुम किस तरह से सत्य की तलाश करते हो, किस तरह से सत्य का अभ्यास करते हो, किस तरह से सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हो और सामान्य मानवता की अंतर्निहित स्थितियों के तहत परमेश्वर के मार्ग पर चलते हो—परमेश्वर इन्हीं चीजों को देखता है” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मेरे दिल ने और अधिक उजला महसूस किया। मैं अंतर्मुखी होने और बोलने में कमजोर होने के लिए खुद को हमेशा नापसंद करती थी और मैं अक्सर अपने सहपाठियों और सहकर्मियों द्वारा नीची नजरों से देखी जाती थी और तुच्छ समझी जाती थी, लेकिन परमेश्वर कहता है कि ये चीज़ें सामान्य मानवता की अभिव्यक्तियाँ हैं। मुझे आखिरकार एहसास हुआ कि अंतर्मुखी और बोलने में कमजोर होना गलत नहीं है, और यह कोई शर्मिंदा होने वाली बात नहीं है। किसी व्यक्ति का अंतर्निहित व्यक्तित्व बदला नहीं जा सकता, और परमेश्वर का कार्य यह नहीं है कि वह किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को बदल दे, अंतर्मुखियों को बहिर्मुखी बना दे और जो बोलने में अच्छे नहीं हैं उन्हें वाक्पटु वक्ता बना दे। बल्कि, परमेश्वर का कार्य किसी व्यक्ति के भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करने और बदलने पर केंद्रित होता है और परमेश्वर सामान्य मानवता के भीतर की कमियों और खामियों की निंदा नहीं करता है। परमेश्वर यह देखता है कि क्या कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण कर सकता है और क्या वह उसके वचनों को सुन सकता है और इनके अनुसार अभ्यास कर सकता है। यह समझकर मैंने अपने अंतर्मुखी व्यक्तित्व या कमजोर वक्तृत्व कौशल से अब और परेशानी महसूस नहीं की और मैं खुद को अब और नापसंद नहीं करती थी। मुझे अपनी कमियों को सही ढंग से पेश आना चाहिए और जब मुझे अपनी राय व्यक्त करनी हो, तो मुझे हमेशा यह नहीं सोचना चाहिए, “मैं यह नहीं कर सकती। मैं अंतर्मुखी हूँ और बोलने में खराब हूँ,” और इसके बजाय, मुझे अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए। आगे चलकर मैंने अपने कर्तव्यों में सचेत होकर परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास किया।
बाद में, जब मैं काम के बारे में पूछताछ कर रही थी, तो मैंने देखा कि कुछ भाई-बहन अपने कर्तव्यों में निष्क्रिय थे। मैंने उन्हें प्रोत्साहित करने के बारे में सोचा, लेकिन जब मैं एक संदेश भेजने वाली थी, तो मैं चिंतित हो गई, सोचने लगी, “मुझे यह कैसे कहना चाहिए? क्या वे संदेश पर सक्रिय रूप से प्रतिक्रिया देंगे? अगर वे मुझसे सवाल पूछते हैं और मैं उन्हें ठीक से जवाब नहीं दे पाई, तो कितनी असहज स्थिति हो जाएगी!” इस तरह सोचने पर, मैंने संदेश भेजने की हिम्मत नहीं की। मुझे एहसास हुआ कि मैं एक बार फिर अपनी हीनता की भावनाओं से बँध गई थी। मैंने कुछ दिन पहले पढ़े परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “चाहे तुम्हारी समस्याएँ, दोष या खामियाँ कुछ भी हों, इनमें से कोई भी चीज परमेश्वर की नजर में मुद्दा नहीं है। परमेश्वर सिर्फ यह देखता है कि तुम किस तरह से सत्य की तलाश करते हो, किस तरह से सत्य का अभ्यास करते हो, किस तरह से सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हो और सामान्य मानवता की अंतर्निहित स्थितियों के तहत परमेश्वर के मार्ग पर चलते हो—परमेश्वर इन्हीं चीजों को देखता है” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। उस पल, मुझे लगा कि मेरे पास दिशा और रास्ता है। चाहे मेरे भाई-बहन सक्रिय रूप से प्रतिक्रिया दें या न दें, मुझे फिर भी अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। इसलिए मैंने उन्हें उनके काम में प्रोत्साहित करने के लिए एक संदेश भेजा। जब उन्होंने मुझसे कुछ सवाल पूछे तो मैं जितना जानती थी मैंने उतना जवाब दिया और इस तरह अभ्यास करने से मुझे सुकून महसूस हुआ। मैंने अनुभव किया कि परमेश्वर के वचन ही वास्तव में इस चीज की दिशा और कसौटी हैं कि लोगों को कैसे कार्य करना चाहिए।
बाद में एक बहन ने मुझे यह चिंतन करने की याद दिलाई : हीनता की भावनाओं से प्रभावित होने के अलावा, कौन-से भ्रष्ट स्वभाव मुझे तब बाधित कर रहे थे जब मैं अपने कर्तव्य में हमेशा निष्क्रिय रहती थी और पीछे हट जाती थी? बहन ने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश भेजा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परिवार लोगों पर एक-दो कहावतों से नहीं, बल्कि अनेक प्रसिद्ध उद्धरणों और सूक्तियों के शिक्षा के प्रभाव से गहरा असर डालता है। उदाहरण के लिए, क्या तुम्हारे परिवार के बुजुर्ग और माँ-बाप अक्सर इस कहावत का उल्लेख करते हैं, ‘एक व्यक्ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज करता जाता है’? (हाँ।) वे तुमसे कह रहे हैं : ‘लोगों को अपनी प्रतिष्ठा की खातिर जीना चाहिए। लोगों को अपने जीवनकाल में एक अच्छी प्रतिष्ठा अर्जित करने और दूसरों के मन पर अच्छी छाप छोड़ने के अलावा और कुछ नहीं खोजना चाहिए। तुम जिससे भी बात करो, उससे मनभावन बातें करो, केवल चापलूसी और दयालुता की बातें करो और उसे नाराज मत करो। इसके बजाय, अच्छी चीजें और नेक क्रियाकलाप और अधिक करो।’ परिवार द्वारा दी गई इस विशेष शिक्षा के प्रभाव का लोगों के व्यवहार या आचरण के सिद्धांतों पर विशेष प्रभाव पड़ता है, जिसका अपरिहार्य नतीजा यह होता है कि वे शोहरत और लाभ को ज्यादा अहमियत देते हैं। यानी, वे अपनी प्रतिष्ठा, साख, लोगों के मन में बनाई अपनी छवि और वे जो कुछ भी करते हैं और जो भी राय व्यक्त करते हैं उसके बारे में दूसरों के मूल्यांकन को बहुत महत्व देते हैं। लोग प्रसिद्धि और लाभ को बहुत महत्व देते हैं, इसलिए पारंपरिक संस्कृति की उन जानी-मानी कहावतों के शब्द और चीजों से निपटने के सिद्धांत उनके दिलों में एक प्रमुख स्थान ले लेते हैं, यहाँ तक कि उन पर पूरी तरह से कब्ज़ा कर लेते हैं। अनजाने में, वे इस चीज को महत्वहीन समझने लगते हैं कि क्या वे अपना कर्तव्य सत्य और सिद्धांतों के अनुसार निभा रहे हैं और वे तो ऐसे विचारों को पूरी तरह त्याग भी सकते हैं। उनके दिलों में, वे शैतानी फलसफे और पारंपरिक संस्कृति की जानी-मानी कहावतें, जैसे कि—‘एक व्यक्ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज करता जाता है,’ विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन जाती हैं। ... तुम जो कुछ भी करते हो वह सत्य का अभ्यास करने की खातिर नहीं है, न ही यह परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए है, बल्कि यह सब तुम्हारी प्रतिष्ठा की खातिर है। इस तरह, तुमने जो कुछ भी किया वह प्रभावी रूप से क्या बन जाता है? यह प्रभावी रूप से एक धार्मिक कार्य बन जाता है। तुम्हारे सार का स्वरूप अब क्या बन गया है? तुम फरीसियों का प्रतिरूप बन गए हो। तुम्हारे मार्ग का स्वरूप अब क्या बन गया है? यह मसीह-विरोधियों का मार्ग बन गया है। परमेश्वर इसी तरह इसे निरूपित करता है। तो, तुम जो भी करते हो उसका सार दूषित हो गया है, यह अब पहले जैसा नहीं रहा; तुम सत्य का अभ्यास या उसका अनुसरण नहीं कर रहे, बल्कि तुम शोहरत और लाभ के पीछे भाग रहे हो। आखिरकार, जहाँ तक परमेश्वर का संबंध है, तुम्हारे कर्तव्य का निर्वहन—एक शब्द में कहें तो—मानक स्तर का नहीं है। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए क्योंकि तुम परमेश्वर के आदेश या एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित होने के बजाय, केवल अपनी प्रतिष्ठा के प्रति समर्पित हो। ... क्योंकि तुम जो कुछ भी करते हो उसका सार केवल तुम्हारी प्रतिष्ठा की खातिर और सिर्फ इस कहावत को अभ्यास में लाने के लिए होता है कि ‘एक व्यक्ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज करता जाता है।’ तुम सत्य का अनुसरण नहीं कर रहे हो, और तुम्हें खुद ही यह पता नहीं है। तुम्हें लगता है कि इस कहावत में कुछ भी गलत नहीं है; क्या लोगों को अपनी प्रतिष्ठा के लिए नहीं जीना चाहिए? जैसी कि आम कहावत है, ‘एक व्यक्ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज करता जाता है।’ यह कहावत बहुत सकारात्मक और उचित लगती है, तो तुम अनजाने में इसकी शिक्षा के प्रभाव को स्वीकार कर लेते हो और इसे एक सकारात्मक चीज मानते हो। इस कहावत को एक सकारात्मक चीज मानने के बाद तुम अनजाने में इसका अनुसरण और अभ्यास कर रहे होते हो। इसी के साथ, तुम अनजाने में और भ्रमित होकर इसे सत्य की कसौटी मान लेते हो। जब तुम इसे सत्य की कसौटी मान लेते हो तो तुम अब और यह नहीं सुनते कि परमेश्वर क्या अभिव्यक्त करता है, न ही तुम इसे समझ सकते हो। तुम आँख बंद करके इस आदर्श वाक्य को अभ्यास में लाते हो कि ‘एक व्यक्ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज करता जाता है,’ और इसके अनुसार कार्य करते हो, जिससे अंत में तुम अच्छी प्रतिष्ठा पा लेते हो। तुम जो चाहते थे अब वह तुम्हें मिल गया है, पर ऐसा करके तुमने सत्य का उल्लंघन और सत्य का त्याग किया है, और बचाए जाने का अवसर भी गँवा दिया है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (12))। परमेश्वर के वचनों से, मुझे एहसास हुआ कि मुझ पर हमेशा “एक व्यक्ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज़ करता जाता है” वाली शैतानी सोच का गहरा असर रहा है, और यह कि मैंने हमेशा अपनी प्रतिष्ठा को बहुत महत्व दिया है, इस बात की बहुत परवाह की है कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे। मैं बस एक कठपुतली की तरह थी, शोहरत और रुतबे से बँधी हुई थी। मैंने इस बारे में सोचा कि कैसे पर्यवेक्षक का मुझे टीम अगुआ बनाना वास्तव में मेरे लिए प्रशिक्षण का एक बड़ा अवसर था। जब मैं भाई-बहनों के साथ मिलकर संवाद करती थी और सीखती थी, यह मेरे लिए अपनी कमी की भरपाई का भी एक अच्छा अवसर था। अगर मेरे दृष्टिकोण गलत होते तो भाई-बहन विचलन दुरुस्त करने में मेरी मदद कर सकते थे। लेकिन मैं अपने आत्मसम्मान से हमेशा बाधित रही और जब मैं देखती थी कि बहुत सारे लोग मौजूद हैं और मुझे अपने विचार साझा करने होते थे तो मेरी पहली प्रतिक्रिया हमेशा यही होती थी, “मैं यह नहीं कर सकती हूँ।” मुझे इस बात का डर था कि मैं अपनी कमियाँ उजागर कर दूँगी और भाई-बहन मेरे बारे में गलत छवि बना लेंगे और मुझे नीची नजर से देखेंगे। नतीजतन, मैं वह नहीं कहती थी जो कहा जाना चाहिए था और उन जिम्मेदारियों को पूरा नहीं करती थी जो मुझे पूरी करनी चाहिए थीं, इस चीज ने मुझे अपने कर्तव्य निभाने में बहुत ही निष्क्रिय बना दिया। मैं अपने व्यक्तिगत आत्मसम्मान और रुतबे को बहुत अधिक महत्व देती थी। अपने आत्मसम्मान और रुतबे की रक्षा के लिए मैंने सत्य का अभ्यास करने और अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के कई अवसर गँवा दिए, और मैंने पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने के बहुत सारे मौके खो दिए। मुझे सचेत होकर सत्य का अभ्यास करना था और अपने आत्मसम्मान या रुतबे के लिए अब और नहीं जीना था।
बाद में कार्य की जरूरतों के कारण मुझे दूसरी टीम में अपने कर्तव्य निभाने थे और टीम अगुआ ने मुझसे भाई-बहनों के काम की पूछताछ करने और समूह की सभाओं की अगुआई करने को कहा। मैंने मन में सोचा, “मैं बोलने में अच्छी नहीं हूँ। अगर मैं चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं समझाती हूँ और भाई-बहनों की समझ में नहीं आता है तो क्या यह लोगों को मुझे नीची नजरों से नहीं दिखवाएगा?” मैं थोड़ी घबराई हुई और बेचैन महसूस करने लगी। लेकिन मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर ने इस कर्तव्य को मुझ पर आने दिया ताकि मुझे एक बोझ मिले, और मुझे और अधिक प्रशिक्षण मिल सके। इसलिए, मैंने यह कर्तव्य स्वीकार कर लिया। पहली बार, जब मैंने भाई-बहनों के साथ सभा की तो मैंने अपनी सहयोगी के साथ मिलकर संचालन किया और मैं संगति करने से पहले अभी भी घबराई हुई थी, इस बात की चिंता कर रही थी कि अगर मैंने अच्छी तरह से संगति नहीं की, तो भाई-बहन मुझे नीची नज़रों से देखेंगे। लेकिन जब मैंने सोचा कि यह मेरा कर्तव्य है, तो मुझे ज़िम्मेदारी का एहसास हुआ, और मैं साहसपूर्वक संगति कर सकी। यूँ तो मैं संगति के दौरान अभी भी घबराई हुई थी, लेकिन कुछ सभाओं के बाद मैंने पाया कि जब मैंने परमेश्वर के वचनों पर ध्यान से विचार किया, तो संगति करते समय मैं उतनी घबराई हुई नहीं थी। मैंने इस बात की बहुत ज़्यादा परवाह नहीं की कि मेरी संगति अच्छी थी या बुरी, और मैंने कहीं अधिक सहज महसूस किया। मैं जो यह थोड़ा सा भी बदलाव ला सकी, वह परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन का ही नतीजा था। परमेश्वर का धन्यवाद!