32. क्या यह विचार कि “महिला अपनी तारीफ करने वालों के लिए ही सजती-सँवरती है” सही है?

यीफेई, चीन

चीन में प्राचीन काल से ही यह कहावत चली आ रही है : “महिला अपनी तारीफ करने वालों के लिए ही सजती-सँवरती है।” कई महिलाएँ अपना आकर्षण दिखाने और अपनी तारीफ करने वाले पुरुषों को खुश करने के लिए, खुद को सजाने-सँवारने की कोशिश करती हैं। मैं कोई अपवाद नहीं थी। जब मैं सत्रह साल की थी तो मेरा दाखिला प्रांतीय राजधानी के एक व्यावसायिक स्कूल में हो गया। मैं अपना देहाती गृहनगर छोड़कर पढ़ाई के लिए बड़े शहर आ गई। सब कुछ बहुत नया और शानदार था। अपनी पढ़ाई के दौरान मेरी मुलाकात अपने मौजूदा पति से हुई और हम अक्सर एक-दूसरे से बातें करते और मिलते थे। जब भी हम मिलते थे तो उस पर अच्छा प्रभाव डालने के लिए मैं हमेशा अपने रूप-रंग का बहुत ध्यान रखती थी। वह भी अक्सर मुझे अपने परिवार और दोस्तों से मिलवाने ले जाता था। वे सब मुझे बहुत पसंद करते थे और अक्सर मेरी सुंदरता और आकर्षण की तारीफ करते थे। जब भी वे मेरी तारीफ करते थे तो मेरा प्रेमी बहुत खुश होता था। उसने कहा कि जब वह मुझे बाहर ले जाता है तो मेरी वजह से उसे गर्व होता है, इसलिए वह जहाँ भी जाता, हमेशा मुझे अपने साथ ले जाने को तैयार रहता था। उन दिनों हम अलग नहीं हो सकते थे। बाद में हमारी शादी हो गई। शुरुआत में वह मेरा बहुत ध्यान रखता था। मुझे याद है जब मैं गर्भवती थी तो मुझे सुबह बहुत ज्यादा मतली आती थी और मैं कुछ भी खा-पी नहीं पाती थी। जब वह काम पर बाहर होता तो हमेशा मेरे बारे में सोचता था और जब भी उसे समय मिलता वह घर आकर मेरी देखभाल करता था। मुझे सच में बहुत सुकून मिलता था। लेकिन हमारे बच्चे के जन्म के बाद मेरी जिंदगी पूरी तरह से उलट-पुलट हो गई। मेरा शरीर बदल गया और मैं पहले की तरह दुबली-पतली या सुंदर नहीं रही। हर दिन मैं अपने बच्चे और परिवार की देखभाल करती थी और काम करते-करते पूरी तरह से खप जाती थी, मेरे पास सजने-सँवरने का न तो समय होता था और न ही कोई ऊर्जा बचती थी। मैं एक लड़की से एक थकी-हारी अधेड़ गृहिणी बन गई और मेरे प्रति मेरे पति का रवैया पहले जैसा नहीं रहा। वह अब मुझे बाहर नहीं ले जाता था और इसके बजाय लगभग हर दिन दोस्तों के साथ घूमता-फिरता था और मेरे साथ घर पर बहुत कम रहता था। जब भी मैं चाहती थी कि वह मेरे और हमारे बच्चे के साथ आराम करने के लिए बाहर चले तो वह परेशान हो जाता था लेकिन अगर उसके दोस्त बुलाते तो वह बिना सोचे-समझे तुरंत चला जाता था। उसे कुत्ते पालना पसंद था, एक बार मैंने दरवाजा ठीक से बंद नहीं किया और जब मेरा ध्यान नहीं था तो कुत्ता बाहर भाग गया और वापस नहीं आया। वह इस बात पर मुझसे नाराज हो गया और दो दिन तक घर नहीं आया। ऐसी कई घटनाएँ हुईं। मुझे लगा कि उसे मेरी बिल्कुल परवाह नहीं है और मैं बहुत दमित और पीड़ा में थी। पहले तो मैं समझ नहीं पाई कि मेरे प्रति मेरे पति का रवैया इतना क्यों बदल गया था। एक दिन मेरी चचेरी बहन मेरे घर आई और उसने मेरा मजाक उड़ाते हुए यहाँ तक कह दिया : “क्या तुमने हाल ही में आईने में खुद को देखा है? तुम कितनी बेडौल दिखती हो—कौन मर्द तुम्हें चाहेगा? क्या तुम जानती हो कि तुम्हारा पति घर आना क्यों पसंद नहीं करता? अगर मुझे तुम्हारे जैसे चेहरे के साथ घर आना पड़ता तो मैं भी नहीं आती।” उसकी बातों से मुझे बहुत दुख हुआ। पता चला कि मेरा पति मेरे साथ ऐसा व्यवहार इसलिए कर रहा था क्योंकि मैं पहले जैसी सुंदर नहीं रही थी और वह मुझसे ऊब गया था। उसके लिए मैं बस एक सजावट की चीज थी, सँजोकर रखने के लिए बहुत बेकार लेकिन इतनी भी बेकार नहीं कि छुटकारा पा लिया जाए। मैं बहुत दर्द में थी लेकिन मुझे नहीं पता था कि इस स्थिति को कैसे सँभाला जाए। बाद में मैंने अपना रूप-रंग बदलने की कोशिश से शुरुआत करने का फैसला किया। मैंने सौंदर्य उपचार और वजन घटाने पर ध्यान देना शुरू कर दिया। वजन कम करने के लिए मैं अक्सर वजन घटाने की गोलियाँ लेती और शेपवियर खरीदती थी। मैं एक्यूपंक्चर और कपिंग के लिए भी गई। मैंने वजन कम करने के लिए हर तरह के तरीके आजमाए। क्योंकि मैंने अपना वजन बहुत ज्यादा कम कर लिया था मुझे अक्सर चक्कर आते और जी मिचलाता था और जब हालत बहुत खराब हो जाती तो मैं बिस्तर पर लेटे-लेटे हिल भी नहीं पाती थी। मैं बहुत दर्द में थी और इस तरह खुद को बर्बाद नहीं करना चाहती थी लेकिन जब मैं अपने पति का दिल वापस जीतने के बारे में सोचती तो दाँत पीसकर दर्द सह लेती थी। आखिरकार मेरे प्रयास रंग लाए। वजन कम करने की मेरी लगन और कड़ी मेहनत की वजह से मैं बहुत पतली हो गई। मेरा पति मुझे अलग नजर से देखने लगा और वह मेरे साथ पहले से कहीं बेहतर व्यवहार करने लगा। कभी-कभी वह मुझे अपने दोस्तों के साथ सभाओं में भी ले जाता था। ऐसा लगा जैसे काफी समय से खोई हुई मेरी खुशी आखिरकार लौट आई है और मैं बहुत खुश थी। मेरे दिल में यह बात और भी पक्की हो गई कि “महिला अपनी तारीफ करने वालों के लिए ही सजती-सँवरती है” यह कहावत सही है।

लेकिन अच्छे दिन ज्यादा समय तक नहीं टिके। मेरे बदलाव मेरे पति की नजरों में बस एक अस्थायी नई चीज की तरह थे और समय के साथ वह अपने पुराने ढर्रे पर लौट आया, पहले की तरह घर पर मेरे साथ बहुत कम समय बिताता था। यहाँ तक कि जब उसे सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल नहीं होना होता था, वह या तो घर पर सोता रहता या फिर टीवी देखता रहता था। वह लगभग कभी भी मेरी परवाह नहीं करता था और न ही मुझसे कोई आम बातचीत करता था। मैं बहुत व्यथित और निराश थी। मैंने तब अपनी नौकरी छोड़ दी थी और अपने सभी सामाजिक दायरों से नाता तोड़ लिया था और मैंने अपनी सारी उम्मीदें उसी पर टिका दी थीं। उसकी खातिर मैंने न केवल घर के सारे काम सँभाले बल्कि अपने परिवार के बच्चों और बड़ों की भी देखभाल की, साथ ही उसका दिल जीतने के लिए वजन घटाने और सौंदर्य उपचार पर भी ध्यान दिया। लेकिन बदले में मुझे उसकी तरफ से सिर्फ उदासीनता और बेरुखी ही मिली। मैं अक्सर अकेली, असहाय, पीड़ित और निराश महसूस करती थी। कई बार मैं सड़क पर या नहर के किनारे अकेली चलने लगती थी और मैं सच में सब कुछ खत्म कर देना चाहती थी। लेकिन जब मैं अपने छोटे बच्चे और बूढ़े माता-पिता के बारे में सोचती तो मैं हार नहीं मान पाती थी। बार-बार मैं आसमान की ओर देखती थी और अपने दिल में चिल्लाती रहती थी : “हे ऊपरवाले! मेरी जिंदगी इतनी दर्दनाक क्यों है? मुझे क्या करना चाहिए?”

बाद में अंत के दिनों का परमेश्वर का उद्धार मुझ तक आया और सभाओं में भाई-बहनों के साथ परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से मैं समझ गई कि परमेश्वर दिन-रात मानवजाति की देखभाल कर रहा है लेकिन मानवजाति को शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है। हम नहीं जानते कि हम कहाँ से आए हैं, कहाँ जा रहे हैं और जीना कैसे है यह तो बिल्कुल भी नहीं जानते। हम केवल दर्द में असहाय होकर संघर्ष कर सकते हैं। यह सब इसलिए है क्योंकि हम परमेश्वर के वचन नहीं सुनते और उसकी देखभाल से भटक गए हैं, यह शैतान द्वारा हमें गुमराह करने और नुकसान पहुँचाने के कारण हुआ है। मुझे यह भी एहसास हुआ कि एक सृजित प्राणी के रूप में व्यक्ति को सत्य का अनुसरण करना चाहिए और अपने कर्तव्य पूरे करने चाहिए और केवल तभी जीवन का कोई अर्थ होता है। जब मैंने भाई-बहनों को सुसमाचार का प्रचार करते, अपने कर्तव्य निभाते और हर दिन संतुष्ट और आनंदमय जीवन जीते देखा तो मुझे बहुत ईर्ष्या हुई। मेरे दिन रसोई के कामों और मेरे पति के इर्द-गिर्द घूमते थे। मैं एक साधारण जीवन जी रही थी और नतीजतन मुझे कुछ भी हासिल नहीं हुआ और मैं रौंदी हुई, घावों से ढकी और असहनीय दर्द से अभिभूत रह गई। ऐसे जीवन का क्या मूल्य या अर्थ था? मैंने अपने दिल को टटोला और खुद से पूछा : “क्या मैं सच में यही जिंदगी चाहती हूँ? नहीं। नहीं, ऐसा नहीं है। मैं इस तरह नहीं जी सकती।” इसलिए मैंने कलीसिया में अपने कर्तव्य करने शुरू कर दिए।

उन दिनों मैंने इस बात पर विचार नहीं किया कि “महिला अपनी तारीफ करने वालों के लिए ही सजती-सँवरती है” यह विचार सही है या नहीं, मैंने यह भी नहीं सोचा कि क्या मेरे अनुसरण में समस्या थी। बाद में जब मैंने पढ़ा कि परमेश्वर ने “महिला अपनी तारीफ करने वालों के लिए ही सजती-सँवरती है” कहावत के भ्रामक पहलुओं को उजागर किया है, तब जाकर मैंने अपने साथ हुई सभी बातों पर विचार करना शुरू कर दिया और मुझे एहसास होने लगा कि मेरे पिछले अनुसरण कितने बेतुके और हास्यास्पद थे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “‘एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है’ यह कहावत खुद ही महिलाओं को पुरुषों की तुलना में असमान दर्जा देती है। यह महिलाओं से अपेक्षा करती है कि वे पुरुषों को खुश करने के लिए खुद को सजाएँ-सँवारें, पुरुषों की खुशी के लिए जीएँ और जब कोई उन्हें पसंद करे और उनकी तारीफ करे तो वे सम्मानित महसूस करें। यह असमान है; यह खुद ही महिलाओं के निम्न रुतबे का सच्चा प्रतिबिम्ब है। ‘एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है’ इस कहावत का निहितार्थ यह है कि एक महिला को दूसरों द्वारा पसंद किए जाने पर खुश और सम्मानित महसूस करना चाहिए, चाहे वह अपने अच्छे रंग-रूप के कारण दूसरों को पसंद आती हो या वह पुरुषों का स्नेह इसलिए आकर्षित करती हो क्योंकि वह आँखों को भाने के लिए खुद को सजाना-सँवारना जानती है। यह खुद ही महिलाओं की मानहानि है। यह कहावत महिलाओं को बताती है कि उनके अस्तित्व का मूल्य, उनकी खुशी का स्रोत किसी ऐसे व्यक्ति का होना है जो उन्हें पसंद करता है और अगर ऐसा नहीं है तो उन्हें बदकिस्मत और दुखी महसूस करना चाहिए और इस पर चिंतन करना चाहिए कि कोई उन्हें क्यों पसंद नहीं करता है और क्या महिलाएँ होने के नाते वे बेकार और असफल जीवन जी रही हैं। तो क्या ‘एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है’ यह कहावत महिलाओं की मानहानि नहीं है? (हाँ।) ‘एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है’ इस कहावत में क्या आमतौर पर कद्रदान का मतलब किसी पुरुष से नहीं होता है? यह कहावत खुद ही पुरुषों को महिलाओं से ऊपर, मालिक के पद पर बिठाती है। इसका मतलब है कि एक महिला को इस बात पर सम्मानित महसूस करना चाहिए कि एक पुरुष—एक मालिक—उसे पसंद करता है और उसकी तारीफ करता है। अगर एक पुरुष—एक मालिक—उसे पसंद नहीं करता है तो उसमें कुछ गड़बड़ है, वह प्रेम किए जाने लायक नहीं है, वह जीवन में असफल है और वह महिला होने के योग्य नहीं है। तुम देखो, यह अनजाने में पुरुषों का रुतबा ऊँचा कर देता है जिससे उन्हें महिलाओं की गर्दन पर पैर रखने और उन पर हावी होने की अनुमति मिल जाती है। यहीं पर ‘एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है’ इस कहावत में गलती है(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (14))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गई कि “महिला अपनी तारीफ करने वालों के लिए ही सजती-सँवरती है” वाक्यांश स्वाभाविक रूप से गलत है। पुरुषों को महिलाओं से ऊपर रखकर यह निस्संदेह महिलाओं का अवमूल्यन करता है। इसके कारण महिलाएँ अवचेतन रूप से पुरुषों को अपना मुखिया मानने लगती हैं, यह सोचती हैं कि महिलाओं का जीवन पुरुषों के इर्द-गर्द घूमना चाहिए और पुरुषों का पक्ष और प्रशंसा पाने पर वे खुश होती हैं। यह विचार महिलाओं को यह सोचने पर मजबूर करता है कि पुरुष के पक्ष और प्रशंसा के बिना उनके जीवन का कोई मूल्य नहीं है मानो स्वाभाविक रूप से महिलाएँ केवल पुरुषों के सुख की खातिर ही जीती हैं। यह दृष्टिकोण महिलाओं के लिए बहुत ही बेतुका और अनुचित है। किशोरावस्था से ही मैं इस कहावत से बहुत प्रभावित थी। मैं मानती थी कि अगर कोई महिला किसी पुरुष का स्नेह जीत ले तो उसका जीवन खुशहाल और चिंतामुक्त हो जाएगा। इसलिए मैं लंबे समय से एक ऐसा पति पाने का सपना देखती थी जो मुझे प्यार करे और मेरी परवाह करे और सोचती थी कि उसके साथ हाथ में हाथ डालकर बूढ़ा होना ही वास्तव में सुखी जीवन जीने का एकमात्र तरीका है। बाद में मैं अपने मौजूदा पति से मिली, उन दिनों मैं जवान और सुंदर थी, मेरा रूप-रंग अच्छा था और वह मुझे बहुत पसंद करता था। जब भी उसके पास समय होता वह मुझे मौज-मस्ती के लिए बाहर ले जाता था और वह मुझे अपने परिवार और दोस्तों से मिलवाने भी ले जाता था। हर कोई मेरे रूप-रंग की तारीफ करता था और इससे वह मुझ पर और भी ज्यादा प्यार लुटाता था। मैं इस अद्भुत प्यार में डूबी हुई थी और बेहद खुश महसूस करती थी। प्यार को ताजा बनाए रखने के लिए मैं हर बार मिलते समय अपने रूप-रंग का बहुत ध्यान रखती थी ताकि वह मेरा सबसे आकर्षक पक्ष देख सके। शादी के बाद मेरा एक बच्चा हुआ और मैं एक लड़की से एक थकी-हारी अधेड़ गृहिणी बन गई। मेरे प्रति मेरे पति का रवैया और खराब हो गया और उसकी प्रशंसा धीरे-धीरे तिरस्कार में बदल गई। अपने पति का पक्ष जीतने और अपनी खुशहाल शादी को बनाए रखने के लिए मैंने सौंदर्य उपचार करवाए, वजन कम किया और खुद को बदलने के लिए हर संभव तरीका आजमाया। भले ही इसका मतलब मेरे शरीर को नुकसान पहुँचाना हो, मुझे कोई परवाह नहीं थी। जब मैंने अपने पति का रवैया अपने प्रति सुधरते देखा तो मुझे बहुत संतोष हुआ और मैं “महिला अपनी तारीफ करने वालों के लिए ही सजती-सँवरती है” को अपनी शादी बनाए रखने की कुंजी के रूप में देखने लगी। मैंने घर के सारे काम भी सँभाले, घर को बेदाग रखा और खूबसूरती से कपड़े पहने। मैंने अपना पूरा दिल और मन अपने पति को समर्पित कर दिया लेकिन बदले में मुझे सिर्फ उसकी उदासीनता ही मिली। मुझे लगा कि जीवन में कोई उम्मीद ही नहीं है और मैं अब जीना भी नहीं चाहती थी। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने से मैं समझ गई कि मैंने जो भी कष्ट सहे, वे सब शैतान द्वारा मुझ पर लाए गए थे। मैं “महिला अपनी तारीफ करने वालों के लिए ही सजती-सँवरती है” के शैतानी पाखंड और भ्रांति के अनुसार चल रही थी और अपना सारा समय यह सोचने में लगाती थी कि उसे कैसे खुश किया जाए और उसका दिल कैसे जीता जाए, अपनी खुशी को अपने पति पर निर्भर बना रही थी। लेकिन बदले में मुझे सिर्फ दर्द और कड़वाहट ही मिली थी। मैं कितनी मूर्ख और बेवकूफ थी!

मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा, जिससे मुझे “महिला अपनी तारीफ करने वालों के लिए ही सजती-सँवरती है” की इस भ्रांति को और भी स्पष्ट रूप से देखने में मदद मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “क्या पुरुष महिलाओं को सिर्फ उनके रूप-रंग और बनाव श्रृंगार के लिए पसंद करते हैं? या वे महिलाओं को सिर्फ इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वे देखते हैं कि महिलाएँ सौम्य, गुणवान, गरिमामय और सुंदर होती हैं? क्या पुरुष सिर्फ अपनी आँखों को खुश करने के लिए महिलाओं को पसंद करते हैं? (नहीं, यह देह की यौन इच्छा को संतुष्ट करने के लिए है।) तो फिर पुरुषों को संतुष्ट करने और खुश करने के पीछे महिलाओं का क्या मकसद होता है? (यह भी देह की यौन इच्छा को तुष्ट करने के लिए है।) यानी जब एक दूसरे की बात आती है, तो पुरुष और महिला दोनों की ही जरूरतें होती हैं और इनमें सबसे मूलभूत जरूरत देह की यौन इच्छा है। पुरुष की महिला के लिए जरूरत सिर्फ उसके रूप-रंग को पसंद करना नहीं है, बल्कि उसके आधार पर उसे शारीरिक रूप से प्राप्त करना भी है—और ज्यादा स्पष्ट रूप से कहा जाए तो अपनी यौन इच्छा को संतुष्ट करने के लिए उसका शरीर प्राप्त करना है। इसलिए, ‘एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है’ इस कहावत के पीछे का मकसद वास्तव में पुरुषों की यौन इच्छा को संतुष्ट करना है। इसके लिए महिलाओं को न सिर्फ अपने रूप-रंग और बनाव श्रृंगार को पुरुषों के लिए दिलकश बनाने की जरूरत पड़ती है, बल्कि उनकी यौन इच्छा को भी संतुष्ट करना होता है। क्या यह जीने का बहुत ही घटिया तरीका नहीं है? अगर महिलाएँ अब भी यही मानती हैं कि यह कहावत सही है, यह कुछ ऐसा है जिसे उन्हें हासिल करना चाहिए और जिसका पालन करना चाहिए, तो महिलाएँ खुद को नीचा दिखा रही हैं। पुरुषों की महिलाओं के प्रति यौन इच्छा होती है और वे महिलाओं के शरीर से खेलना चाहते हैं; अगर महिलाएँ इसे निंदनीय और घिनौना मानने के बजाय अपने कद्रदानों के लिए खुद को सजाती-सँवारती हैं, सोचती हैं कि यह उनके जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है, सर्वोच्च सम्मान है, तो क्या वे खुद को नीचा नहीं दिखा रही हैं? (हाँ।) यह महिलाओं से उनके हक छीन लेना है। यह न सिर्फ महिलाओं से उनके अस्तित्व का हक, उनकी गरिमा और उनके मानवाधिकार छीन लेता है, बल्कि उन्हें यह सोचने के लिए भी मजबूर कता है कि यह सबसे बड़ा सम्मान है। क्या यह क्रूर नहीं है? यह बेहद क्रूर है! कोई स्वायत्तता और कोई भी मानवाधिकार नहीं होने के अलावा, एक महिला की खुशी, आनंद और संतुष्टि सिर्फ पुरुषों को खुश करने और उन्हें पूरी तरह से संतुष्ट करने के आधार पर ही हासिल हो सकती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि महिलाएँ किस तरह का अमानवीय व्यवहार सहती हैं, उनसे अब भी इस पर गर्व करने की अपेक्षा की जाती है। क्या यह महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करना और उनका शोषण करना नहीं है? चाहे आधुनिक महिलाएँ हों या प्राचीन, वे सभी ‘एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है’ इस कहावत को अपना आदर्श वाक्य, अपना जीवन लक्ष्य मानती हैं। क्या यह पूरी तरह से गलत नहीं है? क्या यह शैतान द्वारा लोगों के साथ दुर्व्यवहार करने और उन्हें गुमराह करने के लिए उपयोग की जाने वाली चाल नहीं है? (हाँ।) ... लोगों के यह कहने कि ‘एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है’ का मकसद निश्चित रूप से उतना सरल नहीं है जितना कि एक पुरुष का किसी महिला की तारीफ करना है। यह पूरी तरह से पुरुषों को ऐसी स्थिति में बिठा देता है जहाँ वे महिलाओं पर हावी हो जाते हैं। ज्यादा सटीक रूप से, यह कहावत इस लोकाचार के तहत उत्पन्न हुई कि पुरुष बेहतर हैं और स्त्रियाँ कमतर हैं। इसके अलावा, हकीकत यह है कि किसी भी सामाजिक व्यवस्था के तहत स्त्रियाँ कमजोर समूह होती हैं जिन्हें पुरुषों की सहायक वस्तुएँ और खिलौने माना जाता है। इसलिए, ‘एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है’ यह कहावत सभी महिलाओं के लिए पूरी तरह से अपमानजनक है। अगर महिलाएँ विशेष रूप से इस कहावत को स्वीकारती हैं, तो यह महिलाओं के लिए अफसोस की बात है और हमें उन सभी महिलाओं के लिए तिरस्कार महसूस करना चाहिए जो इसे स्वीकारती हैं(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (14))। परमेश्वर के वचनों से मैंने स्पष्ट रूप से देखा कि चाहे पुरुष महिलाओं को पसंद करें या महिलाएँ पुरुषों को खुश करने की कोशिश करें, उनका उद्देश्य देह की इच्छाओं में लिप्त होना है। भ्रष्ट मानवजाति के पास जीवन के बारे में सही विचार नहीं हैं और वह नहीं जानती कि ठीक से कैसे जिया जाए या सामान्य वैवाहिक जीवन बनाए रखने के लिए अपनी जिम्मेदारियों को कैसे पूरा किया जाए। जब पुरुष और महिलाएँ एक साथ आते हैं तो यह ज्यादातर अपनी दैहिक इच्छाओं को पूरा करने के बारे में होता है। महिलाएँ पुरुषों की इच्छाओं को पूरा करने के लिए पुरुषों को खुश करने की कोशिश में खुद को सजाने-सँवारने के लिए बहुत कुछ करती हैं। फिर भी पुरुष महिलाओं के साथ खेलते हैं जबकि उम्मीद करते हैं कि महिलाएँ उनके सुख के लिए खुद को सुंदर बनाएँ। इसका तर्क बिल्कुल हास्यास्पद है। यह महिलाओं को रौंदने और बर्बाद करने के लिए शैतान की एक चाल है! अगर परमेश्वर ने यह सब उजागर न किया होता तो मैं इस कहावत को सही मानती। मैं सचमुच कितनी मूर्ख और नीच थी! जब मैं जवान और सुंदर थी, मेरा रूप-रंग अच्छा था, उस समय के बारे में सोचती हूँ तो मेरे पति के साथ बाहर जाने से वह अच्छा दिखता था और उसका घमंड पूरी तरह से संतुष्ट होता था, इसलिए वह मेरे साथ अच्छा व्यवहार करता था। बच्चे को जन्म देने के बाद मैं पहले की तरह दुबली-पतली और सुंदर नहीं रही और इसलिए उसका असली रंग सामने आ गया था। उसका पहले का गहरा प्रेम और स्नेह धीरे-धीरे तिरस्कार और उदासीनता में बदल गया था। अपने पति का दिल वापस जीतने के लिए मैंने उसे खुश करने के तरीके खोजने की कोशिश की, खुद को सुंदर बनाने और वजन कम करने के लिए हर संभव तरीका आजमाया। लेकिन इससे वह केवल एक अस्थायी नयेपन के रूप में संतुष्ट हुआ था और हमारे वैवाहिक जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ भी नहीं किया था। हम एक ही छत के नीचे रह रहे थे लेकिन हम अजनबियों की तरह थे। वह भावना अक्सर मुझे बेचैन कर देती थी और पीड़ा देती थी, यहाँ तक कि मुझे अपना जीवन समाप्त करने के विचारों तक ले गई थी। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद ही मैंने विचार किया और मुझे एहसास हुआ कि मेरे पति का मेरे प्रति पहले का स्नेह सच्चा नहीं था। उसे केवल मेरा रूप-रंग पसंद था। साफ शब्दों में कहूँ तो उसे बस मेरी जवानी और खूबसूरती पसंद थी और जब मेरा रूप-रंग फीका पड़ गया और मेरा शरीर बेडौल हो गया तो उसका सारा तिरस्कार और उदासीनता उजागर हो गई। उसने कभी सच में मेरी परवाह नहीं की थी और वह नहीं समझता था कि एक पति के रूप में अपने कर्तव्य कैसे पूरे किए जाएँ। ऐसी शादी खुशहाल कैसे हो सकती थी? मैंने जीवन और मूल्यों पर अपने विचारों को पुरुषों को खुश करने से जोड़ दिया था, गलती से यह सोचने लगी थी कि किसी पुरुष का स्नेह जीतने से मैं उसका दिल जीत पाऊँगी और केवल इसी तरह से मेरा जीवन खुशहाल और आनंदमय होगा और महिलाओं को ऐसे ही जीना चाहिए। नतीजतन मैंने खुद को असहनीय दुख की हद तक सताया। यह सब मेरे अनुसरण के पीछे मेरे गलत परिप्रेक्ष्य के कारण हुआ था। अगर कोई महिला इस विचार के अनुसार जीती है कि “महिला अपनी तारीफ करने वालों के लिए ही सजती-सँवरती है” तो अंत में वह सिर्फ शैतान की शिकार बन जाएगी। यह सचमुच दयनीय और दुखद है!

मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े : “क्या अब तुम्हें स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि ‘एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है’ यह कहावत सही है या नहीं? (यह गलत है।) यह कहावत कोई सकारात्मक चीज नहीं है और न ही यह कोई सही विचार या दृष्टिकोण है। बाइबल में और परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों में देखो—क्या इनमें ऐसा कोई वाक्य है जो महिलाओं से कहता हो कि उन्हें उन लोगों के लिए खुद को सजाना-सँवारना चाहिए जो उनकी सराहना करते हैं? क्या ऐसा कोई वाक्य है जो पुरुषों और महिलाओं के रुतबों को स्तरों में विभाजित करता हो, और यह कहता हो कि पुरुष महिलाओं से ऊपर हैं? नहीं, ऐसा कोई वाक्य नहीं है। बाइबल में उत्पत्ति की पुस्तक में यह दर्ज है कि महिला पुरुष की हड्डियों की हड्डी है और उसके देह का देह है। पुरुष और महिला दोनों ही परमेश्वर द्वारा सृजित मनुष्य हैं; वे परमेश्वर के आगे बराबर हैं, उनमें स्तरों का कोई विभाजन नहीं है, श्रेष्ठ और निम्न का कोई अंतर नहीं है। लोगों को श्रेष्ठ और निम्न में विभाजित करना और रुतबे के स्तरों में अंतर करना कुछ ऐसा है जो शैतान करता है; यह शैतान द्वारा महिलाओं के दमन और उत्पीड़न का वास्तविक प्रमाण है। शुरू में जब से परमेश्वर ने मानवजाति बनाई तब से परमेश्वर की नजर में पुरुष और महिला बराबर रहे हैं। दोनों ही सृजित प्राणी हैं और परमेश्वर के उद्धार के लक्ष्य हैं। परमेश्वर ने यह कभी नहीं कहा कि पुरुष श्रेष्ठ हैं और महिलाएँ निम्न हैं और न ही उसने यह कहा है कि पुरुषों को महिलाओं का मुखिया या उनका स्वामी होना चाहिए, पुरुषों को महिलाओं से ऊँचा होना चाहिए, किसी भी कार्य में पुरुषों को महिलाओं से ज्यादा महत्व मिलना चाहिए या पुरुषों की अपनी राय होती हैं और वे ही आधार स्तंभ हैं जबकि महिलाओ को पुरुषों की ज्यादा बातें माननी चाहिए। परमेश्वर ने ऐसी बातें कभी नहीं कहीं। सिर्फ शैतान की भ्रष्टता के कारण ही लोगों में पुरुषों के श्रेष्ठ होने और महिलाओं के निम्न होने की कहावतें उत्पन्न हुईं और फिर यह चलन पूरे समाज और पूरी मानवजाति में विकसित हुआ जिसने पुरुषों के अधिकार के अधीन महिलाओं का निरंतर दमन किया। सत्य की समझ नहीं होने के कारण जब महिलाएँ शैतान के सभी प्रकार के बुरे चलनों द्वारा प्रभावित और गुमराह हो जाती हैं, उसके बाद वे खुद को पुरुषों से गौण या रुतबे में उनसे निम्नतर महसूस करती हैं। यही कारण है कि आज भी बहुत-सी महिलाएँ यह मानती हैं कि ‘एक महिला अपने कद्रदान के लिए खुद को सजाती-सँवारती है’ यह कहावत सही है। यह बहुत अफसोस की बात है। अगर लोग सत्य नहीं समझते हैं तो वे अभी भी कई विशिष्ट मामलों में शैतान के विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों द्वारा गुमराह और नियंत्रित होते हैं। यहाँ तक कि यह छोटा-सा मामला भी बहुत उदाहरणात्मक है, है ना? (हाँ।) ... सृजित मानवजाति की सदस्य होने के नाते महिलाएँ पुरुषों से सिर्फ लिंग और शरीर-रचना में अलग होती हैं; दूसरे पहलुओं में उनमें बिल्कुल कोई भी अंतर नहीं है। परमेश्वर की नजर में पुरुषों और महिलाओं के रुतबे में किसी प्रकार का कोई अंतर नहीं है। परमेश्वर ने कभी भी, किसी भी हालात में, महिलाओं से ऐसी अपेक्षाएँ नहीं रखीं हैं जो पुरुषों से उसकी अपेक्षाओं से अलग हों। परमेश्वर द्वारा चुने गए लोगों की संख्या, उद्धार की उम्मीद, कर्तव्यों को करने के उनके अवसर, उनके द्वारा निर्वहन किए जा सकने वाले कर्तव्य और उनके द्वारा किए जा सकने वाले कार्य जैसे पहलुओं में महिलाएँ मूल रूप से पुरुषों के बराबर हैं; महिलाएँ पुरुषों से कमतर नहीं हैं। यही वास्तविक स्थिति है(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (14))। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि चाहे पुरुष हो या महिला, सभी लोग सृजित प्राणी हैं और परमेश्वर के सामने बराबर हैं। पुरुष श्रेष्ठता या महिला हीनता जैसी कोई चीज नहीं है। परमेश्वर ने पुरुष और महिला को बनाया और उनके लिए विवाह और परिवार की व्यवस्था की, इस उम्मीद से कि लोग सद्भाव में रहेंगे और एक-दूसरे के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करेंगे। लेकिन शैतान लोगों में “महिला अपनी तारीफ करने वालों के लिए ही सजती-सँवरती है” और “पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ हैं” जैसे पाखंड और भ्रांतियाँ डालता है जिसका उद्देश्य महिलाओं को दबाना और सताना है। अतीत में मैं हमेशा “महिला अपनी तारीफ करने वालों के लिए ही सजती-सँवरती है” के भ्रामक विचार के अनुसार जीती थी और मैं अपने पति को अपना सहारा और अपना सब कुछ मानती थी। मैं उसे खुश करने के तरीके सोचते हुए अपना दिमाग खपाती थी, यहाँ तक कि उसके लिए खुद को लगातार बदलती रहती थी। लेकिन चीजें वैसी नहीं हुईं जैसी मैंने कल्पना की थी और चाहे मैंने उसे खुश करने की कितनी भी कोशिश की, मुझे कभी उसका सच्चा स्नेह नहीं मिला और हम एक-दूसरे के लिए अजनबी जैसे बन गए। मेरी शिकायत थी कि वह मेरी परवाह नहीं करता या मुझसे प्यार नहीं करता और उसकी शिकायत थी कि मैं उसे नहीं समझती। हमारे बीच कोई प्यार या विचारशीलता नहीं थी, हम एक-दूसरे से द्वेष करने लगे और हमारा रिश्ता इतना बिगड़ गया कि सुधर नहीं सकता था, धीरे-धीरे टूटने की ओर बढ़ रहा था। इस समय परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से मैं समझ गई कि पारिवारिक जीवन में एक पत्नी के रूप में मुझे बस अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने की जरूरत है और मुझे अपने पति का दिल जीतने की कोशिश में नहीं लगे रहना चाहिए, न ही मुझे उसे खुश करने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए। ऐसा करना खुद को बर्बाद करना है। पति और पत्नी एक-दूसरे के बराबर हैं और प्रत्येक की अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ और दायित्व हैं। कहने का मतलब है कि परमेश्वर द्वारा निर्धारित विवाह के ढाँचे के भीतर उन्हें एक-दूसरे के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए और जीवन के हर चरण में एक-दूसरे का सहारा बनना चाहिए।

परमेश्वर के वचनों से मैं सबसे महत्वपूर्ण सत्यों में से एक को भी समझी : एक सृजित प्राणी के रूप में व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा दिए गए आदेश और मिशन को पूरा करना चाहिए। यही जीवन का सच्चा अर्थ और मूल्य है और यही सबसे सही अनुसरण भी है। जैसा कि परमेश्वर कहता है : “व्यक्ति के जीवन का मूल्य क्या है? क्या यह केवल खाने, पीने और मनोरंजन जैसे शारीरिक सुखों में शामिल होने की खातिर है? (नहीं, ऐसा नहीं है।) तो फिर यह क्या है? तुम लोग अपने विचार साझा करो। (व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम एक सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करने का लक्ष्य हासिल करना चाहिए।) सही कहा। ... एक ओर, यह सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करने के बारे में है। दूसरी ओर, यह अपनी योग्यता और क्षमता के दायरे में रहकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करने के बारे में है; यह कम से कम उस बिंदु तक पहुँचने के बारे में है जहाँ तुम्हारी अंतरात्मा तुम्हें दोषी नहीं ठहराती है, जहाँ तुम अपनी अंतरात्मा के साथ शांति से रह सकते हो और दूसरों की नजरों में स्वीकार्य साबित हो सकते हो। इसे एक कदम आगे बढ़ाते हुए, अपने पूरे जीवन में, चाहे तुम किसी भी परिवार में पैदा हुए हो, तुम्हारी शैक्षिक पृष्ठभूमि या काबिलियत चाहे जो भी हो, तुम्हें उन सिद्धांतों की थोड़ी समझ होनी चाहिए जिन्हें लोगों को जीवन में समझना चाहिए। उदाहरण के लिए, लोगों को किस प्रकार के मार्ग पर चलना चाहिए, उन्हें कैसे रहना चाहिए, और एक सार्थक जीवन कैसे जीना चाहिए—तुम्हें कम से कम जीवन के असली मूल्य का थोड़ा पता लगाना चाहिए। यह जीवन व्यर्थ नहीं जिया जा सकता और कोई इस पृथ्वी पर व्यर्थ में नहीं आ सकता। दूसरे संदर्भ में, अपने पूरे जीवनकाल के दौरान, तुम्हें अपना लक्ष्य पूरा करना चाहिए; यह सबसे महत्वपूर्ण है। हम किसी बड़े लक्ष्य, कर्तव्य या जिम्मेदारी को पूरा करने की बात नहीं करेंगे; लेकिन कम से कम, तुम्हें कुछ तो हासिल करना चाहिए। उदाहरण के लिए, कलीसिया में, कुछ लोग अपनी सारी कोशिश सुसमाचार फैलाने में लगा देते हैं, अपने पूरे जीवन की ऊर्जा समर्पित करते हैं, बड़ी कीमत चुकाते और कई लोगों को जीतते हैं। इस वजह से, उन्हें लगता है कि उनका जीवन व्यर्थ नहीं गया है, उसका मूल्य है और यह राहत देने वाला है। बीमारी या मृत्यु का सामना करते समय, जब वे अपने पूरे जीवन का सारांश निकालते हैं और उन सभी चीजों के बारे में सोचते हैं जो उन्होंने कभी की थीं, जिस रास्ते पर वे चले, तो उन्हें अपने दिलों में तसल्ली मिलती है। उन्हें किसी आत्मनिंदा या पछतावे का अनुभव नहीं होता। कुछ लोग कलीसिया में अगुआई करते समय या कार्य के किसी खास पहलू की अपनी जिम्मेदारी में कोई कसर नहीं छोड़ते। वे अपनी अधिकतम क्षमता का उपयोग करते हैं, अपनी पूरी ताकत लगाते हैं, अपनी सारी ऊर्जा खर्च करते हैं और जो काम करते हैं उसकी कीमत चुकाते हैं। अपने सिंचन, अगुआई, सहायता और समर्थन से, वे कई लोगों को उनकी कमजोरियों और नकारात्मकता के बीच मजबूत बनने और दृढ़ रहने में मदद करते हैं ताकि वे कलीसिया छोड़ने के बजाय परमेश्वर की उपस्थिति में वापस आएँ और सबसे अच्छा नतीजा यह है कि वे अंत में उसकी गवाही भी दें। इसके अलावा, अपनी अगुआई की अवधि के दौरान, वे कई महत्वपूर्ण कार्य पूरे करते हैं, बहुत-से दुष्ट लोगों को कलीसिया से निकालते हैं, परमेश्वर के चुने हुए अनेक लोगों की रक्षा करते हैं और कई बड़े नुकसानों को वापस ठीक करने की कोशिश भी करते हैं। ये सभी चीजें उनकी अगुआई के दौरान ही हासिल होती हैं। वे जिस रास्ते पर चले, उसे पीछे मुड़कर देखते हुए, बीते बरसों में अपने द्वारा किए गए काम और चुकाई गई कीमत को याद करते हुए, उन्हें कोई पछतावा या आत्मग्लानि महसूस नहीं होती। उन्हें ये काम करने पर कोई पछतावा नहीं होता और वे मानते हैं कि उन्होंने एक सार्थक जीवन जिया है और उनके दिलों में स्थिरता और आराम है। यह कितना अद्भुत है! क्या यही वह फल नहीं जो उन्होंने प्राप्त किया है? (हाँ।) स्थिरता और राहत की यह भावना, पछतावे का न होना, ये सकारात्मक चीजों और सत्य का अनुसरण करने की फसल हैं। आओ, हम लोगों के लिए ऊँचे मानक न रखें। एक ऐसी स्थिति पर विचार करें जहाँ व्यक्ति को ऐसे कार्य का सामना करना पड़ता है जो उसे अपने जीवनकाल में करना चाहिए या वह करना चाहता है। अपनी जगह जान लेने के बाद, वह दृढ़ता से उस पर बना रहता है, अपनी जगह पर टिका रहता है, अपने हृदय का पूरा रक्त और अपनी सारी ऊर्जा खपा देता है, जिस चीज पर काम करना चाहिए और जिसे पूरा करना चाहिए उसे हासिल और पूरा करता है। जब वह अंत में हिसाब देने के लिए परमेश्वर के सामने खड़ा होता है, तो वह अपेक्षाकृत संतुष्ट महसूस करता है, उसके दिल में कोई आत्मग्लानि या पछतावा नहीं होता है। उसे राहत महसूस होता है और लगता है कि उसने कुछ प्राप्त किया है, उसने एक मूल्यवान जीवन जिया है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (6))। मैंने सोचा कि कितनी महिलाएँ अपने पतियों के लिए जीती हैं, अपना पूरा जीवन पुरुषों को खुश करने और अपने पतियों को खुश करने की कोशिश में बिता देती हैं। भले ही वे अपनी शादी और परिवार को अच्छी तरह से बनाए रखने में सक्षम हों, वे नहीं जानतीं कि किसी को किस लिए जीना चाहिए या वास्तव में मूल्यवान जीवन कैसे जीना चाहिए। यह जाने बिना उनके जीवन का क्या अर्थ है? अंत में क्या वे व्यर्थ नहीं जी रही हैं? मैंने सोचा कि कैसे मैंने एक बार वैवाहिक सुख का अनुसरण किया था। मैंने अपने पति को खुश करने की कोशिश में हर तरह की बेमतलब की चीजें कीं और मैंने बहुत अनावश्यक दुख सहे लेकिन अंत में एक दुर्बल हो चुके शरीर के अलावा मुझे क्या मिला? चिंतन करने पर वह अनुभव सचमुच मेरी याद में बस गया। यह मेरे जीवन का सबसे कमजोर बिंदु था और वह समय था जब मैं सबसे ज्यादा निराश और दर्द में थी। परमेश्वर के वचनों ने ही मुझे समझाया कि भ्रष्ट मानवजाति शैतान के स्वभावों से भरी है, वासना से भरी है और पूरी तरह से अनजान है कि प्यार वास्तव में क्या है, अपनी शादी को बनाए रखना तो दूर की बात है। लोग बस एक-दूसरे का इस्तेमाल करते हैं और धोखा देते हैं। कोई सच्चा प्यार नहीं है। केवल मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्यार ही निस्वार्थ है, बिना किसी लेन-देन और बिना किसी माँग के। यह सबसे सच्चा और सबसे वास्तविक प्यार है। अगर कोई महिला सत्य का अनुसरण किए बिना या एक सृजित प्राणी का कर्तव्य किए बिना केवल अपने पति को खुश करने की कोशिश में जीती है तो ऐसा जीवन सचमुच घृणित है!

अब मैं अपना कर्तव्य करने के लिए घर से निकली हूँ और अपना कर्तव्य करने की प्रक्रिया में मैं यह जाँचने पर ध्यान केंद्रित करती हूँ कि मेरे कौन से भ्रष्ट स्वभाव, भ्रामक विचार और दृष्टिकोण हैं और मैं उन्हें हल करने के लिए सचेत रूप से सत्य खोजती हूँ। मुझे लगता है कि केवल इसी तरह जीने से जीवन का कोई अर्थ है। मुझे मेरे गलत विचारों और दृष्टिकोणों से बाहर निकालने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद!

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