33. इंसान को जीवन में किसका अनुसरण करना चाहिए?
मेरा जन्म 1970 के दशक में एक साधारण ग्रामीण परिवार में हुआ था। हम कई भाई-बहन थे और बहुत गरीबी में जीते थे। वहीं दूसरी ओर, हमारे गाँव में कुछ परिवार ऐसे थे जो काउंटी टाउन में काम करते थे। उन्हें तनख्वाह मिलती थी, वे अच्छा खाते थे और बढ़िया कपड़े पहनते थे। गाँव के लोग भी उनसे बड़ी विनम्रता और इज्जत से पेश आते थे। यह सब देखकर मैं सोचने लगी, “पैसे होना ही अच्छा है। तुम्हारा जीवन समृद्ध होता है और लोग तुम्हारा आदर करते हैं।” मेरी माँ अक्सर मुझसे कहती थी, “हमारा कोई अमीर रिश्तेदार नहीं है और हमारे पास नौकरी पाने का कोई जरिया भी नहीं है। तुम्हें मन लगाकर पढ़ना होगा, कॉलेज में दाखिला लेना होगा और भविष्य में नौकरी ढूँढ़नी होगी। एक बार तुम कामयाब हो गई, तो मुझे भी तसल्ली हो जाएगी।” इसलिए, मैं कॉलेज जाने को ही अपनी किस्मत बदलने की एकमात्र उम्मीद मानने लगी। लेकिन, जैसे ही कॉलेज की प्रवेश परीक्षा नजदीक आ रही थी, एक अनहोनी घटना घट गई। मेरी माँ को खाने की नली का कैंसर हो गया था और उन्हें सर्जरी के लिए अस्पताल में भर्ती करना था, जिसके लिए बहुत पैसों की जरूरत थी। मेरे परिवार के पास मुझे आगे पढ़ाने के लिए सच में पैसे नहीं थे। उस पल, मुझे लगा जैसे मुझ पर आसमान टूट पड़ा हो। बाद के दिनों में, मैं अपनी माँ के साथ इलाज और कीमोथेरेपी के लिए अस्पताल में रही, लेकिन फिर भी वह गुजर गई। मेरा कॉलेज जाने का सपना टूटकर चकनाचूर हो गया था और किसी ने तो मेरे मुँह पर ही मेरा मजाक उड़ाते हुए कहा, “तुम्हारी किस्मत तो ‘ए ड्रीम ऑफ रेड मैन्शन्स’ की चिंगवेन जैसी है। तुम्हारी महत्वाकांक्षाएँ आसमान से भी ऊँची हैं, लेकिन तुम्हारी किस्मत कागज से भी पतली है। अपनी किस्मत को स्वीकार कर लो!” इस मजाक का सामना करते हुए, मैंने महसूस किया कि यह दुनिया कितनी गैर-भरोसेमंद और खुदगर्ज है। अगर तुम्हारे पास पैसा नहीं है, तो हर कोई तुम्हें नीची नजर से देखेगा। उस समय मैंने मन में ठान लिया कि मुझे अपनी गरिमा के लिए लड़ने के काबिल बनना होगा। मुझे हर हाल में पैसा कमाने का कोई-न-कोई रास्ता निकालना ही था, ताकि जिन लोगों ने मेरा मजाक उड़ाया था, एक दिन वे मुझे एक अलग नजरिए से देखें!
शादी के बाद, मैंने देखा कि डॉक्टरी का पेशा एक अच्छा विकल्प है, क्योंकि इसमें अच्छी कमाई भी है और लोग इज्जत भी करते हैं। इसलिए, मैंने अपने पति से कहा कि वह अपनी जान-पहचान का इस्तेमाल करके मेरा दाखिला मेडिकल स्कूल में करवा दे। तीन साल की मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद, मैंने अपना खुद का क्लिनिक खोल लिया। मैं लोगों से प्यार से पेश आती थी और धीरे-धीरे, मेरे क्लिनिक में इलाज के लिए ज्यादा-से-ज्यादा लोग आने लगे। मैं अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई भी करती रही, कई प्रमाण-पत्र हासिल किए। मेरा डॉक्टरी कौशल भी बेहतर होता गया और जल्द ही मैं अपने इलाके की एक जानी-मानी डॉक्टर बन गई। मैं अपने पति की नौकरी से भी ज्यादा पैसे अपने क्लिनिक से कमा रही थी, मेरे मरीज मेरी इज्जत करते थे और मेरे रिश्तेदार और दोस्त मेरी तारीफ करते थे। मेरी एक दोस्त की पत्नी ने तो मेरे सामने ही मेरी तारीफ करते हुए कहा, “अब तुम्हारा पहनावा कितना शानदार है। कुछ साल पहले की तुलना में तुम तो बिल्कुल ही अलग इंसान लगती हो!” पता ही नहीं चला कि कब मेरे इतने सारे दोस्त बन गए और मुझसे काम करवाने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ गई। यहाँ तक कि जिस इंसान ने मेरा मजाक उड़ाया था, वह भी मुझे देखकर मुस्कुराता और चापलूसी भरी बातें करता था। ये कहावतें कितनी सच हैं, “दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है” और “जब शहर में गरीब हो तो कोई नहीं पूछता और जब पहाड़ों में अमीर हो तो दूर-दूर के रिश्तेदार भी निकल आते हैं।” क्लिनिक खोलने से मुझे शोहरत और लाभ दोनों मिले और मेरे मिथ्याभिमान को काफी संतुष्टि मिली।
इन सालों में, मेरा डॉक्टरी कौशल बेहतर होता गया और ज्यादा-से-ज्यादा लोग मेरे पास इलाज के लिए आने लगे। पास के एक स्कूल के कुछ शिक्षकों ने मुझे अपने स्कूल में क्लिनिक खोलने के लिए बुलाया। बेशक मैंने पैसे कमाने का इतना अच्छा मौका हाथ से जाने नहीं दिया। मैं एक साथ दो क्लिनिक चला रही थी और अधिक-से-अधिक व्यस्त होती जा रही थी। मेरी भाभी ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के सुसमाचार का प्रचार किया, लेकिन मेरे पास जाँच-पड़ताल करने का भी समय नहीं था क्योंकि मैंने अपना सारा समय और ऊर्जा क्लिनिक में ही लगा दी थी। एक बार, मैं एक दो साल की बच्ची को इंजेक्शन लगाकर काम खत्म कर चुकी थी। मैं खाना खा ही रही थी कि अचानक मेरे पास उसके परिवार का फोन आया, उन्होंने बताया कि बच्ची के मुँह से झाग निकल रहा है और उसे ऐंठन हो रही है और सेंट्रल अस्पताल में उसका आपातकालीन इलाज चल रहा है। उन्होंने मुझे जल्द-से-जल्द वहाँ पहुँचने के लिए कहा। मैं इतना डर गई थी कि मेरा चेहरा पीला पड़ गया और मैं फौरन अस्पताल की तरफ भागी। ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने कहा, “अब सब ठीक है। हो सकता है बच्ची को दवाई से एलर्जी हो गई हो।” एक और बार, एक मरीज की त्वचा की एलर्जी की जाँच की गई, जिसमें कोई रिएक्शन नहीं दिखा। लेकिन, उसे ड्रिप चढ़ाने के दौरान, वह अचानक काँपने लगा। पूरा बिस्तर हिल रहा था और मेरा दिल जैसे हलक में आ गया था। आपातकालीन इलाज के बाद ही वह धीरे-धीरे ठीक हुआ। इन दो घटनाओं के बाद, मैं हर दिन बहुत तनाव में रहती थी और चिंता में रहती थी, इस बात से डरी रहती थी कि कोई मेडिकल दुर्घटना न हो जाए। भले ही मैं क्लिनिक चलाकर कुछ पैसे कमा सकती थी और लोगों से तारीफ और इज्जत मिलने से मेरे मिथ्याभिमान को संतुष्टि मिलती थी, लेकिन दिन भर की व्यस्तता के बाद, मुझे बस खालीपन और उलझन ही महसूस होती थी। मैं बचपन से ही प्रभु यीशु में विश्वास करती थी और क्लिनिक खोलने से पहले, मैं अक्सर प्रार्थना करती और बाइबल पढ़ती थी। लेकिन अब मैं दिन भर बस यही सोचती रहती थी कि कैसे सावधानी से डॉक्टरी का अभ्यास करूँ और कैसे अपने साथियों से बेहतर बनने के लिए अपना हुनर बढ़ाऊँ। मैं अब न तो प्रार्थना करती थी और न ही बाइबल पढ़ती थी; मेरा दिल परमेश्वर से दूर, बहुत दूर होता जा रहा था और मैं बिल्कुल अविश्वासियों की तरह जी रही थी। मैं बदलना चाहती थी, लेकिन दिन भर इतनी व्यस्त रहती थी कि इससे मुक्त होने की मुझमें ताकत ही नहीं थी।
परमेश्वर के एक विश्वासी के तौर पर मेरे जीवन में एक अहम मोड़ 2008 में आया। उस समय मैं 36 साल की थी और अपने दूसरे बच्चे की माँ बनने वाली थी। गर्भावस्था के चौथे महीने में, जाँच में पता चला कि मुझे उच्च रक्तचाप की समस्या है और छठे या सातवें महीने तक, मेरा पूरा शरीर सूज गया, मेरे दाँत ढीले हो गए और पता नहीं कब मेरे बालों का रंग भी फीका पड़ गया। मेरा रक्तचाप लगातार बढ़ता जा रहा था, इसलिए मुझे अस्पताल में भर्ती कर लिया गया। एक रात, मेरे कई दाँतों से खून बहने लगा और मेरे पेट में भी दर्द होने लगा। यह बहुत ज्यादा खून बहने के खतरे का संकेत था और डॉक्टर ने तुरंत सलाह-मशविरा करके फौरन सी-सेक्शन ऑपरेशन करने का फैसला किया। डॉक्टर ने यह संभावना भी जताई कि ऑपरेशन के दौरान शायद मैं और मेरा बच्चा दोनों ही जीवित न बचें। मैं ऑपरेशन टेबल पर लेटी हुई, सर्जरी के उपकरणों की आवाज सुन रही थी और मेरे मन में विचारों की उथल-पुथल मच गई : “मैं सिर्फ 36 साल की हूँ और हमेशा पैसा, शोहरत और लाभ के पीछे भागती रही। अगर मेरी जान ही नहीं बची, तो दुनिया भर के पैसे का क्या फायदा? कितना भी पैसा मेरी जान नहीं बचा सकता! क्या पैसा, शोहरत, लाभ और तारीफ, सब क्षणिक नहीं है?” ऑपरेशन के दौरान, डॉक्टर ने हैरानी से कहा, “प्लेसेंटा तीन-चौथाई अलग हो चुका है और ज्यादा खून भी नहीं बहा। तुम और तुम्हारा बच्चा दोनों सुरक्षित हो। कितना बड़ा आशीष है!” अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद, मैं बहुत कमजोर थी और घर पर आराम कर रही थी। मेरी भाभी ने फिर से मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की गवाही दी। उसकी संगति सुनकर, मैं समझ गई कि परमेश्वर अंत के दिनों में देहधारी हुआ है ताकि वह सत्य व्यक्त करके लोगों को बचा सके। केवल सत्य को स्वीकार करने से ही लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को शुद्ध और परिवर्तित किया जा सकता है; तभी वे विनाशों में परमेश्वर द्वारा सुरक्षित किए जा सकते हैं और एक सुंदर मंजिल पाने के लिए जीवित रह सकते हैं। मैंने उन सालों को याद किया जब मैंने अपना सारा समय और ऊर्जा अपने व्यवसाय में लगा दी थी। मैंने कभी भी परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की जाँच-पड़ताल करने की कोशिश नहीं की। अगर मैंने सच्चे परमेश्वर को अस्वीकार कर दिया, तो मैं परमेश्वर का प्रतिरोध कर रही होऊँगी! इस विचार से मैं थोड़ा डर गई और इसलिए मैंने सच्चे मार्ग की जाँच-पड़ताल करने का मन बना लिया। बाद के दिनों में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बहुत-से वचन पढ़े और मुझे निश्चित हो गया कि प्रभु यीशु सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में लौट आया है। फिर मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर लिया और कलीसियाई जीवन जीने लगी।
कुछ समय बाद, मेरा शरीर ठीक हो गया और जल्दी ही मुझे सिंचन डीकन के रूप में चुन लिया गया। मैं परमेश्वर की बहुत आभारी थी कि उसने मेरा उत्कर्ष किया कि मैं एक कर्तव्य निभा सकी। मैं अक्सर बहुत-सी सभाओं में शामिल होने के कारण क्लिनिक से दूर रहती थी और मेरे मरीज कम होते जा रहे थे। मैं बहुत बेचैन थी और सोचने लगी, “अगर ऐसा ही चलता रहा तो क्या होगा?! अगर मेरे सारे नियमित मरीज इलाज के लिए कहीं और चले गए, तो मैं भविष्य में पैसे कैसे कमाऊँगी? अगर ऐसा ही चलता रहा, तो क्या मुझे क्लिनिक बंद नहीं करना पड़ेगा? ऐसे तो नहीं चलेगा! मुझे कलीसिया अगुआओं से बात करनी होगी और उनसे कहना होगा कि वे मुझे कम सभा समूहों का प्रभार दें।” लेकिन फिर मैंने सोचा : मैं एक सृजित प्राणी हूँ और मुझे अपनी सर्वोत्तम क्षमता से अपना कर्तव्य निभाना चाहिए; यही जमीर और विवेक मुझमें होना चाहिए। इसलिए, मैंने अगुआओं से कुछ नहीं कहा। सभाओं के दौरान, मैं बहुत असहज और बेचैन रहती थी और मन-ही-मन हिसाब लगाती थी कि इस सभा में शामिल होने से मुझे कितने पैसों का नुकसान हुआ। मैंने परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत करके उसके वचनों पर मनन करने की जरा भी कोशिश नहीं की। मैं जानती थी कि मेरी दशा ठीक नहीं है, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना और उसकी खोज की। एक दिन मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े जो मेरे लिए काफी मददगार थे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यदि तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर नहीं ढूँढ़ते हो और यदि तुम पूर्णता के अपने अनुसरण में बाकियों से आगे रहने का प्रयास नहीं करते हो, तो तुम अंततः पछताओगे। यह समय ही लोगों को पूर्ण बनाए जाने का सबसे अच्छा अवसर है; यह बहुत ही अच्छा समय है। यदि तुम गंभीरतापूर्वक परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण नहीं करते हो, तो उसका काम पूरा हो जाने पर, तुम अवसर से चूक जाओगे—तब बहुत देर हो जाएगी। तुम्हारा संकल्प कितना भी बड़ा हो, यदि परमेश्वर ने काम करना बंद कर दिया है, तो तुम कभी भी पूर्णता हासिल नहीं कर पाओगे, चाहे तुम खुद को कितना भी थका दो। जब पवित्र आत्मा अपना महान कार्य कर रहा हो, तो तुम्हें इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए और सहयोग करना चाहिए। यदि तुम इस अवसर को गँवा दोगे, तो फिर चाहे कितने भी प्रयास कर लो, तुम्हें दूसरा अवसर नहीं दिया जाएगा” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहो)। “अगर मैं तुम लोगों के सामने कुछ पैसे रखूँ और तुम्हें चुनने की आजादी दूँ—और अगर मैं तुम्हारी पसंद के लिए तुम्हारी निंदा न करूँ—तो तुममें से ज्यादातर लोग पैसे का चुनाव करेंगे और सत्य को छोड़ देंगे। तुममें से जो बेहतर होंगे, वे पैसे को छोड़ देंगे और अनिच्छा से सत्य को चुन लेंगे, जबकि इन दोनों के बीच वाले एक हाथ से पैसे को झपट लेंगे और दूसरे हाथ से सत्य को। इस तरह तुम्हारा असली रंग क्या स्वतः प्रकट नहीं हो जाता? सत्य और किसी ऐसी अन्य चीज के बीच, जिसके प्रति तुम लोग वफादार हो, तुम सभी ऐसा ही चुनाव करोगे और तुम्हारा रवैया ऐसा ही रहेगा। क्या ऐसा नहीं है? तुम लोगों में बहुत-से सही और गलत के बीच डगमगाए हैं, है ना? सकारात्मक और नकारात्मक, काले और सफेद, परिवार और परमेश्वर, संतानों और परमेश्वर, सद्भाव और बिगाड़, धन और गरीबी, रुतबा और मामूलीपन, समर्थन दिए जाने और ठुकरा दिए जाने इत्यादि के बीच सभी संघर्ष के दौरान तुम लोगों ने जो विकल्प चुने हैं उनके बारे में तुम लोग निश्चित ही अनजान नहीं हो! एक सौहार्दपूर्ण परिवार और टूटे हुए परिवार के बीच तुमने पहले को चुना और तुमने ऐसा बिना किसी संकोच के किया; धन-संपत्ति और कर्तव्य के बीच तुमने फिर से पहले को चुना, यहाँ तक कि तुममें किनारे पर वापस लौटने की इच्छा भी नहीं रही; विलासिता और निर्धनता के बीच तुमने पहले को चुना; अपने बच्चों, पत्नियों और पतियों या मेरे बीच तुमने पहले को चुना; और धारणाओं और सत्य के बीच तुमने अब भी पहले को चुना। तुम लोगों के तरह-तरह के बुरे कर्मों को देखते हुए मेरा विश्वास तुम पर से बिल्कुल उठ गया है, मैं बिल्कुल स्तब्ध हूँ। तुम्हारे हृदय अप्रत्याशित रूप से इतने कठोर हैं कि उन्हें कोमल नहीं बनाया जा सकता। सालों तक मैंने अपने हृदय का जो खून खपाया है, उससे मुझे आश्चर्यजनक रूप से तुम्हारे परित्याग और विवशता से अधिक कुछ नहीं मिला, लेकिन तुम लोगों के प्रति मेरी आशाएँ हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती ही जाती हैं, क्योंकि मेरा दिन सबके सामने पूरी तरह से खुला हुआ है। फिर भी अब तुम लोग अंधेरी और बुरी चीजों का पीछा कर रहे हो और उनसे अपनी पकड़ ढीली करने से इनकार करते हो। तो फिर तुम्हारा परिणाम क्या होगा? क्या तुम लोगों ने कभी इस पर सावधानी से विचार किया है? अगर तुम लोगों को फिर से चुनाव करने को कहा जाए, तो तुम्हारा क्या रुख रहेगा?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो?)। परमेश्वर के वचनों से मैंने मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के ईमानदार इरादे को देखा। अब परमेश्वर का कार्य लोगों के परिणाम तय करने के निर्णायक मोड़ पर पहुँच गया है। चारों ओर तरह-तरह के विनाश आ रहे हैं, जिनमें लगातार आते भूकंप, अकाल और महामारियाँ शामिल हैं। परमेश्वर का कार्य समाप्त होने वाला है और परमेश्वर का अनुसरण करना और उसका उद्धार स्वीकार करना ही हमारे बचने का एकमात्र मौका है। अगर हमने यह मौका गँवा दिया, तो हमें जीवन भर पछतावा रहेगा। मेरे लिए सिंचन का कर्तव्य निभाने का अवसर पाना परमेश्वर का अनुग्रह था। उसका इरादा था कि मैं अपना कर्तव्य निभाकर और अधिक सत्य प्राप्त करूँ। लेकिन मुझे डर था कि अगर मैं बहुत ज्यादा सभाओं में गई, तो मैं पैसे कमाने का मौका गँवा दूँगी। सभाओं के दौरान, मैं परमेश्वर के वचनों पर मनन करने के लिए अपने दिल को शांत नहीं कर पाती थी और मैं तो अपने अगुआओं से यह भी कहना चाहती थी कि वे मुझे कम सभा समूहों का प्रभार दें। पैसे और कर्तव्य के बीच, मैं अभी भी पैसा, शोहरत और लाभ जैसी बाहरी चीजों से चिपकी हुई थी, उन्हें छोड़ नहीं पा रही थी। एक बार जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा और महा विनाश आएँगे, अगर मैंने सत्य को नहीं पाया, तो मैं विनाशों में तबाह हो जाऊँगी। उस समय, मैं चाहे कितना भी रोऊँ और दाँत पीसूँ या कितनी भी बुरी तरह से पछताऊँ, बहुत देर हो चुकी होगी। परमेश्वर के वचनों से मैं यह भी समझ गई कि भले ही पैसा, शोहरत और लाभ के पीछे भागने से देह को अच्छा सुख मिल सकता है और दूसरों से इज्जत और तारीफ मिल सकती है, लेकिन यह सिर्फ पल भर की संतुष्टि है। जब विनाश आते हैं, तो पैसा तुम्हारी जान बिल्कुल नहीं बचा सकता। मैंने सोचा कि भले ही मैंने अपने क्लिनिक चलाकर कुछ पैसे कमाए थे, लेकिन बच्चे को जन्म देते समय मैं बहुत ज्यादा खून बहने से लगभग मर ही गई थी। अगर परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा न होती, तो कितना भी पैसा मेरी जान नहीं बचा सकता था। मेरी एक दोस्त की पत्नी शिक्षिका थी और 30 साल से अधिक की उम्र में ही उसे ब्रेस्ट कैंसर हो गया था। महँगी विदेशी दवाएँ भी उसकी जान नहीं बचा सकीं और आखिरकार 36 साल की उम्र में वह चल बसी। मेरा एक सहपाठी भी था जो हड्डियों का अस्पताल चलाता था और हमारे काउंटी में काफी मशहूर था। अचानक, उसे लिवर कैंसर हो गया और दुर्भाग्य से, सिर्फ छह महीने बाद ही उसकी मौत हो गई। मुझे प्रभु यीशु के वचन याद आ गए : “यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा? या मनुष्य अपने प्राण के बदले क्या देगा?” (मत्ती 16:26)। हाल के बरसों में विनाश अधिक-से-अधिक गंभीर हो गए हैं, दुनिया भर में भूकंप, अकाल और महामारियाँ लगातार हो रही हैं। इन विनाशों में कितने ही लोग अचानक मर जाते हैं। तुम्हारे पास चाहे कितना भी पैसा क्यों न हो, मौत के सामने तुम हमेशा बेबस होते हो। पैसे किसी की जान नहीं बचा सकते। केवल परमेश्वर का अनुसरण करके, सत्य का अनुसरण करके और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छी तरह से निभाकर ही तुम परमेश्वर द्वारा बचाए जा सकते हो और जीवित रह सकते हो; तभी तुम एक अच्छा भाग्य और गंतव्य पा सकते हो। अभी मानवजाति को बचाने का परमेश्वर का कार्य समाप्त नहीं हुआ है। मुझे ईमानदारी से सत्य का अनुसरण करना चाहिए और अपना कर्तव्य करने के इस मौजूदा अवसर को सँजोना चाहिए। इसके बाद, जब भी मेरे पास समय होता, मैं परमेश्वर के वचन ज्यादा पढ़ती थी और सभाओं के दौरान अपने मन को शांत कर पाती थी।
बाद में, स्वास्थ्य ब्यूरो ने यह नियम लागू किया कि सभी सामुदायिक क्लिनिकों को मिलाकर एक कर दिया जाए, उन्हें एक ही प्रबंधन के तहत लाया जाए और सहकारी चिकित्सा प्रतिपूर्ति प्रणाली लागू की जाए; मरीज अब निजी क्लिनिकों में इलाज के लिए चिकित्सा खर्च का दावा नहीं कर सकते थे। मेरे समुदाय के पास क्लिनिक चलाने वाले कुछ डॉक्टरों ने मुझसे हमारे क्लिनिकों को मिलाने के बारे में बात करने के लिए संपर्क किया। मैंने सोचा कि विलय के बाद क्लिनिक का आकार कितना बढ़ जाएगा और मैं निश्चित रूप से और भी ज्यादा पैसे कमाऊँगी। क्लिनिकों का विलय मेरे लिए एक बहुत बड़ा प्रलोभन था। लेकिन, फिर मैंने सोचा कि मैं अब सिंचन का कर्तव्य निभा रही हूँ और लगभग हर दिन मेरी सभाएँ होती हैं। जब मैं अपने क्लिनिक चलाती थी, तो मेरा समय काफी हद तक मेरे हाथ में होता था, लेकिन अगर क्लिनिकों को मिलाकर एक कर दिया गया, तो मेरे साझेदार निश्चित रूप से अपने फायदे के लिए मुझे नियमित रूप से सभाओं में जाने से रोकेंगे और मैं सभाओं में शामिल होने और अपने कर्तव्य निभाने के लिए उतनी स्वतंत्र नहीं रहूँगी। मेरे आध्यात्मिक जीवन को निश्चित रूप से नुकसान होगा। सभाओं में जाने और कर्तव्य निभाने में कोई रुकावट न आए इसके लिए मैं निश्चित रूप से क्लिनिकों को मिलाकर एक नहीं कर सकती थी। लेकिन, अगर मैंने अपने क्लिनिकों को नहीं मिलाया, तो मेरे पास निश्चित रूप से मरीज कम होते जाएँगे क्योंकि वे देखेंगे कि वे मेरे क्लिनिक में अपने चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति नहीं करवा सकते। समय के साथ, मेरे क्लिनिक निश्चित रूप से दिवालिया हो जाएँगे और फिर मैं पैसे कमाने का अपना जरिया पूरी तरह से खो दूँगी। इस चुनाव का सामना करते हुए, मैं हिचकिचाई और उनसे कहा, “मुझे इस बारे में थोड़ा और सोचने दो।” अगले कुछ दिनों तक, ऐसा लगा मानो मेरे दिल पर एक भारी पत्थर रखा हो। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “प्रिय सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मेरे क्लिनिक अब इस विलय योजना का सामना कर रहे हैं। मैं इस मामले को लेकर बहुत उलझन में हूँ और नहीं जानती कि क्या करूँ। मेरा मार्गदर्शन करो।”
इसके बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और मुझे मेरे पैसा, शोहरत और लाभ के पीछे भागने के मूल कारण की कुछ समझ प्राप्त हुई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “‘दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है’; क्या यह एक रुझान है? क्या यह तुम लोगों द्वारा उल्लिखित फैशन और स्वादिष्ट भोजन के रुझानों की तुलना में अधिक शक्तिशाली नहीं है? ‘दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है’ यह शैतान का एक फलसफा है। यह लोगों में, हर समाज में बहुत प्रचलित है; तुम कह सकते हो, यह एक रुझान है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह हर एक व्यक्ति के हृदय में बैठा दिया गया है, जिन्होंने पहले तो इस कहावत को स्वीकार नहीं किया, किंतु फिर जब वे जीवन की वास्तविकताओं के संपर्क में आए, तो इसे मूक सहमति दे दी, और महसूस करना शुरू किया कि ये वचन वास्तव में सत्य हैं। क्या यह शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट करने की प्रक्रिया नहीं है? शायद लोगों के पास इस कहावत को लेकर समान मात्रा में अनुभवजन्य ज्ञान नहीं होता, बल्कि हर एक आदमी अपने आसपास घटित घटनाओं और अपने निजी अनुभवों के आधार पर इस कहावत की अलग-अलग रूप में व्याख्या करता है और इसे अलग-अलग मात्रा में स्वीकार करता है। क्या ऐसा नहीं है? चाहे किसी व्यक्ति का इस कहावत के साथ कितना भी गहरा अनुभव क्यों न हो, इसका उसके हृदय पर क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ा है? वह यह है कि इस दुनिया के लोग—और यह कहा जा सकता है कि इसमें तुम लोगों में से हर एक शामिल है—अपने स्वभाव से कुछ प्रकट करते हैं। वह क्या है? वह है पैसे की पूजा। क्या इसे लोगों के दिलों से निकालना आसान है? नहीं, यह आसान नहीं है! यह दर्शाता है कि शैतान द्वारा मनुष्य की भ्रष्टता वास्तव में गहरी है! शैतान लोगों को लुभाने के लिए पैसे का उपयोग करता है, उन सभी को पैसे और भौतिक चीजों की पूजा करने के लिए भ्रष्ट करता है। और लोगों में पैसे की यह पूजा कैसे अभिव्यक्त होती है? क्या तुम लोग नहीं सोचते कि इस दुनिया में तुम पैसे के बिना जीवित नहीं रह सकते और तुम इसके बिना एक भी दिन नहीं गुजार सकते? लोगों के पास कितना पैसा है, यह तय करता है कि उनका रुतबा कितना ऊँचा है और वे कितने प्रतिष्ठित हैं। गरीबों को नहीं लगता कि वे सिर उठाकर और गर्व से खड़े हो सकते हैं, जबकि अमीरों का ऊँचा रुतबा होता है, वे सिर उठाकर और गर्व से खड़े होते हैं, ऊँची आवाज में बोल सकते हैं और घमंडी और बेलगाम तरीके से जी सकते हैं। यह कहावत और प्रवृत्ति लोगों के लिए क्या लाती है? क्या यह सच नहीं है कि बहुत-से लोग पैसा कमाने के लिए कोई भी त्याग करने को तैयार रहते हैं? क्या अधिक पैसे की खोज में कई लोग अपनी गरिमा और ईमान का बलिदान नहीं कर देते? क्या कई लोग पैसे की खातिर अपना कर्तव्य करने और परमेश्वर का अनुसरण करने का अवसर नहीं गँवा देते? क्या सत्य प्राप्त करने और बचाए जाने का अवसर खोना लोगों का सबसे बड़ा नुकसान नहीं है? केवल इस तरीके और इस कहावत का उपयोग करके, शैतान मनुष्य को इस हद तक भ्रष्ट कर देता है। क्या शैतान का इरादा कुटिल नहीं है? क्या यह एक दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है?” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे समझाया कि जब भी मुझे कर्तव्य और पैसे के बीच चुनाव करना पड़ता था, तो मैं हमेशा पैसे और फायदे को ही चुनती थी। इसका मूल कारण शैतानी सोच और विचारों से होने वाला नुकसान था। बचपन से ही, “दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है” और “जब शहर में गरीब हो तो कोई नहीं पूछता और जब पहाड़ों में अमीर हो तो दूर-दूर के रिश्तेदार भी निकल आते हैं” जैसी शैतानी सोच और विचार मेरे दिल में घर कर गए थे। मेरा मानना था कि पैसा तुम्हें दूसरों की नजरों में रुतबा देता है और केवल पैसे से ही तुम सिर उठाकर जी सकते हो, दूसरों से बेहतर जीवन जी सकते हो और एक उज्ज्वल और शानदार जिंदगी जी सकते हो; अगर तुम्हारे पास पैसा नहीं है, तो तुम दूसरों के सामने छोटे बन जाओगे। बचपन में, चूँकि मेरा परिवार गरीब था, मैंने कॉलेज जाकर अपनी किस्मत बदलने की ठान ली थी। लेकिन, कॉलेज की प्रवेश परीक्षा से पहले ही मेरी माँ को एक लाइलाज बीमारी हो गई और मेरा कॉलेज जाने का सपना टूट गया। सांसारिक लोगों के उपहास ने अमीर बनने के मेरे संकल्प को और भी पक्का कर दिया। जब मैंने देखा कि डॉक्टर बनने से शोहरत और दौलत दोनों मिल सकती हैं, तो मैं मेडिकल स्कूल गई, योग्यता परीक्षाएँ दीं और एक क्लिनिक खोला। कुछ साल बाद, मैंने कुछ सफलता हासिल कर ली और लोगों की सराहना और तारीफ ने मेरे मिथ्याभिमान को संतुष्ट किया। मुझे और भी यकीन हो गया कि पैसे होने से ही जीवन श्रेष्ठ होता है। मैंने पैसा, शोहरत और लाभ को ही जीवन में अपने अनुसरण का लक्ष्य मान लिया था। उन सालों में, मैंने अमीर बनने की चाह में अपना सारा समय और ऊर्जा अपने क्लिनिक के काम में लगा दी। चूँकि मैं दिन भर बहुत ज्यादा तनाव में रहती थी, मुझे उच्च रक्तचाप हो गया और बच्चे के जन्म के दौरान गर्भावस्था-प्रेरित उच्च रक्तचाप की जटिलता का सामना करना पड़ा। अगर परमेश्वर की सुरक्षा न होती, तो मैं बहुत पहले ही मर गई होती। आठ सालों तक, मेरी भाभी ने बार-बार लगन से मुझे सुसमाचार का प्रचार किया, लेकिन मैं पैसा कमाने में व्यस्त थी। यह कुछ ऐसा था मानो लालच ने मेरी आँखों पर पर्दा डाल दिया हो और मुझे सच्चे मार्ग की जाँच-पड़ताल करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी; मैंने बार-बार परमेश्वर के उद्धार को ठुकराया और मैं परमेश्वर के उद्धार का महान अवसर लगभग गँवा ही चुकी थी। परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने के बाद भी, चीजों के प्रति मेरा परिप्रेक्ष्य नहीं बदला था। मुझे डर था कि अगर मैंने बहुत ज्यादा कर्तव्य निभाया या बहुत ज्यादा सभाओं में भाग लिया, तो मैं पैसा कमाने का मौका गँवा दूँगी, इसलिए मैं बहुत ज्यादा सभा समूहों के लिए जिम्मेदार नहीं बनना चाहती थी। सभाओं के दौरान, मैं परमेश्वर के वचनों पर मनन करने के लिए अपने दिल को शांत नहीं कर पाती थी और मेरे जीवन प्रवेश को नुकसान हुआ। यह ठीक वैसा ही है जैसा परमेश्वर ने उजागर किया है : “क्या कई लोग पैसे की खातिर अपना कर्तव्य करने और परमेश्वर का अनुसरण करने का अवसर नहीं गँवा देते? क्या सत्य प्राप्त करने और बचाए जाने का अवसर खोना लोगों का सबसे बड़ा नुकसान नहीं है?” मैं जीने के शैतानी नियमों के अनुसार जीती थी और मैंने पैसा, शोहरत और लाभ के पीछे भागने का गलत रास्ता अपनाया था। इसने मेरे शरीर को पीड़ा दी और उससे भी बढ़कर, मेरे जीवन को नुकसान पहुँचाया। तथ्य दिखाते हैं कि “दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है” और “पैसा ही सब कुछ नहीं है, किन्तु इसके बिना, आप कुछ नहीं कर सकते हैं” ये शैतानी भ्रांतियाँ हैं जो लोगों को गुमराह करती हैं, भ्रष्ट करती हैं और निगल जाती हैं। अगर मैं शैतान के नुकसान पहुँचाने के तरीकों की असलियत नहीं देख पाती और पैसा, शोहरत और लाभ के लिए संघर्ष करती रहती, तो अंत में, मैं निश्चित रूप से शैतान के कब्जे में होती और मेरे बचाए जाने का मौका बर्बाद हो जाता। जब मैं यह समझ गई, तो मैंने क्लिनिकों को न मिलाने का फैसला किया और यह भी तय किया कि जब किराया देने का समय आएगा, तो मैं क्लिनिक बंद कर दूँगी और अपना कर्तव्य निभाने पर ध्यान दूँगी। जब मेरे साथियों ने मुझे फिर से फोन किया, तो मैंने साफ कह दिया कि मैं क्लिनिकों को नहीं मिलाऊँगी। भले ही मैं कम पैसे कमा रही थी, लेकिन मैं सभा करने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए स्वतंत्र थी। इस तरह से अभ्यास करने से, मेरे दिल को बहुत शांति और सुकून महसूस हुआ।
जल्द ही किराया देने का समय आ गया और मैं फिर से हिचकिचाने लगी। मैंने सोचा कि कैसे मुझे डॉक्टरी की पढ़ाई करने से लेकर क्लिनिक खोलने तक पूरे दस साल लग गए थे और मैंने अपने क्लिनिक खोलने के लिए कितनी मुश्किलें सहीं थीं और अपने हृदय का सारा रक्त खर्च किया था। मैं सच में उन्हें छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी। मैंने यह भी सोचा कि अगर मैंने क्लिनिक बंद कर दिए, तो न केवल मेरा भौतिक जीवन पहले से खराब हो जाएगा, बल्कि मैं दूसरों से मिलने वाली प्रशंसा और तारीफ भी खो दूँगी। मेरे दिल में एक जंग छिड़ गई और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ, इसलिए मैं घुटनों के बल बैठ गई और परमेश्वर से लगन से प्रार्थना करने लगी, “प्रिय सर्वशक्तिमान परमेश्वर, मैंने एक बार कहा था कि जब किराया देने का समय आएगा तो मैं अपना कर्तव्य ठीक से निभाने के लिए क्लिनिक बंद कर दूँगी। लेकिन मैं अभी भी उन्हें पूरी तरह से छोड़ नहीं पा रही हूँ। मुझे प्रबुद्ध करो, मेरा मार्गदर्शन करो, मुझे आस्था और शक्ति दो।” मैं उस दिन क्लिनिक में काम करने गई। रास्ते में, मैंने अचानक एक निजी अस्पताल के सामने एक बिल्कुल काला ताबूत देखा, जिसके बगल में फूलों के हार रखे हुए थे। मैं रोने की आवाज भी हल्की-सी सुन सकती थी और मैं चौंक गई। कोई मेडिकल दुर्घटना हुई थी! पूछने पर, मुझे पता चला कि इस अस्पताल में एक औरत और उसका बच्चा, बच्चे के जन्म के दौरान मर गए थे। मैं यह सोचने से खुद को रोक नहीं सकी कि भले ही इन सालों में मेरे क्लिनिकों में कुछ छोटी-मोटी दुर्घटनाएँ हुई थीं, लेकिन वे सभी बिना किसी गंभीर नुकसान के टल गई थीं। ऐसा इसलिए नहीं था कि मेरा डॉक्टरी कौशल बहुत बढ़िया था, न ही इसलिए कि मैं सावधानी से डॉक्टरी करती थी। यह सब परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा के कारण था! परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा के बिना, एक मेडिकल दुर्घटना ही मुझे दिवालिया करने के लिए काफी होती। मैं अपने दिल से परमेश्वर की बहुत आभारी थी और जानती थी कि मुझे परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान करना है। मैंने सोचा कि परमेश्वर का कार्य समाप्त होने वाला है और मेरे सभी भाई-बहन अपने-अपने गंतव्यों के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करने के लिए अपने कर्तव्य निभाने में लगे हुए हैं। लेकिन, मैं क्लिनिकों में उलझी हुई थी और अपने कर्तव्यों के लिए और अधिक समय और ऊर्जा नहीं दे पा रही थी। परमेश्वर में मेरी कमजोर आस्था न केवल मेरे कर्तव्य के आड़े आ रही थी, बल्कि यह मेरे अपने जीवन को भी नुकसान पहुँचा रही थी। फिर मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और एक सार्थक जीवन जीने का तरीका जाना। परमेश्वर कहता है : “तुम सृजित प्राणी हो—तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना और सार्थक जीवन का अनुसरण करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की आराधना नहीं करते हो बल्कि अपनी अशुद्ध देह के भीतर रहते हो, तो क्या तुम बस मानव भेष में जानवर नहीं हो? चूँकि तुम मानव प्राणी हो, इसलिए तुम्हें स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना और सारे कष्ट सहने चाहिए! आज तुम्हें जो थोड़ा-सा कष्ट दिया जाता है, वह तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक और दृढ़तापूर्वक स्वीकार करना चाहिए और अय्यूब तथा पतरस के समान सार्थक जीवन जीना चाहिए। ... तुम वे लोग हो जो सही मार्ग का अनुसरण करते हो और सुधार की खोज करते हो। तुम लोग बड़े लाल अजगर के देश में उठ खड़े होते हो और उनमें हो जिन्हें परमेश्वर धार्मिक कहता है। क्या यह सबसे सार्थक जीवन नहीं है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (2))। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैं समझ गई कि एक सृजित प्राणी के रूप में, अगर मैं जीवन भर परमेश्वर का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने का चुनाव कर सकती हूँ, तो यही सबसे मूल्यवान और सार्थक जीवन है। मैंने पतरस के बारे में सोचा। जब प्रभु यीशु ने उसे बुलाया, तो उसने अपने मछली पकड़ने के जाल और अपनी रोजी-रोटी के औजार छोड़ दिए। उसने प्रभु यीशु का अनुसरण करने के लिए सब कुछ पीछे छोड़ दिया और अंत में उसने सत्य को प्राप्त किया और परमेश्वर द्वारा उसे पूर्ण बनाया गया। इसके विपरीत, जब मैंने खुद को देखा, तो मैंने पाया कि मैं शैतानी सोच और विचारों के अनुसार जीती थी; पैसा, शोहरत और लाभ के पीछे भागती थी। धीरे-धीरे, मेरे दिल में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं रही और मैं पतित होकर एक छद्म-विश्वासी बन गई थी। यह परमेश्वर की दया थी जो मुझे उसके घर वापस ले आई और मुझे अब अपना कर्तव्य निभाने के इस अवसर को पूरी तरह से सँजोना चाहिए। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “लोग इस दुनिया में तो आते हैं, पर मुझसे उनका सामना होना दुर्लभ है और सत्य खोजने और उसे प्राप्त करने का अवसर मिलना भी दुर्लभ है। तुम लोग इस सुंदर समय को इस जीवन में अनुसरण करने के सही मार्ग के रूप में क्यों नहीं सँजोओगे?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन)। यह सच है। बचाए जाने का यह मेरा एकमात्र मौका था। अगर मैं अभी भी परमेश्वर का अनुसरण करने और सत्य का अनुसरण करने को लेकर गंभीर नहीं हुई, तो विनाश आने पर मैं अपनी जान गँवा दूँगी। तब, भले ही मैं दुनिया का सारा पैसा कमा लूँ, उसका क्या मूल्य या अर्थ रह जाएगा? मैं अपने कर्तव्य निभाने के साथ-साथ अपने क्लिनिक भी चला रही थी और मेरे पास अपने भ्रष्ट स्वभाव का समाधान करने के लिए परमेश्वर के वचन पढ़ने और सत्य की खोज करने के लिए ज्यादा समय नहीं था। मैं तो बस खाली समय में परमेश्वर पर विश्वास करती थी, ऐसे में मैं कब सत्य को समझ पाऊँगी? केवल सत्य का अनुसरण करके और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छी तरह से निभाकर ही हम बचाए जा सकते हैं और एक शानदार गंतव्य पा सकते हैं। यही जीवन का सही मार्ग है। मुझे क्लिनिक छोड़ने थे और अपना सारा समय परमेश्वर के लिए खुद को खपाने में लगाना था। इसके बाद, मैंने क्लिनिक बंद कर दिए।
यह परमेश्वर के वचनों की अगुआई और मार्गदर्शन ही था जिसने मुझे पैसा, शोहरत और लाभ से लोगों को गुमराह और भ्रष्ट करने के शैतान के कुटिल इरादे का भेद पहचानने में सक्षम बनाया और जीवन में सत्य का अनुसरण करने के मूल्य और अर्थ को समझने में मेरी मदद की। मैं परमेश्वर को उसके वचनों की अगुआई और मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद देती हूँ, जिसने मुझे व्यवसाय और कर्तव्य के बीच एक बुद्धिमानी भरा चुनाव करने दिया। मैं पिछले कुछ सालों से कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाती आ रही हूँ। मैंने बहुत सारी भ्रष्टता प्रकट की है और परमेश्वर से प्रार्थना करने, सत्य की खोज करने, आत्म-चिंतन करके खुद को जानने के माध्यम से, मेरे भ्रष्ट स्वभावों में कुछ बदलाव आए हैं और मैं धीरे-धीरे कुछ हद तक मनुष्य जैसा जीवन जीने लगी हूँ। मुझमें जो बदलाव आए हैं, वे परमेश्वर के वचनों से प्राप्त किए गए नतीजे हैं। परमेश्वर के इस उद्धार के लिए उसका धन्यवाद!