40. मैं ग्रैजुएट स्कूल की प्रवेश परीक्षा न देने पर पछताती नहीं हूँ
बचपन से ही, मेरे माता-पिता ने मुझे कड़ी पढ़ाई का महत्व सिखाया और कहा कि अच्छी डिग्री हासिल करने से ही मुझे अच्छी नौकरी मिलेगी और तभी मैं अपनी बाकी जिंदगी रोटी-कपड़े की चिंता किए बिना जी सकूँगी और मुझे बहुत सम्मान मिलेगा। मेरे पिता अक्सर अपनी मिसाल देते थे और कहते थे कि वह अपने गाँव से विश्वविद्यालय जाने वाले पहले व्यक्ति थे, जिसकी वजह से ही वह गाँव छोड़ पाए और शहर आ पाए। अब वह एक एसी वाले दफ्तर में बैठते हैं, चाय पीते हैं, ऊँचा वेतन पाते हैं और अच्छे लाभों का आनंद लेते हैं। यह सब उनकी डिग्री की वजह से ही संभव हुआ है। बाद में, मेरी माँ ने परमेश्वर को पा लिया। वह अक्सर मुझे बाइबल की कहानियाँ सुनाती थीं और मुझसे परमेश्वर के वचन पढ़वाती थीं। मुझे पता चला कि परमेश्वर हमेशा हमारे साथ रहा है, हमारी देखभाल और रक्षा करता है और वह अब हमें बचाने के लिए सत्य व्यक्त कर रहा है। मुझे बहुत खुशी महसूस हुई और मैं परमेश्वर में विश्वास करने के लिए राज़ी थी। मेरी माँ ने मेरे साथ संगति की कि परमेश्वर में विश्वास करना जीवन में सबसे महत्वपूर्ण बात है और मुझे इसे गंभीरता से लेना चाहिए। लेकिन मैं समझ नहीं पाई और मैं अपने पिता के इस दृष्टिकोण से ज्यादा सहमत थी कि “अन्य अनुसरण छोटे हैं, किताबें उन सबसे श्रेष्ठ हैं।” मेरा मानना था कि एक उच्चतर डिग्री हासिल करके ही मेरा जीवन अच्छा हो सकता है, मैं भीड़ से अलग दिख सकती हूँ, दूसरों की ईर्ष्या की पात्र बन सकती हूँ और आदर पा सकती हूँ : पढ़ाई मेरे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज थी। मेरी जीवन योजना में शामिल था आराम से यूनिवर्सिटी में दाखिला लेना, फिर मास्टर्स, डॉक्टरेट और पोस्ट-डॉक की पढ़ाई करना और आखिरकार एक प्रोफेसर बनना, जिससे मैं अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के बीच सबसे असाधारण व्यक्ति बन जाऊँ और उनके बच्चों के लिए एक आदर्श बन जाऊँ। तब मैं अपने परिवार का नाम रोशन करूँगी और बिना किसी पछतावे के जीवन जियूँगी। एलीमेंट्री स्कूल से ही, मैं लगभग हर सुबह अंग्रेजी टेप की आवाज़ सुनकर जागती थी और छुट्टियों के दौरान, मेरे पिताजी मुझे कभी बाहर खेलने नहीं जाने देते थे। उन्होंने सप्ताहांत और सर्दी-गर्मी की छुट्टियों के दौरान मेरा दाखिला ट्यूशन क्लासों में भी करवा दिया था। हालाँकि मैं बहुत थकान महसूस करती थी, लेकिन मुझे लगता था कि मुझे यही करना चाहिए और जब भी मैं कुछ ऐसा करती जिससे मेरी पढ़ाई में देरी होती, तो मुझे अपराध-बोध महसूस होता।
मुझे एक बेहतर यूनिवर्सिटी में दाखिला दिलाने के लिए, मेरे पिता ने मुझे मेरे काउंटी शहर के हाई स्कूल से प्रांतीय राजधानी के हाई स्कूल में डालने के लिए बहुत सारा पैसा खर्च किया। इस स्कूल में, हर सेमेस्टर सीधी प्रवेश परीक्षा में स्कूल के शीर्ष दो सौ छात्रों में आने पर, आपको त्सिंगहुआ, पेइचिंग और तोंग्जी जैसे शीर्ष विश्वविद्यालयों में सीधे प्रवेश मिल सकता था। लेकिन इस स्कूल में दाखिला मिलना आसान नहीं था; इसके लिए प्रवेश परीक्षा पास करनी पड़ती थी। मुझे इस स्कूल में आसानी से दाखिला मिल सके, इसके लिए मेरे पिता ने आमने-सामने बैठकर पढ़ाए जाने वाले ट्यूशन में मेरा दाखिला करवाने के लिए फिर से बहुत सारा पैसा खर्च किया। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को सोने तक मेरी कक्षाएँ चलती थीं। मुझे तो सपने में भी सूत्र और अक्षर मेरे सिर पर भारी बोझ की तरह गिरते दिखाई देते थे। मैं घुटन और लाचारी महसूस करती थी, लेकिन अपनी भड़ास निकालने के लिए मैं बस रो सकती थी और फिर आगे बढ़ना जारी रख सकती थी। आखिरकार मेरा दाखिला उस स्कूल में हो गया, जैसा मैं चाहती थी। स्कूल बदलने के बाद, मैंने देखा कि इस स्कूल में छात्रों के बीच मुकाबला वाकई बहुत कड़ा था। हर कोई सीधे प्रवेश की जगह पक्की करने के लिए शीर्ष दो सौ में आने की कोशिश कर रहा था। ऐसे माहौल में, मुझे बहुत दबाव महसूस होता था और मैं बिल्कुल भी आराम करने की हिम्मत नहीं करती थी। मैं हर रात देर तक जागकर पढ़ाई करती थी, सुबह के एक या दो बजे से पहले सोने की हिम्मत नहीं करती थी और सप्ताहांत पर थोड़ी देर और सोना भी पाप जैसा लगता था। मैं अक्सर सोचती थी : क्या थकान के ये दिन कभी खत्म होंगे? लेकिन फिर मैंने सोचा, “अगर मैं अब कड़ी मेहनत नहीं करती और अच्छी यूनिवर्सिटी में दाखिला नहीं ले पाती और दाखिला न मिलने की वजह से अगर लोग मुझे नीची नजर से देखेंगे, तो मुझे और भी ज्यादा पछतावा होगा। एक बार अच्छी यूनिवर्सिटी में दाखिला मिल जाए, तो सब कुछ ठीक हो जाएगा।” यह सोचकर मेरे दिल में कुछ उम्मीद जगी। लेकिन मुझे हैरानी हुई, जब मेरा दाखिला केवल एक साधारण अंडरग्रेजुएट कॉलेज में ही हो पाया। मैं बहुत निराश थी। खास तौर पर, मुझे तब बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई जब मैं इस कॉलेज में अपने ऐसे कई सहपाठियों से मिली, जिन्होंने मेरे काउंटी शहर में ही पढ़ाई की थी और जिनके नंबर मुझसे कम आए थे। “मैंने तो अच्छी यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के लिए एक अच्छे हाई स्कूल में तबादला भी करवाया था, लेकिन आखिर में, मुझे दाखिला नहीं मिला। वे मुझ पर हँस रहे होंगे, कह रहे होंगे कि मेरी औकात बस इतनी ही है और मैं उनसे बेहतर नहीं हूँ, है न?” इसलिए, मैंने एक नया जीवन लक्ष्य बनाया : “मैं बैचलर डिग्री के लिए शीर्ष यूनिवर्सिटी में दाखिला नहीं ले पाई, तो क्या हुआ, मैं मास्टर्स के लिए शीर्ष यूनिवर्सिटी में दाखिला लूँगी! जब मेरे पास ऊँची डिग्री होगी, तो मेरे दोस्त और रिश्तेदार सब मेरी तारीफ करेंगे। वह कितना शानदार होगा!” यह सोचकर मुझमें प्रेरणा भर गई। उसके बाद, जब भी मेरे पास समय होता, मैं पढ़ने के लिए लाइब्रेरी चली जाती थी। जब स्कूल में पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा के लिए ट्यूशन क्लासें हो रही थीं, तो मैंने जल्दी ही उनमें दाखिला ले लिया। उस समय, मैं हफ्ते में दो बार सभाओं में जा रही थी। मैं हर सभा से कुछ न कुछ हासिल कर लेती थी और मुझे उनमें जाना अच्छा भी लगता था। मेरे साथ सभाओं में आने वाली एक बहन स्कूल में मेरी कनिष्ठ सहपाठी थी। उसमें अपने कर्तव्य को लेकर बोझ की बड़ी भावना थी और उसे तो कलीसिया अगुआ भी चुन लिया गया था। वह अपना हरसंभव समय सभाओं और अपने कर्तव्य के लिए इस्तेमाल करती थी, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकती थी। मुझे लगता था कि पढ़ाई जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज है, इसलिए मैं अपना और अधिक खाली समय पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा की तैयारी में लगाती थी। बाद में, मुझे एक सिंचन उपयाजक चुन लिया गया और हर हफ्ते उन सभाओं की संख्या भी थोड़ी-सी बढ़ गई जिनमें मैं जाती थी। अगुआ मेरे लिए जिस किसी कर्तव्य की व्यवस्था करता था उसे मैं पूरी लगन से पूरा करती थी। लेकिन, चूँकि मैं अभी भी पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा की तैयारी वाली कक्षाओं में जा रही थी, इसलिए मेरे पास अपने कर्तव्य के लिए कम समय होता था। सभाओं के दौरान, अगर मेरे भाई-बहनों को कोई समस्या होती, तो मैं उसे फटाफट हल करने के लिए संगति करना चाहती थी ताकि मैं परीक्षा की तैयारी के लिए अपना और समय बचा सकूँ। कभी-कभी, जब सभा खत्म होने वाली होती, तो मैं देखती कि मेरे भाई-बहन संगति जारी रखना चाहते हैं और मेरा भी मन करता कि थोड़ी देर और संगति करूँ, लेकिन तभी मुझे याद आता कि मैं उस दिन अपनी पढ़ाई में पहले ही पीछे छूट चुकी हूँ और अगर मैंने सभा जारी रखी, तो मैं और भी पीछे छूट जाऊँगी और इससे परीक्षा में मेरी सफलता पर असर पड़ेगा, इसलिए मैं निकल जाने का कोई बहाना ढूँढ़ लेती थी। बाद में, मुझे अपने दिल में आत्म-ग्लानि महसूस होती, लेकिन फिर मैं सोचती कि अगर मैं पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा में असफल हो गई तो दूसरे लोग मुझे कैसे नीची नजर से देखेंगे, इसलिए मैं आत्म-ग्लानि की उस भावना को दबा देती थी।
26 अगस्त 2016 को मुझे कलीसिया अगुआ चुना गया। जब इस नतीजे की घोषणा हुई, तो मेरे दिल में खुशी और चिंता दोनों थीं। मैं खुश थी क्योंकि कलीसिया अगुआ चुने जाने का मतलब था कि मुझे प्रशिक्षण के ज्यादा अवसर मिलेंगे। मैं चिंतित थी क्योंकि साल की दूसरी छमाही में, मैं यूनिवर्सिटी के चौथे साल में होऊँगी और राष्ट्रीय पोस्ट-ग्रेजुएशन प्रवेश परीक्षा बिल्कुल करीब थी। मैंने इस परीक्षा के लिए कई सालों तक कड़ी पढ़ाई की थी और इन अंतिम कुछ महीनों का समय तैयारी के लिए बहुत अहम था। अगर मैं पास नहीं हुई, तो मुझ पर “असफल उम्मीदवार” या “रिपीटर” का ठप्पा लग जाएगा। वह कितनी शर्म की बात होगी! इसके अलावा, पोस्ट-ग्रेजुएशन में दाखिला लेना मेरे जीवन के शानदार लक्ष्य को हासिल करने के रास्ते में एक महत्वपूर्ण कदम था। अगर मैं पोस्ट-ग्रेजुएशन में भी दाखिला नहीं ले पाई, तो मैं कभी उच्चतर डिग्री कैसे हासिल कर पाऊँगी? मैं इन सब सालों में देर तक क्यों जागती रही और कड़ी पढ़ाई क्यों करती रही? क्या यह उच्चतर डिग्री पाने के लिए नहीं था? अगर मैंने इस समय कलीसिया अगुआ का कर्तव्य स्वीकार कर लिया, तो मुझे कलीसिया के और अधिक कार्य में हिस्सा लेने की जरूरत पड़ेगी और मेरे पास पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए कोई समय या ऊर्जा नहीं बचेगी। यह कहा जा सकता है कि मैं अपना भविष्य छोड़ रही होऊँगी और इसके नतीजे के तौर पर मेरे पास हमेशा के लिए “अंडरग्रेजुएट” का खिताब रह जाएगा। आजकल, यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट तो हर जगह हैं। नौकरी पाने में मुझे कोई लाभ नहीं मिलेगा। अगर मुझे अच्छी नौकरी नहीं मिली, तो मैं भीड़ से ऊपर कैसे उठ पाऊँगी और अपने परिवार का नाम रोशन कैसे कर पाऊँगी? मैं हमेशा के लिए नीची नजर से देखा जाना नहीं चाहती थी, इसलिए मैंने अगुआ बनने की अपनी अनिच्छा जाहिर की। उपदेशक ने मेरी शंकाएँ सुनने के बाद, मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़कर सुनाया, जिसने मेरे दिल को छू लिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील है, तो तुम कलीसिया के लिए एक सच्चा बोझ विकसित करोगे। असल में इसे कलीसिया के लिए तुम्हारे द्वारा उठाया गया बोझ कहने के बजाय इसे अपने जीवन के लिए तुम्हारे द्वारा उठाया गया बोझ कहना बेहतर होगा, क्योंकि तुम कलीसिया के लिए एक बोझ विकसित करते हो ताकि परमेश्वर तुम्हें ऐसे अनुभवों के माध्यम से पूर्ण कर सके। इसलिए, जो कोई भी कलीसिया के लिए सबसे बड़ा बोझ उठाता है, जो कोई भी जीवन प्रवेश के लिए बोझ उठाता है—वे ही वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर पूर्ण करता है। क्या तुमने इसे स्पष्ट रूप से देखा है? यदि तुम जिस कलीसिया में हो वह रेत की तरह बिखरी हुई है, लेकिन तुम चिंतित नहीं हो और परेशान नहीं हो और तुम तब भी आँखें फेर लेते हो जब तुम्हारे भाई-बहन सामान्य रूप से परमेश्वर के वचन खा और पी नहीं सकते, तो यह कोई बोझ न होने की एक अभिव्यक्ति है। ऐसे लोग वे नहीं हैं, जिन्हें परमेश्वर प्रेम करता है। जिन्हें परमेश्वर प्रेम करता है वे धार्मिकता के भूखे और प्यासे होते हैं और वे परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होते हैं। इसलिए, तुम लोगों को परमेश्वर के बोझ के प्रति अभी तुरंत विचारशील हो जाना चाहिए; परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील होने से पहले तुम्हें तब तक इंतजार नहीं करना चाहिए जब तक कि परमेश्वर असंख्य लोगों के सामने अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करे। क्या तब तक बहुत देर नहीं हो जाएगी? परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए अभी अच्छा अवसर है। यदि तुम अपने हाथ से इस अवसर को निकल जाने दोगे, तो तुम जीवन भर पछताओगे, जैसे मूसा कनान की अच्छी भूमि में प्रवेश नहीं कर पाया और जीवन भर पछताता रहा, पछतावे के साथ ही मरा। जब परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव असंख्य लोगों पर प्रकट होगा, तो तुम पछतावे से भर जाओगे। यदि परमेश्वर तुम्हें ताड़ना नहीं भी देता है, तो भी तुम स्वयं ही अपने आपको अपने पछतावे के कारण ताड़ना दोगे। कुछ लोग इस बात से आश्वस्त नहीं हैं, लेकिन यदि तुम्हें इस पर विश्वास नहीं है, तो इंतजार करो और देखो। कुछ लोग सटीक तौर पर वही लोग हैं जो इन वचनों को स्वयं में साकार होते देखेंगे। क्या तुम इन वचनों के लिए अपनी जान गँवाने को तैयार हो?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहो)। परमेश्वर के वचन पढ़कर मुझे एहसास हुआ कि अब वह अहम समय है जब परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है और परमेश्वर लोगों को उनके कर्तव्य निभाने के जरिए पूर्ण बनाता है। एक अगुआ के रूप में, मैं ज्यादा भाई-बहनों के साथ मेलजोल कर पाऊँगी और ज्यादा समस्याओं का सामना करूँगी। इन सभी समस्याओं को सत्य खोजकर हल करना होगा और मैं जितनी ज्यादा समस्याएँ हल करूँगी, उतने ही ज्यादा सत्यों को समझूँगी। अपना कर्तव्य करने की प्रक्रिया में, मैं बहुत सारे भ्रष्ट स्वभाव प्रकट कर दूँगी। सत्य खोजने से, मेरे अनुसरण के पीछे के गलत नजरिए सही हो जाएँगे और मेरे भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे हल हो जाएँगे। यह प्रक्रिया शुद्ध होने की प्रक्रिया भी है। कर्तव्य किए बिना, तुम सत्य नहीं पा सकते और तुम शुद्ध होने और उद्धार पाने का अवसर भी खो दोगे। मुझे एहसास हुआ कि अगर मैंने इस अवसर का लाभ नहीं उठाया और परमेश्वर का कार्य खत्म होने से पहले मैंने खुद को ज्यादा सत्य से लैस नहीं किया और मेरा भ्रष्ट स्वभाव नहीं बदला, तो आखिरकार मुझे विनाश का सामना करना पड़ेगा और तब पछताने के लिए बहुत देर हो चुकी होगी। मैंने सोचा कि कैसे इस अवधि के दौरान, अपना कर्तव्य करते हुए खुद को दर्शनों से संबंधित सत्यों से लैस करके, मैंने परमेश्वर के प्रबंधन कार्य का लक्ष्य, परमेश्वर के न्याय के कार्य का महत्व समझ लिया था और परमेश्वर के कार्य का कुछ ज्ञान प्राप्त कर लिया था। साथ ही, अतीत में जब मेरे साथ चीजें घटित होती थीं, तो मैं नहीं जानती थी कि आत्म-चिंतन कैसे करना है। मैं हमेशा सोचती थी कि मेरी मानवता अच्छी है और मैं ईमानदार और दयालु हूँ। लेकिन परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन और तथ्यों के खुलासे के जरिए, आखिरकार मैंने देखा कि कीमत चुकाने और खुद को खपाने के लिए मेरे कुछ छिपे हुए इरादे थे, कि मैं परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश कर रही थी और मैं बिल्कुल भी ईमानदार इंसान नहीं थी। अगर मैंने कर्तव्य न निभाया होता, तो मुझे यह ज्ञान कभी हासिल न होता या ये लाभ प्राप्त न होते। उस दिन, मुझे एक अगुआ चुना गया था और परमेश्वर ने उम्मीद की थी कि मैं अपना कर्तव्य निभाकर और भी बहुत-से सत्य समझूँगी। परमेश्वर मुझे बचाना चाहता था, लेकिन मुझे नहीं पता था कि मेरे लिए क्या अच्छा है। मैंने केवल इस बात पर विचार किया कि क्या भविष्य में लोग मुझे उच्च सम्मान की नजर से देख सकते हैं और क्या मैं भीड़ से ऊपर उठ सकती हूँ और अपने परिवार का नाम रोशन कर सकती हूँ। मैं उस अवसर को ठुकराना चाहती थी जो परमेश्वर ने मुझे पूर्ण बनाए जाने के लिए दिया था। मैं सचमुच कितनी अदूरदर्शी, मूर्ख और अज्ञानी थी! फिर मुझे याद आया कि कैसे सिंचन का कर्तव्य निभाने की इस अवधि के दौरान मेरे भाई-बहन और अधिक सभाओं और संगति की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन मैं केवल अपनी परीक्षाओं की तैयारी के लिए जल्दी वापस जाने के बारे में सोचती थी और कलीसिया के कार्य पर बिल्कुल भी विचार नहीं करती थी। मैं सचमुच कितनी स्वार्थी थी और मुझमें मानवता की कितनी कमी थी!
मैं हमेशा मानती थी कि उच्च स्तर की शिक्षा और एक उच्चतर डिग्री होना मुझे एक अच्छे भविष्य और सुखद जीवन की गारंटी देगा। लेकिन क्या यह नजरिया वाकई तर्कसंगत है? एक दिन, मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “कुछ लोग कॉलेज में एक अच्छा विषय चुनते हैं और स्नातक होने के बाद एक बढ़िया नौकरी पा लेते हैं; कहा जा सकता है कि वे जीवन के पथ पर एक शानदार शुरुआत करते हैं। दूसरे कई अलग-अलग कौशल सीखते हैं और उनमें महारत हासिल करते हैं, फिर भी उन्हें कभी कोई ऐसी नौकरी नहीं मिलती जो उनके अनुकूल हो, न ही अपनी जगह पाते हैं, अपना खुद का करियर बनाना तो दूर की बात है; कहा जा सकता है कि इन लोगों का जीवन में पहला कदम असफलताओं और मुश्किलों से भरा होता है, उनकी संभावनाएँ धूमिल होती हैं और उनका जीवन अनिश्चित होता है। कुछ अन्य लोग लगन से अपनी पढ़ाई करते हैं, फिर भी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के हर अवसर से बाल-बाल चूक जाते हैं; ऐसा लगता है कि वे कभी भी सफलता प्राप्त न करने के लिए अभिशप्त हैं—कहा जा सकता है कि जीवन के पथ पर उनकी पहली उम्मीदें ही धुएँ में उड़ जाती हैं। यह न जानते हुए कि आगे का रास्ता आसान है या चट्टानी, वे पहली बार महसूस करते हैं कि मानव का भाग्य कितना अप्रत्याशित है और इसलिए भय और अपेक्षा के मिश्रण के साथ जीवन का सामना करते हैं। दूसरे बहुत अच्छी तरह से शिक्षित नहीं होते, फिर भी वे किताबें लिख सकते हैं और कुछ हद तक प्रसिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। और दूसरे लगभग पूरी तरह से अनपढ़ होते हैं, फिर भी वे व्यवसाय में पैसा कमा सकते हैं और इस तरह अपना भरण-पोषण करने में सक्षम होते हैं। ... कोई कौन-सा पेशा चुनता है, अपनी आजीविका कैसे चलाता है, वह जो चुनाव करता है वे अच्छे हैं या बुरे—क्या इन चीजों में लोगों के पास कोई विकल्प होता है? क्या वे लोगों की इच्छाओं और निर्णयों पर आधारित होते हैं? अधिकांश लोग कम काम करना और अधिक कमाना चाहते हैं, धूप और बारिश में मेहनत न करना, सम्मानजनक कपड़े पहनना, हर जगह आकर्षक दिखना, सबसे ऊपर रहना और अपने पूर्वजों का सम्मान बढ़ाना चाहते हैं। लोगों की ऐसी ‘आदर्श’ इच्छाएँ होती हैं, लेकिन जब वे जीवन के पथ पर अपना पहला कदम रखते हैं, तो वे धीरे-धीरे यह देखने लगते हैं कि मानव का भाग्य कितना अपूर्ण है और पहली बार वास्तव में यह महसूस करते हैं कि यद्यपि कोई अपने भविष्य के लिए साहसिक योजनाएँ बना सकता है और निरंकुश ढंग से हर तरह के सपने संजो सकता है, किसी में भी अपने सपनों को साकार करने की क्षमता या शक्ति नहीं होती, न ही अपने भविष्य को नियंत्रित करने की क्षमता होती है। किसी के सपनों और उसके सामने आने वाली वास्तविकताओं के बीच हमेशा एक अंतर होता है; चीजें कभी भी वैसी नहीं हो सकतीं जैसी कोई कल्पना करता है और ऐसी वास्तविकताओं का सामना करते हुए, लोग कभी भी संतुष्टि या संतोष नहीं पा सकते। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो अपनी आजीविका और संभावनाओं के लिए और अपने भाग्य को बदलने के लिए, बार-बार हर तरह के तरीके अपनाने और हर संभव माध्यम तलाशने की कोशिश करते हैं, हर तरह के प्रयास और त्याग करते हैं। लेकिन अंत में, भले ही वे अपनी कड़ी मेहनत के माध्यम से अपने सपनों और इच्छाओं को साकार कर सकें, वे कभी भी अपने भाग्य को नहीं बदल सकते और चाहे वे कितना भी संघर्ष कर लें, वे कभी भी अपनी नियति से आगे नहीं बढ़ सकते। अपनी क्षमताओं और बुद्धि में अंतर के बावजूद और चाहे उनमें संकल्प हो या न हो, भाग्य के सामने सभी लोग समान हैं, जहाँ महान और छोटे, ऊँच और नीच, प्रतिष्ठित और तुच्छ के बीच कोई भेद नहीं किया जाता। कोई किस पेशे में संलग्न होता है, वह अपनी आजीविका के लिए क्या करता है और जीवन में उसके पास कितना धन होता है, यह उसके माता-पिता, उसकी प्रतिभा या उसके प्रयासों और महत्वाकांक्षाओं पर निर्भर नहीं करता—यह सृष्टिकर्ता की पूर्वनियति पर निर्भर करता है” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि किसी व्यक्ति के पास किस प्रकार की संभावनाएँ और नियति होगी, यह इस बात से निर्धारित नहीं होता कि उसका मुख्य विषय क्या है या उसके पास क्या डिग्री है, बल्कि यह परमेश्वर के पूर्वनियत करने से निर्धारित होता है। मैंने अपने आस-पास के लोगों को देखा। बहुत-से लोगों ने अच्छे ढंग से पढ़ाई की थी और उच्चतर डिग्रियाँ हासिल की थीं, लेकिन आखिरकार उन्हें अच्छी नौकरियाँ नहीं मिलीं। मेरे कुछ सहपाठियों के अकादमिक ग्रेड खराब थे, लेकिन जब उन्होंने ग्रेजुएशन किया, तो नीति सुधारों की वजह से उनकी किस्मत चमक गई और वे अच्छे नियोक्ताओं के पास चले गए। कुछ अन्य सहपाठियों को पोस्ट-ग्रेजुएशन में दाखिला मिल गया, लेकिन अंत में, वे वही काम कर रहे थे जो एसोसिएट डिग्री वाले कर रहे थे। साथ ही, क्या आपको अच्छे स्कूल में दाखिला मिल सकता है, यह तय करना आपके हाथ में नहीं है। मेरी ही मिसाल ले लो। एक अच्छी यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के लिए, मैंने खास तौर पर एक अच्छे हाई स्कूल में तबादला करवाया और हर दिन पढ़ाई करने के लिए रात-दिन एक कर दिया। मुझे लगता था कि बहुत सारी मेहनत करके मैं एक शीर्ष यूनिवर्सिटी के दरवाजों से अंदर दाखिल हो सकती हूँ और उसके बाद भीड़ से ऊपर उठ सकती हूँ और अपने परिवार का नाम रोशन कर सकती हूँ। लेकिन मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि अंत में, मुझे केवल एक साधारण कॉलेज में ही दाखिला मिलेगा। अब भी वही बात थी। अगर मेरी नियति में किसी शीर्ष पोस्ट-ग्रेजुएशन कॉलेज में जाना लिखा होगा तो मैं जाऊँगी। अगर मेरी नियति में नहीं लिखा होगा तो चाहे मैं कितनी भी मेहनत कर लूँ, मैं परीक्षा पास नहीं कर पाऊँगी। मैं बस इतना कर सकती थी कि परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर लूँ और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाते हुए चीजों को स्वाभाविक रूप से होने दूँ। यह सोचकर, मुझे दिल में राहत महसूस हुई और मैंने एक अगुआ का कर्तव्य स्वीकार कर लिया। अगुआ बनने के बाद, मैंने देखा कि कलीसिया के सभी मामलों को, चाहे वे बड़े हों या छोटे, सावधानी से हल करने की जरूरत थी। मैं बस थोड़े समय से प्रशिक्षण ले रही थी और सिद्धांतों पर मेरी पकड़ नहीं थी और मैं नहीं जानती थी कि बहुत-सी चीजों को कैसे सँभालना है। इसलिए, मुझे सिद्धांत खोजने और भाई-बहनों के साथ संगति करने में मेहनत झोंकनी थी। असल में मेरे पास अध्ययन करने के लिए कोई समय या ऊर्जा नहीं थी। साथ ही, मुझे अधिकाधिक यह एहसास होता जा रहा था कि पाठ्यपुस्तकों के ज्ञान को रटना थकाऊ और उबाऊ है और इस ज्ञान का कोई व्यावहारिक उपयोग नहीं है। मुझे उन चीजों को रटने के लिए हमेशा खुद को मजबूर करना पड़ता था। लेकिन अपना कर्तव्य करना अलग था। अपना कर्तव्य करने से मुझे व्यावहारिक लाभ मिल सकते थे और मेरे दिल को खुशी महसूस होती थी। उदाहरण के लिए, कलीसिया को स्वच्छ करने के कार्य को लागू करने में, मुझे भेद पहचानने के संबंध में सत्य खोजने और उसका लोगों की अभिव्यक्तियों के साथ मिलान करने की जरूरत थी, जिससे मेरी भेद पहचानने की क्षमता में सुधार हो सकता था। मैं कलीसिया का कार्य करने में अक्सर कठिनाइयों का सामना भी करती थी। मैं प्रार्थना करने और खोजने के लिए परमेश्वर की ओर मुड़ती थी और परमेश्वर का प्रबोधन और मार्गदर्शन प्राप्त करती थी। परमेश्वर में मेरी आस्था भी बढ़ गई। यूँ तो मैंने अय्यूब की तरह परमेश्वर को अपनी आँखों से नहीं देखा, लेकिन मैं महसूस कर सकती थी कि परमेश्वर हर समय और हर जगह मेरे साथ है और मेरा एकमात्र सहारा है। मेरा दिल बेहद सुकून में था और मेरे दिल में संतुष्टि की वह भावना ऐसी चीज थी जो अध्ययन करने से हासिल नहीं की जा सकती थी। लेकिन जब भी मैं वापस यूनिवर्सिटी जाती और अपने सभी सहपाठियों को पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा की तैयारी में व्यस्त देखती और शिक्षकों, छात्रों और अभिभावकों सबको पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा के बारे में बात करते हुए सुनती, जबकि मैं कलीसिया के कार्य में व्यस्त रहती थी और मेरे पास परीक्षा की तैयारी के लिए कम से कम समय होता जा रहा था, तो मुझे चिंता होती कि वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे। क्या वे सोचेंगे कि मैं अपनी पढ़ाई में मन नहीं लगा रही हूँ और अपने उचित कार्य पर ध्यान नहीं दे रही हूँ? फिर मैं सोचती कि कैसे बचपन से ही मैं एक उच्चतर डिग्री पाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही थी। क्या मैं ऐसे ही हार मान लूँगी? फिर तो मुझे कभी भी भीड़ से ऊपर उठने का मौका नहीं मिलेगा। इन बातों के बारे में सोचकर, मेरा मन अभी भी इसमें अटका था, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं निरंतर एक उच्चतर डिग्री के पीछे भागना चाहती हूँ और मैं अब भी अपने दिल में चाहती हूँ कि पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा में बैठूँ। मैं इसे पूरी तरह से नहीं छोड़ पा रही हूँ। कृपया सत्य समझने के लिए मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा के मामले से प्रभावित न हूँ और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकूँ।”
प्रार्थना करने के बाद, मैंने प्रसिद्धि और लाभ से संबंधित परमेश्वर के वचन ढूँढ़े। मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “लोगों के ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया के दौरान सभी प्रकार के तरीके इस्तेमाल करके, चाहे वह कहानियाँ सुनाना हो, बस उन्हें कुछ ज्ञान देकर या उन्हें अपनी इच्छाएँ या आकांक्षाएँ पूरी करने देकर, शैतान लोगों को किस मार्ग पर ले जाना चाहता है? लोगों को लगता है कि ज्ञान अर्जित करने में कुछ भी गलत नहीं है, यह पूरी तरह स्वाभाविक और न्यायोचित है। इसे आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करें तो ऊँची आकांक्षाएँ रखने या महत्वाकांक्षाएँ होने का मतलब दृढ़-संकल्प होना है और यही जीवन में सही मार्ग होना चाहिए। अगर कोई अपने जीवनकाल में अपनी आकांक्षाएँ पूरी कर सके या सफल करियर बना सके, तो क्या यह जीने का अधिक शानदार तरीका नहीं है? इस तरह व्यक्ति न केवल अपने पूर्वजों का सम्मान कर सकता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी छाप छोड़ने का मौका भी पा सकता है—क्या यह अच्छी बात नहीं है? सांसारिक लोगों की दृष्टि में यह एक अच्छी बात है, और उनकी निगाह में यह उचित और सकारात्मक होनी चाहिए। लेकिन क्या शैतान, अपने दुर्भावनापूर्ण इरादों के साथ, लोगों को ऐसे मार्ग पर ले जाता है और बस इतना ही होता है? बिल्कुल नहीं। वास्तव में, मनुष्य की आकांक्षाएँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, उसकी इच्छाएँ चाहे कितनी भी यथार्थपरक क्यों न हों या वे कितनी भी उचित क्यों न हों, वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है और वह सब जो मनुष्य खोजता है, वह अटूट रूप से दो शब्दों से जुड़ा है। ये दो शब्द हर व्यक्ति के लिए उसके संपूर्ण जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर बैठाना चाहता है। वे दो शब्द कौन-से हैं? वे हैं ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ’। शैतान एक बहुत ही सौम्य तरीका चुनता है, एक ऐसा तरीका जो मनुष्य की धारणाओं के बहुत ही अनुरूप है और जो बहुत आक्रामक नहीं है, ताकि वह लोगों से अनजाने में ही जीवित रहने के अपने साधन और नियम स्वीकार करवा ले, जीवन लक्ष्य और जीवन की दिशाएँ विकसित करवा ले और जीवन की आकांक्षाएँ रखवाने लगे। अपने जीवन की आकांक्षाओं के बारे में लोगों के वर्णन कितने ही आडंबरपूर्ण क्यों न लगते हों, ये आकांक्षाएँ हमेशा ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ’ के इर्द-गिर्द घूमती हैं। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति—या वास्तव में कोई भी व्यक्ति—जीवन भर जिन सारी चीजों का पीछा करता है वे केवल इन दो शब्दों से जुड़ी होती हैं : ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ’। लोगों को लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास ऊँचे रुतबे और अपार धन-संपत्ति का आनंद लेने और जीवन का आनंद लेने के लिए पूँजी आ जाती है। उन्हें लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास वह पूँजी होती है जिसका इस्तेमाल वे सुख खोजने और देह के उच्छृंखल आनंद में लिप्त रहने के लिए कर सकते हैं। लोग जिस प्रसिद्धि और लाभ की कामना करते हैं उसकी खातिर वे खुशी से और अनजाने में, अपने शरीर, दिल और यहाँ तक कि अपनी संभावनाओं और नियतियों समेत वह सब जो उनके पास है, शैतान को सौंप देते हैं। वे ऐसा बिना किसी हिचकिचाहट के करते हैं, बिना एक पल के संदेह के करते हैं और उनके पास कभी जो कुछ था उसे वापस लेने की जागरूकता के बिना करते हैं। लोग जब इस प्रकार खुद को शैतान को सौंप देते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं तो क्या वे खुद पर कोई नियंत्रण बनाए रख सकते हैं? कदापि नहीं। वे पूरी तरह से और शत-प्रतिशत शैतान से नियंत्रित होते हैं। वे पूरी तरह से और सर्वथा इस दलदल में धँस जाते हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ रहते हैं। जब कोई प्रसिद्धि और लाभ की दलदल में फँस जाता है तो फिर वह कभी उसे नहीं खोजता जो उजला है, जो न्यायोचित है या वे चीजें नहीं खोजता जो खूबसूरत और अच्छी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के लिए प्रसिद्धि और लाभ का प्रलोभन बहुत बड़ा होता है और ये ऐसी चीजें हैं जिनका अनुसरण लोग अंतहीन ढंग से अपने पूरे जीवन भर और यहाँ तक कि अनंत काल तक कर सकते हैं। क्या यह असली स्थिति नहीं है? कुछ लोग कहेंगे कि ज्ञान अर्जित करना पुस्तकें पढ़ने और कुछ ऐसी चीजें सीखने से अधिक कुछ नहीं है जिन्हें तुम पहले से नहीं जानते हो, ताकि समय से पीछे न रह जाओ या संसार द्वारा पीछे न छोड़ दिए जाओ। ज्ञान का अर्जन केवल आजीविका जुटाने के लिए, अपने भविष्य के लिए या बुनियादी आवश्यकताएँ मुहैया कराने के लिए किया जाता है। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है, जो मात्र मूलभूत आवश्यकताओं के लिए और मात्र भोजन का मसला हल करने के लिए एक दशक तक कठिन परिश्रम से अध्ययन करेगा? नहीं, ऐसा कोई नहीं है। तो फिर व्यक्ति इन सारे वर्षों तक ये कठिनाइयाँ क्यों सहन करता है? प्रसिद्धि और लाभ के लिए। प्रसिद्धि और लाभ आगे उसका इंतजार कर रहे हैं, उसे इशारे से बुला रहे हैं, और वह मानता है कि केवल अपने परिश्रम, कठिनाइयों और संघर्ष के माध्यम से ही वह उस मार्ग पर कदम बढ़ा सकता है जो प्रसिद्धि और लाभ की ओर ले जाएगा, जिससे उसे ये चीजें प्राप्त होंगी। ऐसे व्यक्ति को अपने भविष्य के पथ के लिए, अपने भविष्य के आनंद के लिए और एक बेहतर जिंदगी प्राप्त करने के लिए ये कठिनाइयाँ सहनी ही होंगी। ... ये विचार और कथन पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को प्रभावित करते हैं; बहुत से लोग इन विचारों को स्वीकार करते हैं, और वे इन ‘ऊँची आकांक्षाओं’ को पूरा करने के लिए उनके पीछे भागते हैं, संघर्ष करते हैं और यहाँ तक कि अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार रहते हैं। यह वह साधन और तरीका है जिसके द्वारा शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। तो जब शैतान लोगों को इस मार्ग पर ले जाता है, तो क्या वे परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसकी आराधना कर पाते हैं? और क्या वे परमेश्वर के वचन स्वीकार कर पाते हैं और सत्य का अनुसरण कर पाते हैं? बिल्कुल नहीं—क्योंकि वे शैतान द्वारा दिग्भ्रमित किए जा चुके हैं। आओ, अब हम इस पर विचार करें : शैतान द्वारा लोगों के मन में बिठाए गए ज्ञान, विचारों और दृष्टिकोणों के भीतर क्या परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उसकी आराधना करने के सत्य हैं? क्या परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के सत्य हैं? क्या परमेश्वर का कोई वचन है? क्या उनमें कुछ ऐसा है जो सत्य का है? बिल्कुल नहीं—ये चीजें पूरी तरह से अनुपस्थित हैं” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। “इस प्रसिद्धि और लाभ की खातिर मानवजाति भटककर परमेश्वर से दूर हो जाती है, उसके साथ विश्वासघात करती है और अधिकाधिक दुष्ट होती जाती है। इस तरह, एक के बाद एक पीढ़ी शैतान की प्रसिद्धि और लाभ के बीच नष्ट होती जाती है। अब शैतान की करतूतें देखते हुए क्या उसके धूर्त इरादे एकदम घृणास्पद नहीं हैं? शायद आज भी तुम शैतान की धूर्त मंशाओं की असलियत नहीं देख पाते हो क्योंकि तुम्हें लगता है कि प्रसिद्धि और लाभ के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं होगा और लोग अब आगे का मार्ग नहीं देख पाएँगे, अपने लक्ष्य नहीं देख पाएँगे और उनका भविष्य अंधकारमय, धुँधला और प्रकाशरहित हो जाएगा। परंतु धीरे-धीरे तुम सब लोग एक दिन समझ जाओगे कि प्रसिद्धि और लाभ ऐसी भारी-भरकम बेड़ियाँ हैं जिन्हें शैतान मनुष्य पर डाल देता है। जब वह दिन आएगा, तुम पूरी तरह से शैतान के नियंत्रण का प्रतिरोध करोगे और पूरी तरह से उन बेड़ियों का भी प्रतिरोध करोगे जो शैतान ने तुम पर डाल दी हैं। जब तुम उन सभी चीजों से खुद को मुक्त करना चाहोगे जिन्हें शैतान ने तुम्हारे भीतर गहराई से बैठा दिया है, तब तुम शैतान से अपने आपको पूरी तरह से अलग कर लोगे और उस सबसे सच में नफरत करोगे जो शैतान तुम्हारे लिए लाया है। तभी तुम्हारे पास परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम होगा और तड़प होगी” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)।
परमेश्वर के वचन पढ़कर मुझे एहसास हुआ कि ऊपरी तौर पर, ज्ञान का अनुसरण करने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन इसके पीछे शैतान के दुष्ट इरादे छिपे हैं। परमेश्वर ने इंसान को बनाया। लोगों के लिए परमेश्वर में विश्वास करना और उसकी आराधना करना और अपना कर्तव्य निभाना पूरी तरह स्वाभाविक और उचित है; ये सकारात्मक चीजें हैं। लेकिन लोगों के लिए परमेश्वर से होड़ करने की खातिर शैतान उन्हें गुमराह करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है, उन्हें प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण करने के रास्ते पर ले जाता है, लोगों को यह मनवाता है कि प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण एक सकारात्मक चीज है, ताकि वे अपना सारा समय और ऊर्जा प्रसिद्धि और लाभ के लिए खपा दें और अपने कर्तव्य निभाने या परमेश्वर की आराधना करने पर बिल्कुल भी ध्यान न दें, इस प्रकार वे परमेश्वर से दूर हो जाते हैं, परमेश्वर के साथ विश्वासघात करते हैं और आखिरकार शैतान द्वारा निगल लिए जाते हैं। मैंने याद किया कि कैसे छोटी उम्र से ही मैंने अपने अंदर पिता के बैठाए इस नजरिए को स्वीकार कर लिया था कि “अन्य अनुसरण छोटे हैं, किताबें उन सबसे श्रेष्ठ हैं।” मेरा मानना था कि नीची नजर से देखे जाने से बचने के लिए, मुझे कड़ी पढ़ाई करनी होगी और ऊँची डिग्री हासिल करनी होगी। प्रवेश परीक्षाओं की खातिर, मैं हर दिन सुबह से रात तक एक रोबोट की तरह अपने दिमाग में ज्ञान ठूँसती रहती थी। मुझे लगता था जैसे मेरा सिर फटने वाला है। घुटन और पीड़ा महसूस करते हुए, मेरे पास अपनी भड़ास निकालने का रोने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। फिर भी, मैंने कभी हार मानने के बारे में नहीं सोचा, क्योंकि मेरा मानना था कि प्रसिद्धि और लाभ हासिल करना एक उज्ज्वल भविष्य पाने के बराबर है। भीड़ से ऊपर उठना और अपने परिवार का नाम रोशन करना मेरे सामने लटके हुए चारे की तरह था, मुझे अपना सारा समय और ऊर्जा खपाने के लिए ललचा रहा था। बाद में, यूँ तो मैं सभाओं में भी जाती थी और अपना कर्तव्य भी निभाती थी, लेकिन मेरे दिमाग में यही चलता रहता था कि पढ़ाई के लिए और समय कैसे निकाला जाए। मुझमें भाई-बहनों की कठिनाइयों और समस्याओं को हल करने की कोई इच्छा नहीं थी, मैं डरती थी कि इससे मेरा पढ़ाई का समय खप जाएगा। मेरे भाई-बहनों ने मुझे एक अगुआ चुना, जो परमेश्वर द्वारा दिया गया प्रशिक्षण का एक अवसर था, ताकि मैं सत्य प्राप्त कर सकूँ और जीवन में संवृद्धि कर सकूँ। लेकिन मैं मना करना चाहती थी। मैं प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण को एक सकारात्मक चीज मानती थी और उन्हें पाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थी। फिर भी जब मैंने अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाया, तो मुझे अपनी अंतरात्मा से कतई कोई धिक्कार महसूस नहीं हुआ। मैंने सचमुच सही और गलत में फर्क नहीं किया! मैंने देखा कि प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण करना मुझे केवल परमेश्वर से दूर ले जाएगा और मुझसे परमेश्वर के साथ विश्वासघात करवाएगा और आखिरकार, मैं परमेश्वर का उद्धार पूरी तरह से खो दूँगी और शैतान द्वारा निगल ली जाऊँगी। अंत के दिनों में, परमेश्वर मानवजाति को बचाने हेतु वचन व्यक्त करने के लिए देहधारी हुआ है। यह मनुष्य के उद्धार के लिए अहम समय है, फिर भी मैं इस बेकार ज्ञान का अध्ययन करने में अपने जीवन के सबसे अच्छे साल बर्बाद कर रही थी, परमेश्वर के उद्धार के सबसे अच्छे अवसर को गँवा रही थी। जब परमेश्वर का कार्य खत्म होगा और महा विनाश आएंगे, तो चाहे मेरे पास कितना भी ज्ञान या पैसा हो या मेरी प्रतिष्ठा कितनी भी बड़ी हो, यह मेरे जीवन को नहीं बचा पाएगा। उसका क्या अर्थ होगा? यह सोचकर, मुझे प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण करने के गंभीर परिणामों का एहसास हुआ और मैं अधिकाधिक महसूस करती गई कि पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा की तैयारी मेरी जवानी को बर्बाद ही करेगी। अब मैं शैतान के धोखे में नहीं आ सकती थी। मुझे प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण छोड़ना ही था और अपना कर्तव्य करने में और अधिक समय और ऊर्जा लगानी थी।
दिसंबर 2016 में, जैसे-जैसे परीक्षा की तारीख करीब आती गई, मैंने अपनी मेज पर पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा की तैयारी वाली किताबें देखीं, जिन्हें मैंने कई दिनों से नहीं खोला था और मेरा मन अब भी कुछ उलझन में था : “क्या मुझे जाकर परीक्षा देनी चाहिए या नहीं? आखिर, मैंने दस साल से ज्यादा समय तक कड़ी मेहनत की है। अगर मैं पास हो गई तो क्या? लेकिन अगर मैं पास हो गई, तो मुझे एक नए दौर की कठिन पढ़ाई शुरू करनी पड़ेगी, सहपाठियों के बीच और भी खुले और छिपे हुए संघर्ष होंगे और विभिन्न प्रमाण-पत्रों के पीछे भागने की एक अंतहीन दौड़ होगी। बस इसके बारे में सोचकर ही मुझे दबाव और घुटन महसूस होती है! इसमें अनिवार्य रूप से मेरे कर्तव्य निभाने का समय भी छिन जाएगा। लेकिन अगर मैं पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा नहीं देती, तो मैं भविष्य में क्या कर सकती हूँ? समाज अब डिग्रियों को बहुत महत्व देता है। अगर मेरे पास उच्चतर डिग्री नहीं होगी, तो नौकरी पाना आसान नहीं होगा। आखिर, यह मेरे भविष्य से जुड़ा है!” यह सोचकर, मैं अध्ययन कक्ष में इधर-उधर टहलने लगी। मुझे क्या चुनना चाहिए? मुझे परमेश्वर की मनुष्य के लिए आखिरी ग्यारह अपेक्षाओं में से एक याद आई : “क्या तुम मेरे वास्ते भविष्य में अपने जीने के मार्ग पर विचार न करने, योजना न बनाने या तैयारी न करने में सक्षम हो?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2))। फिर मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “जिन चीजों की मनुष्य आशा और अनुसरण करता है, वे मनुष्य की नियत मंज़िल के बजाय, वे चीजें हैं जिनके लिए वह देह की असंयमी इच्छाओं के अनुसरण के दौरान तरसता है। इस बीच, जो कुछ परमेश्वर ने मनुष्य के लिए तैयार किया है, वह उसे शुद्ध किए जाने के बाद देय ऐसे आशीष और प्रतिज्ञाएँ हैं, जिन्हें परमेश्वर ने संसार के सृजन के बाद मनुष्य के लिए तैयार किया था, और जो मनुष्य की पसंद, धारणाओं, कल्पनाओं या देह के द्वारा दूषित नहीं हैं। यह मंज़िल किसी व्यक्ति-विशेष के लिए तैयार नहीं की गई है, बल्कि यह संपूर्ण मानव-जाति के लिए विश्राम का स्थल है। और इसलिए, यह मंज़िल मानव-जाति के लिए सबसे उपयुक्त मंज़िल है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना)। “अब वह समय है जब मेरा आत्मा महान कार्य करता है और वह समय है जब मैं अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच अपना कार्य शुरू करता हूँ। इससे भी बढ़कर यह वह समय है जब मैं सभी सृजित प्राणियों को वर्गीकृत करता हूँ, हर एक को उसकी संबंधित श्रेणी में रखता हूँ ताकि मेरा कार्य और अधिक तेजी से आगे बढ़ सके और नतीजे हासिल करने में अधिक सक्षम हो। और इसलिए मैं तुमसे अभी भी यही माँग करता हूँ कि तुम अपने पूरे अस्तित्व को मेरे संपूर्ण कार्य के लिए अर्पित कर दो; और इससे भी अधिक तुम मेरे द्वारा तुम पर किए गए संपूर्ण कार्य का स्पष्ट रूप से भेद पहचान लो और इसे सटीकता से देख लो और अपनी पूरी ऊर्जा खपा दो ताकि मेरा कार्य और बड़े नतीजे हासिल कर सके। यही चीज तुम्हें समझ लेनी चाहिए। एक-दूसरे से होड़ लेने, वैकल्पिक योजना तलाशने या अपनी देह के लिए आराम तलाशने से बाज आओ ताकि मेरे कार्य में विलंब करने और अपने अद्भुत भविष्य में बाधा डालने से बच सको। वरना ऐसा करने से तुम्हें सुरक्षा मिलनी तो दूर रही, तुम खुद पर केवल बरबादी ले आओगे। क्या यह तुम्हारी मूर्खता नहीं होगी? जिसमें तुम आज लिप्त हो वही चीज तुम्हारे भविष्य को बरबाद कर रही है, जबकि आज तुम जो पीड़ा सहते हो वही चीज तुम्हारी सुरक्षा कर रही है। तुम्हें इन चीजों का स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए ताकि तुम उन प्रलोभनों का शिकार होने से बच सको जिनसे बाहर निकलना तुम्हें कठिन लगेगा और ताकि तुम घने कोहरे में गलती से घुसने और फिर कभी सूर्य को न खोज पाने से बच सको। जब घना कोहरा छँटेगा, तुम अपने आपको महान दिन के न्याय के मध्य पाओगे” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है)। मैंने परमेश्वर के वचनों पर बार-बार चिंतन-मनन किया और जितना ज्यादा मैंने चिंतन-मनन किया, मेरा दिल उतना ही रोशन होता गया। परमेश्वर का इरादा यह है कि लोग सृष्टिकर्ता के सामने वापस आ सकें और अपना कर्तव्य कर सकें, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार कर सकें और अपने भ्रष्ट स्वभावों को शुद्ध कर सकें और इस तरह वह सुंदर मंज़िल पा सकें जो परमेश्वर ने उनके लिए तैयार की है। इसके विपरीत, जिस चीज का मैं अनुसरण कर रही थी—भीड़ से ऊपर उठना और अपने परिवार का नाम रोशन करना—वह ऊपरी तौर पर मेरे देह के हितों के अनुरूप लगता था, लेकिन असल में, यह मुझे परमेश्वर से दूर ले जा रहा था और मुझसे परमेश्वर के साथ विश्वासघात करवा रहा था और आखिरकार मेरी बर्बादी का कारण बनता। मैंने सोचा कि कैसे मेरा चार सदस्यों का परिवार अतीत में परमेश्वर में विश्वास करता था, लेकिन बाद में मेरे पिता और मेरी बहन ने इस डर से धीरे-धीरे सभाओं में आना बंद कर दिया कि परमेश्वर में उनका विश्वास उनके नियोक्ताओं को पता चल जाएगा और उनके भविष्य को प्रभावित करेगा, और आखिरकार परमेश्वर में विश्वास करना पूरी तरह से छोड़ दिया। यूँ तो उन्होंने बाद में ऊँचा स्तर और एक अच्छा भौतिक जीवन हासिल कर लिया, लेकिन वे लोगों से हमेशा सावधान रहते थे, उनका कोई सच्चा दोस्त नहीं था और उन्हें हमेशा डर लगा रहता था कि कोई उनके खिलाफ साजिश न करे; वे अपने दिन साजिश करने और जोड़-तोड़ में बिताते थे, वे इतने चिंतित रहते थे कि रात को सो नहीं पाते थे। शैतान उनके साथ खेल रहा था और उन्हें तड़पा रहा था और वे बहुत पीड़ा में जी रहे थे। प्रसिद्धि और लाभ के उनके अनुसरण के नतीजे मुझे यह भी याद दिला रहे थे कि प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण से कोई फायदा नहीं होता : यह एक बंद गली है। मैं उनके नाकाम रास्ते पर नहीं चल सकती थी। मुझे एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने का अनुसरण करना चाहिए और उस सच्चे भविष्य का अनुसरण करना चाहिए जो परमेश्वर ने मनुष्य के लिए तैयार किया है। इस पर गहराई से सोचकर मुझे अब सर्दी की ठंडक महसूस नहीं हो रही थी। हालाँकि मैंने पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन फीस भर दी थी और मेरा परीक्षा हॉल भी तय हो चुका था, लेकिन मैंने परीक्षा न देने का फैसला किया, क्योंकि भले ही मैं पास हो जाऊँ, यह जीवन का सही रास्ता नहीं है और वह प्रसिद्धि अर्थहीन है।
यह फैसला करने के बाद, मुझे अपने पूरे शरीर में एक राहत महसूस हुई। जब मैं स्कूल वापस गई और अपने सहपाठियों को पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा के बारे में चिंतित देखा, तो मैं समझ गई कि यह शैतान उन्हें तड़पा रहा है और मेरा दिल अब पोस्ट-ग्रेजुएशन की प्रवेश परीक्षा की ओर नहीं खिंच रहा था। उस समय से, मैंने खुद को पूरी तरह से अपना कर्तव्य करने के लिए समर्पित कर दिया। एक साल बाद, मेरे पिता को अंतिम चरण का पेट का कैंसर होने का पता चला और छह महीने बाद उनका निधन हो गया। जब मैंने देखा कि मौत के सामने ज्ञान, प्रसिद्धि और लाभ किसी काम के नहीं थे, तो मुझे अपने दिल में और भी पक्का यकीन हो गया कि परमेश्वर में विश्वास करना और सत्य का अनुसरण करना ही लोगों के जीने का एकमात्र मार्ग है। अब मैं अपना कर्तव्य पूर्णकालिक तौर पर करती हूँ, दुनिया के शोर-शराबे और संघर्ष से दूर और मैं अपने दिल में बहुत शांति और सुकून महसूस करती हूँ। हर दिन, मैं अपने भाई-बहनों के साथ मिलती-जुलती हूँ और हम साथ मिलकर अपना कर्तव्य निभाते हैं और सत्य पर संगति करते हैं। मैं परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने पर भी ध्यान देती हूँ और मैंने अपने खुद के भ्रष्ट स्वभावों का कुछ ज्ञान हासिल किया है। ये लाभ कुछ ऐसे हैं जो मुझे बरसों की स्कूली शिक्षा से और बड़ी प्रसिद्धि और लाभ हासिल करने से कभी नहीं मिल सकते थे। मैं परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन की इस बात के लिए आभारी हूँ कि इसने मुझे यह समझने दिया कि एक सच्चा भविष्य क्या है और एक बुद्धिमानी भरा विकल्प चुनने दिया।