52. मैं अब खुशामद नहीं करती

झेंग जिन, चीन

दिसंबर 2023 में, अगुआओं ने मेरे लिए कुछ कलीसियाओं के सिंचन कार्य की जिम्मेदारी संभालने की व्यवस्था की। भाई लिन हाई पर्यवेक्षक था। हमारे काम के पर्यवेक्षण और उसका जायजा लेने के अलावा, वह कई दूसरी कलीसियाओं में सिंचन कार्य के लिए भी जिम्मेदार था। जब मैंने पहली बार लिन हाई के साथ काम करना शुरू किया तो मैंने देखा कि वह अपने कर्तव्य में कुछ बोझ उठाता था; नवागंतुकों को आने वाली किसी भी समस्या का वह तुरंत जायजा लेता और उसे हल करता था। फरवरी 2024 के अंत में, हमने नवागंतुकों को आने वाली आम समस्याओं को संबोधित करते हुए कलीसियाओं को एक संचार पत्र भेजा और हमने यह सुनिश्चित करने के लिए फॉलो-अप भी किया कि कलीसियाएँ सिंचनकर्ता बनने के लिए अनुपयुक्त किसी भी कर्मी के कर्तव्य में तुरंत बदलाव करें। बाद में, मैंने पाया कि लिन हाई न केवल हमारे काम के कार्यान्वयन का जायजा लेने में विफल रहा था, बल्कि उसने उन कलीसियाओं का भी जायजा नहीं लिया था जिनके लिए वह जिम्मेदार था और सिंचनकर्ताओं का कर्तव्य समय पर बदला नहीं गया था। मैंने मन ही मन सोचा, “शायद हाल में उसकी तबीयत ठीक नहीं रही है? क्या उसका ब्लड प्रेशर फिर से बढ़ गया है? शायद वह बीमार चल रहा है और अपने कर्तव्य में बोझ नहीं उठा रहा है? शायद मुझे उसे याद दिलाना चाहिए। लेकिन अगर मैं सीधे तौर पर यह कह दूँ तो क्या वह कहेगा कि मैं उसके प्रति विचारशील नहीं हूँ? इसके अलावा, मैं सिर्फ एक टीम सदस्य हूँ। अगर मैंने सीधे उसकी समस्याओं की ओर इशारा किया तो क्या उसकी बेइज्जती होगी और वह मुझसे द्वेष रखने लगेगा? अगर इससे हमारे बीच तनाव पैदा हो गया तो? उसके बाद सहयोग करना कितना अजीब हो जाएगा!” लेकिन फिर मुझे याद आया कि परमेश्वर ने संगति की है कि काम में सहयोगियों को एक-दूसरे का पर्यवेक्षण करना चाहिए और याद दिलाना चाहिए। उसकी समस्याएँ देखकर भी एक शब्द न कहना मुझे सही नहीं लगा। इसलिए, मैंने उसे उन कार्यों की एक सूची दी जिनका उसे जायजा लेना था और उन कलीसियाओं की सूची दी जिनमें सिंचनकर्ताओं की कमी थी और उनका जायजा लेने की याद दिलाई। मूल रूप से मैं उससे अपने कर्तव्य में अनमना और गैर-जिम्मेदार होने की प्रकृति और परिणामों के बारे में बात करना चाहती थी, लेकिन मुझे चिंता थी कि ऐसा कहने से वह नाराज हो जाएगा और भविष्य में हमारे लिए मिल-जुलकर रहना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए मैंने बस उसकी हालिया सेहत के बारे में पूछा और उसे दिखाने के लिए परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश ढूंढे जो काम के सहयोगियों के बीच आपसी पर्यवेक्षण और एक-दूसरे को याद दिलाने के बारे में थे। इस तरह, उसे पता चल जाएगा कि मैं बस परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करने की कोशिश कर रही हूँ, जानबूझकर उसमें मीनमेख नहीं निकाल रही, इससे वह मेरे खिलाफ कोई पूर्वाग्रह नहीं पालेगा। मुझे आश्चर्य हुआ कि लिन हाई ने बस दो शब्दों में जवाब दिया, “ठीक है।” उसने अपनी समस्याओं को पहचानने के बारे में कुछ नहीं कहा। उसके बाद भी, उसने कलीसियाओं में सिंचनकर्ताओं का कर्तव्य बदलने पर कोई फॉलो-अप नहीं किया, न ही उसने हमारे काम का जायजा लिया, न पर्यवेक्षण किया। मैंने इस बात को फिर से उठाने के बारे में सोचा, लेकिन फिर मुझे याद आया कि उसका पिछला जवाब कितना उपेक्षापूर्ण था। वह शायद नाराज था। अगर मैंने फिर कुछ कहा तो वह यकीनन और भी ज्यादा नाराज हो जाएगा। कोई और कुछ नहीं कह रहा था, इसलिए अगर केवल मैं ही उसके मुद्दों की ओर इशारा करूँगी तो ऐसा लगेगा कि मैं हमेशा उसमें मीनमेख निकालती रहती हूँ। मैं उसे नाराज नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैंने बात वहीं खत्म कर दी।

बाद में, सीसीपी द्वारा ईसाइयों की गिरफ्तारियों के कारण, जिन कलीसियाओं के लिए मैं जिम्मेदार थी, उनके कुछ सिंचनकर्ताओं को सुरक्षा जोखिमों की वजह से छिपना पड़ा और जो अनुपयुक्त थे, उन्हें कर्तव्य बदलने की जरूरत थी। लेकिन हमें कार्यभार संभालने के लिए उपयुक्त लोग नहीं मिल सके, जिससे काम प्रभावित हुआ। आत्म-चिंतन करके और सार निकालकर, मैंने देखा कि ऐसा इसलिए था क्योंकि हम लोगों को विकसित करने पर सामान्यतया ध्यान केंद्रित नहीं करते रहे थे। इसलिए, मैंने इस समस्या के बारे में कलीसियाओं को एक संचार पत्र लिखा, अगुआओं और कार्यकर्ताओं से लोगों को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा ताकि वे समय रहते इस विचलन को सुधार सकें। फिर मैंने इसे लिन हाई और अपनी सहयोगी बहन वांग डैन को भेज दिया कि वे जो भी समस्या या कमी हो, उसकी समीक्षा करें, ताकि वे कलीसियाओं को भेजने से पहले इसमें कोई जोड़ और सुधार कर सकें। मैंने उन्हें तुरंत जवाब देने की याद भी दिलाई ताकि काम में देरी न हो। लेकिन कुछ दिन बीत गए और लिन हाई ने अभी भी जवाब नहीं दिया था। मैंने मन ही मन सोचा, “उसके साथ क्या चल रहा है? वह लोगों को विकसित करने के काम का जायजा नहीं लेता और अब पत्र लिखा गया है फिर भी वह अपनी राय तक नहीं दे रहा। हमें यह पत्र भेजना चाहिए या नहीं? अगर हम नहीं भेजते तो काम में देरी होगी। लेकिन अगर हम भेजते हैं और इसमें कुछ अनुचित हुआ और उससे गड़बड़ी हुई तो क्या होगा?” मैं लिखकर उससे पूछना चाहती थी कि वह क्या सोच रहा है और उसने अभी तक जवाब क्यों नहीं दिया लेकिन मुझे याद आया कि पिछली बार उसने मेरे सुझावों को ज्यादा स्वीकारा नहीं था। मुझे चिंता थी कि उसकी समस्याओं की ओर फिर से इशारा करने से वह और नाराज हो जाएगा और भविष्य में हमारा रिश्ता मुश्किल हो जाएगा, इसलिए मैंने नहीं पूछा। बाद में, वांग डैन ने जवाब दिया कि पत्र ठीक है इसलिए काम में देरी से बचने के लिए हमने इसे भेज दिया।

कुछ ही समय बाद, सीसीपी की गिरफ्तारियाँ तेज हो गईं। उन्होंने विश्वासियों को ढूँढ़ने और गिरफ्तार करने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल किया और यहाँ तक कि लोगों को गुमराह करने के लिए वही पुरानी गढ़ी गई अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं। हमने भेद पहचानने के पहलू में सत्य और दर्शनों से संबंधित सत्य पर नवागंतुकों के साथ संगति की और उनमें से अधिकांश ने कुछ निराधार अफवाहों का भेद पहचानने की क्षमता हासिल कर ली। मैं मन ही मन सोचती थी, “पता नहीं दूसरी कलीसियाओं के सिंचनकर्ताओं ने इन निराधार अफवाहों के बारे में भेद पहचानने के पहलू में सत्य पर नवागंतुकों के साथ संगति की है या नहीं। क्या नवागंतुक इनका भेद पहचान सकते हैं?” इसलिए मैंने लिन हाई को पत्र लिखा, सुझाव दिया कि वह अपने दायरे के सिंचनकर्ताओं से नवागंतुकों की निराधार अफवाहों का भेद पहचानने की क्षमता की जाँच करवाए। अगर उनमें से कोई नहीं समझा तो उन्हें दर्शनों से संबंधित सत्य पर तुरंत संगति करने की जरूरत थी ताकि उन्हें निराधार अफवाहों से गुमराह होने और अपने जीवन में नुकसान उठाने से रोका जा सके। पत्र भेजने के बाद दस दिन बीत गए, लिन हाई का अभी भी कोई जवाब नहीं आया था। मुझे थोड़ा गुस्सा आ रहा था। मैंने सोचा, “यह काम इतना महत्वपूर्ण है। वह इसे गंभीरता से कैसे नहीं ले सकता?” मैं वास्तव में यह बताना चाहती थी कि वह अपने कर्तव्य में बोझ नहीं उठा रहा है, लेकिन फिर, मुझे उसे नाराज करने का डर था, इसलिए मैंने सीधे तौर पर यह नहीं कहा। इसके बजाय, मैंने नरमी से पूछा कि क्या उसे मेरा पत्र मिला है और इस काम का जायजा लेने के महत्व पर संगति की। मुझे आश्चर्य हुआ कि लिन हाई ने जवाब दिया, “हमने सिंचनकर्ताओं से इस बारे में पहले संगति करवाई थी। नवागंतुकों ने शायद यह सब समझ लिया है। फिर से फॉलो-अप करने की कोई जरूरत नहीं है।” जब मैंने देखा कि वह नवागंतुकों की स्थिति समझने की कोशिश किए बिना केवल अपनी कल्पनाओं के आधार पर फैसले ले रहा है तो मुझे लगा कि वह वास्तव में गैर-जिम्मेदार हो रहा है। मैं इस समस्या के बारे में उसके साथ संगति करना चाहती थी, लेकिन फिर मुझे चिंता हुई कि अगर मैं उसकी समस्याएँ दिखाती रही तो वह मेरे बारे में बुरी राय बना लेगा। अगर हमारा रिश्ता खराब हो गया तो? लेकिन उसकी समस्याएँ देखकर भी कुछ न कहने के लिए मेरी अंतरात्मा ने मुझे धिक्कारा। थोड़ी देर बाद, मैंने सोचा, “तुम पर्यवेक्षक हो, इसलिए अगर कुछ गलत होता है तो यह तुम्हारी जिम्मेदारी है। मैंने तुम्हें याद दिलाया था और तुम ही थे जिसने नहीं सुना।” लेकिन फिर मुझे लगा कि इस तरह सोचना मेरी ओर से गैर-जिम्मेदाराना था...। मैं बहुत उत्तेजित और बेचैन थी और मैं अपना कर्तव्य करने के लिए अपने दिल को शांत नहीं कर पा रही थी।

अपनी पीड़ा में, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उसका मार्गदर्शन माँगा। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “तुम चाहे कोई भी कर्तव्य निभाते हो, चाहे वह महत्वपूर्ण कर्तव्य हो या सामान्य, चूँकि तुम्हें यह काम सौंपा गया है, यदि तुम इसमें अपना पूरा दिल नहीं लगाते हो या अपनी जिम्मेदारी नहीं उठाते, और यदि तुम इसे परमेश्वर के आदेश के रूप में नहीं देखते या इसे अपने कर्तव्य और दायित्व के रूप में नहीं लेते हो, हमेशा चीजों को अनमने ढंग से करते हो, तो यह एक समस्या होने वाली है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल परमेश्वर के वचन बार-बार पढ़ने और सत्य पर चिंतन-मनन करने से ही अनुसरण का मार्ग मिल सकता है)। जब मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया तो मुझे एहसास हुआ कि मुझे अपने कर्तव्य में जिम्मेदारी की समझ होनी चाहिए। चाहे मैं पर्यवेक्षक हूँ या नहीं, जब तक मैं कलीसिया के काम में कोई समस्या देखती हूँ, मुझे कलीसिया के काम की सुरक्षा के लिए अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी होगी। अगर मैं कोई समस्या देखती हूँ और उसे नजरअंदाज करती हूँ और अनमनी और गैर-जिम्मेदार हूँ तो यह कर्तव्य के प्रति लापरवाही है। अब जब बड़ा लाल अजगर ईसाइयों को पागलों की तरह गिरफ्तार कर रहा और निराधार अफवाहें फैला रहा है, नवागंतुकों के गुमराह होने और छोड़ने की बहुत संभावना थी। लिन हाई को उनके साथ भेद पहचानने के पहलू में सत्य पर और संगति करने की याद दिलाना मेरी जिम्मेदारी थी। जब मैंने देखा कि वह इसे बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं ले रहा है तो मुझे समय रहते इशारा करना और उसकी मदद करनी चाहिए थी। लेकिन मुझे डर था कि वह मेरे बारे में बुरी राय बना लेगा और उसे नाराज करने और हमारे रिश्ते में खटाई आने का डर था, इसलिए मैंने बस एक खुशामदी की तरह व्यवहार किया। मैंने उसकी समस्याएँ देखीं लेकिन सीधे उनकी ओर इशारा करने की हिम्मत नहीं की। मुझमें जिम्मेदारी की कोई समझ नहीं थी और मैं कलीसिया के हितों की रक्षा नहीं कर रही थी। मैं वास्तव में इतना महत्वपूर्ण कर्तव्य करने के लायक नहीं थी! मुझे अपने दिल में गहरी आत्म-भर्त्सना महसूस हुई, इसलिए मैंने लिन हाई को एक पत्र लिखा ताकि उसके साथ अपने दृष्टिकोण पर चर्चा कर सकूँ। फिर मैंने सोचा कि चूँकि हमारे विचार अलग थे, इसलिए मुझे उन अन्य भाई-बहनों के साथ भी चर्चा करनी चाहिए जिनके साथ हम सहयोग कर रहे थे। लेकिन मैं फिर हिचकिचाई, चिंता हुई, “अगर लिन हाई को पता चल गया तो क्या वह कहेगा कि मैं उसे शर्मिंदा करने की कोशिश कर रही हूँ? क्या वह मेरे बारे में बुरी राय बना लेगा?” मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “‘मैं बिल्कुल भी नहीं डरूँगा, मैं बिल्कुल भी सहमकर पीछे नहीं हटूँगा और मैं बिल्कुल भी हतोत्साहित नहीं होऊँगा!’ क्या तुम लोगों में यह दृढ़ निश्चय है?(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (13))। जब कलीसिया के हितों और हमारे भाई-बहनों के जीवन प्रवेश से जुड़े मामलों की बात आती है तो मैं सिर्फ इसलिए समझौता नहीं कर सकती या पीछे नहीं हट सकती क्योंकि मुझे डर है कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे। चाहे लिन हाई इसे स्वीकार करे या न करे, मुझे अपना पक्ष रखना था और कलीसिया के हितों की रक्षा करनी थी। इसलिए, मैंने पत्र भेज दिया। बाद में, मेरे अन्य सहयोगियों और लिन हाई सभी ने मेरे दृष्टिकोण से सहमत होते हुए जवाब दिया। मैंने अपने दिल में राहत की साँस ली।

लेकिन उसके बाद भी, मैंने लिन हाई के साथ उसके कर्तव्य के प्रति उसके अनमने रवैये के बारे में संगति नहीं की। मैंने आत्म-चिंतन करना शुरू किया : मैंने लिन हाई की समस्याएँ स्पष्ट रूप से देखी थीं, फिर भी मैंने सीधे उस ओर इशारा करने की हिम्मत नहीं की। इसके पीछे कौन से भ्रष्ट स्वभाव छिपे थे? मैंने अपनी समस्याओं को समझने में मेरा मार्गदर्शन करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की। फिर, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जो सीधे मेरी दशा के बारे में बात करता था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अधिकांश लोग सत्य का अनुसरण करने को तैयार हैं और सत्य का अभ्यास करना चाहते हैं, बहुत बार उनमें केवल दृढ़ संकल्प और ऐसा करने की इच्छा होती है; लेकिन भीतर से, सत्य उनका जीवन नहीं बना होता है। इसलिए जब तुम बुरी शक्तियों को कलीसिया के काम में बाधा डालते और तोड़फोड़ करते हुए देखते हो—उदाहरण के लिए, जब तुम नकली अगुआओं को सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए मामलों से निपटते और असली काम नहीं करते हुए देखते हो या बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों को बुराई करते और कलीसिया के काम में बाधा डालते और इस तरह परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान पहुँचाते हुए देखते हो—तो तुममें खड़े होने और बोलने का साहस नहीं होता। तुममें यह साहस क्यों नहीं होता? क्या यह इसलिए है क्योंकि तुम डरपोक हो या स्पष्ट रूप से नहीं बोल पाते हो या क्या तुम इसलिए बोलने की हिम्मत नहीं करते क्योंकि तुम चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते? यह इनमें से किसी भी चीज के कारण नहीं है; यह मुख्य रूप से तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों द्वारा बाधित होने का परिणाम है। तुम्हारे द्वारा प्रकट किए जाने वाले भ्रष्ट स्वभावों में से एक कपटी स्वभाव है : जब कुछ घटित होता है, तो सबसे पहले तुम अपने हितों, अपने कार्यों के परिणामों और क्या वे तुम्हारे लिए फायदेमंद होंगे, इस पर विचार करते हो। यह एक कपटी स्वभाव है, है ना? दूसरा स्वार्थी और नीच स्वभाव है। तुम सोचते हो, ‘उनके द्वारा परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाने से मेरा क्या लेना-देना? मैं अगुआ नहीं हूँ, तो मुझे इसमें क्यों शामिल होना चाहिए? इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है और यह मेरी जिम्मेदारी नहीं है।’ ऐसे विचार और शब्द कुछ ऐसे नहीं हैं जिन्हें तुम जानबूझकर सोचते हो, बल्कि वे तुम्हारे द्वारा अनजाने में उत्पन्न होते हैं—ये वे भ्रष्ट स्वभाव हैं जिन्हें लोग किसी समस्या का सामना करने पर प्रकट करते हैं। ये भ्रष्ट स्वभाव तुम्हारे विचारों पर शासन करते हैं, वे तुम्हारे हाथ-पैर बाँधते हैं और तुम जो भी कहते हो उसे नियंत्रित करते हैं। अपने दिल में, तुम खड़े होकर बोलना चाहते हो, लेकिन तुम्हारे मन में आशंकाएँ रहती हैं और भले ही तुम बोलते हो, तुम घुमा-फिराकर बात करते हो और अपने लिए बचने की गुंजाइश छोड़ते हो या तुम पूरा सच बताने में संकोच करते हो और बस सच नहीं बोलते। भेद पहचानने की क्षमता रखने वाले लोग यह देख सकते हैं और वास्तव में, तुम भी अपने दिल में जानते हो कि तुमने वह सब नहीं कहा जो तुम्हें कहना चाहिए था, तुमने नतीजे हासिल नहीं किए, तुम केवल रस्म अदायगी कर रहे थे और समस्या हल नहीं हुई है। तुमने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की है, फिर भी तुम ढिठाई से कहते हो कि तुमने पूरी कर ली है या यह दावा करते हो कि तुमने उस समय चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं देखा था। क्या ये दावे तथ्यों के अनुरूप हैं? क्या तुम वास्तव में यही सोचते हो? क्या तुम पूरी तरह से अपने शैतानी स्वभावों के नियंत्रण में नहीं हो?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर उजागर करता है कि लोग अपने स्वार्थी और धोखेबाज भ्रष्ट स्वभावों के सहारे जीते हैं। जब वे किसी को सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए देखते हैं तो वे उस ओर इशारा करने की हिम्मत नहीं करते, केवल अपने हितों के बारे में सोचते हैं और कलीसिया के काम की जरा भी सुरक्षा नहीं करते। कुछ लोग, दूसरे व्यक्ति की समस्या की ओर इशारा करते हुए भी नाराज करने से बचने के लिए बात को घुमा-फिरा कर कहते हैं और उसे कम करके बताते हैं। वे मामले की जड़ तक नहीं जाते, इसलिए भले ही वे कुछ कह देते हैं, लेकिन इसका कोई असर नहीं होता। परमेश्वर के वचनों ने जो उजागर किया वह बिल्कुल मेरी दशा थी। उस दौरान, मैंने साफ तौर पर देखा था कि लिन हाई काम का फॉलो-अप या पर्यवेक्षण नहीं कर रहा था और वह गैर-जिम्मेदार था और अपने कर्तव्य में कोई बोझ नहीं उठाता था। इससे सिंचन कार्य और नवागंतुकों के जीवन प्रवेश में पहले ही देरी हो चुकी थी। मुझे इस ओर इशारा करना चाहिए था ताकि उसे चीजों को जल्द से जल्द बदलने में मदद मिल सके, लेकिन मुझे उसके अभिमान को ठेस पहुँचाने और हमारा रिश्ता खराब करने का डर था, जिससे बाद में हमारे बीच मुश्किलें पैदा हो जातीं। इसलिए, मैंने केवल उन कार्यों की सूची दी जिनका उसे जायजा लेना था, लेकिन मैंने कभी भी उसके कर्तव्य में अनमना होने की प्रकृति और नतीजों पर संगति या गहन-विश्लेषण नहीं किया था। बाद में, मुझे पता चला कि लिन हाई लोगों को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहा था, न ही वह वास्तव में जाँच रहा था कि क्या नवागंतुक बड़े लाल अजगर द्वारा फैलाई गई निराधार अफवाहों का भेद पहचान सकते हैं। वह सिर्फ अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर काम कर रहा था और कोई वास्तविक काम बिल्कुल नहीं कर रहा था। मैं उसे गैर-जिम्मेदार होने और अपने कर्तव्य में बोझ न उठाने के लिए बेनकाब करना चाहती थी, लेकिन फिर, मुझे चिंता थी कि बार-बार उसके मुद्दों की ओर इशारा करने से उसके अभिमान को ठेस पहुँचेगी और उसे शर्मिंदगी होगी। अगर उसने मेरे खिलाफ पूर्वाग्रह पाल लिया तो हमारे बीच चीजें कितनी अजीब हो जाएँगी! उसे नाराज करने से बचने के लिए, मैंने एक बार फिर चुप्पी साध ली, यहाँ तक कि इस विचार से खुद को तसल्ली दी, “जो कहना जरूरी था, मैं पहले ही कह चुकी हूँ। मेरे सुझाव न मानना उसकी गलती है। अगर कोई समस्या होती है तो यह उसकी जिम्मेदारी है, मेरी नहीं।” लेकिन वास्तव में, मैंने उसके साथ काम में भले ही कुछ समस्याएँ उठाई थीं, पर मैंने कभी उसके इस तरह से कर्तव्य करने की प्रकृति और नतीजों की ओर इशारा नहीं किया था। नतीजतन, लिन हाई को अपनी समस्याओं की कोई समझ नहीं थी, उसने बदलाव नहीं किए और सिंचन कार्य के मुद्दे अनसुलझे रहे। मैं बस खानापूर्ति कर रही थी, कोई वास्तविक नतीजा हासिल नहीं कर पा रही थी। जब मैंने देखा कि सिंचन कार्य बेअसर था तो समस्याओं को हल करने और कलीसिया के काम की सुरक्षा करने के बारे में सोचने के बजाय, मैंने लिन हाई के साथ अपने रिश्ते को बनाए रखने के लिए बार-बार समझौता किया और हार मान ली। मैं समस्याओं को स्पष्ट रूप से नहीं बताती, भले ही इसका मतलब कलीसिया के काम में बार-बार देरी करना हो। मैं कलीसिया के हितों की कीमत पर उसके साथ अपने रिश्ते को बनाए हुए थी। मूल रूप से, मैं शैतान का साथ दे रही थी और कलीसिया के काम में गड़बड़ी कर रही थी। मैं कितनी स्वार्थी, नीच, धूर्त और धोखेबाज थी!

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और मुझे अपनी समस्याओं की कुछ और समझ मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सांसारिक आचरण के फलसफों का एक सिद्धांत कहता है, ‘अच्छे दोस्तों की गलतियों पर खामोश रहने से दोस्ती अच्छी और लंबी होती है।’ इसका मतलब है कि इस अच्छी दोस्ती को कायम रखने के लिए अपने मित्र की समस्याओं के बारे में चुप रहना चाहिए, भले ही वे उन्हें स्पष्ट रूप से दिखाई दें। वे लोगों के चेहरे पर वार न करने या उनकी कमियों की आलोचना न करने के सिद्धांतों का पालन करते हैं। वे एक दूसरे को धोखा देते हैं, एक दूसरे से चीजें छिपाते हैं और एक दूसरे के खिलाफ साजिश रखते हैं। यूँ तो वे स्पष्ट रूप से जानते हैं कि दूसरा व्यक्ति किस तरह का है, पर वे इसे सीधे तौर पर नहीं कहते, बल्कि अपना संबंध बनाए रखने के लिए शातिर तरीके अपनाते हैं। ऐसे संबंध को कोई व्यक्ति क्यों बनाए रखना चाहेगा? यह इस समाज में, अपने समूह के भीतर दुश्मन न बनाना चाहने के लिए होता है, जिसका अर्थ होगा खुद को अक्सर खतरनाक स्थितियों में डालना। यह जानकर कि किसी की कमियाँ बताने या उसे चोट पहुँचाने के बाद वह तुम्हारा दुश्मन बन जाएगा और तुम्हें नुकसान पहुँचाएगा और खुद को ऐसी स्थिति में न डालने की इच्छा से तुम सांसारिक आचरण के ऐसे फलसफों का इस्तेमाल करते हो, ‘अगर तुम दूसरों पर वार करते हो तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो।’ इसके आलोक में, अगर दो लोगों का संबंध ऐसा है तो क्या वे सच्चे दोस्त माने जा सकते हैं? (नहीं।) वे सच्चे दोस्त नहीं होते, एक-दूसरे के विश्वासपात्र तो बिल्कुल नहीं होते। तो, यह वास्तव में किस तरह का संबंध है? क्या यह एक मूलभूत सामाजिक संबंध नहीं है? (हाँ।) ऐसे सामाजिक संबंध में लोग खुले दिल से की गई चर्चाओं में शामिल नहीं हो सकते हैं, न ही गहरे संपर्क रख सकते हैं, न ही वे जो भी इच्छा हो उस बारे में बात कर सकते हैं। वे अपने दिल की बात या जो समस्याएँ वे दूसरे लोगों में देखते हैं या ऐसे शब्द जो दूसरे लोगों के लिए लाभदायक हों, नहीं बोल सकते। इसके बजाय, वे कहने के लिए अच्छी बातें चुनते हैं, दूसरों की चापलूसी करना चुनते हैं। वे सच बोलने या सिद्धांतों को कायम रखने की हिम्मत नहीं करते, इस प्रकार वे अपने प्रति शत्रुतापूर्ण सोच विकसित करने से दूसरों को रोकते हैं। जब कोई भी किसी व्यक्ति के लिए खतरा नहीं बनता है, तो क्या वह व्यक्ति अपेक्षाकृत आराम और शांति से नहीं रहता? क्या ‘अगर तुम दूसरों पर वार करते हो तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो’ को प्रचारित करने में लोगों का यही लक्ष्य नहीं है? (है।) स्पष्ट रूप से यह जीवित रहने का एक कुटिल और धूर्त तरीका है जिसमें रक्षात्मकता का तत्त्व है, जिसका लक्ष्य आत्म-संरक्षण है। इस तरह जीते हुए लोगों का कोई विश्वासपात्र नहीं होता, कोई करीबी दोस्त नहीं होता, जिससे वे जो चाहें कह सकें। लोगों के बीच बस एक-दूसरे के प्रति रक्षात्मकता होती है, आपसी शोषण होता है और आपसी साजिशबाजी होती है और साथ ही हर व्यक्ति उस रिश्ते से जो चाहता है, वह लेता है। क्या ऐसा नहीं है? मूल रूप से ‘अगर तुम दूसरों पर वार करते हो तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो’ का लक्ष्य दूसरों को ठेस पहुँचाने और दुश्मन बनाने से बचना है, किसी को चोट न पहुँचाकर अपनी रक्षा करना है। यह व्यक्ति द्वारा खुद को चोट पहुँचने से बचाने के लिए अपनाई जाने वाली युक्ति और तरीका है। इसके सार के इन विभिन्न पहलुओं को देखते हुए, क्या लोगों के नैतिक आचरण से यह अपेक्षा करना उचित है, ‘अगर तुम दूसरों पर वार करते हो तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो?’ क्या यह सकारात्मक अपेक्षा है? (नहीं।) तो फिर यह लोगों को क्या सिखा रहा है? कि तुम्हें किसी को नाराज नहीं करना चाहिए या किसी को चोट नहीं पहुँचानी चाहिए, वरना तुम खुद चोट खाओगे; और यह भी कि तुम्हें किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए। अगर तुम अपने किसी अच्छे दोस्त को चोट पहुँचाते हो तो दोस्ती चुपके-से बदलने लगेगी : वे तुम्हारे अच्छे, जानकार दोस्त न रहकर अजनबी या तुम्हारे दुश्मन बन जाएँगे। इस तरह की शिक्षा से वास्तव में कौन-सी समस्याएँ हल हो सकती हैं? भले ही इस तरह कार्य करने से तुम शत्रु नहीं बनाते और कुछ शत्रु कम भी हो जाते हैं, तो क्या इससे लोग तुम्हारी प्रशंसा और अनुमोदन करेंगे और हमेशा तुम्हारे मित्र बने रहेंगे? क्या यह नैतिक आचरण के मानक को पूरी तरह से पूरा करता है? अपने सर्वोत्तम रूप में, यह सांसारिक आचरण के एक फलसफे से अधिक कुछ नहीं है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (8))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे समझ आया कि सांसारिक आचरण के इन शैतानी फलसफों को जैसे “अच्छे दोस्तों की गलतियों पर खामोश रहने से दोस्ती अच्छी और लंबी होती है,” “अगर तुम दूसरों पर वार करते हो, तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों की आलोचना करते हो, तो उनकी कमियों की आलोचना मत करो” इन्हें मैंने अपने आचरण के सिद्धांत बना लिए थे। मेरा मानना था कि दूसरों के साथ मिल-जुलकर रहने के लिए, मुझे खुद को बचाना सीखना होगा। मुझे लगता था कि किसी की समस्याओं की ओर इशारा करने से वे आसानी से नाराज हो सकते हैं, जिससे मेरे लिए दुश्मन पैदा हो सकते हैं, इसलिए भले ही मैं कोई समस्या देखती, मैं उसे साफ तौर पर नहीं कहती। इस तरह, मैं हमारे रिश्ते को नुकसान नहीं पहुँचाती या खुद के लिए मुसीबत खड़ी नहीं करती। पता चला कि मैं जिंदा रहने के उन धूर्त और धोखेबाज तरीकों और सांसारिक आचरण के फलसफों का पालन कर रही थी जो शैतान लोगों में भरता है। सांसारिक आचरण के इन फलसफों के सहारे जीते हुए, लोग एक-दूसरे के सामने खुलकर बात नहीं कर सकते; वे हमेशा सतर्क रहते हैं, और ज्यादा नकली, धूर्त और धोखेबाज बनते जाते हैं। मैं अच्छी तरह जानती थी कि लिन हाई ने अनमना होकर और असली काम न करके कलीसिया के काम में पहले ही देरी कर दी थी और मुझे उसे खुद को जानने में मदद करने के लिए स्पष्ट रूप से उसकी समस्याओं को बताना चाहिए था। लेकिन मुझे उसके अभिमान को ठेस पहुँचाने, उसे शर्मिंदा करने, उसे नाराज करने और हमारा रिश्ता खराब करने का डर था, इसलिए मैंने समझौता करना और पीछे हट जाना चुना। ऊपर से तो ऐसा लग रहा था कि मैं उसका सम्मान बचाने में उसकी मदद कर रही हूँ और शांति बनाए हुए हूँ, लेकिन मैं सच्चे दिल और ईमानदारी से उसकी मदद नहीं कर रही थी। इससे न केवल उसके जीवन प्रवेश को कोई लाभ नहीं हुआ, बल्कि इससे भी बुरी बात यह है कि इससे सिंचन कार्य में देरी हुई। परमेश्वर चाहता है कि हम अपने भाई-बहनों के साथ अपने व्यवहार में खुले और ईमानदार रहें। जब हमें किसी के साथ कोई समस्या दिखाई देती है तो हमें उस ओर इशारा करना चाहिए और प्रेमपूर्ण हृदय से उनकी मदद करने के लिए संगति करनी चाहिए। भले ही वे उस समय इसे स्वीकार न कर सकें, जब तक वे ऐसे व्यक्ति हैं जो सत्य स्वीकार करते हैं, वे बाद में खोज करेंगे और आत्म-चिंतन करेंगे। अगर इशारा किए जाने के बाद भी वे इनकार करना जारी रखते हैं तो हमें कलीसिया के काम को नुकसान से बचाने के लिए जल्द से जल्द अगुआओं को इसकी रिपोर्ट करनी चाहिए। यही वह काम है जो अंतरात्मा और विवेक वाले व्यक्ति को करना चाहिए और यही वह न्याय की भावना है जो एक व्यक्ति में होनी चाहिए। परमेश्वर ईमानदार और नेकदिल लोगों को पसंद करता है और धोखेबाज लोगों से घृणा करता है। अगर मैं एक खुशामदी बनी रहती, बीच का रास्ता अपनाती तो परमेश्वर मुझसे घृणा करता और मुझे निकाल देता। यह समझकर मुझे ऐसे डर का एहसास हुआ जो लगातार बना रहा। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना भी की, मैं पश्चात्ताप करने और अपने भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार न जीने के लिए तैयार थी।

बाद में, मुझे परमेश्वर के वचनों से अभ्यास का एक मार्ग मिला और मेरे दिल में स्पष्टता आ गई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कई बार सामंजस्य का अर्थ धैर्य और सहनशीलता होता है, किंतु इसका अर्थ अपने विचारों पर दृढ़ और सिद्धांतों पर अडिग रहना भी होता है। सामंजस्य का मतलब चीजों को आसान बनाना या चापलूस बनने की कोशिश करना या समझौतावादी तरीका अपनाना नहीं है—और इसका मतलब निश्चित रूप से किसी को खुश करना नहीं है। ये सिद्धांत हैं। एक बार जब तुम इन सिद्धांतों को समझ लेते हो, तो बिना एहसास किए तुम्हारी कथनी और करनी परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो जाएँगी; तुम्हारे पास लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना है, इसके लिए सिद्धांत होंगे और तुम दूसरों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने में सक्षम हो जाओगे। इस तरह, तुम भाई-बहनों के साथ सौहार्दपूर्ण ढंग से रह पाओगे और एकता प्राप्त करना आसान हो जाएगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सामंजस्‍यपूर्ण सहयोग के बारे में)। “अगर तुम्हारे पास एक चापलूस का इरादा और दृष्टिकोण है तो तुम सभी मामलों में सत्य का अभ्यास नहीं करोगे या सिद्धांतों को कायम नहीं रखोगे और इसलिए तुम हमेशा असफल होओगे और गिरोगे। यदि तुम अज्ञानता की नींद से नहीं जागते हो और कभी सत्य नहीं खोजते हो, तो तुम छद्म-विश्वासी हो और तुम कभी सत्य और जीवन हासिल नहीं करोगे। तब तुम्हें क्या करना चाहिए? परमेश्वर के घर के हितों से जुड़े मामलों का सामना होने पर तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी ही चाहिए और उसे पुकारना चाहिए, उससे तुम्हें आस्था और शक्ति देने के लिए कहना चाहिए ताकि तुम सिद्धांतों को कायम रख सको, वह कर सको जो तुम्हें करना चाहिए, चीजों को सिद्धांतों के अनुसार सँभाल सको, उस रुख पर मजबूती से कायम रह सको जो तुम्हें अपनाना चाहिए, परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा कर सको और परमेश्वर के घर के कार्य को होने वाले किसी भी नुकसान को रोक सको। अगर तुम अपने स्वार्थों, अपनी प्रतिष्ठा और एक चापलूस होने के अपने दृष्टिकोण के खिलाफ विद्रोह करने में सक्षम हो और अगर तुम एक ईमानदार, अविभाजित हृदय के साथ वह करते हो जो तुम्हें करना चाहिए तो तुम शैतान को हरा चुके होगे और सत्य के इस पहलू को प्राप्त कर चुके होगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। मैं समझ गई कि सामंजस्यपूर्ण सहयोग का मतलब खुशामदी होना या बीच का रास्ता अपनाना नहीं है, न ही इसका मतलब सतही तौर पर मेल-मिलाप बनाए रखना और किसी को नाराज न करना है। इसके बजाय, इसका मतलब कलीसिया के काम और हमारे भाई-बहनों के जीवन प्रवेश से जुड़े मामलों में सिद्धांतों को बनाए रखने और कलीसिया के हितों की सुरक्षा करने में सक्षम होना है। यह देखते हुए कि लिन हाई के असली काम न करने से कलीसिया के काम में पहले ही देरी हो रही थी, मुझे प्रेमवश उसके साथ संगति करके उसकी मदद करनी थी। अगर जरूरत हो तो उसकी काट-छाँट भी की जा सकती थी, और अगर वह फिर भी इसे स्वीकार नहीं करता तो मुझे समय पर कर्तव्य समायोजन या बर्खास्तगी के लिए अगुआओं को उसकी रिपोर्ट करनी थी। यह सत्य का अभ्यास करना है; यही सच्चा प्रेम है। लेकिन मेरी यह विकृत धारणा थी कि पर्यवेक्षक की समस्याओं की ओर इशारा करने का मतलब उसकी कमियाँ गिनाना और उसे शर्मिंदा करना है। मेरी समझ कितनी बेतुकी थी! परमेश्वर के वचनों से, मैंने यह भी समझा कि जब मुझ पर चीजें आ पड़ती हैं और मैं अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने को तैयार होती हूँ लेकिन इससे उबर नहीं पाती तो मुझे परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उससे मुझे शक्ति देने की विनती करनी चाहिए। मुझे लिन हाई के असली काम न करने की बात उठानी थी और उसे उजागर करना था। मैं अब और खुशामदी नहीं बन सकती थी या बीच का रास्ता नहीं अपना सकती थी। भले ही उसकी समस्याएँ बताने से वह नाराज हो जाए, मुझे सत्य का अभ्यास करना ही था। इसलिए, मैंने लिन हाई को लिखा और उसे एक सभा के लिए मिलने का निमंत्रण दिया। उससे मिलने जाने से पहले, मैंने परमेश्वर से मेरा मार्गदर्शन करने की प्रार्थना की ताकि मैं सत्य का अभ्यास कर सकूँ।

सभा के दौरान, मैंने लिन हाई की समस्याओं की ओर इशारा किया। पहले तो उसने इसे स्वीकार नहीं किया और बहस करने और खुद का बचाव करने की कोशिश की और एक अन्य भाई भी उसका समर्थन करने के लिए बीच में कूद पड़ा। मुझे एहसास हुआ कि यह भाई लिन हाई को बचा रहा है, तो मैंने उसकी बात काट दी और मामलों को शांत करने की कोशिश के लिए उसे साफ-साफ उजागर कर दिया। माहौल थोड़ा अजीब हो गया और लिन हाई के चेहरे का भाव बिगड़ गया। मुझे डर था कि अगर मैंने और कहा तो हमारा रिश्ता अजीब हो जाएगा, इसलिए मैं समझौता करना और मामले को वहीं छोड़ देना चाहती थी। लेकिन फिर मैंने सोचा कि कैसे लिन हाई ने अनमना होकर और असली काम न करके काम को पहले ही नुकसान पहुँचाया है। अपनी समस्याओं की ओर इशारा किए जाने पर भी वह इसे स्वीकार नहीं कर रहा था। अगर ऐसा ही चलता रहा तो इससे कलीसिया के काम को और भी ज्यादा नुकसान होगा। मुझे एक भजन की कुछ पंक्तियाँ याद आ गईं : “कलीसिया में मेरी गवाही में अडिग रहो और सत्य पर टिके रहो। सही सही है और गलत गलत है; काले और सफेद के बीच भ्रमित मत होओ। तुम्हें अवश्य ही शैतान के साथ लड़ना चाहिए और तुम्हें उसे पूरी तरह से हराना चाहिए ताकि वह फिर कभी न उठ पाए(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 41)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे आस्था और शक्ति दी। मैं अब और खुशामदी नहीं बन सकती थी; मुझे सिद्धांतों को बनाए रखना था। इसलिए, परमेश्वर के वचनों से प्रेरणा लेते हुए, मैंने लिन हाई की समस्याएँ बताईं और काम का पर्यवेक्षण या फॉलो-अप न करने और लोगों को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित न करने के नतीजों पर संगति की। यह सुनने के बाद, लिन हाई का रवैया थोड़ा बदल गया और उसने इसे स्वीकार करने की इच्छा जताई। केवल इस तरह अभ्यास करके ही मुझे अपने दिल में सुकून महसूस हुआ।

बाद में, मैंने देखा कि लिन हाई अभी भी ज्यादा नहीं बदला है, इसलिए मैंने उसकी समस्याओं को एक-एक करके सूचीबद्ध किया और उनकी रिपोर्ट अगुआओं को कर दी। लिन हाई का मूल्यांकन इकट्ठा करने के बाद, अगुआओं ने देखा कि उसकी काबिलियत खराब है, उसमें कार्य क्षमता की कमी है और वह अपने कर्तव्य में कोई बोझ नहीं उठाता है। वह एक झूठा कार्यकर्ता था जो कोई असली काम नहीं करता था और उसे बर्खास्त किया जाना चाहिए था। अगुआओं ने फिर मुझे पर्यवेक्षक के रूप में पदोन्नत कर दिया और मुझसे लिन हाई के साथ संगति करने और उसे बर्खास्त करने के लिए कहा। मुझे थोड़ी झिझक महसूस हुई। “अगर मैंने उसके मुँह पर ही उसकी समस्याएँ उजागर कर दीं तो क्या वह मेरे खिलाफ बैर और पूर्वाग्रह रखेगा?” मुझे एहसास हुआ कि मेरी खुशामदी वाली मानसिकता फिर से उभर रही है और मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “... तुम्हारे इसे करने से भले ही लोग नाराज हों या पीठ पीछे तुम्हारी आलोचना हो, यह मायने नहीं रखता है।” मैंने जल्दी से वह अंश पढ़ने के लिए खोजा। परमेश्वर कहता है : “अगर यह ऐसा क्रियाकलाप है जो सिद्धांतों से मेल खाता है, तो तुम्हारे इसे करने से भले ही लोग नाराज हों या पीठ पीछे तुम्हारी आलोचना हो, यह मायने नहीं रखता है; लेकिन अगर यह ऐसा क्रियाकलाप है जो सिद्धांतों से मेल नहीं खाता, तो उसे करने से भले ही तुम्हें सबकी स्वीकृति और समर्थन मिल जाए और तुम सबके साथ मिल-जुलकर रह लो—परंतु एक बात है कि तुम परमेश्वर के सामने इसका हिसाब नहीं दे सकते—तुम्हें नुकसान हो चुका है। अगर तुम अधिसंख्य लोगों के साथ रिश्ते बनाकर रखते हो, उन्हें खुश और संतुष्ट रखते हो और उनकी प्रशंसा पाते हो, मगर तुम परमेश्वर, सृष्टिकर्ता का अपमान करते हो तो तुम महामूर्ख हो। इसलिए तुम जो भी करो, तुम्हें स्पष्ट समझना चाहिए कि क्या यह सिद्धांतों से मेल खाता है, क्या इससे परमेश्वर खुश होता है, इसके प्रति परमेश्वर का रवैया क्या है, लोगों को क्या रुख अपनाना चाहिए, लोगों को किन सिद्धांतों पर कायम रहना चाहिए, परमेश्वर ने किस प्रकार निर्देश दिए हैं और तुम्हें यह कैसे करना चाहिए—तुम्हें पहले इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (24))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मेरा दिल अचानक रोशन हो गया। अपना कर्तव्य करते हुए, मुझमें परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होना चाहिए और परमेश्वर के इरादों और काम करने के सिद्धांतों को खोजना चाहिए। जब तक कोई बात सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है, मुझे उस पर डटे रहना चाहिए। जब तक मैं परमेश्वर को संतुष्ट कर सकती हूँ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं लोगों को नाराज करती हूँ या मेरी बुराई होती है। अगर मैं सत्य जानती हूँ लेकिन लोगों के साथ अपने रिश्ते बनाए रखने के लिए इसका अभ्यास नहीं करती, भले ही मैं किसी को नाराज न करूँ, कलीसिया के काम की सुरक्षा न करके अपराध करने के लिए परमेश्वर द्वारा मेरी निंदा की जाएगी। यह तो बहुत बड़ी मूर्खता होगी! इसलिए, मैं लिन हाई के साथ संगति करने गई, असली काम न करने की उसकी अभिव्यक्तियों को उजागर किया और उसे बर्खास्त कर दिया। लिन हाई ने कहा कि वह पूरी तरह से आत्म-चिंतन करेगा। इस अनुभव के माध्यम से, मुझे एहसास हुआ है कि केवल सत्य का अभ्यास करके और सत्य सिद्धांतों के अनुसार दूसरों के साथ पेश आकर ही कोई मानव जैसा जीवन जी सकता है। अब से, मैं एक खुशामदी बनकर दूसरों और खुद को नुकसान नहीं पहुँचा सकती।

पिछला: 51. जब मैं संतान का फर्ज निभाने के लिए अपने पिता के पास नहीं रह सकी

अगला: 53. तीन बार गिरफ्तार होने से सीखे गए सबक

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

संबंधित सामग्री

32. एक महत्वपूर्ण खोज

लेखिका: फांगफांग, चीनमेरे परिवार के सब लोग प्रभु यीशु में विश्वास रखते हैं। मैं कलीसिया में एक साधारण विश्वासी थी और मेरे डैड कलीसिया में...

22. "शेर की माँद" से भाग निकलना

जायोयू, चीनमेरा नाम जायोयू है और मैं 26 साल की हूँ। मैं एक कैथोलिक हुआ करती थी। जब मैं छोटी थी, तो अपनी माँ के साथ ख्रीस्तयाग में भाग लेने...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें