57. मैंने अपने बेटे के प्रति ऋणी होने की भावना त्याग दी
बचपन से ही मैं अपनी माँ की बहुत प्रशंसा करती थी। उसने मेरे और मेरे भाई-बहनों के लिए बहुत कष्ट सहे। जब कभी मैं आधी रात को जागती तो देखती कि वह एक छोटे से तेल के दीये की रोशनी में हमारे लिए सूती कपड़े सिल रही है और अगले दिन उसे खेती-बाड़ी का काम करने के लिए पहाड़ पर जाना पड़ता था। पूरे परिवार की देखभाल के लिए उसने इतना काम किया कि वह बीमार पड़ गई। मेरे पिता कोई बहुत जिम्मेदार इंसान नहीं थे और जब मेरा बड़ा भाई शादी की उम्र का हुआ तो मेरी माँ ने ही सब कुछ सँभाला। गाँव के सभी लोग मेरी माँ की एक अच्छी पत्नी और माँ के रूप में प्रशंसा करते थे। मन ही मन मैं माँ को अपना आदर्श मानती थी, मेरा मानना था कि उसके कामों से ही यह तय होता है कि एक योग्य माँ होने का क्या मतलब है। शादी के बाद मैं भी अपनी माँ की तरह ही हो गई—मैं हर चीज में अपने पति और बच्चों को प्राथमिकता देती थी और मुझे लगता था कि जब तक वे आराम से रहते थे, मेरा कोई भी कष्ट सहना सार्थक था। सर्दियों में मैं हमेशा जल्दी उठकर चूल्हा जलाती और खाना बनाती थी और मैं अपने पति और बच्चों को नाश्ते के लिए तब तक नहीं जगाती थी जब तक घर गरम नहीं हो जाता। उनकी अच्छी तरह से देखभाल होते देखकर मुझे बहुत संतोष मिलता था। मेरी सास और मेरी बड़ी ननद एक अच्छी पत्नी के रूप में मेरी प्रशंसा करती थीं। और मैं भी मानती थी कि एक औरत को ऐसा ही करना चाहिए। बाद में अप्रत्याशित रूप से मेरे पति बीमार पड़ गए और उनका निधन हो गया और पूरे परिवार का बोझ अकेले मुझ पर आ पड़ा। मैंने मन में ठान लिया, “मुझे यह पक्का करना है कि बच्चे अपनी पढ़ाई पूरी करें और बस जाएँ।” इसलिए मैंने अपने दोनों बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए बाजार में एक छोटा-सा कारोबार शुरू किया।
1999 में मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार किया। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैं कई सत्य समझी और मैं अपने पति को खोने के दर्द से भी बाहर आ गई। बाद में मैंने अपनी क्षमता के अनुसार कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाया। 2003 में एक बुरे व्यक्ति के विश्वासघात के कारण स्थानीय पुलिस मुझे गिरफ्तार करने मेरे घर आई। सौभाग्य से मैं घर पर नहीं थी और इसलिए मैं इस मुसीबत से बच गई। सीसीपी द्वारा गिरफ्तार किए जाने से बचने के लिए मुझे अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ना पड़ा। अपने बच्चों को छोड़ने के खयाल से ही मेरा दिल पीड़ा से भर गया। मेरे पति का देहांत जल्दी हो गया था, इसलिए अगर मैं चली गई तो मेरे दोनों बच्चों का क्या होगा? मेरा बेटा 18 साल का हो चुका था और शादी की उम्र के करीब था और इसलिए मेरे जाने के बाद उसे घर बसाने में कौन मदद करेगा? लेकिन अगर मैं नहीं गई तो मुझे किसी भी पल गिरफ्तार किया जा सकता था और तब भी मैं उनकी देखभाल नहीं कर पाती। मेरी बेटी ने भी कहा, “माँ, मैं आपको गिरफ्तार होते देखने के बजाय यह चाहूँगी कि आप हमें छोड़कर चली जाएँ।” अपनी समझदार बेटी को देखकर मेरा दिल और भी दुखने लगा और आखिर में मैं रोते हुए घर से निकल गई। हालाँकि मैं घर छोड़ चुकी थी, लेकिन मेरा दिल हमेशा मेरे दोनों बच्चों के पास था और मैं सोचती रहती, “क्या वे ठीक हैं? क्या उनके पास पर्याप्त पैसे हैं? क्या उन्हें काम मिल सकता है? मेरे बेटे की शादी का इंतजाम कौन करेगा? क्या वे मुझसे नाराज होंगे और कहेंगे कि मैंने उन्हें छोड़ दिया?” जब भी मैं इन बातों के बारे में सोचती तो मेरा दिल दुखता था। मुझे लगा कि मैंने एक माँ के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं की हैं और मैंने सच में अपने बच्चों को निराश किया है। मैं सच में वापस जाकर उनकी देखभाल करना चाहती थी, लेकिन मुझे गिरफ्तार होने का डर था। मेरा दिल बहुत तड़प रहा था। उस समय मैंने परमेश्वर के वचन का एक अंश पढ़ा : “कौन वास्तव में पूरी तरह से मेरे लिए खुद को खपा पाता है और मेरी खातिर अपना सब कुछ अर्पित कर पाता है? तुम सभी अनमने हो; अपने विचारों को लेकर तुम दुविधाग्रस्त रहते हो, परिवार के बारे में, बाहरी दुनिया के बारे में, भोजन और कपड़ों के बारे में सोचते रहते हो। इस तथ्य के बावजूद कि तुम यहाँ मेरे सामने हो, मेरे लिए चीजें कर रहे हो, अपने दिल में तुम अभी भी घर पर मौजूद अपनी पत्नी, बच्चों और माता-पिता के बारे में सोच रहे हो। क्या वे तुम्हारी संपत्ति हैं? तुम उन्हें मेरे हाथों में क्यों नहीं सौंप देते? क्या तुम मुझ पर भरोसा नहीं करते? या ऐसा है कि तुम डरते हो कि मैं तुम्हारे लिए अनुचित व्यवस्थाएँ करूँगा?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 59)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मेरा दिल रोशन हो गया। क्या अपने बच्चों को परमेश्वर को सौंपना, मेरे द्वारा उनकी देखभाल करने से बेहतर नहीं होगा? सब कुछ परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है और मेरे दोनों बच्चे ठीक हैं या नहीं, यह परमेश्वर के हाथों में है। यह सोचकर मुझे उतना दुख नहीं हुआ।
जैसे-जैसे घर से दूर रहने का समय बढ़ता गया, मेरा बेटा बीसवें साल में पहुँच चुका था, वह अब शादी की उम्र का भी हो गया था और मुझे चिंता थी कि वह शादी कर पाएगा या नहीं। मेरे बच्चे पहले ही अपने पिता को खो चुके थे और मैं उनकी देखभाल के लिए वहाँ नहीं थी, इसलिए मुझे उनके प्रति गहरा अपराध-बोध हुआ। 2007 में एक जिला अगुआ के तौर पर मुझे इसलिए बर्खास्त कर दिया गया क्योंकि मुझमें अपने कर्तव्य के प्रति दायित्व-बोध नहीं था। मैंने सुना कि मेरे बच्चे उस शहर में काम करने चले गए हैं जहाँ मेरे भाई-बहन रहते थे, इसलिए मैं उनके साथ रहने के लिए लौट आई। जब मेरे बेटे ने मुझे देखा, तो वह बहुत रूखा था और मुझसे बात करने को तैयार नहीं था। उसने कहा कि मुझे सिर्फ अपनी आस्था की परवाह है और मैंने उन्हें छोड़ दिया है। मुझे बहुत अपराध बोध हुआ और लगा कि उसकी नाराजगी जायज है। मेरे छोटे भाई-बहन भी मुझसे मिलने आए। मेरे भाई ने मुझे डाँटते हुए कहा, “इतने सालों में जब तुम नहीं थीं, तुम्हारे बच्चों ने बहुत मुश्किल समय काटा है। इस बार तुम फिर से मत जाना। अब वे बड़े हो गए हैं, इसलिए तुम्हें जल्दी करके अपने बेटे की शादी कराने में मदद करनी चाहिए—यही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।” मेरी बहन ने कहा, “जितने साल तुम नहीं थीं, हम तुम्हारे बेटे के लिए चिंता करते रहे और हमने उसे नौकरी ढूँढ़ने में भी मदद की।” यह सुनकर मुझे और भी ज्यादा अपराध बोध हुआ और मैं परेशान हो गई। मुझे लगा कि मैं एक अच्छी माँ नहीं हूँ और मैंने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं की हैं। मेरे बेटे को 17 या 18 साल की उम्र में ही अपनी रोजी-रोटी कमानी पड़ी और मेरी बेटी दुबली-पतली होने के बावजूद कठोर शारीरिक श्रम कर रही थी। अगर मैं घर पर होती तो उन्हें इतनी कम उम्र में काम शुरू नहीं करना पड़ता। उनकी भरपाई करने के लिए मैं उनका पसंदीदा खाना बनाने और उनके कपड़े धोने की पूरी कोशिश करती और मैं उनके लिए जो कुछ भी कर सकती थी, उसके लिए अपना पूरा प्रयास करती। अपने बेटे की शादी के लिए पैसे बचाने के लिए, मैंने घर पर पीस के हिसाब से कपड़े सिलने का काम ले लिया। मैं रात में काम करती और सुबह ऑर्डर पहुँचाती थी और दिन के दौरान मैं बिना किसी रुकावट के नए विश्वासियों को सींच सकती थी, सभाओं में शामिल हो सकती थी और अपना कर्तव्य निभा सकती थी। 2008 में मुझे कलीसिया अगुआ चुन लिया गया, लेकिन उस समय मैं बहुत दुविधा में थी। मैं जानती थी कि मुझे परमेश्वर के इरादों पर विचार करना चाहिए और समर्पण करना चाहिए, लेकिन मुझे चिंता थी कि अगुआ बनकर मुझे ज्यादा समय देना पड़ेगा और पैसे कमाने के लिए समय नहीं बचेगा और बिना पैसे और घर के मेरे बेटे से शादी करने के लिए कौन तैयार होगा? मेरे पति का देहांत जल्दी हो गया था, इसलिए एक माँ के तौर पर मुझ पर और भी ज्यादा जिम्मेदारियाँ थीं। अगर मैंने अपने बेटे को पैसे बचाने में मदद नहीं की तो वह शादी नहीं कर पाएगा—तो क्या दूसरे लोग मुझे एक गैर-जिम्मेदार माँ नहीं कहेंगे? यह सोचकर मैंने अगुआ का कर्तव्य लेने से इनकार कर दिया और नए विश्वासियों को सींचना जारी रखा।
समय बीतता गया और जल्द ही 2010 आ गया। मेरा बेटा अब 25 साल का था और उसके सभी हमउम्र पहले ही शादी कर चुके थे, लेकिन उसने अभी तक नहीं की थी। मैं बहुत चिंतित रहती थी। हालाँकि मैं अपना कर्तव्य निभाने के साथ-साथ पैसे कमाने के लिए भी काम कर रही थी, लेकिन उसकी शादी के लिए मैंने जो पैसे बचाए थे, वे अभी भी काफी से बहुत कम थे। अधिक पैसे बचाने के लिए मैंने और भी ज्यादा काम ले लिया। जैसे-जैसे और ज्यादा नए विश्वासियों ने परमेश्वर का कार्य स्वीकार किया, मैं दिन में अपना कर्तव्य निभाती और देर रात तक काम करती थी, इसलिए मेरे पास नए विश्वासियों को सींचने के लिए कम समय और ऊर्जा बचती थी और मैं शायद ही कभी इस बात पर विचार करती थी कि ऐसी संगति कैसे की जाए जिससे उन्हें सच्चे मार्ग पर जड़ें जमाने में मदद मिले और मुझमें नए विश्वासियों की मुश्किलों या समस्याओं को हल करने के प्रति कोई दायित्व-बोध नहीं था। क्योंकि मैं शाम 5 बजे ही काम शुरू कर देती थी, मैं कभी-कभी आधी रात या 1 बजे तक काम करती थी और फिर मुझे सुबह 4 बजे तक काम सौंपना होता था। अगले दिन अपना कर्तव्य निभाते समय मैं उनींदी और चकराई हुई महसूस करती थी। कुछ समय बाद जिन नए विश्वासियों को मैं सींचती थी, उनमें से कुछ ने नियमित रूप से सभाओं में आना भी बंद कर दिया। चूँकि मुझमें अपने कर्तव्य के प्रति कोई दायित्व-बोध नहीं था, आखिरकार मुझे बर्खास्त कर दिया गया। मैं बहुत बेचैन हो गई। मैंने सोचा कि कैसे मैंने पहले अगुआ का कर्तव्य ठुकरा दिया था और अब मैंने नए विश्वासियों को सींचने का काम भी अच्छी तरह से नहीं किया था। मुझे प्रार्थना करने में भी बहुत शर्म आ रही थी। हालाँकि अब बिना कर्तव्य के मैं पूरा समय काम करके अपने बेटे के लिए पैसे बचा सकती थी, मेरा दिल अंधेरे से भर गया था और मैं बता नहीं सकती थी कि मुझे कैसा लग रहा है।
उस दौरान मैं काम करते हुए भजन सुनती थी। परमेश्वर के वचनों का एक भजन, जिसका शीर्षक “समय जो गँवा दिया कभी वापस न आएगा” है, इस प्रकार है : “नज़र रखो! नज़र रखो! बीता हुआ समय फिर कभी नहीं आएगा—यह याद रखो! दुनिया में ऐसी कोई दवाई नहीं है जो पछतावे का इलाज कर सके! तो, मैं तुम लोगों से भला और क्या कह सकता हूँ? क्या मेरे वचन तुम लोगों के सावधानीपूर्ण मनन, बार-बार के मनन के योग्य नहीं हैं?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 30)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे गहराई से छू लिया। परमेश्वर ने इतना कुछ और इतनी ईमानदारी से कहा है, फिर भी मैं इतनी हठी क्यों थी और लौटने को तैयार क्यों नहीं थी? मैंने अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह मुझे इस अवस्था से बाहर निकाले। मैं खुद से पूछती रही, “क्या मुझे सिर्फ अपने बेटे की शादी के लिए पैसे कमाने के लिए सत्य का अनुसरण करना छोड़ना ही पड़ेगा?” मुझे परमेश्वर के कुछ वचन याद आए : “तुम्हें एहसास भी नहीं होगा और तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथ से निकल जाएगा; उसके बाद क्या तुम्हारे पास अभी भी परमेश्वर से प्रेम करने का इस प्रकार का अवसर होगा?” “यदि जीवन में तुम सत्य के लिए कष्ट नहीं उठाते हो, या इसे पाने की खोज नहीं करते, तो क्या तुम मरने के समय पछताना चाहते हो? यदि ऐसा है, तो फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो?” फिर मुझे पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचनों के ये दो अंश मिले। परमेश्वर कहता है : “संकल्प रखने वाले और परमेश्वर से प्रेम करने वाले हर व्यक्ति के लिए कोई भी सत्य अप्राप्य नहीं है और ऐसा कोई न्याय नहीं है जिसके लिए वह अडिग न रह सके। तुम्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए और कैसे इस प्रेम का उपयोग उसके इरादे पूरे करने के लिए करना चाहिए? तुम्हारे जीवन में इससे बड़ा मामला कोई नहीं है। सबसे बढ़कर, तुममें इस तरह का संकल्प और दृढ़ता होनी चाहिए और रीढ़विहीन निर्बल नहीं होना चाहिए। तुम्हें सीखना चाहिए कि एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुभव कैसे किया जाता है, तुम्हें अर्थपूर्ण सत्यों का अनुभव करना चाहिए और उस तरीके से अपने-आपसे लापरवाही से पेश नहीं आना चाहिए। तुम्हें एहसास भी नहीं होगा और तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथ से निकल जाएगा; उसके बाद क्या तुम्हारे पास अभी भी परमेश्वर से प्रेम करने का इस प्रकार का अवसर होगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तुम्हारे अंदर बिल्कुल पतरस जैसा संकल्प और जमीर होना चाहिए; तुम्हें एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए और अपने साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। एक मनुष्य के रूप में और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में तुम्हें सावधानीपूर्वक अपने जीवन पर विचार करना चाहिए और इससे निपटने में सक्षम होना चाहिए—यह विचार करना चाहिए कि तुम्हें अपने-आपको परमेश्वर को कैसे अर्पित करना चाहिए, तुममें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण आस्था कैसे होनी चाहिए और चूँकि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, इसलिए तुम्हें उससे कैसे इस तरीके से प्रेम करना चाहिए कि यह ज्यादा शुद्ध, ज्यादा सुंदर और ज्यादा अच्छा हो। ... पारिवारिक सामंजस्य का आनंद लेने के लिए तुम्हें सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए और तुम्हें अस्थायी आनंद के लिए जीवन भर की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुम्हें उस सबका अनुसरण करना चाहिए जो खूबसूरत और अच्छा है और तुम्हें जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तुम ऐसा साधारण और सांसारिक जीवन जीते हो और तुम्हारे पास अनुसरण का कोई लक्ष्य नहीं है, तो क्या इससे तुम्हारा जीवन बर्बाद नहीं हो रहा है? ऐसे जीवन से तुम्हें क्या हासिल हो सकता है? तुम्हें एक सत्य के लिए देह के सभी सुखों का त्याग करना चाहिए, और थोड़े-से सुख के लिए सारे सत्यों का त्याग नहीं कर देना चाहिए। ऐसे लोगों में कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं होता!” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। “इस मार्ग पर बहुत-से लोग बहुत ज्ञान की बातें कर सकते हैं, लेकिन मृत्यु के समय उनकी आँखें आँसुओं से भर आती हैं और वे इस बात से घृणा करते हैं कि उन्होंने अपना पूरा जीवन बेकार कर दिया और बुढ़ापे तक जीना व्यर्थ हो गया। वे केवल सिद्धांत समझते हैं, लेकिन सत्य को अभ्यास में नहीं ला पाते, न परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं, वे बस इधर-उधर दौड़ते रहते हैं, अपने काम में काफी व्यस्त दिखते हैं और केवल मृत्यु के कगार पर ही वे अंततः देख पाते हैं कि उनके पास सच्ची गवाही नहीं है, वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते हैं। क्या तब बहुत देर नहीं हो गई होती है? फिर तुम वर्तमान समय का लाभ क्यों नहीं उठाते और उस सत्य की खोज क्यों नहीं करते जिसे तुम प्रेम करते हो? कल तक का इंतज़ार क्यों? यदि जीवन में तुम सत्य के लिए कष्ट नहीं उठाते हो, या इसे पाने की खोज नहीं करते, तो क्या तुम मरने के समय पछताना चाहते हो? यदि ऐसा है, तो फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है)। परमेश्वर के कार्य का यह चरण मानवता को बचाने का अंतिम कार्य है। मैं इसे पा तो गई थी, लेकिन मैंने इसे सँजोया नहीं और जिस दिन परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा, अगर मैं तब अपना कर्तव्य ठीक से करना चाहूँगी तो कोई मौका नहीं मिलेगा और तब भी क्या मुझे निकाल नहीं दिया जाएगा? परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट हैं। परमेश्वर में विश्वास करना, सत्य का अनुसरण करना और सत्य पाना जीवन में सबसे बड़ी चीजें हैं और वे सबसे सार्थक चीजें भी हैं। लेकिन मैंने एक अच्छी माँ होने के लिए अगुआ के कर्तव्य से जी चुराया, क्योंकि मुझे डर था कि अगुआ का कर्तव्य निभाने से मेरे बेटे के लिए पैसे कमाने में देरी होगी। जिन नए विश्वासियों ने अभी-अभी परमेश्वर का कार्य स्वीकार किया है, उनकी कई धारणाएँ होती हैं जिन पर संगति करने और उन्हें हल करने की जरूरत होती है, लेकिन मैं सिर्फ यही सोचती रही कि अपने बेटे के प्रति अपनी कमी की भरपाई कैसे करूँ। मैं नए विश्वासियों की समस्याओं को हल करने में ज्यादा समय नहीं लगाना चाहती थी और मैं सभाओं में बस खानापूर्ति कर रही थी। इसका नतीजा यह हुआ कि नए विश्वासी नियमित रूप से सभाओं में नहीं आते थे। मैंने परमेश्वर के वचनों के सिंचन और पोषण का बहुत आनंद लिया था और परमेश्वर ने मुझे उद्धार का एक मौका भी दिया था—लेकिन मैंने परमेश्वर को बदले में क्या दिया था? अपना कर्तव्य ठुकराने के अलावा मैं लापरवाह और गैर-जिम्मेदार भी रही थी। मुझमें तो जरा भी इंसानियत नहीं बची थी! अब जब मैंने अपना एकमात्र कर्तव्य भी खो दिया था, तो इस तरह जीने का क्या मतलब था? इस तरह जीना—अपना कर्तव्य निभाने के साथ-साथ अपने बच्चों को भी संतुष्ट करने की कोशिश करना, अपने कर्तव्य के प्रति बेवफा होना और दोनों नावों पर पैर रखने की कोशिश करना—अंत में मुझे क्या हासिल होगा? परमेश्वर का कार्य किसी का इंतजार नहीं करता और अगर मैंने अभी इसका अनुसरण नहीं किया तो मुझे दूसरा मौका नहीं मिलेगा। मुझे अपने स्नेह को एक तरफ रखकर सत्य का अनुसरण करना था। जल्द ही मैंने अपना कर्तव्य फिर से शुरू कर दिया।
2011 में मुझे एक सिंचन उपयाजक के रूप में चुना गया। उस समय भी मैं कुछ दुविधा में थी। सिंचन उपयाजक होना एक बड़ी जिम्मेदारी होती और मेरे पास अपने बेटे के लिए पैसे कमाने का समय कम होता। हालाँकि मैंने यह भी सोचा कि पिछले कुछ सालों से मैं अपने बेटे की शादी के लिए कितनी बेताबी से पैसे कमा रही थी—मुझमें अपने कर्तव्य के प्रति कोई दायित्व-बोध नहीं था, मैंने कलीसिया के काम में देरी की थी और मेरे अपने जीवन को भी नुकसान हुआ था—फिर भी कलीसिया ने मुझे इतना महत्वपूर्ण कर्तव्य करने के लिए चुना। मैं अब और परमेश्वर के खिलाफ और ज्यादा विद्रोह नहीं कर सकती थी और मुझे इसे अपनी पूरी क्षमता से करना था। इसलिए मैंने इसे स्वीकार कर लिया। लेकिन अपने दिल में, मुझे अभी भी यह हमेशा चिंता थी कि हमारे पास पैसे न होने के कारण शायद मेरा बेटा शादी न कर पाए। 2014 में मैंने परमेश्वर के वचन का एक अंश पढ़ा जिसने मुझे इस चिंता को कुछ हद तक एक तरफ रखने में मदद की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब कोई व्यक्ति परिपक्व हो जाता है, तो वह अपने माता-पिता को छोड़ने और अपने दम पर आगे बढ़ने की शर्तों को पूरा कर चुका होता है। इसी बिंदु पर वह वास्तव में जीवन में अपनी भूमिका निभानी शुरू करता है, और ठीक इसी समय जीवन में उसका मिशन धीरे-धीरे अस्पष्ट और धुँधले से स्पष्ट और सुस्पष्ट हो जाता है। भले ही ऊपरी तौर पर अपने माता-पिता के साथ एक करीबी रिश्ता बनाए रखता है, लेकिन चूँकि वह जो भूमिका निभाता है और जीवन में उसका जो मिशन है, उसका उसके माता-पिता से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए जैसे-जैसे वह धीरे-धीरे स्वतंत्रता प्राप्त करता जाता है, सार रूप में यह करीबी रिश्ता धीरे-धीरे टूटने लगता है। दैहिक परिप्रेक्ष्य से, वह अवचेतन रूप में अपने माता-पिता पर निर्भर रहना जारी रखने से बच नहीं सकता, लेकिन एक वस्तुनिष्ठ तथ्य के रूप में, जब कोई पूरी तरह बड़ा हो जाता है, तो वह सभी तरह से अपने माता-पिता से पूरी तरह से अलग हो जाता है और वह जो भूमिका ग्रहण करता है उसे वह स्वयं स्वतंत्र रूप से कार्यान्वित करेगा। जन्म देने और पालने के अलावा, किसी के जीवन में माता-पिता की जिम्मेदारी केवल बाहरी रूप से उसे बड़े होने के लिए एक वातावरण प्रदान करना है, और बस इतना ही, क्योंकि यह सृष्टिकर्ता का ही पूर्वनियत करना है जिसका किसी भी व्यक्ति के भाग्य पर प्रभाव पड़ता है। किसी का भविष्य कैसा होगा, यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे कोई भी व्यक्ति नियंत्रित कर सके; यह बहुत पहले से पूर्वनियत है, और किसी का भाग्य उसके माता-पिता भी नहीं बदल सकते हैं। जहाँ तक भाग्य का सवाल है, हर व्यक्ति का भाग्य अद्वितीय है; हर किसी का अपना भाग्य होता है। इसलिए, किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके भाग्य को बिल्कुल भी नहीं रोक सकते, न ही वह जीवन में जो भूमिका निभाता है, उसमें उसकी मदद करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। यह कहा जा सकता है कि चाहे किसी का जन्म किसी भी परिवार में होना पूर्वनियत हो और चाहे कोई किसी भी माहौल में बड़ा हो, ये उसके जीवन के मिशन को पूरा करने के लिए पूर्व-शर्तों से ज्यादा कुछ नहीं हैं। वे किसी भी तरह से किसी व्यक्ति के जीवन के भाग्य या उस तरह की नियति को निर्धारित नहीं करते हैं जिसके भीतर वह अपना मिशन पूरा करता है। इस प्रकार, किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके मिशन को पूरा करने में उसकी सहायता नहीं कर सकते हैं, न ही कोई रिश्तेदार जीवन में उसकी भूमिका को पूरा करने में उसकी मदद कर सकता है। कोई अपना मिशन कैसे पूरा करता है और वह किस तरह के रहन-सहन के वातावरण में अपनी भूमिका निभाता है, यह पूरी तरह से उसके जीवन के भाग्य पर निर्भर करता है। दूसरे शब्दों में, कोई भी वस्तुनिष्ठ स्थिति सृष्टिकर्ता द्वारा पूर्वनियत किसी के मिशन को प्रभावित नहीं कर सकती है। हर कोई उस विशेष परिवेश में परिपक्वता तक पहुँचता है जिसमें वह बड़ा होता है; फिर, कदम-दर-कदम, वह जीवन के अपने मार्ग पर चलता है और उस नियति को पूरा करता है जिसकी व्यवस्था सृष्टिकर्ता द्वारा उसके लिए की गई है। वह स्वाभाविक रूप से और स्वतः मानवजाति के विशाल सागर में प्रवेश करता है और जीवन में अपना पद ग्रहण करता है; साथ ही, सृष्टिकर्ता की पूर्वनियति और उसकी संप्रभुता की खातिर वह सृजित प्राणी के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करना शुरू करता है” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल को रोशन कर दिया। मैं समझ गई कि मेरी जिम्मेदारी केवल अपने बच्चों को इस दुनिया में लाने भर की थी, उन्हें बड़े होने के लिए एक माहौल देना और उन्हें वयस्क होने तक पालना था। लेकिन जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उनका जीवन अपने माता-पिता से अलग हो जाता है। हम सभी के अपने-अपने उद्देश्य होते हैं। मैं एक सृजित प्राणी हूँ और मेरा दायित्व एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य पूरा करना है, न कि हमेशा अपने बच्चों के लिए जीना। उन सालों में मैंने अपने बेटे के प्रति महसूस किए गए कर्ज की भरपाई करने के लिए कड़ी मेहनत से पैसा कमाया था, मुझे उम्मीद थी कि इससे उसे शादी करने और घर बसाने में मदद मिलेगी, यह सोचा था कि केवल ऐसा करके ही मैं उसकी भरपाई कर सकती हूँ। पैसे कमाने के लिए मैंने अगुआ का कर्तव्य भी ठुकरा दिया था और नए विश्वासियों को सींचने में गैर-जिम्मेदारी दिखाई थी। इससे मेरे जीवन प्रवेश और कलीसिया के काम में नुकसान हुआ। अब मैं समझ गई कि मेरा बेटा शादी कर पाएगा या नहीं, यह मुझ पर निर्भर नहीं था, उसके लिए कार या घर खरीदने की खातिर पैसा कमाना उसकी शादी होने की गारंटी नहीं देता था और परमेश्वर ने मेरे बेटे की शादी पहले ही पूर्व-निर्धारित कर दी थी। मैं इसे बदल नहीं सकती थी। मैंने एक पड़ोसी के बारे में सोचा : पति-पत्नी दोनों विकलांग थे और उनके पास न तो घर था न ही कार, फिर भी उनके बेटे ने कम उम्र में ही शादी कर ली और अपना घर बसा लिया। मेरे एक रिश्तेदार हैं जिनके परिवार के पास लाखों की बचत है और कार और घर दोनों हैं, लेकिन उनका बच्चा 30 साल से ऊपर का है और अभी भी अविवाहित है। इससे मैंने देखा कि शादी दौलत से तय नहीं होती और सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है। यह समझने से मेरे दिल को बहुत सुकून मिला और मैंने अपना कर्तव्य ठीक से करने का फैसला किया, अपने बेटे की शादी को पूरी तरह से परमेश्वर को सौंपने और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने का फैसला किया।
2017 में मेरे बेटे ने शादी कर ली और अपनी पत्नी के परिवार के साथ रहने लगा। मेरी बहू ने सगाई में किसी तरह का लेन-देन या उपहार नहीं माँगा और न ही कोई माँग की। मैंने उसे केवल 30,000 युआन दिए और कोई औपचारिक विवाह समारोह नहीं हुआ। रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए बस एक भोज समारोह रखा गया और कार्यक्रम सादे तरीके से संपन्न हो गया। मुझे खुश होना चाहिए था, लेकिन मेरे दिल में अभी भी अपराध बोध की भावना थी, मुझे लग रहा था कि मैंने अपने बेटे के लिए एक भव्य शादी का आयोजन नहीं किया था, मैंने केवल एक मामूली-सी रकम दी थी और एक माँ के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को पूरा नहीं किया था, जिससे मुझे अफसोस हो रहा था। 2019 में मेरी बहू गर्भवती हो गई और उसने मुझसे अपनी देखभाल करने के लिए कहा। उस समय मैं कई कलीसियाओं के पाठ आधारित कार्य के लिए जिम्मेदार थी और इसलिए अगर मैं अपनी बहू की देखभाल करने जाती तो मेरे कर्तव्यों में देरी होती। लेकिन फिर मैंने सोचा कि मैंने इतने सालों में अपने बेटे को ज्यादा कुछ नहीं दिया है। अब मेरा बेटा पैसे कमाने के लिए बाहर काम कर रहा था और मुझे लगा कि मुझे अपनी गर्भवती बहू की देखभाल करनी चाहिए और अगर इस बार मैं उसका बोझ कम करने में मदद नहीं कर सकी, तो मैं उसके प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा नहीं पाऊँगी। तो क्या मेरे रिश्तेदार मुझे सच में एक गैर-जिम्मेदार माँ नहीं कहेंगे? मैं खुद को शांत नहीं कर पा रही थी और अपने कर्तव्यों पर अपना दिल केंद्रित नहीं कर पा रही थी, जिससे मेरे कर्तव्य निभाने के नतीजों पर थोड़ा असर पड़ा। पर्यवेक्षक को इस बारे में पता चला और फिर उसने मेरी अवस्था से संबंधित परमेश्वर के कुछ वचन मेरे लिए ढूँढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “इस असली समाज में जीने वाले लोगों को शैतान बुरी तरह भ्रष्ट कर चुका है। चाहे वे शिक्षित हों या न हों, उनके विचारों और दृष्टिकोणों में पारंपरिक संस्कृति की बहुत-सी बातें शामिल होती हैं। विशेष रूप से, महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने पतियों की सेवा करें और अपने बच्चों का पालन-पोषण करें, एक नेक पत्नी और प्यारी माँ बनें, अपना पूरा जीवन अपने पतियों और बच्चों को समर्पित कर दें और उनके लिए जिएँ। उन्हें घर के सभी काम-काज, जैसे कि परिवार का दैनिक भोजन और कपड़ों की धुलाई और सफाई ठीक से सँभालने चाहिए। एक नेक पत्नी और प्यारी माँ होने का यही स्वीकृत मानक है। हर महिला यह सोचती है कि उसे यही करना चाहिए और अगर वह ऐसा नहीं करती तो वह एक अच्छी महिला नहीं है, उसने अपनी अंतरात्मा और नैतिकता के इस पारंपरिक मानक का उल्लंघन किया है। कुछ लोग इस नैतिक मानक का उल्लंघन करने पर अपनी अंतरात्मा से समझौता नहीं कर पाते; उन्हें लगता है कि उन्होंने अपने पति और बच्चों के साथ गलत किया है और वे अच्छी महिला नहीं हैं। लेकिन परमेश्वर में विश्वास करने, उसके बहुत-से वचन पढ़ने, कुछ सत्यों को समझने और कुछ मामलों की असलियत देख पाने के बाद, तुम सोचोगे, ‘मैं एक सृजित प्राणी हूँ और मुझे एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना चाहिए और परमेश्वर के लिए खुद को खपाना चाहिए।’ इस समय क्या एक नेक पत्नी और प्यारी माँ होने, और सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य करने के बीच कोई टकराव होता है? अगर तुम एक नेक पत्नी और प्यारी माँ बनना चाहती हो तो फिर तुम अपना कर्तव्य पूरे समय नहीं कर सकती, लेकिन अगर तुम अपना कर्तव्य पूरे समय करना चाहती हो तो फिर तुम एक नेक पत्नी और प्यारी माँ नहीं बन सकती। अब तुम क्या करोगी? अगर तुम अपना कर्तव्य अच्छे से करने का फैसला कर कलीसिया के कार्य के लिए जिम्मेदार बनना चाहती हो, परमेश्वर के प्रति समर्पित रहना चाहती हो, तो फिर तुम्हें एक नेक पत्नी और प्यारी माँ बनना छोड़ना पड़ेगा। अब तुम क्या सोचोगी? तुम्हारे मन में किस प्रकार की आंतरिक उथल-पुथल होगी? क्या तुम्हें ऐसा लगेगा कि तुमने अपने पति और बच्चों को निराश कर दिया है? इस प्रकार का अपराधबोध और बेचैनी कहाँ से आती है? जब तुम एक सृजित प्राणी का कर्तव्य नहीं निभा पाती तो क्या तुम्हें ऐसा लगता है कि तुमने परमेश्वर को निराश कर दिया है? तुम्हें कोई अपराधबोध या ग्लानि नहीं होती क्योंकि तुम्हारे दिलोदिमाग में सत्य का लेशमात्र संकेत भी नहीं मिलता है। तो फिर तुम क्या समझती हो? परंपरागत संस्कृति—एक नेक पत्नी और प्यारी माँ होना। इस प्रकार तुम्हारे मन में ‘अगर मैं एक नेक पत्नी और प्यारी माँ नहीं हूँ तो फिर मैं नेक और भली औरत नहीं हूँ’ की धारणा उत्पन्न होगी। उसके बाद से तुम इस धारणा के बंधनों से बँध जाओगी, परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य करने के बाद भी ऐसी ही बनी रहोगी। जब अपना कर्तव्य करने और एक नेक पत्नी और प्यारी माँ होने के बीच टकराव होता है तो भले ही तुम अनिच्छा से अपना कर्तव्य करने का फैसला कर लो या परमेश्वर के प्रति थोड़ी-सी भक्ति दिखा लो, फिर भी तुम्हारे दिल में बेचैनी और थोड़ी-सी ग्लानि होगी। इसलिए अपना कर्तव्य निभाने के दौरान जब तुम्हें कुछ फुर्सत मिलेगी तो तुम अपने बच्चों और पति की देखभाल करने के मौके तलाश करोगी, उनकी और अधिक भरपाई करना चाहोगी और सोचोगी कि भले ही तुम्हें ज्यादा कष्ट झेलना पड़े तो भी यह ठीक है, बशर्ते तुम्हारे पास मन की शांति हो। क्या यह एक नेक पत्नी और प्यारी माँ होने के परंपरागत संस्कृति के विचार और सिद्धांत के असर का नतीजा नहीं है?” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है)। “शैतान इन पारंपरिक संस्कृतियों और नैतिकता की इन धारणाओं का उपयोग तुम्हारे हृदय और मन को बाँधने के लिए करता है, चीजों पर तुम्हारे विचारों को बेहूदा बना देता है और तुमसे अपने हृदय में परमेश्वर का नकार और प्रतिरोध करवाता है, इस प्रकार तुम्हें परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने में असमर्थ बना देता है; तुम शैतान की इन चीजों के वश में हो गए हो, और परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने में अक्षम बना दिए गए हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करना चाहते हो, तो ये चीजें तुम्हारे भीतर सिर उठाएँगी और विघ्न डालेंगी, और तुमसे सत्य और परमेश्वर की माँगों का प्रतिरोध कराएंगी। भले ही तुम पारंपरिक संस्कृति के जुए से खुद को छुटकारा दिलाना चाहो, तुम ऐसा करने में शक्तिहीन होगे। कुछ समय संघर्ष करने के बाद, तुम समझौता कर लोगे। तुम मान लोगे कि नैतिकता की पारंपरिक धारणाएँ सही हैं और सत्य के अनुरूप हैं, और इसलिए तुम परमेश्वर के वचनों को नकार दोगे या उन पर संदेह करोगे, परमेश्वर के वचनों को सत्य के रूप में स्वीकार नहीं करोगे, और इस बात की परवाह नहीं करोगे कि क्या तुम उद्धार प्राप्त कर सकते हो, यह महसूस करोगे कि आखिरकार तुम अभी भी इसी दुनिया में रहते हो, और इन चीजों पर निर्भर रहकर ही जीवन में आगे बढ़ सकते हो। जनमत की निंदा को सहन करने में असमर्थ होकर तुम सत्य और परमेश्वर के वचनों को छोड़ने का विकल्प चुनोगे और इसके बजाय पारंपरिक संस्कृति की नैतिकता की धारणाओं से चिपके रहोगे, शैतान के पक्ष में जाओगे और शैतान के साथ खड़े होओगे, सत्य को स्वीकार करने के बजाय परमेश्वर को नाराज करना पसंद करोगे। मुझे बताओ, क्या मनुष्य दयनीय नहीं है? क्या उसे परमेश्वर के उद्धार की आवश्यकता नहीं है?” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है)। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि “एक नेक पत्नी और प्यारी माँ” होने का पारंपरिक चीनी सांस्कृतिक विचार एक ऐसी जंजीर है जिससे शैतान ने महिलाओं को बाँध रखा है, जो लोगों को यह विश्वास दिलाता है कि एक अच्छी महिला को अपने पति और बच्चों के लिए जीना चाहिए और हमेशा उन्हें पहले रखना चाहिए और जब तक वह अपने पति और बच्चों को संतुष्ट कर सकती है, चाहे कोई काम कितना भी कठिन या थकाऊ क्यों न हो, उसे वह करना चाहिए और अगर वह ऐसा करने में विफल रहती है तो वह एक अच्छी पत्नी या प्रेममयी माँ नहीं है और दूसरों द्वारा उसका उपहास किया जाएगा। मैं इसी दशा में थी। बचपन से ही मैंने अपनी माँ को हमारे परिवार के आराम के लिए सुबह से शाम तक काम करते देखा और उसने मेरे बड़े भाई की शादी की तैयारियाँ भी सँभाली। सभी गाँववाले मेरी माँ की एक अच्छी पत्नी और माँ के रूप में प्रशंसा करते थे। अपनी माँ से प्रभावित होकर, शादी के बाद मैंने अपने पति और बच्चों की बहुत देखभाल की। मेरा पति कहता था कि मैं एक सुघड़ पत्नी हूँ और मेरे बच्चे कहते थे कि मैं एक अच्छी और प्रेममयी माँ हूँ। मेरे पति के निधन के बाद मैंने एक पिता की जिम्मेदारियाँ भी निभाईं और मैंने अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए पैसे कमाने की खातिर कड़ी मेहनत की और चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों न आई हों, मैंने अकेले ही सब कुछ सहा। परमेश्वर को पाने के बाद सीसीपी के उत्पीड़न के कारण मुझे घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा और भले ही मैं अपना कर्तव्य निभा रही थी, मेरा दिल हमेशा मेरे बच्चों में पड़ा रहता था और मैं हमेशा खुद को उनका कर्जदार मानती थी। खासकर जब मैंने अपने बेटे को शादी लायक होते देखा और मैं उसे आर्थिक सहायता नहीं दे सकी, मुझे और भी दृढ़ता से महसूस हुआ कि मैं एक माँ के रूप में असफल रही हूँ। जब मुझे कलीसिया अगुआ के रूप में चुना गया तो मैं जानती थी कि मुझे परमेश्वर के इरादों पर विचार करना चाहिए, लेकिन मुझे अपने बेटे की शादी के लिए पैसे कमाने में देरी होने का डर था, इसलिए मैंने यह कर्तव्य ठुकरा दिया। नए विश्वासियों को सींचते समय भी मेरा दिल उसमें नहीं लगता था, क्योंकि मेरा सारा ध्यान अपने बेटे के लिए पैसे कमाने पर रहता था, जिससे नए विश्वासियों को समय पर सिंचन नहीं मिल पाता था। अब जब अपनी बहू की देखभाल करने की बात आई, हालाँकि मैं उसके पास नहीं गई थी, मेरा दिल पहले ही परमेश्वर से दूर हो चुका था। मैं अपने बेटे के प्रति कर्जदार होने की भावना में जी रही थी और मेरा कर्तव्य निभाने में मन नहीं लगता था। इससे मेरे कर्तव्य पालन की प्रभावशीलता में गिरावट आई। मैं “एक नेक पत्नी और प्यारी माँ” होने के पारंपरिक विचार से बँधी हुई थी, इसलिए जब भी मेरा कर्तव्य इससे टकराता, मेरे विचार हमेशा अपने बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने पर ही टिके रहते थे। और मुझे कलीसिया के हितों की बिल्कुल भी परवाह नहीं थी। मैंने कई सालों तक परमेश्वर में विश्वास किया था और उसके वचनों के इतने सिंचन और पोषण का आनंद लिया था, फिर भी मैं ऐसे काम कर रही थी जो उसके खिलाफ विद्रोह और उसका प्रतिरोध करते थे। मुझमें सच में कोई इंसानियत नहीं थी! अब मैं समझ गई कि ये पारंपरिक सांस्कृतिक विचार शैतान द्वारा लोगों को बाँधने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले औजार हैं, जो मुझे केवल एक अच्छी माँ की प्रतिष्ठा पाने के लिए जीने पर मजबूर करते हैं और अंततः एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य पूरा करने में असफल होने के कारण मुझे निकाल दिया जाएगा। परमेश्वर के वचनों ने मुझे शैतान के बुरे इरादों को पहचानने में मदद की। मैं अब और पारंपरिक संस्कृति से बँधी और बाधित नहीं रह सकती थी और मुझे परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना था।
फिर मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और मेरे दिल ने बहुत उज्ज्वल महसूस किया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर का यह कहने का क्या अर्थ है, ‘परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है’? इसका अर्थ हर व्यक्ति को यह एहसास कराना है : हमारा जीवन और हमारे प्राण परमेश्वर ने रचे हैं, ये हमें उसी से मिले हैं—वे हमारे माता-पिता से नहीं आते, प्रकृति से तो बिल्कुल भी नहीं, ये चीजें हमें परमेश्वर ने दी थीं; बात बस इतनी है कि हमारी देह हमारे माता-पिता से पैदा हुई है और हमारे बच्चे हमसे पैदा हुए हैं, लेकिन उनकी किस्मत पूरी तरह परमेश्वर के हाथों में है। हम परमेश्वर पर विश्वास कर सकते हैं, यह भी परमेश्वर का दिया हुआ अवसर है; यह उसने नियत किया है और उसका अनुग्रह है। इसलिए, तुम्हें किसी और के प्रति अपने दायित्व या जिम्मेदारी को पूरा करने की कोई आवश्यकता नहीं है; तुम्हें केवल एक सृजित प्राणी के रूप में परमेश्वर के प्रति अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहिए। लोगों को किसी भी अन्य चीज से बढ़कर यही करना चाहिए और यह सबसे प्रमुख मामला है जिसे लोगों को अपने जीवन में सबसे पहले पूरा करना चाहिए। यदि तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं करते हो, तो तुम मानक पर खरा उतरने वाले एक सृजित प्राणी नहीं हो। दूसरों की नजर में, तुम एक नेक पत्नी और प्यारी माँ, एक सक्षम गृहिणी, एक संतानोचित संतान और समाज की एक अच्छी सदस्य हो सकती हो, लेकिन परमेश्वर के सामने तुम एक ऐसी इंसान हो जो उसके खिलाफ विद्रोह करती है, जो परमेश्वर में विश्वास तो करती है लेकिन एक सृजित प्राणी के कर्तव्य और दायित्व को पूरा नहीं करती, जो परमेश्वर में विश्वास तो करती है लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करती, सच्चे मन से परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करती और उसे उजागर किया जाएगा और हटा दिया जाएगा। क्या ऐसी इंसान परमेश्वर की स्वीकृति पा सकती है? ऐसे लोग व्यर्थ होते हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है)। मैं एक सृजित प्राणी हूँ और अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से पूरा करना मेरी जिम्मेदारी है। अगर मैं अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से नहीं निभा सकती तो मैं परमेश्वर का उद्धार पाने के योग्य नहीं हूँ। भले ही मैं एक नेक पत्नी और प्यारी माँ हूँ, इसका मतलब यह नहीं है कि मैं सत्य का अभ्यास कर रही हूँ और इसे परमेश्वर की स्वीकृति नहीं है। पहले मैं पारंपरिक संस्कृति के अनुसार जीती थी, हमेशा एक नेक पत्नी और प्यारी माँ होने और अपने कर्तव्यों को निभाने के बीच संघर्ष करती रहती थी। इसने मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से थका दिया था और मैं असहनीय पीड़ा में थी। अब मैं परमेश्वर का इरादा समझ गई। एक व्यक्ति के जीवन में सब कुछ परमेश्वर से आता है, मैं किसी भी व्यक्ति की कर्जदार नहीं थी और मुझ पर सबसे बड़ा कर्ज परमेश्वर का था। सत्य का अनुसरण करना और अपने कर्तव्यों को पूरा करना ही सबसे सार्थक है। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और अपनी बहू को परमेश्वर के हाथों में सौंपते हुए पहले अपना कर्तव्य अच्छे से करना चुना। बाद में मुझे पता चला कि मेरी बहू के बच्चे के जन्म के समय सब कुछ सुचारू रूप से हो गया और मेरे बेटे और बहू ने भी उनकी देखभाल करने न जाने के लिए मुझे दोष नहीं दिया। मैंने अपने दिल में परमेश्वर का धन्यवाद किया।
बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा और यह समझा कि हमें अपने वयस्क बच्चों के साथ कैसे पेश आना चाहिए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर में विश्वास रखने वाले व्यक्ति के रूप में अगर तुम सत्य का अनुसरण करना चाहते हो और उद्धार प्राप्त करना चाहते हो तो अपने शेष जीवन में तुम्हारे पास जो ऊर्जा और समय है उसे अपने उस कर्तव्य में जो तुम निभाते हो और परमेश्वर ने तुम्हें जो कुछ भी सौंपा है उसमें खपाना चाहिए; तुम्हें अपने बच्चों पर कोई समय नहीं खपाना चाहिए। तुम्हारा जीवन तुम्हारे बच्चों का नहीं है और इसे उनके जीवन या जीवित बचे रहने के लिए नहीं खपा देना चाहिए, न ही उनके लिए अपनी अपेक्षाओं को संतुष्ट करने में लगाना चाहिए। इसके बजाय, अपना जीवन उस कर्तव्य और आदेश को समर्पित करना चाहिए जो परमेश्वर ने तुम्हें सौंपे हैं और साथ ही उस मिशन को समर्पित करना चाहिए जो तुम्हें एक सृजित प्राणी के रूप में पूरा करना चाहिए। इसी में तुम्हारे जीवन का मूल्य और अर्थ निहित है। अगर तुम अपनी गरिमा खोने, अपने बच्चों का गुलाम बनने, उनकी फिक्र करने, और उनसे अपनी अपेक्षाएँ संतुष्ट करने हेतु उनके लिए कुछ भी करने को तैयार हो, तो ये सब निरर्थक हैं, मूल्यहीन हैं, और इन्हें याद नहीं रखा जाएगा। अगर तुम ऐसा ही करते रहोगे और इन विचारों और क्रियाकलापों को छोड़ोगे नहीं, तो इसका बस एक ही अर्थ हो सकता है कि तुम सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति नहीं हो, तुम एक ऐसे सृजित प्राणी नहीं हो जो मानक स्तर का है और तुम काफी विद्रोही हो, तुम उस जीवन और समय को नहीं सँजोते हो जो तुम्हें परमेश्वर ने प्रदान किया है। अगर तुम्हारा जीवन और तुम्हारा समय सिर्फ तुम्हारी देह और स्नेह पर खर्च होते हैं, परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिए गए कर्तव्य पर नहीं, तो तुम्हारा जीवन अनावश्यक और मूल्यरहित है। तुम जीने के योग्य नहीं हो, तुम उस जीवन का आनंद लेने के योग्य नहीं हो जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है और तुम ऐसी किसी भी चीज का आनंद लेने के योग्य नहीं हो जो परमेश्वर ने तुम्हें प्रदान की है। परमेश्वर तुम्हें बच्चे केवल इसलिए प्रदान करता है ताकि तुम उन्हें पालने की प्रक्रिया का आनंद ले सको, माता-पिता के रूप में इससे जीवन का अनुभव प्राप्त कर सको और मानवजाति की भावी पीढ़ियों को आगे बढ़ाने का विशेष और असाधारण अनुभव प्राप्त कर सको। बेशक, यह माता-पिता के रूप में एक सृजित प्राणी की जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए भी है। यह वह जिम्मेदारी है जिसे परमेश्वर ने तुम्हारे लिए अगली पीढ़ी के प्रति पूरा करने के लिए नियत किया है, साथ ही वह भूमिका भी है जो तुम अगली पीढ़ी के लिए माता-पिता के रूप में निभाते हो। एक ओर, परमेश्वर ने तुम्हें बच्चे इसलिए दिए ताकि तुम बच्चों को पालने की असाधारण प्रक्रिया का अनुभव कर सको, और दूसरी ओर, ताकि तुम भावी पीढ़ियों को आगे बढ़ाने में एक भूमिका निभा सको। एक बार जब यह दायित्व पूरा हो जाता है, और तुम्हारे बच्चे वयस्क हो जाते हैं, तो वे चाहे बहुत सफल हों या बस सादे और साधारण व्यक्ति बने रहें, इसका तुमसे कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि उनकी नियति कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे तुम निर्धारित करने में सक्षम हो, न ही यह तुम्हारे लिए चुनने का विकल्प है और यह तो और भी कम सच है कि यह उन्हें तुम्हारे द्वारा प्रदान की जाती है—यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है। चूँकि यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है, इसलिए तुम्हें उनके जीवन या उनके अस्तित्व में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए या अपनी नाक नहीं घुसानी चाहिए। उनकी आदतें, दैनिक दिनचर्या, और जीवन के प्रति दृष्टिकोण, उनके पास जीवित रहने के जो भी तरीके हों, जीवन के प्रति जो भी दृष्टिकोण हो, दुनिया के प्रति जो भी उनका रवैया हो, वे जिस भी मार्ग का अनुसरण करें—ये तुम्हारा सरोकार नहीं हैं। इन मामलों को अपने ऊपर लेने के कारण पीड़ा सहने की तुम्हारी कोई बाध्यता नहीं है, और तुम्हारे पास यह सुनिश्चित करने का भी कोई साधन नहीं है कि वे हर दिन खुशी से जिएँ। इस संबंध में तुम्हारे सभी प्रयास अनावश्यक हैं। ... इसलिए, बच्चों के बड़े हो जाने के बाद माता-पिता के लिए सबसे तर्कपूर्ण रवैया जाने देने का है, उन्हें जीवन को खुद अनुभव करने देने का है, उन्हें स्वतंत्र रूप से जीने देने का है, और जीवन की विविध चुनौतियों का स्वतंत्र रूप से सामना कर उनसे निपटने और उन्हें सुलझाने देने का है। अगर वे तुमसे मदद माँगें, और तुम ऐसा करने में सक्षम और सही हालात में हो, तो बेशक तुम मदद कर सकते हो, और जरूरी सहायता दे सकते हो। लेकिन तुम्हें एक तथ्य समझना होगा : तुम चाहे जो भी मदद करो, चाहे यह वित्तीय हो या मानसिक, यह सिर्फ अस्थायी हो सकती है और किसी भी सारभूत मसले का समाधान नहीं कर सकती है। उन्हें जीवन में अपने मार्ग का संचालन खुद करना है और उनके किसी भी मामले या नतीजे की जिम्मेदारी लेने को तुम बिल्कुल बाध्य नहीं हो। यही वह रवैया है जो माता-पिता को अपने वयस्क बच्चों के प्रति रखना चाहिए” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (19))। परमेश्वर के वचनों ने मुझे समझाया कि एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्यों को पूरा करके ही मेरे जीवन का मूल्य और अर्थ हो सकता है। मुझे अपना जीवन सिर्फ अपने बच्चों को संतुष्ट करने के लिए या सिर्फ उनके लिए कीमत चुकाने और खुद को खपाने के लिए नहीं जीना चाहिए। जब मेरे बच्चे छोटे थे, मैंने उनकी ध्यान से देखभाल की; जब वे बड़े हो गए तो माता-पिता के रूप में मेरी जिम्मेदारियाँ पूरी हो गईं और तब मुझे उन्हें छोड़ देना चाहिए और उन्हें जीवन का अनुभव करने देना चाहिए। उसके बाद उन्हें कैसे जीना चाहिए या उनका जीवन क्या मोड़ लेता है, इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। अगर मैं सक्षम हूँ तो मुझे मदद करनी चाहिए, लेकिन अगर नहीं कर सकती तो मुझे कर्जदार महसूस नहीं करना चाहिए। क्योंकि एक व्यक्ति का भाग्य परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित होता है, माता-पिता अपने बच्चों का भाग्य नहीं बदल सकते। अब मुझे अपनी सारी ऊर्जा अपने कर्तव्यों पर केंद्रित करनी चाहिए, अपनी कमियों को पूरा करने के लिए खुद को और अधिक सत्य सिद्धांतों से युक्त करना चाहिए, अपने भ्रष्ट स्वभावों को हल करने के लिए सत्य का अनुसरण करना चाहिए, सत्य का अभ्यास करना चाहिए और सिद्धांतों के अनुसार काम करना चाहिए। यही परमेश्वर को प्रसन्न करता है।
इसका अनुभव करने के बाद मैं समझ गई कि अगर लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन परमेश्वर के वचनों के अनुसार चीजों को नहीं देखते हैं और अगर वे खुद को शैतान की पारंपरिक सांस्कृतिक सोच, सांसारिक व्यवहार के उसके फलसफों और शैतानी विष से मुक्त करने के लिए सत्य का उपयोग नहीं करते हैं, तो वे कभी भी मुक्ति प्राप्त नहीं कर पाएँगे। परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने से ही कोई शैतान के बंधनों और बाधाओं से मुक्त हो सकता है, सच्ची मुक्ति और स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है। उद्धार करने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद!