8. नए विश्वासियों को सींचने का एक खास अनुभव

जॉर्जिना, म्यांमार

अगस्त 2021 में, मैं कलीसिया में नए विश्वासियों को सींच रही थी। कुछ समय तक मैंने तीन नए विश्वासियों का सिंचन ऑनलाइन किया। ये तीनों नए विश्वासी सभाओं में शामिल होने के लिए बहुत उत्सुक थे, लेकिन उनके गाँव में इंटरनेट नहीं था, इसलिए उन्हें कनेक्शन के लिए बहुत दूर पहाड़ों पर जाना पड़ता था, फिर भी वे हर सभा में शामिल होते थे। उनसे बात करते हुए मुझे पता चला कि उनके दो पड़ोसी गाँवों में सौ-सौ से भी ज्यादा लोगों को अभी परमेश्वर का अंत के दिनों का सुसमाचार सुनना था। मैंने इन लोगों को परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य के बारे में गवाही देने और उन्हें परमेश्वर के सामने लाने की जिम्मेदारी महसूस की। एक सभा के दौरान मैंने मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के इरादे के बारे में इन तीन नए विश्वासियों के साथ संगति की और उन्हें परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़कर सुनाया : “एक के बाद एक सभी तरह की आपदाएँ आ पड़ेंगी; सभी देश और स्थान आपदाओं का सामना करेंगे : हर जगह महामारी, अकाल, बाढ़, सूखा और भूकंप हैं। ये आपदाएँ बस एक-दो जगहों पर नहीं आ रही हैं, न ही वे एक-दो दिनों में समाप्त होंगी, बल्कि वे अधिकाधिक बड़े क्षेत्र तक फैल जाएँगी और अधिकाधिक गंभीर होती जाएँगी। इस दौरान एक के बाद एक तमाम तरह के कीट-प्रकोप आएँगे, और हर जगह नरभक्षण की घटनाएँ होंगी। असंख्य देशों और लोगों पर यह मेरा न्याय है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 65)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैंने संगति की, “परमेश्वर के वचन धीरे-धीरे पूरे हो रहे हैं, और आपदाएँ दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही हैं। दूसरे देश ही आपदाओं का सामना नहीं कर रहे हैं, हमारा वा प्रांत भी एक गंभीर महामारी से जूझ रहा है। शहरों और गाँवों में लॉकडाउन लगा है और बहुत से लोग क्वारंटीन में हैं। क्वारंटीन के दौरान कुछ लोगों ने खाना-पानी न होने की वजह से कूदकर अपनी जान दे दी और कुछ ने वायरस का संक्रमण होने के बाद क्वारंटीन का खर्च न उठा पाने के कारण फाँसी लगा ली। कुछ लोग जो काम करने बाहर गए थे, लॉकडाउन के कारण घर नहीं लौट पाए, उनके परिवार के सदस्य मर गए और वे उन्हें आखिरी बार देख भी नहीं पाए। हर दिन अनगिनत लोग संक्रमित हो रहे हैं, और मरने वालों की संख्या का कोई हिसाब नहीं है। आज हम भले ही ठीक हों, लेकिन कोई नहीं जानता कि कल क्या होगा। हम भाग्यशाली हैं कि हमने परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया है और उसके वचन सुने हैं। हमें जल्द-से-जल्द अपने परिवारों, पड़ोसियों और दोस्तों को परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए, ताकि वे भी परमेश्वर की आवाज सुन सकें, उसके सामने आ सकें, सत्य पा सकें और उसका उद्धार प्राप्त कर सकें। अगर हम अभी उन्हें सुसमाचार का प्रचार नहीं करते हैं और किसी दिन वे संक्रमित होकर गुजर जाते हैं तो क्या हमें इसका पछतावा नहीं होगा? लेकिन तब अगर हम रो-रोकर बेहाल भी हो जाएँ तो कोई फायदा नहीं होगा। क्या तुम लोग अपने गाँव में सुसमाचार का प्रचार करने को तैयार हो?” यह सुनकर, वे सब ऐसा करने के लिए तैयार हो गए। अगली शाम को वे कई संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ताओं को लेकर आए। उनमें एक गाँव के मुखिया का बेटा था और एक अकाउंटेंट था जिसकी गाँव में अपेक्षाकृत ऊँची प्रतिष्ठा थी। सुसमाचार प्रचारक ने उनके साथ सच्चे परमेश्वर और झूठे परमेश्वरों के बीच भेद पहचानने के सत्य पर संगति की और इस पर भी कि केवल सच्चे परमेश्वर में विश्वास करने से ही कोई आपदाओं में सुरक्षित रह सकता है, और यह भी कि जो लोग झूठे परमेश्वरों में विश्वास करते हैं वे केवल आपदाओं में गिर पड़ेंगे और अंत में आग और गंधक की झील में जा गिरेंगे। उनमें से कुछ ने परमेश्वर के वचन सुनने के बाद समझ लिया कि केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही एकमात्र सच्चा परमेश्वर है जो पूरी मानवजाति को बचा सकता है। वे परमेश्वर के वचन सुनकर खुश थे और भाव-विह्वल होकर रो पड़े। बाद में वे परमेश्वर के वचन सुनने के लिए अपने उन रिश्तेदारों और दोस्तों को लेकर आए जिनकी मानवता अपेक्षाकृत अच्छी थी। बस बीस से अधिक दिनों में इन दो गाँवों के सौ से ज़्यादा लोग परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की जाँच करने आ गए और मैं उनमें से साठ से ज़्यादा लोगों को सींचने के लिए ज़िम्मेदार थी। मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि इतने सारे लोग एक साथ परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार कर लेंगे।

बाद में दोनों गाँवों से अधिकाधिक लोग सच्चे मार्ग की जाँच करने आए। एक पड़ोसी गाँव के जिला अधिकारी को पता चला कि गाँव वाले हमारे उपदेश सुन रहे हैं और उसने गश्त और निरीक्षण करने के लिए गाँव की मिलिशिया को जुटा लिया। सोलह ऐसे नए विश्वासियों को गिरफ्तार कर लिया गया जिन्होंने सच्चे मार्ग की जाँच अभी-अभी शुरू की थी और उन पर जुर्माना भी लगाया गया। मिलिशिया के दिन-रात गश्त करने की वजह से, गाँव वाले गाँव में उपदेश सुनने की हिम्मत नहीं करते थे, और कुछ ने तो सभाओं के लिए पहाड़ पर आना भी बंद कर दिया था। चूँकि गाँव में इंटरनेट नहीं था, ऐसे में जब तक नए विश्वासी इंटरनेट से जुड़ने और मुझसे संपर्क करने का तरीका नहीं ढूँढ़ लेते, उनसे संपर्क करना वाकई मुश्किल था। उस पल मुझे लगा कि अब सब खत्म हो गया। दूसरों को सुसमाचार सुनाने की तो बात ही छोड़ो, जिन नए विश्वासियों ने पिछले दो दिनों में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया ही था, वे भी शायद अडिग न रह पाएँ। तभी, एक सभा समूह का अगुआ इंटरनेट सुविधा ढूँढ़ने के लिए पहाड़ पर चढ़ा और मेरे संपर्क में आ गया। उसने कहा, “अभी स्थिति वास्तव में खराब है और पुलिस और मिलिशिया वाले हर दिन सब जगह गश्त कर रहे हैं। क्या हम महीने में सिर्फ एक बार सभा कर सकते हैं?” मैंने मन में सोचा, “इससे काम नहीं चलेगा। नए विश्वासियों का आध्यात्मिक कद छोटा है; वे बहुत से सत्य नहीं समझते और उन्हें लगातार सींचने और सहारे की ज़रूरत है। चाहे कुछ भी हो जाए, हमें यह पक्का करना होगा कि नए विश्वासी सभाओं में शामिल हो सकें।” मैंने और समूह अगुआ ने यह डॉक्यूमेंट्री देखी : “वह जिसका हर चीज़ पर प्रभुत्व है”। मैंने कहा, “जब मूसा इस्राएलियों को मिस्र से बाहर ले गया, तो उनके आगे लाल सागर था और पीछे थे पीछा करते सैनिक। आगे कोई रास्ता नहीं था, लेकिन उन्होंने खुद को शांत किया, परमेश्वर से प्रार्थना की, उस पर निर्भर रहे और परमेश्वर ने उनके लिए एक रास्ता खोल दिया। उन्होंने परमेश्वर के अधिकार को देखा। परमेश्वर ने लाल सागर को दो हिस्सों में बाँट दिया और बीच में सूखी जमीन प्रकट कर दी। इस्राएली लाल सागर पार कर गए, जबकि पीछा करने वाली सेना पानी में डूब गई। यह दिखाता है कि परमेश्वर उनका निश्चित रूप से मार्गदर्शन करेगा जिन्हें बचाने का उसने निश्चय कर लिया है।” फिर मैंने उसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़कर सुनाया : “परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर किए जाने वाले कार्य का हर कदम बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो यह मानव-व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय विघ्न से उत्पन्न हुआ हो। किंतु, कार्य के प्रत्येक कदम, और घटित होने वाली हर चीज के पीछे शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाजी है और इनमें अपेक्षित है कि लोग परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब का परीक्षण हुआ : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ शर्त लगा रहा था और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे और मनुष्यों के विघ्न थे। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों पर किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाजी होती है—इसके पीछे एक लड़ाई होती है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है)। फिर मैंने संगति की, “ऊपर से ऐसा लगता है कि यह अधिकारी परमेश्वर में हमारे विश्वास में अड़चन डाल रहा है, लेकिन इसके पीछे शैतान का विघ्न है। शैतान नहीं चाहता कि हम परमेश्वर के वचन सुनें, इसलिए वह हम पर अत्याचार करने और हमें गिरफ्तार करने के लिए अधिकारी का इस्तेमाल कर रहा है ताकि हम अपनी आस्था छोड़ने को मजबूर हो जाएँ। ठीक वैसे ही जैसे जब अय्यूब का परीक्षण किया गया और उसने अपनी सारी दौलत खो दी, तो ऊपर से यह लुटेरों का काम लग रहा था, लेकिन असल में यह शैतान था जो अय्यूब को ललचा रहा था और उस पर हमला कर रहा था। जब अय्यूब ने इन सभी परीक्षणों का सामना किया, तो उसने परमेश्वर से कोई शिकायत नहीं की, बल्कि यहोवा परमेश्वर के नाम की स्तुति की। शैतान ने अय्यूब को चाहे जैसे भी बाधित किया, उसने परमेश्वर को नहीं त्यागा और अंत में शैतान लज्जित हुआ और पीछे हट गया। अब, अधिकारी के विघ्न और उत्पीड़न का सामना करते हुए, अगर हम इतने बाधित हो जाएँ कि महीने में सिर्फ एक बार परमेश्वर के वचन सुनें, तो क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि शैतान की साजिश कामयाब हो गई है? अगर हम ऐसी स्थिति में सभा करने में जुटे रहते हैं, तो शैतान लज्जित होगा।” मेरी संगति सुनने के बाद समूह अगुआ ने कहा कि वह वापस जाने और इन नए विश्वासियों को सभाओं के लिए बुलाने को तैयार है। समूह अगुआ की संगति के माध्यम से नए विश्वासियों ने एक के बाद एक कहा, “जब तक परमेश्वर अनुमति नहीं देता है, कुछ भी नहीं हो सकता है। हम गिरफ्तार होंगे या नहीं, यह परमेश्वर के हाथों में है। शैतान हमसे आस्था छुड़वाने और हमें नरक में घसीटने के लिए सरकार की बाधा का इस्तेमाल करना चाहता है। चाहे वे हमारा जिस तरह भी उत्पीड़न करें, हम निश्चित रूप से परमेश्वर का अनुसरण करेंगे और अपनी आस्था कभी नहीं छोड़ेंगे।” यूँ तो स्थिति बहुत शत्रुतापूर्ण थी, फिर भी कुछ ज़्यादा उत्सुक नए विश्वासी सभाओं में शामिल होने के लिए इंटरनेट सिग्नल पाने के तरीके ढूँढ़ ही लेते थे। लेकिन, चूँकि उनकी सभा की जगहों का पता चल चुका था, वे अब पहले की तरह साठ या सत्तर के समूहों में जमा नहीं हो सकते थे और हर सभा की जगह पर ज्यादा-से-ज्यादा लगभग बीस लोग ही हो सकते थे। जब हम छोटी-छोटी सभाओं की व्यवस्था करने की तैयारी कर ही रहे थे, हमने एक और मुश्किल का सामना किया। क्योंकि नए विश्वासियों के पास सिर्फ दो ही सिम कार्ड थे जिनसे इंटरनेट चल सकता था, इसलिए अगर वे सभा के लिए अलग-अलग बैठते तो सिम कार्ड सबके लिए पर्याप्त नहीं होते और कुछ ग्रामीण अभी भी परमेश्वर के वचन नहीं सुन पाते। साथ ही, सभा करने के लिए बीस लोगों द्वारा एक ही फोन इस्तेमाल करने पर जब कनेक्शन कमजोर होता था तो कुछ लोग संगति साफ-साफ नहीं सुन पाते थे और सभाओं के अच्छे नतीजे नहीं मिलते थे। चीजें वाकई कठिन लगने के कारण मैं हतोत्साहित महसूस करने लगी। उस समय, मैंने सोचा, “काश मैं खुद वहाँ जा पाती, तो मैं उन्हें आमने-सामने सींच सकती थी।” फिर मैंने पर्यवेक्षक के साथ अपने विचार साझा किए और वह मुझे स्थानीय इलाके में जाने देने पर सहमत हो गया।

उस शाम, मैं स्थानीय मेज़बान घर पहुँची। तभी नए विश्वासियों के समूह अगुआओं ने मुझे संदेश भेजा, तो मैंने उनसे अगले दिन दोपहर में भाइयों और बहनों को सभा के लिए बुलाने को कहा, मैंने उनसे कहा कि वे जितने ज़्यादा लोगों को बुला सकते हैं, बुलाएँ और कोई गुप्त जगह ढूँढ़ लें। अगले दिन, हम तय की हुई जगह पर पहुँचे, और मैं दंग रह गई। यह देखकर मेरे आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहा कि साठ से ज़्यादा नए विश्वासियों का समूह आ गया था और वे एक-एक करके मुझसे हाथ मिलाने और गले लगने आए, हर कोई उत्सुकता से अपना परिचय दे रहा था। वे आनंदित चिड़ियों के झुंड की तरह थे, और यह ऐसा कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। उस दिन की सभा के बाद, उन्होंने दूसरे गाँव के नए विश्वासियों को सुसमाचार सुनने के लिए बुलाया। तीसरे दिन समूह अगुआ हमें एक लंबे पहाड़ी रास्ते पर ले गया और हमने एक शांत, गुप्त जगह ढूँढ़ ली। लगभग पचास नए विश्वासी आए थे। लेकिन जब हम सभा कर रहे थे तो गायें चरा रहे एक अविश्वासी ने हमें देख लिया। मैंने सोचा, “क्या वह मेरी शिकायत कर देगा? क्या अधिकारी या पुलिस वाले मुझे गिरफ्तार करने आ जाएंगे?” मैंने भाग जाने के बारे में सोचा। लेकिन उसी पल, मुझे परमेश्वर के वचन का एक अंश याद आया जो मैंने पहले पढ़ा था : “मसीह-विरोधी अपनी सुरक्षा बनाए रखने के लिए हरसंभव प्रयास करते हैं। वे मन ही मन यह सोचते हैं : ‘मुझे अपनी सुरक्षा अवश्य सुनिश्चित करनी चाहिए। चाहे जो भी पकड़ा जाए, मैं न पकड़ा जाऊँ।’ ... अगर कोई स्थान सुरक्षित होता है तो मसीह-विरोधी उस स्थान को कार्य करने के लिए चुनेंगे और बेशक, वे बहुत सक्रिय और सकारात्मक दिखाई देंगे, अपनी महान ‘जिम्मेदारी की भावना’ और ‘वफादारी’ दिखाएंगे। अगर किसी कार्य को करने का अर्थ यह होता है कि उन्हें जोखिम लेना है और इस बात की बड़ी संभावना है कि वे खतरे में पड़ जाएंगे, कि वे बड़े लाल अजगर द्वारा ढूँढ़ लिए जाएंगे तो वे बहाने बना देते हैं और इससे इनकार कर देते हैं और इससे बचकर भागने का मौका तलाशते हैं। जैसे ही कोई खतरा होता है या जैसे ही खतरे का कोई संकेत होता है तो वे खुद को बचाने और अपना कर्तव्य त्यागने का हर संभव तरीका सोचते हैं, वे भाई-बहनों की परवाह नहीं करते और बस खुद खतरे से बाहर निकलने से वास्ता रखते हैं। हो सकता है उन्होंने खुद को दिमागी तौर पर पहले से ही तैयार कर लिया हो : जैसे ही खतरा प्रकट होता है, वे वह सारा काम तुरंत छोड़ देते हैं जिसे वे कर रहे होते हैं, वे इस बात की परवाह नहीं करते हैं कि कलीसिया का कार्य कैसे चलेगा या इससे परमेश्वर के घर के हितों या भाई-बहनों की सुरक्षा को क्या नुकसान हो सकता है—उनके लिए जो मायने रखता है वह है भागना। यहाँ तक कि उनके पास एक ‘तुरुप का इक्का,’ खुद को बचाने की एक योजना भी होती है : जैसे ही उन पर खतरा मँडराता है या उन्हें गिरफ्तार किया जाता है, वे जो कुछ भी जानते हैं, अपनी सुरक्षा बनाए रखने के लिए वह सब कह देते हैं और खुद को पाक-साफ बताकर तमाम जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। उनके पास यह योजना तैयार रहती है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग दो))। मसीह-विरोधी लोग जब कोई खतरा नहीं होता तो सामान्य रूप से अपने कर्तव्य और काम कर सकते हैं, लेकिन जब खतरा आता है, तो वे सबसे पहले अपनी सुरक्षा के बारे में सोचते हैं। वे अपनी सुरक्षा को सबसे महत्वपूर्ण चीज मानते हैं और कलीसिया के हितों के लिए कोई परवाह नहीं दिखाते हैं। मसीह-विरोधी बेहद स्वार्थी और नीच होते हैं, और उनमें ज़रा भी ज़मीर या विवेक नहीं होता। मेरा अपना व्यवहार भी बिल्कुल एक मसीह-विरोधी जैसा ही था। शुरुआत में मैं नए विश्वासियों के साथ संगति करने के लिए पहाड़ चढ़ने में सक्षम थी और मैं कुछ कार्य करती हुई और कुछ कष्ट सहती हुई लगती थी, लेकिन जैसे ही मेरी अपनी सुरक्षा पर आँच आई, मैं अपना कर्तव्य छोड़कर भाग जाना चाहती थी। मैं अपनी सुरक्षा को बाकी सब चीजों से ऊपर रख रही थी और मैंने पहले इन नए विश्वासियों के लिए व्यवस्थाएँ करने के बारे में कभी नहीं सोचा। इतने सारे नए विश्वासी अगर गिरफ्तार कर लिए गए तो प्रबल संभावना है कि वे अपने छोटे आध्यात्मिक कद की वजह से आस्था छोड़ देंगे, फिर भी मुझे सिर्फ खुद को खतरे से बाहर निकालने की परवाह थी। मैं सच में स्वार्थी थी! यह सोचकर, मैंने जल्दी से नए विश्वासियों को सुरक्षित जगहों पर पहुँचा दिया। कुछ खाइयों में छिप गए, कुछ घास में, और कुछ जंगल में। चरवाहे के जाने के बाद, हमने सभा जारी रखी, और कुछ भाइयों को पहरा देने के लिए लगा दिया। सभा के बाद, हमने अगली सभा का समय तय किया।

बाद में सौ से अधिक लोगों ने परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार कर लिया। उस समय दोनों गाँवों के नए विश्वासियों की संख्या लगभग दो सौ हो गई थी। इतने सारे लोगों का परमेश्वर के वचन सुनने आना अधिकारी का और भी ज़्यादा ध्यान खींचने लगा और उसने गाँव के अविश्वासियों और यहाँ तक कि प्राइमरी स्कूल के छात्रों को भी पहाड़ पर गश्त करने का आदेश दिया। अधिकारी ने यह भी कहा कि अगर वे हमारी सभा की जगह ढूँढ़ लेते हैं, तो हर एक को सौ युआन का इनाम दिया जाएगा। उस समय, न केवल गाँव में बल्कि पहाड़ पर भी गश्त होती थी। इसलिए स्थिति बिगड़ती चली गई, लेकिन हर दिन, नए विश्वासी अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को परमेश्वर के वचन सुनने के लिए लाते रहे, यहाँ तक कि दोनों गाँवों के मुखिया और उप-मुखिया भी परमेश्वर के वचन सुनने आए। अधिकारी के ज़ुल्म के कारण, हमें लगातार अपनी सभा की जगह बदलनी पड़ती थी। कभी हम खेतों में सभा करते, कभी रेतीले इलाकों में, कभी जंगलों में, और कभी-कभी हमें सभा करने के लिए पहाड़ों में बहुत दूर जाना पड़ता था। जब मैं नए विश्वासियों को सींचने जाती, तो हर दिन अधिकारी के घर के पास से गुज़रती थी। वह मेरे रास्ते में पड़ता था और मैं इससे बच नहीं सकती थी, और मुझे अक्सर चिंता होती थी कि अधिकारी और पुलिस वाले मुझे देख लेंगे और फिर अधिकारी के गेट के ठीक सामने अचानक मुझे रोक और गिरफ्तार कर लेंगे। अगर मैं गिरफ्तार हो गई और मेरे परिवार को पता चल गया तो मैं क्या करूँगी? वे पहले से ही मेरी आस्था का विरोध करते थे; अगर उन्हें पता चला कि मैं गिरफ्तार हो गई हूँ तो क्या वे मुझ पर और भी ज़्यादा ज़ुल्म नहीं करेंगे? यह होने का ख्याल हर दिन मेरे दिमाग में घूमता रहता था और इसके बारे में सोचने भर से मैं बहुत डर जाती थी। हर दिन जब मैं नए विश्वासियों को सींचने जाती, तो मैं सच में सहमी हुई रहती थी। अधिकारी के घर के पास से गुज़रते समय, मेरी साँस तक लेने की हिम्मत नहीं होती थी, और मैं अपनी मोटरसाइकिल तेज़ी से भगाकर निकल जाती, पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत भी नहीं करती थी। जब मैं डरती, तो मन ही मन परमेश्वर को पुकारती थी। मुझे परमेश्वर के वचनों का एक भजन याद आया, “परमेश्वर विश्वास को पूर्ण बनाता है” : “कार्य के इस चरण में हमसे परम आस्था और प्रेम की अपेक्षा की जाती है। थोड़ी-सी लापरवाही से हम लड़खड़ा सकते हैं, क्योंकि कार्य का यह चरण पिछले सभी चरणों से अलग है : परमेश्वर लोगों की आस्था को पूर्ण कर रहा है—जो कि अदृश्य और अमूर्त दोनों है। परमेश्वर ऐसा करता है कि वचन आस्था में, प्रेम में और जीवन में परिवर्तित हो जाते हैं। लोगों को उस बिंदु तक पहुँचने की आवश्यकता है जहाँ वे सैकड़ों बार शुद्धिकरणों का सामना कर चुके हैं और अय्यूब से भी ज़्यादा आस्था रखते हैं जिसमें वांछित है कि किसी भी समय परमेश्वर से दूर जाए बिना वे अविश्वसनीय पीड़ा और सभी प्रकार की यातनाओं को सहें। जब वे मृत्यु तक समर्पित रहते हैं, और परमेश्वर में अत्यंत विश्वास रखते हैं, तो परमेश्वर के कार्य का यह चरण पूरा हो जाता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मार्ग ... (8))। जब मैं यह भजन गाती थी तो मुझे अंदर से हिम्मत मिलती थी। मैं समझ गई कि परमेश्वर ने यह स्थिति इसलिए आने दी है ताकि मैं उसके वचनों को अनुभव करूँ और उसमें अपनी आस्था मजबूत करूँ। इस गाँव में आने से पहले मुझे लगता था कि मुझे परमेश्वर में बड़ी आस्था है, लेकिन मेरे साथ घटित होने वाले तथ्यों ने मेरा असली आध्यात्मिक कद प्रकट कर दिया। मैंने देखा कि परमेश्वर में मेरी आस्था बहुत कम थी। परमेश्वर मेरी आस्था को पूर्ण बनाने के लिए ज़ुल्म के इस माहौल का इस्तेमाल कर रहा था। मैं इसका अनुभव करने के लिए परमेश्वर पर निर्भर होने को तैयार हो गई। बाद में अधिकारी का ज़ुल्म और भी कठोर हो गया। उसने ग्रामीणों से कहा कि जो भी सभा करते हुए देखा जाए उसकी रिपोर्ट दी जाए और उन्हें एक विश्वासी की सूचना देने पर 500 युआन और दो की सूचना देने पर 1,000 युआन का इनाम मिलेगा। मुझे लगा कि वे लोग एकदम दुष्ट थे। हमने परमेश्वर में विश्वास करके कोई अपराध नहीं किया था, फिर भी वे हमें पकड़ने के लिए किसी भी हद तक जा रहे थे। मुझे अपने दिल में उनसे सच में नफ़रत हो गई। उनके द्वारा ढूँढ़ लिए जाने से बचने के लिए हमने सभा का समय सुबह 10 बजे से बदलकर सुबह 6 बजे कर दिया। यह दिसंबर का महीना था और बहुत ठंड थी, लेकिन नए विश्वासी तब भी उत्साह से सभाओं में आते थे। कुछ 60 साल से ज़्यादा उम्र के थे और फिर भी सभा में डटे रहते थे, कुछ अपने पूरे परिवार के साथ आते थे और कुछ तो सिर्फ एक महीने के बच्चों को गोद में उठाकर सभा के लिए पहाड़ पर आते थे। यह देखकर कि वे सक्रिय रूप से सभाओं में भाग ले रहे थे, मैं यह सोचकर बहुत भावुक और शर्मसार भी हो गई कि कैसे मेरी आस्था उतनी मजबूत नहीं है जितनी उनकी है। मैं इस शैतानी शासन से भी नफ़रत करती थी, जो लोगों को परमेश्वर के वचन सुनने से रोकने के लिए, गाँवों में हर व्यक्ति को गश्त करने और विश्वासियों की सूचना देने के लिए लामबंद तक कर रहा था। इसके बावजूद सुसमाचार के कार्य पर बिल्कुल भी असर नहीं पड़ा और सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का सुसमाचार इस क्षेत्र में फैलता रहा। साथ ही, गश्त करने वाले हमें एक बार भी ढूँढ़ नहीं पाए। हम परमेश्वर की सुरक्षा के लिए सच में कृतज्ञ थे!

एक दिन मेरा अविश्वासी पति अचानक सेना से घर लौट आया। उसे नए साल पर वापस आना था, लेकिन इस बार वह अचानक जल्दी घर आ गया। उसने देखा कि मैं घर पर नहीं हूँ और यह पूछने के लिए फोन किया कि मैं कहाँ चली गई हूँ और मुझसे कहा कि अगली सुबह तुरंत घर वापस आ जाऊँ। अगले दिन जब उसने देखा कि मैं नहीं लौटी हूँ तो मुझे एक मैसेज भेजा। उस समय मेरे पास इंटरनेट नहीं था और मैंने उसे जवाब नहीं दिया और वह बहुत नाराज़ हो गया। बाद में मेरा पति फोन करता रहा और मुझे घर लौटने के लिए कहता रहा, यहाँ तक कि अगर मैं जल्दी वापस नहीं आई तो मुझे तलाक देने की धमकी भी दी। मैं कमज़ोर पड़ गई। मेरा परिवार पहले से ही परमेश्वर में मेरे विश्वास का विरोध करता था और मेरी सास अक्सर मेरे पति को मुझे तलाक देने के लिए जोर देती थी। अगर मैं घर वापस नहीं गई तो क्या मेरा पति सच में मुझे तलाक दे देगा? मेरा दिल दर्द से भर गया था, और मैं सोचने लगी, “क्या मुझे कुछ दिन के लिए घर चले जाना चाहिए?” लेकिन मैं जानती थी कि एक बार वापस जाने के बाद, मेरा फिर से निकलना मुश्किल हो जाएगा। इन नए विश्वासियों को कौन सींचेगा? मेरा दिल बहुत तड़प रहा था, और मैं अपने दिल में शिकायतें उमड़ने से रोक नहीं पाई। “परमेश्वर ने मेरे साथ ऐसा क्यों होने दिया? मेरा पति मुझे घर लौटने पर मजबूर कर रहा है और कह रहा है कि अगर मैं नहीं गई तो वह तलाक दे देगा। लेकिन अगर मैं घर चली गई तो अपना कर्तव्य कैसे निभा सकती हूँ?” मैं मन ही मन यह सोचती रही कि परमेश्वर का इरादा क्या है। सोचते-सोचते, मुझे अचानक परमेश्वर के वचन याद आए : “लोग परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं या नहीं, यह आकलन करने में मुख्य बात यह है कि वे उससे असंयत माँगें कर रहे हैं या नहीं, और उसके प्रति उनके गुप्त अभिप्राय हैं या नहीं। अगर लोग हमेशा परमेश्वर से माँगें करते हैं, तो यह साबित करता है कि वे उसके प्रति समर्पित नहीं हैं। तुम्हारे साथ चाहे जो भी हो, यदि तुम इसे परमेश्वर से आया मानकर स्वीकार नहीं करते, तुम सत्य की तलाश नहीं करते, हमेशा अपने लिए तर्क-वितर्क करते हो और हमेशा यह महसूस करते हो कि सिर्फ तुम सही हो, और यहाँ तक कि तुम अभी भी यह संदेह करने में सक्षम हो कि परमेश्वर सत्य और धार्मिकता है, तो तुम संकट में पड़ जाओगे। ऐसे लोग सबसे अहंकारी और परमेश्वर के प्रति विद्रोही होते हैं। जो लोग हमेशा परमेश्वर से माँगते रहते हैं, वे कभी सच्चे रूप से उसके प्रति समर्पण नहीं कर सकते। अगर तुम परमेश्वर से माँग करते हो, तो यह साबित करता है कि तुम उससे सौदा कर रहे हो, तुम अपनी ही इच्छा चुन रहे हो, और इसी के अनुसार कार्य कर रहे हो। ऐसा करके तुम परमेश्वर को धोखा दे रहे हो और तुममें समर्पण की कमी है। परमेश्वर से माँग करना अपने आप में ही समझ का अभाव है; अगर तुम्हें सचमुच विश्वास है कि वह परमेश्वर है, तो तुम उससे माँगने की हिम्मत नहीं करोगे, न तुम खुद को उससे माँग करने के योग्य समझोगे, फिर चाहे तुम इन माँगों को उचित समझो या नहीं। अगर तुममें परमेश्वर के प्रति सच्चा विश्वास है, और विश्वास करते हो कि वह परमेश्वर है, तो फिर तुम सिर्फ उसकी आराधना और उसके प्रति समर्पण करोगे, इसके सिवाय कोई विकल्प नहीं है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, लोग परमेश्वर से बहुत अधिक माँगें करते हैं)। मुझे एहसास हुआ कि मैं बिल्कुल वैसी ही थी जैसा परमेश्वर ने उजागर किया था। जब परमेश्वर ने ऐसी परिस्थितियाँ बनाईं जो मेरी इच्छाओं के अनुरूप थीं तो मैं समर्पण करने को तैयार थी, लेकिन जब वे मेरी इच्छाओं के अनुकूल नहीं थीं तो मैं समर्पण करने की इच्छुक नहीं थी और परमेश्वर से अविवेकपूर्ण माँगें करती रही। मुझे लगता था कि चूँकि मैं अपना कर्तव्य निभा रही थी और सुसमाचार का प्रचार कर रही थी, इसलिए परमेश्वर को मेरे पति के ज़ुल्म और बाधाओं से मेरी रखवाली और सुरक्षा करनी चाहिए और उसे जल्दी घर नहीं आने देना चाहिए, क्योंकि अगर वह घर लौट आता है तो मैं आगे सुसमाचार का प्रचार नहीं कर पाऊँगी। मैं चाहती थी कि परमेश्वर मेरी माँगें माने, और जब उसने ऐसा नहीं किया तो मैंने शिकायत की कि उसकी व्यवस्थाएँ अनुचित हैं और उससे मनमाने ढंग से बहस की। मैं सच में अविवेकपूर्ण थी! पहले जब मैं सुसमाचार का प्रचार करने के लिए घर छोड़ पाई थी तो मुझे लगा कि मेरा आध्यात्मिक कद बढ़ गया है और मैं परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में पहले ही सक्षम हो चुकी हूँ। अब, मैंने आखिरकार अपना असली आध्यात्मिक कद साफ-साफ देख लिया। यूँ तो मेरे साथ यह जो मामला घटित हुआ वह मेरी धारणाओं से मेल नहीं खाता था, फिर भी यह मेरे लिए खुद को समझने का एक अच्छा अवसर था।

मैंने इस बारे में सोचा कि कैसे ये नए विश्वासी परमेश्वर के वचनों के लिए उत्सुकता से लालायित रहते हैं। चाहे मौसम कितना भी ठंडा हो, सफर कितना भी लंबा हो या स्थिति कितनी भी विकट हो, फिर भी वे सभाओं में भाग लेने में जुटे रहते थे। अगर मैं घर वापस चली गई, तो उन्हें कौन सींचेगा? लेकिन अगर मैं वापस नहीं गई तो हो सकता है मैं तलाक का सामना करूँ। जब मैं फैसला करने के लिए संघर्ष कर रही थी, तभी मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया जो पर्यवेक्षक ने पहले साझा किया था : “क्या तू अपने कंधों के बोझ, अपने आदेश और अपने उत्तरदायित्व से अवगत है? ऐतिहासिक मिशन का तेरा बोध कहाँ है? तू अगले युग के स्वामी के रूप में उचित ढंग से सेवा कैसे करेगा? क्या तुझमें स्वामी होने का प्रबल बोध है? सभी चीजों के स्वामी का वर्णन कैसे किया जाना चाहिए? क्या वास्तव में वही संसार के समस्त सजीव प्राणियों और सभी भौतिक वस्तुओं का स्वामी है? कार्य के अगले चरण की प्रगति के लिए तेरे पास क्या योजनाएँ हैं? कितने लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि तू उनकी चरवाही करे? क्या तेरा काम बहुत भारी है? वे दरिद्र, दयनीय, अंधे और असहाय हैं और अंधकार में विलाप कर रहे हैं—मार्ग कहाँ है? वे कैसे रोशनी के लिए लालायित हैं, मानो एक टूटते तारे की तरह अचानक नीचे उतरे और अंधकार की उन शक्तियों को भगा दे जिन्होंने इतने सारे वर्षों से मनुष्यों का दमन किया है। वे इसके लिए दिन-रात व्याकुल होकर आस लगाए रहते हैं और लालायित रहते हैं—इसे पूरी तरह कौन जान सकता है? उस दिन भी जब रोशनी कौंधकर जाती है, गहन कष्ट सहते ये लोग रिहाई की उम्मीद के बिना अंधेरी कालकोठरी में कैद रहते हैं; वे कब रोना बंद करेंगे? इन भंगुर आत्माओं का दुर्भाग्य भयावह है जिन्हें कभी विश्राम नहीं मिला है और बहुत समय से ये इसी स्थिति में क्रूर बंधनों और जमे हुए इतिहास में जकड़ी हुई हैं। और किसने उनके विलाप की आवाज सुनी है? किसने उनकी दयनीय दशा देखी है? क्या तूने कभी सोचा है कि परमेश्वर का हृदय कितना दुखी और चिंतित है? जिस मासूम मानवजाति को उसने अपने हाथों से रचा, उसे वह ऐसी पीड़ा भोगते देखना कैसे सह सकता है? मनुष्य आखिरकार वे पीड़ित हैं जिन्हें जहर दिया गया है। और यूँ तो मनुष्य आज तक बचा हुआ है, लेकिन कौन जान सकता था कि मानवजाति को बहुत पहले ही उस दुष्ट के द्वारा जहर दिया जा चुका है? क्या तू भूल चुका है कि तू भी पीड़ित लोगों में से एक है? क्या तू इन सारे जीवित बचे लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम की खातिर प्रयास करने का इच्छुक नहीं है? क्या तू उस परमेश्वर को प्रतिफल देने के लिए अपनी सारी शक्ति समर्पित करने का इच्छुक नहीं है जो अपनी देह और लहू के समान मानवजाति से प्रेम करता है? अपना असाधारण जीवन जीने के लिए तू अपने को परमेश्वर द्वारा प्रयोग में लाए जाने को वास्तव में कैसे समझेगा? क्या तुम्हारे पास सचमुच यह संकल्प और आस्था है कि तुम एक धर्मपरायण, परमेश्वर-सेवी व्यक्ति का सार्थक जीवन जी सको?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुझे अपने भविष्य के मिशन से कैसे पेश आना चाहिए?)। परमेश्वर प्रकट हो चुका है और इतने सालों से कार्य कर रहा है, लेकिन बहुत से लोग अभी भी नहीं जानते हैं और झूठे परमेश्वरों की आराधना कर रहे हैं, वे शैतान के धोखे में जी रहे हैं। हम, जिन्होंने पहले परमेश्वर का सुसमाचार पाया है, हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उनके सामने परमेश्वर के कार्य की गवाही दें ताकि वे जल्द-से-जल्द परमेश्वर की आवाज़ सुन सकें और परमेश्वर के सामने आ सकें। इन नए विश्वासियों के साथ संगतियों के बारे में फिर से सोचती हूँ तो जब हम उन्हें परमेश्वर के वचन पढ़कर सुनाते थे, चाहे उनकी उम्र या लिंग कुछ भी हो, उन सबकी आँखों में ललक होती थी, जैसे उन्होंने अभी-अभी एक अँधेरी दुनिया में रोशनी आते देखी हो, मानो वे बहुत-बहुत लंबे समय से रोशनी के आने का इंतज़ार कर रहे हों और आखिरकार उन्हें उम्मीद मिल गई हो। सरकारी ज़ुल्म और गिरफ्तार होने व जुर्माना लगने के खतरे का सामना करते हुए भी, लंबा सफर तय करना पड़ने पर भी, और गोद में सिर्फ एक महीने का बच्चा होने पर भी, वे एक भी सभा छोड़ने को तैयार नहीं थे, और वे चाहते थे कि परमेश्वर के वचन सुनने के लिए दिन भर सभा करें। वे सरकारी ज़ुल्म से नहीं डरते थे, बल्कि वे परमेश्वर के वचन न सुन पाने और सभा न कर पाने से डरते थे। कुछ नए विश्वासी कहते थे, “बहन, डरो मत। हम शैतान के साथ गुरिल्ला युद्ध लड़ेंगे। अगर वे पहाड़ पर जाएँगे, तो हम नीचे आ जाएँगे। हम सभा करने का कोई तरीका ढूँढ़ ही लेंगे।” यह सुनना सच में भावुक करने वाला था। अगर मैंने उन्हें बस यूँ ही छोड़ दिया, उन्हें परमेश्वर के वचन सुन पाने में असमर्थ कर दिया तो मेरी अंतरात्मा मुझे धिक्कारेगी। मैंने इस बारे में सोचा कि परमेश्वर ने कैसे मानवता को शुद्ध करने और बचाने के लिए कितने सारे सत्य व्यक्त किए हैं और कैसे मैंने परमेश्वर के वचनों के सिंचन और पोषण का आनंद लिया है, सत्य के बहुत-से रहस्यों को समझा है, और अपने भ्रष्ट स्वभाव को उतार फेंकने का मार्ग पाया है। परमेश्वर मुझे इतना अधिक दे चुका है और उसका प्रेम इतना महान है! मैं कहती रहती थी कि मैं परमेश्वर के प्रेम का ऋण चुकाने के लिए अपना कर्तव्य अच्छे से निभाऊँगी और मैं परमेश्वर को निराश नहीं करूँगी या मेरे प्रति उसके प्रेम को व्यर्थ नहीं जाने दूँगी, लेकिन चूँकि मुझे डर था कि मेरा पति मुझे तलाक दे देगा, इसलिए मैं अपना कर्तव्य त्याग देना और नए विश्वासियों को पीछे छोड़ देना चाहती थी। मैंने यह सोचा तक नहीं था कि अगर मैं चली गई तो क्या होगा : अधिकारी उन पर ज़ुल्म करता रहेगा, यह धमकी देता रहेगा कि अगर वे पकड़े गए तो उन पर जुर्माना लगाया जाएगा या उन्हें कैद कर लिया जाएगा। क्या वे कमज़ोर और डरपोक हो जाएंगे और सभाओं में आने की हिम्मत नहीं करेंगे? उन्हें सींचने वाला कोई न होने पर क्या वे नकारात्मक हो जाएंगे और पीछे हट जाएंगे? वे सत्य के लिए इतने लालायित थे कि परमेश्वर के वचन सुनने के लिए वे भोर से पहले ही सभा स्थल पहुँच जाते थे और मेरा इंतजार करते थे। अगर वे परमेश्वर के वचन न सुन पाए तो क्या वे तड़पेंगे और दर्द में रहेंगे? अगर मैं बस यूँ ही चली गई तो क्या मैं परमेश्वर और उनके साथ न्याय कर रही हूँगी? अगर मैंने तलाक के डर से इन नए विश्वासियों को छोड़ दिया, उन्हें कमजोर होने दिया और आस्था छोड़ने दी तो मैं परमेश्वर के सामने अपना मुँह दिखाने लायक नहीं रहूँगी! मैं इस बारे में जितना अधिक सोचती थी, खुद को परमेश्वर का उतना ही अधिक ऋणी महसूस करती थी।

बाद में मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया : “जब परमेश्वर कार्य करता है, किसी की देखभाल करता है, उसकी जाँच-पड़ताल करता है और जब वह उस व्यक्ति पर अनुग्रह करता और उसे स्वीकृति देता है, तब शैतान करीब से उसका पीछा करता है, उस व्यक्ति को गुमराह करने और गंभीरता से नुकसान पहुँचाने की कोशिश करता है। अगर परमेश्वर इस व्यक्ति को पाना चाहता है, तो शैतान परमेश्वर को रोकने के लिए अपने सामर्थ्य में सब-कुछ करता है, वह परमेश्वर के कार्य को प्रलोभित करने, उसमें विघ्न डालने और उसे खराब करने के लिए विभिन्न दुष्ट हथकंडों का इस्तेमाल करता है, ताकि वह अपना छिपा हुआ उद्देश्य हासिल कर सके। क्या है वह उद्देश्य? वह नहीं चाहता कि परमेश्वर किसी भी मनुष्य को प्राप्त कर सके; परमेश्वर जिन्हें पाना चाहता है, वह उन पर कब्जा कर लेना चाहता है, वह उन पर नियंत्रण करना, उनको अपने अधिकार में लेना चाहता है, ताकि वे उसकी आराधना करें, ताकि वे बुरे कार्य करने और परमेश्वर का प्रतिरोध करने में उसका साथ दें। क्या यह शैतान का भयानक उद्देश्य नहीं है? ... परमेश्वर के साथ युद्ध करने और उसके पीछे-पीछे चलने में शैतान का उद्देश्य उस समस्त कार्य को नष्ट करना है, जिसे परमेश्वर करना चाहता है; उन लोगों पर कब्ज़ा और नियंत्रण करना है, जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है; उन लोगों को पूरी तरह से मिटा देना है, जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है। यदि वे मिटाए नहीं जाते, तो वे शैतान द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए उसके कब्ज़े में आ जाते हैं—यह उसका उद्देश्य है(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV)। परमेश्वर के वचनों पर मनन करते हुए मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर का कार्य जहाँ कहीं जाता है, वहाँ-वहाँ शैतान की बाधा उसका पीछा करती है। परमेश्वर उन लोगों को पाना चाहता था जो सच में उस पर विश्वास करते थे, लेकिन शैतान उन पर ज़ुल्म करने के लिए सरकार का इस्तेमाल कर रहा था, उन्हें परमेश्वर में विश्वास करने से रोकने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहा था। जब शैतान ने देखा कि इस तरह के ज़ुल्म से उसका लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता, तो उसने अपने दाँव-पेंच बदल दिए, मेरे पति से मुझे तलाक की धमकी दिलवाई, मुझे गाँव छोड़ने पर मजबूर करने की कोशिश की, क्योंकि इस तरह से इन नए विश्वासियों को सींचने वाला कोई नहीं होता। शैतान का लक्ष्य था उन्हें परमेश्वर के वचन सुनने से रोकना और उन्हें धीरे-धीरे पीछे हटाना। यह सच में नीच और बेशर्म है! अगर मैं वापस घर चली गई तो क्या मैं शैतान की चालों में नहीं फँस रही होती? शैतान के कपटपूर्ण इरादे को साफ-साफ देखकर, मैंने इन नए विश्वासियों को ठीक से सींचने का मन बना लिया। फिर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं घर नहीं जा रही हूँ। मैं इन दो गाँवों के नए विश्वासियों को अच्छी तरह से सींचने के लिए तुम पर निर्भर रहूँगी। भले ही मेरा पति मुझे तलाक दे दे, मैं वापस नहीं जाऊँगी।” खुद को तलाक के लिए तैयार कर लेने पर जिस चीज की मुझे कभी उम्मीद नहीं थी वह यह थी कि अगले ही दिन मेरे पति ने मुझे मैसेज भेजकर कहा कि मैं अपना खूब ख्याल रखूँ। उसने कहा कि चूँकि ठंड है, इसलिए मुझे और अधिक कपड़े पहनने चाहिए और सुसमाचार का प्रचार करते समय ज़्यादा सावधान रहना चाहिए। उसने यह भी कहा कि मैं जब भी चाहूँ तब वापस आ सकती हूँ और यहाँ तक कि उसने सर्दियों के कपड़े खरीदने के लिए मुझे 4,000 युआन भेजे। मैं सच में परमेश्वर की आभारी थी!

बाद के दिनों में यूँ तो मैं अब अपने पति से उतनी बाधित नहीं थी, लेकिन अधिकारी का ज़ुल्म कम होने के बजाय और भी गंभीर होता गया। बाद में मैंने यह भजन सुना, “मसीह का अनुसरण करते हुए मैं कभी पीछे नहीं हटूँगा, मृत्यु तक भी नहीं” :

अंत के दिनों का मनुष्य का पुत्र सत्य व्यक्त करता है, अनगिनत दिलों को जगाता है। मैं देखता हूँ कि परमेश्वर के वचन सारे सत्य हैं, इसलिए मैं उसका अनुसरण करता हूँ। शैतान, बड़ा लाल अजगर परमेश्वर के चुने हुए लोगों को बुरी तरह सताता और गिरफ्तार करता है। जो मसीह का अनुसरण करते हैं और अपने कर्तव्य निभाते हैं वे अपनी जान जोखिम में डालकर ऐसा करते हैं। परमेश्वर की गवाही देने के लिए किसी दिन मैं गिरफ्तार किया और सताया जा सकता हूँ। अपने दिल में मैं स्पष्ट रूप से समझता हूँ कि यह धार्मिकता की खातिर अत्याचार है। सुसमाचार का प्रचार करने के कारण किसी दिन मैं गिरफ्तार किया जा सकता हूँ और जेल में डाला जा सकता हूँ। यह वह कष्ट है जो परमेश्वर ने अपने अनुसरणकर्ताओं के लिए नियत किया है। मैं नहीं जानता कि सुसमाचार के प्रचार के इस मार्ग पर मैं और कितनी दूर तक चल सकता हूँ, लेकिन जब तक मैं जीवित हूँ, मैं परमेश्वर के वचनों का प्रसार करूँगा और मसीह की गवाही दूँगा। मैं केवल सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर का आदेश पूरा करने के लिए खुद को खपाता हूँ। इस जीवन में मसीह का अनुसरण करना और उसकी गवाही देना मेरे दिल को गर्व से भर देता है। अगर मैं वह दिन न भी देख सकूँ जब राज्य साकार होगा, आज गवाही दे पाना और शैतान को अपमानित कर पाना काफी है। उत्पीड़न और क्लेश में परमेश्वर मेरे साथ है; वह मेरा सहारा है। शायद मेरा जीवन किसी क्षणभंगुर फुलझड़ी की तरह खत्म हो जाएगा। लेकिन परमेश्वर के लिए शहीद होना एक गुंजायमान गवाही देना है। मैंने राज्य के सुसमाचार के प्रसार के लिए अपनी मामूली ताकत अर्पित की है। मुझे न कोई शिकायत है और न ही कोई पछतावा। परमेश्वर की गवाही दे पाने से, मेरा जीवन व्यर्थ नहीं गया है। यह परमेश्वर का विधान है, और मैं उसे स्तुति और धन्यवाद अर्पित करता हूँ।

परमेश्वर के वचन पूरी दुनिया में फैल गए हैं; मसीह का राज्य मनुष्यों के बीच प्रकट हो गया है। आपदाओं के बीच, परमेश्वर ने विजेताओं का एक समूह बनाया है, जो सभी उसकी गवाही दे रहे हैं। अंधकार दूर हो रहा है, और धार्मिकता की भोर प्रकट हो गई है। परमेश्वर ने शैतान, बड़े लाल अजगर को हरा दिया है। परमेश्वर की स्तुति हो, जिसने महिमा प्राप्त कर ली है!

—मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ

यह भजन सुनने के बाद मैं सच में बहुत भावुक और प्रेरित हुई। यूँ तो इन दो गाँवों में नए विश्वासियों को सींचने के लिए मुझे गिरफ्तार और उत्पीड़ित किया जा सकता है—भले ही परमेश्वर की महिमा का दिन देखने से पहले मैं मर जाती हूँ—तो भी मुझे इसका पछतावा नहीं होगा। परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार कर पाना और उसके राज्य के सुसमाचार का प्रसार कर पाना कितने सम्मान की बात है। यह एहसास होने पर मुझे हर उस चीज को अनुभव करने की और भी अधिक आस्था प्राप्त हो गई जो भी होनी थी।

अधिकारी को पता चल गया कि हम हर सुबह 6 बजे सभा करते हैं, इसलिए वह हमारा इंतज़ार करते हुए सुबह 5 बजे अपने आँगन में आग जला लेता था। जब मैं अपनी मोटरसाइकिल से उसके घर के पास से गुज़रती, तो मैं इसकी लाइट बंद कर देती या इसे इंजन बंद करके धकेलती थी, इस डर से कि कहीं वह मुझे देख न ले। जब हम पहाड़ पर जाते तो टॉर्च जलाने की हिम्मत नहीं करते थे, और कभी-कभी, जब बारिश होती, तो हम गाँव में भाइयों और बहनों के दूर-दराज के घरों में सभा करते थे। पकड़े जाने से बचने के लिए, जब सभाएँ खत्म होतीं, तो कुछ भाई-बहन लकड़ियाँ लेकर घर लौटते, जबकि दूसरे मवेशियों को हाँककर वापस ले जाते, और कुछ घर ले जाने के लिए जंगली सब्जियाँ तोड़ लेते। हालाँकि अधिकारी हमारा इंतज़ार करते हुए अपने आँगन में आग जलाता था, लेकिन हम एक बार भी पकड़े नहीं गए। मैं जानती थी कि यह सब परमेश्वर के हाथों में था और उसी ने अधिकारी की आँखों पर पर्दा डाल दिया था। ऐसी स्थिति का अनुभव करते हुए मुझे परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और संप्रभुता की कुछ समझ मिली। बाद में इन दो गाँवों में इस अधिकारी, उसकी पत्नी और खराब मानवता वाले कुछ लोगों को छोड़कर बाकी सभी लोगों ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार कर लिया। यहाँ तक कि अधिकारी के भाई, बहन, भाभी और ससुर सबने इसे स्वीकार कर लिया। अंत में हम उनके माध्यम से एक दूसरे गाँव के लोगों को सुसमाचार का प्रचार करने गए और उस समय, लगभग सत्तर-अस्सी लोगों ने परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया। अधिकारी ने हम पर चाहे कैसे भी ज़ुल्म किया हो, ये नए विश्वासी तब भी सक्रिय रूप से सभाओं में आते रहे और नए विश्वासियों की संख्या बढ़ती गई। यह सचमुच पवित्रात्मा के कार्य का परिणाम था। मैंने देखा कि शैतान चाहे कोई भी तरीका अपना ले, वह सुसमाचार के कार्य के प्रसार को नहीं रोक सकता।

उस दौरान, हालाँकि मैंने कुछ शारीरिक मुश्किलें सहीं, और मैंने सरकारी ज़ुल्म और पति की तरफ से मिले विघ्न का भी अनुभव किया, जो उस समय काफी दर्दनाक था, लेकिन मैंने पाया भी बहुत कुछ। परमेश्वर का धन्यवाद!

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44. शांत हुआ तलाक का तूफ़ान

लू शी, जापान2015 में मेरी एक दोस्त ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू करने के लिए प्रेरित किया। अंतिम दिनों के सर्वशक्तिमान...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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