90. मेरी आशीषों की इच्छा चूर-चूर होने के बाद

ली शिन, चीन

2009 में, मेरी एक रिश्तेदार ने मुझे परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाया। उसने मुझे बताया कि अंत के दिनों में परमेश्वर हमारी भ्रष्टता को शुद्ध करने, मानवजाति को पाप से बचाने और हमें इस पीड़ामय जीवन से मुक्त करने के लिए सत्य व्यक्त करता है, आखिरकार हमें एक सुंदर मंज़िल तक पहुँचाता है जहाँ फिर कभी न कोई पीड़ा होगी, न कोई शोक होगा। यह सुनते ही मैंने सोचा, “क्या ठीक यही वह जीवन नहीं है जिसके लिए मैं हमेशा से लालायित रही हूँ?” फिर मैंने खुशी-खुशी परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार कर लिया और जल्द ही कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाने लगी। अगले कुछ वर्षों तक, मेरे परिवार में सब ठीक था और हमारा जीवन सुचारु रूप से चल रहा था। मैं अक्सर परमेश्वर का धन्यवाद करती थी, और मैं चीज़ों का त्याग करने और खुद को खपाने के लिए और भी ज्यादा प्रेरित थी।

फिर 2019 की शरद ऋतु में एक दोपहर, मेरी बड़ी बेटी को पुलिस स्टेशन से फोन आया। जिस निर्माण-स्थल के ठेकेदार मेरे पति थे, वहाँ एक दुर्घटना हो गई थी। काम पर एक प्रवासी मज़दूर की दुर्घटनावश मृत्यु हो गई थी, और मेरे पति को कार्रवाई का इंतज़ार करने के लिए हिरासत केंद्र ले जाया गया था। यह खबर सुनते ही मेरा दिमाग सुन्न हो गया। मैंने मन ही मन सोचा, “यह कैसे हो सकता है? हमें मुआवज़े में कितने पैसे देने पड़ेंगे? हमारे पास तो पहले से ही कोई पैसा नहीं है; हम यह बिल्कुल भी वहन नहीं कर सकते हैं। पति के हिरासत में लिए जाने से, क्या हमारा परिवार बरबाद नहीं हो जाएगा?” मैं बता भी नहीं सकती थी कि मुझे अंदर से कैसा महसूस हो रहा था। मेरी बेटी ने शिकायत की, “तुम परमेश्वर में विश्वास करती हो न? फिर हमारे परिवार के साथ ऐसा कैसे हो सकता है?” जब हमारे गृहनगर के रिश्तेदारों ने इस बारे में सुना तो कुछ ने शिकायत की, “कैसी बुरी किस्मत है जो उनके साथ ऐसा हो गया! इतने सालों में जो भी पैसा कमाया, सब बेकार गया!” दूसरों ने कहा, “पता नहीं उन्हें कितना मुआवज़ा देना पड़ेगा!” उन सबको एक साथ बातें करते सुनकर, जिनमें कोई भी पैसे जुटाने में मेरी मदद की पेशकश नहीं कर रहा था, बल्कि सिर्फ कठोर बातें कह रहा था, मुझे गहरी निराशा हुई। इसके अलावा, मुझे चिंता थी कि मृतक मजदूर का परिवार आकर मुसीबत पैदा करेगा। उन कुछ दिनों तक मैं बहुत डरी हुई और बेचैन थी। मैं ठीक से खा या सो नहीं पा रही थी। जब भी मैं मुआवज़े के बारे में सोचती, तो चिंता से घिर जाती थी, “मेरे पति ने पिछले कुछ सालों में सुबह से रात तक इतनी मेहनत करके जो भी पैसा कमाया, वह कर्ज़ चुकाने और मशीनरी व औज़ार खरीदने में चला गया। हमारे पास कोई पैसा नहीं बचा है। अगर हमें लाखों का मुआवज़ा देना पड़ा तो मैं इतने पैसे कहाँ से लाऊँगी?” मैं बस इतना ही कर सकती थी कि इन मुश्किलों को परमेश्वर को सौंप दूँ और प्रार्थना करूँ, “हे परमेश्वर, मैं नहीं जानती कि इस भारी मुआवज़े के भुगतान के बारे में क्या करूँ। मैं अपने रिश्तेदारों या दोस्तों के भरोसे नहीं रह सकती हूँ। मैं यह सब कुछ तुम्हारे हाथों में सौंपती हूँ। कृपया इस मुश्किल घड़ी से निकलने में मेरी मदद करो।” दो-तीन महीनों के बाद अदालत की मध्यस्थता के उपरांत दूसरे पक्ष ने मुआवजे में 2,80,000 युआन माँगे। वकील ने कहा कि अगर हम पैसे दे दें और दूसरा पक्ष क्षमादान के पत्र पर दस्तखत कर दे तो मेरे पति को जेल नहीं जाना पड़ेगा। अगर हम पैसे नहीं दे पाए तो उसे सज़ा हो जाएगी। मेरे लिए 2,80,000 युआन एक बहुत बड़ी रक़म थी! मुझ जैसी औरत इतने पैसे कहाँ से ला सकती थी? लेकिन अगर मैं पैसे नहीं दे पाई तो मेरे पति को जेल की सज़ा हो जाएगी। मेरे पास सभी रिश्तेदारों से पैसे उधार माँगने के अलावा कोई चारा नहीं था, लेकिन मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि जब मैं मदद माँगने गई तो उन सबने तरह-तरह के बहाने बनाकर मुझे मना कर दिया। उनकी बेरुखी का सामना करते हुए मैंने बहुत अकेला और असहाय महसूस किया और मैं इतनी चिंतित थी कि मेरे आँसू रुक ही नहीं रहे थे। मैं बार-बार परमेश्वर को पुकारती रही, यह उम्मीद करती रही कि वह इस मुश्किल घड़ी से निकलने में मेरी मदद करेगा। लेकिन जैसे-जैसे भुगतान की समयसीमा नजदीक आती गई, मैं अभी भी उस रकम के आस-पास भी पैसा नहीं जुटा पाई थी। न चाहते हुए भी मेरे मन में शिकायत आने लगी, “वे अविश्वासी तो ठीक-ठाक जी रहे हैं। मैं परमेश्वर में विश्वास करती हूँ, मैंने अपनी आस्था के लिए सब कुछ छोड़ दिया है, जब मेरे पति और भाई ने मुझे रोकने की कोशिश की तब भी मैं अपना कर्तव्य निभाने में लगी रही। मैं एक सच्ची विश्वासी हूँ तो परमेश्वर ने मेरी रक्षा क्यों नहीं की? उसने मुझ पर ऐसी विपत्ति क्यों आने दी?” मैंने इस बारे में जितना अधिक सोचा, मुझे अपने साथ उतना ही अधिक अन्याय महसूस हुआ और मैंने परमेश्वर को पुकारते हुए कहा, “हे परमेश्वर, मैं इतने सालों से अपना कर्तव्य निभाती आ रही हूँ। तुमने मेरी रक्षा क्यों नहीं की? यह आपदा एक बड़े पहाड़ की तरह मुझे कुचल रही है और मैं बमुश्किल साँस ले पा रही हूँ। मैं अब और नहीं सह सकती। मुझे क्या करना चाहिए?” मुझे एहसास हुआ कि मेरा शिकायत करना गलत था, लेकिन मेरे पास सचमुच कोई सहारा नहीं था और मैं अपने दिल में समर्पण कर ही नहीं पा रही थी। उन दिनों मैं खा या सो नहीं पाती थी, मुझमें बिल्कुल भी ताकत नहीं थी और परमेश्वर के वचन पढ़ने का भी मेरा मन नहीं करता था। मुझे लग रहा था मैं परमेश्वर से बहुत दूर हो गई हूँ। बाद में, क्योंकि मेरा परिवार मुआवज़े के पैसे नहीं जुटा सका, मेरे पति को डेढ़ साल की जेल हो गई। इस नतीजे का सामना करते हुए मैं बहुत दुखी थी। पति के जेल में होने से, परिवार के लिए पैसा कमाने वाला कोई नहीं था। हम भविष्य में गुजारा करने के लिए क्या करेंगे? इन मुश्किलों का सामना करते हुए मुझे लगा कि मैं अपने सिवाय किसी पर निर्भर नहीं रह सकती हूँ। मैं सोचने लगी कि मैं अब पूर्णकालिक कर्तव्य नहीं निभा सकती हूँ और मुझे हर दिन आधा समय कोई अंशकालिक नौकरी करने में बिताना होगा।

जब कलीसिया की पर्यवेक्षक को मेरी स्थिति का पता चला तो उसने मेरी मदद करने के लिए संगति की और कहा कि मुझे अपने परिवार के साथ जो हुआ है उसमें परमेश्वर के इरादे खोजने चाहिए और इससे सबक सीखने चाहिए। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना करना और खोजना शुरू कर दिया। मैंने भक्ति के दौरान परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े : “अय्यूब के कथन, ‘क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?’ से यह पहले ही स्पष्ट हो चुका है कि वह क्यों परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम था और इसमें तलाशने के लिए सत्य है। जब उसने यह कहा था तो क्या उसने कोई शिकायत या उलाहना व्यक्त की थी? (नहीं।) क्या इसमें कोई अस्पष्टता या नकारात्मक बात छिपी थी? (नहीं।) बिल्कुल नहीं। इस परीक्षण से गुजरकर, अय्यूब ने समझा कि सृष्टिकर्ता लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे लोग तय कर सकते हैं। यह सुनने में थोड़ा असहज लग सकता है, लेकिन यही मामले की सच्चाई है। परमेश्वर ने हर किसी के जीवन भर के भाग्य की व्यवस्था की है; चाहे तुम इसे स्वीकार करो या न करो, यह एक तथ्य है। तुम अपनी नियति नहीं बदल सकते। परमेश्वर सृष्टिकर्ता है और तुम्हें उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह सही है, क्योंकि वह सत्य है और वह सभी चीजों का संप्रभु है—लोगों को उसके प्रति समर्पण करना चाहिए। इस ‘सभी चीजों’ में तुम शामिल हो और इसमें अन्य सभी सृजित प्राणी भी शामिल हैं। तो फिर, यह किसकी गलती है कि तुम हमेशा विरोधी होना चाहते हो? (यह हमारी अपनी गलती है।) यह लोगों के साथ एक समस्या है। तुम हमेशा बहाने ढूँढ़ना और लाभ उठाना चाहते हो—क्या यह सही है? तुम हमेशा परमेश्वर से आशीषें और लाभ प्राप्त करना चाहते हो—क्या यह सही है? इसमें से कुछ भी सही नहीं है। ये विचार परमेश्वर के बारे में गलत ज्ञान और समझ हैं। ठीक इसलिए क्योंकि जो दृष्टिकोण परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास को प्रेरित करता है वह गलत है, जब भी तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है तो तुम अनिवार्य रूप से परमेश्वर का प्रतिरोध, उससे संघर्ष और उसका विरोध करते हो, हमेशा यह सोचते हो, ‘परमेश्वर का ऐसा करना गलत है; मैं इसे समझ नहीं सकता। उसका उस तरह से करना मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर उस तरह से करेगा!’ इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर जो करता है वह तुम्हारी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप है या नहीं—परमेश्वर जो कुछ भी करता है, वह फिर भी परमेश्वर ही है। यदि तुममें यह विवेक और यह समझ नहीं है, तुम हमेशा उन चीजों की पड़ताल और उनके बारे में अनुमान लगाते रहते हो जो तुम्हारे साथ हर दिन होती हैं, तो इसका एकमात्र परिणाम यह होगा कि तुम हर मोड़ पर परमेश्वर से संघर्ष और उसका विरोध करोगे। तुम इस मनोदशा से मुक्त नहीं हो पाओगे। लेकिन यदि तुममें यह समझ है और तुम एक सृजित प्राणी के रूप में अपना उचित स्थान ग्रहण कर सकते हो, चीजों का सामना करते हुए तुम उनकी तुलना सत्य के इस पहलू से करते हो, सत्य का अभ्यास और उसमें प्रवेश करते हो, तो तुम भीतर से परमेश्वर का और अधिक भय मानने लगोगे। बिना एहसास किए, तुम यह महसूस करने लगोगे : ‘दरअसल परमेश्वर जो करता है वह गलत नहीं है; परमेश्वर जो करता है वह सब अच्छा है। लोगों को इसकी पड़ताल और विश्लेषण करने की ज़रूरत नहीं है। मैं बस खुद को परमेश्वर के आयोजन के प्रति समर्पित कर दूँगा!’ और जब तुम खुद को परमेश्वर के प्रति समर्पण करने या उसके आयोजनों को स्वीकार करने में असमर्थ पाते हो, तो तुम्हारा दिल धिक्कारेगा : ‘मैं एक अच्छा सृजित प्राणी नहीं रहा हूँ। मैं बस समर्पण क्यों नहीं कर सकता? क्या मैं सृष्टिकर्ता को दुखी नहीं कर रहा हूँ?’ तुम जितना अधिक एक अच्छा सृजित प्राणी बनना चाहोगे, सत्य का यह पहलू तुम्हारे लिए उतना ही अधिक साफ और स्पष्ट होता जाएगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के प्रति मनुष्य का जो रवैया होना चाहिए)। पहले, मैं कई बार अय्यूब की कहानी पढ़ चुकी थी, लेकिन इसे हमेशा एक कहानी के तौर पर ही देखती थी। उस दिन जब मैंने इस पर फिर से विचार किया, यह देखा कि इतने बड़े परीक्षणों का सामना करने पर भी अय्यूब ने अपने होठों से पाप नहीं किया तो मैं परमेश्वर के प्रति उसके समर्पण के लिए प्रशंसा से भर गई। अय्यूब ने अपनी सारी भेड़ें और बैल जो पहाड़ियों पर फैले थे, अपनी विशाल संपत्ति और अपने सभी बच्चों को खो दिया; वह दर्दनाक फोड़ों से भी ढँक गया था, फिर भी उसने परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं की। वह जानता था कि परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, और परमेश्वर चाहे जो भी करे, मनुष्य को समर्पण करना चाहिए। वह जानता था कि यही वह विवेक है जो एक सृजित प्राणी में होना चाहिए और ऐसा नहीं हो सकता कि जब परमेश्वर आशीष दे तो वह खुश हो जाए और जब परमेश्वर वापस ले ले तो वह शिकायत करे; ऐसा करना गलत रुख अपनाना होगा। इसीलिए अय्यूब यह कह सका, “क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?” (अय्यूब 2:10)। अय्यूब का मानना था कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है, वह अच्छा है, और भले ही वह समझ नहीं पाया, फिर भी वह समर्पण कर सका। अय्यूब ने जिन परीक्षणों का सामना किया उनकी तुलना में मैंने जिन चीजों का सामना किया वे कहाँ ठहरती थीं? इसके बावजूद, मैंने ज़रा भी समर्पण नहीं दिखाया। मैं दिन भर यह ऐलान करती रहती थी, “परमेश्वर सभी चीज़ों पर संप्रभु है और सब पर शासन करता है; हमें उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए,” लेकिन जब मेरे पति मुसीबत में पड़े, तो मैं बिल्कुल भी समर्पण नहीं कर सकी। मैंने बार-बार माँग की कि परमेश्वर मेरी तात्कालिक मुश्किलों को हल करने में मदद करे। जब परमेश्वर ने मेरी माँगें पूरी नहीं कीं, तो मैंने उससे सवाल किए, यह पूछा कि वह मेरे साथ कोई ऐसी चीज क्यों होने दे सकता है। मुझे ऐसा लगा कि परमेश्वर मेरे पीछे पड़ा है, कि वह जो कर रहा है वह अनुचित है। मैंने यहाँ तक सोच लिया कि बाहर निकलने का रास्ता खोजने के लिए अपना कर्तव्य छोड़ देती हूँ। मैंने देखा कि मुझे परमेश्वर की संप्रभुता की कोई समझ नहीं थी, और मुझमें परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल नहीं था। इस बारे में सोचती हूँ तो—परमेश्वर में विश्वास करने से पहले, मेरे परिवार ने अच्छे और बुरे दोनों दौर देखे थे। अविश्वासी भी कभी-कभी सुकून के दौर से गुजरते हैं, तो दूसरे मौकों पर उन्हें प्राकृतिक या मानव-निर्मित आपदाओं का सामना करना पड़ता है। असल में, किसी व्यक्ति के जीवन का भाग्य, जिसमें यह भी शामिल है कि उसे कितनी कठिनाइयों और असफलताओं का सामना करना पड़ेगा, परमेश्वर द्वारा बहुत पहले ही पूर्वनियत कर दिया गया है। लेकिन मेरा मानना था कि जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उनका जीवन अविश्वासियों से बेहतर होना चाहिए और उनका सामना आपदाओं से नहीं होना चाहिए। क्या यह एक विकृत समझ, और परमेश्वर की संप्रभुता के ज्ञान की कमी नहीं थी? परमेश्वर सृष्टिकर्ता है। वह हमारी जरूरतों को सबसे अच्छी तरह जानता है, और वह हमारे लिए अनुभव करने हेतु उपयुक्त परिवेशों का इंतजाम करता है। हर व्यक्ति के साथ किस समय क्या होता है, इसके पीछे हमेशा परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाएँ होती हैं। भले ही सतह पर चीजें हमारी धारणाओं से मेल न खाएँ, वे निश्चित रूप से हमारे जीवन के लिए फायदेमंद होती हैं : मुझे समर्पण करना चाहिए और परमेश्वर के इरादे खोजने चाहिए। लेकिन, यूँ तो मैंने परमेश्वर के इतने सारे अनुग्रह और आशीष और उसके वचनों के सिंचन और आपूर्ति का आनंद लिया था, फिर भी मैंने रत्तीभर भी कृतज्ञता नहीं दिखाई थी। जैसे ही कुछ ऐसा होता था जो मेरी पसंद का न हो तो मैं रोषपूर्वक परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत करती थी। मैंने देखा कि मैं कितनी मानवता-रहित थी! मैं अपराधबोध से भर गई और मैंने पश्चात्ताप में परमेश्वर से प्रार्थना की, मैं उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने की इच्छुक थी।

बाद में, मैंने खुद पर चिंतन किया : ऐसा क्यों था कि जब भी कुछ अप्रिय होता था तो मैं परमेश्वर के बारे में शिकायत करती थी? फिर मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े : “तुम यह आशा करते हो कि परमेश्वर में तुम्हारी आस्था के मार्ग में कोई भी मुश्किल या क्लेश या लेशमात्र भी पीड़ा नहीं होगी। तुम हमेशा निरर्थक चीजों के पीछे भागते हो और तुम जीवन को कोई अहमियत नहीं देते, बल्कि तुम अपने असंयमित विचारों को सत्य से ज्यादा महत्व देते हो। तुम कितने निकम्‍मे हो! तुम सूअर की तरह जीते हो—तुममें और सूअर और कुत्ते में क्या अंतर है? जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि शरीर से प्यार करते हैं, क्या वे सब जानवर नहीं हैं? क्या वे मरे हुए लोग जिनमें आत्मा नहीं है, चलती-फिरती लाशें नहीं हैं? तुम लोगों के बीच कितने सारे वचन कहे गए हैं? क्या तुम लोगों के बीच केवल थोड़ा-सा ही कार्य किया गया है? मैंने तुम लोगों के बीच कितनी आपूर्ति की है? तो फिर तुमने इसे प्राप्त क्यों नहीं किया? तुम्हें किस बारे में शिकायत करनी है? क्या ऐसा नहीं है कि तुमने इसलिए कुछ भी प्राप्त नहीं किया है क्योंकि तुम देह से बहुत अधिक प्रेम करते हो? और क्या इसकी वजह यह नहीं है कि तुम्‍हारे विचार बहुत ज्यादा असंयमित हैं? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि तुम बहुत ज्यादा मूर्ख हो? यदि तुम इन आशीषों को प्राप्त करने में विफल होते हो, तो क्या तुम परमेश्वर को दोष दोगे कि उसने तुम्‍हें नहीं बचाया? तुम परमेश्वर में विश्वास करने के बाद शांति प्राप्त करने में सक्षम होने का अनुसरण करते हो—ताकि तुम्हारे बच्चे बीमारी से दूर रहें, तुम्हारे पति को एक अच्छी नौकरी मिल जाए, तुम्हारे बेटे को एक अच्छी पत्नी और तुम्हारी बेटी को एक अच्छा पति मिले, तुम्हारे बैल और घोड़े जमीन की अच्छी जुताई कर पाएँ और तुम्हारी फसलों के लिए साल भर अच्छा मौसम रहे। तुम इन्हीं चीजों का अनुसरण करते हो। तुम्‍हारा अनुसरण केवल आराम से जीने के लिए है—ताकि तुम्‍हारे परिवार में कोई दुर्घटना न हो, आँधी-तूफान तुम्‍हारे पास से होकर गुजर जाएँ, धूल-मिट्टी तुम्‍हारे चेहरे को छू भी न पाए, तुम्‍हारे परिवार की फसलें बाढ़ में न बह जाएँ—किसी भी आपदा से प्रभावित न हों, तुम ‘परमेश्वर के आलिंगन’ में रहो, एक आरामदायक घरौंदे में रहो। तुम जैसा डरपोक इंसान, जो हमेशा दैहिक सुख के पीछे भागता है—क्या तुम्‍हारे अंदर एक दिल है, क्या तुम्‍हारे अंदर एक आत्मा है? क्या तुम एक पशु नहीं हो? मैं बदले में बिना कुछ माँगे तुम्‍हें सच्चा मार्ग देता हूँ, फिर भी तुम उसका अनुसरण नहीं करते। क्या तुम अभी भी उनमें से एक हो जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं? मैं तुम्‍हें एक सच्चा मानवीय जीवन देता हूँ, फिर भी तुम अनुसरण नहीं करते। क्या तुम कुत्ते और सूअर की किस्म के ही नहीं हो? सूअर मनुष्य के जीवन का अनुसरण नहीं करते, वे शुद्ध किए जाने का अनुसरण नहीं करते और वे नहीं समझते कि जीवन क्या है। प्रतिदिन, वे बस पेट भर खाना खाते हैं और सो जाते हैं। मैंने तुम्‍हें सच्चा मार्ग प्रदान किया है, फिर भी तुमने उसे प्राप्त नहीं किया है, तुम्‍हारे हाथ खाली हैं। क्या तुम इस जीवन में एक सूअर का जीवन जीते रहना चाहते हो? ऐसे लोगों के जिंदा रहने का क्या अर्थ है? तुम्‍हारा जीवन घृणित और नीच है, तुम गंदगी और व्यभिचार में जीते हो और किसी लक्ष्य को पाने का प्रयास नहीं करते हो, तो क्या तुम्‍हारा जीवन अत्यंत निकृष्ट नहीं है? क्या तुममें परमेश्वर का सामना करने की हिम्मत है? यदि तुम इसी तरह अनुभव करते रहे, तो क्या केवल शून्य ही तुम्हारे हाथ नहीं लगेगा? तुम्हें सच्चा मार्ग प्रदान किया गया है, किंतु अंततः तुम उसे प्राप्त कर पाओगे या नहीं, यह तुम्हारे अपने अनुसरण पर निर्भर करता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। जैसे-जैसे मैं परमेश्वर के वचनों पर मनन करती गई, वे मेरे दिल को बेधते गए। क्या मैं ठीक उसी तरह की इंसान नहीं थी जिसे परमेश्वर उजागर करता है, एक ऐसी इंसान जो हमेशा देह के लिए सुकून खोजती है और जिसमें दिल और आत्मा का अभाव है? मेरा शुरू में परमेश्वर में विश्वास करने का कारण यह था कि मेरा परिवार हमेशा मुश्किलों का सामना करता रहता था और मैं बस किसी सहारे की तलाश में थी। जब मैंने सुना कि परमेश्वर लोगों को बचा सकता है और शांति और आशीष प्रदान कर सकता है, तो मैंने परमेश्वर को अपना महान उद्धारकर्ता माना। मुझे लगता था कि जब तक मैं उचित रूप से परमेश्वर में विश्वास करती रहूँगी और अपना कर्तव्य निभाती रहूँगी, वह मेरे परिवार को सुकून का आशीष देगा और हमें आपदा और विपत्ति से बचाए रखेगा। जब मेरे पति को निर्माण का ठेका मिला और हमारे परिवार की रहन-सहन की स्थितियाँ सुधर गईं तो मैंने परमेश्वर का दिल खोलकर धन्यवाद किया और मैं अपने कर्तव्य में और भी अधिक सक्रिय हो गई। लेकिन जब पति के निर्माण-स्थल पर दुर्घटना हुई, हम मुआवजा वहन नहीं कर सके और उसे जेल की सजा हो गई, तो मैंने शिकायत की कि परमेश्वर ने मेरी रक्षा नहीं की और मैं परमेश्वर के वचन खाना-पीना और प्रार्थना करना नहीं चाहती थी। मैंने यह तक महसूस किया कि परमेश्वर पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है और यह तक सोचा कि मैं पैसे कमाने के लिए एक अंशकालिक नौकरी पाकर अपने लिए कोई उपाय खोज लेती हूँ। ज़रा सोचो, परमेश्वर अंत के दिनों में देहधारी हुआ और मनुष्य को प्रचुर सत्य प्रदान करने के लिए पृथ्वी पर आया, ताकि लोग उनके कार्य का अनुभव कर सकें, सत्य का अनुसरण कर सकें और स्वभाव में बदलाव ला सकें, जिससे वे अंततः बचाए जा सकें और उसके राज्य में प्रवेश कर सकें। यह मानवजाति के लिए परमेश्वर का महान प्रेम और उद्धार है। लेकिन परमेश्वर में मेरे विश्वास में, मेरे अनुसरण के लक्ष्य गलत थे; मैं केवल देह के सुख का आनंद लेना चाहती थी, और यह कपोल-कल्पना भी करती थी कि अगर एक व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास करेगा तो उसके पूरे परिवार को आशीष मिलेगा। क्या यह आस्था को लेकर ठीक वही दृष्टिकोण नहीं है जो धार्मिक लोगों में होता है? अंत के दिनों में, परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है, लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को शुद्ध करने के लिए सत्य व्यक्त करता है। परमेश्वर आशा करता है कि हर कोई सत्य का अनुसरण और इसे प्राप्त कर सकता है और एक सार्थक जीवन जी सकता है। लेकिन मैं हमेशा बस अनुग्रह और आशीषों का अनुसरण करती रही, एक पशु की तरह दैहिक सुख खोजती रही। यह सबसे दयनीय और बेकार किस्म का जीवन है। अगर मैं इसी तरह अनुसरण करती रही, तो मैं सत्य प्राप्त करने में विफल रहूँगी और अपने स्वभाव में कोई बदलाव हासिल नहीं करूँगी। क्या मैं तब खाली हाथ नहीं रह जाऊँगी, और मेरे पास दिखाने के लिए कुछ भी नहीं होगा? अंत में, मुझे फिर भी परमेश्वर द्वारा हटा दिया जाएगा। मैंने देखा कि मैं कितनी मूर्ख और अज्ञानी थी!

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा, और अपनी प्रकृति के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अपने कर्तव्य के प्रति मसीह-विरोधियों के मुख्य इरादों और रवैयों में से एक है परमेश्वर के साथ लेन-देन करने और अपने इच्छित लाभ प्राप्त करने के अवसर के रूप में इसका इस्तेमाल करना। वे यह भी मानते हैं : ‘जब लोग परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपने परिवारों और अपनी सांसारिक संभावनाओं को त्याग देते हैं तो यह कहने की जरूरत नहीं है कि बदले में उन्हें कुछ हासिल होना चाहिए, कुछ प्राप्त करना चाहिए, केवल यही उचित और न्यायसंगत है। अगर तुम अपना कर्तव्य निभाने के बदले में कुछ भी प्राप्त नहीं करते हो तो भले ही तुम्हें कुछ सत्य प्राप्त हो जाएँ, इसकी कोई अहमियत नहीं है। स्वभाव में बदलाव भी ऐसा मूर्त लाभ नहीं है—भले ही तुम्हें उद्धार प्राप्त हो गया हो, कोई भी इसे नहीं देख पाएगा!’ ये छद्म-विश्वासी मानवजाति के लिए परमेश्वर की किसी भी अपेक्षा को अनदेखा कर देते हैं। वे इसे नहीं स्वीकारते या इस पर विश्वास नहीं करते हैं और वे नकारने का रवैया अपनाते हैं। अपने कर्तव्य के प्रति मसीह-विरोधियों के रवैयों और इरादों को देखा जाए तो वे साफ तौर पर सत्य का अनुसरण करने वाले लोग नहीं हैं, बल्कि वे छद्म-विश्वासी और अवसरवादी हैं; वे शैतान के हैं। क्या तुम लोगों ने सुना है कि शैतान निष्ठा से कोई कर्तव्य निभा सकता है? (नहीं।) अगर शैतान परमेश्वर के सामने अपना ‘कर्तव्य’ निभा सकता है, तो यह कर्तव्य उद्धरण चिह्नों में लिखा जाना चाहिए, क्योंकि शैतान इसे निष्क्रिय रूप से और मजबूरी में कर रहा है; शैतान परमेश्वर द्वारा संचालित किया जा रहा है और परमेश्वर उसका उपयोग कर रहा है। इसलिए, अपने मसीह-विरोधी सार के कारण और क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते, वे सत्य से विमुख हैं, इससे भी अधिक, अपनी दुष्ट प्रकृति के कारण मसीह-विरोधी सृजित प्राणियों के रूप में अपने कर्तव्यों को बिना शर्त या बिना प्रतिफल के नहीं निभा सकते, ना ही वे अपने कर्तव्यों को निभाते हुए सत्य का अनुसरण कर सकते हैं या सत्य प्राप्त कर सकते हैं या परमेश्वर के वचनों की अपेक्षाओं के अनुसार काम कर सकते हैं(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग सात))। परमेश्वर उजागर करता है कि मसीह-विरोधियों में एक स्वार्थी और नीच प्रकृति होती है और वे सत्य से विमुख होते हैं। अपना कर्तव्य निभाने में वे परमेश्वर के साथ बस सौदेबाजी करने की कोशिश कर रहे होते हैं। उनका मानना है कि चूँकि उन्होंने अपने कर्तव्य में चीज़ों का त्याग करके और खुद को खपाकर एक कीमत चुकाई है, इसलिए परमेश्वर को उनकी माँग पर उन्हें अनुग्रह और आशीष प्रदान करना ही चाहिए, और यही एकमात्र निष्पक्ष और उचित तरीका है; अन्यथा, परमेश्वर धार्मिक नहीं होगा। मेरा प्रकृति सार भी बिल्कुल उतना ही कुरूप और दुष्टतापूर्ण था जितना एक मसीह-विरोधी का होता है। इन सारे वर्षों में, मैं अपने पति द्वारा रोके जाने और रिश्तेदारों द्वारा मजाक उड़ाए जाने के बावजूद सिर्फ और सिर्फ परमेश्वर से अधिक बड़े आशीष प्राप्त करने के खातिर अपने कर्तव्य में जुटी रह पाई। मैंने हमेशा यही माना था कि अगर मैं परमेश्वर के लिए खुद को खपाऊँगी और अपना कर्तव्य निभाऊँगी, तो वह मुझे आशीष देगा और मेरी रक्षा करेगा, मुझे एक चिंता-मुक्त जीवन देगा, एक ऐसा सुकून वाला जीवन जिसमें सब कुछ सुचारु रूप से चलता हो। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे पति के निर्माण-स्थल पर कोई दुर्घटना हो जाएगी, और मुआवजा वहन न कर पाने के कारण उसे जेल की सजा हो जाएगी। यह मेरे लिए असहनीय था, इसलिए मैंने परमेश्वर से बहस करने के लिए अपने त्याग और खुद को खपाने का सहारा लिया, यह सवाल किया कि उसने मेरी रक्षा क्यों नहीं की और उसने मुझ पर इतनी बड़ी आपदा क्यों आने दी। मैं जीवित रहने के शैतानी नियमों के अनुसार जी रही थी, जैसे, “बिना पुरस्कार के कभी कोई काम मत करो,” “हर छोटी-से-छोटी चीज के लिए लड़ो,” और “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।” मैं चाहे जिसके साथ भी मेल-जोल करती थी, अगर मैं कोई कीमत चुकाती थी तो मैं बदले में कुछ अपेक्षा करती थी। परमेश्वर में विश्वास शुरू करने के बाद मैं स्वाभाविक रूप से उसके साथ भी सौदेबाजी करने की कोशिश करती थी। मेरा मानना था कि अगर मैं परमेश्वर के लिए पीड़ा सहती हूँ और खुद को खपाती हूँ तो उसे मुझको आशीष देना चाहिए; वरना, वह धार्मिक नहीं है। एक सच्चा विश्वासी सौदेबाजी और माँग किए बिना अपना कर्तव्य निभाता है। यह बिल्कुल नूह की तरह है, जिसने जहाज बनाने के लिए अपना सर्वस्व सौंप दिया, वह एक सौ बीस साल तक, दिन-रात जुटा रहा। उसने सिर्फ परमेश्वर का आदेश पूरा करने के लिए पीड़ा सही और कीमत चुकाई, कभी अपने व्यक्तिगत लाभ या हानि के बारे में नहीं सोचा। लेकिन शुरू से अंत तक, परमेश्वर में मेरा विश्वास सिर्फ आशीष पाने के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए उसका इस्तेमाल करने के बारे में था। मैं बिल्कुल भी सच्ची विश्वासी नहीं थी; मैं परमेश्वर को धोखा देने और इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही थी। मेरी प्रकृति एक मसीह-विरोधी की तरह ही दुष्ट और धोखेबाज़ थी। मैं ठीक वैसी ही छद्म-विश्वासी और अवसरवादी थी जिसे परमेश्वर उजागर करता है। यह देखते हुए कि मेरे क्रियाकलाप इतने विद्रोहपूर्ण थे और इन्होंने परमेश्वर के दिल को इतनी गहराई तक आहत किया था, मैं अपराध-बोध और आत्म-ग्लानि से भर गई। फिर मैंने परमेश्वर से दोबारा प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं इतनी मानवता-रहित और विवेक-रहित हूँ। तुममें मेरा विश्वास और मेरा अपने कर्तव्य का निर्वहन, ये सब तुम्हारे साथ सौदेबाजी करने और तुम्हें धोखा देने के प्रयास रहे हैं। मैंने तुम्हें इतना अधिक निराश किया है! मैं पश्चात्ताप करने को तैयार हूँ। मैं उन परिस्थितियों के प्रति समर्पण करूँगी जिनका इंतजाम तुमने किया है और अब विद्रोह नहीं करूँगी और तुम्हारा दिल नहीं तोड़ूँगी।”

बाद में, मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े, और उनमें अभ्यास का एक मार्ग पाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “उसने आशीषें प्राप्त करने को अनुसरण के लिए एक वैध लक्ष्य माना। यह गलत कैसे है? यह पूरी तरह से सत्य के विपरीत है और लोगों को बचाने के परमेश्वर के इरादे के अनुरूप नहीं है। चूँकि आशीषें प्राप्त करना लोगों के लिए अनुसरण करने का वैध लक्ष्य नहीं है, तो वैध लक्ष्य क्या है? सत्य का अनुसरण करना और स्वभाव में बदलाव लाना ताकि परमेश्वर के सभी आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने में सक्षम हो सकें—यही वह लक्ष्य है जिसका लोगों को अनुसरण करना चाहिए। ... जब तुम आशीषों की इच्छा को छोड़ देते हो और तुम सत्य के अनुसरण के मार्ग पर चलते हो, तो तुम्हारे कंधों से एक बोझ उतर जाता है। क्या तुम तब भी नकारात्मक हो सकते हो? यद्यपि अभी भी ऐसे समय होंगे जब तुम नकारात्मक होगे, तुम इससे बाधित नहीं होगे। अपने दिल में, तुम प्रार्थना करते रहोगे और संघर्ष करते रहोगे, अपने अनुसरण के लक्ष्य को आशीषें प्राप्त करने और एक निश्चित मंज़िल पाने की खोज से, सत्य का अनुसरण करने में बदल दोगे। तुम मन ही मन सोचोगे, ‘सत्य का अनुसरण करना एक सृजित प्राणी का कर्तव्य है। मैं कुछ सत्यों को समझने लगा हूँ और यही सबसे बड़ी फसल, सबसे बड़ा आशीष है। भले ही परमेश्वर मुझे न चाहे, मुझे एक अच्छी मंज़िल न मिले और आशीषें प्राप्त करने की मेरी उम्मीदें टूट जाएँ, मैं फिर भी अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करूँगा। यह एक जिम्मेदारी है जिससे मैं भाग नहीं सकता। चाहे कोई भी कारण हो, मैं बिल्कुल भी इसे अपने कर्तव्य की पूर्ति को प्रभावित नहीं करने दे सकता और मैं इसे अपने परमेश्वर के आदेश को पूरा करने को प्रभावित नहीं करने दे सकता। यह वह सिद्धांत है जिसके अनुसार मैं आचरण करता हूँ।’ क्या यह देह की बाधाओं को पार करना नहीं है?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अभ्यास जीवन प्रवेश प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गई कि परमेश्वर में विश्वास करने में व्यक्ति को सत्य का और स्वभाव में बदलाव का अनुसरण करना चाहिए और परमेश्वर जिन परिवेशों का इंतजाम करता है उनमें सत्य खोजना चाहिए और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। चाहे हमें आशीष मिले या विपत्ति का सामना करना पड़े, हमें अपना कर्तव्य अवश्य ही उचित ढंग से निभाना चाहिए। यही एक विश्वासी के लिए चलने का सही मार्ग है। अतीत में, मेरा दिल आशीषों की इच्छा से भरा होता था। जब आपदा मार करती थी तो मैं हमेशा इससे बच निकलना चाहती थी। मैं परमेश्वर के प्रति विद्रोह की मनोदशा में जी रही थी, जो बहुत ही वेदनाकारी और पीड़ादायी थी। आज, मैं सत्य को समझ गई हूँ। भले ही भविष्य में मुझे आशीष मिले या न मिले, मैं केवल अपने कर्तव्य पर डटी रहना चाहती हूँ और सत्य का और अपने स्वभाव में बदलाव का उचित रूप से अनुसरण करना चाहती हूँ। बाद में, मेरी मनोदशा सामान्य हो गई और मैं एक शांत दिल के साथ अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम हो गई। यूँ तो मेरे परिवार की मुश्किलें अभी भी मौजूद थीं, मैं उनका अनुभव करने के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहने को तैयार थी। मैं अब परमेश्वर से अविवेकपूर्ण माँगें नहीं करती थी और न ही मैं अब और अपनी क्षमताओं के जरिए अपनी मुश्किल दशा से निकलने का प्रयास करने के बारे में सोचती थी। मुझे पता भी नहीं चला और मैं परमेश्वर के मार्गदर्शन को देखने लगी। लगभग उस एक साल के दौरान जब मेरे पति जेल में थे, मेरी बड़ी बेटी ने अपनी छोटी बहन की रोज़मर्रा की ज़रूरतों और पढ़ाई का ध्यान रखा, इसलिए मुझे चिंता नहीं करनी पड़ी। जहाँ तक मुआवजे की बात है, पीड़ित के परिवार ने देखा कि हम वास्तव में भुगतान करने में असमर्थ थे और उसने इस मामले को आगे नहीं बढ़ाया। मैंने सचमुच महसूस किया कि परमेश्वर शुरू से ही मेरी गुपचुप मदद करता आ रहा था, मुझे मेरे जीवन के सबसे कठिन दौर से निकाल रहा था।

यूँ तो उस एक साल से कुछ ऊपर के समय तक मुझे थोड़ी-बहुत पीड़ा और यंत्रणा से गुज़रना पड़ा, लेकिन मुझे अपनी स्वार्थी और नीच प्रकृति का और उस गलत मार्ग का पता चल गया जिस पर मैं अपनी आस्था में चल रही थी। मुझे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की सही समझ भी मिली। मैंने देखा कि परमेश्वर जो कुछ भी आयोजित और व्यवस्थित करता है, वह अच्छा और मेरे जीवन के लिए फायदेमंद है। मैं वास्तव में यह समझ गई हूँ कि विपत्ति का सामना करना कोई बुरी बात नहीं है। तुम चाहे किसी भी पीड़ा का अनुभव करते हो, अगर तुम सत्य को समझ सकते हो और तुम्हारा जीवन संवृद्धि कर सकता है, तो यह परमेश्वर का आशीष प्राप्त करना है। परमेश्वर का धन्यवाद!

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