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परमेश्वर की सृष्टि को उसके अधिकार का पालन करना चाहिये

I

प्रचंड आग है परमेश्वर जो नहीं करता अपराध सहन।

दख़लंदाज़ी करे या आलोचना करे उसके काम और वचन की,

ये हक नहीं है इंसान को,

चूँकि उसने बनाया है इंसान को,

उनका पालन करना चाहिये इंसान को, इंसान को।

परमेश्वर प्रभु है, सृजन का प्रभु है,

अपने लोगों पर शासन करने, प्रयोग में लाता है अपने अधिकार को।

हर प्राणी को इसका पालन करना चाहिये,

वो जो कहता है उसे श्रद्धा से करना चाहिये,

कोई तर्क या विरोध नहीं करना चाहिये।

II

हालाँकि निर्लज्ज हो, ढीठ हो तुम,

नाफ़रमानी करते हो परमेश्वर के वचनों की तुम लोग,

तुम्हारी विद्रोहशीलता को सहता है वो,

मल में कुलबुलाते भुनगों से बेपरवाह,

काबू में रखकर अपने क्रोध को,

काम करता रहेगा वो, काम करता रहेगा वो।

III

परमेश्वर की इच्छा की ख़ातिर

अपने कथनों की पूर्णता तक,

अपने आख़िरी पल तक,

उन चीज़ों को सहता है, जिनसे नफ़रत करता है परमेश्वर।

परमेश्वर प्रभु है, सृजन का प्रभु है,

अपने लोगों पर शासन करने, प्रयोग में लाता है अपने अधिकार को।

हर प्राणी को इसका पालन करना चाहिये,

वो जो कहता है उसे श्रद्धा से करना चाहिये,

कोई तर्क या विरोध नहीं करना चाहिये,

नहीं करना चाहिये, नहीं करना चाहिये।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

पिछला:विश्वास के लिए मुख्य है परमेश्वर के वचनों को जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना

अगला:इंसान का अंत तय करता है परमेश्वर, उनके सार के अनुसार

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