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परमेश्वर को अर्पित करना सबसे मूल्यवान बलिदान

I

बरसों की मुश्किलों, ताड़ना और शुद्धिकरण के बाद,

आख़िरकार तूफ़ानों से टूट चुका इंसान,

अब रूमानियत, गौरव खो चुका इंसान।

समझता है अब वो इंसान होने का सच और परमेश्वर का समर्पण।

और इसलिये अर्पित करता है वो, सबसे मूल्यवान बलिदान परमेश्वर को,

और इसलिये अर्पित करता है वो, सबसे मूल्यवान बलिदान परमेश्वर को,

जो मुस्करा रहा है देखकर उसे।

II

उसे घृणा है अपनी दुष्टता से, नफ़रत है अपनी असभ्यता से,

मिथ्या-धारणा से और परमेश्वर की माँगों से।

वो पलट नहीं सकता है समय को, अपने पछतावे बदल नहीं सकता है वो।

मगर परमेश्वर का वचन, प्रेम देते हैं उसे नया जीवन।

और इसलिये अर्पित करता है वो, सबसे मूल्यवान बलिदान परमेश्वर को,

और इसलिये अर्पित करता है वो, सबसे मूल्यवान बलिदान परमेश्वर को,

जो मुस्करा रहा है देखकर उसे।

III

दिन-ब-दिन भरते हैं घाव, लौटती है शक्ति इंसान की।

उठकर निहारता है चेहरा सर्वशक्तिमान का,

और पाता है, परमेश्वर तो सदा से है यहाँ,

अब भी उतनी मोहक है उसकी मुस्कान और उसका प्रेम।

और इसलिये अर्पित करता है वो, सबसे मूल्यवान बलिदान परमेश्वर को,

और इसलिये अर्पित करता है वो, सबसे मूल्यवान बलिदान परमेश्वर को,

जो मुस्करा रहा है देखकर उसे।

IV

उसके दिल में फ़िक्र है इंसान की;

उतने ही स्नेही और मज़बूत हैं उसके हाथ,

जितने शुरुआत से हमेशा रहे हैं।

जैसे अदनवाटिका में इंसाँ लौट आया हो।

विरोध करता है वो सर्प का, मुड़ता है यहोवा की ओर।

और इसलिये अर्पित करता है वो, सबसे मूल्यवान बलिदान परमेश्वर को,

और इसलिये अर्पित करता है वो, सबसे मूल्यवान बलिदान परमेश्वर को,

जो मुस्करा रहा है देखकर उसे।

हे मेरे प्रभु! हे मेरे परमेश्वर!

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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