परिचय
राज्य के युग में परमेश्वर नए युग की शुरुआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने और उस संपूर्ण युग का काम करने के लिए वचनों का उपयोग करता है। यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर वचन के युग में कार्य करता है। वह देहधारी हुआ है और विभिन्न दृष्टिकोणों से बोलता है, जिससे मनुष्य सचमुच परमेश्वर को देखे, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, और उसकी बुद्धि और चमत्कार को देखे। परमेश्वर इस तरह कार्य करता है ताकि लोगों को जीतने, लोगों को पूर्ण बनाने और लोगों को निकाल देने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल करे। वचन के युग में कार्य करने के लिए वचनों के उपयोग का यही वास्तविक अर्थ है। वचनों के द्वारा लोग परमेश्वर के कार्यों को, परमेश्वर के स्वभाव को, मनुष्य के सार के साथ ही यह जान पाते हैं कि मनुष्य को किसमें प्रवेश करना चाहिए। वचन के युग में परमेश्वर जो भी कार्य करना चाहता है, वह सारा वचनों के जरिए पूरा होता है। वचनों के माध्यम से लोगों को प्रकट किया और निकाला जाता है और उनका परीक्षण किया जाता है। लोगों ने इन वचनों को देखा है, इन वचनों को सुना है और इन वचनों के अस्तित्व को पहचाना है। इसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करने लगे हैं, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि के साथ ही साथ मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेममय और बचाने वाले हृदय पर विश्वास करने लगे हैं। यद्यपि “वचन” शब्द साधारण और सरल है, पर देहधारी परमेश्वर के मुख से निकले वचन ब्रह्माण्ड को झकझोरते हैं; लोगों के हृदय को रूपांतरित करते हैं, उनकी धारणाओं और पुराने स्वभावों को रूपांतरित करते हैं और समस्त संसार के पुराने स्वरूप में परिवर्तन लाते हैं। युगों-युगों में केवल आज का परमेश्वर इस प्रकार से कार्य करता है और केवल वही इस प्रकार से बोलता है और इस प्रकार मनुष्य को बचाता है। इसके बाद से मनुष्य परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में, उसके वचनों की चरवाही और आपूर्ति में जीवन जीता है; सभी लोग वचनों के संसार में जीते हैं, परमेश्वर के वचनों के अभिशापों और आशीषों के बीच जीते हैं और अधिकतर लोग परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना के अधीन जीते हैं। ये वचन और यह कार्य सब कुछ मनुष्य के उद्धार, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने और पुरानी सृष्टि के संसार के मूल स्वरूप को बदलने के लिए हैं। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि वचनों के उपयोग से की, वह समस्त ब्रह्माण्ड में मनुष्य की अगुवाई वचनों के द्वारा करता है, वह वचनों के द्वारा उन्हें जीतता और उनका उद्धार करता है और अंत में वह वचनों के उपयोग से समस्त पुरानी दुनिया का अंत कर देगा और इस प्रकार अपनी संपूर्ण प्रबंधन योजना पूरी करेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है
मेरे वचन सदा अपरिवर्तनीय सत्य हैं। मैं मनुष्य के लिए जीवन की आपूर्ति और मानवजाति के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हूँ; मेरे वचनों का मूल्य और अर्थ इससे निर्धारित नहीं होता कि क्या उन्हें मानवजाति मानती या स्वीकार करती है, बल्कि स्वयं वचनों के सार से निर्धारित होता है; और भले ही इस पृथ्वी पर एक भी व्यक्ति मेरे वचन न स्वीकार कर सके, तो भी मेरे वचनों के मूल्य और मानवजाति के लिए उनके उपकार का आकलन करना किसी भी मनुष्य के लिए असंभव है। इसलिए मेरे वचनों के खिलाफ विद्रोह करने वाले, उनका खंडन करने वाले या उनका पूरी तरह से तिरस्कार करने वाले बहुत से लोगों से सामना होने पर मेरा रवैया केवल यह रहता है : समय और तथ्यों को मेरी गवाही देने दो और यह साबित करने दो कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं। उन्हें यह साबित करने दो कि जो कुछ मैंने कहा है वह सब सही है और वह ऐसा है जो मनुष्य के पास होना चाहिए और इतना ही नहीं, जो मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए। मैं निश्चित करूँगा कि जो लोग मेरा अनुसरण करते हैं वे इस तथ्य को जान लें : जो लोग पूरी तरह से मेरे वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों का अभ्यास नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों में कोई लक्ष्य नहीं खोज सकते और जो मेरे वचनों के माध्यम से उद्धार का अनुग्रह प्राप्त नहीं कर सकते, वे ऐसे लोग हैं जिनकी मेरे वचन निंदा करते हैं; यही नहीं, वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने मेरे उद्धार का अनुग्रह गँवा दिया है, और मेरा डंडा उन्हें कभी नहीं छोड़ेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए
परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन बाहरी तौर पर देखने में चाहे सरल हों या गहन, वे सब ऐसे सत्य हैं जो मनुष्य के जीवन प्रवेश के लिए अपरिहार्य हैं; वे जीवनदायी जल के ऐसे स्रोत हैं जो मनुष्य को आत्मा और देह दोनों में जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्य को जीवित रहने के लिए जरूरी चीजें मुहैया कराते हैं; जैसे कि उसके दैनिक जीवन में स्व-आचरण के नियम और सिद्धांत; उद्धार पाने का अनिवार्य मार्ग और साथ ही उद्धार पाने के लिए लक्ष्य और दिशा; हर वह सत्य जो उसमें परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के रूप में होना चाहिए; और हर वह सत्य कि मनुष्य परमेश्वर के प्रति कैसे समर्पण करे और कैसे उसकी आराधना करे। वे मनुष्य के जीवित बने रहने की गारंटी हैं, वे मनुष्य की दैनिक रोटी हैं और वे ऐसा मजबूत सहारा भी हैं जो मनुष्य को सशक्त होने और अडिग रहने में सक्षम बनाता है। परमेश्वर के वचन उस सत्य वास्तविकता से संपन्न हैं, जिससे सृजित मानवजाति सामान्य मानवता को जीती है, वे उस सत्य से समृद्ध हैं, जिससे मानवता भ्रष्टता से मुक्त होती है और शैतान के फंदे से निकलती है, वे उस गंभीर और धैर्यपूर्ण शिक्षा, प्रोत्साहन, उत्साहवर्धन और सांत्वना से संपन्न हैं, जो सृष्टिकर्ता सृजित मानवता को देता है। वे ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं जो मनुष्य को सभी सकारात्मक चीजों को समझने का मार्गदर्शन और प्रबोधन देते हैं; वे यह सुनिश्चित करने की गारंटी हैं कि मनुष्य वह सब जिएगा और हासिल करेगा जो न्यायसंगत, सुंदर और अच्छा है, वे ऐसे मापदंड हैं जिनसे सभी लोगों, घटनाओं और चीजों को मापा जाता है और वे मार्गदर्शक चिह्न भी हैं जो मनुष्य को उद्धार की तरफ और रोशनी के मार्ग पर ले जाते हैं।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, प्रस्तावना
“संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन” में परमेश्वर, आत्मा के परिप्रेक्ष्य से वचन व्यक्त करता है। जिस ढंग से वह बोलता है, वह सृजित मानवजाति द्वारा अप्राप्य है। और तो और, उसके वचनों की शब्दावली और शैली सुंदर और प्रेरक है, और मानव-साहित्य का कोई भी रूप उनका स्थान नहीं ले सकता। जिन वचनों से वह मनुष्य को उजागर करता है, वे सटीक हैं, किसी भी दर्शनशास्त्र द्वारा उनका खंडन नहीं किया जा सकता और वे सभी लोगों को पूरी तरह मना लेते हैं। परमेश्वर जिन वचनों से मनुष्य का न्याय करता है, वे एक पैनी तलवार की तरह लोगों की आत्मा पर इतनी गहराई से सीधे चोट करते हैं, इतने भीतर तक चीरते हैं कि उनके पास छिपने के लिए कोई जगह नहीं रहती। जिन वचनों से वह लोगों को सांत्वना देता है, उनमें दया और प्रेममयी अनुकंपा होती है, वे एक ममतामयी माँ के आलिंगन के समान स्नेही होते हैं और लोगों को पहले से कहीं अधिक सुरक्षित महसूस करवाते हैं। इन कथनों की अकेली सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस चरण के दौरान, परमेश्वर न तो यहोवा या यीशु मसीह की पहचान का और न ही अंत के दिनों के मसीह की पहचान का उपयोग करके बोलता है। बल्कि वह सृष्टिकर्ता की अपनी अंतर्निहित पहचान का उपयोग करते हुए, उन सभी लोगों से बोलता है, उन्हें शिक्षा देता है जो उसका अनुसरण करते हैं और उन्हें भी जिन्होंने अभी उसका अनुसरण करना शुरू नहीं किया है। यह कहना उचित है कि दुनिया के सृजन के बाद यह पहली बार है कि परमेश्वर ने समस्त मानवजाति को संबोधित किया है। इससे पहले परमेश्वर ने कभी भी इतने विस्तार से और इतने व्यवस्थित तरीके से सृजित मानवजाति से बात नहीं की है। निस्संदेह, यह भी पहली बार ही है कि उसने इतनी अधिक और इतनी दीर्घकालीन अवधि तक समस्त मानवजाति से बात की है। यह अभूतपूर्व है। इसके अलावा, ये कथन मानवता के बीच परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया पहला पाठ हैं जिसमें वह लोगों को उजागर करता है, उनका मार्गदर्शन करता, उनका न्याय करता, उनसे खुलकर बात करता है और वे ऐसे पहले कथन भी हैं जिनमें परमेश्वर अपने पदचिह्नों से, उस स्थान से जिसमें वह वास करता है, परमेश्वर के स्वभाव से, परमेश्वर के स्वरूप से, परमेश्वर के विचारों और मानवता के लिए अपनी चिंता से लोगों को रूबरू कराता है। यह कहा जा सकता है कि ये ही पहले कथन हैं जो परमेश्वर ने सृजन के बाद तीसरे स्वर्ग से मानवजाति के लिए बोले हैं और पहली बार ऐसा हुआ है कि परमेश्वर ने मानवजाति पर प्रकट होने और वचनों के बीच अपने हृदय की वाणी व्यक्त करने के लिए अपनी अंतर्निहित पहचान का उपयोग किया है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, परिचय
जीवन का मार्ग कोई ऐसी चीज नहीं है जो हर व्यक्ति के पास हो, न ही यह कोई ऐसी चीज है जिसे हर व्यक्ति आसानी से प्राप्त कर सके। ऐसा इसलिए है क्योंकि जीवन केवल परमेश्वर से आ सकता है, कहने का तात्पर्य यह है कि केवल स्वयं परमेश्वर के पास जीवन का सार है और केवल स्वयं परमेश्वर के पास जीवन का मार्ग है। और इसलिए केवल परमेश्वर ही जीवन का स्रोत है और जीवन के जीवंत जल का सदा बहने वाला झरना है। संसार के सृजन के समय से ही परमेश्वर ने बहुत सारा कार्य किया है जो अपने साथ जीवन की प्राणशक्ति लेकर चलता है, उसने मनुष्य को जीवन प्रदान करने वाला काफी सारा कार्य किया है और उसने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है जो मनुष्य को जीवन प्राप्त करने में सक्षम बनाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि स्वयं परमेश्वर ही अनंत जीवन है और स्वयं परमेश्वर ही वह मार्ग है, जिससे मनुष्य पुनर्जीवित हो सकता है। परमेश्वर मनुष्य के हृदय से कभी अनुपस्थित नहीं होता और हर समय लोगों के बीच रहता है। वह मनुष्य के जीवन की प्रेरक शक्ति, मनुष्य के जीवित रहने का मूल और जन्म लेने के बाद मनुष्य के जीवित रहने के लिए समृद्ध संसाधन रहा है। वह लोगों को पुनः जन्म लेने में समर्थ बनाता है और उन्हें अपनी हर व्यक्तिगत भूमिका में दृढ़तापूर्वक जीने में समर्थ बनाता है। उसके सामर्थ्य और उसकी अविनाशी जीवन-शक्ति के सहारे मनुष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहा है जबकि परमेश्वर के जीवन का सामर्थ्य मनुष्यों के बीच निरंतर सहारा देता रहा है, और परमेश्वर ने वह कीमत चुकाई है जो किसी साधारण मनुष्य ने कभी नहीं चुकाई। परमेश्वर की जीवन-शक्ति किसी भी सामर्थ्य पर भारी है; इससे भी अधिक, यह किसी भी सामर्थ्य से बढ़कर है। उसका जीवन अनंत है, उसका सामर्थ्य असाधारण है और उसकी जीवन-शक्ति को कोई भी सृजित प्राणी या शत्रु शक्ति दबा नहीं सकती। परमेश्वर की जीवन-शक्ति हर समय और हर स्थान पर विद्यमान रहती है और तेज चमक बिखेरती है। स्वर्ग और पृथ्वी में जबरदस्त बदलाव हो सकते हैं, परंतु परमेश्वर का जीवन हमेशा एक-समान रहता है। हर चीज का अस्तित्व समाप्त हो सकता है, परंतु परमेश्वर के जीवन का अस्तित्व फिर भी रहेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर सभी चीजों के जीवित रहने का स्रोत और मूल है जिस पर सभी चीजें जीवित रहने के लिए निर्भर करती हैं। मनुष्य का जीवन परमेश्वर से उत्पन्न होता है, स्वर्ग का अस्तित्व परमेश्वर के कारण है और पृथ्वी का बचे रहना भी परमेश्वर के जीवन के सामर्थ्य से उत्पन्न होता है। कोई भी जीवित वस्तु परमेश्वर की संप्रभुता से परे नहीं जा सकती और जीवन शक्ति से युक्त कोई भी वस्तु परमेश्वर के अधिकार क्षेत्र के दायरे से नहीं बच सकती। इस प्रकार से सभी लोगों को, चाहे वे कोई भी हों, परमेश्वर के प्रभुत्व के आगे आत्मसमर्पण कर देना चाहिए, सभी लोगों को परमेश्वर के नियंत्रण के अधीन रहना चाहिए, और उनमें से कोई भी उसके हाथों से बच नहीं सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है
अंत के दिनों का मसीह जीवन लाता है, और सत्य का स्थायी और शाश्वत मार्ग लाता है। यह सत्य वह मार्ग है, जिसके द्वारा मनुष्य जीवन प्राप्त करता है, और यही एकमात्र मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जाएगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह द्वारा प्रदान किया गया जीवन का मार्ग नहीं खोजते, तो तुम यीशु की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं करोगे, और स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश करने के योग्य कभी नहीं हो पाओगे, क्योंकि तुम इतिहास की कठपुतली और कैदी दोनों ही हो। जो लोग विनियमों से, शब्दों से और इतिहास की बेड़ियों से नियंत्रित होते हैं, वे न तो कभी जीवन प्राप्त कर पाएँगे और न ही जीवन का अनंत मार्ग प्राप्त कर पाएँगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे जो प्राप्त करते हैं वह सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन के जल के बजाय बस मैला पानी ही है, जिससे वे हजारों सालों से चिपके हुए हैं। जिन्हें जीवन के जल की आपूर्ति नहीं की जाती, वे हमेशा मुर्दे, शैतान के खिलौने और नरक की संतानें बने रहेंगे। फिर वे कैसे परमेश्वर के दर्शन कर सकते हैं? तुम केवल अतीत को पकड़े रखने की खोज में रहते हो, स्थिर खड़े रहने और चीजों को वैसे ही रखने की कोशिश करते हो और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को छोड़ने की खोज में नहीं रहते, इसलिए क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोधी नहीं होगे? परमेश्वर के कार्य के कदम उमड़ती लहरों और घुमड़ते गर्जनों की तरह जबरदस्त और शक्तिशाली हैं—फिर भी तुम निष्क्रियता से बैठकर तबाही का इंतजार करते हो, उससे चिपके रहते हो जो पुराना है और चीजों के अपनी गोद में आ गिरने की प्रतीक्षा करते हो। इस तरह, तुम्हें मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाला व्यक्ति कैसे माना जा सकता है? यह कैसे दिखा सकता है कि तुम जिस परमेश्वर को थामे हो, वह वही परमेश्वर है जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? और तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताबों के शब्द तुम्हें पार कराकर नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे परमेश्वर के कार्य के चरणों को खोजने में तुम्हारी अगुआई कैसे कर सकते हैं? और वे तुम्हें ऊपर स्वर्ग में कैसे ले जा सकते हैं? जिन्हें तुम अपने हाथों में थामे हो, वे केवल शब्द हैं, जो तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना दे सकते हैं, वे तुम्हें जीवन देने में सक्षम सत्य नहीं हैं। धर्मशास्त्र के शब्द जिन्हें तुम पढ़ते हो, वे केवल तुम्हारी जिह्वा को समृद्ध कर सकते हैं; वे बुद्धिमानी के शब्द नहीं हैं जो मानव जीवन को जानने में तुम्हारी मदद कर सकते हों, उनके तुम्हें पूर्णता की ओर ले जाने वाला मार्ग होने की बात तो दूर रही। क्या यह विसंगति तुम्हारे लिए चिंतन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें इसके भीतर समाहित रहस्यों के बारे में अंतर्दृष्टि नहीं देती है? क्या तुम अपने बल पर परमेश्वर से मिलने के लिए अपने आप को स्वर्ग भिजवाने में समर्थ हो? परमेश्वर के आए बिना, क्या तुम परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनंद मनाने के लिए अपने आप को स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? तो मेरा उपदेश यह है कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है—देखो कि अब अंत के दिनों में मनुष्य को बचाने का कार्य कौन कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी जीवन प्राप्त करोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है