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805 जो परमेश्वर का सम्मान करते हैं केवल वही परीक्षाओं में गवाह बन सकते हैं

1 परमेश्वर के प्रति अय्यूब का भय और आज्ञाकारिता मनुष्यजाति के लिए एक उदाहरण है, और उसकी सिद्धता और खराई मानवता की पराकाष्ठा थी जो मनुष्य के द्वारा अवश्य धारण की जानी चाहिए। यद्यपि उसने परमेश्वर को नहीं देखा था, फिर भी उसने यह एहसास किया कि परमेश्वर सचमुच में अस्तित्व में है, और इस एहसास की वजह से वह परमेश्वर का भय मानता था—और परमेश्वर के अपने इसी भय के कारण, वह परमेश्वर का आज्ञा पालन करने में समर्थ था। जो कुछ उसके पास है उसे लेने की उसने परमेश्वर को खुली छूट दी, फिर भी उसने कोई शिकायत नहीं की, और वह परमेश्वर के सामने गिर गया और उसने परमेश्वर से कहा कि, इसी समय, भले ही परमेश्वर उसके प्राण ले ले, फिर भी वह, बिना किसी शिकायत के, प्रसन्नता से उसे ऐसा करने देगा। उसका सम्पूर्ण आचरण उसकी सिद्धता और सच्ची मानवता के कारण था।

2 अपनी निर्दोषता, ईमानदारी, और उदारता के परिणामस्वरूप, अय्यूब परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में अपने एहसास और अनुभव में अटल था, और इस बुनियाद पर उसने स्वयं के बारे में माँगें की तथा अपनी सोच, व्यवहार, आचरण और परमेश्वर के सामने कार्यों के सिद्धान्तों को उसके लिए परमेश्वर के मार्गदर्शन और परमेश्वर के कर्मों के अनुसार मानकीकृत किया जिन्हें उसने सभी चीज़ों के बीच देखा था। समय बीतने के साथ, उसके अनुभवों ने उसमें परमेश्वर का सच्चा और वास्तविक भय उत्पन्न किया और उसे दुष्टता से दूर रखा। यह ईमानदारी का वही स्रोत था जिसे अय्यूब ने दृढ़ता से थामा।

3 अय्यूब ने ईमानदार, निर्दोष, और उदार मानवता को धारण किया था, और उसे परमेश्वर का भय मानने का, परमेश्वर का आज्ञापालन का, और दुष्टता से दूर रहने का, और साथ ही उस ज्ञान का वास्तविक अनुभव था कि "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया।" केवल इन्हीं चीज़ों की वजह से ही वह शैतान के ऐसे भयंकर हमलों के बीच डटे रहने और गवाही देने में समर्थ था, और केवल उन्हीं की वजह से वह उस वक्त परमेश्वर को निराश नहीं करने और परमेश्वर को एक संतोषजनक उत्तर देने में समर्थ था जब परमेश्वर की परीक्षाएँ उसके ऊपर आ पड़ी थीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" से रूपांतरित

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