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देहधारण के मायने

I

देहधारण के मायने हैं परमेश्वर के आत्मा का देह बनना।

इसके मायने हैं स्वयं परमेश्वर का देह बनना।

देह में उसका कार्य है आत्मा का कार्य

होता है देह के ज़रिये पूरा और व्यक्त जो।

देहधारी परमेश्वर की सेवकाई को,

परमेश्वर के देह के अलावा, पूरा कर नहीं सकता कोई।

परमेश्वर का देहधारण यानी सामान्य मानवता ही

व्यक्त कर सकती है दिव्य कार्य को।

मायने परमेश्वर के देहधारण के हैं कि

करता है एक मामूली-सा, सामान्य इंसान कार्य परमेश्वर का,

कि मानवता में परमेश्वर दिव्य कार्य करता है

और परास्त करता है शैतान को।

II

कार्य करने की ख़ातिर देह में आकर,

दिखाता है वो शैतान को, देहधारी है अब परमेश्वर।

अब सामान्य, मामूली इंसान है परमेश्वर,

फिर भी वो विजयी होकर विश्व पर शासन कर सकता है।

दिखाता है वो शैतान को, देहधारी है अब परमेश्वर।

फिर भी वो परास्त कर सकता है शैतान को,

छुटकारा दिला सकता है वो इंसान को,

जीत सकता है वो इंसान को।

मायने परमेश्वर के देहधारण के हैं कि

करता है एक मामूली-सा, सामान्य इंसान कार्य परमेश्वर का,

कि मानवता में परमेश्वर दिव्य कार्य करता है

और परास्त करता है शैतान को।

III

शैतान का लक्ष्य है इंसान को, भ्रष्ट करना,

जबकि परमेश्वर का लक्ष्य है बचाना इंसान को।

शैतान इंसान को खाई में फँसाता है,

जबकि परमेश्वर इंसान को इस से बचाता है।

शैतान हर इंसान से अपनी आराधना करवाता है,

जबकि परमेश्वर इंसान को अपने प्रभुत्व में लाता है।

क्योंकि वो प्रभु है हर सृजन का।

हाँ, वो प्रभु है हर सृजन का।

मायने परमेश्वर के देहधारण के हैं कि

करता है एक मामूली-सा, सामान्य इंसान कार्य परमेश्वर का,

कि मानवता में परमेश्वर दिव्य कार्य करता है

और परास्त करता है शैतान को।

IV

ये सारा काम होता है परमेश्वर के दो बार देहधारण से, देहधारण से।

उसका देह सार रूप में मानवता और दिव्यता का मेल है,

दिव्यता का मेल है,

उसमें सामान्य मानवता है।

मायने परमेश्वर के देहधारण के हैं कि

करता है एक मामूली-सा, सामान्य इंसान कार्य परमेश्वर का,

कि मानवता में परमेश्वर दिव्य कार्य करता है

और परास्त करता है शैतान को।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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