अपने ही परिवार की कैदी

07 दिसम्बर, 2022

2019 में मैंने परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार किया। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैंने जाना कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर मानव-जाति को बचाने के कार्य के तीन चरणों का आंतरिक सत्य, परमेश्वर के देहधारण का रहस्य, न्याय के कार्य का अर्थ बताता है, और यह कि शैतान कैसे लोगों को भ्रष्ट करता है, परमेश्वर कैसे उन्हें बचाता है, और कैसे लोग शुद्ध होकर सुंदर मंजिल पा सकते हैं। इन शब्दों में अधिकार था, मैंने उन्हें पहले कभी नहीं सुना था। वे नए और व्यावहारिक लगे और उन्होंने मेरी आपूर्ति की, मेरी आध्यात्मिक प्यास बुझाई। यकीनन सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटा हुआ प्रभु यीशु है, इससे मैं बेहद उत्साहित थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत कर पाऊँगी। उसके बाद मैं अक्सर सभाओं में जाती, सुसमाचार फैलाती, हर दिन संतोष और आनंद मिलता था। लेकिन दो महीने बाद मेरे छोटे भाई और भाभी को मेरे विश्वास का पता चल गया। मेरी भाभी चीनी है, वह सरकारी विभाग में काम करती थी, इसलिए मेरा भाई उसके साथ चीन चला गया था। मेरे भाई ने मुझे फोन करके डांटा और कहा, "चीनी सरकार सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासियों को सताती है। मैं प्रभु यीशु में विश्वास का विरोध नहीं करता, पर आप सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास नहीं कर सकतीं। आप इंसान में विश्वास करती हैं, परमेश्वर में नहीं।" सुनते ही मैं समझ गई कि मेरा भाई अफवाह दोहरा रहा है, क्योंकि अपनी खोज और जांच में मैंने सीसीपी के सताए सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के विश्वासियों के कई वीडियो देखे थे और जानती थी कि हमेशा से सच्चे मार्ग को सताया गया है। जब परमेश्वर काम करने आता है, तो उसका शैतान की ताकतों द्वारा सताया जाना तय है। वैसे ही जैसे, जब प्रभु यीशु काम करने आया, तो धार्मिक अगुआओं और रोमन शासन ने उसका जमकर विरोध किया और सताया। मैंने उससे कहा, "मेरी परमेश्वर में आस्था है, किसी व्यक्ति में नहीं। जब परमेश्वर कार्य करने और मानव-जाति को बचाने पृथ्वी पर आता है, तो उसका मानव-पुत्र बनना जरूरी है, तभी हम उसके करीब जा सकते हैं। चूंकि परमेश्वर इंसान बनता है, इसलिए उसे एक परिवार में जन्म लेकर सामान्य जीवन बिताना होता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक साधारण व्यक्ति दिखता है, पर उसके भीतर परमेश्वर का आत्मा है, उसका सार परमेश्वर का है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने कई सत्य व्यक्त किए हैं, वह इंसान को शुद्ध कर बचाने के लिए कार्य कर रहा है, जो कोई और नहीं कर सकता। प्रभु यीशु साधारण व्यक्ति दिखता था, पर उसका सार परमेश्वर का था और वह सत्य व्यक्त कर मानव-जाति को छुड़ा सकता था। साधारण लोग ऐसा नहीं कर सकते। क्या प्रभु यीशु पर आस्था किसी व्यक्ति पर आस्था रखना है? जो नहीं समझते, उसके बारे में मूर्खतापूर्ण अनुमान न लगाओ। पवित्र आत्मा की निंदा का पाप कभी माफ नहीं किया जाता। फरीसियों ने प्रभु यीशु की निंदा में कहा कि उसने बालज़बूल की मदद से दुष्टात्माओं को निकाला। अंत में उन्हें परमेश्वर ने दंडित किया और शाप दिया। मैं तुम्हें मजबूर नहीं करती, तो तुम भी मुझे परमेश्वर में विश्वास करने से मत रोको!" उसने मेरी बिल्कुल नहीं सुनी। जितना मैंने उसका खंडन किया, उतना ही उसने मुझे डांटा। उसे सीसीपी की अफवाहों के धोखे में आकर परमेश्वर की निंदा करते देख, मैं उससे मायूस हो गई। अगले दिन भाभी ने भी आस्था न रखने को मनाने के लिए मुझे फोन किया और डराने की कोशिश की, "सर्वशक्तिमान ईश्वर में आपकी आस्था चीन में अवैध है। आपको गोली मारी जा सकती है। चीन में आस्था के लिए आप काफी पहले गिरफ्तार हो जातीं। चीनी सरकार कलीसिया के हर विश्वासी को गिरफ्तार कर लेती है। कोई नहीं बचता।" भाभी की बातों से मुझे पता चला कि कैसे सीसीपी परमेश्वर का विरोध करती और ईसाइयों को सताती है, मैं परमेश्वर में आस्था रखने वाले चीनी भाई-बहनों की मुश्किल समझ गई। साथ ही, मुझे यह अजीब भी लगा। प्रभु में विश्वास के आठ साल के दौरान मेरे परिवार ने कभी दखल नहीं दिया। तो सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करते ही वे मुझे क्यों सताने लगे मेरे प्रति इतने उदासीन कैसे हो गए? तभी याद आया कि भाई-बहनों ने संगति कर बताया था कि हमेशा से सच्चे मार्ग को सताया जा रहा है, जहाँ भी परमेश्वर काम करता है, शैतान दखल देता है। मैं समझ गई कि मेरे परिवार का मुझे सताना शैतान की बाधा है, इसलिए जितना वे मुझे सताते, उतना ही मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करना, शैतान की चालों से बचना चाहती।

बाद में मेरे भाई-बहनों ने परमेश्वर के वचन साझा किए, "परमेश्वर द्वारा मनुष्य के भीतर किए जाने वाले कार्य के प्रत्येक चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो यह मानव-व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न हुआ हो। किंतु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाली हर चीज़, शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी है, और लोगों से अपेक्षित है कि वे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब को आजमाया गया था : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ दाँव लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों में किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाज़ी होती है—इस सब के पीछे एक संघर्ष होता है" (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है)। वचन पढ़कर मैं समझ गई कि यह आध्यात्मिक लड़ाई है। जब परमेश्वर किसी को बचाता है, तो शैतान उसे बाधित करने, रोकने और नरक में खींचने की पूरी कोशिश करता है। उस दिन वही हुआ, बाहर से लगता मेरे भाई-भाभी मुझे रोक रहे हैं, पर वास्तव में यह शैतान की बाधा थी। मेरे उनके साथ अच्छे संबंध थे और आमतौर पर भाई मेरी बात सुनता था, पर सीसीपी की अफवाहें सुनने के बाद मानो वे बदल गए थे। परमेश्वर को छोड़ने को मजबूर करने के लिए उन्होंने कई चालें चलीं, उनकी बातों से मेरा दिल बैठ गया। थाईलैंड में परमेश्वर में आस्था रखने पर वे मुझे काबू करना चाहते थे। अगर चीन में होती, तो वे मुझे जेल भेज चुके होते। मैंने देखा कि शैतान वास्तव में बुरा है, और मैं उनके मार्ग पर नहीं चल रही थी। ऊपर से तो वे मेरे रिश्तेदार थे, मन से हम बिलकुल अलग थे। न हमारी भाषा समान थी, न हम, और हमारे बीच पहले जैसा स्नेह नहीं था। उस शाम मैंने सीसीपी द्वारा प्रताड़ित भाई-बहनों का एक गवाही-वीडियो देखा। शरीर ने अत्यधिक कष्ट झेलकर भी उन्होंने दृढ़ता से परमेश्वर का अनुसरण किया। परमेश्वर से प्रार्थना और उसके वचन के मार्गदर्शन से वे देह की कमजोरी पर काबू पा सके, और कुछ तो अपनी जान देकर भी गवाही में दृढ़ रहे। उनके अनुभवों ने मुझे प्रेरित किया। ऐसे दर्दनाक हालात में भी वे परमेश्वर में आस्था रख पाए, शैतान के साथ समझौता नहीं किया। उनके मुकाबले मेरा उत्पीड़न तो कुछ भी नहीं था। इससे मुझे आगे के लिए और अधिक आस्था मिली।

मुझे नहीं मना पाए तो उन्होंने मेरे पति को मुझे रोकने के लिए उकसाया, कहा कि मैंने परमेश्वर में आस्था रखी तो बच्चे या परिवार नहीं चाहूंगी। पादरी ने भी मेरे पति को धोखा देने के लिए झूठी बातें फैलाईं कि मैं एक व्यक्ति में विश्वास करती हूँ। यह सुनकर मेरे पति भी उनके साथ हो लिए। जब वे मुझे ऑनलाइन सभाओं में शामिल होते या सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की वेबसाइट खोलते देखते, तो वह अक्सर घर का नेटवर्क-केबल हटा देते, फिर दरवाजा बंद कर मुझे उस कमरे में न जाने देते। मुझे परेशान करने और सभाओं में भाग लेने या परमेश्वर के वचन पढ़ने से रोकने के लिए उन्होंने सब-कुछ किया। मुझे पता था कि यह शैतान का दखल है, तो मैं पीछे नहीं हट सकती थी। जब पति ने देखा कि वह मुझे नहीं रोक सकते तो उन्होंने कहा, "यदि तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था बनाए रखी, तो हम तलाक ले लेंगे! तुम्हें घर छोड़ना होगा। आज ही फैसला कर लो!" मैंने कहा, "अगर मेरी परमेश्वर में आस्था न होती, तो आपको काफी पहले तलाक दे चुकी होती। आपकी प्रेमिका थी, पर मैंने जाने दिया, क्योंकि मेरा परमेश्वर में विश्वास है। मैं परमेश्वर में विश्वास करके कुछ गलत नहीं कर रही हूँ, तो आप मुझे रोकने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? मुझे तलाक देकर निकालना चाहते हैं, तो निकाल दीजिए। भले ही मुझे घर छोड़ना पड़े, मैं परमेश्वर में आस्था रखूँगी!" तो मैंने अपने कपड़े समेटे और एक सहेली के घर चली गई। तब मुझे नहीं पता था कि आगे क्या करना है। अपने बच्चे का सोचकर मैं घर छोड़ने से हिचक रही थी। तो, मैंने अपना हाल बताने के लिए भाई-बहनों से संपर्क किया, और मेरी बहन ने मुझे परमेश्वर के वचन का एक अंश भेजा। "परमेश्वर के कार्य के दौरान, आरंभ से लेकर अब तक, परमेश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति के लिए—या तुम लोग कह सकते हो, उस प्रत्येक व्यक्ति के लिए जो उसका अनुसरण करता है—परीक्षाएँ निर्धारित कर रखी हैं और ये परीक्षाएँ भिन्न-भिन्न आकारों में होती हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपने परिवार के द्वारा ठुकराए जाने की परीक्षा का अनुभव किया है; कुछ ने विपरीत परिवेश की परीक्षा का अनुभव किया है; कुछ लोगों ने गिरफ्तार किए जाने और यातना दिए जाने की परीक्षा का अनुभव किया है; कुछ लोगों ने विकल्प का सामना करने की परीक्षा का अनुभव किया है; और कुछ लोगों ने धन एवं हैसियत की परीक्षाओं का सामना करने का अनुभव किया है। सामान्य रूप से कहें, तो तुम लोगों में से प्रत्येक ने सभी प्रकार की परीक्षाओं का सामना किया है। परमेश्वर इस प्रकार से कार्य क्यों करता है? परमेश्वर हर किसी के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करता है? वह किस प्रकार के परिणाम देखना चाहता है? जो कुछ मैं तुम लोगों से कहना चाहता हूँ उसका महत्वपूर्ण बिंदु यह है : परमेश्वर देखना चाहता है कि यह व्यक्ति उस प्रकार का है या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है। इसका अर्थ यह है कि जब परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा ले रहा होता है, तुम्हें किसी परिस्थिति का सामना करने पर मजबूर कर रहा होता है, तो वह यह जाँचना चाहता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो उसका भय मानता और बुराई से दूर रहता है" (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें)। परमेश्वर के वचन पढ़कर मुझे समझ आया कि परिवार से मिला उत्पीड़न भी मेरीपरीक्षा थी यह देखने को कि मैं परमेश्वर को संतुष्ट करती हूँ या शैतान को। मैं समझ गई कि मुझे चुनाव करना होगा। लेकिन दिल में अभी भी उम्मीद की किरण बाकी थी। अब भी चाहती थी कि मेरे पति का मन बदल जाए। मगर मेरे पति और छोटी बहन ने मुझे ढूँढ़ लिया और कहा, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था रखना बंद करो। तुम्हें दिखता नहीं? तुम्हें अब बच्चे और परिवार से भी लगाव नहीं!" मैंने गुस्से से अपने पति से कहा, "मैंने कभी नहीं कहा कि मुझे बच्चा या परिवार नहीं चाहिए। आप ही मुझे सताते हैं, परमेश्वर पर विश्वास करने से रोकते हैं, और तलाक की धमकी देते हैं। क्या थोड़ी धार्मिक आजादी बहुत बड़ी मांग है?" मेरे पिता ने भी मुझे फोन करके कहा, "यह परमेश्वर कहाँ है? इस पर विश्वास मत करो। अपने पति के साथ घर जाओ और अच्छा जीवन जिओ!" इस पर मुझे गुस्सा आ गया और मैंने उनसे कहा, "परमेश्वर में विश्वास करना गलत नहीं। आप मुझे काबू क्यों करना चाहते हैं?" जब मेरे पिता ने देखा कि मैं अड़ी हूँ, तो फोन पर उन्होंने मेरे पति से कहा कि वह मुझे बांधकर पीटे, अगर मैं मर गई तो वे सँभाल लेंगे। उसने मुझे पीटा तो नहीं, पर मेरा बैंक-कार्ड छीन लिया और मेरा फोन और कंप्यूटर तोड़ दिया। इसके बाद मेरे पति और बहन मुझे जबर्दस्ती कार में बिठाकर घर ले गए। मेरी बगल में बैठकर वे दोनों रास्ते भर क्रूरता से पेश आते रहे। इससे मुझे समझ आया कि चीनी भाई-बहनों को गिरफ्तारी पर कैसा महसूस होता होगा। वे मुझे अपना परिवार बिल्कुल नहीं लगे, और मुझे अब उनसे कोई उम्मीद नहीं बची थी। मुझे नहीं पता था कि मेरा परिवार मुझे आगे कैसे सताएगा, इसलिए मैंने मन ही मन प्रार्थना की, परमेश्वर से सही चुनाव के लिए मार्गदर्शन करने को कहा। उस रात मुझे बहुत दुख हुआ। पहले मैं इस समय पर सुसमाचार का प्रचार करती थी, पर अब कुछ नहीं कर सकती थी। मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर में मेरी आस्था देख, मेरा परिवार मुझे सताने को एकजुट हो गया था। चूँकि मेरी भाभी चीन सरकार के लिए काम करती थी और मालदार थी, इसलिए मेरा परिवार उसके कहे पर चलता था, उसने मुझे हर तरह से सताने के लिए उकसाया, इस हद तक कि परमेश्वर में आस्था रखने देने से बेहतर वे मुझे पीट-पीटकर मार डालते। यहाँ मैंने परमेश्वर के प्रति उनके प्रतिरोध का असली चेहरा साफ देखा। वे और कुछ नहीं बल्कि दानव थे, परमेश्वर के शत्रु। मुझे खयाल आया कि अय्यूब ने इतना दर्दनाक परीक्षण झेला, पर परमेश्वर से शिकायत नहीं की। इसके बजाय उसने चुपचाप प्रार्थना कर परमेश्वर की इच्छा खोजी, तो मुझे भी दृढ़ रहने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए, और चाहे जो हो, कभी शैतान के साथ समझौता नहीं करना चाहिए।

अगले दिन मेरे पति और पिता मुझे मेरे मायके ले आए। मेरी माँ और बड़ी भाभी को मेरे भागने का डर था, इसलिए मिलते ही उन्होंने मेरी आईडी उन्हें सौंपने को कहा। वे मुझे कभी अकेले नहीं रहने देते थे। जब मैं नहाती या बाथरूम जाती, तो माँ बाहर पहरा देती। निगरानी के लिए वे मेरी भतीजी को मेरे साथ सुलाते, और अगर मैं रात को बत्ती जलाती, तो माँ तुरंत देखती कि मैं क्या कर रही हूँ और सोने को कहती। बात बर्दाश्त के बाहर तब हो जाती जब सुबह तीन-चार बजे माँ शोर मचाती, चिल्लाती और दरवाजा खटखटाती। मैं इससे बहुत कुंठित हो गई। दिन में वे मुझ पर और कड़ी नजर रखते। मैं दूसरों से बात नहीं कर सकती थी, यहाँ तक कि पड़ोसन से भी नहीं, पड़ोसी मुझे ऐसे देखते, जैसे वे मुझे जानते ही न हों। परिवार का कहा मानने के अलावा कोई चारा नहीं था। उन्होंने मुझसे कैदी जैसा सुलूक किया और मुझ पर नजर रखी। मुझे लगता था, मानो मैं जेल में हूँ। मेरे परिवार ने सीसीपी की अफवाहों और भाभी की बातों में आकर ऐसा किया। वे भाई-बहनों से मेरे संबंध तोड़ देना चाहते थे, ताकि धीरे-धीरे परमेश्वर में मेरी आस्था खत्म हो जाए। मुझे रोज बहुत दुख होता था। मुझे भाई-बहनों के साथ अपनी सभाओं की याद आती थी। परमेश्वर का कार्य समाप्त होने वाला था, पर मेरा सभाओं में जाना, परमेश्वर के वचन पढ़ना या कर्तव्य निभाना मना था। क्या मैं निकाली जाने वाली थी? इसने मुझे काफी चिंता में डाल दिया, मैं बस ये चाहती थी कि इस माहौल से निकलकर परमेश्वर में खुलकर विश्वास कर सकूँ। मैं बाथरूम में छिपकर परमेश्वर से प्रार्थना करती, कोई रास्ता खोलने को कहती। बाद में, मेरे माता-पिता ने मुझे बड़े भाई और भाभी के साथ संतरे के बाग में काम करने को कहा, जहाँ वे मेरी निगरानी कर सकें। मेरी बड़ी भाभी मुझे परमेश्वर पर विश्वास करने से ज्यादा नहीं रोकती थी, इसलिए दिन में काम के दौरान मैं उसके मोबाइल पर परमेश्वर के वचन ऑनलाइन सुनती थी। मार्ग खोलने के लिए मैंने अपने दिल की गहराइयों से परमेश्वर का धन्यवाद किया।

मुझे परमेश्वर के वचन का एक मर्मस्पर्शी अंश याद है। "इन दोनों परीक्षाओं से गुज़रने के पश्चात्, अय्यूब में एक अधिक समृद्ध अनुभव ने जन्म लिया, और इस अनुभव ने उसे और भी अधिक परिपक्व तथा तपा हुआ बना दिया, इसने उसे और मज़बूत, और अधिक दृढ़विश्वास वाला बना दिया, और इसने जिस सत्यनिष्ठा पर वह दृढ़ता से डटा रहा था उसकी सच्चाई और योग्यता के प्रति उसे अधिक आत्मविश्वासी बना दिया। यहोवा परमेश्वर द्वारा ली गई अय्यूब की परीक्षाओं ने उसे मनुष्य के प्रति परमेश्वर की चिंता की गहरी समझ और बोध प्रदान किया, और उसे परमेश्वर के प्रेम की अनमोलता को समझने दिया, जिस बिंदु से परमेश्वर के उसके भय में परमेश्वर के प्रति सोच-विचार और उसके लिए प्रेम भी जुड़ गए थे। यहोवा परमेश्वर की परीक्षाओं ने न केवल अय्यूब को उससे पराया नहीं किया, बल्कि वे उसके हृदय को परमेश्वर के और निकट ले आईं। जब अय्यूब द्वारा सही गई दैहिक पीड़ा अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गई, तब परमेश्वर यहोवा से जो सरोकार उसने महसूस किया था उसने उसे अपने जन्म के दिन को कोसने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिया। ऐसे आचरण की योजना बहुत पहले से नहीं बनाई गई थी, बल्कि यह उसके हृदय के भीतर से परमेश्वर के प्रति सोच-विचार का और उसके लिए प्रेम का स्वाभाविक प्रकाशन था, यह एक स्वाभाविक प्रकाशन था जो परमेश्वर के प्रति उसके सोच-विचार और उसके लिए उसके प्रेम से आया था। कहने का तात्पर्य यह है कि चूँकि वह स्वयं से घृणा करता था, और वह परमेश्वर को यंत्रणा देने का अनिच्छुक था, और यह सहन नहीं कर सकता था, इसलिए उसका सोच-विचार और प्रेम निःस्वार्थता के बिंदु पर पहुँच गए थे। इस समय, अय्यूब ने परमेश्वर के लिए अपनी लंबे समय से चली आती श्रृद्धा और ललक को और परमेश्वर के प्रति निष्ठा को सोच-विचार और प्रेम करने के स्तर तक ऊँचा उठा दिया था। साथ ही साथ, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आस्था और आज्ञाकारिता और परमेश्वर के भय को सोच-विचार और प्रेम करने के स्तर तक ऊँचा उठा दिया था। उसने स्वयं को ऐसा कोई कार्य नहीं करने दिया जो परमेश्वर को हानि पहुँचाता, उसने स्वयं को ऐसे किसी आचरण की अनुमति नहीं दी जो परमेश्वर को ठेस पहुँचाता, और उसने अपने को स्वयं अपने कारणों से परमेश्वर पर कोई दुःख, संताप, या यहाँ तक कि अप्रसन्नता लाने की अनुमति नहीं दी। परमेश्वर की नज़रों में, यद्यपि अय्यूब अब भी वह पहले वाला अय्यूब ही था, फिर भी अय्यूब की आस्था, आज्ञाकारिता, और परमेश्वर के भय ने परमेश्वर को पूर्ण संतुष्टि और आनन्द पहुँचाया था। इस समय, अय्यूब ने वह पूर्णता प्राप्त कर ली थी जिसे प्राप्त करने की अपेक्षा परमेश्वर ने उससे की थी; वह परमेश्वर की नज़रों में सचमुच 'पूर्ण और खरा' कहलाने योग्य व्यक्ति बन गया था" (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II)। अय्यूब ने शैतान के प्रलोभन और हमले झेले, उसके सभी बच्चे और संपत्ति छीन ली गई, उसके पूरे शरीर पर फोड़े हो गए जिनमें असहनीय दर्द था, लेकिन चूँकि उसे परमेश्वर का भय था, वह यूँ ही कुछ बोलता या करता नहीं था। इसके बजाय पहले परमेश्वर से प्रार्थना कर उसकी इच्छा खोजता था। उसने अपनी तकलीफ में परमेश्वर का साथ और लोगों के लिए उसकी परवाह महसूस की। अय्यूब परमेश्वर को कष्ट में नहीं देख सकता था, तो वह परमेश्वर के बजाय उस दिन को दोष देता था, जिस दिन वह जन्मा था। अंत में उसने अडिग रहकर शैतान को अपमानित करने वाले शब्द बोले : "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है" (अय्यूब 1:21)। अय्यूब के दोस्तों और पत्नी ने चाहे जैसे उसका मजाक उड़ाया, अय्यूब का परमेश्वर में विश्वास सच्चा रहा, उसकी गवाही ने शैतान को अपमानित किया, जो अब उस पर दोष नहीं लगा सकता था। मुझे महसूस हुआ कि इस अनुभव में मैंने शैतान के षड्यंत्र समझने के लिए परमेश्वर पर भरोसा नहीं किया या परमेश्वर के अच्छे इरादे नहीं तलाशे। बल्कि विरोध और शिकायत कर शैतान को खुद पर हँसने दिया। परमेश्वर के वचन पर सोचते हुए मैंने प्रार्थना की, जिससे मेरे भीतर आस्था बढ़ी : आगे चाहे जो आए, मैं अय्यूब का अनुकरण करूँगी, परमेश्वर की गवाही में अडिग रहकर शैतान को अपमानित करूँगी।

मैं रोज अपने बड़े भाई और भाभी के साथ खेतों में काम करने जाती थी। भाई-भाभी के बीच का प्यार और उन्हें एक-साथ आते-जाते देखकर मैं उनसे ईर्ष्या किए बिना न रह पाती। मेरा पारिवारिक जीवन सामान्य क्यों नहीं रह पाया? यह सोचकर मेरा समझौता करने का मन हुआ। खासकर रात के खाने पर जब देखती कि उनका परिवार साथ है, खुश है, जबकि मैं अकेली थी, मेरा दिल कमजोर था, तो मुझे रोना आ जाता। मुझे लगा कि मैं देह-सुख के लिए चिंतित हूँ, और मुझे परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों में देहधारण कर लोगों को शुद्ध कर बचाने के लिए सत्य व्यक्त करने की याद आई। सत्य के अनुसरण का यह महत्वपूर्ण समय था, पर मेरे पति मुझे आस्था नहीं रखने दे रहे थे। हमारे बीच कुछ भी समान नहीं था, जब हम बेमन से साथ थे, तब भी खुश नहीं थे। जब मैंने इस बारे में सोचा, तो उतना दुख नहीं हुआ। अपनी बड़ी भाभी से फोन माँगकर चुपचाप भजन सुनने लगी। "सत्य के लिए तुम्हें सब कुछ त्याग देना चाहिए" :

1 तुम्हें सत्य के लिए कष्ट उठाने होंगे, तुम्हें सत्य के लिए समर्पित होना होगा, तुम्हें सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अधिक कष्ट उठाने होंगे। यही तुम्हें करना चाहिए। एक शांतिपूर्ण पारिवारिक जीवन के लिए तुम्हें सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए, और क्षणिक आनन्द के लिए तुम्हें अपने जीवन की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए।

2 तुम्हें उस सबका अनुसरण करना चाहिए जो खूबसूरत और अच्छा है, और तुम्हें अपने जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तुम एक घिनौना जीवन जीते हो और किसी भी उद्देश्य को पाने की कोशिश नहीं करते हो तो क्या तुम अपने जीवन को बर्बाद नहीं कर रहे हो? ऐसे जीवन से तुम क्या हासिल कर पाओगे? तुम्हें एक सत्य के लिए देह के सभी सुखों को छोड़ देना चाहिए, और थोड़े-से सुख के लिए सारे सत्यों का त्याग नहीं कर देना चाहिए। ऐसे लोगों में कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं होता!

— मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ

परमेश्वर को धन्यवाद, कि मुझे इस समय यह गीत सुनने को मिला। मैं समझ गई कि थोड़े-से दैहिक आनंद के लिए मैं सत्य की खोज नहीं छोड़ सकती। अब, परमेश्वर इस युग को पूरी तरह समाप्त करने के लिए अंत के दिनों में न्याय का कार्य कर रहा है। यदि हम सत्य प्राप्त नहीं करते, तो बचने का मौका खो देंगे और आखिर में हम सभी आपदा में पड़कर बरबाद हो जाएंगे। पारिवारिक जीवन सुखी होने से क्या फर्क पड़ता है? क्या ये सब चीजें अस्थायी नहीं हैं? सत्य को न पाने से बड़ा कोई दुख और नुकसान नहीं। यह सोचकर मुझे बड़ी राहत महसूस हुई, जैसे मैं परमेश्वर के सामने ही थी। मुझे मन में सुरक्षा और खुशी महसूस हुई, अब मैं अकेली नहीं थी।

तीन हफ्ते मायके में रहने के बाद एक दिन जब मेरे परिवार का ध्यान नहीं था, तो मैं भागकर एक होटल में आ गई, पर मेरे भतीजे और बड़े भाई ने मुझे जल्द ही ढूंढ़ लिया और वापस ले गए। इसके बाद, मेरे माता-पिता ने पूरे गाँव को रात के खाने पर बुलाकर मुझ पर निगरानी रखने में मदद करने को कहा, अगर किसी को पता चले कि मैं भागी हूँ तो मुझे पकड़े। मेरे पति हमारे पांच-वर्षीय बेटे के साथ आए और बोले कि मैं विश्वास करना बंद कर उनके साथ घर चलूँ। मेरा बेटा मेरे पास नहीं आया, पूछने पर बोला, "डैड कहते हैं कि तुम पागल हो, मुझे मार दोगी।" यह सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया। मुझे यकीन नहीं हुआ कि छोटे-से बच्चे को यह सब सिखाया हैगा। फिर मेरे और बेटे के बीच संबंध सामान्य नहीं रह पाए। कैंडी खरीदकर देने पर ही मेरे बेटे ने मुझसे बात करने की हिम्मत की। मुझे बहुत दुख हुआ, काश मेरा परिवार मुझे मजबूर करने की कोशिश न करता, पर मुझे एहसास था कि यह गलत था। वे सभी परमेश्वर से घृणा करते हैं और कभी नहीं बदलेंगे। मेरे पति ने अब भी मुझे मनाने की कोशिश करते थे, माता-पिता विश्वास न करने के लिए कहते रहे। मैंने कहा, "मैं परमेश्वर में विश्वास करना नहीं छोड़ सकती।" मुझे अभी भी अडिग देख मेरे पति बेटे को वापस घर ले गए।

हफ्ते भर बाद एक सुबह मेरा भाई शहर से लौटा, तो उसके हाथ में मेरी एक ड्रेस थी। उसने कहा, "मैं तुम्हें शुद्ध कराने के लिए आज सुबह ओझा के पास गया था।" तभी मेरे पिता कमरे से निकले और मुझे जल्दी से ड्रेस पहनने का आदेश देते हुए बोले, "इसे पहनकर तुम ठीक हो जाओगी।" मैंने कहा, "मैं इसे नहीं पहनूँगी। मुझ पर भूत का साया नहीं है, न बीमारी है, मेरी सच्चे परमेश्वर में आस्था है।" जब पिता ने देखा कि मैं "इलाज" नहीं करवाऊँगी, तो उन्होंने मुझे कुर्सी पर बिठा दिया। मेरे हाथ जितनी मोटी छड़ी लेकर वे चिल्लाए, "तुम बात नहीं मानती, तो आज मैं तुम्हें सबक सिखाता हूँ! मैंने तुम्हें कभी नहीं पीटा, पर आज दिखाऊँगा कि मैं किस तरह पीटता हूँ। तब तक पीटूँगा, जब तक तुम मर न जाओ या विश्वास करना बंद न कर दो!" मैंने अपने पिता को कभी इतने गुस्से में नहीं देखा था। मुझे पिटाई का डर था, छड़ी इतनी मोटी थी कि उससे मेरी हड्डियाँ टूट सकती थीं। जब मेरे पिता ने कपड़े बदलने को कहा, तो मैंने तुरंत परमेश्वर से प्रार्थना कर कहा, चाहे कुछ भी हो, मैं शैतान के साथ समझौता नहीं कर सकती। मैंने सोचा कि शैतान ने बार-बार अय्यूब को लुभाया और हमला किया था, पर अय्यूब सच्चा बना रहा, अपनी गवाही पर अडिग रहा, अंत में शैतान अपमानित और नाकाम रहा, पूरी तरह खदेड़ दिया गया। हालाँकि मैं अय्यूब के मुकाबले बहुत तुच्छ थी, पर जानती थी कि शैतान मुझे भी पकड़कर मेरी आस्था को धीरे-धीरे तोड़ने की कोशिश में था, मुझे परमेश्वर से निराश और हताश कर रहा था, और आखिर में उसे धोखा देने को उकसा रहा था। मैं शैतान की चालों में नहीं आ सकती थी। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना कर शपथ ली, "परमेश्वर, भले ही मुझे पीट-पीटकर मार डाला जाए, मैं शैतान से समझौता नहीं करूँगी। मैं तुम पर आस्था रखना नहीं छोड़ूँगी, तुम्हारे लिए अपनी गवाही में अडिग रहूँगी।" प्रार्थना के बाद मेरा डर खत्म हो गया और मैंने सब-कुछ दाँव पर लगा दिया। भजन की एक पंक्ति मेरे मन में आने लगी, "मुझे अपनी इच्छा और अपने संकल्प को नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि वैसा करना शैतान के साथ समझौता करने के समान होगा, आत्म-विनाश जैसा होगा, और परमेश्वर को धोखा देने के बराबर होगा" (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ, सच का अनुसरण करने के लिए ज़रूरी संकल्प)। परमेश्वर के वचन की इस पंक्ति ने मुझे भरोसा और शक्ति दी। मैं शैतान से कभी समझौता नहीं करूँगी। मेरे पिताजी छड़ी लेकर आए और मुझे पीटने को हुए। वे दानव जैसे लग रहे थे, पर मैं बिल्कुल नहीं डरी। तभी मेरे पति और माँ खेत से लौट आए। मेरी माँ मेरे पिता को रोकने के लिए मेरे सामने आ गईं, और फिर मुझे विश्वास न करने के लिए मनाने लगी। मैंने कहा, "परमेश्वर में आस्था रखना चोरी-डकैती नहीं है, और मैं दूसरों के परिवारों को नष्ट नहीं करती। मैं केवल सभाओं में जाती हूँ। ऐसा क्या गलत किया, जो आप मुझे पीटकर मार डालना चाहते हैं? क्या आप अब भी मेरा परिवार हैं?" मेरा भतीजा तिरस्कारपूर्वक बोला, "बुआ, उन्हें देखो जिनके पास कार और पैसा है। आप परमेश्वर में आस्था रखती हो, पर उसने आपको क्या दिया है?" मैंने कहा, "वे चीजें किस काम की हैं? जब आपदा आएगी, तो क्या ये चीजें लोगों को बचा लेंगी? केवल परमेश्वर लोगों को बचा सकता है। यदि तुम ये चीजें चाहते हो, तो मैं तुम्हें नहीं रोकूँगी। तुम मेरी परमेश्वर में आस्था में दखल क्यों दे रहे हो?" भतीजे ने गुस्से से कहा, "विश्वास करना बंद नहीं किया, तो फिर हमें निर्दयी होने का दोष न देना। तीन दिन और रात लटकाकर देखते हैं कि क्या फिर भी आप विश्वास करती हैं!" पूरा परिवार मुझे तब तक लटकाने को तैयार हो गया, जब तक कि मैं परमेश्वर पर आस्था न छोड़ दूँ। मुझे बहुत गुस्सा आया। यह मेरा परिवार कैसे था? वे बस शैतान थे। उस वक्त मैं थोड़ा डर गई, तो मैंने परमेश्वर से प्रार्थना कर अगुआई करने को कहा। मेरे पति ने मुझे समझाने की कोशिश की, "प्रभु यीशु में मेरा विश्वास सिर्फ विश्वास है। तुम इसमें इतनी गंभीर क्यों हो? विश्वास करना बंद कर दो।" मैंने कहा, "यदि आप नहीं मानते कि प्रभु यीशु आपको बचाने वापस आया है, तो मैं आपको मजबूर नहीं करूँगी, आप भी मुझे मजबूर करने की कोशिश न करें। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करूँगी!" जब मैंने परिवार के सामने यह दृढ़ घोषणा की, तो वे चुप हो गए, और मैं जान गई कि शैतान हार गया है। मैंने मन में मिठास महसूस की जो पहले कभी नहीं की थी, और मन में परमेश्वर के लिए बस आभार था!

इसके बाद भी मेरे परिवार ने मुझे घर में कैद किए रखा। मगर मैं अब दुखी नहीं थी, इस माहौल में आज्ञापालन करने और सबक सीखने को तैयार थी। जब वे ध्यान नहीं दे रहे होते थे, तो मैं अपनी बड़ी भाभी का फोन लेकर परमेश्वर के दैनिक वचन ऑनलाइन सुन लेती थी। मैं अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना करती, और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होने को तैयार थी। मेरा छूटना परमेश्वर पर निर्भर था और मैं इंतजार करने के लिए तैयार थी। धीरे-धीरे मेरे परिवार ने मुझ पर निगरानी कम कर दी। एक बार गाँव के एक परिवार ने शादी का भोज रखा और मेरे परिवार के सभी सदस्य चले गए। मुझे भागने का मौका मिल गया। इसके बाद मैंने भाई-बहनों से संपर्क किया और अपना गृहनगर छोड़ दिया। अब मैं परमेश्वर में विश्वास करने और कर्तव्य निभाने को आजाद हूँ। इस दौरान मैंने परिवार का उत्पीड़न झेला, हालाँकि मुझे कुछ कष्ट हुआ, पर बहुत-कुछ मिला भी। मैं सीसीपी की बुराई और परमेश्वर के लिए परिवार के प्रतिरोध का सार साफ देख सकती हूँ, और मैंने व्यावहारिक तौर पर पाया कि परमेश्वर मेरी तरफ है और मेरा समर्थन कर रहा है। जब-जब मैं निराश और कमजोर होती हूँ, परमेश्वर मुझे अपने वचनों से प्रबुद्ध कर मेरी अगुआई करता है और मुझे साहस और बुद्धि देता है, ताकि मुझमें अडिग रहने का आत्मविश्वास बना रहे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

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