विपदा आन पड़ी है: परमेश्वर की इच्छा क्या है?

07 जुलाई, 2020
सूचीपत्र

वापस मुड़कर अतीत में देखो और परमेश्‍वर की इच्छा का अनुसरण करो

परमेश्वर को आशा है कि लोग पश्चाताप करेंगे

सच्चा पश्चाताप कैसे करें और परमेश्वर की सुरक्षा कैसे प्राप्त करें

परमेश्‍वर की चेतावनियों पर ध्यान दें

वापस मुड़कर अतीत में देखो और परमेश्‍वर की इच्छा का अनुसरण करो

पुराने नियम में कहा गया है कि सदोम के लोग दुष्ट, अविवेकी और भ्रष्टाचारी थे, वह शहर रक्तपिपासा और नर-संहार में इस कदर डूबा हुआ था कि वहाँ के लोग फ़रिश्तों को भी मार देना चाहते थे। उन्हें कभी पश्चाताप भी नहीं हुआ, इसलिए परमेश्‍वर ने स्वर्ग से उन पर आग की वर्षा की और उन सभी को नष्ट कर दिया। हालांकि, बाइबल में पारंगत लोग जानते हैं कि इससे पहले कि परमेश्वर उस शहर पर विपदा लाते, इब्राहीम ने सदोम की ओर से हाथ जोड़कर परमेश्वर से विनती की। यहाँ बाइबल के इस वृत्‍तांत का उद्धरण दिया गया है: "यहोवा ने कहा, 'यदि मुझे सदोम में पचास धर्मी मिलें, तो उनके कारण उस सारे स्थान को छोड़ूँगा।' फिर उसने कहा, '... कदाचित् उसमें दस मिलें।' उसने कहा, 'तो मैं दस के कारण भी उसका नाश न करूँगा'" (उत्पत्ति 18:26-32)। इन छंदों द्वारा न केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव प्रकट होता है, बल्कि उससे भी बढ़कर हमें परमेश्वर की महान दया और उदारता का एहसास होता है। परमेश्‍वर ने सदोम को बख्‍श दिया होता, अगर वहाँ पचास धार्मिक लोग भी मिल गए होते, वह तब भी उस शहर को बख्श देता, अगर सिर्फ दस धार्मिक लोग भी मिल गए होते। इस बात के बावजूद कि लोग कितने ज्‍़यादा भ्रष्ट और दुष्ट थे, परमेश्वर को अभी भी आशा थी कि वे पश्चाताप करेंगे। यह पीड़ादायक बात है कि इतने बड़े शहर में दस धार्मिक लोग भी नहीं मिले, इसलिए परमेश्‍वर के पास अंततः उन्‍हें नष्ट करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था।

अब इस दुनिया में रहने वाले प्रलोभनों से भरे लोग सालों पहले के सदोम के लोगों से भी बदतर हैं। आज लोग शैतान द्वारा इस हद तक भ्रष्ट कर दिए गए हैं कि उन्‍हें बुराई पसंद आती है और वे अधार्मिकता से प्यार करते हैं; पृथ्वी हिंसा और व्यभिचार से त्राहिमाम कर रही है, आपको मुख्य सड़कों के किनारे और छोटी गलियों में हर जगह कराओके बार, फुट मसाज पार्लर, होटल और डांस क्लब दिखाई दे सकते हैं। ऐसी जगहें बुराई और कामुकता से भरी हुई हैं। हर कोई खाने, पीने, मज़े करने के लिए जी रहा है और भौतिक सुख में लिप्त, चरम पथभ्रष्टता से ओतप्रोत है। लोगों के बीच कोई प्रेम नहीं है, बल्कि हर कोई रुतबे, शोहरत और धन-दौलत के लिए एक-दूसरे के साथ धोखा, लड़ाई और होड़ कर रहा है; वे एक-दूसरे को धोखा दे रहे हैं, षडयंत्र रच रहे है, और यहाँ तक कि पैसे और फायदे के लिए लड़ने-भिड़ने लगते हैं। संपूर्ण मानवजाति शैतान के अधिकार क्षेत्र में रह रही है, किसी भी इंसान में सकारात्मक चीज़ों से कोई प्रेम, रोशनी पाने की ललक या परमेश्वर के उद्धार का अनुग्रह स्वीकार करने के लिए आगे आने की चाह नहीं है। यहाँ तक कि विश्वासी लोग भी परमेश्वर की शिक्षाओं पर पूरी तरह से ईमानदार बने रहने में असमर्थ होकर पाप करने और स्‍वीकार करने के चक्र में जी रहे हैं। वे सांसारिक प्रवृत्तियों का अनुसरण करने और देह-सुख के पीछे भागने में बहुत आगे निकल गए गए हैं। यहाँ तक कि जब उन्‍हें पता लगता है कि वे पाप में जी रहे हैं, तब भी वे पाप के बंधनों को तोड़कर फेंक नहीं पाते हैं—उनका हृदय परमेश्वर से बहुत दूर भटक गया है। क्या इस हद तक भ्रष्ट संपूर्ण मानवजाति बहुत पहले ही उस मुकाम पर नहीं पहुंच गई है जहाँ उसे नष्ट कर दिया जाना चाहिए?

परमेश्वर को आशा है कि लोग पश्चाताप करेंगे

एक के बाद आपदाएँ आती जा रही हैं, और परमेश्वर की इच्छा है कि हम उसके सामने पश्चाताप करने के लिए आएं। वह चाहता है कि हर कोई पश्चाताप करे और नहीं चाहता है कि कोई नष्ट हो। दो हजार साल पहले, प्रभु यीशु ने कहा था, "मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है" (मत्ती 4:17)। इस समय, आप लोगों में से कुछ कह सकते हैं, "नास्तिक परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं और इसलिए संभवतः पश्चाताप नहीं करेंगे। हालांकि प्रभु में विश्वास रखने के बाद, हम अक्सर प्रार्थना करते हुए उसके सामने फूट-फूट कर रोते हैं। हम अतीत के अपने पापों को स्वीकार करते हैं, और हम फिर से कुछ भी बुरा न करने का निश्‍चय करते हैं। हम दूसरों के साथ सहिष्णु और धैर्यवान हो सकते हैं। हम परोपकार के लिए दान दे सकते हैं और दूसरों की मदद कर सकते हैं, यहाँ तक कि हम अपना सारा समय प्रभु के लिए परिश्रम और काम करते हुए व्‍यतीत कर सकते हैं, और यहाँ तक कि अगर हमें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया जाता है तो भी हम परमेश्वर को धोखा नहीं देंगे। क्या यह सच्चा पश्चाताप नहीं है? अगर हम दृढ़ता से इस तरह व्‍यवहार करेंगे, तो प्रभु हमारी रक्षा करेंगे और हमें आपदाओं द्वारा मिटा दिए जाने से दूर रखेंगे।" लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "जो कोई पाप करता है वह पाप का दास है। दास सदा घर में नहीं रहता; पुत्र सदा रहता है" (यूहन्ना 8:34-35)। प्रभु में विश्वास रखने के बाद, हम विनम्र और धैर्यवान हो सकते हैं, हम दूसरों की मदद कर सकते हैं, और हम त्याग कर सकते हैं, खुद को खपा सकते हैं, सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं, प्रभु के लिए गवाही दे सकते हैं, और हमारे कुछ बाहरी अच्छे व्यवहार हो सकते हैं। हालांकि हम जिस बात से इनकार नहीं कर सकते हैं वह यह है कि हमारे भीतर अहंकार, दंभ, कुटिलता, छल, स्वार्थ और नीचता जैसे भ्रष्ट स्वभाव निहित हैं जिन्हें शुद्ध नहीं किया गया है और हम अभी भी हर समय पाप करने में सक्षम हैं। उदाहरण के लिए, हम भली-भांति जानते हैं कि प्रभु चाहते हैं कि हम ईमानदार हों, लेकिन, जैसे ही कुछ भी हमारे अपने व्यक्तिगत हितों के विपरीत जाता है, तो अपनी स्वार्थी, नीच प्रकृति से वशीभूत होकर हम झूठ बोलने और छल-प्रपंच करने लग जाते हैं; अपनी अहंकारी, दंभी प्रकृति से वशीभूत, हम हमेशा दूसरों से जो मन चाहे वो कराते हैं, और जब वे ऐसा नहीं करते हैं तो हम गुस्सा हो जाते हैं और उन्‍हें उपदेश झाड़ने लगते हैं; जब आपदाएं और इम्‍तहान आते हैं, तो हम शिकायत करते हैं और प्रभु को दोष देते हैं। ये सिर्फ कुछ उदाहरण हैं। हमारे पाप खर-पतवार की तरह हैं—जो काटे जाने के तुरंत बाद फिर से उग आते हैं। यहां तक कि हम प्रार्थना करते समय हर दिन फूट-फूट कर रोते हैं और अपने पापों को स्वीकार करते हैं, तो भी हम नहीं बदल पाते हैं। क्या यह सच्चा पश्चाताप हो सकता है? कौन गारंटी दे सकता है कि परमेश्‍वर आपदाओं के बीच में ऐसे व्यक्ति की रक्षा करेगा? सच्चा पश्चाताप तब होता है जब किसी का शैतानी भ्रष्ट स्वभाव पूरी तरह से शुद्ध हो जाता है और वह बदल जाता है, जब वह आगे और बुराई नहीं करता है, पाप नहीं करता है, या परमेश्वर का विरोध नहीं करता है। ऐसा तब होता है जब वह सचमुच परमेश्‍वर के समक्ष समर्पण कर देता है और परमेश्‍वर की आराधना करता है। केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के वादों और आशीषों को प्राप्‍त करने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए उपयुक्त होते हैं। जैसा कि बाइबल में कहा गया है: "इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ" (लैव्यव्यवस्था 11:45)। "धन्य वे हैं, जो अपने वस्त्र धो लेते हैं, क्योंकि उन्हें जीवन के वृक्ष के पास आने का अधिकार मिलेगा, और वे फाटकों से होकर नगर में प्रवेश करेंगे" (प्रकाशितवाक्य 22:14)।

सच्चा पश्चाताप कैसे करें और परमेश्वर की सुरक्षा कैसे प्राप्त करें

हम सच्चा पश्चाताप कैसे कर सकते हैं? प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13 )। "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1 पतरस 4:17)। "सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर: तेरा वचन सत्य है" (यूहन्ना 17:17)। प्रभु ने भविष्यवाणी की थी कि वे अंत के दिनों में वापस आएंगे, अनुग्रह के युग की तुलना में अधिक और उच्‍चतर सत्य व्यक्त करेंगे, और मनुष्य का न्याय करने और उसे शुद्ध करने के कार्य का एक चरण पूरा करेंगे। ऐसा इसलिए है ताकि हम हमेशा-हमेशा के लिए पाप के बंधनों से मुक्त हो जाएं और शुद्ध होकर बदल जाएं। क्योंकि प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग में जो कार्य किया था, वह छुटकारे का कार्य था, इसलिए लोग उन पर विश्वास करके अपने पापों को क्षमा करवा सकते थे। हालांकि लोग अपनी पापी प्रकृति से शुद्ध नहीं हुए हैं। केवल अंत के दिनों में प्रभु का न्याय का कार्य स्वीकार करके, अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध और बदल करके, और फिर कभी बुराई, पाप, या परमेश्वर का विरोध न करके, हम सचमुच पश्चाताप करने का दावा कर सकते हैं। केवल तभी हमें परमेश्‍वर की सुरक्षा मिल सकती है और हम आपदाओं से बच सकते हैं।

प्रभु यीशु पहले ही वापस आ चुके हैं। वे देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर—अंतिम दिनों के मसीह—प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य की बुनियाद पर परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय का कार्य कर रहे हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अंत के दिनों में मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है...। परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

हमें हमारे शैतानी स्वभाव की बेड़ियों से बचाने के लिए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर उन सभी सत्यों को व्यक्त कर रहे हैं जो हमें शुद्ध कर सकते हैं और हमें पूरी तरह से बचा सकते हैं। वे परमेश्वर के छह हजार साल के प्रबंधन कार्य के रहस्यों का खुलासा कर रहे हैं; वह दुनिया की बुराई के स्रोत के साथ-साथ शैतान द्वारा मानवजाति की भ्रष्टता के सार और सत्य को प्रकट कर रहे हैं। परमेश्वर के वचनों के न्याय का अनुभव करके, हम देख पाते हैं कि हम शैतान द्वारा कितनी गहराई तक भ्रष्ट कर दिए गए हैं। अहंकार, दंभ, स्वार्थ, नीचता, कुटिलता, छल-कपट, लोभ, दुष्टता—इन अवगुणों के साथ हम जिंदगी जीते हैं, जिसमें मानवता की कोई झलक नहीं है, जो हमारे लिए परमेश्वर की घृणा और नफरत को बढ़ाती है। साथ ही, हम परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव जानने लगते हैं जो कोई अपराध सहन नहीं करता है। हम जानते हैं कि हम हमेशा अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार जीवन जीते रहे हैं, और अगर हम सत्य का आचरण नहीं करेंगे, तो परमेश्वर निश्चित रूप से हमसे घृणा करेंगे और हमें ठुकरा देंगे। क्‍या केवल तभी हम अपने आपको परमेश्वर के समक्ष दंडवत करेंगे और पश्चाताप करेंगे। हम अपने पापों से नफरत करते हैं और परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना चाहते हैं। बार-बार अपने देह-सुख को त्यागने और सत्य का आचरण करने से, हमारा भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे शुद्ध होकर बदल जाता है। अब हम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह नहीं करते हैं या उनका विरोध नहीं करते हैं, हम सचमुच परमेश्वर के समक्ष समर्पण करने और उसका आदर करने लग जाते हैं। केवल इस तरह के लोग ही वे लोग होते हैं, जिन्हें सच्चा पश्चाताप होता है और जिनकी परमेश्वर द्वारा रक्षा की जाएगी और जिन्‍हें आपदाओं से बचाया जाएगा।

30 साल पहले सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने प्रकट होकर अपना कार्य शुरू किया। सुसमाचार का कार्य धरती पर दूर-दूर तक हर देश में फैल गया है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए लाखों वचन लंबे समय से ऑनलाइन प्रकाशित किए जा रहे हैं। इन वचनों का 20 से अधिक भाषाओं में अनुवाद किया गया है; ये गवाही देते हैं और समस्‍त मानवजाति के लिए खुले तौर पर उपलब्ध हैं। इस सर्वाधिक अंधेरे और बुराई से भरे युग में, अंत के दिनों के मसीह द्वारा व्यक्त किया गया सत्य सच्चे प्रकाश की तरह, चमकती बिजली की तरह प्रतीत होता है, जो पूर्व से लेकर पश्चिम तक चमक रहा है। ये समस्‍त मानवजाति के लिए गवाही देते हैं: परमेश्वर प्रकट हो गए हैं और प्रभु यीशु वापस आ गए हैं। वे मनुष्य को शुद्ध करने और बचाने के लिए सत्य व्यक्त कर रहे हैं, मनुष्य के लिए पूर्ण उद्धार प्राप्त करने का एकमात्र तरीका सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करना है। हालांकि, मानवजाति शैतान द्वारा बहुत गहराई से भ्रष्ट कर दी गई है। कोई भी सत्य से प्रेम नहीं करता है। सभी लोगों की ख्‍़वाहिश पापमय सुखों को भोगना है। वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की छानबीन करने या अंत के दिनों में उसके न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। इसके बजाय, लोगों में परमेश्वर के कार्य के बारे में गहराई से आरोपित धारणाएं हैं, यहां तक कि कुछ लोग अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य की खुले तौर पर निंदा और विरोध भी करते हैं। पश्चाताप का ख्‍़याल किए बिना हर कोई पाप में जी रहा है। इसलिए कुछ ही लोग सत्य के लिए लालायित हैं या प्रकाश की चाह रखते हैं। आज हम जो आपदाएं देख रहे हैं, वे परमेश्वर की अंतिम ताकीद, मानवजाति के लिए उसकी अंतिम चेतावनी है। इससे भी बढ़कर, वे परमेश्‍वर का उद्धार हैं। केवल पश्चाताप करने के लिए परमेश्वर के सामने आकर ही हम आपदाओं से परमेश्वर की सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

परमेश्‍वर की चेतावनियों पर ध्यान दें

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "एक के बाद सभी आपदाएँ आ पड़ेंगी; सभी राष्ट्र और सभी स्थान आपदाओं का अनुभव करेंगे—हर जगह दैवी कोप, अकाल, बाढ़, सूखा और भूकंप होंगे। ये आपदाएँ सिर्फ एक या दो जगहों पर ही नहीं होंगी, न ही ये एक या दो दिनों में समाप्त हो जाएँगी, बल्कि इसके बजाय ये बड़े से बड़े क्षेत्र तक फैल जाएँगी, और आपदाएँ अधिकाधिक गंभीर हो जाएँगी। इस समय के दौरान सभी प्रकार की कीट महामारियाँ क्रमशः उत्पन्न होती जाएँगी, और सभी स्थानों पर नरभक्षण की घटनाएँ होगी। सभी राष्ट्रों और लोगों पर यह मेरा न्याय है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 65')। "यदि मानवजाति अच्छा भाग्य पाना चाहती है, यदि कोई देश अच्छा भाग्य पाना चाहता है, तो मनुष्य को परमेश्वर की आराधना में झुकना होगा, पश्चात्ताप करना होगा और परमेश्वर के सामने अपने पाप स्वीकार करने होंगे, अन्यथा मनुष्य का भाग्य और गंतव्य एक अपरिहार्य विभीषिका बन जाएँगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है')। "मेरा अंतिम कार्य न केवल मनुष्यों को दण्ड देने के वास्ते है बल्कि मनुष्य की मंजिल की व्यवस्था करने के वास्ते भी है। इससे भी अधिक, यह उन सभी कार्यों के लिए सभी से स्वीकृति प्राप्त करने के वास्ते है जो मैं कर चुका हूँ। मैं चाहता हूँ कि हर एक मनुष्य देखे कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है, और जो कुछ मैंने किया है वह मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है; यह मनुष्य का कार्य नहीं है, और प्रकृति का तो बिल्कुल नहीं है, जिसने मानवजाति को उत्पन्न किया है। इसके विपरीत, यह मैं हूँ जो सृष्टि में हर जीवित प्राणी का पोषण करता है। मेरे अस्तित्व के बिना, मानव जाति केवल नष्ट होगी और विपत्तियों के दण्ड से गुज़रेगी। कोई भी मानव सुन्दर सूर्य और चंद्रमा या हरे-भरे संसार को फिर कभी नहीं देखेगा; मानवजाति केवल शीत रात्रि और मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी का सामना करेगी। मैं ही मनुष्यजाति का एक मात्र उद्धार हूँ। मैं ही मनुष्यजाति की एकमात्र आशा हूँ और, इससे भी बढ़कर, मैं ही वह हूँ जिस पर संपूर्ण मानवजाति का अस्तित्व निर्भर करता है। मेरे बिना, मानवजाति तुरंत निस्तब्ध हो जाएगी। मेरे बिना मानवजाति तबाही झेलेगी और सभी प्रकार के भूतों द्वारा कुचली जाएगी, इसके बावजूद कोई भी मुझ पर ध्यान नहीं देगा। मैंने वह काम किया है जो किसी दूसरे के द्वारा नहीं किया जा सकता है, मेरी एकमात्र आशा है कि मनुष्य कुछ अच्छे कर्मों के साथ मेरा कर्ज़ा चुका सके" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो')।

आपदाएं बड़े से बड़े क्षेत्र में फैलते हुए पूरी दुनिया में बद से बदतर होती जा रही हैं। जो लोग अभिशप्त हो गए हैं, वे बच नहीं सकते, ऐसा लगता है कि जल्द ही दुनिया का अंत हो जाएगा। हालांकि हम सभी जानते हैं कि परमेश्वर हमारी किस्‍मत की लकीरें खींचते हैं और सभी आपदाएं उनके हाथ में हैं। अगर हम परमेश्वर के सम्‍मुख पश्चाताप करने और अंत के दिनों में उनके न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने के लिए आएंगे, केवल तभी हमें आपदाओं से सुरक्षित किया जाएगा और जीवित रहने का अवसर मिलेगा। जिस तरह से दुनिया पतनोन्‍मुख है हमारी आंखों के सामने है। एक बार जब परमेश्वर उन सभी लोगों को बचा लेंगे जिन्‍हें वह बचाना चाहते हैं, तो वे इस दुष्ट, अशुद्ध दुनिया को नष्ट करने के लिए भीषण आपदाओं का इस्तेमाल करेंगे। जब वह समय आएगा, तब जो लोग परमेश्वर के सामने नहीं आए हैं, वे आपदाओं द्वारा बहा लिए जाएंगे, वे रोते और अपने दांत पीसते रह जाएंगे।

संपादक का नोट: इस लेख को पढ़ने के बाद, क्या अब आप समझ गए हैं कि आपदाएं लाने में परमेश्‍वर की क्या इच्छा है? क्या अब आपको आपदाओं से परमेश्वर द्वारा रक्षा किए जाने का मार्ग मिल गया है? अगर आपके कोई और सवाल या उलझनें हैं, तो आप हमारी साइट पर उपलब्ध चैट और मैसेंजर के विकल्पों के माध्यम से किसी भी समय हमसे संपर्क करके हमारे साथ संवाद कर सकते हैं

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