अपने गुणों और प्रतिभाओं की कमी से मैं अब और परेशान नहीं होती

19 मई, 2026

एमिलिया, इटली

पिछले कुछ सालों से, मैं एक अभिनेत्री के तौर पर अपना कर्तव्य निभाती और अनुभवजन्य गवाही वीडियो शूट करती रही हूँ। बाद में समान कर्तव्य निभा रहे कुछ भाई-बहनों ने अनुभवजन्य गवाही वीडियो शूट करने के अलावा, गायन और नृत्य में भी खुद को प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया। वे इतने बहु-प्रतिभाशाली हैं यह देखकर मुझे बहुत ईर्ष्या हुई और मैंने मन ही मन सोचा, “इतने सारे गुण और प्रतिभाएँ होना कितना अच्छा होगा न। तुम हर तरह के वीडियो में आ सकते हो और ज्यादा भाई-बहनों की प्रशंसा और तारीफ पा सकते हो। लोग हमेशा बहु-प्रतिभाशाली लोगों के बारे में बहुत ईर्ष्या और चाव से बात करते हैं।” मैं उम्मीद करने लगी कि एक दिन मैं भी दूसरे वीडियो में आ सकूँगी और भाई-बहनों की प्रशंसा पा सकूँगी। वह जीने का सचमुच एक प्रभावशाली तरीका लगता था। कुछ समय पहले, मैंने देखा कि अगुआ ने दो बहनों के लिए विदेशी भाषा के एक भजन का डेमो रिकॉर्ड करने की व्यवस्था की है, तो मैंने मन ही मन सोचा, “मैंने पहले विदेशी भाषाएँ पढ़ी हैं तो क्या मैं भी इसे नहीं गा सकती? अगुआ ने मुझसे कोशिश करने के लिए क्यों नहीं कहा?” बहनों को रिहर्सल करते देख मुझे थोड़ी निराशा हुई, मैंने सोचा, “अगर मैं मंच पर जाकर गा सकूँ तो यह कितना प्रभावशाली होगा! तब भाई-बहन वाकई मेरी प्रशंसा करेंगे।” फिर मैंने सुना कि तीन और भाई-बहन विदेशी भाषा के भजन गाने वाले हैं। मुझे फिर से निराशा और दुख महसूस हुआ और मैंने थोड़ी शिकायत भी की, “मुझमें कोई और प्रतिभा नहीं है, इसलिए मैं केवल अनुभवजन्य गवाही वीडियो ही शूट कर सकती हूँ। मैं कभी इस दायरे से बाहर नहीं निकल पाऊँगी। दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? मुझे यकीन है कि भाई-बहनों के दिलों में मेरी कोई खास अहमियत नहीं है।” फिर मैं उन भाई-बहनों को देखती जो गा और नाच सकते थे और मंच पर काफी प्रभावशाली और प्रमुख थे। हर कोई उनकी बहुत प्रशंसा करता और उन पर बहुत ध्यान देता था। इससे मेरा मन खट्टा हो गया, मैं बस उस दिन के लिए तरसती थी जब मैं भी गायन या नृत्य का कर्तव्य कर सकूँ।

आखिरकार एक दिन मेरा मौका आ ही गया। एक बहन ने मुझे गायन का एक डेमो रिकॉर्ड करने के लिए कहा ताकि वह देख सके कि क्या मैं उस क्षेत्र में अपना कर्तव्य निभा सकती हूँ। मैं बहुत खुश थी। मैंने सोचा, “मुझे सच में इस अवसर का फायदा उठाना चाहिए। अगर मुझे चुन लिया गया तो मैं भी मंच पर गा सकूँगी। यह कितना प्रभावशाली होगा! भाई-बहन पक्का मेरी प्रशंसा करेंगे और मुझसे ईर्ष्या करेंगे।” लेकिन जब मैंने वास्तव में गाने की कोशिश की तो मुझे एहसास हुआ कि मैं इसमें कितनी कमज़ोर थी। मैं कभी-कभी बेसुरी हो जाती थी और मेरी आवाज़ का दायरा भी सीमित था। मैंने तैयार डेमो बहन को भेजा, और आशा की किरण थामे रही कि मुझे यह संदेश मिलेगा कि मैं पार्ट-टाइम गा सकती हूँ। लेकिन अंत में, इसका कोई नतीजा नहीं निकला; मुझे कोई जवाब नहीं मिला।

कुछ ही समय बाद, अगुआ ने मुझे और एक अन्य बहन को सोलो डांस डेमो शूट करने के लिए कहा, उसने बताया कि वे अगली बार एक यांग्गे नृत्य कार्यक्रम शूट करने की योजना बना रहे हैं। मैंने मन ही मन सोचा, “यांग्गे नृत्य मेरे गृहनगर का एक लोक नृत्य है। हालाँकि मैंने पेशेवर रूप से इसे नहीं सीखा था, लेकिन बचपन में मैंने यह नृत्य बहुत किया था। अगर मुझे उसके लिए चुन लिया जाए तो यह बहुत अच्छा होगा।” लेकिन जब मैंने वास्तव में नृत्य किया तो मुझे अपना संतुलन बनाने में काफी संघर्ष करना पड़ा, मेरे अंगों में तालमेल नहीं था और मेरी हरकतें और हाव-भाव मानक स्तर के नहीं थे। मुझे बस इसे सीखने में ही दो अभ्यास सत्र लग गए, लेकिन मैंने अच्छा नृत्य नहीं किया और कुछ जगहों पर तो मेरे हाथ और पैर एक ही तरफ हिल रहे थे। बाद में, मेरे साथ डेमो शूट करने वाली बहन को चुन लिया गया। यह बहन न केवल अनुभवजन्य गवाही वीडियो शूट कर सकती थी, बल्कि एक निर्देशक के रूप में भी काम कर सकती थी। वह पहले क्रॉसटॉक कॉमेडी करती थी, वह एक अच्छी गायिका थी, यहाँ तक कि उसने वाद्ययंत्र बजाना भी सीखा था। और अब वह नृत्य भी करने लगी थी। वह सचमुच कितनी बहु-प्रतिभाशाली थी! दूसरों के पास कितनी प्रतिभाएँ हैं! उस दौरान, मैं अक्सर करती थी कि मेरे पास कई अलग-अलग गुण और प्रतिभाएँ हों—न केवल गायन और नृत्य कर सकूँ, बल्कि विभिन्न वाद्ययंत्र बजा सकूँ, जिससे मैं मंच पर वास्तव में बहुत प्रभावशाली दिख सकूँ। एक दिन, मैं रसोई में खाना परोस रही थी कि तभी मैंने एक बहन को नर्तकियों में से एक से उत्साहपूर्वक यह कहते हुए सुना, “तुम जल्द ही मंच पर जाकर नृत्य करने वाली हो, यह तो बहुत अच्छी बात है! क्या तुमने अपनी ड्रेस पहनकर देखी? ...” उसे बहन की चिंता करते सुना तो मुझे निराशा के साथ-साथ ईर्ष्या की एक टीस महसूस हुई। वहाँ खड़े-खड़े मुझे थोड़ा अजीब लगा और मैंने सोचा, “हमेशा बहु-प्रतिभाशाली लोगों पर ही सारा ध्यान दिया जाता है। उनकी तुलना में, मैं न गा सकती हूँ, न नाच सकती हूँ। मैं बस इतना ही कर सकती हूँ कि अनुभवजन्य गवाही वाले वीडियो शूट करूँ, जो कि बहुत साधारण है!” मुझे अंदर से बहुत बुरा लगा। धीरे-धीरे, अनुभवजन्य गवाही वीडियो शूट करने के प्रति मेरा रवैया अधिक से अधिक उपेक्षापूर्ण हो गया। मैंने परमेश्वर पर भरोसा करके गवाहियाँ अच्छे से सुनाने में अपना दिल लगाना बंद कर दिया और बस मशीन की तरह उन्हें शूट करने लगी। मैं उन भाई-बहनों से भी ज़्यादा बात करने से कतराने लगी जो गा और नाच सकते थे। मैंने दिल में अपने और उनके बीच एक दीवार महसूस की, मुझे लगा कि मैं उनसे कमतर हूँ; मुझे उनसे जलन भी होने लगी और ईर्ष्या भी। एक दिन, मुझे धर्मग्रंथ के एक अंश की याद आई : “क्या गढ़ी हुई वस्तु गढ़नेवाले से कह सकती है, ‘तू ने मुझे ऐसा क्यों बनाया है?’ क्या कुम्हार को मिट्टी पर अधिकार नहीं कि एक ही लोंदे में से एक बरतन आदर के लिये, और दूसरे को अनादर के लिये बनाए?” (रोमियों 9:20-21)। इस अंश ने सचमुच मुझे छू लिया और मुझे एहसास हुआ कि मुझमें विवेक की बहुत कमी है। मेरे गुण और प्रतिभाएँ सभी परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत थे; मुझे अनुचित माँगें या अतिशय इच्छाएँ नहीं रखनी चाहिए। अपनी खुद की क्षमताओं से हमेशा असंतुष्ट रहना परमेश्वर का विरोध करना और प्रतिरोध करना था! उस दौरान, अपनी समस्या का समाधान करने के लिए मैं अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना करती थी।

एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और अपने अनुसरण के नज़रिये के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “बहुत-से लोग सत्य को नहीं समझते या सत्य का अनुसरण नहीं करते। वे कर्तव्य पालन से किस तरह पेश आते हैं? वे इसे एक तरह का काम, एक तरह का शौक या अपने हित में निवेश मानते हैं। वे इसे परमेश्वर द्वारा बताया गया कोई मिशन या कार्य या किसी ऐसी जिम्मेदारी की तरह नहीं मानते जो उन्हें पूरी करनी चाहिए। इससे भी कम प्रयास वे अपने कर्तव्यों का पालन करते समय सत्य या परमेश्वर के इरादों को समझने में करते हैं ताकि अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभा सकें और परमेश्वर के आदेश को पूरा कर सकें। ... क्या ऐसे लोग सत्य प्राप्त कर सकते हैं? वे सत्य के संबंध में प्रयास नहीं करते, और जब अपने कर्तव्यों के निर्वाह की बात आती है तो सत्य का अभ्यास नहीं करते। उन्हें हमेशा दूसरे की रोटी ज्यादा चुपड़ी नजर आती है। आज वे यह करना चाहते हैं, कल कुछ और करना चाहते हैं, और उन्हें लगता है कि हर दूसरे आदमी का कर्तव्य उनके अपने कर्तव्य से बेहतर और आसान है। और तब भी, वे सत्य के लिए प्रयासरत नहीं होते। वे यह नहीं सोचते कि उनके इन विचारों में क्या समस्याएँ हैं, और वे समस्याओं के समाधान के लिए सत्य की खोज नहीं करते। उनके दिमाग हमेशा इस बात पर लगे रहते हैं कि उनके अपने सपने कब साकार होंगे, कौन सुर्खियों में है, किसे ऊपरवाले से मान्यता मिल रही है, कौन बिना काट-छाँट के काम करता है और पदोन्नत हो जाता है। उनके दिमाग इन चीजों से भरे हुए हैं। क्या जो लोग हमेशा इन चीजों के बारे में सोचते रहते हैं, वे अपने कर्तव्यों का इस ढंग से पालन कर सकते हैं जो मानक स्तर का हो? वे इसे कभी पूरा नहीं कर सकते। तो, किस तरह के लोग अपने कर्तव्यों का पालन इस तरह से करते हैं? क्या ये वे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं? सबसे पहले, एक बात तो तय है : इस तरह के लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते। वे कुछ आशीषों का आनंद लेने के लिए सक्रिय प्रयास करते हैं, प्रसिद्ध होना चाहते हैं और परमेश्वर के घर में ध्यान आकर्षित कराना चाहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे वे जैसे-तैसे समाज में जी रहे थे। सार की दृष्टि से, वे कैसे लोग हैं? वे छद्म-विश्वासी हैं। छद्म-विश्वासी परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्यों का वैसे ही पालन करते हैं जैसे वे बाहरी दुनिया में करते हैं। उन्हें पदोन्नतियों की परवाह होती है, इस बात की चिंता होती है कि कौन टीम का अगुआ बन रहा है, कौन कलीसिया का अगुआ बन रहा है, किसके काम की सभी लोग प्रशंसा कर रहे हैं, किसकी बड़ाई हो रही है, और किसका उल्लेख किया जा रहा है। उन्हें इन चीजों की चिंता होती है। यह बिल्कुल किसी कंपनी की तरह है : किसकी पदोन्नति हो रही है, किसका वेतन बढ़ रहा है, अगुआ किसकी प्रशंसा कर रहा है, और कौन अगुआ से परिचित हो रहा है—लोग इन बातों की परवाह करते हैं। यदि वे परमेश्वर के घर में भी इन चीजों को खोजते हैं, और सारा दिन इन्हीं बातों में व्यस्त रहते हैं, तो क्या वे एकदम अविश्वासियों जैसे नहीं हैं? सार रूप से, वे अविश्वासी हैं; वे खाँटी छद्म-विश्वासी हैं। वे जो भी कर्तव्य निभाएँगे, वे केवल मेहनत करेंगे और बेमन से काम करेंगे। वे चाहे जो भी धर्मोपदेश सुनें, वे सत्य को फिर भी नहीं स्वीकारेंगे, और वे सत्य को अभ्यास में तो बिल्कुल भी नहीं लाएँगे। बिना किसी तरह के बदलाव का अनुभव किए वे कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते रहे हैं, और वे चाहे जितने वर्षों तक अपने कर्तव्यों का पालन करें, वे वफादार होने में सक्षम नहीं होंगे। परमेश्वर में उनकी सच्ची आस्था नहीं होती, उनमें निष्ठा नहीं होती, वे छद्म-विश्वासी होते हैं(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग एक))। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन से मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। समाज में अविश्वासी हमेशा अपने वरिष्ठों की सराहना या दूसरों की प्रशंसा पाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। और यहाँ मैं थी, जो कई सालों से विश्वासी होकर भी एक अविश्वासी की तरह ही इन चीज़ों के पीछे भाग रही थी। चीज़ों को देखने का मेरा नज़रिया बिल्कुल नहीं बदला था। मेरा ध्यान हमेशा इस बात पर रहता था कि कौन गाता है, कौन नाचता है, या किसके पास ऐसी कोई प्रतिभा है जिससे उसे भाई-बहनों की प्रशंसा और तारीफ़ मिलती है। मैं हर दिन इन्हीं चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करती थी। अपने आस-पास के भाई-बहनों को कई प्रतिभाओं के साथ, विभिन्न कर्तव्यों को निभाने में सहयोग करने में सक्षम देखकर, मुझे बहुत ईर्ष्या होती थी। मैं भी सचमुच ये गुण और प्रतिभाएँ पाना चाहती थी, ताकि मैं भी मंच पर प्रदर्शन कर सकूँ और खुद का दिखा सकूँ। जब बाद में मुझे गायन और नृत्य का डेमो रिकॉर्ड करने के लिए कहा गया तो मुझे निराशा और दुख हुआ क्योंकि मुझमें वे प्रतिभाएँ नहीं थीं और मैं वे कर्तव्य नहीं निभा सकती थी। मैंने शिकायत की कि परमेश्वर ने मुझे वे गुण और प्रतिभाएँ क्यों नहीं दीं और सोचती थी कि मैं दूसरों से कमतर क्यों हूँ। मैं यहाँ तक कि अपने वर्तमान कर्तव्य को भी हल्के में लेने लगी। अलग दिखने और लोगों का ध्यान खींचने की अपनी महत्वकांक्षा और लालसा को पूरा करने के लिए मैं लगातार अलग-अलग तरह के गुण और प्रतिभाएँ पाने की कोशिश करती थी। मैं अपने उचित कार्य की उपेक्षा कर रही थी और सही मार्ग पर नहीं चल रही थी! सच तो यह है कि तुम चाहे किसी भी कर्तव्य में किसी भी प्रतिभा का उपयोग करो, यह सब सुसमाचार का प्रचार करने और परमेश्वर की गवाही देने के उद्देश्य से है, ताकि अधिक लोग परमेश्वर के पास लौट सकें और उसका उद्धार स्वीकार कर सकें। यह परमेश्वर का इरादा है और इसका प्रतिष्ठा या रुतबे से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन मुझे हमेशा लगता था कि मैं केवल कई तरह की प्रतिभाएँ रखकर, गायन और नृत्य में अच्छी होकर और बहु-प्रतिभाशाली बनकर ही अधिक लोगों की प्रशंसा पा सकती हूँ। मेरा दृष्टिकोण एक अविश्वासी के समान ही था—यह एक छद्म-विश्वासी का दृष्टिकोण था!

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े और मेरे गुण और प्रतिभाओं के पीछे लगातार भागने के मूल कारण के बारे में कुछ मुझे समझ हासिल हुई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे के प्रति मसीह-विरोधियों का अनुराग साधारण लोगों से कहीं ज्यादा होता है और यह एक ऐसी चीज है जो उनके स्वभाव सार के भीतर होती है; यह कोई अस्थायी रुचि या उनके परिवेश का क्षणिक प्रभाव नहीं होता—यह उनके जीवन, उनकी हड्डियों में समायी हुई चीज है और इसलिए यह उनका सार है। कहने का तात्पर्य यह है कि मसीह-विरोधी जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका पहला विचार उनकी अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे का होता है और कुछ नहीं। मसीह-विरोधियों के लिए प्रतिष्ठा और रुतबा उनका जीवन हैं और वही वे लक्ष्य होते हैं जिसका वे जीवन भर अनुसरण करते हैं। ... यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधियों के लिए प्रतिष्ठा और रुतबा कोई अतिरिक्त आवश्यकता नहीं है, यह बात तो रहने ही दो कि ये उनके लिए ऐसी बाहरी चीजें हैं जिनके बिना उनका काम चल सकता है। ये मसीह-विरोधियों की प्रकृति का हिस्सा हैं, ये उनकी हड्डियों में हैं, उनके खून में हैं, ये उनमें जन्मजात हैं। मसीह-विरोधी इस बात के प्रति उदासीन नहीं होते कि उनके पास प्रतिष्ठा और रुतबा है या नहीं; यह उनका रवैया नहीं होता। फिर उनका रवैया क्या होता है? प्रतिष्ठा और रुतबा उनके दैनिक जीवन से, उनकी दैनिक स्थिति से, जिस चीज का वे रोजाना अनुसरण करते हैं उससे, घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं। मसीह-विरोधियों के लिए रुतबा और प्रतिष्ठा उनका जीवन हैं। चाहे वे कैसे भी जीते हों, चाहे वे किसी भी परिवेश में रहते हों, चाहे वे कोई भी काम करते हों, चाहे वे किसी भी चीज का अनुसरण करते हों, उनके कोई भी लक्ष्य हों, उनके जीवन की कोई भी दिशा हो, यह सब अच्छी प्रतिष्ठा और ऊँचा रुतबा पाने के इर्द-गिर्द घूमता है। और यह लक्ष्य बदलता नहीं है; वे कभी ऐसी चीजों को दरकिनार नहीं कर सकते हैं(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। “तुम रुतबे को इतना क्यों सँजोते हो? रुतबे से तुम्हें क्या फायदे मिल सकते हैं? अगर रुतबा तुम्हारे लिए आपदा, कठिनाइयाँ, शर्मिंदगी और दर्द लेकर आए, तो क्या तुम उसे फिर भी सँजोकर रखोगे? (नहीं।) रुतबा होने से बहुत सारे फायदे मिलते हैं, जैसे दूसरों की ईर्ष्या, आदर, सम्मान और चापलूसी, और साथ ही उनकी प्रशंसा और श्रद्धा मिलना। श्रेष्ठता और विशेषाधिकार की भावना भी होती है, जो रुतबे से तुम्हें मिलती है, जो तुम्हें अभिमान और खुद के योग्य होने का एहसास कराती है। इसके अलावा, तुम उन चीजों का भी आनंद ले सकते हो, जिनका दूसरे लोग आनंद नहीं लेते, जैसे कि रुतबे के लाभ और विशेष व्यवहार। ये वे चीजें हैं, जिनके बारे में तुम सोचने की भी हिम्मत नहीं करते, लेकिन जिनकी तुमने अपने सपनों में लालसा की है। क्या तुम इन चीजों को बहुमूल्य समझते हो? अगर रुतबा केवल खोखला है, जिसका कोई वास्तविक महत्व नहीं है, और उसका बचाव करने से कोई वास्तविक प्रयोजन सिद्ध नहीं होता, तो क्या उसे बहुमूल्य समझना मूर्खता नहीं है? अगर तुम देह के हितों और भोगों जैसी चीजें छोड़ पाओ, तो प्रसिद्धि, लाभ और रुतबा तुम्हारे पैरों की बेड़ियाँ नहीं बनेंगे(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग दो))। परमेश्वर उजागर करता है कि मसीह-विरोधी विशेष रूप से प्रतिष्ठा और रुतबे को अत्यधिक महत्व देते हैं। वे चाहे जो भी कहें या करें, वह सब दूसरों की प्रशंसा और समर्थन प्राप्त करने और प्रतिष्ठा और रुतबे के साथ आने वाली श्रेष्ठता की भावना का आनंद लेने के लिए होता है। खुद पर चिंतन करते हुए मैंने देखा कि मैं एक मसीह-विरोधी के मार्ग पर चल रही हूँ। मैं “एक व्यक्‍ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज करता जाता है” और “आदमी ऊपर की ओर जाने के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है” जैसे शैतानी जहरों के अनुसार जी रही थी। मैं प्रतिष्ठा और रुतबे को बहुत महत्वपूर्ण मानती थी और हमेशा चाहती थी कि भीड़ में दूसरे मेरी प्रशंसा करें, यह मानते हुए कि यही एक मूल्यवान जीवन जीने का एकमात्र तरीका है। पिछले कुछ सालों में, मैंने कई अनुभवजन्य गवाही वीडियो शूट किए थे। पहली बार मुझसे मिलने वाले कुछ भाई-बहन मुझसे ऐसी बातें कहते थे, “मैं अक्सर तुम्हें वीडियो में देखती हूँ,” या “जब मैंने पहली बार परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया था, तब मैंने तुम्हारे द्वारा शूट किए गए वीडियो देखे थे।” हर बार जब मैं ऐसे शब्द सुनती थी तो मुझे बहुत खुशी होती थी और दूसरों द्वारा ध्यान दिए जाने और प्रशंसा किए जाने का मैं वास्तव में आनंद लेती थी। जब मैं आस-पास के भाई-बहनों को नाचते-गाते हुए, इतना प्रभावशाली दिखते और सुर्ख़ियों में रहने का आनंद लेते देखती तो मुझे विशेष रूप से निराशा और दुख होता था, जबकि इसके विपरीत, मैं न गा सकती थी और न नाच सकती थी और केवल अनुभवजन्य गवाही वीडियो ही शूट कर सकती थी, जिससे मुझपर उतना ध्यान नहीं जाता था। खासकर जब मैंने एक अन्य बहन को एक नर्तकी का गर्मजोशी से अभिवादन करते सुना जबकि मैं वहीं पास में खड़ी थी और किसी ने ध्यान नहीं दिया, तो इससे मुझे बहुत बुरा लगा। मुझे लगा मेरी मौजूदगी का किसी को एहसास नहीं है। मैं यह चाहने लगी कि मेरे पास भी बहुत सारे गुण और प्रतिभाएँ हों, ताकि मैं भी अन्य भाई-बहनों की तरह अलग-अलग वीडियो में आ सकूँ और मेरे आस-पास के लोग मेरी प्रशंसा और मेरा विशेष सम्मान करें। बाद में कलीसिया ने मुझे गायन और नृत्य के डेमो रिकॉर्ड करने का अवसर दिया, लेकिन तथ्यों से साबित हो गया कि मैं इन चीज़ों में अच्छी नहीं थी। इस वजह से अलग दिखने की मेरी उम्मीद और भी कम हो गई और मैं निराश और दुखी हो गई। अनुभवजन्य गवाही वीडियो शूट करने के प्रति मेरा रवैया उपेक्षापूर्ण हो गया और मैं यह भी शिकायत करने लगी कि मैं ग्रामीण इलाके में एक गरीब परिवार में पैदा हुई और मैंने कभी गाना, नाचना या कोई वाद्ययंत्र बजाना नहीं सीखा। वास्तव में, ये शिकायतें और मेरी वर्तमान स्थिति से मेरा असंतोष मूल रूप से परमेश्वर के प्रति शिकायतें और असंतोष था। अनुभवजन्य गवाही वीडियो शूट कर पाना पहले से ही परमेश्वर की बहुत बड़ी कृपा थी, लेकिन मैं संतुष्ट नहीं थी। मैं हमेशा अपनी तुलना दूसरों से करती थी, लगातार प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे भागती थी और इसे न पा सकने पर परमेश्वर को दोष देती थी। मैं सचमुच कितनी विद्रोही थी! इसका एहसास होने पर मुझे अपने अनुसरण के भ्रामक नज़रिये के बारे में कुछ समझ हासिल हुई और मैंने यह भी समझा कि परमेश्वर लोगों को गुण और प्रतिभाएँ इसलिए देता है ताकि वे अपने कर्तव्यों को बेहतर ढंग से निभा सकें। लेकिन मैं हमेशा अपनी प्रतिभाओं और गुणों का उपयोग दूसरों की प्रशंसा और समर्थन प्राप्त करने और उनके दिलों में जगह बनाने के लिए करना चाहती थी। यह परमेश्वर का प्रतिरोध करना था, ऐसी चीज़ जिससे परमेश्वर घृणा और नफरत करता है, अगर मैं इसी राह पर चलती रही तो परमेश्वर मुझे शाप देगा और दंड देगा। मुझे थोड़ा डर लगा और मैं अपनी गलत दशा को सुधारने के लिए तैयार थी।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और उसके इरादों को समझा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यदि परमेश्वर ने तुम्हें मूर्ख बनाया है तो तुम्हारी मूर्खता में एक अर्थ है; यदि उसने तुम्हें बुद्धिमान बनाया है तो तुम्हारी बुद्धिमत्ता में एक अर्थ है। परमेश्वर ने तुम्हें जो भी खूबियाँ दी हैं, तुम जिस भी चीज में अच्छे हो, तुम्हारा आईक्यू कितना भी ऊँचा क्यों न हो, परमेश्वर का ऐसा करने का अपना उद्देश्य था। ये सभी चीजें परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत थीं। तुम अपने जीवन में जो भूमिका निभाते हो और जो कर्तव्य तुम कर सकते हो, वे भी परमेश्वर द्वारा बहुत पहले ही पूर्वनियत थे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, व्यक्ति के स्व-आचरण का मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत)। “अगर परमेश्वर तुम्हें औसत काबिलियत देता है तो तुम बहुत बड़ा कार्य नहीं कर सकते, इसलिए तुम घमंडी नहीं बन सकते। यह तुम्हारे लिए सुरक्षा है। तुम्हें दी गई औसत काबिलियत के चलते तुम्हारे पास ऐसी कोई पूँजी नहीं है जिससे तुम शेखी बघार सको और न ही तुम कोई बहुत बड़ा योगदान दे सकते हो। तुम्हें हमेशा यह सोचने की जरूरत है, ‘मेरी काबिलियत औसत है; मैं इस क्षेत्र में अच्छा नहीं हूँ और न ही उस क्षेत्र में। मुझे सावधान रहना चाहिए और अपना कर्तव्य करने में सत्य सिद्धांतों की तलाश करनी चाहिए।’ जब तुम्हें लगता है कि तुममें सभी पहलुओं में कमी है, तब तुम और ज्यादा शिष्ट और नियमों का पालन करने वाले व्यक्ति बन जाते हो और ज्यादा शांत हो जाते हो। उदाहरण के लिए, चाहे तुम लोग कोई भी कार्य करते हो, चाहे तुम पर्यवेक्षक हो या कोई साधारण सदस्य, अगर एक खास अवधि के दौरान तुम्हारा कार्य अपेक्षाकृत सुचारू रूप से चलता है, कुछ नतीजे देता है और उपलब्धियाँ अपेक्षाकृत उत्कृष्ट हैं और तुम्हें ऊपरवाले से अभिपुष्‍टि मिलती है, तो तुम्हारी मानसिकता क्या होगी? (हम आत्म-संतुष्ट हो जाएँगे, यह महसूस करेंगे कि हम अच्छे हैं और अब आसानी से सत्य की तलाश नहीं करेंगे।) फिर तुम्हारे लिए नियमों का पालन करना और आचरण करने में व्यावहारिक बने रहना कठिन हो जाएगा। यह तुम्हारे लिए बहुत ही खतरनाक प्रलोभन है; यह अच्छा संकेत नहीं है(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (7))। परमेश्वर के वचनों से, मैं समझ गई कि प्रत्येक व्यक्ति के पास कौन-से गुण और प्रतिभाएँ हैं और वे कौन-सा कर्तव्य कर सकते हैं, यह सब परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है। मुझे थोड़ा विवेक रखना चाहिए, एक सृजित प्राणी की स्थिति में खड़े होना चाहिए और अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाते हुए अपनी जगह जाननी चाहिए। केवल यही परमेश्वर के इरादे के अनुरूप है। इसके अलावा, परमेश्वर कहता है : “यह तुम्हारे लिए सुरक्षा है।” इन वचनों पर विचार करते हुए, मैं काफी भावुक हो गई। हर किसी की घातक कमज़ोरियाँ और भ्रष्ट स्वभाव अलग-अलग होते हैं। कुछ लोग, जो मेरी तरह ही अपना कर्तव्य निभाते हैं, उनके पास कई गुण और प्रतिभाएँ होती हैं और वे फिर भी सही मार्ग पर चल सकते हैं, सत्य का अनुसरण कर सकते हैं और व्यावहारिक तरीके से अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकते हैं। हालाँकि, प्रतिष्ठा और रुतबे की मेरी लालसा बहुत मज़बूत थी और वर्षों से मैंने हमेशा अलग दिखने और प्रशंसा पाने का प्रयास किया था। अगर मेरे पास वास्तव में कई गुण और प्रतिभाएँ होतीं तो मुझे डर है कि मैं बहुत पहले ही भटक गई होती और परमेश्वर द्वारा प्रकट कर निकाल दी गई होती। मैंने इस बारे में सोचा कि कैसे दो साल पहले, मैं घमंडी हो गई थी और मुझे ब्रह्मांड में अपनी जगह का पता नहीं था क्योंकि मैं लंबे समय से अनुभवजन्य गवाही वीडियो शूट करने में खुद को प्रशिक्षित कर रही थी। मैं अपने कर्तव्य में दिखावा करती थी और भाई-बहनों का मार्गदर्शन और मदद स्वीकार नहीं करती थी। अंत में मुझे सख्ती से बेनकाब किया गया, मेरी काट-छाँट की गई और चेतावनी दी गई कि अगर मैंने पश्चात्ताप नहीं किया तो मुझे बर्खास्त कर दिया जाएगा। तब जाकर मैं जल्दी से मुड़ी और खुद पर चिंतन किया। वह विफलता आज भी मेरे दिमाग में ताज़ा है, यह मेरे गुणों और प्रतिभाओं पर बहुत अधिक ज़ोर देने और निरंतर श्रेष्ठ होने की भावना के कारण हुआ था। इस बारे में सोचने से मुझे यह समझने में मदद मिली कि अगर मेरे पास बहुत अधिक प्रतिभाएँ होतीं तो इससे केवल मेरे घमंडी स्वभाव को बढ़ावा मिलता और मैं प्रतिष्ठा और रुतबे का और भी अधिक तीव्रता से अनुसरण करती। उन गुणों और प्रतिभाओं के न होने पर ही मैं नियम का पालन करने वाले तरीके से एक क्षेत्र में अपना कर्तव्य निभा सकती हूँ और विनाश के मार्ग पर चलने से बच सकती हूँ। यह मेरे लिए सुरक्षा का एक रूप है। इस बात का एहसास होने पर मेरा दिल कृतज्ञता की भावना से भर गया। परमेश्वर मुझे जितना भी देता है, उसमें उसके श्रमसाध्य विचार और अच्छे इरादे शामिल होते हैं।

उसके बाद मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और मेरा दिल रोशन हो गया। परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर ने हर व्यक्ति को अलग-अलग क्षमताएँ और खूबियाँ दी हैं। कुछ लोगों के पास दो या तीन क्षेत्रों में क्षमताएँ होती हैं, कुछ के पास केवल एक क्षेत्र में क्षमता होती है, और कुछ के पास कोई भी क्षमता नहीं होती—यदि तुम लोग इन बातों से सही तरीके से निपट सको, तो तुम्हारे पास विवेक है। एक विवेकपूर्ण व्यक्ति अपना स्थान खोजने, पद के अनुसार आचरण करने, और अपने कर्तव्य अच्छी तरह करने में सक्षम होगा। जो व्यक्ति कभी अपना स्थान खोज नहीं सकता, वह व्यक्ति हमेशा महत्वाकांक्षा रखता है। वह हमेशा अपने दिल में रुतबे और लाभ के पीछे भागता है। उसके पास जो कुछ होता है, वह उससे कभी संतुष्ट नहीं होता। अधिक लाभ पाने के लिए वह लालची ढंग से हद से आगे बढ़ जाता है; वह हमेशा अपनी असंयत इच्छाएँ पूरी करना चाहता है। वह सोचता है कि अगर लोगों के पास गुण हैं और उनकी काबिलियत अच्छी है तो उन्हें परमेश्वर का ज्यादा अनुग्रह मिलना चाहिए और यह कि कुछ असंयत इच्छाएँ रखना कोई गलती नहीं है। क्या इस तरह के व्यक्ति में विवेक है? क्या हमेशा असंयत इच्छाएँ रखना बेशर्मी नहीं है? जिन लोगों में जमीर और विवेक होता है, वे महसूस कर सकते हैं कि यह बेशर्मी है और वे अपनी असंयत इच्छाओं का त्याग करने के लिए सत्य की खोज कर सकते हैं। अगर कोई सत्य समझता है तो वह ऐसी मूर्खतापूर्ण चीजें नहीं करेगा। अगर तुम परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान करने के लिए अपना कर्तव्य समर्पित होकर पूरा करने की आशा रखते हो, तो यह कोई असंयत इच्छा नहीं है। यह सामान्य मानवता के जमीर और विवेक के अनुरूप है। यह परमेश्वर को प्रसन्न करता है। अगर तुम सच में अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहते हो तो तुम्हें पहले अपने उपयुक्त स्थान पर खड़ा होना होगा, उसके बाद तुम्हें वह चीज करनी होगी जिसे तुम पूरे दिल से, पूरे मन से, अपनी पूरी क्षमता से कर सकते हो और अपना सर्वश्रेष्ठ करो—यह मानक स्तर का है और इस तरह से कर्तव्य करने में लगन होता है। यही वह कार्य है जो एक सच्चे सृजित प्राणी को करना चाहिए। ... कलीसिया में कुछ लोग गिटार बजा सकते हैं, कुछ एरहु और कुछ ड्रम बजा सकते हैं। यदि इनमें से किसी में भी तुम्हारी रुचि है तो तुम सीख सकते हो। चाहे कोई भी खास कौशल या तकनीक हो, जब तक तुम सीखने में आनंद लेते हो और तुममें योग्यता है, तुम सीख सकते हो। एक बार तुम एक नया कौशल सीख लोगे तो इसका उपयोग एक अतिरिक्त कर्तव्य निभाने में कर सकते हो, यह न केवल लोगों को खुश करता है बल्कि परमेश्वर को भी खुश करता है। अधिक कौशल हासिल करना और परमेश्वर के घर के कार्य में अधिक योगदान देना सबसे धन्य होने वाली बात है। जब कोई युवा हो और उसकी याददाश्त अच्छी हो तो नई चीजें सीखने में कोई बुराई नहीं है। इससे सिर्फ फायदा है और कोई नुकसान नहीं। यह कर्तव्य निभाने और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए लाभप्रद है। अपने कर्तव्य निभाते हुए विभिन्न नई चीजें सीखने पर ध्यान केंद्रित करने का मतलब है कि व्यक्ति मेहनती और जिम्मेदार है; वह उन लोगों से कहीं बेहतर है जो अपने काम के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं। लेकिन यदि तुम कुछ समय से कुछ सीख रहे हो और अब तक तुममें उसकी कोई समझ नहीं बनी है, तो यह इंगित करता है कि उस क्षेत्र में तुममें काबिलियत नहीं है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कुछ लोग अच्छा नृत्य कर सकते हैं लेकिन बेसुरा गाते हैं और उन्हें सुर की कोई समझ नहीं होती है—यह जन्मजात है और इसे बदला नहीं जा सकता है। ऐसी स्थिति से सही तरीके से निपटना चाहिए। यदि तुम नृत्य कर सकते हो तो अच्छे से नृत्य करो। यदि तुम्‍हारे पास परमेश्वर की प्रशंसा करने वाला हृदय है तो भले ही तुम बेसुरा गाते हो, परमेश्वर इसका बुरा नहीं मानता है। अगर तुम्हारे दिल में आनंद है तो इतना ही काफी है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी व्यक्तिगत खूबियाँ किसमें हैं, अगर तुम उनका उपयोग कर सको तो यह अच्छा है। जो कर्तव्य तुम्हें करना चाहिए उसे कर्तव्यनिष्ठ ढंग से करना ही अपने स्थान के अनुसार आचरण करना है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, व्यक्ति के स्व-आचरण का मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि किसी व्यक्ति के पास चाहे कितने भी गुण या प्रतिभाएँ हों, या उसकी काबिलियत कितनी भी अच्छी या खराब हो, एकमात्र अंतर उनके द्वारा निभाए जाने वाले कर्तव्यों और कार्यों में है; कर्तव्यों में, ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं है। इसके अलावा, परमेश्वर द्वारा दिए गए विभिन्न गुणों और प्रतिभाओं के आधार पर परमेश्वर की लोगों से अलग-अलग माँगें होती हैं। जब तक हम अपना सब कुछ दे सकते हैं और पूरे समर्पण के साथ अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकते हैं, परमेश्वर संतुष्ट रहेगा। अगर मैं हमेशा अपनी सही जगह खोजने में असमर्थ रहती हूँ, हमेशा उस चीज़ का लालच करती हूँ जो दूसरों के पास है और प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे भागते हुए लगातार अपने भ्रष्ट स्वभाव में जीती हूँ तो देर-सवेर परमेश्वर मुझे बेनकाब कर देगा और निकाल देगा। मैंने उन भाई-बहनों के बारे में सोचा जो अनुभवजन्य गवाही वाले लेख लिखते हैं। उनमें से कुछ मेजबानी का कर्तव्य निभाते हैं, कुछ सामान्य मामलों का कर्तव्य करते हैं और कुछ बुजुर्ग हैं। उनके पास कोई गुण या प्रतिभा नहीं है, लेकिन अपने कर्तव्यों के प्रति उनका रवैया ईमानदार और व्यावहारिक है। वे अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाने के लिए पूरी सावधानी बरतते हैं, सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं और उन्होंने जीवन के अनुभवजन्य गवाही वाले लेख लिखे हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद करता है। मेरे पास उतनी प्रतिभाएँ नहीं हैं और मैं केवल अनुभवजन्य गवाही वीडियो ही शूट कर सकती हूँ। यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है और यह कुछ ऐसा है जो मैं कर सकती हूँ। अगर मैं इसमें अपना दिल लगाऊँ तो मैं इसे और भी बेहतर कर सकती हूँ, लेकिन अगर मैं व्यावहारिक नहीं हूँ तो शायद मैं इस कर्तव्य को भी अच्छी तरह से न कर पाऊँ। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और मैं अपने गलत अनुसरण को बदलने और अपने वर्तमान कर्तव्य को सँजोने के लिए तैयार थी। मैंने सोचा कि कैसे हर अनुभवजन्य गवाही वाला लेख परमेश्वर के कार्य के बारे में किसी भाई या बहन के अनुभव की गवाही है। इन अनुभवजन्य गवाहियों को अच्छी तरह से पेश करने में अपना दिल लगाकर, एक तरफ मैं परमेश्वर की गवाही दे रही हूँ और दूसरी तरफ, कई लोगों को इन गवाहियों से लाभ उठाने और आध्यात्मिक रूप से उन्नत होने का मौका दे रही हूँ। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और सार्थक कर्तव्य है! उसके बाद अनुभवजन्य गवाही वीडियो शूट करते हुए मैंने अपनी मानसिकता को समायोजित किया, चरित्र में ढलने के लिए लेखक के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश पर ध्यान दिया और हर विवरण को लेकर सतर्कता बरती। हालाँकि तैयार वीडियो में अभी भी कमियाँ और खामियाँ हैं, लेकिन मुझे शांति महसूस हुई और मैंने अपने दिल से इस प्रक्रिया का आनंद लिया। मुझे यह भी एहसास हुआ कि चाहे मैं कोई भी कर्तव्य करूँ, जब तक मैं उसका उपयोग करती हूँ जो मेरे पास है और अपना सर्वश्रेष्ठ देती हूँ, तब तक मैं अपनी सही जगह पर खड़ी हूँ। साथ ही, मुझे अपना कर्तव्य निभाने के दौरान अपने भ्रष्ट स्वभावों को हल करने के लिए सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान देना चाहिए, अपने कर्तव्य में अपने गुणों और प्रतिभाओं पर निर्भर रहने के बजाय, पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन पाने के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहना चाहिए। मुझे अपनी काबिलियत के दायरे में अपने पेशेवर कौशल को सुधारना चाहिए और अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने में अपना दिल लगाना चाहिए। यही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है।

बाद में एक बहन जिसने अनुभवजन्य गवाही वीडियो भी शूट किए थे, विदेशी भाषा के भजन गाने चली गई। मुझे फिर से थोड़ी निराशा हुई, लेकिन मुझे एहसास हुआ कि मेरी सोच गलत थी। मैंने अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह मुझे विचलित होने से बचाए और उससे कहा कि वह मेरे अनुसरण के भ्रामक नज़रिये को छोड़ने में मेरा मार्गदर्शन करे। मैंने सोचा कि कैसे यह परमेश्वर की पूर्वनियति थी कि मेरी बहन के पास यह प्रतिभा थी और मुझे प्रतिस्पर्धा या निराशा महसूस नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर के घर में, हर कोई अपने कर्तव्यों में अपना काम करता है। ऐसा सोचने पर मैं कुछ हद तक इन बातों को छोड़ पाई। मैंने परमेश्वर के वचन याद आए : “अपनी काबिलियत से सही तरीके से पेश आओ। शिकायत मत करो। परमेश्वर ने तुम्हें जितना भी दिया है, वह तुमसे उतना ही माँगेगा। परमेश्वर ने तुम्हें जो नहीं दिया है, वह तुमसे उसकी माँग नहीं करता है। उदाहरण के लिए, अगर परमेश्वर ने तुम्हें औसत या खराब काबिलियत दी है तो वह तुमसे अगुआ, टीम प्रमुख या पर्यवेक्षक बनने की अपेक्षा नहीं करता है। लेकिन अगर परमेश्वर ने तुम्हें वाक्पटुता, खुद को व्यक्त करने की क्षमता या कोई खास गुण दिया है और वह तुमसे इस गुण से संबंधित कार्य करने की अपेक्षा करता है तो तुम्हें इसे अच्छे तरीके से करना चाहिए। परमेश्वर ने तुम्हें जो स्थितियाँ दी हैं, उनके अनुसार अपेक्षाएँ पूरी करने में विफल मत होओ। तुम्हें परमेश्वर के वरदान के योग्य होना चाहिए, इसका पूरा उपयोग करना चाहिए और इसे अच्छी तरह से लागू करना चाहिए, इसे सकारात्मक चीजों पर लागू करना चाहिए और ऐसे मूल्यवान कार्य नतीजे उत्पन्न करने चाहिए जो मानवजाति को लाभ पहुँचाते हों। यह बहुत ही बढ़िया होगा(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (7))। परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल को सुकून दिया। हालाँकि मैं गा या नाच नहीं सकती, लेकिन परमेश्वर ने मुझे अभिनय के क्षेत्र में गुण दिए हैं। इतने सालों से परमेश्वर के घर ने मुझे अनुभवजन्य गवाही वीडियो शूट करने और फिल्म निर्माण में भाग लेने का मौका दिया है। परमेश्वर ने मुझ पर पहले ही बहुत बड़ी कृपा की है। मुझे संतुष्ट रहना चाहिए और अब ऐसे काम नहीं करने चाहिए जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं सत्य का अनुसरण करने में प्रयास करने, अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने, तुम्हारी अपेक्षाओं के अनुसार परमेश्वर में विश्वास के मार्ग पर चलने और तुम्हारे वचनों के अनुसार लोगों और चीज़ों को देखने के लिए तैयार हूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो और मेरी अगुआई करो।” इस प्रार्थना के बाद, मेरा दिल काफी शांत हो गया। जब मैंने दूसरे भाई-बहनों को गाते या नाचते देखा तो मुझ पर कोई असर नहीं हुआ और मैं विचलित नहीं हुई। मैं परमेश्वर के मार्गदर्शन के लिए उसका धन्यवाद करती हूँ, जिससे मुझे मेरे अनुसरण के भ्रामक नज़रिये और उस मार्ग के बारे में कुछ समझ मिली है जिस पर मैं चल रही थी। भविष्य में, मैं परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने और पूरे दिल से अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने के लिए तैयार हूँ।

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