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विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (4)

सिद्ध बनाए जाने का क्या अर्थ है? जीत लिए जाने का क्या अर्थ है? जीत लिए जाने के लिए एक व्यक्ति को किन मानदण्डों पर खरा उतरना अनिवार्य है? सिद्ध बनाए जाने के लिए एक व्यक्ति को किन मानदण्डों पर खरा उतरना अनिवार्य है? जीत लिया जाना और सिद्ध किया जाना दोनों मनुष्य में कार्य किए जाने के लिए हैं ताकि वह अपनी वास्तविक समानता में लौट सके और अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव और शैतान के प्रभाव से स्वतन्त्र हो जाए। यह जीत लिया जाना मनुष्य में कार्य किए जाने की प्रक्रिया में सबसे पहले आता है, अर्थात यह कार्य का पहला कदम है। सिद्ध किया जाना दूसरा कदम या पूरा करने का कार्य है। प्रत्येक मनुष्य को जीत लिए जाने से हो कर गुजरना आवश्यक है; अन्यथा वह परमेश्वर को जानने के योग्य नहीं होगा और नहीं जानेगा कि एक परमेश्वर है, अर्थात, वह परमेश्वर को स्वीकार करने के योग्य नहीं होगा। और यदि एक व्यक्ति परमेश्वर को स्वीकार नहीं करता है, तो परमेश्वर के द्वारा उसे सम्पूर्ण किया जाना असम्भव होगा क्योंकि वह इस सम्पूर्णता के मानदण्ड पर खरा नहीं उतरेगा। यदि तुम परमेश्वर को स्वीकार ही नहीं करते, तो तुम उसे जानने के योग्य कैसे होगे? और तुम उसकी खोज कैसे करोगे? तुम उसके लिए साक्ष्य देने के लिए भी अयोग्य होगे, उसे सन्तुष्ट करने के लिए विश्वास रखने की तो बात ही दूर है। अतः कोई भी व्यक्ति जो सिद्ध बनाया जाना चाहता है, तो पहला कदम जीत लिए जाने के कार्य से हो कर गुजरना है। यह सर्वप्रथम शर्त है। परन्तु चाहे यह जीत लिया जाना हो या सिद्ध किया जाना, यह प्रत्येक मनुष्य में कार्य किए जाने और उसे परिवर्तित किए जाने के लक्ष्य से है और प्रत्येक मनुष्य के प्रबन्धन के कार्य में एक अंश है। यही दो कदम वे बातें हैं, जो किसी व्यक्ति को एक सम्पूर्ण व्यक्ति बनाने के लिए अपेक्षित हैं; किसी भी कदम को छोड़ा नहीं जा सकता है। यह सत्य है कि "जीत लिया जाना" सुनने में अधिक अच्छा नहीं लगता है, परन्तु वास्तव में किसी को जीत लिए जाने की प्रक्रिया उसे परिवर्तित किए जाने की प्रक्रिया है। जीत लिए जाने के पश्चात, हो सकता है तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव से पूर्णतः छुटकारा न पाओ, परन्तु तुम्हें इसका बोध अवश्य हो चुका होगा। जीतने वाले कार्य के द्वारा तुम अपनी निम्न मानवता को जान चुके होगे और अपनी अत्यधिक अनाज्ञाकारिता का बोध भी कर चुके होगे। यद्यपि तुम जीतने वाले कार्य के कम समयावधि में उन्हें त्याग देने या परिवर्तित कर देने में असमर्थ होगे, परन्तु तुम उन्हें जान चुके होगे। यह तुम्हारी सिद्धता के लिए नींव रखता है। इसलिए जीता जाना और सिद्ध किया जाना दोनों ही मनुष्य को बदलने के लिए किए जाते हैं, दोनों ही मनुष्य को उसके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से छुटकारा दिलाने के लिए किए जाते हैं, ताकि वह स्वयं को पूर्ण रीति से परमेश्वर को प्रदान कर सके। बात बस ये है कि जीत लिया जाना मानवीय स्वभाव के परिवर्तन में पहला कदम है और मनुष्य द्वारा परमेश्वर को स्वयं के पूर्ण समर्पण का भी पहला कदम है, एक कदम जो सिद्ध किए जाने से निम्न है। एक जीत लिए गए व्यक्ति के जीवन का स्वभाव एक सिद्ध किए गए व्यक्ति के स्वभाव से बहुत कम परिवर्तित होता है। जीत लिया जाना और सिद्ध किया जाना धारणात्मक रीति से एक-दूसरे से भिन्न हैं, क्योंकि वे कार्य के भिन्न-भिन्न चरण हैं और क्योंकि वे लोगों को भिन्न मानदण्डों में परखते हैं, जीत लिया जाना उन्हें निम्न मानदण्डों में और सिद्ध किया जाना उन्हें उच्च मानदण्डों में परखता है। सिद्ध किए गए लोग धार्मिक जन हैं, लोग जिन्हें पवित्र और शुद्ध बनाया गया है; वे मानवता के प्रबन्धन के कार्य के निश्चित रूप, या अन्तिम उत्पाद हैं। यद्यपि वे निर्दोष मानव नहीं हैं, वे, वे लोग हैं, जो अर्थपूर्ण जीवन जीने को खोजते हैं। परन्तु जीते हुओं का क्या? वे मात्र शाब्दिक रूप से स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर है; वे स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर ने देहधारण किया, कि वचन देह में प्रकट होता है और यह कि पृथ्वी पर परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करने के लिए आया है। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर का न्याय और ताड़ना और उसका प्रहार करना और शुद्धिकरण सब कुछ मनुष्य के लिए लाभप्रद है। अर्थात, उन्होंने अभी मनुष्य की समानता को प्राप्त करना आरम्भ ही किया है, और उनके पास जीवन की कुछ समझ है, परन्तु वे अभी भी इसके विषय में अस्पष्ट हैं। दूसरे शब्दों में, वे अभी मानवता को ग्रहण करना आरम्भ कर ही रहे हैं। ये जीत लिए जाने के परिणाम हैं। जब लोग सिद्धता के मार्ग पर कदम रखते हैं, तो उनका पुराना स्वभाव बदला जा सकता है। इसके अतरिक्त, उनके जीवन निरन्तर विकसित होते रहते हैं, और वे धीरे-धीरे उस सत्य में और गहरे प्रवेश करते जाते हैं। वे संसार से घृणा करने और उन सभी से घृणा करने के योग्य हैं, जो उस सत्य की खोज नहीं करते हैं। वे विशेष रूप से स्वयं से घृणा करते हैं, परन्तु उससे अधिक, वे स्वयं को स्पष्ट रीति से जानते हैं। वे उस सत्य के द्वारा जीवनयापन करने के इच्छुक हैं और वे उस सत्य की खोज को अपना लक्ष्य बनाते हैं। वे उन विचारों में जीवन जीने के लिए अनिच्छुक हैं, जो उनके अपने मस्तिष्कों के द्वारा उपजाए जाते हैं, और वे मनुष्य की आत्म-उपयुक्तता, दम्भ, और आत्म-सन्तोष से घृणा करते हैं। वे औचित्य के सशक्त भाव से सम्भाषण करते हैं, वे विवेक से बातों का निपटारा करते हैं, प्रज्ञावान होते हैं, और निष्ठापूर्वक परमेश्वर के लिए आज्ञाकारी होते हैं। यदि उनपर ताड़ना और न्याय का अवसर आता है, वे न सिर्फ निष्क्रिय और दुर्बल नहीं बनते, अपितु वे इसके लिए आभारी होते हैं। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के बिना वे नहीं रह सकते हैं; इसके द्वारा वे उसकी सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं। वे शान्ति और आनन्द और क्षुधा को तृप्त करने की रोटी के एक विश्वास का अनुसरण नहीं करते हैं। न ही वे अस्थायी शारीरिक आनन्दों के पीछे भागते हैं। सिद्ध किए हुओं के पास यही होता है। लोगों के जीत लिए जाने के पश्चात, वे स्वीकार करते हैं कि एक परमेश्वर है‍‌। परन्तु परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने के पश्चात जो भी कार्य होते हैं, ये कार्य उन तक ही सीमित होते हैं‍‌। वचन का देह में प्रकट होने का वास्तव में क्या अर्थ है? देहधारण का क्या अर्थ है? देहधारी परमेश्वर ने क्या किया है? उसके कार्य का लक्ष्य और महत्त्वपूर्णता क्या है? उसके कार्य को इतना अधिक अनुभव करने के पश्चात, देह में उसके कार्यों को अनुभव करने के पश्चात, तुम ने क्या प्राप्त किया है? इन समस्त वस्तुओं को समझने के पश्चात ही तुम एक जीत लिया गया व्यक्ति बनोगी‍‌। यदि तुम मात्र यही कहती हो "मैं स्वीकार करती हूँ कि एक परमेश्वर है," परन्तु उस पति का त्याग नहीं करती जो तुम्हें करना चाहिए और तुम शारीरिक आनन्दों का त्याग करने में असफल हो जाती हो जो तुम्हें त्याग देने चाहिए और इसके स्थान पर तुम शारीरिक सुख-साधनों की लालसा करती हो जैसा तुम सर्वदा करती हो, तुम भाइयों और बहनों के विरुद्ध किसी भी पूर्वधारणा को त्याग देने में अयोग्य हो, और अनेक साधारण अभ्यासों में कार्यों को पूर्ण करने में तुम अपने देय का भुगतान करने में असमर्थ हो, तब यह प्रमाणित करता है कि तुम अभी भी जीती नहीं गयी हो‍‌। उस स्थिति में, चाहे तुम बहुत अधिक समझते भी हो, तो यह सब व्यर्थ ही होगा‍‌। जीत लिए गए लोग वे लोग हैं जिन्होंने कुछ आरम्भिक बदलाव किए और प्रारम्भिक प्रवेश प्राप्त किया है‍‌। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को अनुभव करना उन्हें परमेश्वर के प्रारम्भिक ज्ञान और उस सत्य की प्रारम्भिक समझ को प्राप्त करने का कारण बनता है‍‌। यद्यपि तुम अनेक गहन, अतिसूक्ष्म सत्यों की वास्तविकता में पूर्णतः प्रवेश करने में अयोग्य हो, तुम अनेक प्रारम्भिक सत्यों का अपने वास्तविक जीवन में अभ्यास करने के योग्य हो, जैसे कि वे जिनमें तुम्हारे शारीरिक आनन्द या तुम्हारी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा सम्मिलित है‍‌। यह सबकुछ, निस्सन्देह, उन लोगों के द्वारा प्राप्त किया गया है, जो जीत लिए जाने से हो कर गुज़र रहे हैं‍‌। स्वभाव में कुछ परिवर्तन उन लोगों में भी देखा जा सकता है जो जीत लिए गए हैं। उदाहरणार्थ, उनकी वेश-भूषा और उनका जीवन-ये बातें बदल सकती हैं। परमेश्वर में विश्वास का उनका दृष्टिकोण बदल जाता है, वे अपने खोज के लक्ष्य की स्पष्टता प्राप्त करते हैं, और उनकी आकांक्षाएँ बढ़ जाती हैं। जीत लिए जाने के दौरान, उनके जीवन का स्वभाव भी परिणामस्वरूप बदल सकता है। ऐसा नहीं है कि वे बदलते ही नहीं हैं। बस उनका परिवर्तन उथला, प्रारम्भिक और स्वभाव में परिवर्तन और अनुसरण का लक्ष्य जो किसी के सिद्ध किये जाने के बाद दिखाई देता है, उससे बहुत छोटा होता है। यदि जीत लिए जाने के दौरान, एक व्यक्ति का स्वभाव बदलता ही नहीं है और वह रत्ती भर भी सत्य प्राप्त नहीं करता है, तो इस प्रकार का व्यक्ति कूड़े-करकट जैसा बन जाता है और पूर्णतः अनुपयोगी होता है! वे लोग जो जीते नहीं गए हैं वे सिद्ध नहीं बन सकते हैं! और यदि एक व्यक्ति मात्र जीत लिए जाने को खोजता है, उसे पूर्णतया सिद्ध नहीं बनाया जा सकता है, चाहे उसके स्वभाव ने जीते जाने के कार्य के दौरान कुछ समरूपी बदलाव दिखाए हों। वह उन प्रारम्भिक सत्यों को भी खो देगा जो उसने प्राप्त किए थे। जीत लिए गए और सिद्ध किए गए के स्वभाव के बदलाव की मात्रा में एक बहुत बड़ा अन्तर है। परन्तु जीत लिया जाना बदलाव में पहला कदम है; यह आधार है। इस आरम्भिक बदलाव की कमी प्रमाण है कि एक व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर को जानता ही नहीं, क्योंकि यह ज्ञान न्याय से आता है, और यह न्याय जीत लिए जाने के कार्य की मुख्य वस्तु है। अतः प्रत्येक सिद्ध किया गया व्यक्ति जीत लिए जाने से होकर गुज़र चुका है। अन्यथा वे सम्भवतः सिद्ध ही नहीं किए जा सकते थे।

तुम कहते हो कि तुम देहधारी परमेश्वर को स्वीकार करते हो और तुम स्वीकार करते हो कि वह वचन देह में प्रकट हुआ, फिर भी उसकी पीठ पीछे तुम कुछ चीज़ें करते हो, और तुम उस प्रकार कार्य नहीं करते जैसा वह चाहता है कि तुम करो, और उसका भय नहीं मानते। क्या यह परमेश्वर को स्वीकार करना है? जो वह कहता है,उसे तुम स्वीकार करते हो परन्तु तुम उन बातों को भी अभ्यास में लाने से इन्कार करते हो, उन्हें भी जो करने के तुम योग्य हो और तुम उसके मार्ग पर बने नहीं रहते हो। क्या यह स्वीकार करना है? तुम उसे स्वीकार करते हो, परन्तु तुम्हारा पूर्वग्रह तो उससे बचकर रहना, कभी भी उसका सम्मान नहीं करना है। यदि तुम ने उसके कार्य को देखा और स्वीकार किया और तुम जानते हो कि वह परमेश्वर है, फिर भी तुम निरुत्साही और पूर्णतः अपरिवर्तित रहते हो, तो तुम अभी भी एक जीते गए व्यक्ति नहीं हो। एक जीत लिए गए व्यक्ति को वह सब कुछ करना है जो वह कर सकता है; वह गहन सत्यों में प्रवेश करना और उन तक पहुँचना चाहता है, यद्यपि अभी वह योग्य नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह जितना आत्मसात कर सकता है उसमें सीमित है और उसके अभ्यास बंधे हुए और सीमित हैं। परन्तु कम से कम उसे वो प्रत्येक बात करनी है जिसके वह योग्य है। यदि तुम ये बातें कर सकते हो, तो यह जीत लिए जाने के कार्य के कारण होगा। कल्पना करो कि तुम कहते हो, "मान लीजिए कि वह अनेक वचन सामने रख सकता है, जो मनुष्य नहीं कर सकता, यदि वह परमेश्वर नहीं है, तो और कौन है?" इस प्रकार की मानसिकता रखने का अर्थ यह नहीं है कि तुम परमेश्वर को स्वीकार करते हो। यदि तुम परमेश्वर को स्वीकार करते हो, तो तुम्हें यह अपने कार्यों के द्वारा प्रदर्शित करना है। एक कलीसिया की अगुवाई करना, परन्तु धार्मिकता करने में अयोग्य होना, और धन का लालच करना और कलीसिया के पैसे को सर्वदा अपनी जेब में डालना-क्या यह स्वीकार करना है कि एक परमेश्वर है? परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और उसका भय मानना है। तुम भयभीत कैसे नहीं हो सकते यदि तुम वास्तव में स्वीकार करते हो कि एक परमेश्वर है? तुम ऐसी कुत्सित चीज़ें कैसे कर सकते हो? क्या उसे विश्वास करना कहा जा सकता है? क्या तुम वास्तव में उसे स्वीकार करते हो? क्या वह परमेश्वर ही है जिसमें तुम विश्वास करते हो? जिसमें तुम विश्वास करते हो वह एक अस्पष्ट परमेश्वर है; इसीलिए तुम भयभीत नहीं हो! वे जो वास्तव में परमेश्वर को स्वीकार करते और जानते हैं वे सभी उसका भय मानते और ऐसा कुछ भी करने से डरते हैं जो उसका विरोध करता है या जो उनके विवेक के विरुद्ध जाता है; वे विशेषतः ऐसा कुछ भी करने से भयभीत होते हैं, जो वे जानते हैं कि परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध है। मात्र इसे ही परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करना समझा जा सकता है। तुम्हें क्या करना चाहिए जब तुम्हारे माता-पिता तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करने से रोकते हैं? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए जब तुम्हारा अविश्वासी पति तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करता है? और तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए जब भाई और बहन तुम से घृणा करते हैं? यदि तुम उसे स्वीकार करते हो, तब तुम उचित रीति से व्यवहार करोगे और इन समस्त परीस्थितियों में वास्तविकता में जीवनयापन करोगे। यदि तुम ठोस रीति से कार्य करने में असफल होते हो परन्तु मात्र कहते हो कि तुम परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हो, तब तुम मात्र एक बकवादी व्यक्ति हो! तुम कहते हो कि तुम उसमें विश्वास करते और उसे स्वीकार करते हो। परन्तु तुम उसे किस रीति से स्वीकार करते हो? तुम किस रीति से उसमें विश्वास करते हो? क्या तुम उसका भय मानते हो? क्या तुम उसका सम्मान करते हो? क्या तुम उसे गहन अभ्यन्तर से प्रेम करते हो? जब तुम व्यथित होते हो और तुम्हारे पास सहारे के लिए कोई नहीं होता, तो तुम अनुभव करते हो कि परमेश्वर से प्रेम करना है, और बाद में तुम इसके विषय में सबकुछ विस्मृत कर देते हो। यह परमेश्वर से प्रेम करना या उसमें विश्वास करना नहीं है! अन्ततः परमेश्वर मनुष्य से क्या प्राप्त करवाना चाहता है? समस्त अवस्थाएँ, जिनका मैंने उल्लेख किया, जैसे कि विचार करना कि तुम एक प्रसिद्ध व्यक्ति हो, अनुभव करना कि तुम बातों को अतिशीघ्र समझ लेते हो, अन्य लोगों को नियन्त्रित करना, दूसरों को नीचा देखना, लोगों को उनकी दिखावट के द्वारा आँकना, निष्कपट लोगों को डराना-धमकाना, कलीसिया के धन का लोभ करना, और ऐसी अनेक बातें-इस प्रकार के भ्रष्ट शैतानी स्वभावों के एक अंश से भी मुक्त होना ही वह बात है जो तुम में जीत लिए जाने के पश्चात दिखाई देनी चाहिए।

जो जीत लिए जाने का कार्य तुम सब लोगों में किया गया है वह गहनतम महत्त्व रखता है। एक ओर, इस कार्य का उद्देश्य लोगों के एक समूह को सिद्ध करना है, अर्थात उन्हें विजेताओं के समूह में सिद्ध करना, पूर्ण किए गए लोगों के प्रथम समूह में, अर्थात प्रथमफलों के रूप में। दूसरी ओर, यह सृष्ट प्राणियों को परमेश्वर के प्रेम का आनन्द लेने देना है, परमेश्वर के महानतम उद्धार को, और परमेश्वर के पूर्ण उद्धार को प्राप्त करने देना है, मनुष्य को न केवल उसकी दया और करुणा का आनन्द लेने देना है, परन्तु और अधिक महत्वपूर्ण रीति से ताड़ना और न्याय का अनुभव लेने देना है। संसार की सृष्टि से अब तक, परमेश्वर ने जो कुछ अपने कार्य में किया है, वह प्रेम ही है, जिसमें मनुष्य के लिए घृणा नहीं है। यहाँ तक कि ताड़ना और न्याय, जो तुम देख चुके हो, वे भी प्रेम ही हैं, अधिक सत्य और अधिक वास्तविक प्रेम, एक सत्य जो मनुष्य का मानवजीवन के सही मार्ग पर सन्दर्शन करता है। तीसरी ओर, यह शैतान के समक्ष साक्ष्य देना है। और चौथी ओर, यह भविष्य के सुसमाचार के कार्य को फैलाने के लिए एक आधार रखना है। जो समस्त कार्य वह कर चुका है, उसका उद्देश्य मानवीय जीवन के सही मार्ग पर लोगों का सन्दर्शन करना है, ताकि वे मनुष्यजाति का सामान्य जीवन प्राप्त कर सकें, क्योंकि मनुष्य नहीं जानता कि एक जीवन का सन्दर्शन कैसे करना है। ऐसे सन्दर्शन के बिना तुम एक रिक्त जीवन जीने के योग्य ही होगे, मात्र एक मूल्यहीन और निरर्थक जीवन जीने के योग्य होगे और यह जानोगे ही नहीं कि एक सामान्य व्यक्ति कैसे बनना है यह मनुष्य को जीत लिए जाने का गहनतम महत्व है। तुम सब मोआब से उत्पन्न हुए हो। तुम में जीत लिए जाने का कार्य तुम्हारा महान उद्धार है। तुम सभी पाप और दुराचार के स्थान में रहते हो; तुम सभी दुराचारी और पापी लोग हो। आज तुम न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण, तुम सब ने ताड़ना और न्याय को प्राप्त किया है, ऐसे गहनतम उद्धार को प्राप्त किया है, अर्थात परमेश्वर के महानतम प्रेम को प्राप्त किया है। वह जो कुछ करता है, वह तुम्हारे लिए वास्तविक प्रेम है; वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता है। यह तुम्हारे पापों के कारण ही है कि वह तुम्हारा न्याय करता है, ताकि तुम आत्म-परीक्षण करोगे और यह अतिबृहत उद्धार प्राप्त करोगे। यह सब कुछ मनुष्य में कार्य करने के लिए किया गया है। आदि से लेकर अन्त तक, मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर जितना हो सके वो सब कुछ कर रहा है, और वह निश्चय ही उस मनुष्य को पूर्णतया विनष्ट करने का इच्छुक नहीं है, जिसे उसने अपने हाथों से रचा है। अब कार्य करने के लिए वह तुम्हारे मध्य आया है; क्या यह और अधिक उद्धार नहीं है? अगर वो तुमसे नफ़रत करता, तो क्या फिर भी वो व्यक्तिगत रूप से तुम्हारा संदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? उसे इस प्रकार दुःख क्यों उठाना चाहिए? परमेश्वर तुम सब से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम सब को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम ही सबसे सच्चा प्रेम है। यह लोगों की अनाज्ञाकारिता के कारण ही है कि उसे उन्हें न्याय के द्वारा बचाना पड़ता है, अन्यथा वे बचाए नहीं जाएँगे। चूंकि तुम नहीं जानते कि एक जीवन का सन्दर्शन कैसे करना है या कैसे जीना है, और तुम इस दुराचारी और पापमय स्थान में जीते हो और दुराचारी और अशुद्ध दानव हो, वह इतना दयाहीन नहीं कि तुम्हें और अधिक भ्रष्ट होने दे; न ही वह इतना दयाहीन है कि तुम्हें शैतान की इच्छानुसार कुचले जाते हुए इस प्रकार के अशुद्ध स्थान में रहने दे, या इतना दयाहीन है कि तुम्हें नरक में गिर जाने दे। वह मात्र तुम्हारे इस समूह को प्राप्त करना और तुम सब को पूर्णतः बचाना चाहता है। यही तुम में जीत लिए जाने के कार्य को करने का मुख्य उद्देश्य है-यह मात्र उद्धार के लिए है। यदि तुम नहीं देख सकते कि जो कुछ तुम में किया गया है, वह प्रेम और उद्धार है, यदि तुम विचार करते हो कि यह मात्र एक विधि है, मनुष्य को यन्त्रणा देने का एक तरीका और कुछ ऐसा जो विश्वास के लायक नहीं है, तब तुम पीड़ा और कठिनाई सहने के लिए अपने संसार में भी लौट सकते हो! यदि तुम इस वर्ग में रहने और इस न्याय और इस अतिबृहत उद्धार में रहने और इस आशिष, जो मानव संसार में कहीं भी पाई नहीं जा सकती, का पूर्णता से आनन्द उठाने, और इस प्रेम का आनन्द उठाने के इच्छुक हो, तो जीत लिए जाने के कार्य को स्वीकार करने के लिए अधीनता से इस वर्ग में बने रहो, जिससे तुम सिद्ध बन सकते हो। यद्यपि अभी तुम न्याय के कारण कुछ कष्ट और शुद्ध किए जाने से पीड़ित हो, यह कष्ट बहुमूल्य और अर्थपूर्ण है। यद्यपि मनुष्य के लिए ताड़ना और न्याय, शुद्धिकरण और निर्दयी प्रकटीकरण हैं, जो उसके पापों का दण्ड देने और उसके शरीर को दण्ड देने के लिए हैं, परन्तु इस कार्य का कुछ भी उसके शरीर की निंदा करने और नष्ट कर देने की इच्छा से नहीं है। वचन के समस्त गम्भीर प्रकटीकरण सही मार्ग पर तुम्हारा सन्दर्शन करने के उद्देश्य से हैं। तुम सब इस कार्य का बहुत कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर चुके हो, और स्पष्टतः, इस ने तुम्हारा सन्दर्शन बुरे मार्ग पर नहीं किया है! इसका सब कुछ तुम्हें एक सामान्य जीवनयापन करने के योग्य करने के लिए है; इसका सब कुछ वह है जो तुम्हारी सामान्य मानवता ग्रहण कर सकती है। इस कार्य के लिए उठाया गया प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारी वास्तविक कद-काठी के अनुसार है, और तुम सब पर कोई भी असहनीय बोझ नहीं डाला गया है। यद्यपि तुम अभी इसे स्पष्ट रीति से देखने में अयोग्य हो, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हूँ, यद्यपि तुम विचार करते रहते हो कि मैं प्रतिदिन तुम्हें ताड़ना देता और तुम्हारा न्याय करता और प्रतिदिन तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुम से घृणा करता हूँ, और यद्यपि जो तुम प्राप्त करते हो वह ताड़ना और न्याय है, वास्तव में तो वह सब तुम्हारे लिए प्रेम है और तुम्हारे लिए एक बड़ी सुरक्षा भी है। यदि तुम इस कार्य के गहन अर्थ को समझ नहीं सकते हो, तब तुम्हारे लिए तुम्हारे अनुभव में चलते जाने के लिए कोई मार्ग ही नहीं है। ऐसे उद्धार से तुम्हें सान्त्वना प्राप्त होनी चाहिए। होश में आने से इन्कार मत करो। इतनी दूर आ कर, तुम्हें जीत लिए जाने के इस कार्य का महत्व सुस्पष्ट दिखाई देना चाहिए। तुम्हें ऐसे - वैसे दृष्टिकोण को और अधिक थामे नहीं रखना चाहिए!

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