देहधारण का रहस्य (2)

जिस समय यीशु ने यहूदिया में कार्य किया था, तब उसने खुलकर ऐसा किया, परंतु अब, मैं तुम लोगों के बीच गुप्त रूप से काम करता और बोलता हूँ। अन्य-जातियाँ इस बात से पूरी तरह से अनजान हैं। तुम लोगों के बीच मेरा कार्य बाहर के लोगों के लिए बंद है। इन वचनों, इन ताड़नाओं और न्यायों को केवल तुम लोग ही जानते हो, और कोई नहीं। यह समस्त कार्य तुम लोगों के बीच ही किया जाता है और केवल तुम लोगों के लिए ही प्रकट किया जाता है; अन्य-जातियों में से कोई भी इसे नहीं जानता, क्योंकि अभी समय नहीं आया है। यहाँ ये लोग ताड़ना सहने के बाद पूर्ण किए जाने के समीप हैं, परंतु बाहर के लोग इस बारे में कुछ नहीं जानते। यह कार्य बहुत अधिक छिपा हुआ है! उनके लिए देहधारी परमेश्वर छिपा हुआ है, परंतु जो इस धारा में हैं, उनके लिए कहा जा सकता है कि वह खुला है। यद्यपि परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से सब-कुछ खुला है, सब-कुछ प्रकट है और सब-कुछ मुक्त है, लेकिन यह केवल उनके लिए सही है, जो उसमें विश्वास करते हैं; जहाँ तक शेष लोगों का, अन्य-जातियों का संबंध है, उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं करवाया जाता। वर्तमान में तुम लोगों में और चीन में जो कार्य किया जा रहा है, वह एकदम छिपाया हुआ है, ताकि उन्हें इसके बारे में पता न चले। यदि उन्हें इस कार्य का पता चल गया, तो वे सिवाय उसकी निंदा और उत्पीड़न के, कुछ नहीं करेंगे। वे उसमें विश्वास नहीं करेंगे। बड़े लाल अजगर के देश में, इस सबसे अधिक पिछड़े इलाके में, कार्य करना कोई आसान बात नहीं है। यदि इस कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो इसे जारी रखना असंभव होता। कार्य का यह चरण इस स्थान में किया ही नहीं जा सकता। यदि इस कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो वे इसे कैसे आगे बढ़ने दे सकते थे? क्या यह कार्य को और अधिक जोखिम में नहीं डाल देता? यदि इस कार्य को छिपाया नहीं जाता, बल्कि यीशु के समय के समान ही किया जाता, जब उसने असाधारण ढंग से बीमारों को चंगा किया और राक्षसों को निकाला था, तो क्या इसे बहुत पहले ही दानवों द्वारा “पकड़” नहीं लिया गया होता? क्या वे परमेश्वर के अस्तित्व को बरदाश्त कर पाते? यदि मैं अभी मनुष्य को उपदेश और व्याख्यान देने के लिए उपासना-गृहों में प्रवेश करता, तो क्या मुझे बहुत पहले ही टुकड़े-टुकड़े नहीं कर दिया गया होता? और यदि ऐसा होता, तो मेरा कार्य कैसे जारी रह पाता? चिह्न और चमत्कार खुले तौर पर बिल्कुल भी प्रकट न करना, यह सब छिपाने के लिए ही है। इसलिए, अन्य-जातियों को मेरा कार्य दिख नहीं सकता, वे इसे जान या खोज नहीं सकते। यदि कार्य के इस चरण को अनुग्रह के युग में यीशु के तरीके से ही किया जाता, तो यह उतना सुस्थिर नहीं हो सकता था, जितना अब है। इसलिए, इस तरह गुप्त रूप से कार्य करना तुम लोगों के लिए और सारे कार्य के लिए लाभकारी है। जब पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा, अर्थात् जब यह गुप्त कार्य पूरा हो जाएगा, तब कार्य का यह चरण एक झटके से प्रकट हो जाएगा। सब जान जाएँगे कि चीन में विजेताओं का एक समूह है; सब जान जाएँगे कि परमेश्वर ने चीन में देहधारण किया और उसका कार्य समाप्ति पर आ गया है। केवल तभी मनुष्य को इसका एहसास होगा : ऐसा क्यों है कि चीन का अभी ह्रास या पतन दिखना बाकी है? इससे पता चलता है कि परमेश्वर ने चीन में व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य किया है और उसने लोगों के एक समूह को विजेताओं के रूप में पूर्ण बना दिया है।

देहधारी बना परमेश्वर स्वयं को सभी सृजित प्राणियों के सामने प्रकट करने के बजाय लोगों के उस एक हिस्से के सामने प्रकट करता है जो उस अवधि के दौरान उसका अनुसरण करते हैं, जब वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है। वह केवल अपने कार्य के एक चरण को पूरा करने के लिए देहधारी बना, मनुष्य को अपनी छवि दिखाने के लिए नहीं। लेकिन उसका कार्य स्वयं उसके द्वारा ही किया जाना चाहिए, इसलिए उसका देह में ऐसा करना आवश्यक है। जब यह कार्य पूरा हो जाएगा, तो वह मनुष्य की दुनिया से चला जाएगा; वह लंबी अवधि तक मानव-जाति के बीच नहीं रह सकता, वरना इससे आगामी कार्य में बाधा आ जाएगी। जो कुछ वह असंख्य लोगों पर प्रकट करता है, वह केवल उसका धार्मिक स्वभाव और उसके समस्त कर्म हैं, अपने दो देहधारणों की छवि नहीं, क्योंकि परमेश्वर की छवि केवल उसके स्वभाव के माध्यम से ही प्रकट की जा सकती है और इसे उसके देहधारी शरीर की छवि से बदला नहीं जा सकता है। उसके देह की छवि केवल सीमित लोगों को प्रकट की जाती है, केवल उन लोगों को जो तब उसका अनुसरण करते हैं जब वह देह में कार्य करता है। इसीलिए जो कार्य अब किया जा रहा है, वह इस तरह गुप्त रूप से किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, यीशु ने जब अपना कार्य किया, तो उसने स्वयं को केवल यहूदियों के सामने प्रकट किया और अपने आप को कभी भी किसी दूसरे देश को सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाया। इस प्रकार, जब एक बार उसने अपना कार्य समाप्त कर लिया, तो वह तुरंत ही मनुष्यों की दुनिया से चला गया और रुका नहीं; उसके बाद वह, मनुष्य की यह छवि, वो नहीं था जो स्वयं को मनुष्य को प्रकट कर रहा था, बल्कि वह पवित्र आत्मा था, जिसने सीधे तौर पर कार्य किया। एक बार जब देहधारी बने परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाता है, तो वह नश्वर संसार से चला जाएगा, और फिर कभी उस तरह का कार्य नहीं करेगा, जो उसने तब किया था, जब वह देह में था। इसके बाद का समस्त कार्य पवित्र आत्मा द्वारा सीधे तौर पर किया जाएगा। इस अवधि के दौरान मनुष्य शायद ही उसके दैहिक शरीर की छवि देख पाएगा; वह स्वयं को बिल्कुल भी मनुष्य को प्रकट नहीं करेगा, बल्कि हमेशा छिपा रहेगा। देहधारी बने परमेश्वर के कार्य के लिए समय सीमित होता है। वह एक विशेष युग, अवधि, देश और विशेष लोगों के बीच किया जाता है। वह कार्य केवल परमेश्वर के देहधारण की अवधि के दौरान के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक युग का प्रतिनिधि है, और यह एक युग-विशेष में परमेश्वर के आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, परमेश्वर के आत्मा के कार्य की संपूर्णता का नहीं। इसलिए, देहधारी बने परमेश्वर की छवि असंख्य लोगों के सामने प्रकट नहीं होगी। असंख्य लोगों के सामने जो चीज प्रकट होती है वह है परमेश्वर की धार्मिकता और अपनी संपूर्णता में उसका स्वभाव, न कि उसकी उस समय की छवि जब वह दो बार देहधारी बना। यह न तो एकल छवि है जो मनुष्य को प्रकट होती है, और न ही दो संयुक्त छवियाँ हैं। इसलिए, यह अनिवार्य है कि देहधारी परमेश्वर का देह उस कार्य की समाप्ति पर पृथ्वी से चला जाए, जिसे करना उसके लिए आवश्यक है, क्योंकि वह केवल उस कार्य को पूरा करने आता है जो उसे करना चाहिए, न कि लोगों को अपनी छवि प्रकट करने आता है। यद्यपि देहधारण की सार्थकता परमेश्वर द्वारा पहले ही दो बार देहधारण करके पूरी की जा चुकी है, फिर भी वह किसी ऐसे देश पर अपने आपको खुलकर प्रकट नहीं करेगा जिसने उसे पहले कभी नहीं देखा है। यीशु फिर कभी स्वयं को धार्मिकता के सूर्य के रूप में यहूदियों के सामने प्रकट नहीं करेगा, न ही वह जैतून के पहाड़ के शिखर पर खड़ा होगा और असंख्य लोगों के सामने खुद को प्रकट करेगा; यहूदियों ने जो कुछ भी देखा है वह सब यहूदिया में अपने समय के दौरान की यीशु की तसवीर है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने देहधारण में यीशु का कार्य दो हजार वर्ष पहले समाप्त हो गया; वह किसी यहूदी की छवि में वापस यहूदिया नहीं आएगा, एक यहूदी की छवि में अपने आप को किसी भी अन्य-जाति राष्ट्र के सामने प्रकट करने की बात तो और भी दूर रही, क्योंकि यीशु की देहधारी छवि केवल एक यहूदी की छवि है, मनुष्य के उस पुत्र की छवि नहीं है जिसे यूहन्ना ने देखा था। भले ही यीशु ने अपने अनुयायियों से वादा किया था कि वह फिर आएगा, फिर भी वह अन्य-जाति राष्ट्रों के सब लोगों के समक्ष स्वयं को यहूदी की छवि में प्रकट नहीं करेगा। तुम लोगों को यह जानना चाहिए कि परमेश्वर के देहधारी होने का कार्य एक युग का सूत्रपात करना है। यह कार्य कुछ वर्षों की अवधि तक सीमित है और वह परमेश्वर के आत्मा का समस्त कार्य पूरा नहीं कर सकता है, वैसे ही जैसे, एक यहूदी के रूप में यीशु की छवि केवल परमेश्वर की उस छवि का प्रतिनिधित्व कर सकती है, जब उसने यहूदिया में कार्य किया था, और वह केवल सलीब पर चढ़ने का कार्य ही कर सकता था। जिस अवधि के दौरान यीशु देहधारी था, वह युग का अंत करने या मानवजाति को नष्ट करने का कार्य नहीं कर सकता था। इसलिए, जब उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, और उसने अपना कार्य समाप्त कर लिया, तब वह उच्चतम ऊँचाई पर चढ़ गया और उसने हमेशा के लिए स्वयं को मनुष्य से छिपा लिया। तब से, अन्य-जाति राष्ट्रों के वे वफादार विश्वासी प्रभु यीशु के प्रकटीकरण को देखने में असमर्थ हो गए, वे केवल उसके चित्र को देखने में ही समर्थ रहे, जिसे उन्होंने दीवार पर चिपकाया था। लेकिन यह चित्र तो मनुष्य का बनाया हुआ चित्र है, न कि परमेश्वर की वह छवि है जैसी वह स्वयं को मनुष्य के सामने प्रकट करता है। परमेश्वर खुद को अपने दो देहधारणों की छवि में असंख्य लोगों के सामने खुलकर प्रकट नहीं करेगा। जो कार्य वह मनुष्यों के बीच करता है, वह इसलिए करता है ताकि वे उसके स्वभाव को समझ सकें। मनुष्य को इस सबका खुलासा भिन्न-भिन्न युगों के कार्य के माध्यम से होता है; यह उस स्वभाव के माध्यम से, जो उसने ज्ञात करवाया है और उस कार्य के माध्यम से, जो उसने किया है, संपन्न किया जाता है, यीशु की अभिव्यक्ति के माध्यम से नहीं। अर्थात्, मनुष्य को परमेश्वर की छवि देहधारी छवि के माध्यम से ज्ञात नहीं करवाई जाती है, बल्कि उस देहधारी परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य के माध्यम से ज्ञात करवाई जाती है जिसके पास छवि और आकार दोनों हैं; और उसके कार्य के माध्यम से उसकी छवि का खुलासा होता है और उसका स्वभाव ज्ञात करवाया जाता है। यही उस कार्य की सार्थकता है जिसे वह देह में करना चाहता है।

एक बार जब परमेश्वर के दो देहधारणों का कार्य समाप्त हो जाएगा, तो वह सभी अन्य-जाति राष्ट्रों में अपने धार्मिक स्वभाव को प्रकट करने लगेगा, अपनी छवि असंख्य लोगों को देखने देगा। वह अपने स्वभाव को प्रकट करेगा और इसके माध्यम से विभिन्न श्रेणियों के मनुष्यों का परिणाम प्रकट करेगा, इस प्रकार समस्त पुराने युग को पूरी तरह से समाप्त कर देगा। देह में उसका कार्य बड़े भौगोलिक क्षेत्र तक विस्तारित नहीं होता (जैसे कि यीशु ने केवल यहूदिया में काम किया, और आज मैं केवल तुम लोगों के बीच कार्य करता हूँ), इसका कारण यह है कि देह में उसके कार्य की हदें और सीमाएँ हैं। वह एक साधारण और सामान्य देह में केवल एक अल्पावधि का कार्य करता है; वह इस देहधारी देह का उपयोग शाश्वतता का कार्य करने या अन्य-जाति राष्ट्रों के असंख्य लोगों को दिखाई देने का कार्य करने के लिए नहीं करता। देह में कार्य का दायरा सीमित ही हो सकता है (जैसे कि सिर्फ यहूदिया में या सिर्फ तुम लोगों के बीच कार्य करना), और फिर इन सीमाओं के भीतर किए गए कार्य के माध्यम से इसके दायरे को तब विस्तार दिया जा सकता है। बेशक, विस्तार का कार्य सीधे तौर पर उसके आत्मा द्वारा किया जाना है और तब वह उसके देहधारी शरीर का कार्य नहीं रह जाएगा। चूँकि देह में कार्य की सीमाएँ हैं और वह विश्व के समस्त कोनों तक नहीं फैलता—वह इसे पूरा नहीं कर सकता। देह में कार्य के माध्यम से उसका आत्मा उस कार्य को करता है, जो उसके बाद आता है। इसलिए, देह में किया गया कार्य शुरुआती प्रकृति का होता है, जिसे कुछ निश्चित सीमाओं के भीतर किया जाता है; इसके बाद, उसका आत्मा उस कार्य को आगे बढ़ाता है, और इतना ही नहीं, ऐसा वह एक बढ़े हुए दायरे में करता है।

परमेश्वर पृथ्वी पर कार्य करने केवल इसलिए आता है ताकि वह युग की अगुआई करे; उसका उद्देश्य केवल नए युग का आरंभ करना और पुराने युग को समाप्त करना है। वह पृथ्वी पर मनुष्य का जीवन जीने, स्वयं मानव-जगत के जीवन के सुख-दुःख का अनुभव करने, या किसी व्यक्ति को अपने हाथ से पूर्ण बनाने या किसी व्यक्ति को संवृद्धि करते हुए स्वयं देखने के लिए नहीं आया है। यह उसका कार्य नहीं है; उसका कार्य केवल एक नए युग का आरंभ करना और पुराने युग को समाप्त करना है। अर्थात्, वह व्यक्तिगत रूप से एक युग का आरंभ करेगा, व्यक्तिगत रूप से दूसरे युग का अंत करेगा और व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करके शैतान को पराजित करेगा। हर बार जब वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है, तो यह ऐसा होता है मानो वह युद्ध के मैदान में कदम रख रहा हो। सबसे पहले, वह विश्व को जीतता है और देह में रहते हुए शैतान पर विजय प्राप्त करता है; वह सारी महिमा प्राप्त करता है और दो हज़ार वर्षों के कार्य की समग्रता पर से पर्दा उठाता है, और उसे ऐसा बना देता है कि पृथ्वी के सभी मनुष्यों के पास चलने के लिए एक सही मार्ग और जीने के लिए एक शांतिपूर्ण और आनंदमय जीवन हो। किंतु, परमेश्वर लंबे समय तक मनुष्य के साथ पृथ्वी पर नहीं रह सकता, क्योंकि परमेश्वर तो परमेश्वर है, और अंततः मनुष्य के समान नहीं है। वह एक सामान्य मनुष्य का जीवनकाल नहीं जी सकता, अर्थात्, वह पृथ्वी पर एक ऐसे मनुष्य के रूप में नहीं रह सकता, जो साधारण के अलावा कुछ नहीं है, क्योंकि उसके पास अपने मानव-जीवन को बनाए रखने के लिए एक सामान्य मनुष्य की सामान्य मानवता का केवल एक अल्पतम अंश ही है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर पृथ्वी पर कैसे एक परिवार शुरू कर सकता है, कैसे आजीविका अपना सकता है और कैसे बच्चे पैदा कर सकता है और उनकी परवरिश कर सकता है? क्या यह उसके लिए अपमानजनक नहीं होगा? वह सिर्फ सामान्य तरीके से कार्य करने के उद्देश्य से सामान्य मानवता से संपन्न है, न कि एक सामान्य मनुष्य के समान अपना परिवार और आजीविका रखने में समर्थ होने के लिए। उसका सामान्य विवेक, सामान्य मन और उसके देह के सामान्य भोजन और वस्त्र यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसमें एक सामान्य मानवता है; यह साबित करने के लिए कि वह सामान्य मानवता से सुसज्जित है, उसे परिवार या आजीविका रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह पूरी तरह से अनावश्यक होगा! परमेश्वर का पृथ्वी पर आना वचन का देह बनना है; वह मनुष्य को मात्र अपने वचन को समझने और अपने वचन को देखने दे रहा है, अर्थात्, मनुष्य को देह द्वारा किए गए कार्य को देखने दे रहा है। उसका यह इरादा नहीं है कि लोग उसके देह के साथ एक निश्चित तरीके से व्यवहार करें, बल्कि केवल यह है कि मनुष्य अंत तक समर्पित बने रहें, अर्थात्, उसके मुँह से निकलने वाले सभी वचनों के प्रति समर्पित रहें और उसके द्वारा किए जाने वाले समस्त कार्य के प्रति समर्पित रहें। वह मात्र देह में कार्य कर रहा है; वह जानबूझकर मनुष्य से यह नहीं कह रहा कि वह उसकी देह की महानता या पवित्रता की सराहना करे, बल्कि वह मनुष्य को अपने कार्य की बुद्धिमानी और वह समस्त अधिकार दिखा रहा है, जिसका वह प्रयोग करता है। इसलिए, भले ही उसके पास उत्कृष्ट मानवता है, फिर भी वह कोई घोषणा नहीं करता है, और केवल उस कार्य पर ध्यान केंद्रित करता है जो उसे करना चाहिए। तुम लोगों को जानना चाहिए कि ऐसा क्यों है कि परमेश्वर देहधारी बना और फिर भी वह अपनी सामान्य मानवता का कभी भी प्रचार नहीं करता है या उसकी गवाही नहीं देता है, बल्कि इसके बजाय केवल उस कार्य को करता है, जिसे वह करना चाहता है। इसलिए, जो कुछ तुम लोग देहधारी परमेश्वर में देख सकते हो, वह उसका दिव्य स्वरूप है; इसका कारण यह है कि वह अपने मानवीय स्वरूप का ढिंढोरा नहीं पीटता, जिससे कि मनुष्य उसका अनुकरण करे। केवल जब मनुष्य लोगों की अगुआई करता है, तभी वह अपने मानवीय स्वरूप के बारे में बोलता है, ताकि वह उनकी प्रशंसा और विश्वास बेहतर ढंग से पा सके और इसके फलस्वरूप उनका अगुआ बन सके। इसके विपरीत, परमेश्वर केवल अपने कार्य (अर्थात् मनुष्य के लिए अप्राप्य कार्य) के माध्यम से ही मनुष्य पर विजय प्राप्त करता है; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि क्या मनुष्य द्वारा उसकी प्रशंसा की जाती है या वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाता है या नहीं। वह बस अपने प्रति मनुष्य में भय की भावना या अपनी अगाधता का भाव भरता है। परमेश्वर को मनुष्य से अपनी सराहना कराने की कोई आवश्यकता नहीं है; वह मनुष्य से बस यह चाहता है कि उसका स्वभाव देख लेने के बाद मनुष्य उसका भय माने। परमेश्वर जो कार्य करता है, वह उसका अपना कार्य है; उसे उसके बजाय मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता, न ही उसे मनुष्य द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। केवल स्वयं परमेश्वर ही अपना कार्य कर सकता है और मनुष्य की एक नए जीवन में अगुआई करने के लिए नए युग की शुरुआत कर सकता है। जो कार्य वह करता है, वह मनुष्य को एक नया जीवन धारण करने और नए युग में प्रवेश करने में सक्षम बनाने के लिए है। शेष कार्य उन लोगों को सौंप दिया जाता है, जो सामान्य मानवता वाले हैं और जिनकी दूसरों के द्वारा प्रशंसा की जाती है। इसलिए, अनुग्रह के युग में उसने दो हज़ार वर्षों के कार्य को देह में अपने तैंतीस वर्षों में से मात्र साढ़े तीन वर्षों में पूरा कर दिया। जब परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आता है, तो वह हमेशा दो हजार वर्षों के या एक समस्त युग के कार्य को कुछ ही वर्षों के लघुतम समय के भीतर पूरा कर देता है। वह ठहरता नहीं, और वह देरी नहीं करता है; वह बस कई वर्षों के काम को घनीभूत कर देता है, ताकि वह मात्र कुछ थोड़े-से वर्षों में ही पूरा हो जाए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिस कार्य को वह व्यक्तिगत रूप से करता है, वह पूर्णतः एक नया मार्ग प्रशस्त करने और एक नए युग की अगुआई करने के लिए होता है।

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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