1. परमेश्वर के वचनों के कार्य का महत्व
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
राज्य के युग में परमेश्वर नए युग की शुरुआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने और उस संपूर्ण युग का काम करने के लिए वचनों का उपयोग करता है। यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर वचन के युग में कार्य करता है। वह देहधारी हुआ है और विभिन्न दृष्टिकोणों से बोलता है, जिससे मनुष्य सचमुच परमेश्वर को देखे, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, और उसकी बुद्धि और चमत्कार को देखे। परमेश्वर इस तरह कार्य करता है ताकि लोगों को जीतने, लोगों को पूर्ण बनाने और लोगों को निकाल देने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल करे। वचन के युग में कार्य करने के लिए वचनों के उपयोग का यही वास्तविक अर्थ है। वचनों के द्वारा लोग परमेश्वर के कार्यों को, परमेश्वर के स्वभाव को, मनुष्य के सार के साथ ही यह जान पाते हैं कि मनुष्य को किसमें प्रवेश करना चाहिए। वचन के युग में परमेश्वर जो भी कार्य करना चाहता है, वह सारा वचनों के जरिए पूरा होता है। वचनों के माध्यम से लोगों को प्रकट किया और निकाला जाता है और उनका परीक्षण किया जाता है। लोगों ने इन वचनों को देखा है, इन वचनों को सुना है और इन वचनों के अस्तित्व को पहचाना है। इसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करने लगे हैं, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि के साथ ही साथ मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेममय और बचाने वाले हृदय पर विश्वास करने लगे हैं। यद्यपि “वचन” शब्द साधारण और सरल है, पर देहधारी परमेश्वर के मुख से निकले वचन ब्रह्माण्ड को झकझोरते हैं; लोगों के हृदय को रूपांतरित करते हैं, उनकी धारणाओं और पुराने स्वभावों को रूपांतरित करते हैं और समस्त संसार के पुराने स्वरूप में परिवर्तन लाते हैं। युगों-युगों में केवल आज का परमेश्वर इस प्रकार से कार्य करता है और केवल वही इस प्रकार से बोलता है और इस प्रकार मनुष्य को बचाता है। इसके बाद से मनुष्य परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में, उसके वचनों की चरवाही और आपूर्ति में जीवन जीता है; सभी लोग वचनों के संसार में जीते हैं, परमेश्वर के वचनों के अभिशापों और आशीषों के बीच जीते हैं और अधिकतर लोग परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना के अधीन जीते हैं। ये वचन और यह कार्य सब कुछ मनुष्य के उद्धार, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने और पुरानी सृष्टि के संसार के मूल स्वरूप को बदलने के लिए हैं। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि वचनों के उपयोग से की, वह समस्त ब्रह्माण्ड में मनुष्य की अगुवाई वचनों के द्वारा करता है, वह वचनों के द्वारा उन्हें जीतता और उनका उद्धार करता है और अंत में वह वचनों के उपयोग से समस्त पुरानी दुनिया का अंत कर देगा और इस प्रकार अपनी संपूर्ण प्रबंधन योजना पूरी करेगा। राज्य के युग के शुरू से अंत तक, परमेश्वर अपना कार्य करने और अपने कार्यों का परिणाम प्राप्त करने के लिए वचन का उपयोग करता है। वह कौतुक या चमत्कार नहीं करता, बल्कि अपना कार्य केवल वचनों के जरिए करता है। इन वचनों के कारण सभी लोग संपोषण और आपूर्ति पाते हैं और ज्ञान और वास्तविक अनुभव प्राप्त करते हैं। वचन के युग में मनुष्य ने वास्तव में अति विशेष आशीष पाई है। मनुष्य को शरीर में कोई कष्ट नहीं होता और वह बस परमेश्वर के वचन की भरपूर आपूर्ति का आनंद उठाता है; उसे आँख मूँदकर खोजने या भाग-दौड़ करने की आवश्यकता नहीं और अपनी निश्चिंतता के बीच वह परमेश्वर के प्रकटन को निहारता है, उसे उसके मुख से बातें करते हुए सुनता है, वह प्राप्त करता है जो परमेश्वर आपूर्ति करता है, और उसे व्यक्तिगत रूप से अपना काम करते हुए देखता है। बीते युगों में मनुष्य को इन सब बातों का आनंद प्राप्त नहीं था और वे इन आशीषों को कभी प्राप्त नहीं कर सकते थे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है
उस समय, यीशु ने बहुत-से ऐसे कार्य किए जो उसके शिष्यों की समझ से बाहर थे, और ऐसी बहुत-सी बातें कहीं जो लोगों की समझ में नहीं आयीं। इसका कारण यह है कि उस समय उसने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। इस प्रकार, यीशु के जाने के कई वर्ष बाद, मत्ती ने उसकी एक वंशावली बनायी और अन्य लोगों ने भी बहुत-से ऐसे कार्य किए जो मनुष्य की इच्छा के अनुसार थे। यीशु मनुष्य को पूर्ण करने और प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि कार्य का एक चरण संपन्न करने के लिए आया था : स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को आगे बढ़ाने और सूली पर चढ़ने का कार्य करने। इसलिए, एक बार जब यीशु को सूली पर चढ़ा दिया गया, तो उसके कार्य का पूरी तरह से अंत हो गया। किन्तु वर्तमान चरण में जो कि विजय का कार्य है, अधिक वचन बोले जाने चाहिए, अधिक कार्य किया जाना चाहिए और कई प्रक्रियाएँ होनी चाहिए। उसी तरह, यीशु और यहोवा के कार्यों के रहस्य भी प्रकट होने चाहिए, ताकि सभी लोगों को अपने विश्वास में समझ और स्पष्टता मिल जाए, क्योंकि यह अंत के दिनों का कार्य है, और अंत के दिन परमेश्वर के कार्य के समापन के दिन हैं, यह कार्य खत्म होने का समय है। कार्य का यह चरण तुम्हारे लिए यहोवा की व्यवस्था और यीशु के छुटकारे को एकदम स्पष्ट कर देगा, और यह मुख्य रूप से इसलिए है ताकि तुम परमेश्वर की छह हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना के पूरे कार्य को समझ सको और इस छह हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना की सारी महत्ता और सार समझ सको, और यीशु द्वारा किए गए सभी कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों का प्रयोजन और यहाँ तक कि बाइबल में अपने अंधे विश्वास और उसकी आराधना को भी समझ सको। तुम्हें इन सब को पूरी तरह से समझने में मदद करेगा। तुम यीशु द्वारा किए गए कार्य और परमेश्वर के आज के कार्य, दोनों को समझ जाओगे; तुम समस्त सत्य, जीवन और मार्ग को समझ लोगे और देख लोगे। यीशु द्वारा किए गए कार्य के चरण में, यीशु समापन कार्य किए बिना क्यों चला गया? क्योंकि यीशु के कार्य का चरण समापन का कार्य नहीं था। जब उसे सूली पर चढ़ाया गया, तब उसके वचनों का भी अंत हो गया था; उसके सूली पर चढ़ने के बाद उसका कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया था। वह वर्तमान चरण जैसा नहीं था, जिसमें वचनों के अंत तक बोले जाने और उसका समस्त कार्य समाप्त हो जाने के बाद ही परमेश्वर का कार्य समाप्त होगा। यीशु के कार्य के चरण के दौरान, ऐसे बहुत-से वचन थे जो अनकहे रह गए थे, या जो स्पष्ट रूप से नहीं बोले गए थे। फिर भी यीशु ने इस बात की परवाह नहीं की कि उसके वचन पूरी तरह से व्यक्त हो गए हैं या नहीं, क्योंकि उसकी सेवकाई कोई वचनों की सेवकाई नहीं थी, इसलिए सूली पर चढ़ाये जाने के बाद वह चला गया। कार्य का वह चरण मुख्यतः सूली पर चढ़ने के वास्ते था और वह वर्तमान चरण से भिन्न है। कार्य का यह चरण मुख्य रूप से समस्त कार्य का समापन करने, आखिरी साफ-सफाई करने और उसे अंत तक ले जाने के लिए है। यदि अंत तक वचन नहीं बोले गए, तो इस कार्य को पूरा करना असंभव होगा, क्योंकि कार्य के इस चरण में समस्त कार्य का समापन और उसे पूरा करने का काम वचनों के उपयोग से किया जाता है। उस समय यीशु ने ऐसा बहुत-सा कार्य किया, जो मनुष्य की समझ से बाहर था। वह चुपचाप चला गया और आज भी ऐसे बहुत-से लोग हैं जो उसके वचनों को नहीं समझते। उनकी समझ त्रुटिपूर्ण है, फिर भी वे उसे सही मानते हैं, और नहीं जानते कि वे गलत हैं। अंतिम चरण पूरी तरह से परमेश्वर के कार्य का अंत और इसका उपसंहार करेगा। सभी लोग परमेश्वर की प्रबंधन योजना को समझ और जान लेंगे। मनुष्य की धारणाएँ, उसके इरादे, उसकी भ्रामक समझ, यहोवा और यीशु के कार्यों के प्रति उसकी धारणाएँ, अविश्वासियों के बारे में उसके विचार और उसकी सभी विकृतियाँ ठीक कर दी जाएँगी। और मनुष्य जीवन में सभी सही मार्ग, परमेश्वर द्वारा किया गया समस्त कार्य और संपूर्ण सत्य समझ जाएगा। जब ऐसा होगा, तो कार्य का यह चरण समाप्त हो जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)
कार्य के इस अंतिम चरण में परिणाम वचन के माध्यम से प्राप्त किए जाते हैं। वचन के माध्यम से मनुष्य अनेक रहस्यों और पिछली पीढ़ियों के दौरान किए गए परमेश्वर के कार्य को समझ जाता है; वचन के माध्यम से मनुष्य पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है; वचन के माध्यम से मनुष्य पिछली पीढ़ियों के द्वारा कभी न सुलझाए गए रहस्यों को, और साथ ही अतीत के समयों के नबियों और प्रेरितों के कार्य को और उनके कार्य करने के सिद्धांतों को समझ जाता है; वचन के माध्यम से मनुष्य स्वयं परमेश्वर के स्वभाव को भी समझ जाता है, वह मनुष्य की विद्रोहशीलता और प्रतिरोध को जान जाता है और वह अपने सार को भी जान जाता है। कार्य के इन चरणों और बोले गए सभी वचनों के माध्यम से मनुष्य आत्मा के कार्य को, देहधारी परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य को, और इससे भी बढ़कर, उसके संपूर्ण स्वभाव को जान जाता है। छह हजार वर्ष भर के परमेश्वर के प्रबंधन कार्य का तुम्हारा ज्ञान भी वचन के माध्यम से ही प्राप्त किया गया। क्या तुम्हारी पुरानी धारणाओं का ज्ञान और उन्हें अलग रखने में तुम्हारी सफलता भी वचन के माध्यम से प्राप्त नहीं की गई? पिछले चरण में यीशु ने चिह्न और चमत्कार दिखाए थे, किंतु इस चरण में कोई चिह्न और चमत्कार नहीं है। क्या तुम्हारी यह समझ भी, कि परमेश्वर चिह्न और चमत्कार क्यों नहीं दिखाता, वचन के माध्यम से ही प्राप्त नहीं की गई? इसलिए, इस चरण में बोले गए वचन पिछली पीढ़ियों के प्रेरितों और नबियों द्वारा किए गए कार्यों से बढ़कर हैं। यहाँ तक कि नबियों द्वारा की गई भविष्यवाणियाँ भी ऐसा परिणाम प्राप्त नहीं कर सकती थीं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)
अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर मुख्य रूप से अपने वचन बोलने आया है। वह पवित्रात्मा के दृष्टिकोण से, मनुष्य के दृष्टिकोण से, और तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से बोलता है; वह एक समयावधि के लिए एक तरीके का प्रयोग करते हुए, भिन्न-भिन्न तरीकों से बोलता है, और वह बोलने के इन तरीकों का उपयोग मनुष्य की धारणाओं को बदलने और मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर की छवि हटाने के लिए करता है। यही परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला मुख्य कार्य है। चूँकि मनुष्य मानता है कि जब परमेश्वर आएगा, तो वह बीमारों को चंगा करेगा, दुष्टात्माओं को निकालेगा, चमत्कार दिखाएगा और मनुष्य को भौतिक आशीष प्रदान करेगा, इसलिए परमेश्वर कार्य का—ताड़ना और न्याय के कार्य का—यह चरण पूरा करता है, ताकि मनुष्य की धारणाओं में मौजूद ऐसी बातों को निकाल सके, मनुष्य को परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता को जानने दे सके, मनुष्य के दिल से यीशु की मौजूदा छवि को हटाया जा सके और उसके स्थान पर परमेश्वर की नई छवि स्थापित की जा सके। एक बार जब मनुष्यों के दिलों में मौजूद परमेश्वर की छवि पुरानी पड़ जाती है, तब वह एक मूर्ति बन जाती है। जब यीशु आया और उसने कार्य का वह चरण पूरा किया, तब वह परमेश्वर की संपूर्णता का प्रतिनिधित्व नहीं करता था। उसने कुछ चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित किए, कुछ वचन बोले, और अंततः सलीब पर चढ़ा दिया गया। उसने परमेश्वर के एक भाग का प्रतिनिधित्व किया। वह परमेश्वर के समग्र रूप का प्रतिनिधित्व नहीं कर सका, बल्कि उसने परमेश्वर के कार्य के एक भाग को करने में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर बहुत महान, बहुत अद्भुत और अथाह है, और वह प्रत्येक युग में अपने कार्य का बस एक भाग ही करता है। इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के लिए जीवन के वचनों का पोषण देना; मनुष्य के प्रकृति सार और भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करना; और उसकी धर्म संबंधी धारणाओं, सामंती सोच, पुरानी पड़ चुकी सोच और ज्ञान और संस्कृति को मिटाना है। ये सभी चीजें परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर किए जाने के माध्यम से शुद्ध की जानी चाहिए। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों का नहीं, वचनों का उपयोग करता है। वह मनुष्य को प्रकट करने, उसका न्याय करने, उसे ताड़ना देने और उसे पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और मनोहरता देखने लगे, और परमेश्वर के स्वभाव को समझने लगे, और ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर के कर्मों को निहारे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान
अंत के दिनों में परमेश्वर वचन का उपयोग मुख्यतः मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करता है। वह मनुष्य को जबरन आश्वस्त करने के लिए चिह्नों और चमत्कारों का उपयोग नहीं करता; यह परमेश्वर के महान सामर्थ्य को प्रकट नहीं कर सकता। यदि परमेश्वर केवल चिह्न और चमत्कार दिखाता तो इससे परमेश्वर की व्यावहारिकता प्रकट न होती और इससे मनुष्य पूर्ण न बनाया जा सकता। परमेश्वर संकेतों और चमत्कारों से मनुष्य को पूर्ण नहीं बनाता, अपितु उसे सींचने और उसकी चरवाही करने के लिए वचन का उपयोग करता है, जिसके बाद मनुष्य परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पण कर सकता है और परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यही उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य और बोले जाने वाले वचनों का उद्देश्य है। परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए संकेत एवं चमत्कार दिखाने की विधि का उपयोग नहीं करता—वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों और कार्य की कई विधियों का उपयोग करता है। चाहे वह शोधन, काट-छाँट या वचनों का पोषण हो, मनुष्य को पूर्ण बनाने और उसे परमेश्वर के कार्य, उसकी बुद्धि और चमत्कारिकता का अधिक ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम बनाने के लिए परमेश्वर कई भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन से सब कुछ पूरा हो जाता है
अंत के दिनों में जब परमेश्वर देहधारी होता है, तब वह मुख्य रूप से सब कुछ संपन्न करने और सब कुछ प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है। केवल उसके वचनों में ही तुम उसका स्वरूप देख सकते हो; केवल उसके वचनों में ही तुम देख सकते हो कि वह स्वयं परमेश्वर है। जब देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, वह वचन बोलने के अलावा कोई अन्य कार्य नहीं करता—इसलिए तथ्यों की कोई आवश्यकता नहीं है; सिर्फ वचन ही काफी हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह मुख्य रूप से इसी कार्य को करने के लिए आया है, ताकि मनुष्य को अपने वचनों में अपनी महान सामर्थ्य और सर्वोच्चता देखने दे, ताकि मनुष्य को अपने वचनों में अपनी दीनता और अदृश्यता देखने दे, और मनुष्य को अपने वचनों में अपनी समग्रता जानने दे। जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, सब उसके वचनों में निहित है। उसकी बुद्धि और चमत्कारिकता उसके वचनों में है। इसमें तुम वे कई तरीके देख सकते हो, जिनसे परमेश्वर अपने वचन बोलता है। परमेश्वर ने इतने लंबे समय तक काम किया है और अधिकांशतः वह मनुष्य को पोषण प्रदान करता रहा है, उसे उजागर करता रहा है या उसकी काट-छाँट करता रहा है। वह मनुष्य को यूँ ही शाप नहीं देता और जब वह शाप देता भी है, तो वचन के द्वारा उसे शाप देता है। इसलिए, परमेश्वर के देहधारी होने के इस युग में, परमेश्वर को पुनः बीमारों की चंगाई करते और दुष्टात्माओं को निकालते हुए देखने की अपेक्षा मत करो और लगातार चिह्न खोजना बंद कर दो—वे किसी काम के नहीं हैं! वे संकेत मनुष्य को पूर्ण नहीं बना सकते! स्पष्ट रूप से कहूँ तो : आज देहधारी व्यावहारिक स्वयं परमेश्वर कुछ करता नहीं, केवल बोलता है। यही सत्य है! वह तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है और तुम्हें पोषित करने और सींचने के लिए वचनों का उपयोग करता है। वह कार्य करने के लिए भी वचनों का उपयोग करता है, और तथ्यों का स्थान लेने और तुम्हें अपनी व्यावहारिकता का ज्ञान कराने के लिए वचनों का उपयोग करता है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के इस तरीके को स्पष्ट रूप से देख लो, तो तुम्हारे नकारात्मक होने की संभावना नहीं रहेगी। नकारात्मक बातों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय तुम्हें केवल उन बातों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो सकारात्मक हैं—अर्थात्, इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर के वचन पूरे होते हैं या नहीं, या तथ्यों का आगमन होता है या नहीं, परमेश्वर अपने वचनों से मनुष्य को जीवन प्राप्त करवाता है, और यह सभी संकेतों में से महानतम संकेत है; और इतना ही नहीं, यह एक अविवादित तथ्य है। यह सर्वोत्तम प्रमाण है जिसके माध्यम से परमेश्वर को जानना है, और यह संकेतों से भी बड़ा संकेत है। केवल ये वचन ही मनुष्य को पूर्ण बना सकते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन से सब कुछ पूरा हो जाता है
यद्यपि मेरे वचन कठोर हैं, किंतु वे सब मनुष्य के लिए उद्धार हैं, क्योंकि मैं केवल वचन बोल रहा हूँ, मनुष्य की देह को दंडित नहीं कर रहा हूँ। इन वचनों के कारण मनुष्य प्रकाश में रह पाता है, यह जान पाता है कि प्रकाश मौजूद है, यह जान पाता है कि प्रकाश अनमोल है, और, इससे भी बढ़कर, यह जान पाता है कि ये वचन उसके लिए कितने फायदेमंद हैं, साथ ही यह भी जान पाता है कि परमेश्वर उद्धार है। यद्यपि मैंने ताड़ना और न्याय के बहुत-से वचन कहे हैं, लेकिन कुछ भी वास्तव में तुम लोगों पर नहीं आया है। मैं विशेष रूप से अपना काम करने और अपने वचन बोलने के लिए आया हूँ, और भले ही मेरे वचन कड़े हैं, लेकिन वे तुम लोगों की भ्रष्टता और विद्रोहशीलता का न्याय करने के लिए बोले जाते हैं। मेरे ऐसा करने का उद्देश्य मनुष्य को शैतान की सत्ता से बचाना है। मेरा उद्देश्य अपने वचनों का उपयोग कर मनुष्य को बचाना है; यह अपने वचनों से मनुष्य को नुकसान पहुँचाना नहीं है। मेरे वचन कठोर इसलिए हैं, ताकि मेरे कार्य में परिणाम प्राप्त हो सकें। केवल ऐसे कार्य से ही मनुष्य खुद को जान सकता है और अपने विद्रोही स्वभाव से दूर हो सकता है। वचनों के कार्य की सबसे बड़ी सार्थकता यह है कि यह लोगों को सत्य को समझ लेने के बाद उसे अभ्यास में लाने और उसके द्वारा अपने स्वभाव में बदलाव लाने और अपना और परमेश्वर के कार्य का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। वचन बोलकर कार्य करने से ही परमेश्वर और मनुष्य के बीच के रिश्ते का पुल बन सकता है, केवल वचन ही सत्य की व्याख्या कर सकते हैं। इस तरह से काम करना मनुष्य को जीतने का सबसे अच्छा साधन है; वचनों को बोलने के अलावा कोई अन्य तरीका लोगों को सत्य और परमेश्वर के कार्य को अधिक स्पष्टता के साथ समझने में सक्षम नहीं बना सकता। इसलिए, अपने कार्य के अंतिम चरण में परमेश्वर उन सभी सत्यों और रहस्यों को खोलने के लिए मनुष्य से बोलने के तरीके का इस्तेमाल करता है, जिन्हें वह नहीं समझता, ताकि वह परमेश्वर से सच्चा मार्ग और जीवन प्राप्त कर सके और ऐसा करके उसके इरादे पूरे कर सके।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें रुतबे के आशीष को परे रखना चाहिए और मनुष्य का उद्धार लाने का परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए
इस युग में, और तुम लोगों के बीच परमेश्वर इस तथ्य को पूरा करेगा : कि प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के वचन को जिएगा, सत्य को अभ्यास में लाएगा और अपने दिल से परमेश्वर से प्रेम करेगा; कि सभी लोग परमेश्वर के वचनों को अपनी नींव के रूप में और अपनी वास्तविकता के रूप में इस्तेमाल करेंगे और उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होगा; और परमेश्वर के वचन का अभ्यास करके मनुष्य परमेश्वर के साथ राज करेगा। यही कार्य परमेश्वर को पूरा करना है। क्या तुम परमेश्वर के वचन को पढ़े बिना रह सकते हो? आज, ऐसे बहुत से लोग हैं जो महसूस करते हैं कि वे एक-दो दिन भी परमेश्वर के वचन को बिना पढ़े नहीं रह सकते। उन्हें परमेश्वर का वचन प्रतिदिन पढ़ना आवश्यक है, और यदि समय न मिले तो वचन को सुनना काफी है। यही अहसास पवित्र आत्मा मनुष्य को प्रदान करता है, और इसी प्रकार वह मनुष्य को प्रेरित करना शुरू करता है। अर्थात वह वचनों के द्वारा मनुष्य को नियंत्रित करता है ताकि वे परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश कर सकें। यदि परमेश्वर के वचन को केवल एक दिन भी बिना खाए-पिए तुम्हें अंधकार और प्यास का अनुभव हो, तुम्हें यह असह्य लगता हो, तब ये बातें दर्शाती हैं कि पवित्र आत्मा तुम्हें प्रेरित कर रहा है और वह तुमसे विमुख नहीं हुआ है। तब तुम इस धारा में हो। किंतु यदि परमेश्वर के वचन को खाए-पिए बिना एक या दो दिन के बाद, तुम्हें कोई अंतर महसूस न हो या तुम्हें प्यास महसूस न हो, तुम थोड़ा भी प्रेरित महसूस न करो तो यह दर्शाता है कि पवित्र आत्मा तुमसे विमुख हो चुका है। इसका अर्थ है कि तुम्हारी भीतरी दशा सही नहीं है; तुमने वचन के युग में प्रवेश नहीं किया है और तुम उन लोगों में से हो जो पीछे छूट गए हैं। परमेश्वर लोगों को नियंत्रित करने के लिए वचनों का उपयोग करता है; जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो तो तुम्हें अच्छा महसूस होता है, और जब तुम इन वचनों को नहीं खाते-पीते हो, तब तुम्हारे पास अनुसरण का कोई मार्ग नहीं होता है। परमेश्वर का वचन मनुष्यों का भोजन और उन्हें संचालित करने वाली शक्ति बन जाता है। बाइबल में लिखा है, “मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा” (मत्ती 4:4)। यही वह कार्य है जो परमेश्वर आज संपन्न करेगा। वह इस तथ्य को तुम लोगों में पूरा करेगा। ऐसा कैसे होता था कि पहले लोग परमेश्वर का वचन बिना पढ़े बहुत दिन रहते थे, पर खाते-पीते और काम करते थे? अब ऐसा क्यों नहीं होता? इस युग में परमेश्वर सभी चीजों को नियंत्रित करने के लिए मुख्य रूप से वचनों का उपयोग करता है। परमेश्वर के वचन के द्वारा मनुष्य का न्याय किया जाता है और उन्हें पूर्ण बनाया जाता है और अंत में इन वचनों के द्वारा राज्य में ले जाया जाता है। केवल परमेश्वर का वचन मनुष्य को जीवन दे सकता है, केवल परमेश्वर का वचन ही मनुष्य को ज्योति और अभ्यास का मार्ग दे सकता है, विशेषकर राज्य के युग में। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता से नहीं भटकते, हर दिन उसके वचनों को खाते-पीते हो, तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है