2. परमेश्वर के विजय के कार्य का महत्व
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
मनुष्यजाति, जो शैतान के द्वारा अत्यधिक भ्रष्ट कर दी गई है, नहीं जानती कि एक परमेश्वर भी है और इसने परमेश्वर की आराधना करनी बंद कर दी है। आरम्भ में, जब आदम और हव्वा को रचा गया था, तो यहोवा की महिमा और गवाही सर्वदा उपस्थित थी। परन्तु भ्रष्ट होने के पश्चात, मनुष्य ने उस महिमा और गवाही को खो दिया, क्योंकि हर किसी ने परमेश्वर से विद्रोह कर उसका भय मानना पूर्णतया बन्द कर दिया। आज की विजय का कार्य उस सम्पूर्ण गवाही और उस सम्पूर्ण महिमा को पुनः प्राप्त करने और सभी लोगों से परमेश्वर की आराधना करवाने के लिए है, ताकि सृजित प्राणियों के बीच गवाही हो; कार्य के इस चरण के दौरान यही किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्यजाति किस प्रकार जीती जानी है? मनुष्य को सम्पूर्ण रीति से कायल करने के लिए इस चरण के वचनों के कार्य का प्रयोग करके; उसे पूरी तरह यकीन दिलाने के लिए प्रकाशन, न्याय, ताड़ना और निर्मम शाप का प्रयोग करके; मनुष्य के विद्रोहीपन को उजागर करके और उसके विरोध का न्याय करके, ताकि वह मानवजाति की अधार्मिकता और मलिनता को जान सके और इस तरह इनका प्रयोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की विषमता के रूप में कर सके। मुख्यतः, मनुष्य को इन्हीं वचनों से जीता और पूर्णतः कायल किया जाता है। वचन मनुष्यजाति पर अंतिम रूप से विजय करने के साधन हैं और वे सभी जो परमेश्वर की विजय को स्वीकार करते हैं, उन्हें उसके वचनों के प्रहार और न्याय को भी स्वीकार करना चाहिए। बोलने की वर्तमान प्रक्रिया, जीतने की ही प्रक्रिया है। और लोगों को किस प्रकार सहयोग देना चाहिए? यह जानकर कि इन वचनों को कैसे खाना-पीना है और उनकी समझ हासिल करके। जहाँ तक यह बात है कि लोगों पर विजय कैसे पाई जाती है, इसे इंसान खुद नहीं कर सकता। तुम सिर्फ इतना कर सकते हो कि इन वचनों को खाने और पीने के द्वारा, अपनी भ्रष्टता और अशुद्धता, अपने विद्रोहीपन और अपनी अधार्मिकता को जानकर, परमेश्वर के समक्ष दण्डवत हो सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के इरादों को समझने के बाद अभ्यास कर लेते हो और अगर तुम्हारे पास दर्शन हों, और इन वचनों के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो सकते हो, और अपने मन से कोई चुनाव नहीं करते हो, तब तुम जीत लिए जाओगे और यह उन वचनों का नतीजा रहा होगा। मनुष्यजाति ने साक्ष्य क्यों खो दिया? क्योंकि किसी की भी परमेश्वर में आस्था नहीं है, क्योंकि लोगों के हृदयों में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है। मनुष्यजाति की विजय लोगों की आस्था की बहाली है। लोग हमेशा अंधाधुंध लौकिक संसार की ओर भागना चाहते हैं, वे अनेक आशाएँ रखते हैं, अपने भविष्य के लिए बहुत अधिक चाहते हैं और उनकी अनेक अनावश्यक मांगें हैं। वे हमेशा अपने शरीर के विषय में सोचते, शरीर के लिए योजनाएं बनाते रहते हैं, उनकी रुचि कभी भी परमेश्वर में विश्वास रखने के मार्ग की खोज में नहीं होती। उनके हृदय को शैतान ने छीन लिया है, उन्होंने परमेश्वर का भय मानने वाला अपना दिल खो दिया है और उनका हृदय शैतान पर ही केंद्रित रहता है। परन्तु मनुष्य की सृष्टि परमेश्वर द्वारा की गई थी। इसलिए मनुष्य वह गवाही खो चुका है; यानी वह परमेश्वर की महिमा को खो चुका है। मनुष्य को जीतने का उद्देश्य परमेश्वर के लिए मनुष्य के भय की महिमा को पुनः प्राप्त करना है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)
आज के विजय के कार्य का अभिप्राय यह खुलासा करना है कि मनुष्य का परिणाम क्या होगा। ऐसा क्यों कहा जाता है कि आज की ताड़ना और न्याय, अंत के दिनों के महान श्वेत सिंहासन के सामने का न्याय है? क्या तुम यह नहीं देखते हो? विजय का कार्य अन्तिम चरण क्यों है? क्या यह इस बात का खुलासा करने के लिए नहीं है कि मनुष्य के प्रत्येक वर्ग का परिणाम कैसा होगा? क्या यह प्रत्येक व्यक्ति को ताड़ना और न्याय के विजय कार्य के दौरान उसका असली स्वरूप दिखाने और फिर उसके प्रकार के अनुसार छाँटने के लिए नहीं है? यह कहने के बजाय कि यह मनुष्यजाति को जीतना है, यह कहना बेहतर होगा कि यह इस बात खुलासा करना है कि व्यक्ति के प्रत्येक वर्ग का परिणाम किस प्रकार का होगा। यह लोगों के पापों का न्याय करने और फिर लोगों के विभिन्न वर्गों को उजागर करने और इस प्रकार यह निर्णय करने के बारे में है कि वे दुष्ट हैं या धार्मिक। विजय-कार्य के पश्चात अच्छे को पुरस्कृत करने और बुरे को दंड देने का कार्य आता है। जो लोग पूर्णतः समर्पण करते हैं अर्थात जो पूर्ण रूप से विजय कर लिए गए हैं, उन्हें सम्पूर्ण कायनात में परमेश्वर के कार्य को फैलाने के अगले चरण में रखा जाएगा; जिन्हें विजय नहीं किया गया उनको अंधकार में रखा जाएगा और उन पर महाविपत्ति आएगी। इस प्रकार लोगों को अपनी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा, बुरों को बुरों की जमात में रखा जाएगा और उन्हें फिर कभी सूर्य का प्रकाश नसीब नहीं होगा और धार्मिकों को रोशनी प्राप्त करने और सर्वदा रोशनी में रहने के लिए अच्छे लोगों के साथ रखा जाएगा। सभी चीजों के परिणाम निकट हैं और लोगों के परिणाम साफ तौर पर उनकी आँखों के सामने दिखा दिए गए हैं। सभी चीजों को उनकी अपनी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा, तो फिर लोग प्रत्येक व्यक्ति को उसकी अपनी किस्म के अनुसार छाँटे जाने की पीड़ा से किस प्रकार बच सकते हैं? जब सभी चीजों के परिणाम निकट होते हैं, तब प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति के परिणामों का खुलासा किया जाता है और यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड (इसमें समस्त विजय-कार्य सम्मिलित है, जो वर्तमान कार्य से आरम्भ होता है) के विजय-कार्य के दौरान किया जाता है। सभी लोगों के परिणामों का खुलासा, न्याय के सिंहासन के सामने, ताड़ना के दौरान और अंत के दिनों के विजय-कार्य के दौरान किया जाता है। ... अन्तिम चरण की विजय पाने का उद्देश्य लोगों को बचाना और साथ ही उनके परिणामों को प्रकट करना है। यह न्याय के द्वारा लोगों की पतित अवस्था को उजागर करना है और इस प्रकार उनसे पश्चात्ताप करवाना, उन्हें उठ खड़े होने के लिए प्रेरित करना और जीवन और जीवन के सही मार्ग का अनुसरण करवाना है। यह सुन्न और मन्दबुद्धि लोगों के हृदयों को जगाना और न्याय के द्वारा मनुष्य की भीतरी विद्रोहशीलता को प्रकट करना है। परंतु यदि लोग अभी भी पश्चात्ताप करने में असमर्थ हैं, अभी भी मानव जीवन में सही मार्ग का अनुसरण करने में असमर्थ हैं और अभी भी अपनी इन भ्रष्टताओं को उतार फेंकने में असमर्थ हैं, तो वे शैतान द्वारा निगल लिए जाने की वस्तुएँ बन जाएँगे, जो कि उद्धार से परे हैं। विजय-कार्य की महत्ता ऐसी है : लोगों को बचाना और साथ ही उनके परिणाम भी प्रकट करना। अच्छे परिणाम, बुरे परिणाम—वे सभी विजय-कार्य के द्वारा प्रकट किए जाते हैं। लोग बचाए जाएँगे या शापित होंगे, यह सब विजय-कार्य के दौरान प्रकट किया जाता है।
अंत के दिन वे हैं जब सभी वस्तुएँ विजय के जरिए अपनी किस्म के अनुसार छाँटी जाएँगी। विजय, अंत के दिनों का कार्य है; दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति के पापों का न्याय करना, अंत के दिनों का कार्य है। अन्यथा, लोगों की छँटाई उनकी किस्म के अनुसार कैसे की जा सकेगी? तुम लोगों के बीच किस्म के अनुसार की जाने वाली छँटाई का कार्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ऐसे कार्य का आरंभ है। इसके पश्चात सभी देशों के लोगों और तमाम लोगों को भी विजय-कार्य को स्वीकार करना होगा। इसका अर्थ यह है कि सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति की अपनी किस्म के अनुसार छँटाई होगी और उसे न्याय के लिए न्याय के सिंहासन के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा। कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु इस ताड़ना और न्याय को सहने से बच नहीं सकती और न ही कोई व्यक्ति और वस्तु ऐसी है जिसकी किस्म के अनुसार छँटाई नहीं की जाती; प्रत्येक व्यक्ति की छँटाई की जाएगी, क्योंकि सभी चीजों के परिणाम निकट आ रहे हैं और समस्त स्वर्ग और पृथ्वी अपने अंत तक पहुँच गए हैं। मनुष्य उस दिन से कैसे बचेगा जिस दिन मानवीय अस्तित्व का अंत होगा?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)
विजय के कार्य का अभीष्ट प्रभाव मुख्य रूप से यह है कि मनुष्य की देह अब विद्रोह न करे; अर्थात मनुष्य का मस्तिष्क परमेश्वर की नई समझ हासिल करे, उसका दिल पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पण करे और मनुष्य ऐसे संकल्प ले जो परमेश्वर की खातिर हों। जब लोगों के व्यक्तित्व या देह में बदलाव होता है तो उन्हें जीत लिया गया नहीं माना जाता है; जब उनकी मानसिकता, उनकी चेतना और उनके विवेक में बदलाव होता है, यानी जब उनके पूरे मानसिक दृष्टिकोण में बदलाव होता है तो तभी वे परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाते हैं। जब तुममें समर्पण करने का संकल्प होता है, जब तुम नई मानसिकता अपना लेते हो, जब तुममें परमेश्वर के वचनों और कार्य के विषय में कोई धारणा नहीं रह जाती है, न ही इन चीजों को लेकर कोई इरादा होता है और तुम्हारे मस्तिष्क में सामान्य रूप से सोचने की क्षमता होती है—यानी, जब तुम खुद को पूरे दिल से परमेश्वर के लिए खपा सकते हो—तब तुम उस प्रकार के व्यक्ति होते हो जिस पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त की जा चुकी होती है। धर्म के दायरे में बहुत-से लोग जीवनभर बहुत अधिक पीड़ा सहते हैं : वे अपनी देह को अधीन रखते हैं और अपने क्रूस उठाए चलते हैं, यहाँ तक कि वे मृत्यु की ऐन कगार पर पीड़ा भोगना और सहना जारी रखते हैं! कुछ लोग अपनी मृत्यु की सुबह भी उपवास रखते हैं। वे जीवन-भर स्वयं को अच्छे भोजन और अच्छे कपड़ों से दूर रखते हैं और केवल पीड़ा सहने पर ही ज़ोर देते हैं। वे अपनी देह को अधीन रखने और अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने में सक्षम होते हैं। पीड़ा सहन करने का उनका जोश सराहनीय है। लेकिन उनकी मानसिकता, उनकी धारणाओं, उनके मानसिक दृष्टिकोण और उनकी पुरानी प्रकृति की लेशमात्र भी काट-छाँट नहीं की गई है। उनकी स्वयं के बारे में कोई सच्ची समझ नहीं होती। परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि एक अज्ञात परमेश्वर की पारंपरिक छवि होती है। परमेश्वर के लिए पीड़ा सहने का उनका संकल्प, उनके उत्साह और उनकी मानवता के अच्छे व्यक्तित्व से आता है। भले ही वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वे न तो परमेश्वर को समझते हैं और न उसके इरादों को जानते हैं। वे केवल अंधों की तरह परमेश्वर के लिए कार्य करते और पीड़ा सहते हैं। वे विवेकशीलता को बिल्कुल महत्व नहीं देते और उन्हें इसकी भी बहुत परवाह नहीं होती कि वे यह कैसे सुनिश्चित करें कि उनकी सेवा वास्तव में परमेश्वर के इरादों को पूरा करे। उन्हें इसका ज्ञान तो बिल्कुल ही नहीं होता कि परमेश्वर के विषय में समझ कैसे हासिल करें। वे जिस परमेश्वर की सेवा करते हैं वह परमेश्वर अपनी मूल छवि में नहीं है, बल्कि वह उनकी कल्पनाओं का परमेश्वर होता है, एक ऐसा परमेश्वर जिसके बारे में उन्होंने बस सुना है या जिसके बारे में लेखों में बस किंवदंतियाँ पढ़ी हैं। फिर वे अपनी उर्वर कल्पनाओं और धर्मनिष्ठता का उपयोग परमेश्वर की खातिर पीड़ा सहने के लिए करते हैं और परमेश्वर के लिए उस कार्य का दायित्व स्वयं ले लेते हैं जो परमेश्वर करना चाहता है। उनकी सेवा बहुत ही अनिश्चित होती है, ऐसी कि उनमें से कोई भी परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने के पूरी तरह योग्य नहीं होता। चाहे वे स्वेच्छा से जितनी भी पीड़ा सहते हों, सेवा को लेकर उनका मूल परिप्रेक्ष्य और परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि अपरिवर्तित रहती है, क्योंकि वे परमेश्वर के न्याय, उसकी ताड़ना, उसके शोधन और उसकी पूर्णता से नहीं गुजरे हैं, न ही किसी ने सत्य द्वारा उनका मार्गदर्शन किया है। यूँ तो वे उद्धारकर्ता यीशु पर विश्वास करते हैं, लेकिन उनमें से किसी ने कभी उद्धारकर्ता को देखा नहीं होता हैं। वे केवल किंवदंती और सुनी-सुनाई बात के माध्यम से ही उसके बारे में जानते हैं। इसलिए उनकी सेवा आँख बंद करके बेतरतीब ढंग से की जाने वाली सेवा से अधिक कुछ नहीं है, जैसे एक नेत्रहीन आदमी अपने पिता की सेवा कर रहा हो। इस प्रकार की सेवा के माध्यम से आखिरकार क्या हासिल किया जा सकता है? और इसे स्वीकृति कौन देगा? शुरुआत से लेकर अंत तक, उनकी सेवा कभी भी बदलती नहीं। वे केवल मानव-निर्मित पाठ प्राप्त करते हैं और अपनी सेवा को केवल अपनी स्वाभाविकता और ख़ुद की पसंद पर आधारित रखते हैं। इससे क्या इनाम प्राप्त हो सकता है? यहाँ तक कि यीशु को देखने वाला पतरस भी नहीं जानता था कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा कैसे करनी है; अंत में, वृद्धावस्था में पहुंचने के बाद ही वह इसे समझ पाया। यह उन नेत्रहीन लोगों के बारे में क्या कहता है जिन्होंने किसी भी तरह की काट-छाँट का ज़रा-भी अनुभव नहीं किया और जिनका किसी ने मार्गदर्शन नहीं किया? क्या आजकल तुम लोगों में से अधिकांश की सेवा उन नेत्रहीन लोगों की तरह ही नहीं है? जिन लोगों का न्याय नहीं हुआ है, जिनकी काट-छाँट नहीं हुई है, जो नहीं बदले हैं—क्या वे सब वो नहीं हैं जो पूरी तरह जीते नहीं गए हैं? ऐसे लोगों का क्या उपयोग? यदि तुम्हारी मानसिकता, जीवनभर के तुम्हारे ज्ञान और परमेश्वर को लेकर तुम्हारे ज्ञान में कोई नया परिवर्तन नहीं दिखता है और तुम वास्तव में कुछ भी हासिल नहीं करते हो, तो तुम अपनी सेवा में कभी कोई नतीजा प्राप्त नहीं करोगे! परमेश्वर के कार्य की एक नई समझ और दर्शन के बिना तुम जीते नहीं जाते हो। तब तुम्हारा परमेश्वर का अनुसरण उन्हीं लोगों की तरह होगा जो पीड़ा सहते हैं और उपवास रखते हैं : इसका कोई मूल्य नहीं होता! वे जो करते हैं उसमें कोई गवाही नहीं होती, इसीलिए मैं कहता हूँ कि उनकी सेवा व्यर्थ होती है! वे लोग जीवनभर पीड़ा सहते हैं और बंदीगृह में समय बिताते हैं, वे हर पल सहनशील, दयालु होते हैं, हमेशा अपने क्रूस उठाए चलते हैं और वे दुनिया द्वारा बदनाम किए और ठुकराए जाते हैं—वे हर कठिनाई का अनुभव करते हैं। यूँ तो वे अंत तक आज्ञाकारी रहते हैं, लेकिन फिर भी उन पर विजय प्राप्त नहीं की जाती और वे विजय प्राप्ति की कोई भी गवाही पेश नहीं कर पाते। वे बहुत अधिक कष्ट भोग चुके होते हैं, लेकिन अपने भीतर वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते हैं। उनकी पुरानी सोच, पुरानी धारणाओं, धार्मिक प्रथाओं, मानव-निर्मित ज्ञान और मानवीय सोच में से किसी की भी काट-छाँट नहीं हुई होती है। उनमें कोई नई समझ नहीं होती है। परमेश्वर के बारे में उनकी लेशमात्र समझ भी सच या सटीक नहीं होती है। उन्होंने परमेश्वर के इरादों को गलत समझ लिया होता है। क्या इससे परमेश्वर की सेवा होती है? परमेश्वर के बारे में अतीत में तुम्हारी समझ चाहे जो भी रही हो, अगर यह आज भी पहले जैसी ही रहती है और परमेश्वर चाहे जो भी करे तुम परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान को अपनी धारणाओं और सोच पर आधारित रखना जारी रखते हो, अर्थात्, अगर तुम्हारे पास परमेश्वर का कोई नया, सच्चा ज्ञान नहीं होता है और तुम परमेश्वर की अंतर्निहित छवि और स्वभाव को जानने में विफल रहते हो, यदि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ अभी भी सामंती, अंधविश्वासी सोच पर आधारित है और यह अब भी मानवीय कल्पनाएँ और धारणाएँ है, तो तुम पर विजय प्राप्त नहीं की गई है। मैं अब तुमसे जो बहुत-से वचन कहता हूँ उन सबका यह उद्देश्य है कि तुम जान सको और यह ज्ञान तुम्हें नवीनतर, सटीक ज्ञान की ओर ले जाए; इनका उद्देश्य तुम्हारी पुरानी धारणाओं और पुराने ज्ञान को काट-छाँट कर दूर करना भी है, ताकि तुम नया ज्ञान ले सको। अगर तुम सच में मेरे वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हारे ज्ञान में काफी बदलाव आएगा। यदि तुम एक समर्पित हृदय के साथ परमेश्वर के वचनों को खाओगे-पिओगे, तो तुम्हारा परिप्रेक्ष्य बदल जाएगा। यदि तुम बार-बार ताड़ना को स्वीकार कर पाओ, तो तुम्हारी पुरानी मानसिकता धीरे-धीरे बदल जाएगी। यदि तुम्हारी पुरानी मानसिकता पूरी तरह से नई बन जाए, तो तुम्हारा अभ्यास भी तदनुसार बदलेगा। इस तरह तुम्हारी सेवा अधिकाधिक सटीक होती जाएगी, परमेश्वर के इरादों को अधिकाधिक पूरा कर पाएगी। यदि तुम अपना जीवन, मानव जीवन की अपनी समझ और परमेश्वर के बारे में अपनी अनेक धारणाओं को बदल सको, तो तुम्हारी स्वाभाविकता धीरे-धीरे कम होती जाएगी। यह और इससे कम कुछ भी नहीं, वह प्रभाव है जब परमेश्वर लोगों पर विजय प्राप्त करता है, यह वह बदलाव है जो लोगों में घटित होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (3)
यहोवा का कार्य दुनिया का सृजन था, वह आरंभ था; कार्य का यह चरण कार्य का अंत है, और यह समापन है। आरंभ में, परमेश्वर का कार्य इस्राएल के चुने हुए लोगों के बीच किया गया था और यह सभी जगहों में से सबसे पवित्र जगह पर एक अभूतपूर्व कार्य था। कार्य का अंतिम चरण दुनिया का न्याय करने और युग को समाप्त करने के लिए सभी देशों में से सबसे गंदे देश में किया जा रहा है। पहले चरण में, परमेश्वर का कार्य सबसे प्रकाशमान स्थान पर किया गया था और अंतिम चरण सबसे अंधकारमय स्थान पर किया जाता है, और यह अंधकार भगा दिया जाएगा, रोशनी लाई जाएगी और सब लोगों पर विजय प्राप्त की जाएगी। जब इस सबसे गंदे और सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी और समस्त आबादी स्वीकार कर लेगी कि परमेश्वर होता है, जो कि सच्चा परमेश्वर है, और हर व्यक्ति पूरी तरह से कायल हो जाएगा, तब समस्त ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त करने का कार्य कार्यान्वित करने के लिए इस तथ्य का उपयोग किया जाएगा। कार्य का यह चरण प्रातिनिधिक है : एक बार इस युग का कार्य समाप्त हो गया, तो छह हजार वर्षों का प्रबंधन कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। जब सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों को जीत लिया जाएगा, तो कहने की जरूरत नहीं है कि बाकी सब जगह भी ऐसा ही होगा। इस तरह, केवल चीन में विजय का कार्य ही प्रातिनिधिक महत्व रखता है। चीन अंधकार की सभी शक्तियों का मूर्त रूप है और चीन के लोग उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो देह के हैं, शैतान के हैं, दैहिक हैं। चीनी लोग ही बड़े लाल अजगर द्वारा सबसे ज्यादा भ्रष्ट किए गए हैं, वही परमेश्वर के सबसे कट्टर विरोधी हैं, उन्हीं की मानवता सबसे अधम और सबसे गंदी है, इसलिए वे समस्त भ्रष्ट मानवता के आद्यरूप हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अन्य देशों में कोई समस्या नहीं है; मनुष्य की धारणाएँ समान हैं, यद्यपि इन देशों के लोग अच्छी काबिलियत वाले हो सकते हैं, किन्तु यदि वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो अवश्य ही वे उसका विरोध करते होंगे। यहूदियों ने भी परमेश्वर का विरोध और उससे विद्रोह क्यों किया? फरीसियों ने भी उसका विरोध क्यों किया? यहूदा ने यीशु के साथ विश्वासघात क्यों किया? उस समय, बहुत-से अनुयायी यीशु को नहीं जानते थे। यीशु को सूली पर चढ़ाये जाने और उसके फिर से जी उठने के बाद भी, लोगों ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया? क्या मनुष्य का विद्रोहीपन बिल्कुल समान नहीं है? बात बस इतनी है कि चीन के लोग इसके एक उदाहरण के रूप में पेश किए जाते हैं, जब उन पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी तो वे एक मॉडल और नमूना बन जाएँगे और दूसरों के लिए संदर्भ का काम करेंगे। मैंने हमेशा क्यों कहा है कि तुम लोग मेरी प्रबंधन योजना का केवल एक गौण अंग हो? चीन के लोगों में ही भ्रष्टता, अशुद्धता, अधार्मिकता, विरोध और विद्रोहशीलता सर्वाधिक पूर्णता से व्यक्त होती हैं और अपने विविध रूपों में प्रकट होती हैं। एक लिहाज से, वे खराब काबिलियत के हैं और दूसरे लिहाज से, उनका जीवन और उनकी मानसिकता पिछड़ी हुई है, उनकी आदतें, सामाजिक वातावरण, जिस परिवार में वे जन्मे हैं—सभी दयनीय और सर्वाधिक पिछड़े हैं। उनकी हैसियत भी निम्न है। इस स्थान पर कार्य प्रातिनिधिक है, एक बार जब यह परीक्षा-कार्य पूरी तरह से कार्यान्वित हो जाएगा, तो परमेश्वर का उसके ठीक बाद का कार्य अधिक आसान हो जाएगा। जब कार्य का यह चरण पूरा हो जाएगा, तब अगला कार्य बिल्कुल भी कठिन नहीं होगा। एक बार जब कार्य का यह चरण सम्पन्न हो जाएगा, तो बड़ी सफलता पूरी तरह प्राप्त हो चुकी होगी और समस्त ब्रह्माण्ड में विजय का कार्य पूर्ण अंत तक पहुँच चुका होगा। वास्तव में, एक बार तुम लोगों के बीच कार्य सफल हो जाएगा तो यह समस्त ब्रह्माण्ड में सफलता के बराबर होगा। यही इस बात की महत्ता है कि क्यों मैं तुम लोगों को एक मॉडल और नमूने के रूप में कार्य करने को कहता हूँ। विद्रोहशीलता, विरोध, अशुद्धता, अधार्मिकता—ये सभी इन लोगों में पाए जा सकते हैं और ये मानवजाति की समस्त विद्रोहशीलता का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे वास्तव में कुछ हैं। इस प्रकार, उन्हें विजय के प्रतीक के रूप में लिया जाता है, एक बार जब वे जीत लिए गए तो वे स्वाभाविक रूप से दूसरों के लिए मॉडल और नमूने बन जाएँगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)
मनुष्य भविष्य के परिणाम, अंतिम मंज़िल, और आशा करने के लिए कोई अच्छी चीज है या नहीं, इससे अधिक और किसी चीज की परवाह नहीं करता। यदि विजय के कार्य के दौरान मनुष्य को एक खूबसूरत आशा दे दी जाती, और यदि मनुष्य पर विजय से पहले उसे अनुसरण के लिए उपयुक्त मंज़िल दे दी जाती, तो न केवल मनुष्य पर विजय ने अपना परिणाम प्राप्त न किया होता, बल्कि विजय के कार्य का परिणाम भी प्रभावित हो गया होता। अर्थात्, विजय का कार्य मनुष्य के भाग्य और उसके भविष्य की संभावनाओं को छीनने और मनुष्य के विद्रोही स्वभाव का न्याय और उसकी ताड़ना करने से अपना परिणाम प्राप्त करता है। इसे मनुष्य के साथ सौदा करके, अर्थात् मनुष्य को आशीष और अनुग्रह देकर प्राप्त नहीं किया जाता, बल्कि मनुष्य को उसकी “स्वतंत्रता” से वंचित करके और उसकी भविष्य की संभावनाओं को जड़ से उखाड़कर और इस प्रकार यह देखकर प्राप्त किया जाता है कि वह कितना वफादार है। यह विजय के कार्य का सार है। यदि मनुष्य को बिल्कुल आरंभ में ही एक खूबसूरत आशा दे दी गई होती, और ताड़ना और न्याय का कार्य बाद में किया जाता, तो मनुष्य इस ताड़ना और न्याय को इस आधार पर स्वीकार कर लेता कि उसके पास भविष्य की संभावनाएँ हैं, और अंत में, सृष्टिकर्ता को उसके सभी सृजित प्राणियों से बिना शर्त समर्पण और आराधना प्राप्त नहीं होती; वहाँ केवल अंधा, अज्ञानी समर्पण ही होता, या फिर मनुष्य परमेश्वर से आँख मूँदकर माँगें करता और मनुष्य के हृदय पर पूरी तरह से विजय प्राप्त करना असंभव होता। इसके परिणामस्वरूप, विजय के ऐसे कार्य के लिए मनुष्य को प्राप्त करना असंभव होगा, मनुष्य के लिए परमेश्वर की गवाही देना तो और भी असंभव होगा। ऐसे सृजित प्राणी अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ होते और वे परमेश्वर के साथ केवल मोल-भाव ही करते; यह विजय न होती, बल्कि करुणा और आशीष होते। मनुष्य की सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि वह हमेशा अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के बारे में सोचता है और इन चीजों की पूजा करता है। मनुष्य अपने भाग्य और भविष्य की संभावनाओं के वास्ते परमेश्वर का अनुसरण करता है; वह परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम की वजह से उसकी आराधना नहीं करता। और इसलिए मनुष्य पर विजय में मनुष्य के स्वार्थ, लोभ और जो चीजें उसके द्वारा परमेश्वर की आराधना में सबसे अधिक व्यवधान डालती हैं, उन सभी से निपटा जाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य पर विजय प्राप्त कर ली जाती है। परिणामस्वरूप, मनुष्य पर विजय के पहले चरणों में यह जरूरी है कि पहले मनुष्य की अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं और सबसे घातक कमजोरियों को दूर किया जाए, ताकि मनुष्य का परमेश्वर-प्रेमी हृदय प्रकट किया जाए और मानव-जीवन के बारे में उसके ज्ञान को, परमेश्वर के बारे में उसके दृष्टिकोण को, और उसके अस्तित्व के अर्थ को बदल दिया जाए। इस तरह से, मनुष्य का परमेश्वर-प्रेमी हृदय शुद्ध हो जाता है, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य के हृदय को जीत लिया जाता है। किंतु सभी सृजित प्राणियों के प्रति अपने दृष्टिकोण में परमेश्वर केवल जीतने के वास्ते विजय प्राप्त नहीं करता; बल्कि वह मनुष्य को पाने के लिए, अपनी स्वयं की महिमा के लिए, और मनुष्य की आदिम, मूल सदृशता पुनः हासिल करने के लिए विजय प्राप्त करता है। यदि उसे केवल विजय पाने के वास्ते ही विजय पानी होती, तो विजय के कार्य का महत्व खो गया होता। कहने का तात्पर्य है कि यदि परमेश्वर केवल मनुष्य पर विजय प्राप्त कर लेता और ऐसा करने के बाद मनुष्य से पीछा छुड़ा लेता और उसके जीवन और मृत्यु पर कोई ध्यान नहीं देता, तो यह मानव-जाति का प्रबंधन न होता, न ही यह उसके उद्धार के वास्ते होता। केवल मनुष्य पर विजय पाने के बाद उसे प्राप्त करना और अंततः मानवजाति को एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना ही उद्धार के समस्त कार्य के केंद्र में है, और केवल यही मनुष्य के उद्धार का लक्ष्य प्राप्त करता है। दूसरे शब्दों में, केवल एक अद्भुत मंज़िल पर मनुष्य का आगमन और विश्राम में उसका प्रवेश ही भविष्य की वे संभावनाएँ हैं, जो सभी सृजित प्राणियों के पास होनी चाहिए और वह कार्य है जिसे सृष्टिकर्ता द्वारा किया जाना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना
अंत के दिनों का चरण, जिसमें मनुष्य को जीता जाना है, शैतान के साथ युद्ध में कार्य का अंतिम चरण है, और यह शैतान की सत्ता से मनुष्य के संपूर्ण उद्धार का कार्य भी है। मनुष्य पर विजय का आंतरिक अर्थ मनुष्य पर विजय पाने के बाद शैतान के मूर्त रूप—मनुष्य, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है—का अपने जीते जाने के बाद सृष्टिकर्ता के पास वापस लौटना है, जिसके माध्यम से वह शैतान से विद्रोह कर पूरी तरह से परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा। इस तरह मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। इसलिए, विजय का कार्य शैतान के विरुद्ध युद्ध में अंतिम कार्य है, और यह परमेश्वर के प्रबंधन में अंतिम चरण है जो शैतान को पराजित करने के लिए है। इस कार्य के बिना मनुष्य का संपूर्ण उद्धार अंततः असंभव होगा, शैतान की संपूर्ण पराजय भी असंभव होगी, और मानव-जाति कभी भी अपनी अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करने या शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होगी। इसलिए, शैतान के साथ युद्ध की समाप्ति से पहले मनुष्य के उद्धार का कार्य समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का केंद्रीय भाग मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है। सबसे आरंभ में मानव-जाति परमेश्वर के हाथों में थी, किंतु शैतान के प्रलोभन और भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान द्वारा बाँध लिया गया और वह इस दुष्ट के हाथों में पड़ गया। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रबंधन कार्य में शैतान पराजित किए जाने का लक्ष्य बन गया। चूँकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और चूँकि मनुष्य परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन की पूँजी है, इसलिए यदि मनुष्य को बचाया जाना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस लेना होगा, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को, जिसे शैतान द्वारा बंदी बना लिया गया है, वापस लेना होगा। इस प्रकार, शैतान को मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों और मनुष्य के मूल विवेक को पुनर्स्थापित करने के माध्यम से पराजित किया जाना चाहिए। इस तरह से बंदी बना लिए गए मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस लिया जा सकता है। यदि मनुष्य शैतान के प्रभाव और बंधन से मुक्त हो जाता है, तो शैतान शर्मिंदा हो जाएगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और चूँकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त किया जा चुका है, इसलिए एक बार जब यह युद्ध समाप्त हो जाएगा, तो मनुष्य इस संपूर्ण युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बन जाएगा, और शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दंडित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मानव-जाति के उद्धार का संपूर्ण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना
तुम लोगों पर किया गया विजय का कार्य गहनतम अर्थ रखता है : एक ओर, इस कार्य का उद्देश्य लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाना है, और इसलिए पूर्ण करना है, ताकि वे विजेताओं का एक समूह बन सकें—पूर्ण किए गए लोगों का प्रथम समूह, अर्थात प्रथम फल। दूसरी ओर, यह सृजित प्राणियों को परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेने देना, परमेश्वर के पूर्ण और महानतम उद्धार को प्राप्त करने देना और मनुष्य को न केवल उसकी दया और प्रेमपूर्ण करुणा का, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से ताड़ना और न्याय का आनंद लेने देना है। संसार की सृष्टि से अब तक परमेश्वर ने जो कुछ अपने कार्य में किया है, वह प्रेम ही है, जिसमें मनुष्य के लिए कोई घृणा नहीं है। यहाँ तक कि जो ताड़ना और न्याय तुमने देखे हैं, वे भी प्रेम ही हैं, अधिक सच्चा और अधिक वास्तविक प्रेम, ऐसा प्रेम जो लोगों को मानव-जीवन के सही मार्ग पर ले जाता है। तीसरी ओर, यह शैतान के समक्ष गवाही देना है। और चौथी ओर, यह भविष्य के सुसमाचार के कार्य को फैलाने की नींव रखना है। जो समस्त कार्य वह कर चुका है, उसका उद्देश्य लोगों को मानव-जीवन के सही मार्ग पर ले जाना है, ताकि वे सामान्य मानवीय जीवन जी सकें, क्योंकि लोग नहीं जानते कि कैसे जीएँ, और बिना मार्गदर्शन के तुम केवल एक खोखला जीवन जियोगे; तुम्हारा जीवन मूल्यहीन और निरर्थक होगा, और तुम एक सामान्य व्यक्ति बनने में बिल्कुल असमर्थ रहोगे। यह मनुष्य को जीते जाने का गहनतम अर्थ है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (4)