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परमेश्वर के प्रकटन की महत्ता

I

परमेश्वर के प्रकटन के मायने हैं,

अपने काम की ख़ातिर धरती पर उसका निजी आगमन।

वो अपनी पहचान, अपने स्वभाव, अपने तरीके से,

युग शुरु करने, युग का अंत करने, इंसानों के बीच आता है।

ऐसा प्रकटन न प्रतीक है, न तस्वीर है।

ये रस्म का रूप नहीं।

ये चमत्कार नहीं, ये भव्य दर्शन नहीं।

ये धार्मिक रीति तो बिल्कुल नहीं।

ये हकीकत है, सच्चाई है जिसे छुआ और देखा जा सकता है,

ये हकीकत है, सच्चाई है जिसे छुआ और देखा जा सकता है,

ऐसा सच जिसे छुआ और देखा जा सकता है।

ऐसा प्रकटन किसी व्यवस्था के पालन के लिए नहीं है,

न ही ये थोड़े वक्त का वचन है;

बल्कि ये परमेश्वर की प्रबंधन योजना में, काम के चरण के लिए है,

काम के चरण के लिए है।

II

परमेश्वर का प्रकटन सदा सार्थक होता है,

और सदा उसकी प्रबंधन योजना से जुड़ा होता है।

यह प्रकटन पूरी तरह से इंसान को परमेश्वर की अगुवाई,

मार्गदर्शन या प्रबुद्ध करने के प्रकटन की तरह नहीं है।

परमेश्वर जब भी ख़ुद को प्रकट करता है

वो महान कार्य के एक चरण को करता है।

ये काम किसी भी अन्य युग के काम से अलग है,

इंसान की कल्पना से परे है, इंसान के अनुभव से परे है।

ये काम नव-युग की शुरुआत करता है, और पुरातन युग को समाप्त करता है,

नया और उन्नत काम है ये, जो इंसान का उद्धार करता है,

ये काम इंसान को नए युग में लेकर जाता है।

यही परमेश्वर के प्रकटन की महत्ता है।

यही परमेश्वर के प्रकटन की महत्ता है।

यही परमेश्वर के प्रकटन की महत्ता है।

यही परमेश्वर के प्रकटन की महत्ता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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