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692 तुम्हें पतरस का अनुकरण करना चाहिए

1 जैसे ही पतरस का उल्लेख होता है, प्रत्येक व्यक्ति तुरन्‍त ही उसके बारे में प्रचलित सभी कहानियों को स्‍मरण करते हुए उसकी प्रशंसा से भर जाता है—कैसे उसने तीन बार परमेश्वर को जानने से इन्कार किया और इसके अतिरिक्‍त शैतान को अपनी सेवाएं प्रदान कीं, पतरस बुद्धि से चुस्त था, जन्‍मजात बुद्धिसम्पन्न था, बचपन से उसके माता-पिता उससे स्नेह करते थे, फिर भी, बड़े होने के बाद, वह उनका शत्रु बन गया, क्योंकि उसने हमेशा मुझे जानने की कोशिश की, और इसी बात ने उसे अपने माता-पिता से विमुख कर दिया। यह इसलिए हुआ क्योंकि, सबसे पहले, उसे यह विश्वास था कि स्वर्ग और पृथ्वी और उसकी सभी वस्तुएं सर्वशक्तिमान के हाथों में हैं, और सभी सकारात्मक बातें, शैतान की किसी भी रीति से गुज़रे बिना उसी से उत्पन्न होती हैं और सीधे उसी की ओर से आती हैं। उसके माता-पिता के प्रतिकूल उदाहरण से तुलना करके, वह मेरे प्रेम एवं दया को और भी अधिक आसानी से समझने में सक्षम हो पाया, जिस कारणवश उसके भीतर मुझे खोजने का आवेग और तीव्र हो गया।

2 उसने न केवल बहुत ही करीबी से मेरे वचनों को खाने और पीने पर ध्यान दिया, बल्कि मेरे इरादों को समझने के लिए और भी अधिक प्रयास किया, और वह अपने विचारों में लगातार दूरदर्शी एवं सतर्क रहा, इसलिए वह अपनी आत्मा में बहुत ही कुशाग्रता से चतुर बना रहा और वह अपने हर काम में मुझे प्रसन्न कर सका। साधारण जीवन में, उसने, असफलताओं के जाल में फंसने से गहराई में भयातुर होकर, अतीत में असफल हुए लोगों के सबक स्‍वयं में समाहित करने पर बहुत करीबी से ध्यान दिया ताकि और भी महान प्रयास के लिए अपने आप को प्रेरित करता रहे। उसने उन लोगों की आस्‍था और प्रेम को आत्मसात करने पर भी करीब से ध्यान दिया जो युगों से परमेश्वर को प्रेम करते आ रहे थे। इस प्रकार से उसने न केवल नकारात्मक रूप में, बल्कि और भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, सकारात्मक रूप से अपने विकास की प्रगति को तेज़ किया, जब तक कि वह मेरी उपस्थिति में मुझे सबसे अच्छी तरह जानने वाला व्यक्ति न बन गया।

3 इस की कल्पना करना कठिन नहीं होगा कि किस प्रकार से वह अपना सब कुछ मेरे हाथों में दे पाया, यहां तक कि खाने-पीने, कपड़े पहनने, सोने या रहने में भी वह स्वयं का स्वामी नहीं रहा, परन्तु मुझे सभी बातों में संतुष्टि प्रदान करने को उसने अपनी बुनियाद बनाया जिसके ऊपर उसने मेरे उपहारों का आनन्द लिया। कई बार मैंने उसे परीक्षाओं में रखा, जिन्‍होंने वास्तव में उसे अधमरा कर दिया, परन्तु इन सैकड़ों परीक्षाओं के मध्य में भी, उसने कभी भी मुझ पर अपनी आस्‍था नहीं छोड़ी या मुझ से मायूस नहीं हुआ। बल्कि जब मैंने कहा कि मैंने उसे पहले से ही अलग कर दिया है, तो उसका दिल कमज़ोर नहीं पड़ा या व‍ह निराशा में नहीं पड़ गया, बल्कि पहले की ही तरह उसने अपने सिद्धांतों का पालन करना जारी रखा ताकि मुझे व्यावहारिक ढंग से प्रेम कर सके।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 6" से रूपांतरित

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