1. परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य के बीच विभेदन

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

स्वयं परमेश्वर के कार्य में संपूर्ण मनुष्यजाति का कार्य समाविष्ट है, और यह संपूर्ण युग के कार्य का भी प्रतिनिधित्व करता है, कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर का अपना कार्य पवित्र आत्मा के सभी कार्य की गतिकी और रुझान का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि प्रेरितों का कार्य परमेश्वर के अपने कार्य के बाद आता है और उसे जारी रखता है, वह न तो युग की अगुवाई करता है, न ही वह पूरे युग में पवित्र आत्मा के कार्य के रुझान का प्रतिनिधित्व करता है। वे केवल वही कार्य करते हैं जो मनुष्य को करना चाहिए, जिसका प्रबंधन कार्य से कोई लेना-देना नहीं है। परमेश्वर का अपना कार्य प्रबंधन कार्य के भीतर ही एक परियोजना है। मनुष्य का कार्य केवल वही कर्तव्य है जिसका निर्वहन प्रयुक्त लोग करते हैं, और उसका प्रबंधन कार्य से कोई संबंध नहीं है। विभिन्न पहचान और कार्य के विभिन्न निरूपणों के कारण, इस तथ्य के बावजूद कि वे दोनों पवित्र आत्मा के कार्य हैं, परमेश्वर के अपने कार्य और मनुष्य के कार्य के बीच स्पष्ट और सारभूत अंतर हैं। इसके अतिरिक्त, पवित्र आत्मा विभिन्न पहचानों वाली पात्रों पर विभिन्न सीमाओं तक कार्य करता है। ये पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांत और दायरे हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

वह समस्त कार्य, जिसे स्वयं परमेश्वर करता है, ऐसा कार्य है, जिसे वह अपनी स्वयं की प्रबंधन योजना में करने का इरादा करता है और वह बड़े प्रबंधन से संबंध रखता है। लोगों द्वारा किए गए कार्य में उनके व्यक्तिगत अनुभवों की आपूर्ति शामिल रहती है। उसमें उस मार्ग के अलावा, जिस पर पहले के लोग चले थे, अनुभव के एक नए मार्ग की खोज करना और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में अपने भाई-बहनों का मार्गदर्शन करना शामिल रहता है। इस तरह के लोग अपने व्यक्तिगत अनुभवों या आध्यात्मिक लोगों के आध्यात्मिक लेखन की ही आपूर्ति करते हैं। यद्यपि इन लोगों का पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाता है, फिर भी वे जो कार्य करते हैं, वह छह-हज़ार-वर्षीय योजना के बड़े प्रबंधन-कार्य से संबंध नहीं रखता। वे सिर्फ ऐसे लोग हैं, जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा विभिन्न अवधियों में उभारा गया, ताकि वे तब तक पवित्र आत्मा की धारा में लोगों की अगुआई करें, जब तक कि वे जो भूमिकाएँ निभा सकते हैं, वे पूरी न हो जाएँ या उनके जीवन का अंत न हो जाए। जो कार्य वे करते हैं, वह केवल स्वयं परमेश्वर के लिए एक उचित मार्ग तैयार करना है या पृथ्वी पर स्वयं परमेश्वर के प्रबंधन का एक निश्चित पहलू जारी रखना है। अपने आप में ये लोग उसके प्रबंधन का महान कार्य करने में सक्षम नहीं होते, न ही वे नए मार्गों की शुरुआत कर सकते हैं, उनमें से कोई पिछले युग के परमेश्वर के समस्त कार्य का समापन तो बिल्कुल भी नहीं कर सकता। इसलिए, जो कार्य वे करते हैं, वह केवल अपनी भूमिका निभाने वाले एक सृजित प्राणी का प्रतिनिधित्व करता है, वह अपनी सेवकाई संपन्न करने वाले स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जो कार्य वे करते हैं, वह स्वयं परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य के समान नहीं है। एक नए युग की शुरुआत करने का कार्य ऐसा नहीं है, जो परमेश्वर के स्थान पर मनुष्य द्वारा किया जा सकता हो। इसे स्वयं परमेश्वर के अलावा किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता। मनुष्य के द्वारा किया जाने वाला समस्त कार्य एक सृजित प्राणी के रूप में उसके कर्तव्य का निर्वहन है और वह तब किया जाता है, जब पवित्र आत्मा द्वारा उसे प्रेरित या प्रबुद्ध किया जाता है। इन लोगों द्वारा प्रदान किया जाने वाला मार्गदर्शन मनुष्य को बस दैनिक जीवन में अभ्यास का मार्ग दिखाना और यह बताना होता है कि उसे किस प्रकार परमेश्वर के इरादों के अनुरूप कार्य करना चाहिए। मनुष्य के कार्य में न तो परमेश्वर का प्रबंधन सम्मिलित है और न ही वह आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। उदाहरण के लिए, विटनेस ली और वॉचमैन नी का कार्य मार्ग की अगुआई करना था। मार्ग चाहे नया हो या पुराना, कार्य बाइबल के सिद्धांतों के भीतर ही बने रहने के आधार पर किया गया था। चाहे स्थानीय कलीसियाओं को पुनर्स्थापित करना हो या स्थानीय कलीसियाओं को बनाना हो, उनका कार्य कलीसियाओं की स्थापना से संबंधित था। उनके द्वारा किया गया कार्य उस कार्य को आगे बढ़ाता था, जिसे यीशु और उसके प्रेरित अधूरा छोड़ गए थे या जिसे उन्होंने अनुग्रह के युग में आगे विकसित नहीं किया था। उन्होंने अपने कार्य में उस चीज़ को बहाल किया जिसे यीशु ने अपने समय के कार्य में, अपने बाद आने वाली पीढ़ियों से करने को कहा था, जैसे कि अपना सिर ढककर रखना, बपतिस्मा लेना, रोटी तोड़ना या दाखरस पीना। यह कहा जा सकता है कि उनका कार्य बाइबल का पालन करना था और बाइबल के भीतर ही मार्ग तलाशना था। उन्होंने किसी भी प्रकार की कोई नई प्रगति नहीं की। इसलिए, कोई उनके कार्य में केवल बाइबल के भीतर ही नए मार्गों की खोज और साथ ही बेहतर और अधिक यथार्थवादी अभ्यास ही देख सकता है। किंतु कोई उनके कार्य में परमेश्वर के वर्तमान इरादे नहीं खोज सकता और उस नए कार्य को तो बिल्कुल नहीं खोज सकता जिसे अंत के दिनों में करने का परमेश्वर का इरादा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिस मार्ग पर वे चले, वह फिर भी पुराना ही था—उसमें कोई नवीनीकरण और प्रगति नहीं थी। उन्होंने यीशु को सलीब पर चढ़ाए जाने के तथ्य को पकड़े रखना, लोगों को पश्चात्ताप करने और अपने पाप स्वीकार करने के लिए कहने के अभ्यास का पालन करना, और इस तरह की उक्तियों का पालन जारी रखा, जैसे कि, जो अंत तक सहन करता है उसे बचा लिया जाएगा, और कि पुरुष स्त्री का सिर है और स्त्री को अपने पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए, यहाँ तक कि उन्होंने इस परंपरागत धारणा को भी बनाए रखा कि बहनें उपदेश नहीं दे सकतीं, वे केवल आज्ञापालन कर सकती हैं। यदि इस तरह की अगुआई जारी रही होती, तो पवित्र आत्मा कभी भी नया कार्य करने, लोगों को विनियमों से मुक्त करने या उन्हें स्वतंत्रता और सुंदरता की अवस्था में ले जाने में समर्थ नहीं होता। इसलिए, युग का परिवर्तन करने वाले कार्य के इस चरण को आवश्यकता है कि स्वयं परमेश्वर कार्य करे और बोले; अन्यथा कोई व्यक्ति उसके स्थान पर ऐसा नहीं कर सकता। अभी तक, इस धारा के बाहर पवित्र आत्मा का समस्त कार्य एकदम रुक गया है, और जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया गया था, वे दिग्भ्रमित हो गए हैं। इसलिए, चूँकि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों का कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य से भिन्न है, इसलिए उनकी पहचान और वे जिनकी ओर से कार्य करते हैं, दोनों ही भिन्न हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पवित्र आत्मा जिस कार्य को करने का इरादा करता है, वह भिन्न है, और इसलिए समान रूप से कार्य करने वालों की अलग-अलग पहचान और रुतबे होते हैं। पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले लोग कुछ नया कार्य भी कर सकते हैं और वे पूर्व युग में किए गए किसी कार्य को हटा भी सकते हैं, किंतु उनके द्वारा किया गया कार्य नए युग में परमेश्वर के स्वभाव और इरादों को व्यक्त नहीं कर सकता। वे केवल पूर्व युग के कार्य को हटाने के लिए कार्य करते हैं, और सीधे तौर पर स्वयं परमेश्वर के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से कोई नया कार्य करने के लिए कुछ नहीं करते। इस प्रकार, चाहे वे पुराने पड़ चुके कितने भी अभ्यासों का उन्मूलन कर दें या वे कितने भी नए अभ्यास आरंभ कर दें, वे फिर भी मनुष्य और सृजित प्राणियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। किंतु जब स्वयं परमेश्वर कार्य करता है, तो वह खुलकर प्राचीन युग के अभ्यासों के उन्मूलन की घोषणा नहीं करता या सीधे तौर पर नए युग की शुरुआत की घोषणा नहीं करता। वह अपने कार्य में सीधा और स्पष्ट है। वह जिस कार्य को करने का इरादा रखता है, उसे सीधे तौर पर करता है; अर्थात्, वह उस कार्य को सीधे तौर पर व्यक्त करता है जिसे वह स्वयं आरंभ करता है, वह अपने अस्तित्व और स्वभाव को व्यक्त करते हुए अपने मूल इरादे के अनुसार सीधे तौर पर अपना कार्य करता है। जैसा कि मनुष्य देखता है, उसका स्वभाव और कार्य भी पिछले युगों से भिन्न हैं। किंतु स्वयं परमेश्वर के दृष्टिकोण से, यह मात्र उसके कार्य की निरंतरता और आगे का विकास है। जब स्वयं परमेश्वर कार्य करता है, तो वह अपने वचन व्यक्त करता है और सीधे नया कार्य लाता है। इसके विपरीत, जब मनुष्य काम करता है, तो वह विचार-विमर्श एवं अध्ययन के माध्यम से होता है, या वह दूसरों के कार्य की बुनियाद पर निर्मित ज्ञान का विस्तार और अभ्यास का व्यवस्थापन है। कहने का अर्थ है कि मनुष्य द्वारा किए गए कार्य का सार किसी स्थापित व्यवस्था का अनुसरण करना और “नए जूतों से पुराने मार्ग पर चलना” है। इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए गए मनुष्यों द्वारा अपनाया गया मार्ग भी स्वयं परमेश्वर द्वारा आरंभ किए गए मार्ग पर ही आधारित है। इसलिए, कुल मिलाकर मनुष्य फिर भी मनुष्य है, और परमेश्वर फिर भी परमेश्वर है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (1)

अनुग्रह के युग में यीशु ने भी कई वचन बोले और बहुत कार्य किया। वह यशायाह से कैसे अलग था? वह दानिय्येल से कैसे अलग था? क्या वह कोई नबी था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि वह मसीह है? उनके मध्य क्या भिन्नताएँ हैं? वे सभी मनुष्य थे और उन सबने वचन बोले थे, जो, इसके अलावा, मनुष्य को लगभग एक-से प्रतीत होते थे। उन सभी ने वचन बोले और कार्य किए। पुराने विधान के नबियों ने भविष्यवाणियाँ कीं, और उसी तरह से, यीशु भी वैसा ही कर सकता था। ऐसा क्यों है? यहाँ भेद कार्य की प्रकृति के आधार पर है। इस मामले को विवेक से परखने के लिए तुम्हें देह की प्रकृति पर विचार नहीं करना चाहिए, न ही तुम्हें उनके वचनों की गहराई पर विचार करना चाहिए। कुछ भी हो, तुम्हें पहले उनके कार्य और उसके द्वारा मनुष्य में प्राप्त किए जाने वाले परिणामों पर विचार करना चाहिए। उस समय नबियों द्वारा की गई भविष्यवाणियों ने मनुष्य के जीवन की आपूर्ति नहीं की, यशायाह और दानिय्येल जैसे लोगों द्वारा प्राप्त की गई प्रेरणाएँ मात्र भविष्यवाणियाँ थीं, जीवन का मार्ग नहीं। यदि यहोवा की ओर से प्रत्यक्ष प्रकाशन नहीं होता, तो कोई भी इस कार्य को नहीं कर सकता था, जो नश्वर लोगों के लिए संभव नहीं है। यीशु ने भी कई वचन बोले, परंतु वे वचन जीवन का मार्ग थे, जिनमें से मनुष्य अभ्यास का मार्ग प्राप्त कर सकता था। दूसरे शब्दों में, एक तो वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति कर सकता था, क्योंकि यीशु जीवन है; दूसरे, वह मनुष्यों के विकृत पहलुओं को उलट सकता था; तीसरे, अगले युग में प्रवेश करते हुए वह यहोवा के कार्य को हाथ में ले सकता था; चौथे, वह मनुष्य के भीतर की आवश्यकताएँ जान सकता था और समझ सकता था कि मनुष्य में किस चीज का अभाव है; पाँचवें, वह नए युग का सूत्रपात और पुराने युग का समापन कर सकता था। यही कारण है कि वह परमेश्वर और मसीह है; वह न केवल यशायाह से भिन्न है, अपितु अन्य सभी नबियों से भी भिन्न है। नबियों के कार्य के लिए तुलना के रूप में यशायाह को लें। पहले, वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकता था। दूसरे, वह नए युग का सूत्रपात नहीं कर सकता था। वह यहोवा की अगुआई के अधीन कार्य कर रहा था, न कि नए युग का सूत्रपात करने के लिए। तीसरे, उसके द्वारा बोले गए शब्द उससे परे थे। वे सीधे परमेश्वर के आत्मा से प्राप्त प्रकाशन थे और दूसरे लोगों ने जब उन्हें सुना तो वे उन्हें नहीं समझे। ये कुछ चीज़ें अकेले ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसके वचन भविष्यवाणियों से अधिक और यहोवा के बदले किए गए कार्य के एक पहलू से ज़्यादा कुछ नहीं थे। वह पूरी तरह से यहोवा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। वह यहोवा का सेवक था, यहोवा के काम में एक उपकरण। वह केवल व्यवस्था के युग के भीतर और यहोवा के कार्य-क्षेत्र के भीतर ही कार्य कर रहा था; उसने व्यवस्था के युग से आगे कार्य नहीं किया। इसके विपरीत, यीशु का कार्य भिन्न था। उसने यहोवा के कार्य-क्षेत्र को पार कर लिया; उसने देहधारी परमेश्वर के रूप में कार्य किया और संपूर्ण मानवजाति के छुटकारे के लिए सलीब पर चढ़ गया। दूसरे शब्दों में, उसने यहोवा द्वारा किए गए कार्य के बाहर नया कार्य किया। यह नए युग का सूत्रपात करना था। इसके अतिरिक्त वह उन बातों के बारे में बोलने में सक्षम था जिन तक मनुष्य नहीं पहुँच सकता था। उसका कार्य परमेश्वर के प्रबंधन के भीतर का कार्य था, जो संपूर्ण मानवजाति को समाविष्ट करता था। इसमें केवल कुछ ही लोग शामिल नहीं थे, न ही इसका उद्देश्य केवल सीमित संख्या में लोगों की अगुआई करना था। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि परमेश्वर कैसे मनुष्य के रूप में देहधारी हुआ, कैसे उस समय पवित्रात्मा ने प्रकाशन दिए, और कैसे पवित्रात्मा कार्य करने के लिए एक मनुष्य पर उतरा, तो ये ऐसी बातें हैं, जिन्हें मनुष्य देख या छू नहीं सकता। इन सत्यों का इस बात का साक्ष्य होना सर्वथा असंभव है कि वह देहधारी परमेश्वर है। इस प्रकार भेद केवल परमेश्वर के वचनों और कार्य के आधार पर ही किया जा सकता है, क्योंकि मनुष्य केवल इन्हीं के संपर्क में आ सकता है और इन्हें अनुभव कर सकता है। केवल यही वास्तविक है। इसका कारण यह है कि पवित्रात्मा के मामले तुम्हारे लिए दृष्टिगोचर नहीं हैं और केवल स्वयं परमेश्वर को ही स्पष्ट रूप से ज्ञात हैं, यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर की देह भी सारी चीज़ें नहीं जानती; तुम केवल उसके द्वारा किए गए कार्य से ही यह निश्चित कर सकते हो कि वह परमेश्वर है। उसके कार्यों से यह देखा जा सकता है कि एक तो वह एक नए युग की शुरुआत करने में सक्षम है; दूसरे, वह मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करने और मनुष्य को अनुसरण का मार्ग दिखाने में सक्षम है। यह इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि वह स्वयं परमेश्वर है। कम से कम, जो कार्य वह करता है, वह पूरी तरह से परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और ऐसे कार्य से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का आत्मा उसके भीतर है। चूँकि देहधारी परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से नए युग का सूत्रपात करना, नए कार्य की अगुआई करना और नया क्षेत्र पैदा करना था, इसलिए ये कुछ स्थितियाँ अकेले ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह स्वयं परमेश्वर है। इस प्रकार यह उसे यशायाह, दानिय्येल और अन्य महान नबियों से भिन्नता प्रदान करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर

तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य में भेद कैसे करना है। तुम मनुष्य के कार्य में क्या देख सकते हो? मनुष्य के कार्य में उसके अनुभव के बहुत-से तत्व होते हैं; मनुष्य वही व्यक्त करता है जैसा उसका स्वरूप होता है। अपना कार्य करने में परमेश्वर भी वही व्यक्त करता है जो उसका स्वरूप है, परंतु उसका अस्तित्व मनुष्य से भिन्न है। मनुष्य का अस्तित्व मनुष्य के अनुभव और जीवन का प्रतिनिधि है (जो कुछ मनुष्य अपने जीवन में अनुभव करता या जिससे सामना होता है, या जो उसके सांसारिक आचरण के फलसफे हैं), और भिन्न-भिन्न परिवेशों में रहने वाले लोग भिन्न-भिन्न अस्तित्व व्यक्त करते हैं। क्या तुम्हारे पास सामाजिक अनुभव है और तुम वास्तव में किस प्रकार अपने परिवार में रहते और उसके भीतर कैसे अनुभव करते हो, इसे तुम्हारी अभिव्यक्ति में देखा जा सकता है, जबकि तुम देहधारी परमेश्वर के कार्य से यह नहीं देख सकते कि उसके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं। वह मनुष्य के सार को अच्छी तरह से जानता है और सभी प्रकार के लोगों के विभिन्न अभ्यास उजागर कर सकता है। इतना ही नहीं, वह मनुष्यों के भ्रष्ट स्वभाव और विद्रोही व्यवहार भी उजागर कर सकता है। वह दुनिया के लोगों के बीच नहीं रहता, परंतु वह नश्वर लोगों की प्रकृति और दुनिया के लोगों की समस्त भ्रष्टता से अवगत है। यही उसका अस्तित्व है। यद्यपि वह दुनिया के साथ व्यवहार नहीं करता, लेकिन वह दुनिया से निपटने के तमाम नियम जानता है, क्योंकि वह मानवीय प्रकृति को पूरी तरह से समझता है। वह आत्मा के आज के और अतीत के, दोनों कार्यों के बारे में जानता है जिन्हें मनुष्य की आँखें नहीं देख सकतीं और कान नहीं सुन सकते। इसमें बुद्धि शामिल है जो कि सांसारिक आचरण का फलसफा नहीं है और वह चमत्कार है जिनकी थाह पाना मनुष्य के लिए कठिन है। यही उसका अस्तित्व है, लोगों के लिए खुला भी और उनसे छिपा हुआ भी है। वह जो कुछ व्यक्त करता है, वह असाधारण मनुष्य का अस्तित्व नहीं है, बल्कि आत्मा के अंतर्निहित गुण और अस्तित्व हैं। वह दुनिया भर में यात्रा नहीं करता परंतु उसकी हर चीज़ को जानता है। वह “वन-मानुषों” के साथ संपर्क करता है जिनके पास कोई ज्ञान या अंतर्दृष्टि नहीं होती, परंतु वह ऐसे वचन व्यक्त करता है जो ज्ञान से ऊँचे और महान हस्तियों के वचनों से ऊपर होते हैं। वह ऐसे मंदबुद्धि और संवेदनशून्य लोगों के समूह में रहता है जिनमें मानवता नहीं है और जो मानव-जीवन को या मानवता के मानदंडों को नहीं समझते, परंतु वह मानवजाति से सामान्य मानवता का जीवन जीने के लिए कह सकता है, साथ ही वह मानवजाति की नीच और अधम मानवता को उजागर भी करता है। यह सब कुछ उसका अस्तित्व ही है, किसी भी रक्त-माँस के इंसान के अस्तित्व की तुलना में अधिक ऊँचा। उसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह उस कार्य को करने के लिए जो उसे करने की जरूरत है और भ्रष्ट मानवजाति के सार को पूरी तरह से उजागर करने के लिए जटिल, बोझिल और पतित सामाजिक जीवन का अनुभव करने का अतिरिक्त कदम उठाए। पतित सामाजिक जीवन उसके देह को “विकसित” नहीं कर सकता। उसका कार्य और उसके वचन केवल मनुष्य के विद्रोहीपन को उजागर करते हैं और संसार से निपटने के लिए मनुष्य को अनुभव और सबक प्रदान नहीं करते। जब वह मनुष्य को जीवन की आपूर्ति करता है तो उसे समाज या मनुष्य के परिवार की जाँच-पड़ताल करने की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य को उजागर करना और न्याय करना उसकी देह के अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह लंबे समय तक मनुष्य के विद्रोहीपन को जानने और मनुष्य की भ्रष्टता से घृणा करने के बाद उसका मनुष्य की अधार्मिकता उजागर करना है। जो भी कार्य वह करता है, वह सब मनुष्य के सामने उसका स्वभाव प्रकट करता है और उसके अस्तित्व को व्यक्त करता है। केवल वही इस कार्य को कर सकता है; इस कार्य को रक्त-माँस का व्यक्ति नहीं कर सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

जिस कार्य को परमेश्वर करता है वह उसकी देह के अनुभव का प्रतिनिधित्व नहीं करता; जिस कार्य को मनुष्य करता है वह मनुष्य के अनुभव का प्रतिनिधित्व करता है। हर कोई अपने व्यक्तिगत अनुभव की बात करता है। परमेश्वर सीधे तौर पर सत्य व्यक्त कर सकता है, जबकि मनुष्य कुछ सत्यों का अनुभव करने के पश्चात् केवल प्रासंगिक अनुभवों को ही व्यक्त कर सकता है। परमेश्वर के कार्य के कोई विनियम नहीं होते और वह समय या भौगोलिक रुकावटों के अधीन नहीं है। वह अपने स्वरूप को किसी भी समय और किसी भी स्थान पर व्यक्त कर सकता है। उसे जैसा अच्छा लगता है वह वैसा ही करता है। मनुष्य के कार्य में परिस्थितियाँ और सन्दर्भ होते हैं; उनके बिना, वह कार्य करने में असमर्थ होता है और वह परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान को व्यक्त करने या सत्य के बारे में अपने अनुभव को व्यक्त करने में भी असमर्थ होता है। कोई चीज स्वयं परमेश्वर का कार्य है या मनुष्य का कार्य, जब तक तुम दोनों की तुलना करते हो तुम अंतर जान जाओगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

परमेश्वर केवल युग की अगुआई करने और एक नए कार्य को गतिमान करने के लिए देह बनता है। तुम लोगों के लिए इस बिंदु को समझना आवश्यक है। यह मनुष्य के काम से बहुत अलग है, और दोनों एक साँस में उल्लेख किए जाने योग्य नहीं हैं। कार्य करने के लिए उपयोग किए जा सकने से पूर्व मनुष्य को लंबी अवधि तक विकसित और पूर्ण किए जाने की आवश्यकता होती है, और इसके लिए एक विशेष रूप से उच्च स्तर की मानवता अपेक्षित होती है। मनुष्य को न केवल अपना सामान्य मानवता के विवेक को बनाए रखने में सक्षम होना चाहिए, बल्कि उसे उन अनेक सिद्धांतों और नियमों को भी समझना चाहिए जिनके द्वारा वह संसार से पेश आता है, और इतना ही नहीं, उसे मनुष्य की बुद्धि और नैतिक ज्ञान का और अधिक अध्ययन करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। मनुष्य के अंदर ये तमाम बातें होनी चाहिए। लेकिन, देहधारी परमेश्वर के मामले में ऐसा नहीं है, क्योंकि उसका कार्य न तो मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है और न ही वह मनुष्य का कार्य है, और इसके बजाय यह उसके अस्तित्व की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और उस कार्य का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है, जो उसे करना चाहिए। (स्वाभाविक रूप से उसका कार्य उपयुक्त समय पर किया जाता है, आकस्मिक या ऐच्छिक ढंग से नहीं, और वह तब शुरू होता है, जब उसकी सेवकाई करने का समय होता है।) वह मनुष्य के जीवन में या मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता, अर्थात्, उसकी मानवता इनमें से किसी से युक्त नहीं होती (हालाँकि इससे उसका कार्य प्रभावित नहीं होता)। वह अपनी सेवकाई तभी करता है, जब उसके लिए ऐसा करने का समय होता है; उसकी स्थिति कुछ भी हो, वह बस उस कार्य को करने पर ध्यान देता है, जो उसे करना चाहिए। मनुष्य उसके बारे में जो कुछ भी जानता हो या उसके बारे में जो भी राय रखता हो, इससे उसके कार्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (3)

मनुष्य का कार्य एक विस्तार और सीमा के भीतर रहता है। एक व्यक्ति केवल किसी निश्चित चरण के कार्य को करने में ही समर्थ होता है, वह संपूर्ण युग का कार्य नहीं कर सकता—अन्यथा, वह लोगों को विनियमों में ले जाएगा। मनुष्य के कार्य को केवल एक विशेष समय या चरण पर ही लागू किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य के अनुभव का एक दायरा होता है। परमेश्वर के कार्य की तुलना मनुष्य के कार्य से नहीं की जा सकती। मनुष्य के अभ्यास करने के तरीके और सत्य का उसका ज्ञान, ये सभी एक विशेष दायरे में लागू होते हैं। तुम यह नहीं कह सकते कि जिस मार्ग पर मनुष्य चलता है वह पूरी तरह से पवित्र आत्मा का इरादा है, क्योंकि मनुष्य को केवल पवित्र आत्मा द्वारा ही प्रबुद्ध किया जा सकता है और उसे पवित्र आत्मा से पूरी तरह से नहीं भरा जा सकता। जिन चीजों को मनुष्य अनुभव कर सकता है, वे सभी सामान्य मानवता के दायरे के भीतर हैं और वे सामान्य मानवीय बुद्धि में मौजूद विचारों की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ सकतीं। वे सभी लोग, जो सत्य वास्तविकता को जी सकते हैं, इस सीमा के भीतर अनुभव करते हैं। जब वे सत्य का अनुभव करते हैं, तो यह हमेशा पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के तहत सामान्य मानव-जीवन का अनुभव होता है; यह अनुभव करने का ऐसा कोई तरीका नहीं है जो सामान्य मानव-जीवन की सीमाओं से परे हो। वे अपने मानव-जीवन को जीने की बुनियाद पर पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध किए गए सत्य का अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त, यह सत्य हर व्यक्ति के लिए अलग होता है, और इसकी गहराई उस व्यक्ति की अवस्था से संबंधित होती है। बस यही कहा जा सकता है कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसे व्यक्ति का सामान्य मानवीय जीवन है जो सत्य की खोज कर रहा है, और इसे ऐसा मार्ग कहा जा सकता है जिस पर पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध कोई सामान्य व्यक्ति चलता है। कोई यह नहीं कह सकता कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसा मार्ग है जिस पर पवित्र आत्मा चलता है। सामान्य मानवीय अनुभव में, क्योंकि जो लोग अनुसरण करते हैं वे एक समान नहीं होते, इसलिए पवित्र आत्मा का कार्य भी समान नहीं होता। इसके अतिरिक्त, क्योंकि जिन परिवेशों का लोग अनुभव करते हैं और उनके अनुभव की सीमाएँ एक समान नहीं होतीं, इसलिए उनके मन और विचारों के मिश्रण की वजह से, उनका अनुभव विभिन्न अंशों तक मिश्रित हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भिन्न व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार ही किसी सत्य को समझता है। सत्य के वास्तविक अर्थ की उसकी समझ पूर्ण नहीं होती और यह उसका केवल एक या कुछ ही पहलू होते हैं। मनुष्य सत्य के जिस दायरे का अनुभव करता है, वह प्रत्येक इंसान की परिस्थितियों के अनुरूप बदलता है। इस तरह, एक ही सत्य के बारे में विभिन्न लोगों द्वारा व्यक्त ज्ञान एक समान नहीं होता। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य का अनुभव हमेशा सीमित होता है—वह पवित्र आत्मा के इरादे पूरी तरह से नहीं दर्शा सकता। मनुष्य के कार्य को परमेश्वर का कार्य नहीं समझा जा सकता, भले ही मनुष्य जो कुछ व्यक्त करता है वह परमेश्वर के इरादों से बहुत हद तक मेल खाता हो और भले ही मनुष्य का अनुभव पूर्ण बनाए जाने के उस कार्य के बहुत करीब हो जिसे पवित्र आत्मा करना चाहता है। मनुष्य केवल परमेश्वर का सेवक हो सकता है, जो केवल वही कार्य करता है जो परमेश्वर उसे सौंपता है। मनुष्य केवल पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध ज्ञान और व्यक्तिगत अनुभवों से प्राप्त सत्यों को ही व्यक्त कर सकता है। मनुष्य में पवित्र आत्मा का निर्गम बनने की योग्यताएँ नहीं हैं या वह वैसा बनने की शर्तें पूरी नहीं करता। वह यह कहने का हकदार नहीं है कि उसका कार्य परमेश्वर का कार्य है। लोगों के कार्य करने के अपने सिद्धांत होते हैं और हर किसी के अलग-अलग अनुभव होते हैं और उनकी अलग-अलग स्थितियाँ होती हैं। मनुष्य के कार्य में पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के अंतर्गत उसके सभी अनुभव शामिल होते हैं। ये अनुभव केवल मनुष्य के अस्तित्व का ही प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, ये परमेश्वर के अस्तित्व का या पवित्र आत्मा के इरादों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि मनुष्य जिस मार्ग पर चलता है, उसी पर पवित्र आत्मा भी चलता है क्योंकि मनुष्य का कार्य परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता और मनुष्य के कार्य और मनुष्य का अनुभव पूरी तरह से पवित्र आत्मा के इरादे नहीं होते। मनुष्य के कार्य की विनियमों में पड़ने की संभावना है, और उसकी कार्य-पद्धति आसानी से एक दायरे में सीमित हो जाती है और यह लोगों की स्वतंत्र मार्ग पर अगुवाई करने में असमर्थ होती है। अधिकांश अनुयायी एक सीमित दायरे में जीवन जीते हैं, और उनके अनुभव करने का तरीका भी अपने दायरे में सीमित होता है। मनुष्य का अनुभव हमेशा सीमित होता है; उसकी कार्य-पद्धति भी कुछ प्रकारों तक ही सीमित होती है और इसकी तुलना पवित्र आत्मा के कार्य से या स्वयं परमेश्वर के कार्य से नहीं की जा सकती। ऐसा इसलिए है क्योंकि आख़िरकार मनुष्य का अनुभव सीमित होता है। परमेश्वर अपना कार्य चाहे जिस तरह करे, वह विनियम से बंधा नहीं होता; इसे जैसे भी किया जाए, यह किसी एक पद्धति तक सीमित नहीं होता। परमेश्वर के कार्य के किसी प्रकार के कोई विनियम नहीं होते—उसका समस्त कार्य मुक्त और स्वतंत्र होता है। भले ही मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करते हुए कितना ही समय क्यों न बिताए, वह उसे निचोड़कर ऐसे नियम नहीं निकाल सकता जो परमेश्वर के कार्य करने के तरीके का संचालन करते हों। यद्यपि उसका कार्य अत्यंत सिद्धांत-आधारित होता है, फिर भी वह कार्य हमेशा नए-नए तरीकों से किया जाता है और उसमें नये-नये विकास होते रहते हैं, और यह मनुष्य की पहुँच से परे होता है। एक ही समयावधि के दौरान, परमेश्वर के पास भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य और लोगों की अगुवाई करने के भिन्न-भिन्न तरीके हो सकते हैं, ताकि लोगों के पास हमेशा नए-नए प्रवेश और नए-नए परिवर्तन हों। तुम उसके कार्य के नियम नहीं समझ सकते क्योंकि वह हमेशा नए तरीकों से कार्य करता है, और केवल इसी तरह परमेश्वर के अनुयायी विनियमों से नहीं बँधते। स्वयं परमेश्वर का कार्य हमेशा लोगों की धारणाओं से परहेज करता है और उनका विरोध करता है। जो लोग सच्चे हृदय से उसका अनुसरण और उसकी खोज करते हैं, केवल वही अपने स्वभाव में बदलाव ला सकते और स्वतंत्रता से जी सकते हैं, वे किन्हीं विनियमों से बाधित नहीं होते या किन्हीं धार्मिक धारणाओं से प्रतिबंधित नहीं होते। मनुष्य का कार्य लोगों से उसके अपने अनुभव और जो वह स्वयं हासिल कर सकता है, उसके आधार पर माँगें करता है। ये अपेक्षित मानक एक निश्चित दायरे के भीतर सीमित होते हैं, और अभ्यास के तरीके भी बहुत-सीमित होते हैं। इसलिए अनुयायी अनजाने में ही सीमित दायरे के भीतर जीवन जीते हैं; जैसे-जैसे समय गुजरता है, ये चीजें विनियम और कर्मकांड बन जाती हैं। यदि एक अवधि के कार्य की अगुवाई कोई ऐसा व्यक्ति करता है जो परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से पूर्ण किए जाने से नहीं गुजरा है और जिसने न्याय प्राप्त नहीं किया है, तो उसके सभी अनुयायी धर्म से चिपके रहने वाले बन जाएँगे और परमेश्वर का विरोध करने में माहिर हो जाएँगे। इसलिए, यदि कोई अगुआ मानक स्तर का है, तो उसने अवश्य ही न्याय से गुजरकर, पूर्ण किया जाना स्वीकार किया होगा। जो लोग न्याय से नहीं गुजरे हैं, उनमें भले ही पवित्र आत्मा का कार्य हो, वे केवल अस्पष्ट और अव्यावहारिक चीजों को ही व्यक्त करते हैं। अगर वे लंबे समय तक लोगों की अगुआई करते हैं तो वे उन्हें अस्पष्ट और अलौकिक विनियमों की ओर ले जाएँगे। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की देह से मेल नहीं खाता; वह मनुष्य के विचारों से मेल नहीं खाता, बल्कि मनुष्य की धारणाओं का विरोध करता है; यह अस्पष्ट धार्मिक रंग से कलंकित नहीं होता। परमेश्वर के कार्य के परिणाम वे लोग प्राप्त नहीं कर सकते जो उसके द्वारा पूर्ण नहीं बनाए गए हैं; वे मनुष्य की सोच से परे होते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

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प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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