5. दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
प्रथम देहधारण मनुष्य को पाप से छुटकारा दिलाने के लिए था, उसे यीशु के दैहिक शरीर के माध्यम से छुटकारा दिलाने के लिए था, अर्थात् यीशु ने मनुष्य को सलीब से बचाया, किंतु शैतानी भ्रष्ट स्वभाव मनुष्य के भीतर अभी भी बचे रह गए। दूसरा देहधारण अब पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए नहीं है, अपितु उन लोगों को पूरी तरह से बचाने के लिए है जिन्हें पाप से छुटकारा दिलाया गया था। यह इसलिए किया जाता है ताकि जिनके पापों को क्षमा किया जा चुका है वे अपने पाप से मुक्त और पूरी तरह से शुद्ध हो सकें और स्वभावगत बदलाव हासिल कर सकें और इस प्रकार शैतान के अंधकार के प्रभाव से मुक्त हो जाएँ और परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आएँ। केवल इसी तरीके से मनुष्य पूरी तरह से पावनीकृत हो सकता है। व्यवस्था के युग का अंत होने के बाद और अनुग्रह के युग के आरंभ से परमेश्वर ने उद्धार-कार्य शुरू किया, जो अंत के दिनों में जारी है, जब परमेश्वर मनुष्य की विद्रोहशीलता के लिए उसके न्याय और ताड़ना का कार्य करता है और इस प्रकार मानवजाति को पूरी तरह से शुद्ध करता है। केवल इसके बाद ही परमेश्वर उद्धार के अपने कार्य का समापन करेगा और विश्राम में प्रवेश करेगा। इसलिए, कार्य के तीन चरणों में परमेश्वर स्वयं मनुष्य के बीच अपना कार्य करने के लिए केवल दो बार देहधारी हुआ है। वह इसलिए, क्योंकि कार्य के तीन चरणों में से केवल एक चरण ही लोगों का जीवन जीने में मार्गदर्शन करने के लिए है, जबकि अन्य दो चरणों में उद्धार का कार्य शामिल है। केवल देहधारी होकर ही परमेश्वर मनुष्य के साथ रह सकता है, संसार के कष्ट का अनुभव कर सकता है और एक सामान्य दैहिक शरीर में रह सकता है। केवल इसी तरह से वह लोगों को उस व्यावहारिक वचन की आपूर्ति कर सकता है जिसकी उन्हें सृजित प्राणी होने के नाते आवश्यकता है। परमेश्वर के देहधारण के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर से पूर्ण उद्धार प्राप्त करता है, न कि अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर में सीधे स्वर्ग से। मनुष्य देह और रक्त से बना है, उसके पास परमेश्वर के आत्मा को देखने का कोई उपाय नहीं है, उसके आत्मा के निकट पहुँचने की तो बात ही छोड़ दो, इसलिए मनुष्य जिसके संपर्क में आ सकता है वह सिर्फ परमेश्वर का देहधारी देह है। केवल इसी तरीके से मनुष्य समस्त वचन और सभी सत्य समझ पाता है और पूर्ण उद्धार प्राप्त कर पाता है। दूसरा देहधारण मनुष्य को उसके पापों से छुटकारा दिलाने और उसे पूरी तरह से शुद्ध करने के लिए पर्याप्त है। इसलिए, दूसरे देहधारण के साथ देह में परमेश्वर का संपूर्ण कार्य समाप्त कर दिया जाएगा और परमेश्वर के देहधारण का महत्व पूरा कर दिया जाएगा। उसके बाद देह में परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। दूसरे देहधारण के बाद वह अपने कार्य के लिए तीसरी बार देहधारी नहीं होगा। क्योंकि उसका संपूर्ण प्रबंधन समाप्त हो गया होगा, अंत के दिनों के देहधारण ने अपने चुने हुए लोगों को पूरी तरह से प्राप्त कर लिया होगा, और अंत के दिनों में मानवजाति को उसकी किस्म के अनुसार छाँट लिया गया होगा। वह अब और उद्धार-कार्य नहीं करेगा, न ही वह कोई कार्य करने के लिए देह में लौटेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)
जिस समय यीशु अपना कार्य कर रहा था, तब भी उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान कल्पित और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा उसे दाऊद का वंशज माना और कहा कि वह एक महान नबी है, उदार प्रभु है जिसने मनुष्य को उसके पापों से छुटकारा दिलाया। कुछ लोग अपनी आस्था के बल पर उसके वस्त्र के किनारे को छूकर ही चंगे हो गए; अंधे देख सके, यहाँ तक कि मृतक जीवित किए जा सके। किंतु मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए शैतानी भ्रष्ट स्वभावों का पता लगाने में असमर्थ रहा, न ही वह यह जानता था कि उन्हें कैसे त्यागा जाए। मनुष्य ने बहुत अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति की आस्था से पूरे परिवार को आशीष मिलना, बीमारी से चंगाई, इत्यादि। शेष मनुष्य के अच्छे कर्म और उसका धर्मात्मा जैसा रूप था; यदि कोई इनके आधार पर जी सकता था तो उसे एक मानक स्तर का विश्वासी माना जाता था। केवल इसी तरह के विश्वासी मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ था कि उन्हें छुटकारा दिला दिया गया था। परंतु अपने जीवन-काल में इन लोगों ने जीवन के मार्ग को बिल्कुल नहीं समझा था। उन्होंने सिर्फ इतना किया कि अपना स्वभाव बदलने के किसी मार्ग को अपनाए बिना बस एक निरंतर चक्र में पाप किए और उन्हें स्वीकार कर लिया : अनुग्रह के युग में मनुष्य की स्थिति ऐसी थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया है? नहीं! इसलिए, उस चरण का कार्य पूरा हो जाने के बाद भी न्याय और ताड़ना का कार्य बाकी रह गया था। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध करने और इस प्रकार उसे अनुसरण हेतु एक मार्ग प्रदान करने के लिए है। यह चरण फलदायक या अर्थपूर्ण न होता, यदि यह दुष्टात्माओं को निकालने के साथ जारी रहता, क्योंकि यह मनुष्य की पापी प्रकृति को उतार फेंकने में असफल रहता और मनुष्य अपने पापों की क्षमा पर ही रुक जाता। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए गए हैं, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले ही समाप्त हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। किंतु मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर रहते हैं, मनुष्य अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है और परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर वचन का उपयोग करके मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करता है और उसे उचित मार्ग के अनुसार अभ्यास करने के लिए प्रेरित करता है। इस चरण का कार्य पिछले चरण से अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक फलदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन का पोषण करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया होने में सक्षम बनाता है; कार्य का यह चरण कहीं अधिक संपूर्ण है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूर्ण किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना का पूर्णतः समापन किया है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)
अपने पहले देहधारण में परमेश्वर ने देहधारण के कार्य को पूरा नहीं किया; उसने उस कार्य के पहले चरण को ही पूरा किया जिसे करना देह में रह रहे परमेश्वर से अपेक्षित था। इसलिए देहधारण के कार्य को पूरा करने के लिए परमेश्वर एक बार फिर देह में वापस आया है, और देह की समस्त सामान्यता और व्यावहारिकता को जी रहा है, अर्थात् उस देह में परमेश्वर के वचन को प्रकट कर रहा है जो उतनी सामान्य और साधारण है जितना संभव है, इस प्रकार उस कार्य का समापन कर रहा है जिसे देह में पूरा होना बाकी है। दूसरी देहधारी देह का सार पहले वाली के ही समान है, लेकिन यह पहली से और भी अधिक व्यावहारिक है, और भी अधिक सामान्य है। परिणामस्वरूप, दूसरी देहधारी देह पहले देहधारण से भी अधिक पीड़ा सहती है, किन्तु यह पीड़ा देह में उसकी सेवकाई का परिणाम है, जो कि एक भ्रष्ट मानव की पीड़ा से भिन्न है। यह भी उसकी देह की सामान्यता और व्यावहारिकता से उत्पन्न होती है। क्योंकि वह अपनी सेवकाई का कार्य उस देह में करता है जो सर्वाधिक सामान्यता और व्यावहारिकता वाली है, इसलिए उसकी देह को अत्यधिक कष्ट सहना होगा। उसकी देह जितनी अधिक सामान्य और व्यावहारिक होगी, उतना ही अधिक वह अपनी सेवकाई में कष्ट उठाएगा। परमेश्वर का कार्य एक बहुत ही आम देह में अभिव्यक्त होता है, जो बिल्कुल अलौकिकता से रहित है। चूँकि उसकी देह सामान्य है और उसे मनुष्य को बचाने के कार्य का दायित्व भी लेना है, इसलिए वह अलौकिक देह की अपेक्षा और भी अधिक पीड़ा भुगतता है—और ये सारी पीड़ा उसकी देह की व्यावहारिकता और सामान्यता से उत्पन्न होती है। सेवकाई का कार्य करते समय जिस पीड़ा से दोनों देहधारी देह गुजरी हैं, उससे देहधारी देह के सार को देखा जा सकता है। देह जितनी अधिक सामान्य होगी, उसे कार्य करते समय उतना ही अधिक कष्ट सहना होगा; कार्य करने वाली देह जितनी अधिक व्यावहारिक होती है, लोगों की धारणाएँ उतनी ही अधिक मजबूत होती जाती हैं, और वह उतने ही जोखिम उठाता है। फिर भी, देह जितनी अधिक व्यावहारिक होती है, और उसमें सामान्य मानव की जितनी अधिक आवश्यकताएँ और पूर्ण विवेक होता है, वह उतना ही अधिक परमेश्वर के कार्य का देह में बीड़ा उठाने में सक्षम होती है। यीशु को देह के जरिए सलीब पर चढ़ाया गया था और वह देह के जरिए पापबलि बना, यानी उसने सामान्य मानवता वाली देह के जरिए ही शैतान को हराया और सलीब से मनुष्य को पूरी तरह से बचाया था। पूर्ण देह के जरिए ही दूसरा देहधारी परमेश्वर विजय का कार्य करता है और शैतान को हराता है। केवल ऐसी देह जो पूरी तरह से सामान्य और व्यावहारिक है, अपने पूर्ण अर्थ में विजय का कार्य कर सकती और एक सशक्त गवाही दे सकती है। अर्थात् देह में रह रहे परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता के माध्यम से मानव पर विजय पाने में सफलता मिलती है, न कि अलौकिक चमत्कारों और प्रकाशनों के माध्यम से। यह देहधारी परमेश्वर बोलकर सेवकाई करता है और बोलकर ही वह मनुष्य को जीतता और पूर्ण बनाता है; दूसरे शब्दों में, देह में साकार हुए आत्मा का कार्य बोलना है और देह का कार्य बोलना है, और इसके फलस्वरूप मनुष्य को पूरी तरह से जीतने, प्रकाशित करने, पूर्ण बनाने और निकाल देने का उद्देश्य पूरा करना है। इसलिए विजय के कार्य में देह में परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से सम्पन्न होगा। मनुष्य के पापों के लिए प्रायश्चित का कार्य जो पहली बार किया गया था, वह देहधारण के कार्य का आरंभ मात्र था; विजय का कार्य करने वाली देह ही देहधारण के समस्त कार्य को पूरा करती है। लिंग रूप में, एक पुरुष है और दूसरा महिला; यह परमेश्वर के देहधारण की महत्ता को पूर्णता देकर, परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाओं को दूर करता है : परमेश्वर पुरुष और महिला दोनों बन सकता है, सार रूप में देहधारी परमेश्वर स्त्रीलिंग या पुल्लिंग नहीं है। उसने पुरुष और महिला दोनों को बनाया है, और उसके लिए कोई लिंगभेद नहीं है। कार्य के इस चरण में, परमेश्वर चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता, ताकि कार्य वचनों के माध्यम से अपने परिणाम प्राप्त करे। इसके अलावा, क्योंकि देहधारी परमेश्वर का इस बार का कार्य बीमार को चंगा करना और राक्षसों को बाहर निकालना नहीं है, बल्कि बोलकर मनुष्य को जीतना है, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर के इस देहधारण की स्वाभाविक क्षमताएँ वचन बोलना और मनुष्य को जीतना हैं, न कि बीमार को चंगा करना और राक्षसों को बाहर निकालना। सामान्य मानवता में उसका कार्य चिह्न दिखाना नहीं है, बीमार को चंगा करना और राक्षसों को बाहर निकालना नहीं है, बल्कि बोलना है, और इसलिए दूसरी देहधारी देह लोगों को पहले वाले की तुलना में अधिक सामान्य लगती है। लोग जैसे देखते हैं, परमेश्वर ने वास्तव में देह धारण किया है। हालाँकि, यह देहधारी परमेश्वर यीशु के देहधारण से भिन्न है, हालाँकि दोनों ही परमेश्वर के देहधारण हैं, फिर भी वे पूरी तरह से एक नहीं हैं। यीशु में सामान्य और साधारण मानवता थी, लेकिन उसमें अनेक चिह्न और चमत्कार दिखाने की शक्ति थी। जबकि इस देहधारी परमेश्वर में मानवीय आँखों को न तो कोई चिह्न दिखाई देगा, और न कोई चमत्कार, न तो बीमार चंगे होते हुए दिखाई देंगे, न ही दुष्टात्माएँ बाहर निकाली जाती हुई दिखाई देंगी, न तो समुद्र पर चलना दिखाई देगा, न ही चालीस दिन तक उपवास रखना दिखाई देगा...। वह उसी कार्य को नहीं करता जो यीशु ने किया, इसलिए नहीं कि उसकी देह सार रूप में यीशु से भिन्न है, बल्कि इसलिए कि बीमार को चंगा करना और राक्षसों को निकालना उसकी सेवकाई नहीं है। वह अपने ही कार्य को ध्वस्त नहीं करता, अपने ही कार्य में विघ्न नहीं डालता। चूँकि वह मनुष्य को अपने व्यावहारिक वचनों से जीतता है, इसलिए उसे चिह्नों से वश में करने की आवश्यकता नहीं है, और इसलिए यह चरण देहधारण के कार्य को पूरा करने के लिए है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार
मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि देहधारण का अर्थ यीशु के कार्य में पूर्ण नहीं हुआ था? क्योंकि वचन पूरी तरह से देह नहीं बना था। यीशु ने जो किया वह देह में परमेश्वर के कार्य का केवल एक अंश ही था; उसने केवल छुटकारे का कार्य किया और मनुष्य को पूरी तरह से प्राप्त करने का कार्य नहीं किया। इसी कारण से परमेश्वर एक बार पुनः अंत के दिनों में देह बना है। कार्य का यह चरण भी एक साधारण देह में किया जाता है; यह एक सर्वथा सामान्य मानव द्वारा किया जाता है, जिसकी मानवता अंश मात्र भी अलौकिक नहीं होती। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर पूरी तरह से इंसान बन गया है; और वह ऐसा व्यक्ति है जिसकी पहचान परमेश्वर की है, जो एक पूर्ण मानव है, जो एक पूर्ण देह है, जो कार्य को कर रहा है। मानवीय आँखों के लिए, वह केवल एक देह है जो बिल्कुल भी अति-असाधारण नहीं है, एक अति साधारण व्यक्ति जो स्वर्ग की भाषा बोल सकता है, जो कोई भी चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता है, वृहद सभाकक्षों में धर्म के पीछे की असली कहानी को उजागर करना तो दूर की बात है। लोगों को दूसरी देहधारी देह का कार्य पहले वाले से एकदम अलग प्रतीत होता है, और दोनों में कुछ भी समान नहीं दिखता—इस बार पहले वाले के कार्य का थोड़ा-भी अंश नहीं देखा जा सकता। यद्यपि दूसरे देहधारण की देह का कार्य पहले वाले से भिन्न है, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उनका स्रोत एक ही नहीं है। उनका स्रोत एक ही है या नहीं, यह दोनों देहों के द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति पर निर्भर करता है, न कि उनके बाहरी आवरण पर। अपने कार्य के तीन चरणों के दौरान, परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया है, और दोनों बार देहधारी परमेश्वर के कार्य ने एक नए युग का शुभारंभ किया है, एक नए कार्य का सूत्रपात किया है; दोनों देहधारण एक-दूसरे के पूरक हैं। मानवीय आँखों के लिए यह बताना असंभव है कि दोनों देह वास्तव में एक ही स्रोत से आते हैं। बेशक यह मानवीय आँखों या मानवीय मन की क्षमता से बाहर है। किन्तु अपने सार में वे एक ही हैं, क्योंकि उनका कार्य एक ही आत्मा से उत्पन्न होता है। दोनों देहधारी देह एक ही स्रोत से उत्पन्न होते हैं या नहीं, इस बात को उस युग और उस स्थान से जिसमें वे पैदा हुए थे, या ऐसे ही अन्य कारकों से नहीं, बल्कि उनके द्वारा किए गए दिव्य कार्य से तय किया जा सकता है। दूसरी देहधारी देह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करती जिसे यीशु कर चुका है, क्योंकि परमेश्वर का कार्य किसी परंपरा का पालन नहीं करता, बल्कि हर बार वह एक नया मार्ग खोलता है। दूसरी देहधारी देह का लक्ष्य, लोगों के मन पर पहली देह के प्रभाव को गहरा या दृढ़ करना नहीं है, बल्कि इसे पूरक करना और उनके मन में पहली देह की छवि को सुधारना है, परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान को गहरा करना है, उन सभी विनियमों को तोड़ना है जो लोगों के हृदय में विद्यमान हैं, और उनके हृदय से परमेश्वर की भ्रामक छवि को मिटाना है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के अपने कार्य का कोई भी अकेला चरण मनुष्य को उसके बारे में पूरा ज्ञान नहीं दे सकता; प्रत्येक चरण केवल एक भाग का ज्ञान देता है, न कि संपूर्ण का। यद्यपि परमेश्वर ने अपने स्वभाव को पूरी तरह से व्यक्त कर दिया है, किन्तु मनुष्य की सीमित बोध क्षमता की वजह से, परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान अभी भी अपूर्ण है। मानव भाषा का उपयोग करके, परमेश्वर के स्वभाव की समग्रता को पूरी तरह समझाना असंभव है। तो फिर परमेश्वर के कार्य के एक चरण का परमेश्वर को पूरी तरह से व्यक्त करना और भी कितना असंभव होगा? वह देह में अपनी सामान्य मानवता की आड़ में कार्य करता है, उसे केवल उसकी दिव्यता की अभिव्यक्तियों से ही जाना जा सकता है, न कि उसके दैहिक आवरण से। परमेश्वर मनुष्य को अपने विभिन्न कार्यों के माध्यम से स्वयं को जानने देने के लिए देह में आता है। उसके कार्य के कोई भी दो चरण एक जैसे नहीं होते। केवल इसी प्रकार से मनुष्य, देह में परमेश्वर के कार्य का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है और इसे एक निश्चित दायरे तक सीमित नहीं कर सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार
कार्य का जो चरण यीशु ने संपन्न किया, उसने केवल “वचन परमेश्वर के साथ था” का सार ही पूरा किया : परमेश्वर का सत्य परमेश्वर के साथ था, और परमेश्वर का आत्मा देह के साथ था और उस देह से अभिन्न था। अर्थात, देहधारी परमेश्वर का देह परमेश्वर के आत्मा के साथ था, जो इस बात का अधिक बड़ा प्रमाण है कि देहधारी यीशु परमेश्वर का प्रथम देहधारण था। कार्य का यह चरण सटीक रूप से “वचन देहधारी हुआ है” के आंतरिक अर्थ को पूरा करता है, “वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था,” को और गहन अर्थ देता है और तुम्हें इन वचनों पर दृढ़ता से विश्वास कराता है कि “आरंभ में वचन था।” कहने का अर्थ है कि सृष्टि के निर्माण के समय परमेश्वर वचनों से संपन्न था, उसके वचन उसके साथ थे और उससे अभिन्न थे, और अंतिम युग में वह अपने वचनों का सामर्थ्य और अधिकार और भी अधिक प्रकट करता है, और मनुष्य को अपना सारा मार्ग देखने—अपने सभी वचन सुनने देता है। ऐसा है अंतिम युग का कार्य। तुम्हें इन चीजों को हर पहलू से जान लेना चाहिए। यह देह को जानने का प्रश्न नहीं है, बल्कि इस बात का है कि तुम देह और वचन को और देह और मार्ग को कैसे समझते हो। यही वह गवाही है, जो तुम्हें देनी चाहिए, जिसे हर किसी को जानना चाहिए। चूँकि यह दूसरे देहधारण का कार्य है—और यह आख़िरी बार है जब परमेश्वर देहधारी होता है; दूसरे शब्दों में, यह देहधारण के महत्व को पूरा कर देता है, देह में परमेश्वर के समस्त कार्य को पूरी तरह से कार्यान्वित और प्रकट करता है, और परमेश्वर के देह में होने के युग का अंत करता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (4)
इस चरण में देहधारी परमेश्वर चाहे कष्ट सह रहा हो या सेवकाई कर रहा हो, वह ऐसा केवल देहधारण के अर्थ को पूरा करने के लिए करता है, क्योंकि यह परमेश्वर का अंतिम देहधारण है। परमेश्वर केवल दो बार देहधारण कर सकता है। ऐसा तीसरी बार नहीं हो सकता। पहला देहधारी परमेश्वर पुरुष था; दूसरा स्त्री, तो मनुष्य के मन में परमेश्वर की देह की छवि पूरी हो चुकी है; इसके अलावा, दोनों देहधारणों ने पहले ही परमेश्वर के कार्य को देह में समाप्त कर लिया है। पहली बार, देहधारण के अर्थ को पूरा करने के लिए परमेश्वर के देहधारण ने सामान्य मानवता धारण की। इस बार उसने सामान्य मानवता भी धारण की है, किन्तु इस देहधारण का अर्थ भिन्न है : यह अधिक गहरा है, और उसका कार्य अधिक गहन महत्ता का है। परमेश्वर के पुनः देहधारी होने का कारण देहधारण के अर्थ को पूरा करना है। जब परमेश्वर इस चरण के कार्य को पूरी तरह से समाप्त कर लेगा, तो देहधारण का संपूर्ण अर्थ, अर्थात्, देह में परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाएगा, और फिर देह में करने के लिए और कार्य बाकी नहीं रह जाएगा। अर्थात्, अब से परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए फिर कभी देहधारण नहीं करेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार
दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने
(परमेश्वर के वचनों का चुनिंदा अध्याय)
परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के प्रत्येक चरण के अपने व्यावहारिक मायने हैं। जब यीशु का आगमन हुआ, तो वह पुरुष रूप में आया, लेकिन इस बार के आगमन में परमेश्वर, स्त्री रूप में आता है। इससे तुम देख सकते हो कि परमेश्वर द्वारा पुरुष और स्त्री, दोनों का ही सृजन उसके कार्य के काम आ सकता है, वह कोई लिंग-भेद नहीं करता। जब उसका आत्मा आता है, तो वह इच्छानुसार किसी भी देह को धारण कर सकता है और वही देह उसका प्रतिनिधित्व करती है; चाहे पुरुष हो या स्त्री जब तक यह उसका देहधारी शरीर है, यह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है। यदि यीशु जब आया तब वह स्त्री के रूप में प्रकट होता, यानी अगर पवित्र आत्मा द्वारा लड़के के बजाय लड़की गर्भ में आई होती तो भी कार्य का वह चरण उसी तरह से पूरा किया गया होता। और यदि ऐसा होता, तो कार्य का वर्तमान चरण पुरुष के द्वारा किया जाता, लेकिन कार्य उसी तरह से पूरा किया जाता। प्रत्येक चरण में किए गए कार्य का अपना अर्थ है; कार्य का कोई भी चरण दूसरे चरण को दोहराता नहीं है, लेकिन वे एक-दूसरे का विरोध भी नहीं करते हैं। उस समय जब यीशु कार्य कर रहा था, तो उसे इकलौता पुत्र कहा गया, और “पुत्र” का अर्थ है पुरुष लिंग। तो फिर इस चरण में इकलौते पुत्र का उल्लेख क्यों नहीं किया जाता है? क्योंकि कार्य की आवश्यकताओं ने लिंग में बदलाव को आवश्यक बना दिया जो यीशु के लिंग से भिन्न हो। परमेश्वर लिंग को लेकर कोई अंतर नहीं करता। वह अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करता है, और अपने कार्य को करते समय उस पर किसी तरह की कोई बाधा भी नहीं होती है, बल्कि वह विशेष रूप से स्वतंत्र होता है, परन्तु कार्य के प्रत्येक चरण के अपने ही व्यावहारिक मायने होते हैं। परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया, और यह स्वतः प्रमाणित है कि अंत के दिनों में उसका देहधारण अंतिम है। वह अपने सभी कर्मों का खुलासा करने के लिए आया है। यदि इस चरण में वह देहधारण नहीं करता और व्यक्तिगत रूप से कार्य नहीं करता जिसे मनुष्य देख सके, तो मनुष्य हमेशा के लिए यही धारणा बनाए रखता कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष है, स्त्री नहीं। इससे पहले, सब मानते थे कि परमेश्वर सिर्फ पुरुष ही हो सकता है, किसी स्त्री को परमेश्वर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सारी मानवजाति मानती थी कि पुरुषों का स्त्रियों पर अधिकार होता है। वे मानते थे कि किसी स्त्री के पास अधिकार नहीं हो सकता, अधिकार सिर्फ पुरुष के पास ही हो सकता है। वे तो यहाँ तक कहते थे कि पुरुष स्त्री का मुखिया होता है, स्त्री को पुरुष की आज्ञा का पालन करना चाहिए और वह उससे श्रेष्ठ नहीं हो सकती। अतीत में जब ऐसा कहा गया कि पुरुष स्त्री का मुखिया है, तो यह आदम और हव्वा के संबंध में कहा गया था जिन्हें सर्प के द्वारा छला गया था—न कि उस पुरुष और स्त्री के बारे में जिन्हें आरंभ में यहोवा ने रचा था। निस्संदेह, स्त्री को अपने पति का आज्ञापालन और उससे प्रेम करना चाहिए, उसी तरह पुरुष को अपने परिवार का भरण-पोषण करना आना चाहिए। ये वे नियम और संविधियाँ हैं जिन्हें यहोवा ने बनाया था, जिनका इंसान को धरती पर अपने जीवन में पालन करना चाहिए। यहोवा ने स्त्री से कहा, “तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।” उसने यह सिर्फ इसलिए कहा ताकि मानवजाति (अर्थात् पुरुष और स्त्री दोनों) यहोवा के प्रभुत्व में सामान्य जीवन जी सकें, ताकि मानवजाति के जीवन की एक संरचना हो और वह अपने व्यवस्थित क्रम में ही रहे। इसलिए यहोवा ने उपयुक्त नियम बनाए कि पुरुष और स्त्री को किस तरह व्यवहार करना चाहिए, हालाँकि यह पृथ्वी पर रहने वाले सारे सृजित प्राणियों के सन्दर्भ में था और देहधारी परमेश्वर के देह से कोई संबंध नहीं रखता था। परमेश्वर अपने ही सृजित प्राणियों के समान कैसे हो सकता था? उसके वचन सिर्फ उसके द्वारा रची गई मानवजाति के लिए थे; पुरुष और स्त्री के लिए उसने ये नियम इसलिए स्थापित किए थे ताकि मानवजाति सामान्य जीवन जी सके। आरंभ में, जब यहोवा ने मानवजाति का सृजन किया, तो उसने दो प्रकार के मनुष्य बनाए, पुरुष और स्त्री; इसलिए, उसके देहधारी देहों में पुरुष और स्त्री का भेद किया गया। उसने अपना कार्य आदम और हव्वा को बोले गए वचनों के आधार पर निर्धारित नहीं किया। दोनों बार जब उसने देहधारण किया तो यह पूरी तरह से उसकी तब की सोच के अनुसार निर्धारित किया गया जब उसने प्रारंभ में मानवजाति की रचना की थी; अर्थात्, उसने अपने दो देहधारणों के कार्य को उन पुरुष और स्त्री के आधार पर पूरा किया जिन्हें तब तक भ्रष्ट नहीं किया गया था। सर्प द्वारा छले गये आदम और हव्वा से कहे गए यहोवा के वचनों को यदि मनुष्य परमेश्वर के देहधारण के कार्य पर लागू करता है, तो क्या यीशु को अपनी पत्नी से वैसा ही प्रेम नहीं करना पड़ता जैसा कि उसे करना चाहिए था? इस तरह, क्या परमेश्वर तब भी परमेश्वर ही रहता? यदि ऐसा होता, तो क्या वह तब भी अपना कार्य पूरा कर पाता? यदि देहधारी परमेश्वर का स्त्री होना गलत है, तो क्या परमेश्वर का स्त्री की रचना करना भी भयंकर भूल नहीं थी? यदि लोग अब भी मानते हैं कि परमेश्वर का स्त्री के रूप में देहधारण करना गलत है, तो क्या यीशु का देहधारण, जिसने विवाह नहीं किया या अपनी पत्नी से प्रेम नहीं किया, ऐसी ही त्रुटि नहीं होती जैसा कि वर्तमान देहधारण है? चूँकि तुम यहोवा के द्वारा हव्वा को बोले गए वचनों को परमेश्वर के वर्तमान देहधारण के सत्य को मापने के लिए उपयोग करते हो, तब तो तुम्हें, अनुग्रह के युग में देहधारण करने वाले प्रभु यीशु को मापने के लिए यहोवा द्वारा आदम को बोले गए वचनों का उपयोग करना चाहिए। क्या वे दोनों एक ही नहीं हैं? चूँकि तुम प्रभु यीशु को उस पुरुष के हिसाब से मापते हो जिसे सर्प के द्वारा छला नहीं गया था, तब तुम आज के देहधारण के सत्य के बारे में उस स्त्री के हिसाब से नहीं माप सकते जिसे सर्प के द्वारा छला गया था। यह तो अनुचित होगा! परमेश्वर को इस प्रकार मापना यह साबित करता है कि तुममें कोई विवेक नहीं है। जब यहोवा ने दो बार देहधारण किया, तो उसके देहधारण का लिंग उन पुरुष और स्त्री से संबंधित था जिन्हें सर्प के द्वारा छला नहीं गया था; उसने दो बार ऐसे पुरुष और स्त्री के अनुरूप देहधारण किया जिन्हें सर्प के द्वारा नहीं छला गया था। ऐसा न सोचो कि यीशु का पुरुषत्व वैसा ही था जैसा कि आदम का था, जिसे सर्प के द्वारा छला गया था। उन दोनों का कोई संबंध नहीं है, दोनों भिन्न प्रकृति के पुरुष हैं। निश्चय ही ऐसा तो नहीं हो सकता कि यीशु का पुरुषत्व यह साबित करे कि वह सिर्फ स्त्रियों का ही मुखिया है पुरुषों का नहीं? क्या वह सभी यहूदियों (पुरुषों और स्त्रियों सहित) का राजा नहीं है? वह स्वयं परमेश्वर है, वह न सिर्फ स्त्री का मुखिया है बल्कि पुरुष का भी मुखिया है। वह सभी सृजित प्राणियों का प्रभु है, सभी सृजित प्राणियों का मुखिया है। तुम यीशु के पुरुषत्व को स्त्री के मुखिया का प्रतीक कैसे निर्धारित कर सकते हो? क्या यह ईशनिंदा नहीं है? यीशु ऐसा पुरुष है जिसे भ्रष्ट नहीं किया गया है। वह परमेश्वर है; वह मसीह है; वह प्रभु है। वह आदम की तरह का पुरुष कैसे हो सकता है जो भ्रष्ट हो गया था? यीशु वह देह है जिसे परमेश्वर के अति पवित्र आत्मा ने धारण किया हुआ है। तुम यह कैसे कह सकते हो कि वह ऐसा परमेश्वर है जो आदम के पुरुषत्व को धारण किए हुए है? उस स्थिति में, क्या परमेश्वर का समस्त कार्य गलत नहीं हो गया होता? क्या यहोवा ने यीशु के भीतर उस आदम के पुरुषत्व को समाविष्ट किया होगा जिसे सर्प द्वारा छला गया था? क्या वर्तमान देहधारण देहधारी परमेश्वर के कार्य का दूसरा उदाहरण नहीं है जो कि यीशु के लिंग से भिन्न परन्तु प्रकृति में यीशु के ही समान है? क्या तुम अब भी यह कहने का साहस करते हो कि देहधारी परमेश्वर स्त्री नहीं हो सकता क्योंकि स्त्री ही सबसे पहले सर्प के द्वारा छली गई थी? क्या तुम अब भी यह कहने की हिम्मत कर सकते हो कि चूँकि स्त्री सबसे अधिक अशुद्ध होती है और मानवजाति की भ्रष्टता का मूल है, इसलिए परमेश्वर संभवतः एक स्त्री के रूप में देह धारण नहीं कर सकता? क्या तुम अब भी यह कहते जाने की हिम्मत कर सकते हो कि “स्त्री हमेशा पुरुष का आज्ञापालन करेगी और कभी भी परमेश्वर को अभिव्यक्त नहीं कर सकती है या प्रत्यक्ष रूप से उसका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है”? अतीत में तो तुम नहीं समझे; क्या तुम अब भी परमेश्वर के कार्य की, विशेषकर परमेश्वर के देहधारी शरीर की निंदा कर सकते हो? यदि तुम यह स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, तो अच्छा होगा कि तुम अपनी जुबान पर लगाम लगाओ, ऐसा न हो कि तुम्हारी मूर्खता और अज्ञानता प्रकट हो जाए और तुम्हारी कुरूपता उजागर हो जाए। यह मत सोचो कि तुम सब कुछ समझते हो। मैं तुम्हें बता दूँ कि तुमने जो कुछ भी देखा और अनुभव किया है, वह मेरी प्रबंधन योजना के हजारवें हिस्से को समझने के लिए भी अपर्याप्त है। तो फिर तुम इतने अहंकार से पेश क्यों आते हो? तुम्हारी जरा-सी प्रतिभा और अल्पतम ज्ञान यीशु के कार्य में एक पल के लिए भी उपयोग किए जाने के लिए पर्याप्त नहीं है! तुम्हें वास्तव में कितना अनुभव है? तुमने अपने जीवन में जो कुछ देखा और सुना है और जिसकी तुमने कल्पना की है, वह मेरे एक क्षण के कार्य से भी कम है! तुम्हारे लिए यही अच्छा होगा कि तुम आलोचक बनकर दोष मत ढूँढ़ो। चाहे तुम कितने भी अहंकारी हो, फिर भी तुम एक ऐसे सृजित प्राणी से बढ़कर नहीं हो जो एक चींटी के बराबर भी नहीं है! तुम्हारे भीतर उतना भी नहीं है जितना एक चींटी के भीतर होता है! यह मत सोचो कि सिर्फ इसलिए कि तुमने बहुत अनुभव कर लिया है और वरिष्ठ हो गए हो, तुम बेलगाम ढंग से हाथ नचाते हुए बड़ी-बड़ी बातें कर सकते हो। क्या तुम्हारे पास यह अनुभव और यह वरिष्ठता उन वचनों के कारण नहीं है जो मैंने कहे हैं? क्या तुम यह मानते हो कि वे तुम्हारे परिश्रम और कड़ी मेहनत द्वारा अर्जित किए गए हैं? आज, तुम देखते हो कि मैंने देहधारण किया है, और परिणामस्वरूप तुम्हारे अंदर ऐसी प्रचुर अवधारणाएँ हैं, और उनसे निकली धारणाओं का कोई अंत नहीं है। यदि मेरा देहधारण न होता, तो तुम्हारे अंदर कितनी भी असाधारण प्रतिभाएँ होतीं, तब भी तुम्हारे अंदर इतनी अवधारणाएँ नहीं होतीं; और क्या तुम्हारी धारणाएँ इन्हीं से नहीं उभरतीं? यदि यीशु पहली बार देहधारण नहीं करता, तो क्या तुम देहधारण के बारे में जानते? क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि पहले देहधारण से ही तुमने परमेश्वर के देहधारी होने के बारे में जान लिया था, जिसके कारण तुम ढिठाई से दूसरे देहधारण को मापने की कोशिश करते हो? तुम एक समर्पित अनुयायी बनने के बजाय इसकी जाँच-पड़ताल क्यों कर रहे हो? जब तुमने इस धारा में प्रवेश कर लिया है और देहधारी परमेश्वर के सामने आ गए हो, तो क्या वह तुम्हें परमेश्वर की पड़ताल करने देगा? तुम अपने परिवार के इतिहास की पड़ताल कर सकते हो, परन्तु यदि तुम परमेश्वर के “परिवार के इतिहास” की पड़ताल करते हो, तो क्या आज का परमेश्वर तुम्हें ऐसा करने देगा? क्या तुम अंधे नहीं हो? क्या तुम स्वयं तिरस्कार के भागी नहीं बन रहे हो?
यदि मात्र यीशु का कार्य किया गया होता और अंत के दिनों में इस चरण का कार्य इसका पूरक न होता, तो मनुष्य हमेशा के लिए इस अवधारणा से चिपका रहता कि केवल यीशु ही परमेश्वर का एकमात्र पुत्र है, अर्थात्, परमेश्वर का सिर्फ एक ही पुत्र है, यदि उसके बाद कोई किसी दूसरे नाम से आता है तो वह परमेश्वर का एकमात्र पुत्र नहीं होगा, स्वयं परमेश्वर तो बिल्कुल भी नहीं होगा। मनुष्य की यह धारणा है कि जो कोई भी पापबलि बनता है या जो परमेश्वर की ओर से सत्ता हाथ में लेता है और समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाता है, वही परमेश्वर का एकमात्र पुत्र है। कुछ ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि यदि आने वाला कोई पुरुष है, तो उसे ही परमेश्वर का एकमात्र पुत्र और परमेश्वर का प्रतिनिधि समझा जा सकता है। कुछ तो यहाँ तक कहते हैं कि यीशु यहोवा का पुत्र है, उसका एकमात्र पुत्र है। क्या ये मनुष्य की बेहद गंभीर धारणाएँ नहीं हैं? यदि परमेश्वर कार्य का यह चरण करने के लिए अंतिम युग में नहीं आता, तो जब परमेश्वर की बात आती तो समस्त मानवजाति एक काली परछाईं में ढकी होती। यदि ऐसा होता, तो पुरुष अपने आपको स्त्री से श्रेष्ठ समझता, और स्त्रियाँ कभी अपना सिर ऊँचा नहीं उठा पातीं, और तब एक भी स्त्री को बचाना संभव न होता। लोग हमेशा यही मानते हैं कि परमेश्वर पुरुष है, वह हमेशा से स्त्री से घृणा करता रहा है और कभी उसका उद्धार नहीं करेगा। यदि ऐसा होता, तो क्या यह सच नहीं है कि यहोवा द्वारा रची गयी सभी स्त्रियाँ, जो भ्रष्ट भी की जा चुकी हैं, उन्हें कभी भी बचाए जाने का अवसर न मिलता? तो क्या यहोवा के लिए स्त्री यानी हव्वा की रचना करना व्यर्थ नहीं हो गया होता? और क्या स्त्री अनंतकाल के लिए नष्ट नहीं हो जाती? इसलिए, अंत के दिनों में कार्य का यह चरण समस्त मानवजाति को बचाने के लिए किया जाता है, न कि सिर्फ स्त्री को। यदि कोई यह सोचता है कि अगर परमेश्वर ने स्त्री के रूप में देहधारण किया होता, तो वह मात्र स्त्रियों को बचाने के लिए होता, तो वह व्यक्ति और भी बड़ा मूर्ख होगा!
आज के कार्य ने अनुग्रह के युग के कार्य को आगे बढ़ाया है; अर्थात्, समस्त छह हजार सालों की प्रबंधन योजना का कार्य आगे बढ़ा है। यद्यपि अनुग्रह का युग समाप्त हो गया है, किन्तु परमेश्वर के कार्य ने अधिक और गहरी प्रगति की है। मैं क्यों बार-बार कहता हूँ कि कार्य का यह चरण अनुग्रह के युग और व्यवस्था के युग पर आधारित है? दूसरी तरह से कहा जाए तो आज का कार्य अनुग्रह के युग में किए गए कार्य की निरंतरता और व्यवस्था के युग में किए गए कार्य की प्रगति है। तीनों चरण आपस में घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं और श्रृंखला की हर कड़ी निकटता से अगली कड़ी से जुड़ी है। मैं यह भी क्यों कहता हूँ कि कार्य का यह चरण यीशु द्वारा किए गए कार्य पर आधारित है? मान लो, यह चरण यीशु द्वारा किए गए कार्य पर आधारित न होता, तो फिर इस चरण में क्रूस पर चढ़ाए जाने का कार्य फिर से करना होता, और पहले किए गए छुटकारे के कार्य को फिर से करना पड़ता। यह अर्थहीन होता। इसलिए, ऐसा नहीं है कि कार्य पूरी तरह समाप्त हो चुका है, बल्कि युग आगे बढ़ गया है और कार्य को पहले से अधिक ऊँचा कर दिया गया है। यह कहा जा सकता है कि कार्य का यह चरण व्यवस्था के युग की नींव और यीशु के कार्य की चट्टान पर निर्मित है। परमेश्वर का कार्य चरण-दर-चरण निर्मित किया जाता है, और यह चरण कोई नई शुरुआत नहीं है। सिर्फ तीनों चरणों के कार्य के संयोजन को ही छह हजार सालों की प्रबंधन योजना माना जा सकता है। इस चरण का कार्य अनुग्रह के युग के कार्य की नींव पर किया जाता है। यदि कार्य के ये दो चरण जुड़े न होते, तो इस चरण में क्रूस पर चढ़ाए जाने का कार्य क्यों नहीं दोहराया गया? मैं मनुष्य के पापों को अपने ऊपर क्यों नहीं लेता हूँ, इसके बजाय सीधे उनका न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने क्यों आता हूँ? अगर मनुष्य का न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने का मेरा कार्य क्रूसीकरण के बाद नहीं होता—इस तथ्य के साथ कि अब मेरा आगमन पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आए बिना हुआ है—तो मैं मनुष्य का न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने के योग्य नहीं होता। मैं यीशु से एकाकार हूँ, बस इसी कारण मैं प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य को ताड़ना देने और उसका न्याय करने के लिए आता हूँ। कार्य का यह चरण पूरी तरह से पिछले चरण पर ही निर्मित है। यही कारण है कि सिर्फ ऐसा कार्य ही चरण-दर-चरण मनुष्य का उद्धार कर सकता है। यीशु और मैं एक ही पवित्रात्मा से आते हैं। यद्यपि हमारी देह एक-दूसरे से जुड़ी नहीं है, किन्तु हमारा आत्मा एक ही है; यद्यपि हमारे कार्य की विषयवस्तु और हम जो कार्य करते हैं, वे एक नहीं हैं, तब भी हमारा सार एक समान है; हमारी देह भिन्न रूप धारण करती हैं, लेकिन यह युग में परिवर्तन और हमारे कार्य की भिन्न आवश्यकताओं के कारण है; हमारी सेवकाई एक जैसी नहीं है, इसलिए जो कार्य हम आगे लाते हैं और जिस स्वभाव को हम मनुष्य पर प्रकट करते हैं, वे भी भिन्न हैं। यही कारण है कि आज मनुष्य जो देखता और समझता है वह अतीत के समान नहीं है; ऐसा युग में बदलाव के कारण है। यद्यपि उनके देह के लिंग और रूप भिन्न-भिन्न हैं, और वे दोनों एक ही परिवार में नहीं जन्मे हैं, उसी समयावधि में तो बिल्कुल नहीं, किन्तु फिर भी उनके आत्मा एक ही हैं। यद्यपि उनके देह किसी प्रकार के रक्त या भौतिक संबंध साझा नहीं करते, पर इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे भिन्न-भिन्न समयावधियों में परमेश्वर के देहधारी शरीर हैं। यह एक निर्विवाद सत्य है कि वे परमेश्वर के द्वारा धारित देह हैं। यद्यपि वे रक्त से संबंधित नहीं हैं या एक ही भाषा साझा नहीं करते (एक पुरुष था जो यहूदियों की भाषा बोलता था और दूसरी स्त्री है जो सिर्फ चीनी भाषा बोलती है)। इन्हीं कारणों से उन्हें जो कार्य करना चाहिए, उसे वे भिन्न-भिन्न देशों में, और साथ ही भिन्न-भिन्न समयावधियों में करते हैं। इस तथ्य के बावजूद वे एक ही आत्मा के हैं—यानी उनका सार एक ही है—लेकिन उनकी देह के बाहरी आवरणों में कोई समानता नहीं है। बस उनकी मानवता समान है, परन्तु जहाँ तक उनकी देह के बाहरी स्वरूप और उनके जन्म की परिस्थितियों की बात है, वे दोनों समान नहीं हैं। इन चीजों का उनके अपने-अपने कार्य या उनके बारे में मनुष्य का जो ज्ञान है, उस पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि अंतिम विश्लेषण में, वे एक ही आत्मा के हैं और उन्हें कोई अलग नहीं कर सकता। यद्यपि उनका रक्त-संबंध नहीं है, किन्तु उनका सम्पूर्ण अस्तित्व उनके आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, जो उन्हें अलग-अलग समय में अलग-अलग कार्य प्राप्त करने में सक्षम बनाता है और उनकी देह के अलग-अलग रक्त-संबंध हैं। उदाहरण के लिए, यहोवा का आत्मा यीशु के आत्मा का पिता नहीं है, यीशु का आत्मा यहोवा के आत्मा का पुत्र नहीं है : वे एक ही और समान आत्मा के हैं। उसी तरह, आज के देहधारी परमेश्वर और यीशु में कोई रक्त-संबंध नहीं है, लेकिन वे हैं एक ही—क्योंकि उनके आत्मा एक ही हैं। परमेश्वर दया और करुणा का, और साथ ही धार्मिक न्याय का, मनुष्य की ताड़ना का, और मनुष्य को श्राप देने का कार्य कर सकता है; अंत में, वह संसार को नष्ट करने और दुष्टों को सज़ा देने का कार्य कर सकता है। क्या वह यह सब स्वयं नहीं करता? क्या यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता नहीं है? उसने मनुष्य के लिए व्यवस्थाएँ निर्धारित कीं और आज्ञाएँ जारी कीं, वह आरंभिक इस्राएलियों की पृथ्वी पर उनके जीवन-यापन में अगुआई करने में भी समर्थ था और मंदिर व वेदियाँ बनाने में उनका मार्गदर्शन करने, और समस्त इस्राएलियों को अपने प्रभुत्व में रखने में भी समर्थ था। अपने अधिकार के कारण, दो हजार वर्षों के दौरान वह इस्राएल के लोगों के साथ पृथ्वी पर रहा, इस्राएलियों ने उसके खिलाफ विद्रोह करने का साहस नहीं किया; और वे सब यहोवा का भय मानते और उसकी आज्ञाओं का पालन करते थे। उसके अधिकार और उसकी सर्वशक्तिमत्ता के कारण किया जाने वाला कार्य ऐसा था। तब अनुग्रह के युग में, यीशु संपूर्ण पतित मानवजाति (सिर्फ इस्राएलियों को नहीं) को छुटकारा दिलाने के लिए आया। उसने मनुष्य के प्रति दया और प्रेममयी करुणा दिखायी। मनुष्य ने अनुग्रह के युग में जिस यीशु को देखा वह मनुष्य के प्रति प्रेममयी करुणा से भरा हुआ और हमेशा ही प्रेममय था, क्योंकि वह मनुष्य को पाप से बचाने के लिए आया था। उसने लोगों के पापों को क्षमा किया, फिर उसके क्रूस पर चढ़ने ने मानवजाति को पूरी तरह पाप से छुटकारा दिला दिया। उस दौरान, परमेश्वर मनुष्य के सामने दया और प्रेममयी करुणा के साथ प्रकट हुआ; अर्थात्, वह मनुष्य के लिए पापबलि बना और मनुष्य के पापों के लिए सूली पर चढ़ाया गया ताकि उन्हें हमेशा के लिए माफ किया जा सके। वह दयालु, करुणामय, सहिष्णु और प्रेममय था। और वे सब जिन्होंने अनुग्रह के युग में यीशु का अनुसरण किया था, उन्होंने भी सारी चीजों में सहिष्णु और प्रेममय बनने का प्रयास किया। उन्होंने लम्बे समय तक कष्ट सहे, यहाँ तक कि जब उन्हें पीटा गया, धिक्कारा गया या उन्हें पत्थर मारे गए, तो भी उन्होंने पलटकर वार नहीं किया। परन्तु इस अंतिम चरण में ऐसा नहीं हो सकता। उदाहारण के लिए, भले ही यीशु और यहोवा का आत्मा एक ही था, लेकिन उनका कार्य पूरी तरह एक-सा नहीं था। यहोवा के कार्य ने युग का अंत नहीं किया बल्कि युग का मार्गदर्शन किया, पृथ्वी पर मानवजाति के जीवन का सूत्रपात किया, और आज का कार्य अन्यजाति के राष्ट्रों में गहराई से भ्रष्ट किए गए मनुष्यों को जीतने के लिए और न केवल चीन में परमेश्वर के चुने हुए लोगों की, बल्कि समस्त विश्व और मानवजाति की अगुआई करने के लिए है। तुम्हें ऐसा लग सकता है कि यह कार्य सिर्फ़ चीन में हो रहा है, परन्तु यह पहले से ही विदेशों में फैलना शुरू हो गया है। ऐसा क्यों है कि चीन के बाहर के लोग बार-बार सच्चे मार्ग को खोजते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि आत्मा ने अपना कार्य पहले से ही शुरू कर दिया है, और ये वचन अब संपूर्ण ब्रह्मांड के लोगों के लिए हैं। इसके साथ, आधा कार्य पहले ही प्रगति पर है। संसार के सृजन से लेकर आज तक, परमेश्वर के आत्मा ने इस महान कार्य को कार्यान्वित कर दिया है, इसके अलावा, उसने विभिन्न युगों के दौरान और भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न-भिन्न कार्य किए हैं। प्रत्येक युग के लोग उसके एक भिन्न स्वभाव को देखते हैं, जो कि उस भिन्न कार्य के माध्यम से सहज रूप से प्रकट होता है जिसे वह करता है। वह दया और प्रेममयी करुणा से भरा हुआ एक परमेश्वर है; वह मनुष्य के लिए पापबलि है और उसकी चरवाही करने वाला है, लेकिन वह मनुष्य का न्याय, ताड़ना, और श्राप भी है। वह पृथ्वी पर दो हजार साल तक जीवन-यापन करने में मनुष्य की अगुआई कर सकता और भ्रष्ट मानवजाति को पाप से छुटकारा भी दिला सकता था। आज, वह मानवजाति को जीतने में भी सक्षम है जो उससे अनजान है और उसे अपने प्रभुत्व के अधीन दंडवत कराने और अपने सामने पूरी तरह से समर्पण कराने में सक्षम है। अंत में, वह ब्रह्मांड के लोगों के अंदर जो कुछ भी अशुद्ध और अधार्मिक है उसे जलाकर भस्म कर देगा, ताकि उन्हें यह दिखाए कि वह न सिर्फ करुणामय और प्रेमपूर्ण परमेश्वर है, न सिर्फ बुद्धि और चमत्कार का परमेश्वर है, न सिर्फ पवित्र परमेश्वर है, बल्कि वह मनुष्य का न्याय करने वाला परमेश्वर भी है। मानवजाति के बीच दुष्टजनों के लिए, वह प्रज्ज्वलन, न्याय और दण्ड है; जिन्हें पूर्ण किया जाना है उनके लिए, वह क्लेश, शोधन, परीक्षण के साथ-साथ आराम, संपोषण, वचनों का पोषण और काट-छाँट है। और जिन्हें हटाया गया है उनके लिए, वह सज़ा और प्रतिशोध भी है। बताओ, परमेश्वर सर्वशक्तिमान है या नहीं? ऐसा नहीं है कि वह केवल सूली पर ही चढ़ सकता है, जैसा कि तुम्हें लगता है, बल्कि वह सभी कार्य कर सकता है। परमेश्वर के बारे में तुम्हारी सोच बहुत तुच्छ है! क्या तुम्हें लगता है कि वह बस सूली पर चढ़कर समस्त मानवजाति को छुटकारा ही दिला सकता है और बात खत्म? उसके बाद, तुम स्वर्ग में उसके पीछे जाओगे, जीवन के वृक्ष से फल खाओगे और जीवन की नदी से जल पियोगे? ... क्या यह इतना आसान हो सकता है? अच्छा बताओ, तुमने क्या हासिल किया है? क्या तुममें यीशु का जीवन है? यह सच है कि उसने तुम्हें छुटकारा दिलाया था, लेकिन सूली पर चढ़ना स्वयं यीशु का कार्य था। एक मनुष्य के रूप में तुमने कौन-सा कर्तव्य निभाया है? तुममें सिर्फ दिखावे की धर्मनिष्ठा है परन्तु तुम उसके मार्ग को नहीं समझते। क्या ऐसे ही तुम उसे व्यक्त करते हो? यदि तुमने परमेश्वर का जीवन प्राप्त नहीं किया है या उसके धार्मिक स्वभाव की समग्रता को नहीं देखा है, तो तुम ऐसे व्यक्ति होने का दावा नहीं कर सकते जिसमें जीवन है, और तुम स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश करने योग्य नहीं हो।
परमेश्वर न केवल आत्मा है बल्कि वह देहधारण भी कर सकता है। इसके अलावा, वह महिमा का एक शरीर है। यीशु को यद्यपि तुम लोगों ने नहीं देखा है, पर इस्राएलियों ने यानी उस समय के यहूदियों ने उसे देखा था। पहले वह एक देह था, परन्तु उसे सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद, वह महिमावान शरीर बन गया। वह व्यापक आत्मा है और सभी स्थानों में कार्य कर सकता है। वह यहोवा, यीशु या मसीहा हो सकता है; अंत में, वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर भी बन सकता है। वह धार्मिकता, न्याय, और ताड़ना है; वह श्राप और क्रोध है; परन्तु वह करुणा और प्रेममयी दया भी है। उसके द्वारा किया गया समस्त कार्य उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है। तुम्हें वह किस प्रकार का परमेश्वर लगता है? तुम उसकी व्याख्या नहीं कर सकते। यदि तुम सच में उसकी व्याख्या नहीं कर सकते, तो तुम्हें परमेश्वर के बारे में फैसला नहीं सुनाना चाहिए। यह फैसला मत सुनाओ कि परमेश्वर हमेशा के लिए करुणा और प्रेममयी दया का ही परमेश्वर है, ऐसा इसलिए भी मत करो क्योंकि परमेश्वर ने एक चरण में छुटकारे का कार्य किया। क्या तुम निश्चित हो सकते हो कि वह मात्र दयालु और प्रेमपूर्ण परमेश्वर है? यदि वह केवल एक दयालु और प्रेममय परमेश्वर है, तो वह अंत के दिनों में युग का अंत क्यों करेगा? वह बहुत-सी विपत्तियाँ क्यों भेजेगा? लोगों की धारणाओं और विचारों के अनुसार परमेश्वर को बिल्कुल अंत तक दयालु और प्रेममय रहना चाहिए, ताकि मानवजाति के आखिरी सदस्य को भी बचाया जा सके। लेकिन वह अंत के दिनों में इस दुष्ट मानवजाति को नष्ट करने के लिए, जो परमेश्वर को अपना दुश्मन समझती है, भूकंप, महामारी, सूखे जैसी बड़ी आपदाएँ क्यों भेजता है? वह मनुष्य को इन विपत्तियों से पीड़ित क्यों होने देता है? तुम लोगों में से किसी की भी यह कहने की हिम्मत नहीं कि वह किस प्रकार का परमेश्वर है, और न ही कोई इस बात को समझा सकता है। क्या तुम यह कहने की हिम्मत करते हो कि वह आत्मा है? क्या तुम यह कहने का साहस रखते हो कि वह यीशु का ही देह है? और क्या तुम यह कहने की हिम्मत करते हो कि वह ऐसा परमेश्वर है जिसे मनुष्य की खातिर हमेशा सलीब पर चढ़ाया जाएगा?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य