6. सच्चे और झूठे अगुवों और सच्चे और झूठे चरवाहों के बीच विभेदन

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मानक स्तर के कर्मी का कार्य लोगों को सही मार्ग पर लाने और सत्य में ज्यादा गहराई से प्रवेश करने में मदद कर सकता है। उसका कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है, वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न-भिन्न हो सकता है और वह विनियमों से बँधा हुआ नहीं होता, उन्हें मुक्ति और स्वतंत्रता, जीवन में क्रमिक विकास और सत्य में उत्तरोत्तर अधिक गहन प्रवेश करने की क्षमता प्रदान करता है। जो कर्मी मानक स्तर का नहीं है उसका कार्य इससे कहीं दूर होता है। उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल विनियमों के भीतर ला सकता है और लोगों से उसकी अपेक्षाएँ हर व्यक्ति के लिए भिन्न-भिन्न नहीं होतीं; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता। इस प्रकार के कार्य में बहुत अधिक विनियम और बहुत अधिक सिद्धांत होते हैं और वह लोगों को वास्तविकता में नहीं ला सकता, न ही वह उन्हें जीवन में विकास के सामान्य अभ्यास में ला सकता है। वह लोगों को केवल कुछ बेकार विनियमों का पालन करने में ही सक्षम बना सकता है। ऐसा मार्गदर्शन लोगों को भटका सकता है। वह तुम्हें अपने जैसा बनाने में तुम्हारी अगुआई करता है, उसके पास जो है और जो वह है उसमें ला सकता है। इस बात का भेद पहचानने के लिए कि अगुआ मानक स्तर के हैं या नहीं, इसकी कुंजी यह देखना है कि अगुआ दूसरों को किस मार्ग पर ले जाते हैं और उनके कार्य के परिणाम क्या हैं, और यह भी देखना चाहिए कि अनुयायी सत्य के अनुसार सिद्धांत पाते हैं या नहीं और अपने रूपांतरण के लिए उपयुक्त अभ्यास के तरीके प्राप्त करते हैं या नहीं। तुममें विभिन्न प्रकार के लोगों के विभिन्न कार्यों के बीच भेद पहचानने की क्षमता होनी चाहिए; तुम्हें भ्रमित अनुयायी नहीं बनना चाहिए। यह लोगों के प्रवेश के मामले पर प्रभाव डालता है। यदि तुम यह भेद पहचानने में असमर्थ हो कि किस व्यक्ति की अगुआई में मार्ग है और किसकी अगुआई में नहीं, तो तुम आसानी से गुमराह हो जाओगे। इस सबका तुम्हारे अपने जीवन के साथ सीधा संबंध है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

तुम्हें उन अनेक स्थितियों की समझ होनी चाहिए, जिनमें लोग तब होते हैं, जब पवित्र आत्मा उन पर काम करता है। विशेषकर, जो लोग परमेश्वर की सेवा में समन्वय करते हैं, उन्हें इन स्थितियों की और भी गहरी समझ होनी चाहिए। यदि तुम बहुत सारे अनुभवों या प्रवेश पाने के कई तरीकों के बारे में केवल बात ही करते हो, तो यह दिखाता है कि तुम्हारा अनुभव बहुत ज्यादा एकतरफा है। अपनी वास्तविक अवस्था को जाने बिना और सत्य सिद्धांतों को समझे बिना स्वभाव में परिवर्तन हासिल करना संभव नहीं है। पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को जाने बिना या उसके फल को समझे बिना तुम्हारे लिए बुरी आत्माओं के कार्य को पहचानना मुश्किल होगा। तुम्हें बुरी आत्माओं के कार्य के साथ-साथ लोगों की धारणाओं को बेनकाब कर सीधे मुद्दे के केंद्र में पैठना चाहिए; तुम्हें लोगों के अभ्यास में आने वाले अनेक भटकावों या लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने में होने वाली समस्याओं को भी इंगित करना चाहिए, ताकि वे उन्हें पहचान सकें। कम से कम, तुम्हें उन्हें नकारात्मक या निष्क्रिय महसूस नहीं कराना चाहिए। हालाँकि, तुम्हें उन कठिनाइयों को समझना चाहिए, जो अधिकांश लोगों के लिए समान रूप से मौजूद हैं, तुम्हें विवेकहीन नहीं होना चाहिए या “भैंस के आगे बीन बजाने” की कोशिश नहीं करनी चाहिए; यह मूर्खतापूर्ण व्यवहार है। लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली अनेक कठिनाइयों को हल करने के लिए तुम्हें पहले पवित्र आत्मा के काम की गतिशीलता को समझना चाहिए; तुम्हें समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा विभिन्न लोगों पर कैसे काम करता है, तुम्हें लोगों के सामने आने वाली कठिनाइयों और उनकी कमियों को समझना चाहिए, तुम्हें समस्या के मूल की असलियत को समझना चाहिए और बिना विचलित हुए या बिना कोई त्रुटि किए, समस्या के स्रोत पर पहुँचना चाहिए। केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति होगे जो परमेश्वर की सेवा में सहयोग करने के संदर्भ में मानक स्तर का है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो चरवाहा उपयोग के लिए उपयुक्त है उसके पास क्या होना चाहिए

जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, वे परमेश्वर के अंतरंग होने चाहिए, वे परमेश्वर को प्रिय होने चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के प्रति परम निष्ठा रखने में सक्षम होना चाहिए। चाहे एकांत में हो या सार्वजनिक रूप से, परमेश्वर की उपस्थिति में तुम्हारे कार्य उसे प्रसन्न करने में सक्षम होने चाहिए और वे सभी उसके सामने अडिग रहने में सक्षम होने चाहिए; दूसरे लोग तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार क्यों न करें, तुम्हें परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील होने के लिए हमेशा उस मार्ग पर चलना चाहिए जिस पर तुम्हारा चलना अपेक्षित है। केवल इसी तरह के लोग परमेश्वर के अंतरंग होते हैं। परमेश्वर के अंतरंग सीधे उसकी सेवा करने में इसलिए समर्थ हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर का महान आदेश और परमेश्वर का बोझ दिया गया है, वे परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय बनाने और परमेश्वर के बोझ को अपने बोझ की तरह लेने में समर्थ हैं और वे अपने भविष्य की संभावनाओं को होने वाले लाभ या हानि पर कोई विचार नहीं करते—यहाँ तक कि जब संभावना हो कि उनके पास कुछ नहीं होगा और उन्हें कुछ भी नहीं मिलेगा, तब भी वे हमेशा एक परमेश्वर-प्रेमी हृदय से परमेश्वर में विश्वास करते हैं। और इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अंतरंग होता है। परमेश्वर के अंतरंग उसके विश्वासपात्र भी हैं; केवल परमेश्वर के विश्वासपात्र ही उसकी तात्कालिकता की भावना और उसके विचार साझा कर सकते हैं, और यद्यपि उनकी देह पीड़ायुक्त और कमजोर होती है, फिर भी वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए पीड़ा सह पाते हैं और उस चीज को छोड़ पाते हैं जिससे वे प्रेम करते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को और अधिक बोझ देता है और जो कुछ परमेश्वर करना चाहता है, वह ऐसे लोगों की गवाही से प्रकट होता है। इस प्रकार, ये लोग परमेश्वर को प्रिय हैं, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की सेवा करते हैं और जो उसके इरादों के अनुरूप होते हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के साथ राजाओं की तरह शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सेवा कैसे करें

वे हमेशा परमेश्वर के नए कार्य के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हैं; उनमें कभी भी समर्पण करने की जरा-सी भी प्रवृत्ति नहीं होती, न ही उन्होंने कभी खुशी-खुशी समर्पण किया है या खुद को विनम्र किया है। दूसरों के सामने, वे सबसे अधिक अभिमानी होते हैं और वे कभी किसी के आगे समर्पण नहीं करते। परमेश्वर के सामने, वे खुद को ‘धर्मोपदेशों’ का प्रचार करने में सर्वश्रेष्ठ और दूसरों पर कार्य करने में सबसे कुशल मानते हैं। वे अपने पास मौजूद ‘खजानों’ को कभी नहीं छोड़ते; बल्कि वे उन्हें पारिवारिक विरासत मानते हैं जिनकी पूजा की जानी चाहिए और जिनके बारे में दूसरों को प्रचार किया जाना चाहिए; वे उनका उपयोग उन बुद्धुओं को व्याख्यान देने के लिए करते हैं जो उन्हें पूजते हैं। कलीसिया में वास्तव में ऐसे कुछ लोग हैं। यह कहा जा सकता है कि वे ‘अदम्य नायकों का एक राजवंश’ हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परमेश्वर के घर में डेरा डाले रहते हैं। वे ‘धर्मोपदेशों’ (सिद्धांतों) का प्रचार करने को अपना सर्वोच्च कर्तव्य मानते हैं। साल-दर-साल, पीढ़ी-दर-पीढ़ी, वे अपने ‘पावन और अलंघनीय’ कर्तव्य को सख्ती से पूरा करते रहते हैं। कोई भी उन्हें छूने की हिम्मत नहीं करता; एक भी व्यक्ति खुले तौर पर उनकी निंदा करने की हिम्मत नहीं करता। वे परमेश्वर के घर में ‘राजा’ बन जाते हैं, युग-युग तक दूसरों पर अत्याचार करते हुए निरंकुश होकर कहर ढाते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाएँगे

जो कार्य मनुष्य के मन में होता है उसे वह बहुत आसानी से प्राप्त कर सकता है। उदाहरण के लिए, धार्मिक संसार के पादरी और अगुवे अपना कार्य करने के लिए अपनी खूबियों और पदों पर भरोसा रखते हैं। जो लोग लम्बे समय तक उनका अनुसरण करते हैं वे उनकी खूबियों से संक्रमित होकर उनके अस्तित्व के कुछ हिस्से से प्रभावित हो जाते हैं। वे लोगों की खूबी, योग्यता और ज्ञान पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वे अलौकिक चीजों और अनेक गहन और अवास्तविक सिद्धांतों पर ध्यान देते हैं (निस्संदेह, ये गहन सिद्धांत अप्राप्य हैं)। वे लोगों के स्वभावों में बदलाव पर नहीं, बल्कि लोगों की उपदेश देने और कार्य करने की क्षमताओं को प्रशिक्षित करने और उनका बाइबल और आध्यात्मिक सिद्धांतों संबंधी ज्ञान सुधारने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वे इस बात पर ध्यान केंद्रित नहीं करते कि लोग कितना सत्य समझते हैं या उनके जीवन स्वभाव कितना बदलते हैं और वे लोगों के भ्रष्ट सार से कोई सरोकार नहीं रखते, वे लोगों की सामान्य और असामान्य अवस्थाओं से परिचित होने की कोशिश तो बिल्कुल नहीं करते। वे लोगों की धारणाओं का विरोध नहीं करते, न ही वे उनकी धारणाएँ उजागर करते हैं, वे लोगों की कमियों या भ्रष्टता के लिए उनकी काट-छाँट तो बिल्कुल भी नहीं करते। उनका अनुसरण करने वाले अधिकांश लोग अपनी खूबी से सेवा करते हैं, और जो कुछ वे प्रदर्शित करते हैं, वह धार्मिक धारणाएँ और धर्म-संबंधी सिद्धांत होते हैं, जो वास्तविकता से कोसों दूर होते हैं और उन्हें जीवन प्राप्त करने में बिल्कुल भी मदद नहीं कर सकते। वास्तव में, उनके कार्य का सार प्रतिभाशाली व्यक्तियों को विकसित करना, ऐसे व्यक्ति को, जिसके पास कुछ नहीं होता, एक असाधारण सेमेनरी स्नातक के रूप में विकसित करना है जो बाद में कार्य और अगुआई करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

परमेश्वर की सेवा करना कोई सरल कार्य नहीं है। जिनका भ्रष्ट स्वभाव अपरिवर्तित रहता है, वे परमेश्वर की सेवा कभी नहीं कर सकते हैं। यदि परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम्हारे स्वभाव का न्याय नहीं हुआ है और उसे ताड़ित नहीं किया गया है, तो तुम्हारा स्वभाव अभी भी शैतान का प्रतिनिधित्व करता है जो यह प्रमाणित करता है कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारी सेवा बस तुम्हारा अपने अच्छे इरादों को अर्पित करना है, कि तुम्हारी सेवा तुम्हारी शैतानी प्रकृति पर आधारित है। तुम परमेश्वर की सेवा अपने स्वाभाविक चरित्र से और अपनी व्यक्तिगत पसंदगियों के अनुसार करते हो। यही नहीं, तुम्हें हमेशा यह लगता है कि तुम जिन चीजों को करने के इच्छुक हो वे परमेश्वर को पसंद हैं, और तुम जिन चीजों को नहीं करना चाहते हो वे परमेश्वर के लिए घृणित हैं, और तुम पूर्णतः अपनी पसंदगियों के अनुसार कार्य करते हो। क्या इसे परमेश्वर की सेवा करना कह सकते हैं? अंततः तुम्हारे जीवन स्वभाव में रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं आएगा; बल्कि तुम्हारी सेवा इसे और भी अधिक जिद्दी बना देगी और इससे तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव गहराई तक जड़ें जमा लेगा। इस तरह, परमेश्वर की सेवा के बारे में तुम्हारे अंदर ऐसे नियम बन जाएंगे जो मुख्यतः तुम्हारे अपने चरित्र पर आधारित होते हैं और ऐसा अनुभव अर्जित होगा जो तुम्हारे अपने स्वभाव के अनुसार की गई तुम्हारी सेवा से प्राप्त होता है। ये मनुष्य के अनुभव और सबक हैं। यह मनुष्य के सांसारिक आचरण का फलसफा है। इस तरह के लोग फरीसी और धार्मिक अधिकारी हैं। यदि वे नहीं जागते और अभी पश्चात्ताप नहीं करते, तो वे निश्चित रूप से झूठे मसीह और मसीह-विरोधी बन जाएँगे, जो अंत के दिनों में लोगों को गुमराह करते हैं। झूठे मसीह और मसीह-विरोधी, जिनके बारे में कहा गया था, इसी प्रकार के लोगों में से उठ खड़े होंगे। जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, यदि वे अपने चरित्र का अनुसरण करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं, तब वे किसी भी समय निकाल दिए जाने के खतरे में होते हैं। जो दूसरों का दिल जीतने, उन्हें नसीहत देने और नियंत्रित करने तथा ऊँचाई पर खड़े होने के लिए परमेश्वर की सेवा करने के अपने बहुत-से वर्षों के अनुभव पर निर्भर करते हैं—और जो कभी पश्चात्ताप नहीं करते हैं, कभी अपने पाप कबूल नहीं करते हैं, रुतबे के लाभों को कभी नहीं छोड़ते हैं—उनका परमेश्वर के सामने पतन हो जाएगा। ये बिल्कुल पौलुस की किस्म के लोग हैं, अपनी वरिष्ठता का घमंड दिखाते हैं और दूसरों पर अपनी योग्यताओं का रौब जमाते हैं। परमेश्वर इस तरह के लोगों को पूर्ण नहीं बनाता। इस प्रकार की सेवा तो परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी डालने के समान है। लोग हमेशा पुराने से चिपके रहते हैं। वे अतीत की धारणाओं और अतीत की हर चीज से चिपके रहते हैं। यह उनकी सेवा में एक बड़ी बाधा है। यदि तुम उन्हें नहीं छोड़ते हो, तो ये चीजें तुम्हारे पूरे जीवन को बर्बाद कर देंगी। भले ही तुम दौड़-भाग करके अपनी टाँगें तोड़ लो या मेहनत करके अपनी कमर तोड़ लो, या यहाँ तक कि परमेश्वर की “सेवा” की खातिर शहीद भी हो जाओ, परमेश्वर तुम्हें जरा-सी भी स्वीकृति नहीं देगा। बल्कि इसका ठीक उलटा होगा : वह कहेगा कि तुम एक कुकर्मी हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, धार्मिक सेवा का उन्मूलन अवश्य होना चाहिए

ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोगों ने परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में काफी मेहनत की है, लेकिन इसके पश्चात उनके पास मात्र ज्ञान है और व्यावहारिक मार्ग के बारे में कुछ नहीं कह पाते? क्या तुझे लगता है कि ज्ञान से युक्त होना सत्य से युक्त होने के बराबर है? क्या यह भ्रांत दृष्टिकोण नहीं है? तू ज्ञान के उतने अंश बोल पाता है जितने समुद्र-तट पर रेत के कण होते हैं, फिर भी इसमें से कुछ भी व्यावहारिक मार्ग नहीं है। यह करके क्या तू लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयत्न नहीं कर रहा है? क्या तू खोखला प्रदर्शन नहीं कर रहा है, जिसके समर्थन के लिए कुछ भी ठोस नहीं है? ऐसा समूचा व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत और उतना ही अधिक यह वास्तविकता से रहित, उतना ही अधिक यह लोगों को वास्तविकता में ले जाने में अक्षम है। जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत, उतना ही अधिक यह तुझसे परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और विरोध करवाता है। आध्यात्मिक सिद्धांत में लिप्त मत हो—इसका कोई फायदा नहीं! कुछ लोग आध्यात्मिक सिद्धांत के बारे में दशकों से बात कर रहे हैं, और वे महान आध्यात्मिक हस्तियाँ बन गए हैं, लेकिन अंततः, इतने पर वे भी सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में विफल हैं। चूँकि उन्होंने परमेश्वर के वचनों का अभ्यास या अनुभव नहीं किया है, इसलिए उनके पास अभ्यास के लिए कोई सिद्धांत या मार्ग नहीं है। ऐसे लोगों के पास स्वयं सत्य वास्तविकता नहीं होती, तो वे अन्य लोगों को परमेश्वर में आस्था के सही रास्ते पर कैसे ला सकते हैं? वे केवल लोगों को गुमराह कर सकते हैं। क्या यह दूसरों को और खुद को नुकसान पहुँचाना नहीं है? कम से कम, तुझे वास्तविक समस्याएँ हल करने में सक्षम होना चाहिए, जो ठीक तेरे सामने हैं। अर्थात्, तुझे परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने और सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम होना चाहिए। केवल यही परमेश्वर के प्रति समर्पण है। जीवन प्रवेश पा लेने पर ही तू परमेश्वर के लिए काम करने के योग्य होता है, और परमेश्वर के लिए सच्चे मन से खुद को खपाने पर ही तू परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जा सकता है। हमेशा बड़े-बड़े वक्तव्य न दिया कर और आडंबरपूर्ण सिद्धांत की बात मत किया कर; यह वास्तविक नहीं है। लोगों से अपनी प्रशंसा करवाने के लिए आध्यात्मिक सिद्धांत बघारना परमेश्वर की गवाही देना नहीं है, बल्कि अपनी शान दिखाना है। यह लोगों के लिए बिलकुल भी लाभदायक नहीं है और उन्हें कुछ सिखाता नहीं, और उन्हें आसानी से आध्यात्मिक सिद्धांत की आराधना करने और सत्य के अभ्यास पर ध्यान केंद्रित न करने के लिए प्रेरित कर सकता है—और क्या यह लोगों को गुमराह करना नहीं है? इसी तरह करते रहना कई खोखले सिद्धांतों और साथ ही बहुत-से विनियमों को जन्म देगा, जो लोगों को बाधित करेंगे और फँसाएँगे; यह वाकई शर्मनाक है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, वास्तविकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करो

जो लोग परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य नहीं समझते, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले लोग होते हैं। यह बात उन लोगों पर और भी ज्यादा लागू होती है जो परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य तो समझते हैं फिर भी परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते। ऐसे भी लोग हैं, जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में बाइबल पढ़ते हैं और दिन भर उसके अंशों का पाठ करते रहते हैं, फिर भी उनमें से एक भी व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य नहीं समझता, न ही उनमें से कोई ऐसा होता है जो परमेश्वर को जान सकता है—उनमें से किसी के परमेश्वर के इरादों के अनुरूप चलने वाला होने की तो बात ही छोड़ दो। वे सब बेकार, नीच लोग होते हैं, जो “परमेश्वर” को उपदेश देने के लिए ऊँचे स्थानों पर खड़े होते हैं। वे ऐसे लोग हैं, जो परमेश्वर के बैनर तले काम करते हैं, फिर भी जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, जो परमेश्वर में विश्वास करने का लेबल लगाते हैं, लेकिन मनुष्य का मांस खाते और उनका रक्त पीते हैं। ऐसे तमाम लोग दुष्ट दानव हैं जो मनुष्यों की आत्माएँ निगल जाते हैं, वे प्रधान राक्षस हैं जो जानबूझकर लोगों को सही मार्ग पर चलने से बाधित करते हैं और वे ऐसी अड़चनें हैं जो लोगों को परमेश्वर की खोज करने से रोकती हैं। वे देखने में भले ही “शारीरिक रूप से हृष्ट-पुष्ट” लगते हों, लेकिन उनके अनुयायियों को यह कैसे पता चलेगा कि वे मसीह-विरोधी हैं जो लोगों को परमेश्वर का प्रतिरोध करने की ओर ले जाते हैं? उनके अनुयायियों को यह कैसे पता चलेगा कि वे ऐसे जीवित दानव हैं जो मनुष्यों की आत्माएँ निगल जाने के लिए समर्पित हैं?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते, वे सभी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले लोग हैं

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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