7. बाहरी अच्छे कर्मों और स्वभाव में परिवर्तनों के बीच अंतर

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

स्वभाव में परिवर्तन मुख्य रूप से एक व्यक्ति की प्रकृति में परिवर्तन को संदर्भित करता है। किसी व्यक्ति की प्रकृति में निहित चीजों को उसके बाहरी व्यवहारों से नहीं महसूस किया जा सकता। उनका सीधा संबंध उस व्यक्ति के अस्तित्व की कीमत और महत्व से और जीवन के बारे में उसके नजरिए और उसके मूल्यों से है; उनका संबंध उसकी आत्मा की गहराई में स्थित चीजों और उसके सार से है। अगर कोई व्यक्ति सत्य को स्वीकार नहीं कर पाता, तो वह इन पहलुओं में किसी भी रूपांतरण का अनुभव नहीं करेगा। केवल परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने और परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने से ही लोग वास्तव में सत्य को समझ सकते हैं। चीजों के बारे में उनके परिप्रेक्ष्य और अस्तित्व और मूल्यों को लेकर उनके नजरिए बदलने लगते हैं। चीजों के बारे में उनके दृष्टिकोण सत्य के अनुरूप और परमेश्वर के वचन के साथ संगत हो जाते हैं और वे वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और अपना कर्तव्य निभाने में उसके प्रति वफादार होने में सक्षम हो जाते हैं। केवल यही स्वभावगत बदलाव है। वर्तमान में, यदि लोग सत्य की समझ प्राप्त नहीं कर सकते, तो यद्यपि वे अपने कर्तव्य के निर्वहन में बाहरी तौर पर थोड़ा प्रयास कर सकते हैं और थोड़ा कष्ट सह सकते हैं, वे ऊपरवाले की कार्य-व्यवस्थाओं को पूरा करने में सक्षम हो सकते हैं, कुछ सरल कार्य कर सकते हैं और उनमें थोड़ा समर्पण प्रतीत हो सकता है, लेकिन जब उनका सामना किसी ऐसी चीज से होता है जो उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, तो उनकी विद्रोहशीलता फिर से प्रकट हो जाएगी। उदाहरण के लिए, जब तुम्हारी काट-छाँट की जाएगी, तो तुम बहस करोगे और अपना बचाव करने की कोशिश करोगे और जब कोई प्राकृतिक या मानव-निर्मित आपदा आएगी, तब तुम परमेश्वर के बारे में शिकायत करोगे और बड़बड़ाओगे। यह प्रकट करता है कि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है। इसलिए वह थोड़ा-सा बाहरी समर्पण और बदलाव केवल व्यवहार में बदलाव है; यह स्वभावगत बदलाव के स्तर तक नहीं पहुँच पाता है। तुम बहुत भाग-दौड़ करने में सक्षम हो सकते हो, कई कठिनाइयों का सामना कर सकते हो, और बहुत अपमान सह सकते हो; तुम खुद को परमेश्वर के बहुत करीब महसूस कर सकते हो, और पवित्र आत्मा तुम पर कुछ काम कर सकता है। लेकिन, जब परमेश्वर तुमसे कुछ ऐसा करने के लिए कहता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, तब तुम समर्पण करने से इनकार कर सकते हो, बहाने बना सकते हो, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और उसका प्रतिरोध कर सकते हो और गंभीर मामलों में सवाल खड़े कर सकते हो और उसका विरोध कर सकते हो। यह एक गंभीर समस्या है! यह दिखाता है कि तुममें अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली प्रकृति है, तुम वास्तव में सत्य नहीं समझते, और तुम्हारे जीवन स्वभाव में बिल्कुल भी कोई परिवर्तन नहीं आया है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, स्वभावगत परिवर्तन के बारे में क्या जानना चाहिए

चाहे कोई व्यक्ति कितने ही अच्छे कर्म क्यों न करे, इसका मतलब यह नहीं है कि उसमें सत्य वास्तविकताएँ हैं। सत्य वास्तविकता के होने का अर्थ है सत्य का अभ्यास करना और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। सत्य वास्तविकता के होने का अर्थ है परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। ऐसे लोग होते हैं जो उत्साही होते हैं, वे सिद्धांत बोल सकते हैं, विनियमों का पालन करते हैं और कई अच्छी चीजें करते हैं, लेकिन उनके बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि उनमें थोड़ी-सी मानवता है। यह जरूरी नहीं कि जो लोग सिद्धांत बोल सकते हों और हमेशा विनियमों का पालन करते हों, वे सत्य का अभ्यास भी करते हों। भले ही वे जो कुछ कहते हैं वह सही होता है और ऐसा लगता है यह समस्या-मुक्त है, लेकिन सत्य के सार से संबंधित मामलों में उनके पास कहने को कुछ नहीं होता। इसलिए, कोई कितने भी सिद्धांत बोले, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे सत्य की समझ है, वह चाहे कितना भी सिद्धांत समझता हो, कोई समस्या नहीं सुलझा सकता। धार्मिक सिद्धांतकार बाइबल की व्याख्या कर सकते हैं, लेकिन अंत में, उन सभी का पतन हो जाता है, क्योंकि वे परमेश्वर द्वारा व्यक्त किसी भी सत्य को नहीं स्वीकारते। जिन लोगों ने अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुभव किया है, वे अलग हैं; उन्होंने सत्य समझ लिया है, वे सभी मुद्दों पर विवेकी होते हैं, वे जानते हैं कि कैसे परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करना है, कैसे सत्य सिद्धांत के अनुसार कार्य करना है, कैसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कार्य करना है, और वे उस भ्रष्टता की प्रकृति को समझते हैं जो उनसे प्रकट होती है। जब उनके अपने विचार और धारणाएँ प्रकट होती हैं, तो वे विवेकी बन सकते और देह के खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं। स्वभाव में परिवर्तन इसी तरह से दिखता है। जिन लोगों का स्वभाव बदल चुका है, उनकी मुख्य अभिव्यक्ति यह है कि उन्होंने सत्य को स्पष्ट रूप से समझ लिया है और कार्य करते समय तो वे काफी सटीकता के साथ सत्य का अभ्यास करते हैं और वे अक्सर भ्रष्टता प्रकट नहीं करते। आम तौर पर, जिन लोगों का स्वभाव बदल गया है, वे खासकर तर्कसंगत और विवेकपूर्ण प्रतीत होते हैं, और सत्य की अपनी समझ के कारण, वे उतनी आत्मतुष्टता और अहंकार प्रकट नहीं करते। वे अपनी प्रकट हुई ज्यादातर भ्रष्टता की असलियत जान लेते हैं और उसका भेद पहचान लेते हैं, इसलिए उनमें अभिमान उत्पन्न नहीं होता। उन्हें कौन-सा स्थान लेना चाहिए, विवेकयुक्त व्यक्ति समझा जाने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए, अपने कर्तव्यों का पालन कैसे करना चाहिए, क्या कहना और क्या नहीं कहना चाहिए, और किन लोगों से क्या कहना और क्या करना चाहिए—इस बारे में उन्हें एक विवेकपूर्ण समझ होती है। इस प्रकार जिन लोगों का स्वभाव बदल गया है, वे अपेक्षाकृत विवेकी होते हैं और सही मायनों में ऐसे लोग ही मानव के समान जीवन जीते हैं। क्योंकि उन्हें सत्य की समझ होती है, वे सत्य के अनुरूप बोलने और मामलों को देखने में समर्थ होते हैं और वे जो भी करते हैं, उसमें सिद्धांत का पालन करते हैं; वे किसी व्यक्ति, घटना या चीज़ के प्रभाव में नहीं होते, उनका अपना दृष्टिकोण होता है और वे सत्य सिद्धांतों को कायम रख सकते हैं। उनका स्वभाव काफी स्थिर होता है, वे भावनात्मक रूप से अस्थिर नहीं होते, चाहे उनकी स्थिति कैसी भी हो, वे जानते हैं कि कैसे उन्हें अपने कर्तव्यों को अच्छे से निभाना है और कैसे उस ढंग से व्यवहार करना है जो परमेश्वर को संतुष्ट करता है। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं वे इस पर ध्यान नहीं देते कि बाहरी तौर पर ऐसा क्या करना चाहिए ताकि दूसरे उनके बारे में अच्छा सोचें; अपने दिलों में वे स्पष्ट हैं कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए क्या करना है। इसलिए, हो सकता है कि बाहर से लगे कि वे उतने उत्साही नहीं हैं या उन्होंने बहुत-से बड़े काम नहीं किए हैं, लेकिन वो जो कुछ भी करते हैं वह सार्थक होता है, मूल्यवान होता है, और उसके परिणाम वास्तविक होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं उनके अंदर निश्चित रूप से बहुत-सी सत्य वास्तविकताएँ होती हैं, और इस बात की पुष्टि चीज़ों के बारे में उनके दृष्टिकोण और उनके कार्यकलाप के सिद्धांतों के आधार पर की जा सकती है। जिन लोगों ने सत्य प्राप्त नहीं किया है, उनके जीवन स्वभाव में बिल्कुल कोई परिवर्तन नहीं हुआ होता है। स्वभाव में परिवर्तन कैसे लाया जाता है? मनुष्यों को शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट किया गया है, वे सभी परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और परमेश्वर का प्रतिरोध करना ही उनकी प्रकृति है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार का अर्थ है जिन लोगों की प्रकृति परमेश्वर का प्रतिरोध करना है और जो परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकते हैं, उन्हें उन लोगों में बदलना जो परमेश्वर के प्रति समर्पण कर और उसका भय मान सकते हैं। जिनके स्वभाव में बदलाव हो चुका है वे ऐसे लोग होते हैं। कोई व्यक्ति कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो या उसके पास कितने भी भ्रष्ट स्वभाव हों, अगर वह सत्य स्वीकार सकता है, परमेश्वर का न्याय और ताड़ना स्वीकार सकता है, विभिन्न परीक्षण और शोधन स्वीकार सकता है, तो उसमें परमेश्वर की सच्ची समझ होगी, और साथ ही, वह स्पष्ट रूप से अपने प्रकृति सार को भी देख पाएगा। जब वह स्वयं को वास्तव में जान लेगा, तो उसे स्वयं से और शैतान से घृणा हो जाएगी, और वह शैतान से विद्रोह करने को तैयार हो जाएगा और पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पण करेगा। जब किसी व्यक्ति में यह संकल्प आ जाता है तो वह सत्य का अनुसरण करेगा। जब किसी व्यक्ति को परमेश्वर का सच्चा ज्ञान होता है, जब उसका शैतानी स्वभाव शुद्ध कर दिया जाता है और परमेश्वर के वचन उसके भीतर जड़ें जमा लेते हैं और उसका जीवन और उसके अस्तित्व का आधार बन जाते हैं, जब वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकता है और पूरी तरह से बदलकर नया व्यक्ति बन गया है, केवल तभी उसके जीवन स्वभाव में बदलाव आया है। स्वभाव में बदलाव का मतलब परिपक्व और अनुभवी मानवता होना नहीं है या यह नहीं है कि लोग पहले की तुलना में स्वभाव में अधिक नम्र दिखाई देते हैं—अतीत में अहंकारी होने से लेकर अब विवेक से बोलने में सक्षम होने तक, या अतीत में किसी की न सुनने से लेकर अब दूसरों की बात थोड़ा-बहुत सुनने में सक्षम होने तक। ऐसे बाहरी परिवर्तनों को स्वभाव में परिवर्तन नहीं कहा जा सकता। बेशक स्वभाव में बदलाव में ऐसी अभिव्यक्तियाँ शामिल होती हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति का आंतरिक जीवन बदल जाता है। यह पूरी तरह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर के वचनों और सत्य ने उनमें अंदर जड़ें जमा ली हैं, उनके भीतर वे शासन करने लग गए हैं और वे उनका जीवन बन गए हैं। चीजों पर उनके विचार भी बदल गए हैं। वे दुनिया और मानवजाति को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। वे पूरी तरह से इसकी असलियत जान सकते हैं कि शैतान मानवजाति को कैसे भ्रष्ट करता है, बड़ा लाल अजगर परमेश्वर का प्रतिरोध कैसे करता है और बड़े लाल अजगर का सार क्या है। वे अपने दिलों में बड़े लाल अजगर और शैतान से घृणा कर पाते हैं और वे पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़कर उसका अनुसरण कर सकते हैं। इसका अर्थ है कि उनका जीवन स्वभाव बदल गया है और वे परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए हैं। जीवन स्वभाव में परिवर्तन मौलिक परिवर्तन होता है, जबकि व्यवहार में परिवर्तन सतही होता है। जिन लोगों ने जीवन स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त कर लिया है, उन्हीं लोगों ने सत्य प्राप्त किया है और केवल वही परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

धर्म के दायरे में बहुत-से लोग जीवनभर बहुत अधिक पीड़ा सहते हैं : वे अपनी देह को अधीन रखते हैं और अपने क्रूस उठाए चलते हैं, यहाँ तक कि वे मृत्यु की ऐन कगार पर पीड़ा भोगना और सहना जारी रखते हैं! कुछ लोग अपनी मृत्यु की सुबह भी उपवास रखते हैं। वे जीवन-भर स्वयं को अच्छे भोजन और अच्छे कपड़ों से दूर रखते हैं और केवल पीड़ा सहने पर ही ज़ोर देते हैं। वे अपनी देह को अधीन रखने और अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने में सक्षम होते हैं। पीड़ा सहन करने का उनका जोश सराहनीय है। लेकिन उनकी मानसिकता, उनकी धारणाओं, उनके मानसिक दृष्टिकोण और उनकी पुरानी प्रकृति की लेशमात्र भी काट-छाँट नहीं की गई है। उनकी स्वयं के बारे में कोई सच्ची समझ नहीं होती। परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि एक अज्ञात परमेश्वर की पारंपरिक छवि होती है। परमेश्वर के लिए पीड़ा सहने का उनका संकल्प, उनके उत्साह और उनकी मानवता के अच्छे व्यक्तित्व से आता है। भले ही वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वे न तो परमेश्वर को समझते हैं और न उसके इरादों को जानते हैं। वे केवल अंधों की तरह परमेश्वर के लिए कार्य करते और पीड़ा सहते हैं। वे विवेकशीलता को बिल्कुल महत्व नहीं देते और उन्हें इसकी भी बहुत परवाह नहीं होती कि वे यह कैसे सुनिश्चित करें कि उनकी सेवा वास्तव में परमेश्वर के इरादों को पूरा करे। उन्हें इसका ज्ञान तो बिल्कुल ही नहीं होता कि परमेश्वर के विषय में समझ कैसे हासिल करें। वे जिस परमेश्वर की सेवा करते हैं वह परमेश्वर अपनी मूल छवि में नहीं है, बल्कि वह उनकी कल्पनाओं का परमेश्वर होता है, एक ऐसा परमेश्वर जिसके बारे में उन्होंने बस सुना है या जिसके बारे में लेखों में बस किंवदंतियाँ पढ़ी हैं। फिर वे अपनी उर्वर कल्पनाओं और धर्मनिष्ठता का उपयोग परमेश्वर की खातिर पीड़ा सहने के लिए करते हैं और परमेश्वर के लिए उस कार्य का दायित्व स्वयं ले लेते हैं जो परमेश्वर करना चाहता है। उनकी सेवा बहुत ही अनिश्चित होती है, ऐसी कि उनमें से कोई भी परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने के पूरी तरह योग्य नहीं होता। चाहे वे स्वेच्छा से जितनी भी पीड़ा सहते हों, सेवा को लेकर उनका मूल परिप्रेक्ष्य और परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि अपरिवर्तित रहती है, क्योंकि वे परमेश्वर के न्याय, उसकी ताड़ना, उसके शोधन और उसकी पूर्णता से नहीं गुजरे हैं, न ही किसी ने सत्य द्वारा उनका मार्गदर्शन किया है। यूँ तो वे उद्धारकर्ता यीशु पर विश्वास करते हैं, लेकिन उनमें से किसी ने कभी उद्धारकर्ता को देखा नहीं होता हैं। वे केवल किंवदंती और सुनी-सुनाई बात के माध्यम से ही उसके बारे में जानते हैं। इसलिए उनकी सेवा आँख बंद करके बेतरतीब ढंग से की जाने वाली सेवा से अधिक कुछ नहीं है, जैसे एक नेत्रहीन आदमी अपने पिता की सेवा कर रहा हो। इस प्रकार की सेवा के माध्यम से आखिरकार क्या हासिल किया जा सकता है? और इसे स्वीकृति कौन देगा? शुरुआत से लेकर अंत तक, उनकी सेवा कभी भी बदलती नहीं। वे केवल मानव-निर्मित पाठ प्राप्त करते हैं और अपनी सेवा को केवल अपनी स्वाभाविकता और ख़ुद की पसंद पर आधारित रखते हैं। इससे क्या इनाम प्राप्त हो सकता है? यहाँ तक कि यीशु को देखने वाला पतरस भी नहीं जानता था कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा कैसे करनी है; अंत में, वृद्धावस्था में पहुंचने के बाद ही वह इसे समझ पाया। यह उन नेत्रहीन लोगों के बारे में क्या कहता है जिन्होंने किसी भी तरह की काट-छाँट का ज़रा-भी अनुभव नहीं किया और जिनका किसी ने मार्गदर्शन नहीं किया? क्या आजकल तुम लोगों में से अधिकांश की सेवा उन नेत्रहीन लोगों की तरह ही नहीं है? जिन लोगों का न्याय नहीं हुआ है, जिनकी काट-छाँट नहीं हुई है, जो नहीं बदले हैं—क्या वे सब वो नहीं हैं जो पूरी तरह जीते नहीं गए हैं? ऐसे लोगों का क्या उपयोग? यदि तुम्हारी मानसिकता, जीवनभर के तुम्हारे ज्ञान और परमेश्वर को लेकर तुम्हारे ज्ञान में कोई नया परिवर्तन नहीं दिखता है और तुम वास्तव में कुछ भी हासिल नहीं करते हो, तो तुम अपनी सेवा में कभी कोई नतीजा प्राप्त नहीं करोगे! परमेश्वर के कार्य की एक नई समझ और दर्शन के बिना तुम जीते नहीं जाते हो। तब तुम्हारा परमेश्वर का अनुसरण उन्हीं लोगों की तरह होगा जो पीड़ा सहते हैं और उपवास रखते हैं : इसका कोई मूल्य नहीं होता! वे जो करते हैं उसमें कोई गवाही नहीं होती, इसीलिए मैं कहता हूँ कि उनकी सेवा व्यर्थ होती है! वे लोग जीवनभर पीड़ा सहते हैं और बंदीगृह में समय बिताते हैं, वे हर पल सहनशील, दयालु होते हैं, हमेशा अपने क्रूस उठाए चलते हैं और वे दुनिया द्वारा बदनाम किए और ठुकराए जाते हैं—वे हर कठिनाई का अनुभव करते हैं। यूँ तो वे अंत तक आज्ञाकारी रहते हैं, लेकिन फिर भी उन पर विजय प्राप्त नहीं की जाती और वे विजय प्राप्ति की कोई भी गवाही पेश नहीं कर पाते। वे बहुत अधिक कष्ट भोग चुके होते हैं, लेकिन अपने भीतर वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते हैं। उनकी पुरानी सोच, पुरानी धारणाओं, धार्मिक प्रथाओं, मानव-निर्मित ज्ञान और मानवीय सोच में से किसी की भी काट-छाँट नहीं हुई होती है। उनमें कोई नई समझ नहीं होती है। परमेश्वर के बारे में उनकी लेशमात्र समझ भी सच या सटीक नहीं होती है। उन्होंने परमेश्वर के इरादों को गलत समझ लिया होता है। क्या इससे परमेश्वर की सेवा होती है? परमेश्वर के बारे में अतीत में तुम्हारी समझ चाहे जो भी रही हो, अगर यह आज भी पहले जैसी ही रहती है और परमेश्वर चाहे जो भी करे तुम परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान को अपनी धारणाओं और सोच पर आधारित रखना जारी रखते हो, अर्थात्, अगर तुम्हारे पास परमेश्वर का कोई नया, सच्चा ज्ञान नहीं होता है और तुम परमेश्वर की अंतर्निहित छवि और स्वभाव को जानने में विफल रहते हो, यदि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ अभी भी सामंती, अंधविश्वासी सोच पर आधारित है और यह अब भी मानवीय कल्पनाएँ और धारणाएँ है, तो तुम पर विजय प्राप्त नहीं की गई है। मैं अब तुमसे जो बहुत-से वचन कहता हूँ उन सबका यह उद्देश्य है कि तुम जान सको और यह ज्ञान तुम्हें नवीनतर, सटीक ज्ञान की ओर ले जाए; इनका उद्देश्य तुम्हारी पुरानी धारणाओं और पुराने ज्ञान को काट-छाँट कर दूर करना भी है, ताकि तुम नया ज्ञान ले सको। अगर तुम सच में मेरे वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हारे ज्ञान में काफी बदलाव आएगा। यदि तुम एक समर्पित हृदय के साथ परमेश्वर के वचनों को खाओगे-पिओगे, तो तुम्हारा परिप्रेक्ष्य बदल जाएगा। यदि तुम बार-बार ताड़ना को स्वीकार कर पाओ, तो तुम्हारी पुरानी मानसिकता धीरे-धीरे बदल जाएगी। यदि तुम्हारी पुरानी मानसिकता पूरी तरह से नई बन जाए, तो तुम्हारा अभ्यास भी तदनुसार बदलेगा। इस तरह तुम्हारी सेवा अधिकाधिक सटीक होती जाएगी, परमेश्वर के इरादों को अधिकाधिक पूरा कर पाएगी। यदि तुम अपना जीवन, मानव जीवन की अपनी समझ और परमेश्वर के बारे में अपनी अनेक धारणाओं को बदल सको, तो तुम्हारी स्वाभाविकता धीरे-धीरे कम होती जाएगी। यह और इससे कम कुछ भी नहीं, वह प्रभाव है जब परमेश्वर लोगों पर विजय प्राप्त करता है, यह वह बदलाव है जो लोगों में घटित होता है। यदि परमेश्वर में अपनी आस्था में तुम केवल अपनी देह को अधीन करने और सहने और पीड़ा भुगतने के बारे में जानते हो, और तुम यह नहीं जानते हो कि यह सही है या गलत, यह तो और भी कम जानते हो कि यह किसकी खातिर किया जाता है तो ऐसा अभ्यास बदलाव का निमित्त कैसे बन सकता है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (3)

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो अक्सर जुबान से परमेश्वर के प्रति अपने ऋणी होने को व्यक्त करते हैं; वे अपने दिन चिंता में भौंहें चढ़ाए गुजारते हैं, दिखावा करते हैं, और दया के पात्र होने का दिखावा करते हैं। कितनी घिनौनी बात है! यदि तुम उनसे पूछते, “क्या तुम बता सकते हो कि तुम परमेश्वर के ऋणी कैसे हो?” तो वे निरुत्तर हो जाते। यदि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो, तो तुम बाहरी तौर पर इस बारे में बात नहीं करोगे; बल्कि वास्तविक अभ्यास के तरीके से परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम दर्शाओगे और सच्चे हृदय से उससे प्रार्थना करोगे। जो लोग परमेश्वर के सामने सिर्फ जबानी जमा-खर्च करते हैं, वे सब पाखंडी हैं! कुछ लोग जब भी प्रार्थना करते हैं, तब परमेश्वर के प्रति ऋणी होने की बात करते हैं और वे जब भी प्रार्थना करते हैं, चाहे जब भी करें, पवित्र आत्मा से द्रवित हुए बिना भी रोना आरंभ कर देते हैं। इस तरह के लोग धार्मिक रिवाजों और धारणाओं से ग्रस्त होते हैं; वे लोग हमेशा इन धार्मिक रिवाजों और धारणाओं के साथ जीते हैं, और मानते हैं कि इन कामों से परमेश्वर प्रसन्न होता है और सतही धार्मिकता या दुःख भरे आँसुओं को पसंद करता है। क्या ऐसे बेतुके लोग कभी कोई महत्व रख सकते हैं? कुछ लोग विनम्रता का प्रदर्शन करने के लिए, दूसरों के सामने बोलते समय शिष्टाचार का दिखावा करते हैं। कुछ लोग दूसरों के सामने जानबूझकर किसी नितांत शक्तिहीन मेमने की तरह जी-हुजूरी करते हैं। क्या यह तौर-तरीका राज्य के लोगों के लिए उचित है? राज्य के लोगों को जीवंत और स्वतंत्र, शुद्ध और खुला, ईमानदार और प्रेमयोग्य होना चाहिए और उन्हें स्वतंत्रता की अवस्था में जीना चाहिए। उनमें सत्यनिष्ठा और गरिमा होनी चाहिए और वे जहाँ भी जाएँ, उन्हें वहाँ अपनी गवाही में दृढ़ रहने में सक्षम होना चाहिए; ऐसे लोग परमेश्वर और मनुष्य दोनों को प्रिय होते हैं। जो लोग विश्वास में नौसिखिये होते हैं, वो बहुत सारे बाहरी अभ्यास करते हैं; उन्हें सबसे पहले काट-छाँट किए और तोड़े जाने की अवधि से अवश्य गुजरना चाहिए। परमेश्वर में आंतरिक आस्था होना ऐसी चीज नहीं है जिसे दूसरे देख सकें, लेकिन ऐसा करने वाले लोगों के क्रियाकलाप और कर्म सराहनीय होते हैं। ऐसे व्यक्ति ही परमेश्वर के वचनों को जीने वाले समझे जा सकते हैं। यदि तुम विभिन्न लोगों को उद्धार में लाने के लिए प्रतिदिन सुसमाचार का उपदेश देते हो, लेकिन अंत में अभी भी विनियमों और धर्म-सिद्धांतों में ही जीते रहते हो, तो तुम परमेश्वर को गौरवान्वित नहीं कर सकते। ऐसे लोग धार्मिक शख्सियत होने के साथ ही पाखंडी भी होते हैं। जब भी वे धार्मिक लोग इकट्ठे होते हैं, तो वे पूछ सकते हैं, “बहन, आजकल तुम कैसी हो?” संभव है कि बहन उत्तर दे, “मैं महसूस करती हूँ कि मैं परमेश्वर की कर्जदार हूँ और मैं उसके इरादे पूरे नहीं कर पाती।” संभव है कि दूसरी बहन कहे, “मैं भी परमेश्वर के प्रति ऋणी महसूस करती हूँ और उसे संतुष्ट नहीं कर पाती।” ये कुछ वाक्य और शब्द ही उनके हृदय की गहराई में मौजूद अधम चीजों को व्यक्त कर देते हैं; ऐसी बातें सर्वाधिक घृणित और अत्यंत घिनौनी हैं। ऐसे लोगों की प्रकृति परमेश्वर का विरोध करने वाली होती है। जो लोग वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वे उसी पर संगति करते हैं जो उनके मन में होता है और ऐसा वे खुले दिल से करते हैं। ऐसे लोग न तो एक भी झूठी कवायद में शामिल होते हैं, न झूठा शिष्टाचार दिखाते हैं, न खोखले शिष्टाचार का प्रदर्शन करते हैं। वे हमेशा बेबाक होते हैं और किसी सांसारिक नियम का पालन नहीं करते हैं। कुछ लोगों में, विवेक के निपट अभाव के बिंदु तक, दिखावे की प्रवृत्ति होती है। जब कोई गाता है, तो वे नाचने लगते हैं, वो समझ ही नहीं पाते कि उनकी पतीलियों में चावल जल चुका है। ऐसे लोग धर्मपरायण या नेक नहीं होते, वे तो बहुत ही अगंभीर होते हैं। ये सब वास्तविकता के अभाव की अभिव्यक्तियाँ हैं। जब कुछ लोग आध्यात्मिक जीवन के मामलों के बारे में संगति करते हैं, तो यद्यपि वे परमेश्वर के प्रति ऋणी होने की बात नहीं करते, फिर भी उनके मन की गहराइयों में उसके प्रति सच्चा प्रेम होता है। परमेश्वर के प्रति तुम्हारे ऋणी महसूस करने का दूसरे लोगों से कोई लेना-देना नहीं है; तुम परमेश्वर के प्रति ऋणी हो, न कि लोगों के प्रति। इस बारे में लगातार दूसरों को बताने का क्या फायदा है? तुम्हें वास्तविकता में प्रवेश करने को महत्व देना चाहिए, न कि बाहरी उत्साह या प्रदर्शन को। इंसानों का बाहरी अच्छा व्यवहार किस चीज का प्रतिनिधित्व करता है? वह देह का प्रतिनिधित्व करता है; यहाँ तक कि सर्वोत्तम बाहरी अभ्यास भी जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करते और वे केवल तुम्हारा व्यक्तिगत स्वभाव ही दिखा सकते हैं। मनुष्य के बाहरी अभ्यास परमेश्वर के इरादों को पूरा नहीं कर सकते। तुम निरंतर परमेश्वर के प्रति अपने ऋणी होने की बातें करते रहते हो, लेकिन तुम दूसरों के जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकते या उनके परमेश्वर-प्रेमी हृदय को उद्दीप्त नहीं कर सकते। क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारे ऐसे कार्य परमेश्वर को संतुष्ट करेंगे? तुम्हें लगता है कि तुम्हारा इस तरीके से कार्य करना परमेश्वर का इरादा है, और तुम्हारे क्रियाकलाप आध्यात्मिक हैं, किन्तु वास्तव में, वे सब बेतुके हैं! तुम मानते हो कि जो तुम्हें पसंद है और जो तुम करना चाहते हो, वे ठीक वही चीजें हैं जिनसे परमेश्वर आनंदित होता है। क्या तुम्हारी पसंद परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है? क्या व्यक्ति का व्यक्तित्व परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जो तुम्हें पसंद है, परमेश्वर ठीक उसी से घृणा करता है और तुम्हारी आदतें ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर ठुकराता है। यदि तुम खुद को ऋणी महसूस करते हो, तो परमेश्वर के सामने जाओ और प्रार्थना करो; इस बारे में दूसरों से बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम परमेश्वर के सामने प्रार्थना नहीं करते और इसके बजाय दूसरों की उपस्थिति में निरंतर अपना प्रदर्शन करते रहते हो, तो क्या इससे परमेश्वर के इरादे पूरे किए जा सकते हैं? यदि तुम हमेशा बाहरी तौर पर चीजें करने पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो इसका मतलब है कि तुम अत्यधिक दिखावटी हो। वे किस तरह के लोग हैं जिनका केवल बाहरी व्यवहार अच्छा होता है और जो वास्तविकता से रहित होते हैं? वे पाखंडी फरीसी और धार्मिक लोग हैं! यदि तुम लोग अपने बाहरी अभ्यासों को नहीं छोड़ते और परिवर्तन नहीं कर सकते, तो तुम लोगों में पाखंड के तत्व बढ़ते जाएँगे। तुममें पाखंड के जितने तत्व होंगे, परमेश्वर के प्रति प्रतिरोध उतना ही अधिक होगा। और अंत में, इस तरह के लोग निश्चित रूप से निकाल दिए जाएँगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, इंसान को अपनी आस्था में, वास्तविकता पर ध्यान देना चाहिए—धार्मिक रीति-रिवाजों में लिप्त रहना आस्था नहीं है

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण :

धार्मिक दुनिया में, बहुत से भक्त कहते हैं, “हम प्रभु यीशु में अपने विश्वास के कारण बदल गए हैं। हम प्रभु के लिए खुद को खपाने में, काम करने में, कारावास सहन करने में सक्षम हैं, और उसके नाम को अस्वीकार नहीं करते हैं। हम कई गुणकारी चीजें करने, भले कार्य के लिए धन देने, दान करने और गरीबों की सहायता करने में सक्षम हैं। ये बड़े बदलाव हैं! इसलिए हम स्वर्ग के राज्य में ले जाये जाने के योग्य हैं।” तुम इन शब्दों के बारे में क्या सोचते हो? (वे गलत हैं।) इन शब्दों के बारे में क्या तुममें कोई विवेक है? शुद्ध किये जाने का क्या मतलब है? क्या तुम्हें लगता है कि यदि तुम्हारा व्यवहार बदल गया है और तुम अच्छे कर्म करते हो, तो तुम्हें शुद्ध कर दिया गया है? कोई कहता है, “मैंने सब कुछ दरकिनार कर दिया है। परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के लिए, मैंने अपनी नौकरी, अपना परिवार और देह की इच्छाओं को भी दरकिनार कर दिया। क्या यह शुद्ध किये जाने के बराबर है?” यदि तुमने यह सब किया भी है, तो यह ठोस प्रमाण नहीं है कि तुम्हें शुद्ध कर दिया गया है। तो, मुख्य बात क्या है? तुम किस पहलू में ऐसी शुद्धता प्राप्त कर सकते हो जिसे असल शुद्धता माना जा सकता है? परमेश्वर का विरोध करने वाले शैतानी स्वभाव की शुद्धता ही सच्ची शुद्धता है। उस शैतानी स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं जो परमेश्वर का विरोध करती हैं? सबसे स्पष्ट अभिव्यक्तियाँ हैं, एक व्यक्ति का अहंकार, दम्भ, आत्मतुष्टता और आत्म-गौरव, साथ ही साथ उसका टेढ़ापन, विश्वासघात, झूठ बोलना, धोखाधड़ी और पाखंड। जब ये शैतानी स्वभाव किसी का हिस्सा नहीं रह जाते हैं, तो उसे वास्तव में शुद्ध कर दिया गया है। कहा जाता है कि मनुष्य के शैतानी स्वभाव की 12 महत्वपूर्ण अभिव्यक्तियाँ हैं, जैसे कि, स्वयं को सबसे सम्मानजनक मानना; खुद से अनुकूल लोगों को बढ़ने देना और अपना विरोध करने वालों का नाश होने देना; केवल परमेश्वर को ही अपने आप से बेहतर मानना, किसी और के सामने न झुकना, किसी और के प्रति आदर न रखना; एक बार सत्ता पाने के बाद अपना एक स्वतंत्र राज्य बनाना; सत्ता का उपयोग करने वाला एकमात्र इन्सान बनने और सभी चीजों का स्वामी बनने की चाह रखना, और अपने आप सब कुछ तय करने की चाह रखना। ये सभी अभिव्यक्तियाँ शैतानी स्वभाव हैं। कोई व्यक्ति अपने जीवन स्वभाव में बदलाव का अनुभव कर पाए, इससे पहले इन शैतानी स्वभावों को शुद्ध किया जाना ज़रूरी है। किसी के जीवन स्वभाव में बदलाव एक पुनर्जन्म है, क्योंकि उसका सार बदल गया है। इससे पहले, जब उसे सत्ता दी गई, तो वह अपना स्वतंत्र राज्य बनाने में सक्षम था। अब, जब उसे सत्ता दी जाती है, तो वह परमेश्वर की सेवा करता है, परमेश्वर की गवाही देता है और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए सेवक बन जाता है। क्या यह वास्तविक परिवर्तन नहीं है? इससे पहले, सभी स्थितियों में वह खुद का दिखावा करता था और चाहता था कि अन्य लोग उसके बारे में श्रेष्ठ सोचें और उसकी आराधना करें। अब, वह हर जगह परमेश्वर की गवाही देता है, और खुद का दिखावा नहीं करता। चाहे लोग उससे कैसे भी व्यवहार करें, उसे वह ठीक लगता है। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग उसके बारे में कैसी टिप्पणी करते हैं, उसे वह ठीक लगता है। उसे इसकी कोई परवाह नहीं होती है। वह केवल परमेश्वर को उत्कृष्टता देना चाहता है, परमेश्वर के लिए गवाही देना चाहता है, दूसरों को परमेश्वर की समझ प्राप्त करने में मदद करना चाहता है, और परमेश्वर की उपस्थिति में दूसरों की पालन करने में मदद करना चाहता है। क्या यह जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं है? “मैं भाई-बहनों के साथ प्रेम से व्यवहार करूँगा। मैं सभी परिस्थितियों में दूसरों के प्रति करुणामय रहूँगा। मैं अपने बारे में नहीं सोचूंगा और दूसरों को लाभ प्रदान करूँगा। मैं दूसरों को उनकी जिंदगी में आगे बढ़ने में मदद करूँगा और अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करूंगा। मैं दूसरों की सत्य समझने में और सत्य प्राप्त करने में मदद करूँगा।” दूसरों को स्वयं के समान प्यार करने का यही मतलब है! जब शैतान की बात आती है, तो तुम इसे समझ सकते हो, सिद्धांत बना सकते हो, इसके साथ एक सीमांकन रेखा खींच सकते हो और शैतान की बुराइयों को पूरी तरह से प्रकट कर सकते हो ताकि परमेश्वर के चुने हुए लोगों को इसके नुकसान से बचाया जा सके। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों की रक्षा करना है, और यह दूसरों को और भी अधिक स्वयं के समान प्यार करना है। इसके अतिरिक्त, तुम्हें उससे प्यार करना चाहिए जिससे परमेश्वर प्यार करता है और उससे नफरत करनी चाहिए जिससे परमेश्वर घृणा करता है। परमेश्वर मसीह विरोधियों, दुष्ट आत्माओं और दुष्ट लोगों से नफरत करता है। इसका मतलब है कि हमें भी मसीह विरोधियों, दुष्ट आत्माओं और दुष्ट लोगों से नफरत करनी है। हमें परमेश्वर की तरफ खड़ा होना चाहिए। हम उनके साथ समझौता नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर किससे प्यार करता है? परमेश्वर उनसे प्यार करता है जिन्हें वह बचाना और आशीष देना चाहता है। इन लोगों के लिए, हमें जिम्मेदार होना चाहिए, उनके साथ प्यार से व्यवहार करना चाहिए, उन्हें सहायता, नेतृत्व और समर्थन प्रदान करना चाहिए। क्या यह किसी के जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं है? इसके अतिरिक्त, जब तुमने कुछ अपराध या गलतियाँ की हैं, या कोई काम करने में सिद्धांतों की उपेक्षा की है, तो तुम भाई-बहनों की आलोचना, उलाहना, व्यवहार और कांट-छांट स्वीकार कर सकते हो; तुम इन सभी चीजों से उचित व्यवहार कर सकते हो और उन्हें परमेश्वर से प्राप्त कर सकते हो, घृणा त्याग सकते हो, और अपने भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए सत्य की तलाश कर सकते हो। क्या यह तुम्हारे जीवन स्वभाव में बदलाव नहीं है?

क्या एक व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव, जिसकी धार्मिक जगत में चर्चा है, जीवन स्वभाव में बदलाव का प्रतिनिधित्व कर सकता है? सभी कहते हैं कि नहीं कर सकता। ऐसा क्यों है? मुख्य कारण यह है कि वह अभी भी परमेश्वर का विरोध करता है। यह बिल्कुल फरीसियों जैसा है जो बाहर से बड़े भक्त थे। वे अक्सर प्रार्थना करते थे, पवित्रशास्त्र को समझाते थे और व्यवस्था के नियमों का बहुत अच्छे से पालन करते थे। ऐसा कहा जा सकता है कि बाहरी रूप से, वे निंदा से परे थे। लोग कोई भी दोष निकालने में असमर्थ थे। हालाँकि, वे अभी भी मसीह का विरोध करने और निंदा करने में सक्षम क्यों थे? यह क्या इशारा करता है? चाहे लोग कितने भी अच्छे प्रतीत हों, अगर उनके पास सत्य नहीं है और इस प्रकार वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं तो वे अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करेंगे। बाहरी रूप से, वे बहुत अच्छे थे, लेकिन यह जीवन स्वभाव में बदलाव के रूप में क्यों नहीं गिना जाता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि उनका भ्रष्ट स्वभाव ज़रा भी नहीं बदला था और वे अभी भी घमंडी, दम्भी और विशेष रूप से आत्म-तुष्ट थे। वे अपने ज्ञान और सिद्धांतों में विश्वास करते थे और मानते थे कि उनकी शास्त्रों की समझ सर्वोत्तम है। उनका मानना था कि वे सबकुछ समझ गए थे और वे अन्य लोगों की तुलना में बेहतर थे। यही कारण है कि जब प्रभु यीशु प्रचार कर रहा था और अपना कार्य कर रहा था, तब उन्होंने उसका विरोध किया और निंदा की। यही कारण है कि जब धार्मिक जगत ने सुनता है कि अंत के दिनों के मसीह ने सारा सत्य व्यक्त किया है, तो वे उसकी निंदा करते हैं, भले ही उन्हें पता है कि यह सच है। उन्होंने किस तरह की गलती की? बाहरी रूप से, वे इतने बड़े बदलाव से होकर गुज़रे, तो यह कैसे सम्भव था कि वे अभी भी परमेश्वर का विरोध करने में सक्षम थे? यह कैसे सम्भव था कि वे अभी भी मसीह के प्रति पागलों के समान शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने में सक्षम थे? यह किस तरह की समस्या है? क्या कोई व्यक्ति जो मसीह का विरोध करता है और प्रतिरोध करता है वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है? क्या परमेश्वर उन लोगों को राज्य में ला सकता है जो मसीह के दुश्मन हैं? परमेश्वर ऐसा नहीं करेगा।

—‘जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति’ से उद्धृत

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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