परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें)

विषय-वस्तु

अध्याय 7 सत्य के अन्य पहलू जो कि न्यूनतम हैं जिन्हें नए विश्वासियों द्वारा समझा जाना चाहिए

1.परमेश्वर पर विश्वास में नए कार्य के प्रति लोगों के विरोध का स्रोत तुम्हें अवश्य मालूम होना चाहिए।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

मनुष्य के द्वारा परमेश्वर का विरोध करने का कारण, एक ओर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से, और दूसरी ओर, परमेश्वर के प्रति अज्ञानता और परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों की और मनुष्य के प्रति उनकी इच्छा की समझ की कमी से उत्पन्न होता है। इन दोनों पहलुओं का, परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध के इतिहास में विलय होता है। नौसिखिए विश्वासी परमेश्वर का विरोध करते हैं क्योंकि ऐसा विरोध उनकी प्रकृति में होता है, जबकि कई वर्षों से विश्वास वाले लोगों में परमेश्वर का विरोध, उनके भ्रष्ट स्वभाव के अलावा, परमेश्वर के प्रति उनकी अज्ञानता का परिणाम है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं" से

कार्य के तीनों चरणों में से प्रत्येक चरण पूर्ववर्ती चरण की बुनियाद पर पूरा किया जाता है; इसे स्वतंत्र रूप से, उद्धार के कार्य से पृथक नहीं किया जाता है। यद्यपि युग और किए गए कार्य के प्रकार में बहुत बड़े अंतर हैं, इसके मूल में अभी भी मानवजाति का उद्धार ही है, और उद्धार के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले से ज्यादा गहरा होता है। कार्य का प्रत्येक चरण पिछले की बुनियाद से पर आगे बढ़ता है, जिसका उन्मूलन नहीं किया जाता है। इस प्रकार से, अपने कार्य में जो हमेशा नया रहता है और कभी भी पुराना नहीं पड़ता है, वह परमेश्वर निरंतर अपने स्वभाव का एक पहलू व्यक्त करता रहता है जिसे कभी भी मनुष्य के लिए व्यक्त नहीं किया गया है और हमेशा मनुष्यों को अपना नया कार्य और अपना नया अस्तित्व व्यक्त करता रहता है, और भले ही पुराना धार्मिक रक्षक इसका प्रतिरोध करने के लिए अपनी अधिकतम सामर्थ्य लगाता है और इसका खुलेआम विरोध करता है, तब भी परमेश्वर हमेशा नया कार्य करता है जिसे करने का वह अभिप्राय रखता है। उसका कार्य हमेशा बदलता रहता है और इस कारण से, यह हमेशा मनुष्य के विरोध का सामना करता रहता है। इसलिए भी, उसका स्वभाव युगों और उसके कार्यों को ग्रहण करने वालों के अनुसार सदैव बदलता रहता है। इसके अलावा, वह हमेशा उस काम को करता है जो पहले कभी नहीं किया गया था, यहाँ तक कि उस कार्य को भी करता है जो मनुष्यों को पहले किए गए काम का विरोधाभासी, उसका विरोध करने वाला, दिखाई देता है। मनुष्य केवल एक ही प्रकार का कार्य या एक ही प्रकार का अभ्यास स्वीकार करने में समर्थ है। मनुष्य के लिए ऐसे कार्य या अभ्यास के तरीकों को स्वीकार करना कठिन होता है, जो उनके साथ विरोधाभास प्रकट करते हैं, या उनसे उच्चतर हैं—परन्तु पवित्र आत्मा हमेशा नया कार्य कर रही है और इसलिए धार्मिक विशेषज्ञों के समूह के बाद समूह दिखाई देते हैं जो परमेश्वर के नए कार्य का विरोध करते हैंहो। ये लोग ठीक तरीके से "विशेषज्ञ" बन गए हैं क्योंकि मनुष्य के पास ज्ञान नहीं है कि परमेश्वर किस प्रकार हमेशा नया रहता है और कभी भी पुराना नहीं होता है, और परमेश्वर के कार्य के सिद्धान्तों का कोई ज्ञान नहीं है और इसके अधिक क्या, कि उन विभिन्न मार्गों का ज्ञान नहीं है जिनमें परमेश्वर मनुष्य को बचाता है। वैसे तो, मनुष्य यह बताने में सर्वथा असमर्थ है कि क्या यह वह कार्य है जो पवित्र आत्मा की ओर से आता है, क्या यह परमेश्वर का कार्य है। कई लोग इस प्रकार के दृष्टिकोण से चिपके रहते हैं जिसमें, यदि यह पहले आए हुए वचनों के अनुरूप है, तब वे इसे स्वीकार करते हैं, और यदि पहले किए गए कार्य में कोई अंतर हैं, तब वे इसका विरोध करते हैं और अस्वीकार करदेते हैं।… ज्ञात हो कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हो, या आज कार्य को मापने के लिए अपनी ही धारणा का उपयोग करते हो, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के सिद्धान्तों को नहीं जानते हो, और क्योंकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को पर्याप्त गम्भीरता से नहीं लेते हो। तुम लोगों का परमेश्वर के प्रति विरोध और पवित्र आत्मा के कार्य में अवरोध तुम लोगों की धारणा और तनम लोगों के अंतर्निहित अहंकार के कारण है। यह इसलिए नहीं कि परमेश्वर का कार्य गलत है, बल्कि क्योंकि तुम लोग प्राकृतिक रूप से बहुत ही ज्यादा अवज्ञाकारी हो।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" से

कभी भी परमेश्वर का कार्य मनुष्यों की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, क्योंकि उसका कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता है। न ही वह कभी पुराने कार्य को दोहराता है बल्कि पहले कभी नहीं किए गए कार्य के साथ आगे बढ़ जाता है। जिस प्रकार परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं है और मनुष्य परमेश्वर द्वारा अतीत में किए गए कार्य के आधार पर निरपवाद रूप से उसके आज के कार्य का निर्णय करता है, नए युग के कार्य के प्रत्येक चरण को करना परमेश्वर के लिए अत्यंत कठिन है। मनुष्य बहुत अधिक बाधाएँ प्रस्तुत करता है! मनुष्य की सोच बहुत ही ओछी है! कोई भी मनुष्य परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता है, फिर भी वह ऐसे कार्य की व्याख्या करता है।…सभी मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते हैं फिर भी परमेश्वर के कार्य में हुए किसी भी बदलाव को सहने में असमर्थ है। जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, और कि परमेश्वर का कार्य हमेशा एक ठहराव पर रहता है। उनके विश्वास के अनुसार, परमेश्वर से जो कुछ भी शाश्वत उद्धार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है वह है व्यवस्था को बनाए रखना, और जब तक वे पश्चाताप करते और अपने पापों को स्वीकार करते रहेंगे, तब तक परमेश्वर का हृदय हमेशा संतुष्ट रहेगा। वे इस विचार के हैं कि परमेश्वर केवल वही हो सकता है जो व्यवस्था के अधीन है और जिसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था; उनका यह भी विचार है कि परमेश्वर बाइबल से बढ़कर नही होना चाहिए और नही हो सकता है। ये ठीक इस प्रकार के विचार हैं जिन्होंने उन्हें पुरानी व्यवस्था में दृढ़ता से बाँध दिया है और कठोर नियमों में जकड़ कर रख दिया है। इससे भी अधिक लोग यह विश्वास करतें है कि जो कुछ भी परमेश्वर का नया कार्य है, उसे भविष्यवाणियों के द्वारा पूर्ण अवश्य बनाया जाना चाहिए और यह कि इस तरह के कार्य के प्रत्येक चरण में, जो भी उसका अनुसरण सच्चे हृदय से करते हैं उन्हें प्रकटन भी अवश्य दिखाया जाना चाहिए, अन्यथा वह कार्य परमेश्वर का कार्य नहीं हो सकता है। परमेश्वर को जानना मनुष्य के लिए पहले ही आसान कार्य नहीं है। इसके अतिरिक्त मनुष्य के विवेकहीन हृदय और उसके आत्म-महत्व एवं मिथ्याभिमान के विद्रोही स्वभाव को लें, तो परमेश्वर के नए कार्य को ग्रहण करना मनुष्य के लिए और भी अधिक कठिन है। मनुष्य न तो परमेश्वर के कार्य का सावधानीपूर्वक अध्ययन करता है और न ही इसे विनम्रता से स्वीकार करता है; बल्कि, मनुष्य परमेश्वर से प्रकाशन और मार्गदर्शन का इंतजार करते हुए, तिरस्कार का दृष्टिकोण अपनाता है। क्या यह मनुष्य का व्यवहार नहीं है जो परमेश्वर का विरोध करता है और उसका विरोधी है? इस प्रकार के मनुष्य कैसे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त कर सकते हैं?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है?" से

फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया, क्या तुम लोग उसका कारण जानना चाहते हो? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे ज्यादा और क्या, उन्होंने केवल इस बात पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, मगर जीवन के इस सत्य की खोज नहीं की। और इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं, क्यों उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है, और नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग कैसे कहते हो कि ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? वे यीशु का विरोध करते थे क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु के द्धारा कहे गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे, और, ऊपर से, क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। और क्योंकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था, और कभी भी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने सिर्फ़ मसीहा के नाम को खोखली श्रद्धांजलि देने की गलती की जबकि किसी न किसी ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत है: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, तुम मसीह नहीं हो जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण नहीं हैं? मैं तुम लोगों से पुनः पूछता हूँ: मान लीजिए कि तुम लोगों में यीशु के बारे में थोड़ी सी भी समझ नहीं है, तो क्या तुम लोगों के लिए उन गलतियों को करना अत्यंत आसान नहीं है जो बिल्कुल आरंभ के फरीसियों ने की थी? क्या तुम सत्य के मार्ग को जानने के योग्य हो? क्या तुम सचमुच में यह विश्वास दिला सकते हो कि तुम ईसा का विरोध नहीं करोगे? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने के योग्य हो? यदि तुम नहीं जानते हो कि क्या तुम ईसा का विरोध करोगे, तो मेरा कहना है कि तुम पहले से ही मौत के कगार पर जी रहे हो। जो लोग मसीहा को नहीं जानते थे वे सभी यीशु का विरोध करने में, यीशु को अस्वीकार करने में, उन्हें बदनाम करने में सक्षम थे। जो लोग यीशु को नहीं समझते हैं वे सब उसे अस्वीकार करने एवं उन्हें बुरा भला कहने में सक्षम हैं। इसके अलावा, वे यीशु के लौटने को शैतान के द्वारा दिए जाने वाले धोखे के समान देखने में सक्षम हैं और अधिकांश लोग देह में लौटने की यीशु की निंदा करेंगे। क्या इस सबसे तुम लोगों को डर नहीं लगता है? जिसका तुम लोग सामना करते हो वह पवित्र आत्मा के विरोध में ईशनिंदा होगी, कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचनों का विनाश होगा और यीशु के द्वारा व्यक्त किए गए समस्त को ठुकराना होगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा" से

उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर यहूदिया में देहधारी हुआ, उसका लक्ष्य सूली पर चढ़ाये जाने के कार्य को पूरा करने के द्वारा सारी मानव जाति को पाप से मुक्त करना था। फिर भी यहूदियों का मानना था कि परमेश्वर के लिए ऐसा करना असंभव था, और उन्होंने सोचा कि परमेश्वर के लिए देहधारी होना और प्रभु यीशु के रूप में होना असंभव है। उनका "असंभव" एक ऐसा आधार बन गया जिसके द्वारा उन्होंने परमेश्वर को अपराधी ठहराया और विरोध किया, और अंत में इस्राएल को विनाश की ओर ले गए। आज, कई लोगों ने उसी प्रकार की गलती की है। वे परमेश्वर के किसी भी क्षण आ जाने का प्रचार बहुत हल्के रूप में करते हैं, साथ ही वे उसके प्रकट होने को गलत भी ठहराते हैं; उनका "असंभव" एक बार फिर परमेश्वर के प्रकट होने को उनकी कल्पना की सीमाओं के भीतर सीमित करता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है" से