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अध्याय 7 सत्य के अन्य पहलू जो तुम्हें परमेश्वर में अपनी आस्था में समझना चाहिए

6. पीड़ा का अर्थ और परमेश्वर के विश्वासियों को किस प्रकार की पीड़ा अवश्य सहनी चाहिए

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

आज अधिकाँश लोगों के पास यह ज्ञान नहीं है। वे मानते हैं कि दुःख उठाने का कोई महत्व नहीं है, वे संसार के द्वारा त्यागे जाते हैं, उनके पारिवारिक जीवन में परेशानी होती है, वे परमेश्वर के प्रिय भी नहीं होते, और उनकी अपेक्षाएँ काफी निराशापूर्ण होती हैं। कुछ लोगों के कष्ट एक विशेष बिंदु तक पहुँच जाते हैं, और उनके विचार मृत्यु की ओर मुड़ जाते हैं। यह परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें बिलकुल धीरज नहीं होता, वे कमजोर और शक्तिहीन होते हैं! परमेश्वर उत्सुक है कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परंतु मनुष्य जितना अधिक उससे प्रेम करता है, मनुष्य के कष्ट उतने अधिक बढ़ते हैं, और जितना अधिक मनुष्य उससे प्रेम करता है, मनुष्य के क्लेश उतने अधिक होते हैं। यदि तुम उससे प्रेम करते हो, तब हर प्रकार के कष्ट तुम पर आएँगे—और यदि तुम उससे प्रेम नहीं करते, तब शायद सब कुछ तुम्हारे लिए अच्छा चलता रहेगा, और तुम्हारे चारों ओर सब कुछ शांतिमय होगा। जब तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तो तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर सब कुछ दुर्गम है, और क्योंकि तुम्हारी क्षमता बहुत कम है, इसलिए तुम्हें शुद्ध किया जाएगा, इसके अलावा तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हो और तुम हमेशा महसूस करोगे कि परमेश्वर की इच्छा बहुत अधिक बड़ी है, कि यह मनुष्य की पहुँच से बाहर है। इन सब बातों के कारण तुम्हें शुद्ध किया जाएगा—क्योंकि तुममें बहुत निर्बलता है, और ऐसा बहुत कुछ है जो परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने में असमर्थ है, इसलिए तुम्हें भीतर से शुद्ध किया जाएगा। फिर भी तुम्हें स्पष्टता से यह देखना आवश्यक है कि केवल शोधन के द्वारा ही शुद्धीकरण प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार, इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और परमेश्वर की कृपा पर रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो" से उद्धृत

निराश न हो, कमज़ोर न बनो, मैं तुम्हारे सामने प्रकट करूंगा। राज्य की राह इतनी आसान नहीं है, कुछ भी इतना सरल नहीं है! तुम चाहते हो कि आशीष आसानी से मिल जाएं, हैं न? आज हर किसी को कड़वे परीक्षणों का सामना करना होगा, अन्यथा तुम लोगों के पास जो मुझे प्यार करने वाला दिल है वह मजबूत नहीं होगा और मेरे लिए तुम्हारा प्यार सच्चा नहीं होगा। यहां तक कि यदि मामूली परिस्थितियां भी होंगी, तो भी सभी को उनसे गुज़रना होगा, बस वे कुछ हद तक भिन्न होंगी। परिस्थिति मेरे आशीषों में से एक है, मेरा आशीष प्राप्त करने के लिए कितने हैं जो मेरे सामने घुटने टेकते हैं? बेवकूफ़ बच्चे! तुम्हें हमेशा महसूस होता है कि कुछ भाग्यशाली वचन मेरा आशीष हैं, फिर भी तुम्हें यह नहीं लगता कि कड़वाहट मेरे आशीषों में से एक है। जो लोग मेरी कड़वाहट को बांटेंगे वे निश्चित रूप से मेरी मिठास भी साझा करेंगे। यह मेरा वादा है और तुम लोगों को मेरा आशीष है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 41" से उद्धृत

जब परमेश्वर मनुष्य को शुद्ध करने के लिए कार्य करता है, तो मनुष्य को कष्ट होता है। जितना अधिक उसका शुद्धिकरण होता है, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना अधिक विशाल होता है, और परमेश्वर की शक्ति उस में उतनी ही अधिक प्रकट हो जाती है। मनुष्य का शुद्धिकरण जितना कम होता है, उतना ही कम परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम होता है, और परमेश्वर की उतनी ही कम शक्ति उस में प्रकट होती है। उसका शुद्धिकरण एवं दर्द जितना ज़्यादा होता है तथा उसकी यातना जितनी अधिक होगी, परमेश्वर के प्रति उसका सच्चा प्रेम एवं विश्वास उतना ही अधिक गहरा होगा, परमेश्वर में उसकी आस्था उतनी ही अधिक सच्ची होगी, और परमेश्वर के विषय में उसका ज्ञान भी उतना ही अधिक गहरा होगा। तुम अपने अनुभवों में देखोगे कि वे जो अत्यधिक शुद्धिकरण तथा दर्द, और अधिक व्यवहार तथा अनुशासन सहते हैं, उनका परमेश्वर के प्रति गहरा प्रेम होता है, और उनके पास परमेश्वर का अधिक गहन एवं मर्मज्ञ ज्ञान होता है। ऐसे लोग जिन्होंने व्यवहार किए जाने का अनुभव नहीं किया है, उनके पास केवल सतही ज्ञान होता है, और वे केवल यह कह सकते हैं: "परमेश्वर बहुत अच्छा है, वह लोगों को अनुग्रह प्रदान करता है ताकि वे परमेश्वर में आनन्दित हो सकें।" यदि लोगों ने व्यवहार और अनुशासित किए जाने का अनुभव किया है, तो वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान के बारे में बोलने में समर्थ हैं। अतः मनुष्य में परमेश्वर का कार्य जितना ज़्यादा अद्भुत होता है, उतना ही ज़्यादा यह मूल्यवान एव महत्वपूर्ण होता है। यह तुम्हारे लिए जितना अधिक अभेद्य होता है और यह तुम्हारी अवधारणाओं के साथ जितना अधिक असंगत होता है, परमेश्वर का कार्य उतना ही अधिक तुम्हें जीतने में समर्थ होता है, तुम तक पहुँचता है और तुम्हें परिपूर्ण बना पाता है। परमेश्वर के कार्य का महत्व बहुत अधिक है! यदि उसने मनुष्य को इस तरीके से शुद्ध नहीं किया, यदि उसने इस पद्धति के अनुसार से कार्य नहीं किया, तो परमेश्वर का कार्य अप्रभावी और महत्वहीन होगा। अंत के दिनों के दौरान उसके द्वारा लोगों के एक समूह के चयन के पीछे असाधारण महत्व का यही कारण है। पहले यह कहा गया था कि परमेश्वर इस समूह को चयनित और प्राप्त करेगा। वह तुम लोगों के भीतर जितना बड़ा काम करता है, उतना ही ज़्यादा तुम लोगों का प्रेम गहरा एवं शुद्ध होता है। परमेश्वर का काम जितना अधिक विशाल होता है, उतना ही अधिक उसकी बुद्धिमत्ता का स्वाद लेने में तुम लोग समर्थ होते हैं और उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान उतना ही अधिक गहरा होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पूर्ण बनाए जाने वालों को शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए" से उद्धृत

तुझे सत्य के लिए कठिनाई उठानी होगी, तुझे स्वयं को सत्य के लिए देना होगा, तुझे सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुझे अधिक कष्ट से होकर गुज़रना होगा। तुझे यही करना चाहिए। एक शांतिपूर्ण पारिवारिक ज़िन्दगी के लिए तुझे सत्य को नहीं फेंकना चाहिए, और क्षणिक आनन्द के लिए तुझे अपने जीवन की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुझे उन सब चीज़ों का अनुसरण करना चाहिए जो ख़ूबसूरत और अच्छा है, और तुझे अपने जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज़्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तू एक ऐसा घिनौना जीवन जीता है, किसी उद्देश्य के लिए प्रयास नहीं करता है, तो क्या तू अपने जीवन को बर्बाद नहीं करता है? ऐसे जीवन से तू क्या हासिल कर पाएगा? तुझे एक सत्य के लिए देह के सारे सुख विलासों को छोड़ देना चाहिए, थोड़े से सुख विलास के लिए सारे सत्य को नहीं फेंकना चाहिए। ऐसे लोगों के पास कोई सत्यनिष्ठा और गरिमा नहीं होती है; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान" से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों के न्याय को प्राप्त करते समय, हमें कष्टों से नहीं घबराना चाहिये, न ही पीड़ा से डरना चाहिये; इस बात से तो बिल्कुल भी ख़ौफ़ नहीं खाना चाहिये कि परमेश्वर के वचन हमारे हृदय को वेध देंगे। हमें उनके वचनों को और अधिक पढ़ना चाहिये कि कैसे परमेश्वर न्याय करते हैं, ताड़ना देते हैं और कैसे हमारे भ्रष्ट सार को उजागर करते हैं। परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, हमें अक्सर उनसे अपनी तुलना करनी चाहिये। हमारे अंदर इनमें से किसी एक भ्रष्टता का भी अभाव नहीं है; हम सभी उनसे सहमत हो सकते हैं। ...हमें पहले जानना होगा कि इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उसके वचन सुनने में अच्‍छे लगते हैं, कि वे हमें कड़वाहट का एहसास कराते हैं या मिठास का—हमें उन सबको स्‍वीकार करना चाहिए। हमें परमेश्‍वर के वचनों के प्रति यही दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। यह किस प्रकार का दृष्टिकोण है? क्‍या यह परमेश्वर भक्तिका दृष्टिकोण है? सहिष्‍णुता का है? या यह कष्‍ट सहने का दृष्टिकोण है? मैं तुमसे कहता हूं, यह इनमें से कोई नहीं है। हमें दृढ़ता से यह बनाए रखना चाहिए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं। चूँकि वे सचमुच सत्य हैं, हमें उन्हें तर्कसंगत ढंग से स्वीकार कर लेना चाहिये। हम इस बात को भले ही न पहचानें या स्वीकार न करें, लेकिन परमेश्वर के वचनों के प्रति हमारा पहला रुख़ पूर्ण स्वीकृति का होना चाहिये।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "सत्य के अनुसरण का महत्व और मार्ग" से उद्धृत

परमेश्वर को प्रेम करने के लिए आवश्यक है सभी चीज़ों में उसकी इच्छा को खोजना, और यह कि जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है तो तुम अपने भीतर गहराई में खोज करते हो, परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश करना, और यह देखने की कोशिश करना कि इस मामले में परमेश्वर की इच्छा क्या है, वह क्या चाहता है कि तुम हासिल करो, और कैसे तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति सावधान रहना चाहिए। उदाहरण के लिए: ऐसा कुछ होता है जिसमें तुम्हें कठिनाई झेलने की आवश्यकता होती है, उस समय तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, और कैसे तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति सावधान रहना चाहिए। तुम्हें स्वयं को संतुष्ट नहीं करना चाहिए: सबसे पहले अपने आप को एक तरफ़ रखें। देह से अधिक अधम कुछ और नहीं है। तुम्हें अवश्य परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए और अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहिए। इस प्रकार के विचारों के साथ, परमेश्वर इस मामले में तुम पर अपनी विशेष प्रबुद्धता लाएगा, और तुम्हारे हृदय को भी आराम मिलेगा। जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, तो सबसे पहले तुम्हें अपने आपको अवश्य एक तरफ़ रखना और देह को सभी चीज़ों में सबसे अधम समझना चाहिए। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करोगे, यह उतनी ही अधिक यह स्वाधीनता लेता है; यदि तुम इस समय इसे संतुष्ट करते हो, तो अगली बार यह तुमसे और अधिक की माँग करेगा, और जैसे-जैसे यह जारी रहता है, तुम देह को और भी अधिक प्रेम करते जाते हो। देह की हमेशा ही असंयमी इच्छाएँ होती हैं, और यह हमेशा चाहता है कि तुम इसे संतुष्ट और इसे भीतर से तुष्ट करो, चाहे यह उन चीज़ों में हो जिन्हें तुम खाते हो, जो तुम पहनते हो, जिनमें अनियंत्रित रूप से क्रोधित होते हो, या स्वयं की कमज़ोरी और आलस को बढ़ावा देते हो...। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करते हो, उसकी कामनाएँ उतनी ही अधिक हो जाती हैं, और उतनी ही अधिक वह लंपट बन जाती है, जब तक कि वह उस स्थिति तक नहीं पहुँच जाती है जहाँ मनुष्य की देह और अधिक गहरी धारणाओं को आश्रय देती है, और परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करती है और स्वयं को ऊँचा उठाती है और परमेश्वर के कार्यों के बारे में संशयात्मक हो जाती है। ...इस प्रकार से, तुम्हें अवश्य देह के विरोध में विद्रोह करना चाहिए, और इसको बढ़ावा नहीं देना चाहिए: "मेरा पति (मेरी पत्नी), बच्चे, सम्भावनाएँ, विवाह, परिवार—इनमें से कुछ भी मायने नहीं रखता है! मेरे हृदय में केवल परमेश्वर ही है और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपना अथक प्रयास अवश्य करना चाहिए और देह को संतुष्ट करने के लिए प्रयास नहीं करना चाहिए।" तुममें ऐसा संकल्प होना चाहिए। यदि तुममें हमेशा इस प्रकार का संकल्प रहेगा, तो जब तुम सत्य को अभ्यास में लाओगे, और अपने आप को एक ओर करोगे, तो तुम ऐसा बहुत ही कम प्रयास के द्वारा कर पाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है" से उद्धृत

तुम परमेश्वर के सामने जीवन प्राप्त कर सकते हो या नहीं, और तुम्हारा अंतिम अंत क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम देह के प्रति अपना विद्रोह कैसे करते हो। परमेश्वर ने तुम्हें बचाया है, और तुम्हें चुना है और पूर्वनिर्धारित किया है, फिर भी यदि आज तुम उसे संतुष्ट करने के अनिच्छुक हो, तुम सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हो, तुम अपनी स्वयं की देह के विरूद्ध एक ऐसे हृदय के साथ विद्रोह करने के अनिच्छुक हो जो सचमुच परमेश्वर से प्रेम करता हो, तो अंततः तुम अपने आप को बर्बाद कर दोगे, और इसलिए चरम पीड़ा सहोगे। यदि तुम हमेशा अपनी देह को खुश करते हो, तो शैतान तुम्हें भीतर से धीरे-धीरे निगल लेगा, और तुम्हें जीवन या पवित्रात्मा के स्पर्श से रहित छोड़ देगा, जब तक कि वह दिन नहीं आ जाता, जब तुम भीतर से पूरी तरह अंधकारमय नहीं हो जाते हो। जब तुम अंधकार में रहोगे, तो तुम्हें शैतान के द्वारा बंदी बना लिया जाएगा, तुम्हारे हृदय में परमेश्वर अब और नहीं होगा, और उस समय तुम परमेश्वर के अस्तित्व को इनकार करोगे और उसे छोड़ दोगे। इस प्रकार, यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करने की इच्छा रखते हो, तो तुम्हें अवश्य पीड़ा की क़ीमत चुकानी चाहिए और कठिनाई को सहना चाहिए। बाहरी जोश की और कठिनाईयों को सहने की, अधिक पढ़ने तथा अधिक इधर-उधर भागने की आवश्यकता नहीं है; इसके बजाय, तुम्हें अपने भीतर की चीज़ों को एक तरफ रख देना चाहिए: असंयमी विचार, व्यक्तिगत हित, और तुम्हारे स्वयं के विचार, धारणाएँ और प्रेरणाएँ। ऐसी ही परमेश्वर की इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है" से उद्धृत

परमेश्वर लोगों से मुख्य रूप से उनके भीतर की चीज़ों से निपटने, उनके विचारों और धारणाओं से, जो परमेश्वर के मनोनुकूल नहीं हैं, निपटने के लिए सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कहता है। पवित्र आत्मा लोगों के हृदय में स्पर्श करता है और उन्हें प्रबुद्ध और रोशन करता है। इसलिए जो कुछ होता है उन सब के पीछे एक संघर्ष होता है: प्रत्येक बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं या परमेश्वर के लिए प्रेम को अभ्यास में लाते हैं, तो एक बड़ा संघर्ष होता है, और यद्यपि देह के साथ सभी अच्छे दिखाई दे सकते हैं, किन्तु, वास्तव में, उनके हृदय की गहराई में जीवन और मृत्यु का संघर्ष चल रहा होगा—और केवल इस घमासान संघर्ष के बाद ही, एक अत्यधिक चिंतन के बाद ही, जीत या हार तय की जा सकती है। कोई यह नहीं जानता है कि रोया जाए या हँसा जाए। क्योंकि मनुष्यों के भीतर की बहुत सी प्रेरणाएँ ग़लत हैं, या फिर क्योंकि परमेश्वर का अधिकांश कार्य उनकी धारणाओं से विलक्षण होता है, इसलिए जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं तो पर्दे के पीछे एक बड़ा संघर्ष छिड़ जाता है। इस सत्य को अभ्यास में लाकर, पर्दे के पीछे लोग अंततः परमेश्वर को संतुष्ट करने का मन बनाने के पहले उदासी के असंख्य आँसू बहा चुके होंगे। यह इसी संघर्ष के कारण है कि लोग दुःख और शुद्धिकरण को सहते हैं; यही असली कष्ट सहना है। जब संघर्ष तुम्हारे ऊपर पड़ता है, तब यदि तुम सचमुच परमेश्वर की ओर खड़े रहने में समर्थ होते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे। सत्य के अभ्यास के दौरान पीड़ा सहना अपरिहार्य है; यदि, जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, उस समय उनके भीतर सब कुछ ठीक होता, तो उन्हें परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने की आवश्यकता नहीं होती, और कोई संघर्ष नहीं होता और वे पीड़ित नहीं होते। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के भीतर कई ऐसी चीज़ें हैं जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग के लिए उचित नहीं हैं, और देह का अधिक विद्रोही स्वभाव है, जिससे लोगों को देह के विरुद्ध विद्रोह करने के सबक को अधिक गहराई से सीखने की आवश्यकता है। इसी को परमेश्वर पीड़ा कहता है जिससे लोगों को उसके साथ गुज़रने के लिए उसने कहा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है" से उद्धृत

परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग, भविष्य के लिए आशीर्वाद पाने की खोज करते हैं; यह उनकी आस्‍था में उनका लक्ष्‍य होता है। सभी लोगों की यही अभिलाषा और आशा होती है, लेकिन, उनकी प्रकृति के भीतर के भ्रष्टाचार का हल परीक्षण के माध्यम से किया जाना चाहिए। जिन-जिन पहलुओं में तुमशुद्ध नहीं किए गए हो, इन पहलुओं में तुम्हें परिष्कृत किया जाना चाहिए—यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर तुम्हारे लिए एक वातावरण बनाता है, परिष्कृत होने के लिए बाध्य करता है जिससे तुम अपने खुद के भ्रष्टाचार को जान जाओ। अंततः तुम उस बिंदु पर पहुंच जाते हो जहां तुम मर जाना और अपनी योजनाओं और इच्छाओं को छोड़ देन और परमेश्वर की सार्वभौमिकता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करना अधिक पसंद करते हो। इसलिए अगर लोगों को कई वर्षों का शुद्धिकरण नहीं मिलत है, अगर वे एक हद तक पीड़ा नहीं सहते हैं, तो वे, अपनी सोच और हृदय में देह के भ्रष्टाचार के बंधन से बचने में सक्षम नहीं होंगे। जिन भी पहलुओं में तुम अभी भी शैतान के बंधन के अधीन हो, जिन भी पहलुओं में तुमअभी भी अपनी इच्छाएं रखते हो, जिनमें तुम्हारी अपनी मांगें हैं, यही वे पहलू हैं जिनमें तुम्हें कष्ट उठाना होगा। केवल दुख से ही सबक सीखा जा सकता है, जिसका अर्थ है सत्य पाने और परमेश्वर के इरादा को समझने में समर्थ होना। वास्तव में, कई सत्यों को कष्टदायक परीक्षणों के अनुभव से समझा जाता है। कोई भी व्यक्ति एक आरामदायक और सहज परिवेश में या अनुकूल परिस्थिति में परमेश्वर की इच्छा नहीं समझ सकता है, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को नहीं पहचान सकता है, परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की सराहना नहीं कर सकता है। यह असंभव होगा!

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "परीक्षणों के बीच परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करें" से उद्धृत

परमेश्वर हर एक व्यक्ति में कार्य करता है, और इससे फर्क नहीं पड़ता है कि उसकी विधि क्या है, सेवा करने के लिए वो किस प्रकार के लोगों, चीज़ों या मामलों का प्रयोग करता है, या उसके वचनों के लहजे किस तरह के हो, उसका केवल एक ही अंतिम लक्ष्य होता है: तुझे बचाना। तुझे बचाने के पहले, उसे तुझे रूपांतरित करने की आवश्यकता है, तो तू थोड़ी-सी पीड़ा कैसे सहन नहीं कर सकता है? तुझे पीड़ा सहनी होगी। इस पीड़ा में कई चीजें शामिल हो सकती हो। परमेश्वर तेरे आसपास के लोगों, मामलों, और चीज़ों को उठाता है, ताकि तू खुद को जान सके या फिर सीधे तेरे साथ निपटा जा सके, तेरी काट-छाँट और तुझे उजागर किया जा सके। ऑपरेशन की मेज़ पर पड़े किसी व्यक्ति की तरह—तुझे अच्छे परिणाम के लिए कुछ दर्द सहना होगा। यदि हर बार जब तेरी काट-छाँट होती है और तुझसे निपटा जाता है और हर बार जब वह लोगों, मामलों, और चीज़ों को उठाता है, इससे तेरी भावनाओं में हलचल पैदा होती है और तुझे प्रोत्साहन मिलता है, तो यह सही है, और तेरे पास कद-काठी होगी और तू सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करेगा। यदि, हर बार काटे-छांटे जाने, निपटारा किए जाने, और हर बार परमेश्वर द्वारा तुम्हारे परिवेश को ऊपर उठाये जाने पर तुम्हें थोड़ी-भी पीड़ा या असुविधा महसूस नहीं होती है और कुछ भी महसूस नहीं होता है, और यदि तुम परमेश्वर के सामने उसकी इच्छा की तलाश करने नहीं आते हो, न प्रार्थना करते हो, न ही सत्य की खोज करते हो, तब तुम वास्तव में बहुत संवेदनहीन हो! यदि कोई व्यक्ति बहुत अधिक संवेदनहीन है, और कभी भी आध्यात्मिक रूप से सचेत नहीं होता है, तो परमेश्वर के पास उस पर कार्य करने का कोई रास्ता नहीं होगा। परमेश्वर कहेगा, "यह व्यक्ति ज़्यादा ही संवेदनहीन है, और बहुत गहराई से भ्रष्ट किया गया है। मैंने उस पर बहुत सारे कार्य किए हैं, बहुत प्रयास किए हैं, फिर भी मैं अभी तक उसके दिल को पुकार नहीं सकता हूँ, न ही मैं उसकी आत्मा को जगा सकता हूँ। इसके साथ कार्य करना बहुत परेशानी देने वाला और मुश्किल है।" यदि परमेश्वर तुम्हारे लिए विशेष परिवेशों, लोगों, चीज़ों और वस्तुओं की व्यवस्था करता है, यदि वह तुम्हारी काट-छाँट और तुम्हारे साथ व्यवहार करता है और यदि तुम इससे सबक सीखते हो, यदि तुमने परमेश्वर के सामने आना सीख लिया है, तुमने सत्य की तलाश करना सीख लिया है, तुम अनजाने में, प्रबुद्ध और रोशन हुए हो और तुमने सत्य को प्राप्त किया है, यदि तुमने इन परिवेशों के मध्य बदलाव का अनुभव किया है, पुरस्कार प्राप्त किए हैं, और प्रगति की है, यदि तुम परमेश्वर की इच्छा की थोड़ी-सी समझ पाना शुरू करते हो और शिकायत करना बंद कर देते हो, तो इन सबका मतलब यह होगा कि तुम इन परिवेशों के परीक्षण के बीच में अडिग रहे हो, और तुमने परीक्षा का सामना किया है। इस तरह से तुमने इस कठिन परीक्षा को पार कर लिया होगा।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "सत्य को प्राप्त करने के लिए, तुझे लोगों, मामलों और अपने आसपास की चीज़ों से अवश्य सीखना चाहिए" से उद्धृत

पिछला:परमेश्वर पर विश्वास केवल शान्ति और आशीषों को खोजने के लिए ही नहीं होना चाहिए

अगला:परमेश्वर पर विश्वास करने वालों को अपने गंतव्य के लिए भले कार्यों से पर्याप्त होकर तैयार होना चाहिए

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