6. पीड़ा का अर्थ और परमेश्वर के विश्वासियों को किस प्रकार की पीड़ा अवश्य सहनी चाहिए
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
आज अधिकतर लोगों के पास यह ज्ञान नहीं है। वे मानते हैं कि कष्ट सहने का कोई मूल्य नहीं है और दुनिया उन्हें ठुकरा देती है, उनका पारिवारिक जीवन अशांत रहता है, परमेश्वर उनसे प्रसन्न नहीं होता और उनका भविष्य अंधकारमय है। कुछ लोग तो एक निश्चित सीमा तक कष्ट सहते हुए मर ही जाना चाहते हैं। यह परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें दृढ़ता नहीं होती है, वे रीढ़विहीन और अक्षम होते हैं! परमेश्वर उत्सुक है कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परंतु मनुष्य जितना अधिक उससे प्रेम करता है, उसके कष्ट उतने अधिक बढ़ते हैं और जितना अधिक मनुष्य उससे प्रेम करता है, उसके परीक्षण उतने अधिक बढ़ते हैं। यदि तुम उससे प्रेम करते हो तो तुम्हारे ऊपर हर प्रकार के कष्ट आ पड़ेंगे—और यदि तुम उससे प्रेम नहीं करते, तब शायद सब कुछ तुम्हारे लिए सुचारु रूप से चलता रहेगा और तुम्हारे चारों ओर सब कुछ शांतिपूर्ण होगा। जब तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो तो तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर बहुत-कुछ अजेय है। और चूँकि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, इसलिए तुम्हारा शोधन किया जाएगा और तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ रहोगे—तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि परमेश्वर के इरादे बहुत ही ऊँचे हैं और वे मनुष्य की पहुँच से बाहर हैं। इन सबकी वजह से तुम्हारा शोधन किया जाएगा—क्योंकि तुममें बहुत कमजोरी है और तुम कई मायनों में परमेश्वर के इरादे पूरे करने में असमर्थ हो, इसलिए तुम्हारा भीतर से शोधन किया जाएगा। फिर भी तुम लोगों को यह स्पष्ट देखना चाहिए कि शुद्धिकरण केवल शोधन के द्वारा ही प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार, इन अंत के दिनों में तुम लोगों को परमेश्वर के लिए गवाही देनी चाहिए। चाहे तुम्हारे कष्ट कितने भी बड़े क्यों न हों, तुम्हें बिल्कुल अंत तक चलना चाहिए, यहाँ तक कि अपनी अंतिम साँस तक तुम्हें परमेश्वर के प्रति वफादार होना चाहिए और खुद को परमेश्वर के आयोजन की दया पर छोड़ देना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही सशक्त और गुंजायमान गवाही है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो
निराश न होओ, कमजोर न बनो और मैं तुम्हारे सामने चीजें प्रकट कर दूँगा। राज्य का मार्ग इतना सुगम नहीं है—कुछ भी इतनी आसानी से नहीं आता है! तुम चाहते हो कि तुम्हें आशीष आसानी से मिल जाएँ, है ना? आज हर किसी को कड़वे परीक्षणों का सामना करना होगा। बिना इन परीक्षणों के मुझे प्रेम करने वाला तुम लोगों का दिल और मजबूत नहीं होगा और तुम्हें मुझसे सच्चा प्रेम नहीं होगा। भले ही ये परीक्षण केवल मामूली परिस्थितियों से युक्त हों, तो भी हरेक को ये परीक्षण पार करने होंगे; अंतर केवल इतना है कि परीक्षणों की तीव्रता अलग-अलग होगी। परीक्षण मेरी ओर से आशीष हैं और तुममें से कितने लोग अक्सर मेरे सामने घुटनों के बल झुकते हैं, मेरे आशीष के लिए विनती करते हैं? बेवकूफ बच्चो! तुम्हें हमेशा लगता है कि कुछ शुभ वचन ही मेरे आशीष होते हैं, लेकिन तुम कभी नहीं मानते कि कड़वाहट मेरा आशीष है। जो लोग मेरी कड़वाहट में हिस्सा बँटाते हैं वे निश्चित रूप से मेरी मिठास में भी हिस्सा बँटाएँगे। यह मेरा वादा है और तुम लोगों को मेरा आशीष है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 41
जब परमेश्वर मनुष्य का शोधन करने के लिए काम करता है, तो मनुष्य कष्ट सहता है। किसी व्यक्ति का शोधन जितना अधिक होता है, उसका परमेश्वर-प्रेमी दिल उतना ही बड़ा होगा और उसमें परमेश्वर का महान सामर्थ्य उतना ही अधिक प्रकट होगा। इसके विपरीत, किसी व्यक्ति का शोधन जितना कम होता है, उसका परमेश्वर-प्रेमी दिल उतना ही छोटा होगा और उसमें परमेश्वर का महान सामर्थ्य उतना ही कम प्रकट होगा। किसी व्यक्ति का शोधन और दर्द जितना अधिक होता है और वह जितनी अधिक पीड़ा का अनुभव करता है, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना ही गहरा होता जाएगा, परमेश्वर में उसकी आस्था उतनी ही अधिक सच्ची होती जाएगी और परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान उतना ही अधिक गहरा होता जाएगा। अपने अनुभवों में, तुम देखोगे कि जो लोग अत्यंत शोधन और कष्ट से गुजरते हैं, जिनकी बहुत अधिक काट-छाँट की जाती है और जिन्हें बहुत अधिक अनुशासित किया जाता है, उनमें परमेश्वर के लिए एक गहरा प्रेम और परमेश्वर का एक अधिक गहरा और संपूर्ण ज्ञान होता है। जिन लोगों ने काट-छाँट किए जाने का अनुभव नहीं किया है, उनके पास केवल सतही ज्ञान होता है। वे केवल यह कह सकते हैं, “परमेश्वर बहुत अच्छा है, वह लोगों को अनुग्रह देता है ताकि वे उसका आनंद ले सकें।” यदि उन्होंने काट-छाँट किए जाने और अनुशासित किए जाने का अनुभव किया है, तो वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान के बारे में बात करने में सक्षम होते हैं। इसलिए परमेश्वर का कार्य मनुष्य पर जितना अधिक अद्भुत होता है, वह उतना ही अधिक मूल्यवान और महत्वपूर्ण होता है। यह तुम्हारे लिए जितना अधिक अबूझ होता है और तुम्हारी धारणाओं के साथ जितना अधिक असंगत होता है, परमेश्वर का कार्य तुम्हें उतना ही अधिक जीतने, तुम्हें प्राप्त करने और तुम्हें पूर्ण बनाने में सक्षम होता है। परमेश्वर के कार्य का महत्व कितना अधिक है! यदि परमेश्वर मनुष्य का इस तरह शोधन न करे, यदि वह इस पद्धति के अनुसार कार्य न करे, तो उसका कार्य निष्प्रभावी और महत्वहीन होगा। अतीत में जिसका उल्लेख किया गया था, उसका असाधारण महत्व इसी में निहित है—परमेश्वर द्वारा इस समूह को चुनना और प्राप्त करना और अंत के दिनों में उसे पूर्ण करना। वह तुम लोगों पर जितना बड़ा कार्य करता है, परमेश्वर के प्रति तुम लोगों का प्रेम उतना ही ज्यादा गहरा एवं शुद्ध होता है। परमेश्वर का कार्य जितना बड़ा होता है, उतना ही अधिक मनुष्य उसकी बुद्धि के बारे में कुछ समझ पाता है और उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान उतना ही अधिक गहरा होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा
तुम्हें सत्य के लिए कष्ट उठाने चाहिए, तुम्हें सत्य के लिए खुद को कुर्बान करना चाहिए, तुम्हें सत्य के लिए अपमान सहना चाहिए और तुम्हें और अधिक सत्य प्राप्त करने की खातिर और अधिक कष्ट सहना चाहिए। यही है जो तुम्हें करना चाहिए। पारिवारिक सामंजस्य का आनंद लेने की खातिर तुम्हें सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए और तुम्हें अस्थायी आनंद के लिए जीवन भर की गरिमा और सत्यनिष्ठा नहीं गँवानी चाहिए। तुम्हें उस सबका अनुसरण करना चाहिए जो खूबसूरत और अच्छा है और तुम्हें जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज्यादा अर्थपूर्ण है। अगर तुम ऐसा साधारण और सांसारिक जीवन जीते हो और तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए कोई लक्ष्य नहीं है, तो क्या यह अपना जीवन बर्बाद करना नहीं है? ऐसे जीवन से तुम क्या पा सकते हो? तुम्हें एक सत्य के लिए देह के सभी सुख त्याग देने चाहिए और थोड़े-से सुख के लिए सारे सत्य नहीं छोड़ने चाहिए। ऐसे लोगों में कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती; उनके होने का कोई अर्थ नहीं है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
जब परमेश्वर के वचनों का न्याय स्वीकार करने की बात आती है, तो अपने दिल में दर्द सहने से मत डरो, परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर किए जाने पर अपनी गरिमा और इज्जत खोने से मत डरो और इससे भी बढ़कर, अपनी भद्दी दशाओं के उजागर होने और दूसरों द्वारा उनकी असलियत जान लिए जाने से मत डरो। केवल इन पीड़ाओं को सहकर ही तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को जान सकते हो, अपनी गहरी भ्रष्टता की सच्चाई की असलियत जान सकते हो, अपने दिल से खुद से और शैतान से नफरत कर सकते हो और आसानी से अपनी देह और शैतान के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो। जब तुम सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम हो जाओगे, तो तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को उतारकर फेंक चुके होगे। न्याय स्वीकार करते समय लोगों के लिए इस तरह से कष्ट सहना बहुत फायदेमंद है। परमेश्वर के विश्वासी के रूप में, तुम्हें लोगों का न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने वाले परमेश्वर के वचन अधिक पढ़ने चाहिए, विशेष रूप से वे वचन जो मानवजाति की भ्रष्टता के सार को उजागर करते हैं। तुम्हें उन्हें अपनी वास्तविक दशा से अधिक जोड़ना चाहिए और तुम्हें उन्हें खुद पर अधिक और दूसरों पर कम लागू करना चाहिए। परमेश्वर जिन विभिन्न दशाओं को उजागर करता है, वे हर व्यक्ति में काफी अधिक दिखाई देती हैं और वे सभी उनमें पाई जा सकती हैं। अगर तुम्हें इस पर विश्वास नहीं है, तो इसे अनुभव करके देखो। तुम जितना ज्यादा अनुभव करोगे, उतना ही ज्यादा खुद को जानोगे, और उतना ही ज्यादा यह महसूस करोगे कि परमेश्वर के वचन बिल्कुल सही हैं। ... हमें पहले यह समझना होगा कि परमेश्वर जो कुछ भी कहता है, वह सत्य है और तथ्यों के अनुरूप है, और लोगों का न्याय करके उन्हें उजागर करने वाले उसके वचन चाहे जितने भी कठोर क्यों न हों, या लोगों के साथ सत्य की संगति करने या उन्हें प्रोत्साहित करने वाले उसके वचन कितने भी कोमल क्यों न हों, चाहे उसके वचन न्याय हों या आशीष, चाहे वे निंदा हों या शाप, और चाहे वे लोगों को कड़वाहट का एहसास कराते हों या मिठास का, लोगों को वे सब स्वीकार करने चाहिए। यही वह रवैया है जो लोगों को परमेश्वर के वचनों के प्रति अपनाना चाहिए। यह किस प्रकार का रवैया है? क्या यह भक्ति का रवैया है, धैर्यशीलता का रवैया है या कष्ट सहने का रवैया है? तुम थोड़ी उलझन में हो। मैं तुमसे कहता हूँ कि यह इनमें से कोई नहीं है। अपनी आस्था में, लोगों को दृढ़ता से यह मानना चाहिए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और चूँकि वे सत्य हैं, लोगों को उन्हें विवेक के साथ स्वीकार कर लेना चाहिए। चाहे वे इसे पहचानने या मानने में सक्षम हों या नहीं, उनका पहला रवैया परमेश्वर के वचनों को पूरी तरह से अपने दिलों में स्वीकार करने का होना चाहिए; केवल यही परमेश्वर के प्रति समर्पण का रवैया है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य के अनुसरण का महत्व और मार्ग
परमेश्वर से प्रेम करने के लिए आवश्यक है सभी चीजों में उसके इरादों को खोजना, और जब तुम्हारे साथ कुछ घटित हो जाए, तो तुम अपने भीतर गहराई में खोज करो, परमेश्वर के इरादे समझने की कोशिश करो और देखो कि इन मामलों में वे क्या हैं, परमेश्वर तुमसे क्या हासिल करने के लिए कहता है और कैसे तुम्हें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहना चाहिए। उदाहरण के लिए : कोई ऐसी चीज होती है जिसमें तुम्हें कष्ट उठाने की जरूरत पड़ती है, तो उस समय तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर का इरादा क्या है और कैसे तुम्हें उसके इरादों के प्रति विचारशील रहना चाहिए। तुम्हें स्वयं को संतुष्ट नहीं करना चाहिए : पहले अपने आप को छोड़ दो। देह से अधिक अधम कोई और चीज नहीं है। तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास करना चाहिए और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। ऐसे विचारों के साथ इस मामले के संबंध में परमेश्वर तुम्हें खास तौर से प्रबुद्ध करेगा और तुम्हारे हृदय को भी आराम मिलेगा। जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, तब पहले तुम्हें खुद को छोड़ना होगा और देह को सभी चीजों में सबसे अधम समझना होगा। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करोगे, यह उतनी ही अधिक मनमानी करने लगेगी। यदि तुम इस समय इसे संतुष्ट करते हो तो अगली बार यह तुमसे और अधिक की माँग करेगी। जब यह जारी रहता है, तब तुम देह को और अधिक प्रेम करने लगते हो। देह की हमेशा असंयमित इच्छाएँ होती हैं; यह हमेशा चाहती है कि तुम इसे संतुष्ट और भीतर से प्रसन्न करो, चाहे यह उन चीजों में हो जिन्हें तुम खाते हो, जो तुम पहनते हो या अपना आपा खो देते हो या स्वयं की कमजोरी और आलस को बढ़ावा देते हो...। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करते हो, उसकी कामनाएँ उतनी ही बड़ी हो जाती हैं और वह उतनी ही अधिक आसक्त बन जाती है, जब तक कि यह उस बिंदु तक नहीं पहुँच जाता जहाँ तुम्हारी देह और अधिक गहरी धारणाएँ पाल लेती है और परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर देती है और स्वयं को ऊँचा उठाती है और परमेश्वर के कार्य के बारे में शंकालु हो जाती है। ... इसलिए तुम्हें देह से विद्रोह करना चाहिए और इसके आगे झुकना नहीं चाहिए : “मेरा पति (मेरी पत्नी), बच्चे, भविष्य की संभावनाएँ, विवाह, परिवार—इनमें से कुछ भी मायने नहीं रखता! मेरे हृदय में केवल परमेश्वर है और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए और देह को संतुष्ट नहीं करना चाहिए।” तुममें ऐसा संकल्प होना चाहिए। यदि तुममें हमेशा इस प्रकार का संकल्प रहेगा, तो जब तुम सत्य को अभ्यास में लाओगे और अपने आप को दरकिनार रखोगे, तो तुम ऐसा केवल थोड़ा-सा प्रयास करके कर सकोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है
तुम परमेश्वर के सामने जीवन हासिल कर सकते हो या नहीं और तुम्हारा अंतिम परिणाम क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम देह के खिलाफ विद्रोह करने का अभ्यास कैसे करते हो। परमेश्वर ने तुम्हें बचाया है और तुम्हें चुना और पूर्वनिर्धारित किया है, फिर भी यदि आज तुम उसे संतुष्ट करने के अनिच्छुक हो, सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हो और एक सच्चे परमेश्वर-प्रेमी हृदय के साथ अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने के अनिच्छुक हो तो तुम अंततः खुद को नष्ट कर दोगे और इस प्रकार अत्यंत पीड़ा सहोगे। यदि तुम सदा देह में लिप्त रहते हो, तो शैतान धीरे-धीरे तुम्हें निगल जाएगा और तुम्हें जीवन या आत्मा के स्पर्श से रहित छोड़ देगा, जब तक वह दिन नहीं आता है जब तुम भीतर से पूरी तरह अंधकारमय हो जाते हो। जब तुम अंधकार में जिओगे तो तुम्हें शैतान के द्वारा बंदी बना लिया जाएगा, तुम्हारे हृदय में परमेश्वर का कोई स्थान नहीं रहेगा और उस समय तुम परमेश्वर के अस्तित्व को नकार दोगे और उसे छोड़ दोगे। इस प्रकार यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं तो उन्हें पीड़ा और कष्ट सहने की कीमत चुकानी होगी। बाहरी जोश और कठिनाई की कोई जरूरत नहीं है, जैसे कि, अधिक पढ़ना तथा अधिक भाग-दौड़ करना; इसके बजाय उन्हें अपने भीतर की चीजें यानी असंयमित विचार, व्यक्तिगत हित और अपनी योजनाएँ, धारणाएँ और मंशाएँ एक तरफ रख देनी चाहिए। यह परमेश्वर का इरादा है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है
जब परमेश्वर लोगों से सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कहता है, तो वह मुख्य रूप से उनके भीतर की चीज़ों की काट-छाँट करने और उनके उन विचारों और धारणाओं की, जो परमेश्वर के इरादे के अनुरूप नहीं हैं, काट-छाँट करने के लिए होता है—पवित्र आत्मा लोगों के हृदयों को छूता है और उन्हें प्रबुद्ध और रोशन करता है। इसलिए जो कुछ होता है, उस सबके पीछे एक संघर्ष होता है : हर बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं या परमेश्वर से प्रेम करने का अभ्यास करते हैं, तो एक बड़ा संघर्ष होता है और यद्यपि बाहरी रूप से उनकी देह में सब कुछ ठीक दिखाई दे सकता है, किंतु वास्तव में उनके हृदय की गहराई में जीवन और मृत्यु का संघर्ष चल रहा होता है—और केवल इस घमासान संघर्ष के बाद, अत्यधिक चिंतन के बाद ही, जीत या हार का निर्णय हो सकता है। कोई यह नहीं जानता कि रोया जाए या हँसा जाए। चूँकि मनुष्यों के भीतर के अनेक इरादे ग़लत हैं, या फिर चूँकि परमेश्वर का अधिकांश कार्य उनकी धारणाओं से मेल नहीं खाता, इसलिए जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं, तो पर्दे के पीछे एक बड़ा संघर्ष छिड़ जाता है। इस सत्य को अभ्यास में लाकर, पर्दे के पीछे लोग अंततः परमेश्वर को संतुष्ट करने का मन बनाने से पहले उदासी के असंख्य आँसू बहा चुके होंगे। यह इसी संघर्ष के कारण है कि लोग दुःख और शोधन सहते हैं; यही असली कष्ट सहना है। जब संघर्ष तुम्हारे ऊपर पड़ता है, तब यदि तुम सचमुच परमेश्वर की ओर खड़े रहने में समर्थ होते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे। सत्य का अभ्यास करते हुए व्यक्ति का अपने अंदर पीड़ा सहना अपरिहार्य है; यदि, जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, उस समय उनके भीतर सब कुछ ठीक होता, तो उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की आवश्यकता न होती, और कोई संघर्ष न होता और वे पीड़ित न होते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोगों के भीतर कई ऐसी चीजें हैं, जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग में लाए जाने योग्य नहीं हैं, और चूँकि देह का स्वभाव बहुत विद्रोही है, इसलिए लोगों को देह के विरुद्ध विद्रोह करने के सबक को अधिक गहराई से सीखने की आवश्यकता है। इसी को परमेश्वर पीड़ा कहता है, जिसमें से उसने मनुष्य को अपने साथ गुजरने के लिए कहा है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है
परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग भविष्य के लिए आशीष पाने का अनुसरण करते हैं; यही उनके विश्वास का लक्ष्य होता है। सभी लोगों की यही मंशा और आशा होती है, लेकिन उनकी प्रकृति की भ्रष्टता का समाधान परीक्षणों और शोधन के माध्यम से अवश्य किया जाना चाहिए। लोग जिन-जिन पहलुओं में शुद्ध नहीं हैं और अभी भी भ्रष्टता दिखाते हैं उन पहलुओं में उनका शोधन अवश्य किया जाना चाहिए—यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर तुम्हारे लिए परिवेशों का इंतजाम करता है, तुम्हें उनमें शोधन से गुजरने के लिए बाध्य करता है, ताकि तुम अपनी भ्रष्टता को जान जाओ। अंततः तुम उस मुकाम पर पहुँच जाते हो जहाँ तुम अपने मंसूबों और इच्छाओं को छोड़ने और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करने के इच्छुक होते हो, भले ही इसका मतलब मृत्यु हो। इसलिए अगर लोग कई वर्षों के शोधन से न गुजरें, अगर वे एक निश्चित मात्रा में कष्ट नहीं सहते हैं, तो वे अपनी सोच और अपने दिलों में देह की भ्रष्टता के बंधनों से मुक्त नहीं हो पाएंगे। जिन किन्हीं पहलुओं में लोग अभी भी अपनी शैतानी प्रकृति के बंधनों में जकड़े हैं और जिन भी पहलुओं में उनकी अपनी इच्छाएँ और माँगें बची हैं, उन्हीं पहलुओं में उन्हें कष्ट उठाना चाहिए। केवल कष्ट झेलकर ही लोग सबक सीख सकते हैं, जिसका अर्थ है कि वे सत्य प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर के इरादों को समझ सकते हैं। वास्तव में, बहुत-से सत्य कष्ट और परीक्षणों का अनुभव करके समझ में आते हैं। कोई भी व्यक्ति आरामदायक और सहज परिवेश में या अनुकूल परिस्थितियों में परमेश्वर के इरादों को नहीं समझ सकता है, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को नहीं जान सकता है, या परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का एहसास नहीं कर सकता है। यह असंभव होगा!
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
जब परमेश्वर हर व्यक्ति में कार्य करता है, भले ही उसकी विधि कुछ भी हो, सेवा करने के लिए वो किस प्रकार के लोगों, घटनाओं या चीज़ों का प्रयोग करता है, या उसकी बातों का लहजा कैसा है, परमेश्वर का केवल एक ही अंतिम लक्ष्य होता है : तुम्हें बचाना। और वह तुम्हें कैसे बचाता है? तुम्हें बदलकर। तो तुम थोड़ी-बहुत पीड़ा कैसे नहीं सह सकते? तुम्हें थोड़ी-बहुत पीड़ा तो सहनी ही होगी। इस पीड़ा में कई चीजें शामिल हो सकती हैं। पहले, जब लोग परमेश्वर के वचनों का न्याय और ताड़ना स्वीकारते हैं, तो उन्हें कष्ट होता है। जब परमेश्वर के वचन बहुत कठोर और स्पष्ट होते हैं तब लोग परमेश्वर को गलत समझ लेते हैं, यहाँ तक कि वे धारणाएँ भी विकसित कर लेते हैं और उन्हें थोड़ा-बहुत कष्ट भी होता है। कभी-कभी परमेश्वर लोगों की भ्रष्टता प्रकट करने के लिए और उनसे आत्मचिंतन और आत्मज्ञान करवाने के लिए उनके आसपास एक परिवेश बना देता है और तब उन्हें थोड़ा कष्ट भी होता है। कई बार जब लोगों की सीधे काट-छाँट कर उन्हें उजागर किया जाता है, तब वे कष्ट सहते हैं। भ्रष्ट स्वभाव हल करना सर्जरी कराने जैसा ही है—बिना कष्ट सहे तुम कोई परिणाम नहीं पा सकते। यदि हर बार जब तुम्हारी काट-छाँट की जाती है और हर बार जब तुम किसी परिवेश द्वारा प्रकट किए जाते हो, यह तुम्हारे हृदय को झकझोरता है और तुम्हें बढ़ावा देता है, तुम्हें सत्य खोजने और आत्मचिंतन करने, अपनी भ्रष्टता और विद्रोहशीलता जानने और परमेश्वर के सामने सच में पश्चात्ताप करने के लिए प्रेरित करता है—यदि तुम इस तरह से चीजों को अनुभव करते हो तो तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश करोगे और तुम्हारा आध्यात्मिक कद होगा। यदि, हर बार काटे-छांटे जाने और किसी परिवेश द्वारा प्रकट किए जाने पर, तुम्हें थोड़ी-भी पीड़ा या असुविधा महसूस नहीं होती और कुछ भी महसूस नहीं होता, और तुम परमेश्वर के इरादे खोजने उसके सामने नहीं आते, न प्रार्थना करते हो, न ही सत्य की खोज करते हो, तो तुम बहुत सुन्न हो! यदि तुम परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ते और सत्य समझने की कोशिश नहीं करते, किसी स्थिति का सामना करने पर सत्य खोजना तो दूर की बात है, और तुम्हारी आत्मा के भीतर एक मृत व्यक्ति की तरह थोड़ी-सी भी जागरूकता या प्रतिक्रिया नहीं होती, तो परमेश्वर अब तुममें कार्य नहीं करेगा। वह कहेगा, “यह व्यक्ति बहुत सुन्न और बहुत गहराई तक भ्रष्ट है। इसे चाहे कैसे भी नियंत्रण में रखा जाए, इसकी कैसे भी काट-छाँट की जाए या इसे कैसे भी अनुशासित किया जाए, यह फिर भी किसी तरह इसके दिल को नहीं झकझोरता या इसकी आत्मा को नहीं जगाता। इसके बचाए जाने की संभावना नहीं है।” मान लो परमेश्वर तुम्हारे लिए विशेष परिवेशों, लोगों, घटनाओं और चीजों का इंतजाम करता है, या वह तुम्हारी काट-छाँट करता है और तुम इससे सबक सीखते हो; तुम परमेश्वर के सामने आना, सत्य खोजना सीखते हो और अनजाने ही प्रबुद्ध और रोशन हो जाते हो और सत्य प्राप्त कर लेते हो; तुम इन परिवेशों में बदलावों का अनुभव करते हो, कुछ प्राप्त करते हो और प्रगति करते हो, और तुम परमेश्वर के इरादे की थोड़ी समझ प्राप्त करना शुरू कर देते हो और शिकायत करना बंद कर देते हो। इसका मतलब है कि तुम इन परिवेशों के परीक्षणों के बीच में अडिग रहे हो और तुमने परीक्षा सहन कर ली है। उस स्थिति में तुमने इस बाधा को पार कर लिया होगा।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य प्राप्त करने के लिए अपने आसपास के लोगों, घटनाओं और चीजों से सबक सीखना चाहिए