5. परमेश्वर पर विश्वास केवल शान्ति और आशीषों को खोजने के लिए ही नहीं होना चाहिए

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मनुष्य ने जब पहली बार परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू किया था, तब से उसने क्या पाया है? तुमने परमेश्वर के बारे में क्या जाना है? परमेश्वर में अपने विश्वास के कारण तुम कितने बदले हो? आज, तुम सभी लोग यह जानते हो कि परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास सिर्फ आत्मा के उद्धार और दैहिक कल्याण के लिए नहीं है, और न ही यह परमेश्वर से प्रेम करने के माध्यम से अपने जीवन को समृद्ध बनाने इत्यादि के लिए है। वर्तमान स्थिति में, यदि तुम परमेश्वर से प्रेम दैहिक कल्याण या क्षणिक आनंद के लिए करते हो, तो भले ही अंत में परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम अपने शिखर पर पहुँच जाए और तुम इससे ज्यादा और कुछ न माँगो, लेकिन तुम जिस प्रेम के लिए प्रयास करते हो वह अभी भी मिलावटी प्रेम ही है और परमेश्वर के लिए प्रसन्नतादायक नहीं है। जो लोग परमेश्वर से प्रेम करने का उपयोग अपने नीरस जीवन को समृद्ध बनाने और अपने हृदय के खालीपन को भरने के लिए करते हैं, वे उस तरह के लोग हैं जो आराम के लिए लालायित रहते हैं, न कि वे जो सच में परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार का प्रेम जबरदस्ती का प्रेम है, यह मानसिक सुख की खोज है और परमेश्वर को इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। तो फिर, तुम्हारा प्रेम किस तरह का है? तुम परमेश्वर से किसलिए प्रेम करते हो? अभी तुम्हारे भीतर परमेश्वर के लिए कितना सच्चा प्रेम है? तुम लोगों में से अधिकांश का प्रेम उपर्युक्त प्रकार का है। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ यथास्थिति बरकरार रख सकता है; यह अपरिवर्तनीयता प्राप्त नहीं कर सकता, न ही यह मनुष्य में जड़ें जमा सकता है। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ ऐसे फूल की तरह होता है, जो खिलता है पर फल दिए बिना ही मुरझा जाता है। दूसरे शब्दों में, जब तुम एक बार परमेश्वर से इस तरीके से प्रेम कर लेते हो, तब अगर तुम्हें इस मार्ग पर आगे ले जाने वाला कोई नहीं है तो तुम ढह जाओगे। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करने के समय ही परमेश्वर से प्रेम कर सकते हो, लेकिन बाद में तुम्हारा जीवन स्वभाव अपरिवर्तित रहता है, तो फिर तुम अंधकार के प्रभाव के आवरण में रहोगे, इससे निकलने में असमर्थ रहोगे, और तुम शैतान के बंधन और उसके द्वारा मूर्ख बनाए जाने से खुद को मुक्त करने में असमर्थ रहोगे। इस तरह का कोई भी व्यक्ति परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त नहीं किया जा सकता; अंततः उसकी आत्मा, प्राण और शरीर शैतान के ही रहेंगे। इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता। जो लोग परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त नहीं किए जा सकते, वे सभी अपने मूल स्थान लौट जाएंगे, अर्थात् शैतान के पास लौट जाएंगे, और वे परमेश्वर के दंड का अगला चरण स्वीकार करने के लिए आग और गंधक की झील में उतर जाएंगे। परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने वाले वे होते हैं, जो शैतान के खिलाफ विद्रोह करते हैं और उसकी सत्ता से बच निकलते हैं। उन्हें राज्य के लोगों में आधिकारिक रूप से गिना जाता है। यहीं से राज्य के लोगों का प्रारंभ हुआ।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए

आज, व्यावहारिक परमेश्वर के एक विश्वासी के रूप में तुम्हें सही रास्ते पर कदम रखना होगा। परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें बस आशीष नहीं खोजने चाहिए; इसके बजाय तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को जानने का अनुसरण करना चाहिए। परमेश्वर की प्रबुद्धता के माध्यम से और अपने व्यक्तिगत अनुसरण के द्वारा तुम्हें उसके वचनों को खाने और पीने, परमेश्वर के बारे में सच्ची समझ विकसित करने और अपने अंतरतम से आने वाला परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम रखने में सक्षम होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम सबसे सच्चा हो और उसके प्रति तुम्हारे प्रेम को कोई नष्ट न कर सके या इसके मार्ग में आड़े न आ सके तो तब जाकर तुम परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में सही रास्ते पर होते हो। यह साबित करता है कि तुम परमेश्वर के हो, क्योंकि तुम्हारा हृदय पहले से ही परमेश्वर के अधिकार में आ चुका है और तब कोई भी दूसरी चीज तुम पर अधिकार नहीं कर सकती। तुम अपने अनुभव, चुकाए गए मूल्य और परमेश्वर के कार्य के माध्यम से परमेश्वर के लिए एक स्वाभाविक प्रेम विकसित करने में समर्थ हो जाते हो—और जब तुम ऐसा कर लोगे तो तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त हो जाओगे और परमेश्वर के वचन के प्रकाश में जीने लग जाओगे। तुम अंधकार के प्रभाव को तोड़कर जब मुक्त हो जाते हो, केवल तभी यह माना जा सकता है कि तुमने परमेश्वर को प्राप्त कर लिया है। परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में तुम्हें इस लक्ष्य का अनुसरण करने का प्रयास करना ही होगा। यह तुममें से हर एक व्यक्ति की जिम्मेदारी है। तुममें से किसी को भी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। तुम परमेश्वर के कार्य के प्रति दो मन नहीं रख सकते और न ही इसे हल्के में ले सकते हो। तुम्हें सभी पहलुओं में और हर समय परमेश्वर को अपने मन में रखना चाहिए और उसके लिए सब कुछ करना चाहिए। और अपनी कथनी और करनी में तुम्हें परमेश्वर के घर के हितों को सबसे पहले रखना चाहिए। केवल इसी तरह तुम परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो सकते हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है

जो कोई परमेश्वर की सेवा करता है उसे परमेश्वर के लिए केवल कष्ट सहना नहीं जानना चाहिए; इससे भी बढ़कर, उसे यह समझना चाहिए कि परमेश्वर पर विश्वास करने का प्रयोजन परमेश्वर से प्रेम का अनुसरण करना है। परमेश्वर तुम्हारा उपयोग सिर्फ तुम्हारा शोधन करने या तुम्हें पीड़ित करने के लिए नहीं करता, बल्कि वह तुम्हारा उपयोग इसलिए करता है ताकि तुम उसके कर्मों को जानो, मानव-जीवन की सच्ची सार्थकता को जानो और उससे भी अधिक यह जानो कि परमेश्वर की सेवा करना कोई आसान काम नहीं है। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करना अनुग्रह का आनंद लेना नहीं है; बल्कि उससे अधिक इसका मतलब परमेश्वर के प्रति प्रेम के लिए कष्ट सहना है। चूँकि तुम परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हो, इसलिए तुम्हें उसकी ताड़ना का भी आनंद लेना चाहिए; तुम्हें इस सबका अनुभव करना चाहिए। अगर तुम परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए जाने का अनुभव कर सकते हो और तुम उसके द्वारा तुम्हारी काट-छाँट और तुम्हारा न्याय किए जाने का भी अनुभव कर सकते हो, तो तुम्हारा अनुभव व्यापक होगा। परमेश्वर ने तुम पर अपना न्याय का कार्य किया है और उसने तुम पर अपनी ताड़ना का कार्य भी किया है। परमेश्वर के वचन ने तुम्हारी काट-छाँट की है, लेकिन इसने तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन भी किया है। जब तुम नकारात्मक और कमजोर होते हो, परमेश्वर फिर भी तुम्हारी चिंता करता है। यह सब कार्य तुम्हें यह सिखाता है कि मनुष्य से संबंधित सब कुछ परमेश्वर के आयोजनों के अंतर्गत है। तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर पर विश्वास करना बस कष्ट सहने या उसके लिए बहुत सारी चीजें करने या अपनी देह की शांति या अपने लिए सब कुछ सहज रूप से होने देने या सभी चीजों में खुद आराम और सहजता से रहने के बारे में है। इनमें से कोई भी प्रयोजन ऐसा नहीं है जो लोगों का परमेश्वर पर अपने विश्वास में होना चाहिए। अगर तुम इन प्रयोजनों के लिए विश्वास करते हो, तो तुम्हारा दृष्टिकोण गलत है और तुम्हें पूर्ण बनाया जाना बिल्कुल भी संभव नहीं है। परमेश्वर के कर्म, परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव, उसकी बुद्धि, उसके वचन, उसकी अद्भुतता और उसका अथाहपन, वे सब चीजें हैं जिन्हें लोगों को समझना चाहिए। इस समझ के जरिए तुम्हें अपनी व्यक्तिगत माँगों, आशाओं और धारणाओं को अपने हृदय से निकाल देना चाहिए। केवल इन चीजों को हटा करके ही तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित शर्तें पूरी कर सकते हो। केवल इसके माध्यम से ही तुम जीवन प्राप्त कर सकते हो और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो। परमेश्वर पर विश्वास करने का प्रयोजन उसे संतुष्ट करना और उसके द्वारा अपेक्षित स्वभाव को जीना है, ताकि अयोग्य लोगों के इस समूह के माध्यम से उसके कर्म और उसकी महिमा अभिव्यक्त हो सके। परमेश्वर में विश्वास करने का यही सही दृष्टिकोण है और यही वह लक्ष्य भी है जिसका तुम्हें अनुसरण करना चाहिए। परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में तुम्हारा दृष्टिकोण सही होना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर के वचनों को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने की आवश्यकता है और तुम्हें सत्य को जीने, और विशेष रूप से उसके व्यावहारिक कर्मों और संपूर्ण ब्रह्मांड में उसके अद्भुत कर्मों को देखने और साथ ही देह में उसके द्वारा किए जाने वाले व्यावहारिक कार्य को देखने में सक्षम होना चाहिए। अपने वास्तविक अनुभवों के माध्यम से लोगों को यह बात समझनी चाहिए कि कैसे परमेश्वर उन पर अपना कार्य करता है और उनके प्रति परमेश्वर के इरादे क्या हैं। इस सबका उद्देश्य यह है कि वे अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को उतारकर फेंक सकें। अपने भीतर की सारी अशुद्धता और अधार्मिकता को उतारकर फेंकने और अपने गलत इरादों को उतारकर फेंकने से तुम परमेश्वर में सच्चा विश्वास विकसित करोगे। केवल सच्चे विश्वास के साथ ही तुम असल में परमेश्वर से प्रेम कर सकते हो। तुम केवल परमेश्वर पर विश्वास करने की नींव पर ही उससे सच्चा प्रेम कर सकते हो। क्या तुम परमेश्वर पर विश्वास किए बिना उसके प्रति प्रेम प्राप्त कर सकते हो? चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें इसके बारे में भ्रमित नहीं होना चाहिए। कुछ लोग जैसे ही यह देखते हैं कि परमेश्वर पर आस्था उनके लिए आशीष लाएगी, वे प्रेरित हो जाते हैं, परंतु जैसे ही वे देखते हैं कि उन्हें शोधन सहने पड़ेंगे, उनकी सारी प्रेरणा हवा हो जाती है। क्या यह परमेश्वर पर विश्वास करना है? अंततः, अपनी आस्था में तुम्हें परमेश्वर के सामने पूर्ण और चरम समर्पण हासिल करना होगा। तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो परंतु यदि उससे माँगें भी करते हो, तुम्हारी कई धार्मिक धारणाएँ हैं जिन्हें तुम छोड़ नहीं सकते, तुम्हारे व्यक्तिगत हित हैं जिन्हें तुम त्याग नहीं सकते, और फिर भी देह के आशीष खोजते हो और चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हारी देह को बचाए, तुम्हारी आत्मा को बचाए, तो तुम गलत दृष्टिकोण वाले लोगों का व्यवहार प्रदर्शित कर रहे हो। यद्यपि धार्मिक विश्वास वाले लोगों की परमेश्वर पर आस्था होती है, फिर भी वे अपना स्वभाव बदलने का प्रयास नहीं करते और परमेश्वर संबंधी ज्ञान की खोज नहीं करते, बल्कि केवल अपनी देह के हितों की ही तलाश करते हैं। तुम लोगों में से कइयों की आस्थाएँ ऐसी हैं, जो धार्मिक आस्थाओं की श्रेणी में आती हैं; यह परमेश्वर पर सच्ची आस्था नहीं है। परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए लोगों के पास उसके लिए पीड़ा सहने वाला हृदय और स्वयं को त्याग देने का संकल्प होना चाहिए। जब तक वे ये दो शर्तें पूरी नहीं करते, तब तक परमेश्वर पर उनकी आस्था मान्य नहीं है और वे स्वभावों में बदलाव हासिल करने में सक्षम नहीं होंगे। जो लोग वास्तव में सत्य, परमेश्वर के ज्ञान और जीवन का अनुसरण करते हैं, केवल वे ही सचमुच परमेश्वर पर विश्वास करते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा

अब क्या तुम लोग समझते हो कि परमेश्वर में विश्वास क्या है? क्या परमेश्वर में विश्वास का अर्थ चिह्न और चमत्कार देखना है? क्या इसका अर्थ स्वर्ग जाना है? परमेश्वर में विश्वास करना किसी भी तरह से कोई सरल मामला नहीं है। विश्वास के धार्मिक तरीकों को हटा दिया जाना चाहिए; बीमारों को चंगा करने और दानवों को निकालने का अनुसरण करना, चिह्नों और चमत्कारों पर ध्यान केंद्रित करना, परमेश्वर के अधिक अनुग्रह, शांति और आनंद का लालच करना, देह की संभावनाओं और सुख-सुविधाओं का अनुसरण करना—ये विश्वास के धार्मिक तरीके हैं और विश्वास के ऐसे तरीके कल्पित किस्म की आस्था हैं। आज परमेश्वर में व्यावहारिक विश्वास क्या है? यह परमेश्वर के वचन को अपनी जीवन वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना, परमेश्वर के वचन से उसको जानना और इस प्रकार उसके प्रति सच्चा प्रेम प्राप्त करना है। स्पष्ट रूप से कहूँ तो : परमेश्वर में विश्वास इसलिए है ताकि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सको, परमेश्वर से प्रेम कर सको और उस कर्तव्य को पूरा कर सको जिसे एक सृजित प्राणी द्वारा पूरा किया जाना चाहिए। परमेश्वर में विश्वास करने का यही उद्देश्य है। तुम्हें परमेश्वर की मनोहरता को जानना चाहिए, यह जानना चाहिए कि परमेश्वर श्रद्धा के कितने योग्य है और यह जानना चाहिए कि परमेश्वर अपने सृजित प्राणियों में जो कार्य करता है, वह उनका उद्धार और उनकी पूर्णता है—ये परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास की नितांत आवश्यक बातें हैं। परमेश्वर में विश्वास मुख्य रूप से देह के जीवन से परमेश्वर से प्रेम करने के जीवन में बदलना है, भ्रष्टता में जीने से परमेश्वर के वचनों के जीवन में जीने में बदलना है; यह शैतान की शक्ति के अधीन होने से बाहर आना और परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में जीना है; यह इसलिए है ताकि तुम देह के बजाय परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम हो सको, ताकि परमेश्वर तुम्हारे पूरे हृदय को प्राप्त कर सके और तुम्हें पूर्ण बना सके, ताकि तुम शैतानी भ्रष्ट स्वभावों से मुक्त हो सको। परमेश्वर में विश्वास मुख्य रूप से इसलिए है ताकि परमेश्वर की महान सामर्थ्य और महिमा तुममें अभिव्यक्त हो सके, ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चल सको, ताकि परमेश्वर की योजना पूरी हो सके और ताकि तुम शैतान के सामने परमेश्वर के लिए गवाही दे सको। परमेश्वर में विश्वास चिह्नों और चमत्कारों को देखने की इच्छा के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहिए, न ही यह तुम्हारी अपनी देह के वास्ते होना चाहिए। यह परमेश्वर को जानने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम होने और पतरस की तरह, मृत्यु तक परमेश्वर के प्रति समर्पण करने के अनुसरण के बारे में होना चाहिए। मुख्य उद्देश्य इसे प्राप्त करना है। कोई व्यक्ति परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने के लिए भी परमेश्वर के वचन को खाता और पीता है। परमेश्वर के वचन को खाने और पीने से तुम्हें परमेश्वर का अधिक ज्ञान मिलता है, जिसके बाद ही तुम उसके प्रति समर्पण कर सकते हो। केवल परमेश्वर के ज्ञान से ही तुम उससे प्रेम कर सकते हो और परमेश्वर में अपने विश्वास में मनुष्य का यही एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। यदि परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम हमेशा चिह्न और चमत्कार देखना चाहते हो, तो परमेश्वर में विश्वास पर यह दृष्टिकोण गलत है। परमेश्वर में विश्वास मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों को अपनी जीवन वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना है। जब परमेश्वर के मुख से निकले वचन लोगों द्वारा अभ्यास में लाए जाते हैं और उनमें साकार होते हैं, तो परमेश्वर का उद्देश्य प्राप्त हो जाता है। परमेश्वर में विश्वास करते हुए, मनुष्य को परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम होने और परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण प्राप्त करने का अनुसरण करना चाहिए। यदि तुम बिना किसी शिकायत के परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हो, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हो सकते हो और पतरस के आध्यात्मिक कद को प्राप्त कर सकते हो, परमेश्वर द्वारा बताई गई पतरस की शैली को धारण कर सकते हो, तभी तुमने परमेश्वर में विश्वास में सफलता प्राप्त की होगी और यह इस बात का प्रतीक होगा कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन से सब कुछ पूरा हो जाता है

तुम यह आशा करते हो कि परमेश्वर में तुम्हारी आस्था के मार्ग में कोई भी मुश्किल या क्लेश या लेशमात्र भी पीड़ा नहीं होगी। तुम हमेशा निरर्थक चीजों के पीछे भागते हो और तुम जीवन को कोई अहमियत नहीं देते, बल्कि तुम अपने बेतुके विचारों को सत्य से ज्यादा महत्व देते हो। तुम कितने निकम्‍मे हो! तुम सूअर की तरह जीते हो—तुममें और सूअर और कुत्ते में क्या अंतर है? जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि देह से प्यार करते हैं, क्या वे सब जानवर नहीं हैं? क्या वे मरे हुए लोग जिनमें आत्मा नहीं है, चलती-फिरती लाशें नहीं हैं? तुम लोगों के बीच कितने सारे वचन कहे गए हैं? क्या तुम लोगों के बीच केवल थोड़ा-सा ही कार्य किया गया है? मैंने तुम लोगों के बीच कितनी आपूर्ति की है? तो फिर तुमने इसे प्राप्त क्यों नहीं किया? तुम्हें किस बारे में शिकायत करनी है? क्या ऐसा नहीं है कि तुमने इसलिए कुछ भी प्राप्त नहीं किया है क्योंकि तुम देह से बहुत अधिक प्रेम करते हो? और क्या इसकी वजह यह नहीं है कि तुम्‍हारे विचार बहुत ज्यादा असंयमित हैं? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि तुम बहुत ज्यादा मूर्ख हो? यदि तुम इन आशीषों को प्राप्त करने में विफल होते हो, तो क्या तुम परमेश्वर को दोष दोगे कि उसने तुम्‍हें नहीं बचाया? तुम परमेश्वर में विश्वास करने के बाद शांति प्राप्त करने में सक्षम होने का अनुसरण करते हो—ताकि तुम्हारे बच्चे बीमारी से दूर रहें, तुम्हारे पति को एक अच्छी नौकरी मिल जाए, तुम्हारे बेटे को एक अच्छी पत्नी और तुम्हारी बेटी को एक अच्छा पति मिले, तुम्हारे बैल और घोड़े जमीन की अच्छी जुताई कर पाएँ और तुम्हारी फसलों के लिए साल भर अच्छा मौसम रहे। तुम इन्हीं चीजों का अनुसरण करते हो। तुम्‍हारा अनुसरण केवल आराम से जीने के लिए है—ताकि तुम्‍हारे परिवार में कोई दुर्घटना न हो, आँधी-तूफान तुम्‍हारे पास से होकर गुजर जाएँ, धूल-मिट्टी तुम्‍हारे चेहरे को छू भी न पाए, तुम्‍हारे परिवार की फसलें बाढ़ में न बह जाएँ—किसी भी आपदा से प्रभावित न हों, तुम “परमेश्वर के आलिंगन” में रहो, एक आरामदायक घरौंदे में रहो। तुम जैसा डरपोक इंसान, जो हमेशा देह के पीछे भागता है—क्या तुम्‍हारे अंदर एक दिल है, क्या तुम्‍हारे अंदर एक आत्मा है? क्या तुम एक पशु नहीं हो? मैं बदले में बिना कुछ माँगे तुम्‍हें सच्चा मार्ग देता हूँ, फिर भी तुम उसका अनुसरण नहीं करते। क्या तुम अभी भी उनमें से एक हो जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं? मैं तुम्‍हें एक सच्चा मानवीय जीवन देता हूँ, फिर भी तुम उसका अनुसरण नहीं करते। क्या तुम कुत्ते और सूअर की किस्म के ही नहीं हो? सूअर मनुष्य के जीवन का अनुसरण नहीं करते, वे शुद्ध किए जाने का अनुसरण नहीं करते और वे नहीं समझते कि जीवन क्या है। प्रतिदिन, वे बस पेट भर खाना खाते हैं और सो जाते हैं। मैंने तुम्‍हें सच्चा मार्ग प्रदान किया है, फिर भी तुमने उसे प्राप्त नहीं किया है, तुम्‍हारे हाथ खाली हैं। क्या तुम इस जीवन में एक सूअर का जीवन जीते रहना चाहते हो? ऐसे लोगों के जिंदा रहने का क्या अर्थ है? तुम्‍हारा जीवन घृणित और नीच है, तुम गंदगी और व्यभिचार में जीते हो और किसी लक्ष्य को पाने का प्रयास नहीं करते हो, तो क्या तुम्‍हारा जीवन अत्यंत निकृष्ट नहीं है? क्या तुममें परमेश्वर का सामना करने का दुस्साहस है? यदि तुम इसी तरह अनुभव करते रहे, तो क्या केवल शून्य ही तुम्हारे हाथ नहीं लगेगा? तुम्हें सच्चा मार्ग प्रदान किया गया है, किंतु अंततः तुम उसे प्राप्त कर पाओगे या नहीं, यह तुम्हारे अपने अनुसरण पर निर्भर करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान

आखिर आज तुम परमेश्वर से कितना प्रेम करते हो? और जो कुछ भी परमेश्वर ने तुम पर किया है, उस सबके बारे में तुम आखिर कितना जानते हो? ये वे सबक हैं जो तुम्हें सीखने चाहिए। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है तो जो कुछ वह मनुष्य पर कर चुका है और मनुष्य को देखने दे चुका है वह सब इसलिए होता है ताकि मनुष्य उससे प्रेम करे और वास्तव में उसे जाने। मनुष्य परमेश्वर के लिए कष्ट सह पाता है और यहाँ तक आ पाया है तो यह एक ओर परमेश्वर के प्रेम के कारण है और दूसरी ओर परमेश्वर के उद्धार के कारण है; इससे भी अधिक, यह उस न्याय के कारण और ताड़ना के कार्य के कारण है जो परमेश्वर ने मनुष्य पर कार्यान्वित किया है। यदि तुम लोग परमेश्वर के न्याय, ताड़ना और परीक्षणों से रहित हो और यदि परमेश्वर ने तुम लोगों को कष्ट सहन नहीं कराया है तो तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम नहीं करोगे। मनुष्य पर परमेश्वर का कार्य जितना बड़ा होता है, उतनी ही बड़ी मनुष्य की पीड़ा होती है, उतना ही अधिक यह दिखाता है कि परमेश्वर का कार्य कितना अर्थपूर्ण है और उतना ही अधिक मनुष्य का हृदय परमेश्वर से सचमुच प्रेम कर पाता है। परमेश्वर से प्रेम करने का सबक कैसे हासिल होता है? कठिनाई और शोधन के बिना, पीड़ादायक परीक्षणों के बिना—और इसके अलावा, यदि परमेश्वर ने मनुष्य को बस अनुग्रह, प्रेमपूर्ण दयालुता और दया ही प्रदान की होती—तो क्या तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने के मुकाम तक पहुँच पाते? एक ओर, परमेश्वर के परीक्षणों के दौरान मनुष्य अपनी कमियाँ जान पाता है और देख पाता है कि वह तुच्छ, घृणित और निकृष्ट है, कि उसके पास कुछ नहीं है और वह कुछ नहीं है; तो दूसरी ओर, परीक्षणों के दौरान परमेश्वर मनुष्य के लिए कुछ परिवेशों का इंतजाम करता है ताकि उनमें मनुष्य परमेश्वर की मनोहरता का बेहतर अनुभव कर सके। यद्यपि पीड़ा अधिक होती है और कभी-कभी तो इससे उबरना असंभव हो जाता है—यहाँ तक कि यह हृदय-विदारक दुख तक पहुँच जाती है—परंतु इसका अनुभव करने के बाद मनुष्य देखता है कि उस पर परमेश्वर का कार्य कितना मनोहर है, और केवल इसी नींव पर मनुष्य में परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम का जन्म होता है। आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर के अनुग्रह, प्रेमपूर्ण दयालुता और उसकी दया मात्र से वह स्वयं को सही मायने में जान सकने में असमर्थ है, मनुष्य के सार को जानने में सक्षम तो वह बिल्कुल भी नहीं है, और केवल परमेश्वर के न्याय और शोधन दोनों के माध्यम से, और शोधन की प्रक्रिया के दौरान ही व्यक्ति अपनी कमियाँ जान सकता है, और यह जान सकता है कि उसके पास कुछ नहीं है। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रति मनुष्य का प्रेम परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले शोधन और न्याय की नींव पर निर्मित होता है। यदि तुम शांतिमय पारिवारिक जीवन या भौतिक आशीषों के साथ केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हो, तो इसका मतलब यह नहीं कि तुमने परमेश्वर को प्राप्त कर लिया है, न ही इसका मतलब यह है कि परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम सफल रहे हो। परमेश्वर ने अनुग्रह के कार्य का एक चरण देह में पहले ही पूरा कर लिया है, और बेशक मनुष्य को भौतिक आशीष पहले ही प्रदान कर दिए हैं, परंतु मनुष्य को केवल अनुग्रह, प्रेमपूर्ण दयालुता और दया से पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। अपने अनुभवों में मनुष्य परमेश्वर के कुछ प्रेम का स्वाद लेता है और परमेश्वर की प्रेमपूर्ण दयालुता और उसकी दया को देखता है, फिर भी कुछ समय तक इसका अनुभव करने के बाद वह देखता है कि परमेश्वर का अनुग्रह और उसकी प्रेमपूर्ण दयालुता और दया मनुष्य को पूर्ण बनाने में असमर्थ हैं, वे मनुष्य के भीतर जो कुछ भ्रष्ट है उसे उजागर करने में असमर्थ हैं, और वे मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुड़ाने या उसके प्रेम और विश्वास को पूर्ण बनाने में असमर्थ हैं। परमेश्वर का अनुग्रह का कार्य एक अवधि का कार्य था, और परमेश्वर को जानने के लिए मनुष्य उसके अनुग्रह का आनंद उठाने पर निर्भर नहीं रह सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो

परमेश्वर का अनुसरण करने वाले बहुत सारे लोग केवल इस बात से मतलब रखते हैं कि आशीष कैसे प्राप्त किए जाएँ या आपदा को कैसे टाला जाए। जैसे ही परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन का उल्लेख किया जाता है, वे चुप हो जाते हैं और सारी रुचि खो देते हैं। उन्हें लगता है कि इस प्रकार के उबाऊ मुद्दों को समझने से उनके जीवन की प्रगति में कोई मदद नहीं मिलेगी और न ही कोई लाभ प्राप्त होगा। परिणामस्वरूप, भले ही उन्होंने परमेश्वर के प्रबंधन के बारे में जानकारी सुनी हो, वे इसके साथ अगंभीर तरीके से पेश आते हैं। वे इसे स्वीकारने योग्य कोई खजाना नहीं मानते, न ही इसे समझने के लिए अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में इन लोगों का प्रयोजन बहुत सरल होता है और यह एक ही लक्ष्य के लिए होता है : आशीषित होना। ये लोग ऐसी किसी भी दूसरी चीज के लिए पूर्णतया उदासीन रहते हैं जो इस उद्देश्य से संबंध नहीं रखती। उनके लिए, परमेश्वर में विश्वास करने का सबसे वैध लक्ष्य आशीष प्राप्त करना है—यह उनकी आस्था का असली मूल्य है। यदि कोई चीज इस प्रयोजन को पूरा नहीं करती, तो चाहे जो भी हो वे उससे अप्रभावित रहते हैं। आज परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश लोगों का यही हाल है। उनका प्रयोजन और इरादा न्यायोचित प्रतीत होते हैं, क्योंकि जब वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते भी हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पित भी होते हैं और अपना कर्तव्य भी निभाते हैं। वे अपनी जवानी न्योछावर कर देते हैं, परिवार और आजीविका त्याग देते हैं, यहाँ तक कि दौड़-धूप करने के लिए वर्षों अपने घर से दूर बिताते हैं। अपने परम प्रयोजन के लिए वे अपनी रुचियाँ बदल डालते हैं, अपने जीवन का दृष्टिकोण बदल देते हैं, यहाँ तक कि अपने अनुसरण की दिशा तक बदल देते हैं, किंतु परमेश्वर पर अपने विश्वास करने के प्रयोजन को नहीं बदल सकते। वे अपनी आकांक्षाओं के प्रबंधन के लिए दौड़-धूप करते हैं; चाहे मार्ग कितना भी दूर क्यों न हो, और मार्ग में कितनी भी कठिनाइयाँ, खतरे और अवरोध क्यों न आएँ, वे दृढ़ रहते हैं और मृत्यु से नहीं डरते। इस तरह से अपने आप को समर्पित रखने के लिए उन्हें कौन-सी ताकत बाध्य करती है? क्या यह उनकी अंतरात्मा है? क्या यह उनका महान और कुलीन चरित्र है? क्या यह बुराई की शक्तियों से बिल्कुल अंत तक लड़ने का उनका दृढ़ संकल्प है? क्या यह प्रतिफल की आकांक्षा के बिना परमेश्वर के लिए गवाही देने की जो आस्था उनके पास है, वह है? क्या यह परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए सब कुछ बेहिचक त्याग देने की उनकी लगन है? या यह विलासितापूर्ण व्यक्तिगत माँगें हमेशा त्यागने की उनकी समर्पित भावना है? ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए, जिसने कभी परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य को नहीं समझा, उसका इतना सारा हृदय का रक्त खपाने में सक्षम होना एक बहुत बड़ा चमत्कार है! फिलहाल, आओ इसकी चर्चा न करें कि इन लोगों ने कितना कुछ दिया है। किंतु उनका व्यवहार हमारे गहन-विश्लेषण के बहुत योग्य है। उनके साथ इतनी निकटता से जुड़े उन लाभों के अतिरिक्त, परमेश्वर को कभी नहीं समझने वाले लोगों द्वारा उसके लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाने का क्या कोई अन्य कारण हो सकता है? यहाँ हमें एक ऐसी समस्या का पता चलता है जिसे मनुष्य पहले पता नहीं लगा सका है : परमेश्वर के साथ मनुष्य का संबंध केवल नग्न स्वार्थ पर आधारित है। यह आशीष लेने वाले और देने वाले के मध्य का संबंध है। स्पष्ट रूप से कहें तो यह एक कर्मचारी और एक नियोक्ता के मध्य का संबंध है। कर्मचारी केवल नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले प्रतिफल प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करता है। इस प्रकार के स्वार्थ आधारित संबंध में कोई आत्मीय स्नेह नहीं होता, केवल लेन-देन होता है। प्रेम करने या प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होती है। कोई समझ नहीं होती, केवल असहाय दबा हुआ आक्रोश और धोखा होता है। कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक अगम खाई होती है। अब जबकि चीजें इस बिंदु तक आ गई हैं तो ऐसी राह को कौन उलट सकता है? और कितने लोग इस बात को वास्तव में समझने में सक्षम हैं कि यह संबंध कितना भयावह बन चुका है? मेरा मानना है कि जब लोग आशीष प्राप्त होने के आनंदपूर्ण वातावरण में निमग्न हो जाते हैं तो कोई यह कल्पना नहीं कर सकता कि परमेश्वर के साथ ऐसा संबंध कितना अटपटा और भद्दा है।

परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास के बारे में सबसे दुःखद बात यह है कि परमेश्वर के कार्य के बीच मनुष्य अपने खुद के उद्यम में जुटा रहता है, जबकि परमेश्वर के प्रबंधन पर कोई ध्यान नहीं देता। परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास की सबसे बड़ी असफलता यह है कि जब वह परमेश्वर के प्रति समर्पित होने और उसकी आराधना करने का अनुसरण करता है, उसी समय वह एक महत्वाकांक्षी मंजिल के अपने सपने का निर्माण कर रहा होता है और इस बात की साजिश रचता है कि सबसे बड़ा आशीष और सर्वोत्तम मंजिल कैसे हासिल की जाए। भले ही लोग समझते हैं कि वे कितने दीन-हीन, घृणास्पद और दयनीय हैं, फिर भी ऐसे कितने लोग अपनी आकांक्षाओं और आशाओं को आसानी से त्याग सकते हैं? और कौन अपने कदमों को रोकने और अपनी ओर से योजनाएँ बनाना बंद करने में सक्षम है? परमेश्वर को उन लोगों की ज़रूरत है, जो उसके प्रबंधन को पूरा करने के लिए उसके साथ निकटता से सहयोग करेंगे। उसे उन लोगों की जरूरत है जो उसके प्रति समर्पण करने की खातिर अपने पूरे तन-मन को उसके प्रबंधन के कार्य के प्रति समर्पित करेंगे। उसे ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो हर दिन उससे भीख माँगने के लिए अपने हाथ फैलाए रहते हैं और उनकी तो बिल्कुल भी जरूरत नहीं है जो उसके लिए खुद को थोड़ा-सा खपाते हैं और फिर उससे भुगतान अदायगी की माँग करने का इंतजार करते हैं। परमेश्वर उन लोगों से नफरत करता है जो तुच्छ योगदान करते हैं और फिर अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट हो जाते हैं। वह उन निष्ठुर लोगों से नफरत करता है जो उसके प्रबंधन-कार्य को अत्यधिक नापसंद करते हैं और केवल स्वर्ग जाने और आशीष प्राप्त करने के बारे में बात करना चाहते हैं। वह उन लोगों से और भी अधिक नफरत करता है जो उसके उद्धार के कार्य से प्राप्त अवसर का लाभ अपने फायदे के लिए उठाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन लोगों ने कभी इस बात की परवाह नहीं की है कि परमेश्वर अपने प्रबंधन के कार्य के माध्यम से क्या हासिल और प्राप्त करना चाहता है। उनकी रुचि केवल इस बात में होती है कि किस प्रकार वे परमेश्वर के कार्य द्वारा प्रदान किए गए अवसर का उपयोग आशीष प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं। वे परमेश्वर के हृदय के प्रति बिल्कुल भी विचारशील नहीं हैं और पूरी तरह से अपने भविष्य और भाग्य में तल्लीन रहते हैं। जो लोग परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के प्रति विमुख होते हैं और जो इस बात में जरा-सी भी रुचि नहीं रखते कि परमेश्वर मानवजाति को कैसे बचाता है और उसके इरादे क्या हैं, वे सभी परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के दायरे से बाहर वही चीजें कर रहे हैं जिन्हें वे करना चाहते हैं। उनके क्रियाकलापों को परमेश्वर द्वारा न तो याद किया जाता है और न ही अनुमोदित किया जाता है, परमेश्वर द्वारा इन्हें मूल्यवान माना जाना तो दूर की बात है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है

अब तुम्हें किस चीज का अनुसरण करना चाहिए? तुम परमेश्वर के कार्य की गवाही देने में समर्थ हो या नहीं, तुम परमेश्वर की गवाही और उसकी एक अभिव्यक्ति बनने में सक्षम हो या नहीं, और तुम उसके द्वारा उपयोग किए जाने के योग्य हो या नहीं—ये वे बातें हैं, जिनका तुम्हें अनुसरण करना चाहिए। परमेश्वर ने तुम पर वास्तव में कितना कार्य किया है? तुमने कितना देखा है, कितना समझा है? तुमने कितना अनुभव किया और चखा है? चाहे परमेश्वर ने तुम्हारा परीक्षण किया हो, तुम्हारी काट-छाँट की हो या तुम्हें अनुशासित किया हो, उसके कर्म और उसका कार्य तुम पर किए गए हैं। परंतु परमेश्वर के एक विश्वासी के रूप में और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए प्रयास करने को उत्सुक है, क्या तुम अपने व्यावहारिक अनुभव के आधार पर परमेश्वर के कार्य की गवाही देने में समर्थ हो? क्या तुम अपने व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से परमेश्वर के वचन को जी सकते हो? क्या तुम अपने व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से दूसरों को पोषण प्रदान करने और परमेश्वर के कार्य की गवाही देने के लिए अपना पूरा जीवन खपाने में सक्षम हो? परमेश्वर के कार्य की गवाही देने के लिए तुम्हें अपने अनुभव, ज्ञान और स्वयं द्वारा चुकाई गई कीमत पर निर्भर करना चाहिए। केवल इसी तरह तुम उसके इरादे पूरे कर सकते हो। क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के कार्य की गवाही देता है? क्या तुम्हारा यह संकल्प है? अगर तुम उसके नाम, और इससे भी बढ़कर, उसके कार्य की गवाही देने में समर्थ हो, और अगर तुम उसके लोगों की छवि को जीने में सक्षम हो जिसकी वह अपेक्षा करता है, तो तुम परमेश्वर के गवाह हो! तुम परमेश्वर की गवाही आखिर कैसे देते हो? अगर तुम परमेश्वर के वचन को जीने और अपने मुँह से उसकी गवाही देने का प्रयास और उसकी लालसा करते हो, इस तरह कि लोग परमेश्वर के कार्य को जान जाएँ और उसके कर्मों को देख लें—अगर तुम वास्तव में इन सबका अनुसरण करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बना देगा। अगर तुम बस परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने और अंत में धन्य किए जाने का अनुसरण करते हो, तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का परिप्रेक्ष्य शुद्ध नहीं है। तुम्हें इसका अनुसरण करना चाहिए कि वास्तविक जीवन में परमेश्वर के कर्मों को कैसे देखें, जब वह अपने इरादे तुम पर प्रकट करे तो उसे कैसे संतुष्ट करें, और तुम्हें इसका अनुसरण करना चाहिए कि उसकी अद्भुतता और बुद्धि की गवाही तुम्हें कैसे देनी चाहिए, और इसकी गवाही कैसे देनी चाहिए कि वह तुम्हें कैसे अनुशासित करता है और कैसे तुम्हारी काट-छाँट करता है। ये सभी वे चीजें हैं, जिन पर अब तुम्हें विचार करना चाहिए। अगर तुम्हारा परमेश्वर-प्रेमी हृदय सिर्फ इसलिए है कि परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के बाद तुम उसके साथ महिमा प्राप्त कर सको, तो यह अभी भी अपर्याप्त है और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी नहीं कर सकता। तुम्हें परमेश्वर के कार्य की गवाही देने में समर्थ होने, उसकी अपेक्षाएँ पूरी करने और उसके द्वारा लोगों पर किए जाने वाले कार्य का व्यावहारिक तरीके से अनुभव करने की आवश्यकता है। चाहे यह पीड़ा हो, आँसू हों या दुख, तुम्हें ये सभी चीजें व्यावहारिक ढंग से अनुभव अवश्य करनी चाहिए। ये तुम्हें परमेश्वर के गवाह के रूप में पूर्ण करने के लिए हैं। वास्तव में अभी वह क्या है, जो तुम्हें कष्ट सहने और पूर्णता पाने का अनुसरण करने के लिए मजबूर करता है? क्या तुम्हारा वर्तमान कष्ट सच में परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी गवाही देने के लिए है? या यह देह के आशीषों के लिए, तुम्हारे भविष्य की संभावनाओं और नियति के लिए है? अपने जिन इरादों, प्रेरणाओं और लक्ष्यों का तुम अनुसरण करते हो, वे सब सही किए जाने चाहिए, वे तुम्हारी अपनी इच्छा से निर्देशित नहीं होने चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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