कार्य के तीन चरण

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 1

मेरी संपूर्ण प्रबंधन योजना, छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना, के तीन चरण या तीन युग हैं : आरंभ में व्यवस्था का युग; अनुग्रह का युग (जो छुटकारे का युग भी है); और अंत के दिनों का राज्य का युग। इन तीनों युगों में मेरे कार्य की विषयवस्तु प्रत्येक युग के अनुसार अलग-अलग है, परंतु प्रत्येक चरण में यह कार्य मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप किया गया है—या, ज्यादा सटीक रूप में, यह शैतान द्वारा उस युद्ध में चली जाने वाली चालों के अनुसार किया जाता है, जो मैं उससे लड़ रहा हूँ। इसका उद्देश्य शैतान को हराना, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करना, शैतान की सभी चालों को उजागर करना और परिणामस्वरूप समस्त मानवजाति को बचाना है, जो शैतान की सत्ता के अधीन रहती है। यह मेरी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करने के लिए और शैतान की असहनीय विकरालता को सामने लाने के लिए है; इससे भी अधिक, यह सृजित प्राणियों को अच्छे और बुरे के बीच अंतर करने देने के लिए है, यह जानने देने के लिए कि मैं सभी चीजों का संप्रभु हूँ, यह स्पष्ट रूप से देखने देने के लिए कि शैतान मानवजाति का शत्रु है, अधम है, दुष्ट है; और उन्हें पूरी स्पष्टता के साथ अच्छे और बुरे, सत्य और भ्रांति, पवित्रता और मलिनता और क्या महान है और क्या हेय, इसके बीच अंतर करने में सक्षम बनाने के लिए है। यह अज्ञानी मानवजाति को मेरे लिए यह गवाही देने में सक्षम बनाने के लिए है कि वह मैं नहीं हूँ जो मानवजाति को भ्रष्ट करता है और यह कि केवल मैं—सृष्टिकर्ता—मानवजाति को बचाता हूँ और लोगों को उनके आनंद की वस्तुएँ प्रदान करता हूँ; यह उन्हें जानने देने के लिए है कि मैं सभी चीजों का संप्रभु हूँ और शैतान मात्र वह प्राणी है जिसका मैंने सृजन किया है और जिसने बाद में मुझसे विश्वासघात किया। मेरी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना तीन चरणों में विभाजित है और मैं इस तरह इसलिए कार्य करता हूँ, ताकि सृजित प्राणियों को मेरे लिए गवाही देने, मेरे इरादे समझ पाने और यह जान पाने के योग्य बनाने का प्रभाव प्राप्त कर सकूँ कि मैं ही सत्य हूँ। इस प्रकार, अपनी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना के शुरुआती कार्य के दौरान मैंने व्यवस्था का काम किया, जो यहोवा द्वारा लोगों की अगुआई करने का कार्य था। दूसरे चरण के दौरान मैंने यहूदिया के गाँवों में अनुग्रह के युग का शुरुआती कार्य आरंभ किया। यीशु अनुग्रह के युग के समस्त कार्य का प्रतिनिधित्व करता है; वह देहधारी हुआ और उसे सलीब पर चढ़ाया गया, और उसने अनुग्रह के युग का आरंभ भी किया। वह सलीब पर चढ़ाए जाने और छुटकारे का कार्य पूरा करने आया, वह व्यवस्था के युग का अंत करने और अनुग्रह के युग का आरंभ करने के लिए आया, इसलिए उसे “सर्वोच्च सेनापति,” “पाप-बलि,” और “उद्धारकर्ता” कहा गया। परिणामस्वरूप, यीशु के कार्य की विषयवस्तु यहोवा के कार्य से अलग थी, यद्यपि वे सैद्धांतिक रूप से एक ही थे। यहोवा ने व्यवस्था का युग आरंभ करके और व्यवस्थाएँ तथा आज्ञाएँ जारी करके पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य का आधार—उद्गम-स्थल—स्थापित किया। ये उसके द्वारा किए गए दो कार्य हैं, और ये व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व करते हैं। जो कार्य यीशु ने अनुग्रह के युग में किया, वह व्यवस्थाएँ जारी करना नहीं था बल्कि उन्हें पूरा करना था, और परिणामस्वरूप अनुग्रह के युग का सूत्रपात करना और व्यवस्था के युग को समाप्त करना था, जो दो हजार सालों तक रहा था। वह युग-प्रवर्तक था, जो अनुग्रह के युग को शुरू करने के लिए आया, फिर भी उसके कार्य का मुख्य भाग छुटकारे में निहित था। इसलिए उसका कार्य भी दोहरा था : एक नए युग का मार्ग प्रशस्त करना, और सलीब पर चढ़ने के माध्यम से छुटकारे का कार्य पूरा करना, जिसके बाद वह चला गया। उसके बाद से व्यवस्था का युग समाप्त हो गया और अनुग्रह का युग शुरू हो गया।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, छुटकारे के युग के कार्य की वास्तविक कहानी

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 2

परमेश्वर के 6,000 वर्षों के प्रबंधन कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है : व्यवस्था का युग, अनुग्रह का युग और राज्य का युग। कार्य के ये तीनों चरण मानव-जाति के उद्धार के वास्ते हैं, अर्थात् ये उस मानव-जाति के उद्धार के लिए हैं, जिसे शैतान द्वारा बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिया गया है। किंतु, साथ ही, परमेश्वर शैतान के साथ युद्ध भी कर रहा है। इस प्रकार, जैसे उद्धार के कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है, ठीक वैसे ही शैतान के साथ युद्ध को भी तीन चरणों में बाँटा जाता है, और परमेश्वर के कार्य के ये दो पहलू एक-साथ संचालित किए जाते हैं। शैतान के साथ युद्ध वास्तव में मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है, और चूँकि मानव-जाति के उद्धार का कार्य कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे एक ही चरण में सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकता हो, इसलिए शैतान के साथ युद्ध को भी चरणों और अवधियों में बाँटा जाता है, और मनुष्य की आवश्यकताओं और मनुष्य में शैतान की भ्रष्टता की सीमा के अनुसार शैतान के साथ युद्ध छेड़ा जाता है। कदाचित् मनुष्य अपनी कल्पना में यह विश्वास करता है कि इस युद्ध में परमेश्वर शैतान के विरुद्ध शस्त्र उठाएगा, वैसे ही, जैसे दो सेनाएँ आपस में लड़ती हैं। मनुष्य की बुद्धि मात्र यही कल्पना करने में सक्षम है; यह अत्यधिक अस्पष्ट और अवास्तविक सोच है, फिर भी मनुष्य यही विश्वास करता है। और चूँकि मैं यहाँ कहता हूँ कि मनुष्य के उद्धार का साधन शैतान के साथ युद्ध करने के माध्यम से है, इसलिए मनुष्य कल्पना करता है और मानता है कि युद्ध इसी तरह से संचालित किया जाता है। मनुष्य के उद्धार के कार्य के तीन चरण हैं, जिसका तात्पर्य है कि शैतान के साथ युद्ध को तीन चरणों में विभाजित किया गया है और इस प्रकार शैतान को हमेशा के लिए पराजित कर दिया जाएगा। किंतु शैतान के साथ युद्ध के समस्त कार्य की वास्तविक कहानी यह है कि इसके परिणाम कार्य के अनेक चरणों में हासिल किए जाते हैं : मनुष्य को अनुग्रह प्रदान करना, मनुष्य के लिए पाप-बलि बनना, मनुष्य के पापों को क्षमा करना, मनुष्य पर विजय पाना और मनुष्य को पूर्ण बनाना। सरल शब्दों में कहें तो शैतान के साथ युद्ध करना उसके विरुद्ध हथियार उठाना नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को बचाने के जरिए परमेश्वर की गवाही देना है, मनुष्य के जीवन में कार्य करना है और मनुष्य के स्वभाव को बदलना है और इस तरह शैतान को पराजित करना है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के माध्यम से शैतान को पराजित किया जाता है। जब शैतान को पराजित कर दिया जाएगा, अर्थात् जब मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा, तो अपमानित शैतान पूरी तरह से बंधन में डाल दिया जाएगा, और इस प्रकार मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। इस प्रकार, मनुष्य के उद्धार का सार शैतान के विरुद्ध युद्ध है और यह युद्ध मुख्य रूप से मनुष्य के उद्धार में प्रतिबिंबित होता है। अंत के दिनों का चरण, जिसमें मनुष्य को जीता जाना है, शैतान के साथ युद्ध में कार्य का अंतिम चरण है, और यह शैतान की सत्ता से मनुष्य के संपूर्ण उद्धार का कार्य भी है। मनुष्य पर विजय का आंतरिक अर्थ मनुष्य पर विजय पाने के बाद शैतान के मूर्त रूप—मनुष्य, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है—का अपने जीते जाने के बाद सृष्टिकर्ता के पास वापस लौटना है, जिसके माध्यम से वह शैतान से विद्रोह कर पूरी तरह से परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा। इस तरह मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। इसलिए, विजय का कार्य शैतान के विरुद्ध युद्ध में अंतिम कार्य है, और यह परमेश्वर के प्रबंधन में अंतिम चरण है जो शैतान को पराजित करने के लिए है। इस कार्य के बिना मनुष्य का संपूर्ण उद्धार अंततः असंभव होगा, शैतान की संपूर्ण पराजय भी असंभव होगी, और मानव-जाति कभी भी अपनी अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करने या शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होगी। इसलिए, शैतान के साथ युद्ध की समाप्ति से पहले मनुष्य के उद्धार का कार्य समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का केंद्रीय भाग मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है। सबसे आरंभ में मानव-जाति परमेश्वर के हाथों में थी, किंतु शैतान के प्रलोभन और भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान द्वारा बाँध लिया गया और वह इस दुष्ट के हाथों में पड़ गया। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रबंधन कार्य में शैतान पराजित किए जाने का लक्ष्य बन गया। चूँकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और चूँकि मनुष्य परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन की पूँजी है, इसलिए यदि मनुष्य को बचाया जाना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस लेना होगा, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को, जिसे शैतान द्वारा बंदी बना लिया गया है, वापस लेना होगा। इस प्रकार, शैतान को मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों और मनुष्य के मूल विवेक को पुनर्स्थापित करने के माध्यम से पराजित किया जाना चाहिए। इस तरह से बंदी बना लिए गए मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस लिया जा सकता है। यदि मनुष्य शैतान के प्रभाव और बंधन से मुक्त हो जाता है, तो शैतान शर्मिंदा हो जाएगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और चूँकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त किया जा चुका है, इसलिए एक बार जब यह युद्ध समाप्त हो जाएगा, तो मनुष्य इस संपूर्ण युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बन जाएगा, और शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दंडित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मानव-जाति के उद्धार का संपूर्ण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 3

परमेश्वर को सृजित प्राणियों के प्रति कोई द्वेष नहीं होता है; वह जो कुछ भी करता है, शैतान को पराजित करने के लिए होता है। उसका समस्त कार्य—चाहे वह ताड़ना हो या न्याय—शैतान की ओर निर्देशित है; इसे मानव-जाति के उद्धार के वास्ते किया जाता है, यह सब शैतान को पराजित करने के लिए है, और इसका एक ही उद्देश्य है : शैतान के विरुद्ध बिल्कुल अंत तक युद्ध करना! परमेश्वर जब तक शैतान पर विजय प्राप्त न कर ले, तब तक कभी विश्राम नहीं करेगा! वह केवल तभी विश्राम करेगा, जब वह शैतान को पूरी तरह से हरा देगा। चूँकि परमेश्वर द्वारा किया गया समस्त कार्य शैतान की ओर निर्देशित है, और चूँकि वे सभी लोग जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, शैतान की सत्ता के नियंत्रण में हैं और सभी शैतान की सत्ता के अधीन जीवन बिताते हैं, यदि परमेश्वर ने शैतान के विरुद्ध युद्ध करने और उससे संबंध-विच्छेद करने के लिए इन लोगों की अगुआई नहीं की और यदि परमेश्वर शैतान पर विजय प्राप्त नहीं कर पाया, तो शैतान इन लोगों को जाने नहीं देगा और परमेश्वर द्वारा उन्हें प्राप्त नहीं किया जा सकेगा। यदि परमेश्वर ने उन्हें प्राप्त नहीं किया, तो यह साबित करेगा कि शैतान को पराजित नहीं किया गया है, उसे वश में नहीं किया गया है। और इसलिए, अपनी 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना में परमेश्वर ने प्रथम चरण के दौरान व्यवस्था का कार्य किया, दूसरे चरण के दौरान उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, अर्थात् सलीब पर चढ़ने का कार्य, और तीसरे चरण के दौरान वह मानव-जाति पर विजय प्राप्त करने का कार्य करता है। यह समस्त कार्य उस सीमा पर निर्देशित है, जिस तक शैतान ने मानव-जाति को भ्रष्ट किया है, यह सब शैतान को पराजित करने के लिए है, और इन चरणों में से प्रत्येक चरण शैतान को पराजित करने के वास्ते है। परमेश्वर के प्रबंधन के 6,000 वर्ष के कार्य का सार बड़े लाल अजगर के विरुद्ध युद्ध है, और मानव-जाति का प्रबंधन करने का कार्य शैतान को हराने का कार्य है, शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य है। परमेश्वर ने 6,000 वर्षों तक युद्ध किया है, और इस प्रकार उसने 6,000 वर्षों तक कार्य किया है। अंत में, वह मनुष्य को नए क्षेत्र में लाएगा। जब शैतान पराजित हो जाएगा, तो मनुष्य पूरी तरह से मुक्त हो जाएगा। क्या यह आज परमेश्वर के कार्य की दिशा नहीं है? यह निश्चित रूप से आज के कार्य की प्रवृत्ति है : ऐसा करना जिससे कि मनुष्य पूरी तरह से स्वतंत्र और मुक्त हो जाए, वह किसी विनियम से बाधित न हो और वह किसी प्रकार के बंधनों या प्रतिबंधों द्वारा सीमित न हो। यह समस्त कार्य तुम लोगों की कद-काठी के अनुसार और तुम लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार किया जाता है, जिसका अर्थ है कि जो कुछ तुम लोग पूरा कर सकते हो, वही तुम लोगों को प्रदान किया जाता है। यह “किसी मछली को जमीन पर रहने के लिए मजबूर करने” का मामला नहीं है, तुम लोगों पर कुछ थोपने का मामला नहीं है; इसके बजाय, यह समस्त कार्य तुम लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार किया जाता है। कार्य का प्रत्येक चरण मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताओं और अपेक्षाओं के अनुसार कार्यान्वित किया जाता है, और यह शैतान को हराने के वास्ते है। वास्तव में, आरंभ में सृष्टिकर्ता और सृजित प्राणियों के बीच किसी प्रकार की बाधाएँ नहीं थीं। ये सब अवरोध शैतान द्वारा उत्पन्न किए गए। शैतान ने मनुष्य के लिए इतना व्यवधान डाला है और भ्रष्ट किया है कि वह किसी भी चीज को देखने या छूने में असमर्थ हो गया है। मनुष्य पीड़ित है, जिसे धोखा दिया गया है। जब शैतान को हरा दिया जाएगा, तो सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता को देखेंगे, और सृष्टिकर्ता सृजित प्राणियों को देखेगा और व्यक्तिगत रूप से उनकी अगुआई करने में समर्थ होगा। केवल यही वह जीवन है, जो पृथ्वी पर मनुष्य के पास होना चाहिए। और इसलिए, परमेश्वर का मुख्य कार्य शैतान को हराने के लिए किया जाता है, और जब शैतान को हरा दिया जाएगा, तो हर चीज का समाधान हो जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 4

परमेश्वर की संपूर्ण प्रबंधन योजना का कार्य व्यक्तिगत रूप से स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाता है। प्रथम चरण—संसार का सृजन—परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था और यदि ऐसा न किया जाता, तो कोई भी मानव-जाति का सृजन कर पाने में सक्षम न हुआ होता। दूसरा चरण, जो संपूर्ण मानवजाति के छुटकारे का था, उसे भी स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था। तीसरा चरण स्वतः स्पष्ट है : परमेश्वर के संपूर्ण कार्य के अंत को स्वयं परमेश्वर द्वारा किए जाने की और भी अधिक आवश्यकता है। संपूर्ण मानव-जाति के छुटकारे, उस पर विजय पाने, उसे प्राप्त करने, और उसे पूर्ण बनाने का समस्त कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाता है। यदि वह व्यक्तिगत रूप से यह कार्य न करता, तो मनुष्य उसकी पहचान का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, न ही उसका कार्य मनुष्य द्वारा किया जा सकता था। शैतान को हराने, मानव-जाति को प्राप्त करने, और मनुष्य को पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन प्रदान करने के लिए वह व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की अगुआई करता है और व्यक्तिगत रूप से मनुष्यों के बीच कार्य करता है; अपनी संपूर्ण प्रबंधन योजना के वास्ते और अपने संपूर्ण कार्य के लिए उसे व्यक्तिगत रूप से इस कार्य को करना चाहिए। यदि मनुष्य केवल यह विश्वास करता है कि परमेश्वर इसलिए आया था कि मनुष्य उसे देख सके, या वह मनुष्य को खुश करने के लिए आया था, तो ऐसे विश्वास का कोई मूल्य, कोई महत्व नहीं है। मनुष्य की समझ बहुत ही सतही है! केवल स्वयं कार्यान्वित करके ही परमेश्वर इस कार्य को अच्छी तरह से और पूरी तरह से कर सकता है। यदि मनुष्य को यह कार्य करना हो, तो वह परमेश्वर का स्थान लेने में अक्षम होगा। चूँकि उसके पास परमेश्वर की पहचान या उसका सार नहीं है, इसलिए वह परमेश्वर का कार्य करने में असमर्थ है और यदि मनुष्य इसे करता भी, तो इसका कोई प्रभाव नहीं होता। पहली बार जब परमेश्वर ने देह धारण किया था, तो वह छुटकारे के वास्ते था, संपूर्ण मानव-जाति को पाप से छुटकारा देने के लिए था, मनुष्य को शुद्ध होने और उसके पापों को क्षमा किए जाने में सक्षम बनाने के लिए था। विजय का कार्य भी परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से किया जाता है। इस चरण के दौरान यदि परमेश्वर को केवल भविष्यवाणी ही करनी होती, तो किसी नबी—किसी गुणी व्यक्ति—को उसका स्थान लेने के लिए ढूँढ़ा जा सकता था; यदि केवल भविष्यवाणी ही कहनी होती, तो मनुष्य परमेश्वर की जगह ले सकता था। किंतु व्यक्तिगत रूप से स्वयं परमेश्वर का कार्य करने और मनुष्य के जीवन का कार्य करने के संदर्भ में, मनुष्य इस कार्य को नहीं कर सकता था। इसे व्यक्तिगत रूप से स्वयं परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए : इस कार्य को करने के लिए परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से देह धारण करना चाहिए। वचन के युग में, यदि केवल भविष्यवाणी ही कही जाती, तो इस कार्य को करने के लिए नबी यशायाह या एलिय्याह को ढूँढ़ा जा सकता था, और इसे व्यक्तिगत रूप से करने के लिए स्वयं परमेश्वर की कोई आवश्यकता न होती। चूँकि इस चरण में किया जाने वाला कार्य मात्र भविष्यवाणी कहना नहीं है, और चूँकि इस बात का अत्यधिक महत्व है कि वचनों के कार्य का उपयोग मनुष्य पर विजय पाने और शैतान को पराजित करने के लिए किया जाता है, इसलिए इस कार्य को मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता, और इसे स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाना चाहिए। व्यवस्था के युग में यहोवा ने अपने कार्य का एक भाग किया था, जिसके पश्चात् उसने कुछ वचन कहे और नबियों के जरिये कुछ कार्य किया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य यहोवा के कार्य में उसका स्थान ले सकता था, और भविष्यद्रष्टा उसकी ओर से चीजों की भविष्यवाणी और कुछ स्वप्नों की व्याख्या कर सकते थे। उस समय किया गया कार्य सीधे-सीधे मनुष्य के स्वभाव को परिवर्तित करने का कार्य नहीं था, और वह मनुष्य के पाप से संबंध नहीं रखता था, और मनुष्य से केवल व्यवस्था का पालन करने की अपेक्षा की गई थी। अतः यहोवा देहधारी नहीं हुआ और उसने स्वयं को मनुष्य पर प्रकट नहीं किया; इसके बजाय उसने मूसा और अन्य लोगों से सीधे बातचीत की, उनसे बुलवाया और अपने स्थान पर कार्य करवाया, और उनसे मानव-जाति के बीच सीधे तौर पर कार्य करवाया। परमेश्वर के कार्य का पहला चरण मनुष्य की अगुआई का था। यह शैतान के विरुद्ध युद्ध का आरंभ था, किंतु यह युद्ध आधिकारिक रूप से शुरू होना बाक़ी था। शैतान के विरुद्ध आधिकारिक युद्ध परमेश्वर के प्रथम देहधारण के साथ आरंभ हुआ, और यह आज तक जारी है। इस युद्ध की पहली लड़ाई तब हुई, जब देहधारी परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया गया। देहधारी परमेश्वर के सलीब पर चढ़ाए जाने ने शैतान को पराजित कर दिया, और यह युद्ध में प्रथम सफल चरण था। जब देहधारी परमेश्वर ने सीधे मनुष्य के जीवन का कार्य करना आरंभ किया, तो यह मनुष्य को पुनः प्राप्त करने के कार्य की आधिकारिक शुरुआत थी। और चूँकि यह मनुष्य के पुराने स्वभाव को परिवर्तित करने का कार्य था, इसलिए यह शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य था। आरंभ में यहोवा द्वारा किए गए कार्य का चरण पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन की अगुआई मात्र था। यह परमेश्वर के कार्य का आरंभ था, और हालाँकि इसमें अभी कोई युद्ध या कोई बड़ा कार्य शामिल नहीं हुआ था, फिर भी इसने आने वाले युद्ध के कार्य की नींव डाली थी। बाद में, अनुग्रह के युग के दौरान दूसरे चरण के कार्य में मनुष्य के पुराने स्वभाव को परिवर्तित करना शामिल था, जिसका अर्थ है कि स्वयं परमेश्वर मनुष्य के जीवन का कार्य कर रहा था। इसे परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाना था। इसमें अपेक्षित था कि परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से देहधारी हो जाए। यदि वह देहधारी न हुआ होता, तो कार्य के इस चरण में कोई अन्य उसका स्थान नहीं ले सकता था, क्योंकि यह शैतान के विरुद्ध सीधी लड़ाई के कार्य को दर्शाता था। यदि परमेश्वर की ओर से मनुष्य ने शैतान की उपस्थिति में यह कार्य किया होता, तो उसे झुकाया नहीं जा सकता था; उसे हराना असंभव हो गया होता। देहधारी परमेश्वर को ही उसे हराने के लिए आना था, क्योंकि देहधारी परमेश्वर का सार फिर भी परमेश्वर है, वह फिर भी मनुष्य का जीवन है, और वह फिर भी सृष्टिकर्ता है; कुछ भी हो, उसकी पहचान और सार नहीं बदलेगा। और इसलिए, उसने देहधारण किया और शैतान को पूरी तरह झुकवाने का कार्य किया। अंत के दिनों के कार्य के चरण के दौरान, यदि मनुष्य को यह कार्य करना होता और उससे सीधे तौर पर वचनों को बुलवाया जाता, तो वह उन्हें बोलने में असमर्थ होता, और यदि भविष्यवाणी कही जाती, तो मनुष्य पर विजय प्राप्त करना असंभव हो जाता। देहधारी होकर परमेश्वर शैतान को हराने और उसे पूरी तरह झुकवाने के लिए आता है। जब वह शैतान को पूरी तरह से पराजित कर लेगा, पूरी तरह से मनुष्य पर विजय पा लेगा और मनुष्य को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा, तो कार्य का यह चरण पूरा हो जाएगा और सफलता प्राप्त कर ली जाएगी। परमेश्वर के प्रबंधन में मनुष्य परमेश्वर का स्थान नहीं ले सकता। विशेष रूप से, युग की अगुआई करने और नया कार्य आरंभ करने का काम स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किए जाने की और भी अधिक आवश्यकता है। मनुष्य को प्रकाशन देना और उसे भविष्यवाणी प्रदान करना मनुष्य द्वारा किया जा सकता है, किंतु यदि यह ऐसा कार्य है जिसे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए, अर्थात् स्वयं परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध का कार्य, तो इस कार्य को मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता। कार्य के प्रथम चरण के दौरान, जब शैतान के साथ कोई युद्ध नहीं लड़ा जा रहा था, तब यहोवा ने नबियों द्वारा बोली गई भविष्यवाणियों का उपयोग करके व्यक्तिगत रूप से इस्राएल के लोगों की अगुआई की थी। उसके बाद, कार्य का दूसरा चरण शैतान के साथ युद्ध था, और स्वयं परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से देहधारण किया और इस कार्य को करने के लिए देह में आया। जिस भी चीज में शैतान के साथ युद्ध शामिल होता है, उसमें परमेश्वर का देहधारण शामिल होता है, जिसका अर्थ है कि यह युद्ध मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता। यदि मनुष्य को युद्ध करना पड़ता, तो वह शैतान को पराजित करने में असमर्थ होता। उसके पास उसके विरुद्ध लड़ने की ताकत कैसे हो सकती है, जबकि वह अभी भी उसकी सत्ता के अधीन है? मनुष्य बीच में है : यदि तुम शैतान की ओर झुकते हो तो तुम शैतान से संबंधित हो, किंतु यदि तुम परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, तो तुम परमेश्वर से संबंधित हो। यदि इस युद्ध के कार्य में मनुष्य को प्रयास करना होता और उसे परमेश्वर का स्थान लेना होता, तो क्या वह कर पाता? यदि वह युद्ध करता, तो क्या वह बहुत पहले ही नष्ट नहीं हो गया होता? क्या वह बहुत पहले ही नरक में नहीं समा गया होता? इसलिए, परमेश्वर के कार्य में मनुष्य उसका स्थान लेने में अक्षम है, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य के पास परमेश्वर का सार नहीं है, और यदि तुम शैतान के साथ युद्ध करते, तो तुम उसे पराजित करने में अक्षम होते। मनुष्य केवल कुछ कार्य ही कर सकता है; वह कुछ लोगों को जीत सकता है, किंतु वह स्वयं परमेश्वर के कार्य में परमेश्वर का स्थान नहीं ले सकता। मनुष्य शैतान के साथ युद्ध कैसे कर सकता है? तुम्हारे शुरुआत करने से पहले ही शैतान ने तुम्हें बंदी बना लिया होता। केवल जब स्वयं परमेश्वर ही शैतान के साथ युद्ध करता है और मनुष्य इस आधार पर परमेश्वर का अनुसरण और उसके प्रति समर्पण करता है, तभी मनुष्य को परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और वह शैतान के बंधनों से बच सकता है। मनुष्य द्वारा अपनी स्वयं की बुद्धि और योग्यताओं से प्राप्त की जा सकने वाली चीजें बहुत ही सीमित हैं; वह मनुष्य को पूर्ण बनाने में असमर्थ है, उसकी अगुआई करने में असमर्थ है, शैतान को हराने में तो और ज्यादा असमर्थ है। मनुष्य की प्रतिभा और बुद्धि शैतान के षड्यंत्रों को नाकाम करने में असमर्थ हैं, इसलिए मनुष्य उसके साथ युद्ध कैसे कर सकता है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 5

मानवजाति के प्रबंधन का कार्य तीन चरणों में बंटा हुआ है, जिसका अर्थ यह है कि मानवजाति को बचाने का कार्य तीन चरणों में बंटा हुआ है। इन तीन चरणों में संसार की रचना का कार्य समाविष्ट नहीं है, बल्कि ये व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग और राज्य के युग के कार्य के तीन चरण हैं। संसार की रचना करने का कार्य संपूर्ण मानवजाति को उत्पन्न करने का कार्य था। यह मानवजाति को बचाने का कार्य नहीं था, और मानवजाति को बचाने के कार्य से कोई संबंध नहीं रखता है, क्योंकि जब संसार की रचना हुई थी तब मानवजाति शैतान के द्वारा भ्रष्ट नहीं की गई थी, और इसलिए मानवजाति के उद्धार का कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। मानवजाति को बचाने का कार्य शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट किए जाने के बाद ही आरंभ हुआ, और इसलिए मानवजाति के प्रबंधन का कार्य भी मानवजाति को भ्रष्ट किए जाने के बाद ही आरंभ हुआ। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर द्वारा मनुष्य का प्रबंधन मानवजाति को बचाने के उसके कार्य के साथ आरंभ हुआ; यह संसार की रचना के उसके कार्य के साथ आरंभ नहीं हुआ। मानवजाति के पास भ्रष्ट स्वभाव होने के बाद ही प्रबंधन का कार्य अस्तित्व में आया, और इसलिए मानवजाति के प्रबंधन के कार्य में चार चरणों या चार युगों की बजाय तीन भागों का समावेश है। परमेश्वर के मानवजाति के प्रबंधन का उल्लेख करने का केवल यही सही तरीका है। जब अंतिम युग समाप्त होगा, तब तक मानवजाति को प्रबंधित करने का कार्य पूर्ण समाप्ति तक पहुँच चुका होगा। प्रबंधन के कार्य के समापन का अर्थ है कि समस्त मानवजाति को बचाने का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो गया होगा, और तब से यह चरण मानवजाति के लिए पूरा हो चुका होगा। समस्त मानवजाति को बचाने के कार्य के बिना, मानवजाति के प्रबंधन के कार्य का कोई अस्तित्व नहीं होता, न ही कार्य के तीन चरण होते। यह निश्चित रूप से मानवजाति की नैतिक पतनशीलता की वजह से था और क्योंकि मानवजाति को उद्धार की इतनी जरूरी आवश्यकता थी कि यहोवा ने संसार का सृजन पूरा किया और व्यवस्था के युग का कार्य आरंभ कर दिया। केवल तभी मानवजाति के प्रबंधन का कार्य आरम्भ हुआ, जिसका अर्थ है कि केवल तभी मानवजाति को बचाने का कार्य आरम्भ हुआ। “मानवजाति का प्रबंधन करने” का अर्थ पृथ्वी पर नव-सृजित मानवजाति (कहने का अर्थ है, कि ऐसी मानवजाति जो अभी तक भ्रष्ट नहीं हुई थी) के जीवन का मार्गदर्शन करना नहीं है। बल्कि, यह उस मानवजाति के उद्धार का कार्य है जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, जिसका अर्थ है, कि यह इस भ्रष्ट मानवजाति को बदलने का कार्य है। “मानवजाति के प्रबंधन” का यही अर्थ है। मानवजाति को बचाने के कार्य में संसार की रचना करने का कार्य सम्मिलित नहीं है और इसलिए मानवजाति के प्रबंधन का कार्य संसार की रचना करने के कार्य को सम्मिलित नहीं करता है, बल्कि केवल इस कार्य के उन तीन चरणों को ही समाविष्ट करता है जो संसार की रचना से अलग हैं। मानवजाति के प्रबंधन के कार्य को समझने के लिए कार्य के तीन चरणों के इतिहास से अवगत होना आवश्यक है—बचाए जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इससे अवगत अवश्य होना चाहिए। सृजित प्राणी के रूप में तुम्हें यह जानना चाहिए कि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा रचा गया था, तुम्हें मानवजाति की भ्रष्टता के स्रोत को जानना चाहिए और इससे भी बढ़कर तुम्हें मनुष्य के उद्धार की प्रक्रिया को भी जानना चाहिए। यदि तुम लोग केवल परमेश्वर को प्रसन्न करने के प्रयास में कुछ विनियमों का पालन करना ही जानते हो, परंतु तुम्हें इस बात का कोई भान नहीं है कि परमेश्वर मानवजाति को किस प्रकार बचाता है, या मानवजाति की भ्रष्टता का स्रोत क्या है, तो एक सृजित प्राणी के रूप में यही तुम लोगों में कमी है। परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के व्यापक दायरे से अनभिज्ञ रहते हुए, तुम्हें केवल उन कुछ सत्यों को समझकर ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए जिन्हें अभ्यास में लाया जा सकता है—यदि ऐसा मामला है, तो तुम बहुत ही हठधर्मी हो। कार्य के ये तीन चरण परमेश्वर द्वारा मनुष्य के प्रबंधन की वास्तविक कहानी हैं, समूचे संसार में सुसमाचार के आगमन का संकेत हैं, समस्त मानवजाति के बीच सबसे बड़ा रहस्य हैं और सुसमाचार के व्यापक प्रचार की आधारशिला भी हैं। यदि तुम केवल अपने जीवन से संबंधित सरल सत्यों को समझने का प्रयास करते हो, और उसके बारे में कुछ नहीं जानते हो जो सबसे बड़ा रहस्य और दर्शन है, तो क्या तुम्हारा जीवन किसी दोषपूर्ण उत्पाद के समान नहीं है, जो सिर्फ देखने के अलावा किसी काम का नहीं होता?

यदि मनुष्य केवल अभ्यास पर ही ध्यान केंद्रित करता है, और परमेश्वर के कार्य और मनुष्य को जो जानना चाहिए, उसे गौण समझता है, तो क्या यह सोने की लूट और कोयले पर छाप नहीं है? वह जिसे तुम्हें अवश्य जानना चाहिए, तुम्हें उसे अवश्य जानना चाहिए, और वह जिसे तुम्हें अभ्यास में अवश्य लाना चाहिए, तुम्हें उसे अभ्यास में अवश्य लाना चाहिए। तभी तुम एक ऐसे इंसान बनोगे जो जानता है कि सत्य का अनुसरण कैसे करना है। मान लो कि जब तुम्हारा सुसमाचार का प्रचार करने का दिन आता है, उस दिन तुम सिर्फ यह कह पाते हो कि परमेश्वर एक महान और धार्मिक परमेश्वर है, वह सर्वोच्च परमेश्वर है, ऐसा परमेश्वर है जिससे किसी भी महान व्यक्ति की तुलना नहीं की जा सकती है, और वह ऐसा परमेश्वर है जिससे ऊपर और कोई भी नहीं है...। तुम केवल ये अप्रासंगिक और सतही बातें ही कह सकते हो, जबकि तुम अत्यधिक महत्व वाले और सार तक पहुँचने वाले शब्दों को कहने में सर्वथा असमर्थ हो। तुम्हारे पास परमेश्वर को जानने के बारे में या परमेश्वर के कार्य के बारे में कहने के लिए कुछ भी नहीं है, और इसके अलावा, तुम सत्य की व्याख्या नहीं कर सकते हो या वह प्रदान नहीं कर सकते हो जिसकी मनुष्य में कमी है। ऐसा व्यक्ति अपने कर्तव्य का अच्छी तरह से निर्वाह करने में असमर्थ होता है। परमेश्वर की गवाही देना और राज्य के सुसमाचार का प्रचार करना कोई आसान बात नहीं है। सबसे पहले तुम्हें सत्य से सुसज्जित होना चाहिए और ऐसे दर्शन होने चाहिए, जिन्हें समझना परम आवश्यक है। जब तुम परमेश्वर के कार्य के विभिन्न दर्शनों और सत्यों के बारे में स्पष्ट हो जाओगे, और जब तुम अपने हृदय में परमेश्वर के कार्य को जान जाओगे, और इसकी परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या करता है—चाहे यह धार्मिक न्याय हो या शोधन—तुम अपनी बुनियाद के रूप में सबसे महत्वपूर्ण दर्शन से सम्पन्न हो जाओगे, और अभ्यास में लाने के लिए सही सत्य से सम्पन्न हो जाओगे, तब तुम बिल्कुल अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करने के योग्य बन जाओगे। तुम्हें यह अवश्य जानना चाहिए कि परमेश्वर चाहे जो भी कार्य करे, उसके कार्य का उद्देश्य नहीं बदलता, उसके कार्य का केंद्रबिंदु नहीं बदलता और मनुष्य के प्रति उसके इरादे नहीं बदलते। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता कि उसके वचन कितने कठोर हैं, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता कि परिस्थिति कितनी विपरीत है, उसके कार्य के सिद्धांत नहीं बदलेंगे और मनुष्यों को बचाने का उसका इरादा नहीं बदलेगा। बशर्ते कि यह मनुष्य के परिणाम या गंतव्य का प्रकाशन न हो और अंतिम चरण का कार्य न हो, या परमेश्वर की संपूर्ण प्रबंधन योजना को समाप्त करने का कार्य न हो, और बशर्ते कि यह उस समय के दौरान हो जब वह मनुष्य पर कार्य करता है, तब उसके कार्य का केंद्रबिंदु नहीं बदलेगा। यह हमेशा मानवजाति का उद्धार होगा। यह परमेश्वर में तुम लोगों के विश्वास का आधार होना चाहिए। कार्य के तीन चरणों का उद्देश्य समस्त मानवजाति का उद्धार करना है—जिसका अर्थ है शैतान की सत्ता से मनुष्य का पूर्ण उद्धार। यद्यपि कार्य के इन तीन चरणों में से प्रत्येक का एक भिन्न उद्देश्य और महत्व है, किंतु प्रत्येक मानवजाति को बचाने के कार्य का हिस्सा है, और प्रत्येक उद्धार का एक भिन्न कार्य है जो मानवजाति की आवश्यकताओं के अनुसार किया जाता है। एक बार जब तुम कार्य के तीन चरणों के उद्देश्य से अवगत हो जाओगे, तब तुम जान जाओगे कि तुम्हें कार्य के प्रत्येक चरण के महत्व को कैसे समझना है और तुम जान जाओगे कि परमेश्वर के इरादे पूरे करने के लिए किस तरह से अभ्यास करना है। यदि तुम इस स्थिति तक पहुँच सकते हो, तो यह सबसे बड़ा दर्शन, परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का आधार बन जाएगा। तुम्हें केवल आसान अभ्यासों या गहरे सत्यों का अनुसरण नहीं करना चाहिए, बल्कि दर्शन को अभ्यास के साथ जोड़ देना चाहिए, तुम्हारे पास अभ्यास से संबंधित सत्यों और दर्शनों से संबंधित ज्ञान दोनों होने चाहिए। तभी तुम एक ऐसे व्यक्ति बनोगे जो समग्र रूप में सत्य की तलाश करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 6

कार्य के तीनों चरण परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन का मुख्य केंद्र हैं और उनमें परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप अभिव्यक्त होते हैं। जो लोग परमेश्वर के कार्य के तीनों चरणों के बारे में नहीं जानते हैं, वे यह जानने में अक्षम हैं कि परमेश्वर कैसे अपने स्वभाव को अभिव्यक्त करता है, न ही वे परमेश्वर के कार्य की बुद्धिमत्ता को जानते हैं। वे उन अनेक मार्गों से, जिनके माध्यम से परमेश्वर मानवजाति को बचाता है, और संपूर्ण मानवजाति के लिए उसके इरादों से भी अनभिज्ञ रहते हैं। कार्य के तीनों चरण मानवजाति को बचाने के कार्य की पूर्ण अभिव्यक्तियाँ हैं और जो लोग कार्य के तीन चरणों के बारे में नहीं जानते, वे पवित्र आत्मा के कार्य के विभिन्न तरीकों और सिद्धांतों से अनभिज्ञ रहेंगे। वे लोग जो सख्ती से केवल उन विनियमों से चिपके रहते हैं जो कार्य के किसी एक चरण से बचे रह जाते हैं, ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर को केवल विनियमों तक सीमित कर देते हैं, और परमेश्वर में जिनका विश्वास अस्पष्ट होता है—ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार को कभी भी प्राप्त नहीं करेंगे। केवल परमेश्वर के कार्य के तीन चरण ही परमेश्वर के स्वभाव की संपूर्णता को पूरी तरह से अभिव्यक्त कर सकते हैं और संपूर्ण मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के इरादे को और मानवजाति के उद्धार की संपूर्ण प्रक्रिया को पूरी तरह से अभिव्यक्त कर सकते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि परमेश्वर ने शैतान को हरा दिया है और मानवजाति को जीत लिया है, यह परमेश्वर की जीत का प्रमाण है और परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है। जो लोग परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में से केवल एक चरण को ही समझते हैं, वे परमेश्वर के स्वभाव को केवल आंशिक रूप से ही जानते हैं। कार्य के इस अकेले चरण के आधार पर मनुष्य की धारणाओं के भीतर विनियमों के बनने की संभावना होती है, और इस बात की संभावना बन जाती है कि मनुष्य परमेश्वर को सीमित कर देगा और परमेश्वर के स्वभाव के इस अकेले भाग का परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव के प्रतिनिधि के रूप में उपयोग करेगा। इसके अलावा, मनुष्य के भीतर अनेक कल्पनाएँ इस कदर मिली-जुली रहती हैं कि वह परमेश्वर के स्वभाव, अस्तित्व और बुद्धि, साथ ही परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों को सीमित मापदंडों के भीतर कठोरता से बाँध देता है, यह मानते हुए कि यदि परमेश्वर एक बार ऐसा था, तो वह सदा वैसा ही रहेगा और अनंत काल तक नहीं बदलेगा। केवल उन लोगों के पास ही, जो कार्य के तीनों चरणों को जानते और समझते हैं, परमेश्वर का पूरा और सटीक ज्ञान हो सकता है। कम से कम, वे परमेश्वर को इस्राएलियों या यहूदियों के परमेश्वर के रूप में परिभाषित नहीं करेंगे और उसे ऐसे परमेश्वर के रूप में नहीं देखेंगे जिसे मनुष्य की खातिर सदैव के लिए सलीब पर चढ़ा दिया जाएगा। यदि कोई परमेश्वर को उसके कार्य के केवल एक चरण के माध्यम से जानता है, तो उसका ज्ञान बहुत अल्प है और समुद्र में एक बूँद से ज्यादा नहीं है। यदि नहीं, तो कई पुराने धर्म-रक्षकों ने परमेश्वर को जीवित सलीब पर क्यों चढ़ाया होता? क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को निश्चित मापदंडों के भीतर सीमित कर देता है? क्या बहुत-से लोग इसलिए परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करते और पवित्र आत्मा के कार्य में बाधा नहीं डालते क्योंकि वे परमेश्वर के विभिन्न और विविधतापूर्ण कार्यों को नहीं जानते हैं, और इसके अलावा, क्योंकि वे केवल थोड़े-से ज्ञान और धर्म-सिद्धांत से संपन्न होते हैं जिसका उपयोग करके वे पवित्र आत्मा के कार्य को मापते हैं? यद्यपि इन लोगों के पास केवल उथले अनुभव हैं, फिर भी इनकी प्रकृति अहंकारी, स्वेच्छाचारी और निरंकुश है, ये पवित्र आत्मा के कार्य को तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं, पवित्र आत्मा के अनुशासन की उपेक्षा करते हैं और इसके अलावा, पवित्र आत्मा के कार्य की “पुष्टि” करने के लिए अपने तुच्छ पुराने धर्म-सिद्धांतों का उपयोग करते हैं। वे दिखावा भी करते हैं और अपनी विद्वता के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त रहते हैं, यह मानते हुए कि वे पूरी दुनिया में बेरोकटोक घूम सकते हैं। क्या ऐसे लोग वे नहीं हैं जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा तिरस्कृत कर दिया जाता है और जिन्हें नए युग द्वारा हटा दिया जाता है? क्या वे लोग जो परमेश्वर के सामने आते हैं और खुलेआम उसका प्रतिरोध करते हैं, उथले और सीमित ज्ञान वाले ऐसे नीच व्यक्ति नहीं हैं जो अपनी कथित “बुद्धिमत्ता” का प्रदर्शन कर रहे हैं? उन्हें बाइबल का बस थोड़ा-सा ज्ञान है और फिर भी वे दुनिया के “शैक्षणिक हलकों” में बेरोकटोक राज करना चाहते हैं; उनके पास लोगों को सिखाने के लिए बस थोड़ा-सा उथला धर्म-सिद्धांत है और फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को पलटना चाहते हैं और इसे अपनी विचार प्रक्रियाओं के इर्द-गिर्द घुमाने का प्रयास करते हैं। वे अदूरदर्शी हैं, फिर भी वे परमेश्वर के 6,000 वर्षों के कार्य की भव्यता को देखना चाहते हैं। इन लोगों में नाममात्र की भी समझ नहीं है! वास्तव में, लोगों को परमेश्वर का जितना अधिक ज्ञान होता है, वे उसके कार्य के बारे में उतने ही कम हल्के ढंग से निर्णय करते हैं। वे परमेश्वर के वर्तमान कार्य के बारे में अपने ज्ञान की केवल थोड़ी-सी चर्चा करते हैं, लेकिन उस पर लापरवाही से कोई निर्णय नहीं सुनाते। लोग परमेश्वर को जितना कम जानते हैं, वे उतने ही अधिक अहंकारी होते हैं, स्वयं का उतना ही बढ़ा-चढ़ाकर आकलन करते हैं और उतनी ही मनमानी से यह घोषणा करते हैं कि परमेश्वर का स्वरूप क्या है; फिर भी वे जो घोषणा करते हैं, वह केवल धर्म-सिद्धांत होता है और उसका कोई तथ्यात्मक आधार नहीं होता। ये सबसे बेकार लोग हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को एक खेल मानते हैं, वे ओछे लोग हैं! पवित्र आत्मा के नए कार्य का सामना होने पर, वे इसके साथ सावधानी से व्यवहार नहीं करते, बल्कि इसके बजाय वे बिना सोचे-समझे बोलते हैं और जल्दी से राय बना लेते हैं, पवित्र आत्मा के कार्य के सही होने को नकारने के लिए अपनी मर्जी को खुली छूट देते हैं और यहाँ तक कि इसका अपमान या ईश-निंदा करते हैं—क्या ये अनादर करने वाले व्यक्ति पवित्र आत्मा के कार्य से अनजान नहीं हैं और इसके अलावा, क्या ये ऐसे घमंडी लोग नहीं हैं जो स्वाभाविक रूप से अहंकारी और निरंकुश हैं? भले ही एक दिन ऐसा आए जब ऐसे लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार कर लें, फिर भी उन्हें परमेश्वर की क्षमा प्राप्त नहीं होगी। वे न केवल परमेश्वर के लिए कार्य करने वालों को नीची दृष्टि से देखते हैं, बल्कि वे स्वयं परमेश्वर की ईश-निंदा भी करते हैं। ऐसे दुस्साहसी लोगों को न तो इस जीवन में और न ही आने वाले संसार में क्षमा किया जाएगा और वे हमेशा के लिए नरक में विनष्ट हो जाएँगे! ऐसे अनादर करने वाले और आत्म-भोगी लोग केवल विश्वासियों का लेबल लगाए रहते हैं, और वे जितने अधिक ऐसे होते हैं, उतनी ही अधिक संभावना होती है कि वे परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करेंगे। क्या वे सभी अहंकारी व्यक्ति जो स्वाभाविक रूप से निरंकुश हैं और जिन्होंने कभी किसी की आज्ञा नहीं मानी है, इसी मार्ग पर नहीं चलते हैं? क्या वे दिन-प्रतिदिन, इसी तरह से उस परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करते जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं होता?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 7

कार्य के तीन चरण परमेश्वर के संपूर्ण कार्य का तथ्यात्मक अभिलेख हैं; ये परमेश्वर द्वारा मानवजाति के उद्धार के तथ्यात्मक अभिलेख हैं, और ये कल्पित नहीं हैं। यदि तुम लोग वास्तव में परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव के ज्ञान का अनुसरण करना चाहते हो, तो तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के तीनों चरणों को जानना होगा और साथ ही तुम लोगों को किसी भी चरण को चूकना नहीं चाहिए। जो लोग परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करते हैं, उन्हें कम से कम इतना तो हासिल कर ही लेना चाहिए। मनुष्य स्वयं परमेश्वर का सच्चा ज्ञान नहीं रच सकता। यह ऐसा कुछ नहीं है जिसकी कल्पना मनुष्य स्वयं कर सकता हो, यह पवित्र आत्मा द्वारा किसी एक व्यक्ति को प्रदान किए जा रहे विशेष अनुग्रह का नतीजा तो बिल्कुल नहीं है। इसके बजाय, यह वह ज्ञान है जो तब आता है जब मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लेता है, और यह परमेश्वर का वह ज्ञान है जो केवल परमेश्वर के कार्य के तथ्यों का अनुभव करने के बाद ही आता है। इस प्रकार का ज्ञान आसानी से हासिल नहीं किया जा सकता, न ही यह कोई ऐसी चीज है जिसे सिखाया जा सकता है। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत अनुभव से संबंधित है। इन तीन चरणों के मूल में परमेश्वर द्वारा मनुष्यों का उद्धार निहित है, मगर उद्धार के कार्य के भीतर कार्य करने की कई विधियाँ शामिल हैं और साथ ही ऐसे कई साधन भी हैं, जिनके माध्यम से परमेश्वर का स्वभाव व्यक्त होता है। मनुष्य के लिए इसे पहचानना बेहद मुश्किल है। मनुष्य के लिए इसे समझना मुश्किल है। युगों का विभाजन, परमेश्वर के कार्य में बदलाव, कार्य के स्थान में बदलाव, इस कार्य को ग्रहण करने वाले में बदलाव आदि, ये सभी कार्य के तीन चरणों में समाविष्ट हैं। विशेष रूप से, पवित्र आत्मा के कार्य करने के तरीकों में भिन्नता, और साथ ही परमेश्वर के स्वभाव, छवि, नाम, पहचान में परिवर्तन या अन्य बदलाव, ये सभी कार्य के तीन चरणों के ही भाग हैं। कार्य का एक चरण केवल एक ही भाग का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और यह एक निश्चित दायरे के भीतर ही सीमित है। इसमें युगों का विभाजन या परमेश्वर के कार्य में बदलाव शामिल नहीं है, इसमें अन्य पहलू तो बिल्कुल भी शामिल नहीं हैं। यह एक सुस्पष्ट तथ्य है। कार्य के तीन चरण मानवजाति को बचाने में परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता हैं। मनुष्य को परमेश्वर के कार्य को और उद्धार के कार्य में परमेश्वर के स्वभाव को अवश्य जानना चाहिए; इस तथ्य के बिना, परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान निराधार शब्दों के अलावा कुछ भी नहीं है, यह सैद्धांतिक बातों का दिखावा मात्र है। इस प्रकार का ज्ञान मनुष्य को न तो यकीन दिला सकता है और न ही उसे जीत सकता है; यह वास्तविकता से बेमेल है और यह सत्य नहीं है। यह बहुत भरपूर मात्रा में और कानों के लिए सुखद हो सकता है, परंतु यदि यह परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव से मेल नहीं खाता, तो परमेश्वर तुम्हें नहीं बख़्शेगा। न केवल वह तुम्हारे ज्ञान को स्वीकृति नहीं देगा, बल्कि तुम्हें तुम्हारी ईश-निंदा के पाप का दंड देगा। परमेश्वर को जानने के वचन हल्के में नहीं बोले जाते हैं। भले ही तुम वाक्पटु और चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाले हो सकते हो, और भले ही तुम्हारे शब्द इतने चतुर हों कि तुम अपनी बहस से काले को सफेद और सफेद को काला बना सकते हो, फिर भी परमेश्वर के ज्ञान की बात आते ही तुम्हारी क्षमता जवाब दे जाती है। परमेश्वर कोई ऐसा नहीं है, जिसके बारे में तुम लापरवाही से निर्णय दे सको या जिसकी यूँ ही प्रशंसा कर सको या कलंकित कर सको। तुम किसी की भी और हर किसी की प्रशंसा कर सकते हो, फिर भी परमेश्वर के सर्वोच्च अनुग्रह का वर्णन करने के लिए सही शब्द खोजने में तुम्हें संघर्ष करना पड़ता है—यही सभी हारने वालों द्वारा महसूस किया जाता है। भले ही ऐसे कई भाषा के माहिर हैं जो परमेश्वर का वर्णन करते हैं, लेकिन वे जो वर्णन करते हैं उसकी सटीकता उन लोगों द्वारा बोले गए सत्य का सौवाँ हिस्सा ही है जो परमेश्वर द्वारा चुने गए होते हैं, यद्यपि उनका शब्द-संग्रह सीमित होता है, फिर भी उनके पास ऐसा समृद्ध अनुभव होता है, जिसके आधार पर वे बोलते हैं। इस प्रकार, यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का ज्ञान सटीकता और व्यावहारिकता में निहित है, न कि शब्दों का चतुराई से उपयोग करने या समृद्ध शब्द-संग्रह में और यह कि मनुष्य के ज्ञान और परमेश्वर के ज्ञान का आपस में कोई संबंध नहीं है। परमेश्वर को जानने का पाठ मानवजाति के किसी भी प्राकृतिक विज्ञान से ऊँचा है। यह ऐसा सबक है जो केवल उन्हीं बहुत थोड़े-से लोगों द्वारा सफलतापूर्वक सीखा जा सकता है जो परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करते हैं, न कि यूँ ही किसी भी प्रतिभावान व्यक्ति द्वारा सीखा जा सकता है। इसलिए तुम लोगों को परमेश्वर को जानने और सत्य का अनुसरण करने को ऐसे नहीं देखना चाहिए मानो कि वे ऐसी चीजें हैं, जिन्हें किसी बच्चे द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है। हो सकता है कि तुम अपने पारिवारिक जीवन, अपने कार्यक्षेत्र या अपने वैवाहिक जीवन में पूरी तरह से सफल हो, परंतु जब सत्य और परमेश्वर को जानने के सबक की बात आती है, तो तुम्हारे पास दिखाने के लिए कुछ नहीं है, तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है। ऐसा कहा जा सकता है कि सत्य को अभ्यास में लाना तुम लोगों के लिए बहुत ही कठिन बात है और परमेश्वर को जानना तो और भी बड़ी समस्या है। यही तुम लोगों की कठिनाई है, और इसी कठिनाई का सामना संपूर्ण मानवजाति कर रही है। जिन्होंने परमेश्वर को जानने के प्रयास में कुछ प्राप्त कर लिया है, उनमें से लगभग कोई भी मापदंड पर खरा नहीं उतरता। मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर को जानने का अर्थ क्या है, परमेश्वर को जानना क्यों आवश्यक है या व्यक्ति को किस स्तर तक पहुँचना चाहिए, इससे पहले कि वह परमेश्वर को जान सके। यही मानवजाति के लिए बहुत उलझन वाली बात है और सीधे-सीधे यही वह सबसे बड़ी पहेली है जिसका सामना मानवजाति द्वारा किया जा रहा है—कोई भी इस प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम नहीं है, न ही कोई इस प्रश्न का उत्तर देने की इच्छा रखता है, क्योंकि आज तक मानवजाति में से किसी को भी इस कार्य के अध्ययन में कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई है। शायद, जब कार्य के तीन चरणों की पहेली मानवजाति को बताई जाएगी, तो अनुक्रम से परमेश्वर को जानने वाले प्रतिभावान लोगों का एक समूह प्रकट होगा। बेशक, मैं आशा करता हूँ कि ऐसा ही हो और साथ ही मैं इस कार्य को करने की प्रक्रिया में हूँ। मैं निकट भविष्य में ऐसे और भी अधिक प्रतिभावान लोगों के उभरने की आशा करता हूँ और यह आशा करता हूँ कि वे कार्य के इन तीन चरणों के तथ्य के गवाह बनें—जिसका बेशक यह अर्थ है कि वे कार्य के इन तीनों चरणों की गवाही देने वाले प्रथम लोग बनेंगे। परंतु इससे अधिक दुखद और खेदजनक कुछ भी नहीं होगा कि परमेश्वर के कार्य की समाप्ति के दिन इस प्रकार के प्रतिभावान लोग प्रकट न हों, या केवल ऐसे एक या दो ही लोग सामने आएँ और वे वही लोग हों जिन्होंने देहधारी परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना व्यक्तिगत रूप से स्वीकार कर लिया हो। फिर भी, यह सिर्फ़ सबसे बुरी संभावना है। चाहे जो भी हो, मैं अभी भी आशा करता हूँ कि जो वास्तव में परमेश्वर के अनुसरण में हैं, वे इस आशीष को प्राप्त कर पाएँ। समय के आरम्भ से ही, इस प्रकार का कार्य पहले कभी नहीं हुआ; मानव विकास के इतिहास में कभी भी इस प्रकार का उपक्रम नहीं हुआ है। यदि तुम वास्तव में परमेश्वर को जानने वालों में सबसे प्रथम लोगों में से एक हुए, तो क्या यह सभी सृजित प्राणियों में सर्वोच्च गरिमा की बात नहीं होगी? क्या मानवजाति में ऐसा कोई सृजित प्राणी होगा जो परमेश्वर की इससे अधिक स्वीकृति प्राप्त कर सके? इस प्रकार का कार्य कर पाना आसान नहीं है, परंतु इसके बावजूद अंत में परिणाम देगा। लिंग या राष्ट्रीयता से निरपेक्ष, वे सभी लोग जो परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम हैं, अंत में उनके पास परमेश्वर का सबसे महान सम्मान होगा और एकमात्र वे ही परमेश्वर के अधिकार को प्राप्त करेंगे। यही आज का कार्य है, और भविष्य का कार्य भी है; यह 6,000 सालों के कार्य में निष्पादित किया जाने वाला अंतिम और सबसे ऊँचा कार्य है और यह कार्य करने का ऐसा तरीका है, जो मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी को प्रकट करता है। मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान करवाने के कार्य के माध्यम से, लोगों की सभी प्रकार की श्रेणियाँ प्रकट होती हैं : जो परमेश्वर को जानते हैं वे परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने और उसके वादों की विरासत पाने के योग्य होते हैं, जबकि जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे परमेश्वर के आशीषों और उसके वादों की विरासत को पाने के योग्य नहीं होते हैं। जो परमेश्वर को जानते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग होते हैं, और जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग नहीं कहे जा सकते हैं; परमेश्वर के अंतरंग परमेश्वर का कोई भी आशीष प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु जो उसके घनिष्ठ नहीं हैं वे उसके किसी भी काम के योग्य नहीं हैं। चाहे यह क्लेश, शोधन या न्याय हो, ये सभी चीजें अंततः मनुष्य को परमेश्वर को जानने और उसके प्रति समर्पण करने के योग्य बनाने की खातिर हैं। यही एकमात्र प्रभाव है जो अंततः प्राप्त किया जाएगा। कार्य के तीनों चरणों से पूरी तरह अवगत कराया जाना परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान के लिए लाभकारी है और परमेश्वर का अधिक पूर्ण और विस्तृत ज्ञान प्राप्त करने में मनुष्य की सहायता करता है। यह समस्त कार्य मनुष्य के लिए लाभप्रद है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 8

स्वयं परमेश्वर का कार्य वह दर्शन है जो मनुष्य को अवश्य जानना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर का कार्य मनुष्यों द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, और मनुष्यों द्वारा धारण नहीं किया जाता। कार्य के तीन चरण परमेश्वर के प्रबंधन की संपूर्णता हैं, और इससे बड़ा कोई दर्शन नहीं है जिसे मनुष्य को जानना चाहिए। यदि मनुष्य इस सबसे महान दर्शन को नहीं जानता है, तो परमेश्वर को जानना आसान नहीं है, परमेश्वर के इरादों को समझना आसान नहीं है, और, इसके साथ ही, मनुष्य जिस मार्ग पर चलता है वह उत्तरोत्तर कठिन बनता जायेगा। दर्शन के बिना, मनुष्य इतनी दूर तक नहीं आ सकता था। ये दर्शन ही हैं जिन्होंने आज तक मनुष्य को बनाए रखा है और जो मनुष्य की सबसे बड़ी सुरक्षा बने हैं। भविष्य में, तुम लोगों का ज्ञान अवश्य ही अधिक गहरा होना चाहिए। तुम्हें उसके संपूर्ण इरादों को और कार्य के तीन चरणों में उसके बुद्धिमानी भरे कार्य के सार को अवश्य ही जानना चाहिए। केवल यही तुम लोगों का असली आध्यात्मिक कद है। कार्य का अंतिम चरण अकेला नहीं होता है, बल्कि यह उस संपूर्ण का हिस्सा है जो पिछले दो चरणों के साथ मिलकर बनता है, कहने का अर्थ है कि कार्य के तीनों चरणों में से केवल एक को करके उद्धार के समस्त कार्य को पूरा करना असंभव है। भले ही कार्य का अंतिम चरण मनुष्य को पूरी तरह से बचाने में समर्थ है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि केवल इसी एक चरण को स्वतंत्र रूप से करना आवश्यक है और यह कि कार्य के पिछले दो चरण मनुष्य को शैतान के प्रभाव से बचाने के लिए आवश्यक नहीं हैं। इन तीन चरणों में से एक चरण को भी अपने आपमें एकमात्र ऐसा दर्शन नहीं माना जा सकता है जिसे समस्त मानवजाति को जानना होगा, क्योंकि उद्धार के कार्य की संपूर्णता कार्य के तीन चरण हैं न कि उनमें से कोई एक चरण। जब तक उद्धार का कार्य पूर्ण नहीं होता, तब तक परमेश्वर का प्रबंधन पूरी तरह से समाप्त नहीं हो पाएगा। परमेश्वर का अस्तित्व, स्वभाव और बुद्धि उद्धार के कार्य की संपूर्णता में व्यक्त होते हैं, उनके बारे में मनुष्य को आरंभ में नहीं बताया जाता है, बल्कि उद्धार के कार्य में धीरे-धीरे व्यक्त किया जाता है। उद्धार के कार्य का प्रत्येक चरण परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग को और उसके अस्तित्व के एक भाग को व्यक्त करता है; कार्य का कोई एक चरण प्रत्यक्षतः और पूर्णतः परमेश्वर के अस्तित्व की संपूर्णता को व्यक्त नहीं कर सकता है। इस तरह, चूँकि उद्धार का कार्य केवल तभी पूरी तरह से संपन्न हो सकता है, जब कार्य के ये तीनों चरण पूरे हो जाते हैं, परमेश्वर की संपूर्णता के बारे में मनुष्य के ज्ञान को परमेश्वर के कार्य के तीनों चरणों से अलग नहीं किया जा सकता। कार्य के एक चरण से मनुष्य जो प्राप्त करता है वह सिर्फ परमेश्वर का वह स्वभाव है जो उसके कार्य के सिर्फ एक भाग में व्यक्त होता है। यह उस स्वभाव और अस्तित्व का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, जो इससे पहले या बाद के चरणों में व्यक्त होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मानवजाति को बचाने का कार्य सीधे एक ही अवधि के दौरान या किसी एक स्थान पर समाप्त नहीं होता है, बल्कि भिन्न-भिन्न समयों और स्थानों पर मनुष्य के विकास की स्थिति के अनुसार यह धीरे-धीरे अधिक गहरा होता जाता है। यह वह कार्य है जो चरणों में किया जाता है, और एक ही चरण में पूरा नहीं होता है। इसलिए, परमेश्वर की संपूर्ण बुद्धि किसी एक अलग चरण में नहीं, बल्कि तीनों चरणों में मूर्त रूप लेती है। उसके संपूर्ण अस्तित्व और उसकी संपूर्ण बुद्धि इन तीन चरणों के बीच आवंटित किए जाते हैं—प्रत्येक चरण में उसके अस्तित्व का समावेश होता है और प्रत्येक चरण उसके कार्य की बुद्धिमत्ता का अभिलेख है। मनुष्य को इन तीन चरणों में व्यक्त परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव को जानना चाहिए। परमेश्वर का यह अस्तित्व समस्त मानवजाति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, और यदि लोगों को परमेश्वर की आराधना करते समय यह ज्ञान न हो, तो वे उन लोगों से किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं हैं जो बुद्ध की पूजा करते हैं। मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य मनुष्यों से छिपा नहीं है, और उन सभी को यह जानना चाहिए जो परमेश्वर की आराधना करते हैं। चूँकि परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच उद्धार के कार्य के तीन चरणों को पूरा कर लिया है, इसलिए मनुष्य को कार्य के इन तीन चरणों के दौरान जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, इसकी अभिव्यक्ति को जानना चाहिए। यह काम मनुष्य को अवश्य करना चाहिए। परमेश्वर मनुष्य से जो कुछ छिपाता है वह ऐसी चीज है जिसे मनुष्य प्राप्त करने में अक्षम है और जिसे मनुष्य को नहीं जानना चाहिए, जबकि परमेश्वर मनुष्य को जो कुछ दिखाता है वह ऐसी चीज है जिसे मनुष्य को जानना चाहिए, और जो मनुष्य के पास होना चाहिए। कार्य के तीनों चरणों में से प्रत्येक चरण पूर्ववर्ती चरण की बुनियाद पर पूरा किया जाता है; इसे स्वतंत्र रूप से, उद्धार के कार्य से पृथक नहीं किया जाता है। यद्यपि किए गए कार्य और युग में काफी बड़े अंतर हैं, पर इसके मूल में मानवजाति का उद्धार ही है, और उद्धार के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले चरण से ज्यादा गहरा होता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 9

मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य मनुष्यों से छिपा नहीं है, और उन सभी को यह जानना चाहिए जो परमेश्वर की आराधना करते हैं। चूँकि परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच उद्धार के कार्य के तीन चरणों को पूरा कर लिया है, इसलिए मनुष्य को कार्य के इन तीन चरणों के दौरान जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, इसकी अभिव्यक्ति को जानना चाहिए। यह काम मनुष्य को अवश्य करना चाहिए। परमेश्वर मनुष्य से जो कुछ छिपाता है वह ऐसी चीज है जिसे मनुष्य प्राप्त करने में अक्षम है और जिसे मनुष्य को नहीं जानना चाहिए, जबकि परमेश्वर मनुष्य को जो कुछ दिखाता है वह ऐसी चीज है जिसे मनुष्य को जानना चाहिए, और जो मनुष्य के पास होना चाहिए। कार्य के तीनों चरणों में से प्रत्येक चरण पूर्ववर्ती चरण की बुनियाद पर पूरा किया जाता है; इसे स्वतंत्र रूप से, उद्धार के कार्य से पृथक नहीं किया जाता है। यद्यपि किए गए कार्य और युग में काफी बड़े अंतर हैं, पर इसके मूल में मानवजाति का उद्धार ही है, और उद्धार के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले चरण से ज्यादा गहरा होता है। कार्य का प्रत्येक चरण पिछले चरण की बुनियाद पर ही आगे बढ़ता है, पिछले चरण को कभी भी त्यागा नहीं जाता। इस प्रकार, अपने कार्य में, जो हमेशा नया रहता है और कभी भी पुराना नहीं पड़ता है, परमेश्वर निरंतर अपने स्वभाव के उन पहलुओं को व्यक्त करता रहता है जिन्हें पहले कभी भी मनुष्य के सामने व्यक्त नहीं किया गया है, और वह हमेशा मनुष्य को अपने नए कार्य और अपने नए अस्तित्व से अवगत कराता रहता है। भले ही पुराने धर्म-रक्षक इसका प्रतिरोध करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा देते हैं और इसका खुलेआम विरोध करते हैं, तब भी परमेश्वर वह नया कार्य करता रहता है जो उसे करना होता है। उसका कार्य हमेशा बदलता रहता है और इस कारण से, यह हमेशा मनुष्य के विरोध का सामना करता रहता है। इसी प्रकार, उसका स्वभाव भी युगों और उसके कार्य को ग्रहण करने वालों की तरह सदैव बदलता रहता है। इसके साथ ही, वह हमेशा वह काम करता है जो पहले कभी नहीं किया गया है, वह ऐसा कार्य भी करता है जो मनुष्यों को पहले किए गए कार्य से विरोधाभासी, उससे बिल्कुल उलट दिखाई देता है। मनुष्य केवल एक ही प्रकार का कार्य या एक ही प्रकार का अभ्यास स्वीकार करता है, और मनुष्य के लिए ऐसे कार्य या अभ्यासों को स्वीकार करना कठिन होता है, जो इनके साथ बेमेल प्रतीत होते हैं या इनसे उच्चतर होते हैं। परंतु पवित्र आत्मा हमेशा नया कार्य करता है और इसलिए एक के बाद एक ऐसे धार्मिक विशेषज्ञों के समूह उभरते रहते हैं जो परमेश्वर के नए कार्य का प्रतिरोध करते हैं। ये लोग ठीक इसलिए “विशेषज्ञ” बन गए हैं क्योंकि उनके पास यह ज्ञान ही नहीं है कि परमेश्वर किस प्रकार हमेशा नया रहता है और कभी भी पुराना नहीं पड़ता है, और उनके पास परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों का भी कोई ज्ञान नहीं है, और इसके अलावा, उन्हें उन विभिन्न तरीकों का ज्ञान नहीं है जिनके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को बचाता है। मनुष्य यह पहचानने में सर्वथा असमर्थ है कि क्या यह वह कार्य है जो पवित्र आत्मा की ओर से आता है और क्या यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है। कई लोग इस रवैये पर अड़े रहते हैं कि यदि कोई चीज़ पहले आए हुए वचनों के अनुरूप है, तो वे इसे स्वीकार करते हैं, और यदि पहले किए गए कार्य से कुछ अलग है, तो वे इसका विरोध करते हैं और इसे अस्वीकार कर देते हैं। क्या तुम लोग आज इसी प्रकार के सिद्धांतों से बँधे हुए नहीं हो? उद्धार के कार्य के तीन चरणों का तुम लोगों पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा है, और यहाँ ऐसे लोग भी हैं जो यह मानते हैं कि कार्य के पहले के दो चरण एक बोझ हैं, जिन्हें जानने की उन्हें कोई जरूरत नहीं है। उन्हें लगता है कि इन चरणों को आम जनता के लिए घोषित नहीं किया जाना चाहिए, और जितनी जल्दी हो सके इन्हें हटा लिया जाना चाहिए, ताकि लोग कार्य के तीन चरणों के इन पिछले दो चरणों से उलझन में न पड़ें। अधिकांश लोग ऐसा मानते हैं कि कार्य के पिछले दो चरणों से अवगत करवाना अनावश्यक है, और परमेश्वर को जानने में यह बिल्कुल भी मददगार नहीं है—तुम लोग ऐसा ही सोचते हो। आज, तुम सभी लोग ऐसा मानते हो कि इस तरह से व्यवहार करना उचित है, परंतु एक दिन आएगा जब तुम लोग मेरे कार्य के महत्व को समझोगे। यह जान लो कि मैं बिना महत्व का कोई भी कार्य नहीं करता हूँ। चूँकि मैं कार्य के तीन चरणों को तुम लोगों के लिए घोषित कर रहा हूँ, इसलिए वे तुम लोगों के लिए अवश्य लाभदायक होंगे; चूँकि कार्य के ये तीन चरण परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन का मुख्य भाग हैं, इसलिए ब्रह्मांड में उन्हें प्रत्येक का केंद्र बिंदु बनना होगा। एक दिन, तुम सभी लोग इस कार्य के महत्व को महसूस करोगे। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य का प्रतिरोध या आज के कार्य को मापने के लिए अपनी ही धारणाओं का उपयोग इसलिए करते हो, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों को नहीं जानते हो, और क्योंकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति लापरवाही बरतते हो। तुम लोगों द्वारा परमेश्वर का प्रतिरोध और पवित्र आत्मा के कार्य में अवरोध तुम लोगों की धारणाओं और तुम लोगों के अंतर्निहित अहंकार के कारण है। ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर का कार्य गलत है, बल्कि इसलिए है कि तुम लोग स्वाभाविक रूप से अत्यंत विद्रोही हो। परमेश्वर में विश्वास हो जाने के बाद भी, कुछ लोग यकीन से यह भी नहीं कह सकते हैं कि मनुष्य कहाँ से आया, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्य के सही और गलत होने के बारे में राय बनाते हुए सार्वजनिक भाषण देने का साहस करते हैं। यहाँ तक कि वे उन प्रेरितों को भी नसीहतें देते हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य है, उन पर टिप्पणी करते हैं और अभद्र बातें बोलते रहते हैं; उनकी मानवता बहुत ही निम्न स्तर की है और उनमें रत्ती-भर भी विवेक नहीं है। क्या वह दिन नहीं आएगा जब इस प्रकार के लोग पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा ठुकरा दिए जाएँगे और नरक की आग द्वारा भस्म कर दिए जाएँगे? वे परमेश्वर के कार्यों को नहीं जानते हैं, फिर भी उसके कार्य पर राय बनाते हैं और परमेश्वर को यह निर्देश देने की कोशिश करते हैं कि कार्य किस प्रकार किया जाए। इस प्रकार के विवेक से रहित लोग परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? मनुष्य खोजने और अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान ही परमेश्वर को जान पाता है; मनुष्य द्वारा मनमाने आकलन करने के दौरान पवित्र आत्मा के प्रबोधन के माध्यम से परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं होता। परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान जितना अधिक सटीक होता जाता है, उतना ही कम वे उसका प्रतिरोध करते हैं। इसके विपरीत, लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, उतनी ही ज्यादा उनके द्वारा परमेश्वर का प्रतिरोध करने की संभावना रहती है। तुम्हारी धारणाएँ, तुम्हारी पुरानी प्रकृति और तुम्हारी मानवता, चरित्र और नैतिक दृष्टिकोण वह पूँजी है जिससे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो और जितनी अधिक तुम्हारी नैतिकता भ्रष्ट होती है, तुम्हारा चरित्र उतना ही अधिक नीच होता है और तुम्हारी मानवता जितनी निम्न स्तर की होती है, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के शत्रु बन जाते हो। जो लोग प्रबल धारणाएँ रखते हैं और आत्मतुष्ट स्वभाव के होते हैं, वे देहधारी परमेश्वर के प्रति और भी अधिक शत्रुतापूर्ण होते हैं; इस प्रकार के लोग मसीह-विरोधी हैं। यदि तुम्हारी धारणाओं में सुधार न किया जाए, तो वे सदैव परमेश्वर की विरोधी रहेंगी; तुम कभी भी परमेश्वर की अनुरूपता में नहीं होगे और सदैव उससे दूर रहोगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 10

कार्य के तीनों चरण एक ही परमेश्वर द्वारा किए गए हैं; यही सबसे महान दर्शन है और यह परमेश्वर को जानने का एकमात्र मार्ग है। कार्य के तीनों चरण केवल स्वयं परमेश्वर द्वारा ही किए जा सकते हैं। कोई भी मनुष्य इस प्रकार का कार्य उसकी ओर से नहीं कर सकता है। कहने का तात्पर्य है कि आरंभ से लेकर आज तक केवल स्वयं परमेश्वर ही अपना कार्य कर सकता था। यद्यपि परमेश्वर के कार्य के तीनों चरण विभिन्न युगों और स्थानों में किए गए हैं, और यद्यपि प्रत्येक का कार्य भी अलग-अलग है, किंतु यह सब कार्य एक ही परमेश्वर द्वारा किया गया है। उन सभी दर्शनों में, जिनके बारे में मनुष्य को जानना आवश्यक है, यह सबसे महान दर्शन है, और यदि यह पूरी तरह से मनुष्य के द्वारा समझा जा सके, तो वह अडिग रहने में समर्थ होगा। आज विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हैं और वे पवित्र आत्मा के कार्य तथा जो कार्य पवित्र आत्मा के नहीं हैं, उनके बीच अंतर नहीं कर पाते—और इस कारण वे भेद नहीं कर सकते कि क्या कार्य का यह चरण भी, कार्य के पिछले दो चरणों के समान, यहोवा परमेश्वर के द्वारा किया गया है। यद्यपि लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, तब भी उनमें से अधिकांश लोग अभी भी यह भेद करने में समर्थ नहीं हैं कि क्या यही सही मार्ग है। मनुष्य चिंता करता रहता है कि क्या यही वह मार्ग है जिसकी अगुवाई स्वयं परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से की है और क्या परमेश्वर का देहधारण एक तथ्य है, और अधिकांश लोगों को तब भी कुछ पता नहीं होता कि इन चीजों को कैसे जानें। जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं उन्हें इस मार्ग के बारे में सुनिश्चित नहीं है और इसलिए जो धर्मोपदेश दिए जाते हैं उनका इन लोगों पर केवल आंशिक प्रभाव पड़ता है और वे पूरा प्रभाव डालने में असमर्थ रहते हैं और फिर यह ऐसे लोगों के जीवन प्रवेश को प्रभावित करता है। यदि मनुष्य कार्य के तीनों चरणों में यह देख सकता है कि वे विभिन्न समयों, स्थानों में और लोगों पर स्वयं परमेश्वर के द्वारा किए जाते हैं, अगर मनुष्य यह देख सकता है कि यद्यपि कार्य भिन्न है, तब भी यह सब एक ही परमेश्वर के द्वारा किया गया है, और चूँकि यह कार्य एक ही परमेश्वर द्वारा किया गया है, तो इसे सही और त्रुटिहीन होना चाहिए, और यह भी कि यद्यपि यह मनुष्यों की धारणाओं से मेल नहीं खाता है, तो भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह एक ही परमेश्वर का कार्य है—यदि मनुष्य निश्चित होकर कह सके कि यह एक ही परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य है, तो मनुष्य की धारणाएँ तुच्छ हो जाएँगी और उनका उल्लेख करना भी आवश्यक नहीं रहेगा। मनुष्य दर्शनों के बारे में अस्पष्ट है, वह केवल यहोवा को परमेश्वर के रूप में और यीशु को प्रभु के रूप में जानता है और आज के देहधारी परमेश्वर के बारे में दुविधा में है। इसके परिणामस्वरूप बहुत-से लोग अभी भी यहोवा और यीशु के कार्यों से जुड़े हुए हैं, और आज के कार्य के बारे में धारणाओं से ग्रस्त हैं, अधिकांश लोग हमेशा अनिश्चित महसूस करते हैं और आज के कार्य को गंभीरता से नहीं लेते हैं। मनुष्य की कार्य के पिछले दो चरणों के बारे में कोई धारणाएँ नहीं हैं, जो अदृश्य थे। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य पिछले दोनों चरणों की वास्तविकता को नहीं समझता है और व्यक्तिगत रूप से वह उनका साक्षी नहीं रहा है। चूँकि कार्य के इन चरणों को देखा नहीं जा सकता है, इसलिए मनुष्य इनके बारे में मनचाही कल्पनाएँ करता है; वह कुछ भी क्यों न सोचता रहे, पर इन कल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए कोई तथ्य नहीं हैं, और इन्हें सुधारने वाला भी कोई नहीं है। मनुष्य कोई सावधानी बरते बिना और अपनी कल्पनाओं को बेलगाम दौड़ाते हुए अपने मिजाज को खुली छूट दे देता है। उसकी कल्पनाओं को सत्यापित करने के लिए कोई तथ्य नहीं है, इसलिए मनुष्य की कल्पनाएँ “तथ्य” बन जाती हैं, भले ही वे जाँच-परख में सही सिद्ध हों या न हों। इस प्रकार, मनुष्य अपने मन में कल्पित परमेश्वर को ही मानने लगता है और वास्तविकता के परमेश्वर का अनुसरण नहीं करता है। यदि एक व्यक्ति का एक प्रकार का विश्वास है, तो सौ लोगों के बीच सौ प्रकार के विश्वास होंगे। मनुष्य के पास इसी प्रकार के विश्वास हैं क्योंकि उसने परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य को नहीं देखा है, क्योंकि उसने इसे सिर्फ अपने कानों से सुना है और अपनी आँखों से नहीं देखा है। मनुष्य ने उपाख्यानों और कहानियों को सुना है, परंतु उसने परमेश्वर के कार्य के तथ्यों के ज्ञान के बारे में शायद ही सुना है। इस प्रकार, वे जो केवल एक वर्ष से विश्वासी रहे हैं, परमेश्वर पर अपनी खुद की धारणाओं के माध्यम से विश्वास करते हैं और यही उन सभी के बारे में भी सही है जिन्होंने परमेश्वर पर जीवन भर विश्वास किया है। जो लोग तथ्यों को नहीं देख सकते वे ऐसे विश्वास से बच नहीं सकते जिसमें परमेश्वर के बारे में उनकी अपनी धारणाएँ हैं। मनुष्य यह मानता है कि उसने स्वयं को अपनी सभी पुरानी धारणाओं के बंधनों से मुक्त कर लिया है और एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। क्या मनुष्य यह नहीं जानता कि उन लोगों का ज्ञान जो परमेश्वर का असली चेहरा नहीं देख सकते, केवल धारणाएँ और अफ़वाह है? मनुष्य सोचता है कि उसकी धारणाएँ सही हैं और त्रुटिहीन हैं और सोचता है कि ये धारणाएँ परमेश्वर की ओर से आती हैं। आज जब मनुष्य परमेश्वर के कार्य देखता है, वह कई वर्षों से मन में जमी धारणाओं को खुलकर व्यक्त कर देता है। अतीत की कल्पनाएँ और विचार इस चरण के कार्य में अवरोध बन गए हैं और मनुष्य के लिए इस प्रकार की धारणाओं को छोड़ना और इस प्रकार के विचारों का खंडन करना कठिन हो गया है। परमेश्वर का आज तक अनुसरण करने वाले कई लोगों की इस कार्य के प्रत्येक कदम के प्रति धारणाएँ और भी अधिक गंभीर हो गई हैं और इन लोगों ने धीरे-धीरे देहधारी परमेश्वर के प्रति एक दुराग्रही घृणा पैदा कर ली है। इस घृणा का स्रोत मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। तथ्य मनुष्य को अपनी कल्पना को खुली छूट देने की अनुमति नहीं देते, किसी मनमाने खंडन के आगे झुकना तो दूर की बात है; मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ तथ्यों के अस्तित्व को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं; इसके अलावा, मनुष्य तथ्यों के सही होने और उनकी प्रामाणिकता पर विचार नहीं करता और केवल अपनी धारणाओं को खुलकर व्यक्त कर देता है और अपनी कल्पनाओं को विकसित करता रहता है। ठीक इसी कारण से मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ आज के कार्य की शत्रु बन गई हैं, ऐसा कार्य जो मनुष्य की धारणाओं से मेल नहीं खाता। इसे केवल मनुष्यों की धारणाओं का दोष ही कहा जा सकता है, इसे परमेश्वर के कार्य का दोष नहीं कहा जा सकता। मनुष्य जो चाहे कल्पना कर सकता है, परंतु वह परमेश्वर के कार्य के किसी भी चरण या इसके छोटे-से अंश का भी खंडन नहीं कर सकता है; परमेश्वर के कार्य का तथ्य मनुष्य द्वारा अनुल्लंघनीय है। तुम अपनी कल्पनाओं को खुली छूट दे सकते हो, और यहाँ तक कि यहोवा एवं यीशु के कार्यों के बारे में बढ़िया कथाओं का भी संकलन कर सकते हो, परंतु तुम यहोवा और यीशु के कार्य के प्रत्येक चरण के तथ्य का खंडन नहीं कर सकते; यह एक सिद्धांत है, और एक प्रशासनिक आदेश भी है और तुम लोगों को इन मामलों के महत्व को समझना चाहिए। मनुष्य यह समझता है कि कार्य का यह चरण मनुष्य की धारणाओं के साथ असंगत है, जबकि पिछले दो चरणों के कार्य के साथ ऐसी कोई बात नहीं है। अपनी कल्पना में मनुष्य यह विश्वास करता है कि पिछले दोनों चरणों का कार्य निश्चित रूप से आज के कार्य के समान नहीं है—परंतु क्या तुमने कभी यह विचार किया है कि परमेश्वर के कार्य के सभी सिद्धांत एक ही हैं, कि उसका कार्य हमेशा व्यावहारिक होता है और युग चाहे कोई भी हो, ऐसे लोगों की हमेशा भरमार होगी जो उसके कार्य के तथ्य का प्रतिरोध और विरोध करते हैं? आज जो लोग कार्य के इस चरण का प्रतिरोध और विरोध करते हैं वे निस्संदेह अतीत में भी परमेश्वर का प्रतिरोध करते, क्योंकि इस प्रकार के लोग सदैव परमेश्वर के शत्रु रहेंगे। वे लोग जो परमेश्वर के कार्य के तथ्य को जानते हैं, कार्यों के इन तीन चरणों को एक ही परमेश्वर के कार्य के रूप में देखेंगे, और अपनी धारणाओं को छोड़ देंगे। ये वे लोग हैं जो परमेश्वर को जानते हैं, और सचमुच परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। जब परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन समाप्ति के निकट होगा, तो परमेश्वर सभी चीजों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटेगा। मनुष्य सृष्टिकर्ता के हाथों से रचा गया था और अंत में वह मनुष्य को पूरी तरह से अपने प्रभुत्व में वापस ले लेगा; कार्य के तीन चरणों की यही परिणति है। अंत के दिनों में कार्य का चरण और इस्राएल एवं यहूदा में पिछले दो चरण, संपूर्ण ब्रह्मांड में परमेश्वर के प्रबंधन की योजना हैं। इसे कोई नकार नहीं सकता है, और यह परमेश्वर के कार्य का तथ्य है। यद्यपि लोगों ने इस कार्य के बहुत-से हिस्से का अनुभव नहीं किया है या इसके साक्षी नहीं हैं, परंतु तथ्य तब भी तथ्य ही हैं और इसे किसी भी मनुष्य के द्वारा नकारा नहीं जा सकता है। ब्रह्मांड में हर जगह जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे सभी कार्य के इन तीनों चरणों को स्वीकार करेंगे। यदि तुम कार्य के किसी एक विशेष चरण को ही जानते हो, और कार्य के अन्य दो चरणों को नहीं समझते हो, अतीत में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों को नहीं समझते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रबंधन की समस्त योजना के संपूर्ण सत्य के बारे में बात करने में असमर्थ हो, और परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान एक-पक्षीय है, क्योंकि तुम परमेश्वर को जानते या समझते नहीं हो, और इसलिए तुम परमेश्वर के गवाह बनने के लिए योग्य नहीं हो। इन चीज़ों के बारे में तुम्हारा वर्तमान ज्ञान चाहे गहरा हो या सतही, अंत में तुम सभी लोगों के पास ज्ञान होना ही चाहिए और तुम्हें पूरी तरह से आश्वस्त होना चाहिए और सभी लोग परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता को देखेंगे और उसके प्रभुत्व के अधीन समर्पित होंगे। इस कार्य के अंत में सभी धर्म एक हो जाएँगे, सभी सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन लौट जाएँगे, सभी सृजित प्राणी एक सच्चे परमेश्वर की आराधना करेंगे और सभी दुष्ट धर्म नष्ट हो जाएँगे और फिर कभी भी प्रकट नहीं होंगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 11

कार्य के इन तीनों चरणों का निरंतर उल्लेख क्यों किया जा रहा है? युगों का बीतना, सामाजिक विकास और प्रकृति का बदलता हुआ स्वरूप सभी कार्य के तीनों चरणों में परिवर्तनों का अनुसरण करते हैं। मानवजाति परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ बदलती है और अपने-आप विकसित नहीं होती। परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का उल्लेख सभी सृजित प्राणियों को और प्रत्येक धर्म और सम्प्रदाय के लोगों को एक ही परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन लाने के लिए है। चाहे तुम किसी भी धर्म से संबंधित हो, अंततः तुम परमेश्वर के प्रभुत्व के आगे आत्मसमर्पण कर दोगे। स्वयं परमेश्वर ही इस कार्य को कर सकता है; इसे कोई धर्म-प्रमुख नहीं कर सकता। संसार में कई प्रमुख धर्म हैं, प्रत्येक का अपना प्रमुख या अगुआ है और उनके अनुयायी संसार भर के विभिन्न देशों और क्षेत्रों में सभी ओर फैले हुए हैं; लगभग प्रत्येक देश में, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, भिन्न-भिन्न धर्म हैं। फिर भी संसार भर में चाहे कितने ही धर्म क्यों न हों, ब्रह्मांड के सभी लोग अंततः एक ही परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन अस्तित्व में हैं, धर्म के प्रमुखों या अगुआओं के मार्गदर्शन के अधीन नहीं हैं। कहने का अर्थ है कि मानवजाति किसी विशेष धर्म-प्रमुख या अगुवा द्वारा मार्गदर्शित नहीं है; बल्कि संपूर्ण मानवजाति को एक ही सृष्टिकर्ता के द्वारा मार्गदर्शित किया जाता है, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी का और सभी चीजों का और मानवजाति का भी सृजन किया है—यह एक तथ्य है। यद्यपि संसार में कई प्रमुख धर्म हैं, किंतु वे कितने ही बड़े क्यों न हों, वे सभी सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन अस्तित्व में हैं और उनमें से कोई भी इस प्रभुत्व के दायरे से बाहर नहीं जा सकता है। मानवजाति का विकास, समाज का परिवर्तन, प्राकृतिक विज्ञानों का उन्नत होना—प्रत्येक सृष्टिकर्ता की व्यवस्थाओं से अविभाज्य है और यह कार्य ऐसा नहीं है जो किसी धर्म-प्रमुख द्वारा किया जा सके। धर्म-प्रमुख मात्र किसी धर्म विशेष के अगुआ हैं, और वे परमेश्वर का, या उसका जिसने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों को रचा है, प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। धर्म-प्रमुख पूरे धर्म के भीतर सभी का नेतृत्व कर सकते हैं, परंतु वे स्वर्ग के नीचे के सभी सृजित प्राणियों को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं—यह सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत तथ्य है। एक धर्म-प्रमुख मात्र अगुआ है, और वह परमेश्वर (सृष्टिकर्ता) के समकक्ष खड़ा नहीं हो सकता। सभी चीजें सृष्टिकर्ता के हाथों में हैं और अंत में वे सभी सृष्टिकर्ता के हाथों में लौट जाएँगी। मानवजाति परमेश्वर द्वारा बनाई गई थी और प्रत्येक धर्म परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन आ जाएगा—यह अपरिहार्य है। केवल परमेश्वर ही सभी चीज़ों में सर्वोच्च है, और सभी सृजित प्राणियों में उच्चतम शासक को भी उसके प्रभुत्व के अधीन आना होगा। किसी इंसान का रुतबा चाहे कितना भी ऊँचा क्यों न हो, वह मानवजाति को किसी उपयुक्त गंतव्य तक नहीं ले जा सकता और कोई भी सभी चीजों को उनकी किस्म के आधार पर छाँटने में सक्षम नहीं है। स्वयं यहोवा ने मानवजाति की रचना की और प्रत्येक को उसकी किस्म के आधार पर छाँटा और जब अंत का समय आएगा तो वह तब भी सभी चीजों को उनकी किस्म के आधार पर छाँटते हुए अपना कार्य स्वयं ही करेगा—इस कार्य में कोई भी इंसान परमेश्वर की जगह नहीं ले सकता। आरंभ से लेकर आज तक किए गए कार्य के सभी तीन चरण स्वयं परमेश्वर के द्वारा किए गए हैं और एक ही परमेश्वर के द्वारा किए गए हैं। कार्य के तीन चरणों का तथ्य परमेश्वर की समस्त मानवजाति की अगुआई का तथ्य है, एक ऐसा तथ्य जिसे कोई नकार नहीं सकता। कार्य के तीन चरणों के अंत में सभी चीजों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा और वे परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन लौट जाएँगी, क्योंकि ब्रह्मांड के ऊपर और संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल इसी एक परमेश्वर का अस्तित्व है, और कोई दूसरे धर्म नहीं हैं। जो संसार का निर्माण करने में अक्षम है वह उसका अंत करने में भी अक्षम होगा, जबकि जिसने संसार की रचना की है वह उसका अंत करने में भी निश्चित रूप से समर्थ होगा। इसलिए, यदि कोई युग का अंत करने में असमर्थ है और बस मानव की स्वयं को विकसित करने और अपने चरित्र का शोधन करने में सहायता करने में सक्षम है, तो वह निश्चित रूप से परमेश्वर नहीं होगा, वह निश्चित रूप से मानवजाति का प्रभु नहीं होगा और वह इस तरह के महान कार्य को करने में असमर्थ होगा। केवल एक ही है जो इस प्रकार का कार्य कर सकता है और वे सभी जो यह कार्य करने में असमर्थ हैं, निश्चित रूप से विभिन्न बुरी आत्माएँ हैं, न कि परमेश्वर और सभी बुरी आत्माएँ परमेश्वर की दुश्मन हैं। जब तक कुछ बुरी आत्माओं द्वारा लोगों को गुमराह करने का कार्य है, वह एक बुरा धर्म है और बुरे धर्म परमेश्वर के साथ असंगत हैं और जो परमेश्वर के साथ असंगत है, वह परमेश्वर का शत्रु है। समस्त कार्य केवल इसी एक सच्चे परमेश्वर द्वारा किया जाता है और संपूर्ण ब्रह्मांड पर केवल इसी एक परमेश्वर का शासन है। चाहे उसका इस्राएल का काम हो या चीन का, चाहे यह कार्य आत्मा द्वारा किया जाए या देह के द्वारा, किया सब कुछ परमेश्वर के द्वारा ही जाता है, किसी अन्य के द्वारा नहीं। बिल्कुल इसी कारण कि वह समस्त मानवजाति का परमेश्वर है, वह किसी भी परिस्थिति से बाधित हुए बिना स्वतंत्र रूप से कार्य करता है। यह सभी दर्शनों में सबसे महान है। एक सृजित प्राणी के रूप में यदि तुम सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहते हो और परमेश्वर के इरादे समझना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के कार्य को अवश्य समझना चाहिए, सृजित प्राणियों के लिए परमेश्वर के इरादों को अवश्य समझना चाहिए, तुम्हें उसकी प्रबंधन योजना को अवश्य समझना चाहिए, और उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य के समस्त महत्व को भी अवश्य समझना चाहिए। जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं वे मानक स्तर के सृजित प्राणी नहीं हैं! सृजित प्राणी के रूप में यदि तुम यह नहीं समझते हो कि तुम कहाँ से आए हो, मानवजाति के इतिहास और परमेश्वर द्वारा किए गए संपूर्ण कार्य को नहीं समझते हो, और इससे भी बढ़कर, यह नहीं समझते हो कि आज तक मानवजाति का विकास कैसे हुआ है, और नहीं जानते हो कि कौन संपूर्ण मानवजाति पर शासन करता है, तो तुम्हारे द्वारा अपने कर्तव्य को निभाने का तो सवाल ही नहीं उठता। परमेश्वर ने आज तक मानवजाति की अगुवाई की है, और जब से उसने पृथ्वी पर मनुष्य की रचना की है तब से उसने उसे कभी भी नहीं छोड़ा है। पवित्र आत्मा ने कभी भी कार्य करना बंद नहीं किया है, उसने मानवजाति की अगुवाई करना कभी भी बंद नहीं किया है, और कभी भी मानवजाति को नहीं त्यागा है। परंतु परमेश्वर के बारे में जानना तो दूर, मानवजाति को यह भी अहसास नहीं होता कि परमेश्वर है, और क्या सभी सृजित प्राणियों के लिए इससे अधिक अपमानजनक कुछ और हो सकता है? परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की अगुवाई करता है, परंतु मनुष्य परमेश्वर के कार्य को नहीं समझता है। तुम एक सृजित प्राणी हो, फिर भी तुम अपने ही इतिहास से अनजान हो, इस बात से अनजान हो कि किसने तुम्हारी यात्रा में तुम्हारी अगुआई की है और तुम परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य से अनजान हो और इसलिए तुम परमेश्वर को नहीं जान सकते हो। यदि तुम अब भी इन चीजों से अनजान हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर के गवाह बनने के योग्य नहीं बनोगे। आज सृष्टिकर्ता व्यक्तिगत तौर पर एक बार फिर से सभी लोगों की अगुआई कर रहा है और सभी लोगों को अपनी बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता, उद्धार और अद्भुतता दिखाता है। फिर भी तुम्हें अब भी न तो इसका एहसास है और न तुम इसे समझते हो—इसलिए क्या तुम वह नहीं हो जिसे उद्धार प्राप्त नहीं होगा? जो लोग शैतान के हैं वे परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते हैं, जबकि जो परमेश्वर द्वारा चुने गए लोग हैं वे परमेश्वर की वाणी को सुन सकते हैं। वे सभी लोग जो मेरे द्वारा बोले गए वचनों को जानते और समझते हैं, ऐसे लोग हैं जो बचा लिए जाएँगे और वे परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं; वे सभी लोग जो मेरे द्वारा बोले गए वचनों को नहीं समझते हैं, परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो निकाल दिए जाएँगे। जो लोग परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते हैं और परमेश्वर के कार्य को नहीं समझते हैं, वे परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने में अक्षम हैं और इस प्रकार के लोग परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते। यदि तुम परमेश्वर की गवाही देना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर को अवश्य जानना होगा, और परमेश्वर के कार्य के द्वारा ही परमेश्वर के ज्ञान को पाया जा सकता है। अंततः, यदि तुम परमेश्वर को जानने की इच्छा करते हो, तो तुम्हें उसके कार्य को अवश्य जानना चाहिए : परमेश्वर के कार्य को जानना सबसे महत्वपूर्ण बात है। जब कार्य के तीन चरण समाप्ति पर पहुँचेंगे, तो ऐसे लोगों का एक समूह बनाया जाएगा जो परमेश्वर की गवाही देंगे, ऐसे लोगों का समूह जो परमेश्वर को जानते हैं। ये सभी लोग परमेश्वर को जानेंगे। वे सत्य को अभ्यास में लाने में समर्थ होंगे और उनमें मानवता और समझ होगी। उन्हें परमेश्वर के उद्धार के कार्य के तीनों चरणों का ज्ञान होगा। यही कार्य अंत में निष्पादित होगा, और यही लोग 6,000 साल के प्रबंधन के कार्य की परिणति हैं और शैतान की अंतिम पराजय की सबसे शक्तिशाली गवाही हैं। जो परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं वे ही परमेश्वर की प्रतिज्ञा और आशीष को प्राप्त करने में समर्थ होंगे, और ऐसा समूह होंगे जो बिल्कुल अंत तक जीवित रहेगा, वह समूह जो परमेश्वर के अधिकार को धारण करेगा और परमेश्वर की गवाही देगा। शायद तुम लोगों में से सभी या शायद केवल आधे या केवल थोड़े-से ही इस समूह के सदस्य बन सकते हैं—यह तुम लोगों के संकल्प और तुम लोगों के अनुसरण पर निर्भर करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 12

छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना कार्य के तीन चरणों में विभाजित है। कोई भी एक चरण अकेला तीनों युगों के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, बल्कि संपूर्ण कार्य के केवल एक भाग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। यहोवा नाम परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। यह तथ्य कि उसने व्यवस्था के युग में अपना कार्य किया था, यह प्रमाणित नहीं करता कि परमेश्वर केवल व्यवस्था के अंतर्गत ही परमेश्वर हो सकता है। यहोवा ने मनुष्य से मंदिर और वेदियाँ बनाने के लिए कहा और उसके लिए व्यवस्थाएँ निर्धारित कीं और उसे आज्ञाएँ दीं; जो कार्य उसने किया, वह केवल व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व करता है। उसके द्वारा किया गया यह कार्य यह प्रमाणित नहीं करता कि परमेश्वर केवल वो परमेश्वर है जो मनुष्य से व्यवस्था बनाए रखने के लिए कहता है या वो परमेश्वर है जो मंदिर में रहता है या वो परमेश्वर है जो वेदी के सामने खड़ा रहता है। ऐसा कहना असत्य होगा। व्यवस्था के अंतर्गत किया गया कार्य केवल एक युग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। इसलिए, यदि परमेश्वर ने केवल व्यवस्था के युग में ही कार्य किया होता तो मनुष्य यह कहते हुए परमेश्वर को परिसीमित कर देता, “परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मंदिर में रहता है और परमेश्वर की सेवा करने के लिए हमें याजकों वाले वस्त्र पहनकर मंदिर में प्रवेश करना चाहिए।” यदि अनुग्रह के युग का कार्य कभी न किया जाता और व्यवस्था का युग ही वर्तमान समय तक जारी रहता तो मनुष्य यह नहीं जान पाता कि परमेश्वर दयालु और प्रेमपूर्ण भी है। यदि व्यवस्था के युग में कोई कार्य न किया जाता और केवल अनुग्रह के युग में ही कार्य किया जाता तो मनुष्य बस इतना ही जान पाता कि परमेश्वर सिर्फ मनुष्य को छुटकारा दिलाता है और परमेश्वर मनुष्य के पाप क्षमा करता है। मनुष्य केवल इतना ही जान पाता कि परमेश्वर पवित्र और निर्दोष है और वह मनुष्य के लिए अपना बलिदान देने और सलीब पर चढ़ने में सक्षम है। मनुष्य केवल ये चीजें ही जान पाता और उसे किसी और चीज की समझ न होती। अतः प्रत्येक युग परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग का प्रतिनिधित्व करता है। व्यवस्था का युग परमेश्वर के स्वभाव के कुछ पहलू दर्शाता है और ऐसा ही अनुग्रह का युग और यह वर्तमान युग करता है—केवल ये तीनों चरण एक संपूर्ण इकाई में एकीकृत किए जाने पर ही परमेश्वर के स्वभाव की संपूर्णता प्रकट कर सकते हैं। इन तीनों चरणों को जान लेने के बाद ही मनुष्य इसे पूरी तरह से समझ सकता है। तीनों चरणों में से एक भी चरण छोड़ा नहीं जा सकता। कार्य के इन तीनों चरणों को जान लेने के बाद ही तुम परमेश्वर के स्वभाव को उसकी संपूर्णता में देखोगे। यह तथ्य कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में अपना कार्य पूरा किया, यह प्रमाणित नहीं करता कि वह केवल व्यवस्था के अंतर्गत ही परमेश्वर है और इस तथ्य का कि उसने छुटकारे का कार्य पूरा किया, यह अर्थ नहीं है कि परमेश्वर सदैव मानवजाति को छुटकारा देगा। ये सभी मनुष्यों द्वारा निर्मित परिसीमन हैं। अनुग्रह के युग के समाप्त हो जाने पर तुम यह नहीं कह सकते कि परमेश्वर केवल सलीब का परमेश्वर है और केवल सलीब ही परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले उद्धार का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसा करना परमेश्वर को सीमित करना होगा। वर्तमान चरण में परमेश्वर मुख्य रूप से वचन का कार्य कर रहा है, परंतु इससे तुम यह नहीं कह सकते कि परमेश्वर मनुष्य के प्रति कभी दयालु नहीं रहा है और वह बस ताड़ना और न्याय लाया है। अंत के दिनों का कार्य यहोवा और यीशु के कार्य को और उन सभी रहस्यों को प्रकट करता है, जिन्हें मनुष्य ने नहीं समझा था, इस तरह यह मानवजाति की मंजिलों और परिणामों को प्रकट करता है और मानवजाति के बीच उद्धार के समस्त कार्य को समाप्त करता है। अंत के दिनों में कार्य का यह चरण सभी चीजों को समाप्ति की ओर ले जाता है। मनुष्य द्वारा समझे न गए सभी रहस्यों को प्रकट किया ही जाना चाहिए, ताकि मनुष्य उनकी असलियत जान सके और उसके हृदय में उन सबकी समझ उत्पन्न हो सके। केवल तभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जा सकता है। केवल छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना पूर्ण होने के बाद ही मनुष्य परमेश्वर का स्वभाव उसकी संपूर्णता में समझ पाएगा, क्योंकि तब उसका प्रबंधन समाप्त हो चुका होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 13

छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना के दौरान किया गया समस्त कार्य अब समाप्ति पर आ गया है। यह समस्त कार्य मनुष्यों पर प्रकट किए जाने और मनुष्यों के बीच संपन्न किए जाने के बाद ही मानवजाति परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव और परमेश्वर के पास जो है और जो वह स्वयं है उसे जानेगी। जब इस चरण का कार्य पूरी तरह से संपन्न कर लिया जाएगा तो मनुष्य द्वारा नहीं समझे गए सभी रहस्यों को प्रकट कर दिया गया होगा, पहले नहीं समझे गए सभी सत्यों को स्पष्ट कर दिया गया होगा और मानवजाति को उसके भविष्य के मार्ग और मंज़िल के बारे में बता दिया गया होगा। यह वह संपूर्ण कार्य है जिसे वर्तमान चरण में किया जाना है। यद्यपि आज मनुष्य जिस मार्ग पर चलता है, वह सलीब का मार्ग और दुःख का मार्ग भी है, फिर भी आज का मनुष्य जो अभ्यास करता है और जो वह खाता-पीता है और जिसका आनंद लेता है, वह व्यवस्था और अनुग्रह के युग के मनुष्य से बहुत भिन्न है। आज मनुष्य से जो माँग की जाती है, वह अतीत की माँग से भिन्न है और व्यवस्था के युग में मनुष्य से की गई माँग से तो वह और भी अधिक भिन्न है। भला व्यवस्था के अंतर्गत मनुष्य से क्या माँग की गई थी, जब परमेश्वर इस्राएल में अपना कार्य कर रहा था? वह इससे बढ़कर कुछ नहीं थी कि मनुष्य को सब्त और यहोवा की व्यवस्थाओं का पालन करना चाहिए। किसी को भी सब्त के दिन काम नहीं करना था या यहोवा की व्यवस्थाओं का उल्लंघन नहीं करना था। परंतु अब ऐसा नहीं है। सब्त के दिन मनुष्य हमेशा की तरह काम करते हैं, इकट्ठे होते हैं और प्रार्थना करते हैं और उन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाए जाते। अनुग्रह के युग में लोगों को बपतिस्मा लेना पड़ता था और फिर उनसे उपवास करने, रोटी तोड़ने, दाखमधु पीने, अपने सिर ढकने और दूसरों के पाँव धोने के लिए कहा जाता था। अब ये विनियम समाप्त कर दिए गए हैं, किंतु मनुष्य से और भी बड़ी माँगें की जाती हैं, क्योंकि परमेश्वर का कार्य लगातार अधिक गहरा होता जाता है और मनुष्य का प्रवेश पहले से कहीं अधिक ऊँचा हो गया है। अतीत में यीशु मनुष्य के ऊपर हाथ रखता था और प्रार्थना करता था, परंतु अब जबकि सब कुछ कहा जा चुका है तो मनुष्य के ऊपर हाथ रखने का क्या उपयोग है? वचन अकेले ही परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। जब अतीत में वह अपना हाथ मनुष्य के ऊपर रखता था तो यह मनुष्य को आशीष देने और चंगा करने के लिए होता था। उस समय पवित्र आत्मा इसी तरह से कार्य करता था, परंतु अब ऐसा नहीं है। अब पवित्र आत्मा कार्य करने और नतीजे पाने के लिए वचनों का उपयोग करता है। उसके वचन तुम लोगों पर स्पष्ट कर दिए गए हैं और तुम्हें उन्हें ठीक वैसे ही अभ्यास में लाना चाहिए, जैसे तुम्हें बताया गया है। उसके वचन उसके इरादे हैं; वे वह कार्य हैं, जिसे वह करना चाहता है। उसके वचनों के माध्यम से तुम उसके इरादे और वह चीज समझ जाओगे, जिसे प्राप्त करने के लिए वह तुमसे कहता है और तुम अपने ऊपर हाथ रखे जाने की आवश्यकता के बिना ही सीधे उसके वचनों को अभ्यास में ला सकते हो। कुछ लोग कह सकते हैं, “मुझ पर अपना हाथ रख! मुझ पर अपना हाथ रख, ताकि मैं तेरे आशीष प्राप्त कर सकूँ और तेरा हिस्सा बन सकूँ।” यह अतीत का एक पुराना अभ्यास है, जो अब अप्रचलित हो चुका है, क्योंकि युग बदल चुका है। पवित्र आत्मा युग के अनुसार कार्य करता है, मनमाने ढंग से नहीं और न ही विनियमों को लागू करके। युग बदल चुका है और नया युग अनिवार्य रूप से अपने साथ नया काम लेकर आता है। यह कार्य के प्रत्येक चरण के बारे में सच है, इसलिए उसका कार्य कभी दोहराया नहीं जाता। अनुग्रह के युग में यीशु ने इस तरह का बहुत-सा कार्य किया, जैसे कि बीमारी को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, मनुष्य के लिए प्रार्थना करने हेतु उस पर अपने हाथ रखना और मनुष्य को आशीष देना। किंतु आज दोबारा ऐसा करना निरर्थक होगा। पवित्र आत्मा ने उस समय उस तरह से कार्य किया, क्योंकि वह अनुग्रह का युग था और मनुष्य के आनंद लेने के लिए पर्याप्त अनुग्रह था। उससे किसी तरह के भुगतान की माँग नहीं की गई और जब तक वह विश्वास करता रहा, उसे अनुग्रह मिलता रहा। सबके साथ बहुत अनुग्रहपूर्ण व्यवहार किया जाता था। अब युग बदल चुका है और परमेश्वर का कार्य आगे बढ़ चुका है; मनुष्य की विद्रोहशीलता और उसके भीतर की अशुद्ध चीजें ताड़ना और न्याय के माध्यम से त्याग दी जाएँगी। चूँकि वह छुटकारे का चरण था, इसलिए मनुष्य के आनंद के लिए उस पर पर्याप्त अनुग्रह प्रदर्शित करते हुए परमेश्वर का उस तरह से कार्य करना अनिवार्य था, ताकि मनुष्य को पापों से छुटकारा दिलाया जा सके। अपने अनुग्रह के माध्यम से उसने मनुष्य के पाप क्षमा किए। यह वर्तमान चरण ताड़ना, न्याय, वचनों के प्रहार और साथ ही वचनों के अनुशासन तथा प्रकाशन के माध्यम से मनुष्य के भीतर की अधार्मिक चीजें उजागर करने के लिए है, ताकि बाद में मानवजाति को बचाया जा सके। यह कार्य छुटकारे के कार्य से कहीं अधिक गहरा है। अनुग्रह के युग में मनुष्य के आनंद के लिए अनुग्रह पर्याप्त था; अब चूँकि मनुष्य पहले ही इस अनुग्रह का अनुभव कर चुका है, इसलिए उसे अब और उसका आनंद नहीं उठाना है। इस कार्य का समय अब बीत चुका है और इसे अब और नहीं किया जाना है। अब मनुष्य को वचन के न्याय के माध्यम से बचाया जाना है। मनुष्य का न्याय, उसकी ताड़ना और उसका शोधन किए जाने के पश्चात् इनके द्वारा उसका स्वभाव बदल जाता है। क्या यह सब मेरे द्वारा बोले गए वचनों के कारण नहीं है? कार्य का प्रत्येक चरण समूची मानवजाति की प्रगति और युग के अनुसार किया जाता है। समस्त कार्य महत्वपूर्ण है और यह सब अंतिम उद्धार के लिए किया जाता है, ताकि मानवजाति को भविष्य में एक अच्छी मंज़िल मिल सके और अंत में लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जा सके।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 14

पवित्र आत्मा के कार्य के प्रत्येक चरण को मनुष्य की गवाही की आवश्यकता भी होती है। कार्य का प्रत्येक चरण परमेश्वर और शैतान के बीच एक युद्ध है और युद्ध का लक्ष्य शैतान है, जबकि इस कार्य से जिसे पूर्ण बनाया जाएगा वह मनुष्य है। परमेश्वर का कार्य सफल हो सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की गवाही कैसी है। यह गवाही उन लोगों से परमेश्वर की एकमात्र अपेक्षा है जो उसका अनुसरण करते हैं; यही वह गवाही है जो शैतान के सामने दी जाती है और यह परमेश्वर के कार्य के प्रभावों का प्रमाण भी है। परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन तीन चरणों में विभाजित है और प्रत्येक चरण में मनुष्य से यथोचित अपेक्षाएँ की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, जैसे-जैसे युग बीतते और आगे बढ़ते जाते हैं, समस्त मानवजाति से परमेश्वर की अपेक्षाएँ और अधिक ऊँची होती जाती हैं। इस प्रकार कदम-दर-कदम परमेश्वर के प्रबंधन का यह कार्य अपने चरम पर पहुँचता जाता है, इस तरह मनुष्य “वचन का देह में प्रकट होना” देख लेता है और इस तरह मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ अधिक ऊँची हो जाती हैं, साथ ही वह गवाही भी ऊँची हो जाती है जिसे देने की अपेक्षा मनुष्य से की जाती है। मनुष्य परमेश्वर के साथ वास्तव में सहयोग करने में जितना अधिक सक्षम होता है, उतना ही अधिक परमेश्वर महिमा प्राप्त कर सकता है। मनुष्य का सहयोग वह गवाही है, जिसे देने की उससे अपेक्षा की जाती है, और जो गवाही वह देता है, वह मनुष्य का अभ्यास है। इसलिए, परमेश्वर के कार्य का उचित प्रभाव हो सकता है या नहीं, और सच्ची गवाही हो सकती है या नहीं, ये अटूट रूप से मनुष्य के सहयोग और गवाही से जुड़े हुए हैं। जब कार्य समाप्त हो जाएगा, अर्थात् जब परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन अपनी समाप्ति पर पहुँच जाएगा, तो मनुष्य से अधिक ऊँची गवाही देने की अपेक्षा की जाएगी, और जब परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुँच जाएगा, तब मनुष्य का अभ्यास और प्रवेश अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाएँगे। अतीत में मनुष्य से व्यवस्था और आज्ञाओं का पालन करना अपेक्षित था, और उससे धैर्यवान और विनम्र बनने की अपेक्षा की जाती थी। आज मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह परमेश्वर की समस्त व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करे और परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखे और अंततः उससे अपेक्षा की जाती है कि वह क्लेश के बीच भी परमेश्वर से प्रेम करे। ये तीन चरण वे अपेक्षाएँ हैं, जो परमेश्वर अपने संपूर्ण प्रबंधन के दौरान कदम-दर-कदम मनुष्य से करता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले चरण की तुलना में अधिक गहरे जाता है, और प्रत्येक चरण में मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाएँ पिछले चरण की तुलना में और अधिक ऊँची होती हैं, और इस तरह परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन धीरे-धीरे आकार लेता है। इसका कारण ठीक यह है कि मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ निरंतर ऊँची होती जाती हैं, जिससे मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के निरंतर अधिक निकट आता जाता है और केवल तभी संपूर्ण मानवजाति धीरे-धीरे शैतान के प्रभाव से अलग हो जाती है। जब तक परमेश्वर का कार्य पूर्ण समाप्ति पर आएगा, संपूर्ण मानवजाति शैतान के प्रभाव से बचा ली गई होगी। जब वह समय आएगा, तो परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुँच चुका होगा, और अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने के लिए परमेश्वर के साथ मनुष्य का सहयोग अब नहीं होगा, और संपूर्ण मानवजाति परमेश्वर के प्रकाश में जीएगी, और तब से परमेश्वर के प्रति कोई विद्रोहशीलता या विरोध नहीं होगा। परमेश्वर भी मनुष्य से कोई अपेक्षाएँ नहीं रखेगा, और मनुष्य और परमेश्वर के बीच अधिक सामंजस्यपूर्ण सहयोग होगा, ऐसा सहयोग जो मनुष्य और परमेश्वर दोनों का एक-साथ जीवन होगा, ऐसा जीवन, जो परमेश्वर के प्रबंधन का पूरी तरह से समापन होने और परमेश्वर द्वारा मनुष्य को शैतान के शिकंजों से पूरी तरह से बचा लिए जाने के बाद आता है। जो लोग परमेश्वर के पदचिह्नों का निकट से अनुसरण नहीं कर सकते, वे ऐसा जीवन हासिल करने में अक्षम होते हैं। वे अंधकार में डूब चुके होंगे, जहाँ वे रोएँगे और अपने दाँत पीसेंगे; वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किंतु उसका अनुसरण नहीं करते, जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किंतु उसके संपूर्ण कार्य के प्रति समर्पण नहीं करते।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 15

समस्त प्रबंधन कार्य के दौरान, सबसे महत्वपूर्ण कार्य शैतान के प्रभाव से मनुष्य को बचाना है। मुख्य कार्य भ्रष्ट लोगों को पूरी तरह से जीतना है ताकि जीते गए लोगों का मूलतः परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय पहले जैसा बहाल किया जा सके, और वे एक सामान्य जीवन, यानी एक सृजित प्राणी का सामान्य जीवन प्राप्त कर सकें। यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, और प्रबंधन कार्य का मूल है। उद्धार के कार्य के तीन चरणों में, व्यवस्था के युग का प्रथम चरण प्रबंधन कार्य के मूल से काफी दूर था; इसमें उद्धार के कार्य का केवल हल्का-सा आभास था, यह शैतान की सत्ता से मनुष्य को बचाने के परमेश्वर के कार्य का आरम्भ नहीं था। कार्य का पहला चरण सीधे तौर पर आत्मा के द्वारा किया गया था क्योंकि, व्यवस्था के अन्तर्गत, मनुष्य केवल व्यवस्था का पालन करना जानता था, उसके अंदर अधिक सत्य नहीं था, और चूँकि व्यवस्था के युग के कार्य में मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन करना शामिल नहीं था, वह मनुष्य को शैतान की सत्ता से बचाने के कार्य से तो और भी संबंधित नहीं था। इस प्रकार परमेश्वर के आत्मा ने कार्य के इस अत्यंत सरल चरण को पूरा किया था जो मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से संबंधित नहीं था। प्रबंधन के मूल से इस चरण के कार्य का कोई ज्यादा संबंध नहीं था, इसका मनुष्य के उद्धार के आधिकारिक कार्य से कोई बड़ा संबंध नहीं था, और इसलिए निजी तौर पर इस कार्य को करने के लिए परमेश्वर को देह धारण करने की आवश्यकता नहीं थी। आत्मा द्वारा किया गया कार्य अप्रत्यक्ष और अथाह है, यह मनुष्य के लिए भयावह और अगम्य है; आत्मा उद्धार के कार्य को करने और मनुष्य को सीधे तौर पर जीवन प्रदान करने के लिए उपयुक्त नहीं है। मनुष्य के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है आत्मा के कार्य को ऐसे तरीके में रूपान्तरित करना जो मनुष्य के करीब हो, यानी जो मनुष्य के लिए अत्यंत उपयुक्त है वह यह है कि परमेश्वर अपने कार्य को करने के लिए एक साधारण, सामान्य व्यक्ति बन जाए। इसके लिए आवश्यक है कि आत्मा के कार्य का स्थान लेने के लिए परमेश्वर देह धारण करे, और मनुष्य के लिए, कार्य करने हेतु परमेश्वर के पास इससे अधिक उपयुक्त मार्ग नहीं है। कार्य के इन तीन चरणों में से, दो चरणों को देह के द्वारा सम्पन्न किया जाता है, और ये दो चरण प्रबंधन कार्य की मुख्य अवस्थाएँ हैं। दो देहधारण परस्पर पूरक हैं और एक दूसरे की बढ़िया ढंग से अनुपूर्ति भी करते हैं। परमेश्वर के देहधारण के प्रथम चरण ने द्वितीय चरण की नींव डाली, ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के दोनों देहधारण एक पूर्ण इकाई बनाते हैं, और एक-दूसरे से असंगत नहीं हैं। परमेश्वर के कार्य के इन दो चरणों को परमेश्वर द्वारा अपनी देहधारी पहचान में कार्यान्वित किया जाता है क्योंकि वे समस्त प्रबंधन के कार्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। लगभग ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के दो देहधारणों के कार्य के बिना, समस्त प्रबंधन कार्य थम गया होता, और मनुष्यजाति को बचाने का कार्य खोखली बातों के सिवाय और कुछ न होता। यह कार्य महत्वपूर्ण है या नहीं, यह मनुष्यजाति की आवश्यकताओं, उसकी कलुषता की वास्तविकता, शैतान के विद्रोहीपन की गंभीरता और कार्य में उसके व्यवधान पर आधारित है। कार्य करने में सक्षम सही व्यक्ति को कार्यकर्ता द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति, और कार्य के महत्व पर तय किया जाता है। जब इस कार्य के महत्व की बात आती है कि इस सम्बन्ध में कार्य के कौन से तरीके को अपनाया जाए—परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया गया कार्य, या देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य, या मनुष्य के माध्यम से किया गया कार्य—तो सबसे पहले इंसान के माध्यम से किए गए कार्य को हटाया जाता है, और फिर कार्य की प्रकृति, आत्मा के कार्य की प्रकृति बनाम देह के कार्य की प्रकृति के आधार पर, अंततः यह निर्णय लिया जाता है कि आत्मा द्वारा सीधे तौर पर किए गए कार्य की अपेक्षा देह के द्वारा किया गया कार्य मनुष्य के लिए अधिक लाभदायक है और अधिक लाभ प्रदान करता है। जब परमेश्वर ने यह निर्णय लिया कि कार्य आत्मा के द्वारा किया जाएगा या देह के द्वारा तो उस समय परमेश्वर का इरादा था। कार्य के प्रत्येक चरण का एक अर्थ और एक आधार होता है। इनमें से कार्य का एक भी चरण बेबुनियादी कल्पनाओं पर आधारित नहीं है, न ही उन्हें मनमाने ढंग से कार्यान्वित किया जाता है; उनमें एक विशेष बुद्धि होती है। परमेश्वर के समस्त कार्य के पीछे की सच्ची कहानी यह है। विशेष रूप से, ऐसे बड़े कार्य में परमेश्वर की और भी बड़ी योजना होती है जैसे कि देहधारी परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से लोगों के बीच में कार्य कर रहा है। इसलिए, उसके कार्य में प्रत्येक क्रिया, विचार और मत में परमेश्वर की बुद्धि और उसके स्वरूप की समग्रता प्रतिबिम्बित होती है; यह परमेश्वर का बेहद मूर्त और सुव्यवस्थित स्वरूप है। इंसान के लिए इन सूक्ष्म विचारों और मतों की कल्पना करना और उन पर विश्वास करना बेहद कठिन है और इन्हें जानना तो और भी कठिन है। इंसान जो काम करता है, वह सामान्य सिद्धान्त के अनुसार किया जाता है, जो उसके लिए अत्यंत संतोषजनक होता है। लेकिन परमेश्वर के कार्य की तुलना में, इसमें बहुत बड़ी असमानता दिखाई देती है। भले ही परमेश्वर के कर्म महान होते हैं और उसके कार्य भव्य पैमाने पर होते हैं, फिर भी उनके पीछे अनेक सूक्ष्म और सटीक योजनाएँ और व्यवस्थाएँ होती हैं जो मनुष्य के लिए अकल्पनीय हैं। उसके कार्य का प्रत्येक चरण न केवल सिद्धान्त के अनुसार किया जाता है, बल्कि प्रत्येक चरण में अनेक ऐसी चीजें होती हैं जिन्हें मानवीय भाषा में स्पष्टता से व्यक्त नहीं किया जा सकता, और ये चीजें इंसान के लिए अदृश्य होती हैं। यह कार्य चाहे आत्मा का हो या देहधारी परमेश्वर का, प्रत्येक में उसके कार्य की योजनाएँ निहित हैं, वह बिना किसी आधार के कार्य नहीं करता, और निरर्थक कार्य नहीं करता। जब आत्मा सीधे तौर पर कार्य करता है तो वह उसके लक्ष्यों के अनुसार होता है, और जब वह कार्य करने के लिए मनुष्य बनता है (यानी जब वह अपने बाहरी रूप को रूपान्तरित करता है), तो उसमें उसका उद्देश्य और भी ज्यादा निहित होता है। अन्यथा वह बेहिचक अपनी पहचान क्यों बदलेगा? वह बेहिचक ऐसा व्यक्ति क्यों बनेगा जिसे निकृष्ट माना जाता है और जिसे यातना दी जाती है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 16

आज के कार्य ने अनुग्रह के युग के कार्य को आगे बढ़ाया है; अर्थात्, समस्त छह हजार सालों की प्रबंधन योजना का कार्य आगे बढ़ा है। यद्यपि अनुग्रह का युग समाप्त हो गया है, किन्तु परमेश्वर के कार्य ने अधिक और गहरी प्रगति की है। मैं क्यों बार-बार कहता हूँ कि कार्य का यह चरण अनुग्रह के युग और व्यवस्था के युग पर आधारित है? दूसरी तरह से कहा जाए तो आज का कार्य अनुग्रह के युग में किए गए कार्य की निरंतरता और व्यवस्था के युग में किए गए कार्य की प्रगति है। तीनों चरण आपस में घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं और श्रृंखला की हर कड़ी निकटता से अगली कड़ी से जुड़ी है। मैं यह भी क्यों कहता हूँ कि कार्य का यह चरण यीशु द्वारा किए गए कार्य पर आधारित है? मान लो, यह चरण यीशु द्वारा किए गए कार्य पर आधारित न होता, तो फिर इस चरण में क्रूस पर चढ़ाए जाने का कार्य फिर से करना होता, और पहले किए गए छुटकारे के कार्य को फिर से करना पड़ता। यह अर्थहीन होता। इसलिए, ऐसा नहीं है कि कार्य पूरी तरह समाप्त हो चुका है, बल्कि युग आगे बढ़ गया है और कार्य को पहले से अधिक ऊँचा कर दिया गया है। यह कहा जा सकता है कि कार्य का यह चरण व्यवस्था के युग की नींव और यीशु के कार्य की चट्टान पर निर्मित है। परमेश्वर का कार्य चरण-दर-चरण निर्मित किया जाता है, और यह चरण कोई नई शुरुआत नहीं है। सिर्फ तीनों चरणों के कार्य के संयोजन को ही छह हजार सालों की प्रबंधन योजना माना जा सकता है। इस चरण का कार्य अनुग्रह के युग के कार्य की नींव पर किया जाता है। यदि कार्य के ये दो चरण जुड़े न होते, तो इस चरण में क्रूस पर चढ़ाए जाने का कार्य क्यों नहीं दोहराया गया? मैं मनुष्य के पापों को अपने ऊपर क्यों नहीं लेता हूँ, इसके बजाय सीधे उनका न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने क्यों आता हूँ? अगर मनुष्य का न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने का मेरा कार्य क्रूसीकरण के बाद नहीं होता—इस तथ्य के साथ कि अब मेरा आगमन पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आए बिना हुआ है—तो मैं मनुष्य का न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने के योग्य नहीं होता। मैं यीशु से एकाकार हूँ, बस इसी कारण मैं प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य को ताड़ना देने और उसका न्याय करने के लिए आता हूँ। कार्य का यह चरण पूरी तरह से पिछले चरण पर ही निर्मित है। यही कारण है कि सिर्फ ऐसा कार्य ही चरण-दर-चरण मनुष्य का उद्धार कर सकता है। यीशु और मैं एक ही पवित्रात्मा से आते हैं। यद्यपि हमारी देह एक-दूसरे से जुड़ी नहीं है, किन्तु हमारा आत्मा एक ही है; यद्यपि हमारे कार्य की विषयवस्तु और हम जो कार्य करते हैं, वे एक नहीं हैं, तब भी हमारा सार एक समान है; हमारी देह भिन्न रूप धारण करती हैं, लेकिन यह युग में परिवर्तन और हमारे कार्य की भिन्न आवश्यकताओं के कारण है; हमारी सेवकाई एक जैसी नहीं है, इसलिए जो कार्य हम आगे लाते हैं और जिस स्वभाव को हम मनुष्य पर प्रकट करते हैं, वे भी भिन्न हैं। यही कारण है कि आज मनुष्य जो देखता और समझता है वह अतीत के समान नहीं है; ऐसा युग में बदलाव के कारण है। यद्यपि उनके देह के लिंग और रूप भिन्न-भिन्न हैं, और वे दोनों एक ही परिवार में नहीं जन्मे हैं, उसी समयावधि में तो बिल्कुल नहीं, किन्तु फिर भी उनके आत्मा एक ही हैं। यद्यपि उनके देह किसी प्रकार के रक्त या भौतिक संबंध साझा नहीं करते, पर इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे भिन्न-भिन्न समयावधियों में परमेश्वर के देहधारी शरीर हैं। यह एक निर्विवाद सत्य है कि वे परमेश्वर के द्वारा धारित देह हैं। यद्यपि वे रक्त से संबंधित नहीं हैं या एक ही भाषा साझा नहीं करते (एक पुरुष था जो यहूदियों की भाषा बोलता था और दूसरी स्त्री है जो सिर्फ चीनी भाषा बोलती है)। इन्हीं कारणों से उन्हें जो कार्य करना चाहिए, उसे वे भिन्न-भिन्न देशों में, और साथ ही भिन्न-भिन्न समयावधियों में करते हैं। इस तथ्य के बावजूद वे एक ही आत्मा के हैं—यानी उनका सार एक ही है—लेकिन उनकी देह के बाहरी आवरणों में कोई समानता नहीं है। बस उनकी मानवता समान है, परन्तु जहाँ तक उनकी देह के बाहरी स्वरूप और उनके जन्म की परिस्थितियों की बात है, वे दोनों समान नहीं हैं। इन चीजों का उनके अपने-अपने कार्य या उनके बारे में मनुष्य का जो ज्ञान है, उस पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि अंतिम विश्लेषण में, वे एक ही आत्मा के हैं और उन्हें कोई अलग नहीं कर सकता। यद्यपि उनका रक्त-संबंध नहीं है, किन्तु उनका सम्पूर्ण अस्तित्व उनके आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, जो उन्हें अलग-अलग समय में अलग-अलग कार्य प्राप्त करने में सक्षम बनाता है और उनकी देह के अलग-अलग रक्त-संबंध हैं। उदाहरण के लिए, यहोवा का आत्मा यीशु के आत्मा का पिता नहीं है, यीशु का आत्मा यहोवा के आत्मा का पुत्र नहीं है : वे एक ही और समान आत्मा के हैं। उसी तरह, आज के देहधारी परमेश्वर और यीशु में कोई रक्त-संबंध नहीं है, लेकिन वे हैं एक ही—क्योंकि उनके आत्मा एक ही हैं। परमेश्वर दया और करुणा का, और साथ ही धार्मिक न्याय का, मनुष्य की ताड़ना का, और मनुष्य को श्राप देने का कार्य कर सकता है; अंत में, वह संसार को नष्ट करने और दुष्टों को सज़ा देने का कार्य कर सकता है। क्या वह यह सब स्वयं नहीं करता? क्या यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता नहीं है? उसने मनुष्य के लिए व्यवस्थाएँ निर्धारित कीं और आज्ञाएँ जारी कीं, वह आरंभिक इस्राएलियों की पृथ्वी पर उनके जीवन-यापन में अगुआई करने में भी समर्थ था और मंदिर व वेदियाँ बनाने में उनका मार्गदर्शन करने, और समस्त इस्राएलियों को अपने प्रभुत्व में रखने में भी समर्थ था। अपने अधिकार के कारण, दो हजार वर्षों के दौरान वह इस्राएल के लोगों के साथ पृथ्वी पर रहा, इस्राएलियों ने उसके खिलाफ विद्रोह करने का साहस नहीं किया; और वे सब यहोवा का भय मानते और उसकी आज्ञाओं का पालन करते थे। उसके अधिकार और उसकी सर्वशक्तिमत्ता के कारण किया जाने वाला कार्य ऐसा था। तब अनुग्रह के युग में, यीशु संपूर्ण पतित मानवजाति (सिर्फ इस्राएलियों को नहीं) को छुटकारा दिलाने के लिए आया। उसने मनुष्य के प्रति दया और प्रेममयी करुणा दिखायी। मनुष्य ने अनुग्रह के युग में जिस यीशु को देखा वह मनुष्य के प्रति प्रेममयी करुणा से भरा हुआ और हमेशा ही प्रेममय था, क्योंकि वह मनुष्य को पाप से बचाने के लिए आया था। उसने लोगों के पापों को क्षमा किया, फिर उसके क्रूस पर चढ़ने ने मानवजाति को पूरी तरह पाप से छुटकारा दिला दिया। उस दौरान, परमेश्वर मनुष्य के सामने दया और प्रेममयी करुणा के साथ प्रकट हुआ; अर्थात्, वह मनुष्य के लिए पापबलि बना और मनुष्य के पापों के लिए सूली पर चढ़ाया गया ताकि उन्हें हमेशा के लिए माफ किया जा सके। वह दयालु, करुणामय, सहिष्णु और प्रेममय था। और वे सब जिन्होंने अनुग्रह के युग में यीशु का अनुसरण किया था, उन्होंने भी सारी चीजों में सहिष्णु और प्रेममय बनने का प्रयास किया। उन्होंने लम्बे समय तक कष्ट सहे, यहाँ तक कि जब उन्हें पीटा गया, धिक्कारा गया या उन्हें पत्थर मारे गए, तो भी उन्होंने पलटकर वार नहीं किया। परन्तु इस अंतिम चरण में ऐसा नहीं हो सकता। उदाहारण के लिए, भले ही यीशु और यहोवा का आत्मा एक ही था, लेकिन उनका कार्य पूरी तरह एक-सा नहीं था। यहोवा के कार्य ने युग का अंत नहीं किया बल्कि युग का मार्गदर्शन किया, पृथ्वी पर मानवजाति के जीवन का सूत्रपात किया, और आज का कार्य अन्यजाति के राष्ट्रों में गहराई से भ्रष्ट किए गए मनुष्यों को जीतने के लिए और न केवल चीन में परमेश्वर के चुने हुए लोगों की, बल्कि समस्त विश्व और मानवजाति की अगुआई करने के लिए है। तुम्हें ऐसा लग सकता है कि यह कार्य सिर्फ़ चीन में हो रहा है, परन्तु यह पहले से ही विदेशों में फैलना शुरू हो गया है। ऐसा क्यों है कि चीन के बाहर के लोग बार-बार सच्चे मार्ग को खोजते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि आत्मा ने अपना कार्य पहले से ही शुरू कर दिया है, और ये वचन अब संपूर्ण ब्रह्मांड के लोगों के लिए हैं। इसके साथ, आधा कार्य पहले ही प्रगति पर है। संसार के सृजन से लेकर आज तक, परमेश्वर के आत्मा ने इस महान कार्य को कार्यान्वित कर दिया है, इसके अलावा, उसने विभिन्न युगों के दौरान और भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न-भिन्न कार्य किए हैं। प्रत्येक युग के लोग उसके एक भिन्न स्वभाव को देखते हैं, जो कि उस भिन्न कार्य के माध्यम से सहज रूप से प्रकट होता है जिसे वह करता है। वह दया और प्रेममयी करुणा से भरा हुआ एक परमेश्वर है; वह मनुष्य के लिए पापबलि है और उसकी चरवाही करने वाला है, लेकिन वह मनुष्य का न्याय, ताड़ना, और श्राप भी है। वह पृथ्वी पर दो हजार साल तक जीवन-यापन करने में मनुष्य की अगुआई कर सकता और भ्रष्ट मानवजाति को पाप से छुटकारा भी दिला सकता था। आज, वह मानवजाति को जीतने में भी सक्षम है जो उससे अनजान है और उसे अपने प्रभुत्व के अधीन दंडवत कराने और अपने सामने पूरी तरह से समर्पण कराने में सक्षम है। अंत में, वह ब्रह्मांड के लोगों के अंदर जो कुछ भी अशुद्ध और अधार्मिक है उसे जलाकर भस्म कर देगा, ताकि उन्हें यह दिखाए कि वह न सिर्फ करुणामय और प्रेमपूर्ण परमेश्वर है, न सिर्फ बुद्धि और चमत्कार का परमेश्वर है, न सिर्फ पवित्र परमेश्वर है, बल्कि वह मनुष्य का न्याय करने वाला परमेश्वर भी है। मानवजाति के बीच दुष्टजनों के लिए, वह प्रज्ज्वलन, न्याय और दण्ड है; जिन्हें पूर्ण किया जाना है उनके लिए, वह क्लेश, शोधन, परीक्षण के साथ-साथ आराम, संपोषण, वचनों का पोषण और काट-छाँट है। और जिन्हें हटाया गया है उनके लिए, वह सज़ा और प्रतिशोध भी है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 17

परमेश्वर ने आज तक अपना छह हजार वर्षों का कार्य किया है और अपने बहुत-से कर्म प्रकट किए हैं, इसका मुख्य उद्देश्य शैतान को पराजित करना और समस्त मानवजाति को बचाना है। इस अवसर के माध्यम से परमेश्वर स्वर्ग की सारी चीजों, पृथ्वी पर की सारी चीजों और समुद्र के अंदर की सारी चीजों और यहाँ तक कि पृथ्वी के हर अंतिम प्राणी को अपनी सर्वशक्तिमत्ता और अपने सारे कर्म देखने देता है। वह शैतान को पराजित करने के इस अवसर के माध्यम से मानवजाति को अपने सारे कर्म प्रकट करता है ताकि वे उसकी स्तुति करें और शैतान को पराजित करने में उसकी बुद्धि का गुणगान कर सकें। पृथ्वी पर, स्वर्ग में और समुद्र के भीतर की सारी चीजें परमेश्वर को महिमा प्रदान करती हैं, उसकी सर्वशक्तिमत्ता की स्तुति करती हैं, उसके हर एक कर्म की स्तुति करती हैं और उसके पवित्र नाम को ऊँचे स्वर में पुकारती हैं। यह उसके द्वारा शैतान को हराने का प्रमाण है; यह शैतान पर उसकी विजय का प्रमाण है। उससे भी अधिक, यह उसके द्वारा मानवजाति के उद्धार का प्रमाण है। परमेश्वर की समस्त सृष्टि उसे महिमा प्रदान करती है, अपने शत्रु को पराजित करने और विजयी होकर लौटने के लिए उसकी स्तुति करती है और एक महान विजयी राजा के रूप में उसका गुणगान करती है। उसका उद्देश्य केवल शैतान को पराजित करना नहीं है, इसीलिए उसका कार्य छह हजार वर्ष से जारी रहा है। वह मानवजाति को बचाने के लिए शैतान की पराजय का उपयोग करता है; वह अपने सभी कर्मों को प्रकट करने के लिए और अपनी सारी महिमा को प्रकट करने के लिए शैतान की पराजय का उपयोग करता है। वह महिमा प्राप्त करेगा और स्वर्गदूतों की समस्त सभा उसकी सारी महिमा देखेगी। स्वर्ग में दूत, पृथ्वी पर मनुष्य और पृथ्वी पर उसकी समस्त सृष्टि सृष्टिकर्ता की महिमा देखेंगे। यही वह कार्य है जो वह करता है। स्वर्ग में और पृथ्वी पर उसकी सृष्टि, सभी उसकी महिमा को देखेंगे और वह शैतान को सर्वथा पराजित करने के बाद विजयोल्लास के साथ वापस लौटेगा, पूरी मानवजाति उसकी प्रशंसा करेगी—यह वह कार्य है जो एक बार में दो लक्ष्य हासिल करता है। अंत में समस्त मानवजाति उसके द्वारा जीत ली जाएगी, और वह ऐसे हर व्यक्ति को मिटा देगा जो उसका विरोध या विद्रोह करेगा, अर्थात्, वह उन सभी को मिटा देगा जो शैतान के हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 18

यहोवा ने जो कार्य इस्राएलियों पर किया, उसने मानव-जाति के बीच पृथ्वी पर परमेश्वर के मूल स्थान को स्थापित किया, जो कि ऐसा पवित्र स्थान भी था जहाँ वह उपस्थित रहता था। उसने अपने कार्य को इस्राएल के लोगों तक ही सीमित रखा। आरंभ में उसने इस्राएल के बाहर कार्य नहीं किया, बल्कि उसने अपने कार्यक्षेत्र को सीमित रखने के लिए ऐसे लोगों को चुना, जिन्हें उसने उचित पाया। इस्राएल वह जगह है, जहाँ परमेश्वर ने आदम और हव्वा की रचना की, और उस जगह की धूल से यहोवा ने मनुष्य को बनाया; यह स्थान पृथ्वी पर उसके कार्य का आधार बन गया। इस्राएली, जो नूह के वंशज थे और आदम के भी वंशज थे, पृथ्वी पर यहोवा के कार्य की मानवीय बुनियाद थे।

उस समय, इस्राएल में यहोवा के कार्य की महत्ता, उद्देश्य और कदम अपना कार्य पूरी पृथ्वी पर कार्यान्वित करने के लिए थे, जो इस्राएल को अपना केंद्र बनाकर धीरे-धीरे अन्य-जाति राष्ट्रों में फैल गया। वह इसी सिद्धांत के अनुसार पूरे ब्रह्मांड के भीतर कार्य करता है—एक निश्चित बिंदु से आरंभ कर संपूर्ण को संचालित करता है और फिर अपने कार्य को तब तक फैलाता है जब तक कि ब्रह्मांड के सभी लोग उसके सुसमाचार को प्राप्त न कर लें। प्रथम इस्राएली नूह के वंशज थे। इन लोगों को केवल यहोवा की श्वास प्रदान की गई थी और वे जीवन की मूल आवश्यकताएँ पूरी करना जानते थे, किंतु वे नहीं जानते थे कि यहोवा किस प्रकार का परमेश्वर है या मनुष्य के लिए उसके इरादे क्या हैं, और वे यह तो बिल्कुल भी नहीं जानते थे कि सृष्टिकर्ता का भय कैसे मानें। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि क्या ऐसे विनियम और व्यवस्थाएँ हैं जिनका पालन किया जाना था,[क] या क्या सृजित प्राणियों को सृष्टिकर्ता के लिए कोई कर्तव्य करना चाहिए, आदम के वंशज इन बातों के बारे में कुछ नहीं जानते थे। वे बस इतना ही जानते थे कि पति को अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए पसीना बहाना और परिश्रम करना चाहिए, और पत्नी को अपने पति के प्रति समर्पित होकर यहोवा द्वारा सृजित मानव-जाति को बनाए रखना चाहिए। दूसरे शब्दों में, वे लोग जिनके पास केवल यहोवा की श्वास और उसका जीवन था, इस बारे में कुछ भी नहीं जानते थे कि परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन कैसे करें या सृष्टिकर्ता को कैसे संतुष्ट करें। वे बहुत ही कम समझते थे। इसलिए भले ही उनके हृदय में कुछ भी कुटिलता या छल-कपट नहीं था, और उनके बीच ईर्ष्या और कलह कभी-कभार ही उत्पन्न होते थे, फिर भी उन्हें सृष्टिकर्ता, यहोवा के बारे में कोई ज्ञान या समझ नहीं थी। मनुष्य के ये पूर्वज केवल यहोवा की चीजों को खाना और उनका आनंद लेना जानते थे, किंतु वे यहोवा का भय मानना नहीं जानते थे; वे नहीं जानते थे कि उन्हें घुटने टेककर यहोवा की आराधना करनी चाहिए। तो वे उसके सृजित प्राणी कैसे कहला सकते थे? यदि ऐसा होता, तो क्या इन वचनों का बोला जाना, “यहोवा सृष्टिकर्ता है” और “उसने मनुष्य को सृजित किया ताकि मनुष्य उसे अभिव्यक्त कर सके, उसे महिमामंडित कर सके और उसका प्रतिनिधित्व कर सके”—व्यर्थ न हो जाता? जिन लोगों के पास यहोवा का भय मानने वाला हृदय नहीं था, वे उसकी महिमा के गवाह कैसे बन सकते थे? वे उसकी महिमा की अभिव्यक्ति कैसे बन सकते थे? तब क्या यहोवा के इन वचनों “मैंने मनुष्य को अपनी छवि में बनाया” का फायदा उठाकर शैतान, वह दुष्ट हमला न करता? क्या तब ये वचन यहोवा द्वारा मनुष्य के सृजन को लेकर शर्म का एक चिह्न न बन जाते? कार्य के उस चरण को पूरा करने के लिए, मनुष्य को बनाने के बाद, यहोवा ने आदम से नूह तक उन्हें निर्देश या मार्गदर्शन नहीं दिया। बल्कि, जल-प्रलय द्वारा दुनिया को नष्ट किए जाने के बाद ही उसने औपचारिक तौर पर इस्राएलियों का मार्गदर्शन करना आरंभ किया था जो नूह के वंशज थे और आदम के भी। इस्राएल में उसके कार्य और कथनों ने इस्राएल में रहने वाले सभी लोगों को मार्गदर्शन दिया और इस तरह मानव-जाति को दिखाया कि यहोवा न केवल मनुष्य में श्वास फूँकने में समर्थ है, ताकि वह परमेश्वर से जीवन प्राप्त कर सके और मिट्टी में से उठकर एक सृजित मानव बन सके, बल्कि वह मानव-जाति को भस्म भी कर सकता है, उसे शाप भी दे सकता है और उस पर अपने राजदंड का उपयोग कर शासन भी कर सकता है। इसलिए उन्होंने देखा कि यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन कर सकता है और मानव-जाति के बीच दिन और रात के समय के अनुसार बोल सकता है और कार्य कर सकता है। जो कार्य उसने किया, वह केवल इसलिए किया ताकि उसके सृजित प्राणी जान सकें कि मनुष्य उसके द्वारा उठाई गई धूल से उत्पन्न हुआ है। इसके अलावा, मनुष्य उसके द्वारा ही बनाया गया है। इतना ही नहीं, बल्कि उसने पहले इस्राएल में कार्य किया ताकि दूसरे लोग और राष्ट्र (जो वास्तव में इस्राएल से पृथक नहीं थे, बल्कि इस्राएलियों से अलग हो गए थे, मगर फिर भी वे आदम और हव्वा के वंशज ही थे) इस्राएल से यहोवा का सुसमाचार प्राप्त कर सकें, ताकि ब्रह्मांड में सभी सृजित प्राणी यहोवा का भय मान सकें और उसे महान मानते हुए सम्मान दे सकें। यदि यहोवा ने अपना कार्य इस्राएल में आरंभ न किया होता, बल्कि मनुष्यों को बनाने के बाद उन्हें बस पृथ्वी पर निश्चिंत जीवन जीने दिया होता, तो उस स्थिति में, मनुष्य की भौतिक प्रकृति को देखते हुए (प्रकृति का अर्थ है कि मनुष्य उन चीजों को कभी नहीं जान सकता, जिन्हें वह देख नहीं सकता, अर्थात् वह कभी नहीं जान पाएगा कि मानव-जाति को यहोवा ने बनाया है, और यह तो बिल्कुल नहीं जान पाएगा कि उसने ऐसा क्यों किया), वह न तो कभी जान पाएगा कि यहोवा ने ही मानवजाति को बनाया है, न ही यह कि वह सभी चीजों का प्रभु है। यदि यहोवा ने मनुष्य का सृजन करके उसे पृथ्वी पर छोड़ दिया होता और एक अवधि तक मनुष्यों का मार्गदर्शन करने के लिए उनके बीच रहने के बजाय ऐसे ही अपने हाथ झाड़कर चला गया होता, तो सारी मानव-जाति शून्य बना दी गई होती; यहाँ तक कि स्वर्ग, पृथ्वी और उसके द्वारा सृजित सभी चीजें और समस्त मानव-जाति शून्य बना दी गई होती और इतना ही नहीं, शैतान द्वारा कुचल दी गई होती। ऐसा होता तो, यहोवा की यह इच्छा “पृथ्वी पर अर्थात्, उसके सृजन के बीच, उसके पास पृथ्वी पर खड़े होने के लिए एक स्थान, एक पवित्र स्थान हो” चकनाचूर हो गई होती। इसलिए मानवजाति को बनाने के बाद, वह मनुष्यों के जीवन में मार्गदर्शन करने के लिए उनके बीच रहा और उनसे बात की—यह सब उसका अपनी इच्छा और योजना को साकार करने के लिए था। उसने जो कार्य इस्राएल में किया, वह केवल उस योजना को साकार करने के लिए था जिसे उसने सभी चीजों की रचना करने से पहले बनाया था, इसलिए उसका पहले इस्राएलियों के मध्य कार्य करना और सभी चीजों का सृजन करना एक-दूसरे से असंगत नहीं था, बल्कि दोनों उसके प्रबंधन, उसके कार्य और उसकी महिमा के लिए और उसके द्वारा मानव-जाति के सृजन के अर्थ को और अधिक गहरा करने के लिए किए गए थे। उसने नूह के बाद दो हजार वर्षों तक पृथ्वी पर मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन किया, लोगों की यह समझने में मदद की कि यहोवा, सभी चीजों के प्रभु का किस प्रकार भय मानें, अपने जीवन में कैसा आचरण करें और कैसे जिएँ, और इन सबसे बढ़कर, यहोवा की गवाही कैसे दें, उसके प्रति समर्पण कैसे करें और उसका भय कैसे मानें, यहाँ तक कि कैसे संगीत के साथ उसकी स्तुति करें जैसे दाऊद और उसके याजकों ने की थी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, व्यवस्था के युग का कार्य

फुटनोट :

क. मूल पाठ में, “पालन किया जाना था” यह वाक्यांश नहीं है।


परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 19

जिन दो हजार वर्षों के दौरान यहोवा ने कार्य किया, उनके पूर्व मनुष्य कुछ नहीं जानता था, और लगभग समस्त मानव-जाति पतित हो चुकी थी, जल-प्रलय द्वारा संसार के विनाश से पहले तक, मनुष्य स्वच्छंद संभोग और भ्रष्टता की गहराई में गिर चुका था, उसके हृदय में यहोवा बिल्कुल नहीं था और उसका मार्ग तो बिल्कुल नहीं था। उसने उस कार्य को कभी नहीं समझा था, जिसे यहोवा करने जा रहा था; लोगों में विवेक का अभाव था, ज्ञान और भी कम था, और एक साँस लेती हुई मशीन के समान वे मनुष्य, परमेश्वर, सभी चीजें, जीवन आदि से पूर्णतया अनभिज्ञ थे। पृथ्वी पर वे साँप के समान, बहुत-से प्रलोभनों में लिप्त थे, और बहुत-सी ऐसी बातें कहते थे जो यहोवा के लिए अपमानजनक थीं, लेकिन चूँकि वे अनभिज्ञ थे, इसलिए यहोवा ने उन्हें ताड़ना नहीं दी या अनुशासित नहीं किया। केवल जल-प्रलय के बाद ही, जब नूह 601 वर्ष का था, तो यहोवा ने औपचारिक रूप से नूह के सामने प्रकट होकर उसका तथा उसके परिवार का मार्गदर्शन किया और 2,500 वर्षों तक चले व्यवस्था के युग की समाप्ति तक नूह और उसके वंशजों के साथ-साथ, जल-प्रलय में जिंदा बचे पक्षियों और जानवरों की अगुआई की। वह इस्राएल में कार्यरत था, अर्थात् कुल 2,000 वर्षों तक औपचारिक रूप से इस्राएल में कार्यरत था और 500 वर्षों तक इस्राएल और उसके बाहर एक-साथ कार्यरत था, जो मिलकर 2,500 वर्ष होते हैं। इस दौरान उसने इस्राएलियों को निर्देश दिया कि यहोवा की सेवा करने के लिए उन्हें एक मंदिर का निर्माण करना चाहिए, याजकों के लबादे पहनने चाहिए और उषाकाल में नंगे पाँव मंदिर में प्रवेश करना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि उनके जूते यहोवा के मंदिर को अपवित्र कर दें और मंदिर के शिखर से उन पर आग गिरा दी जाए और उन्हें जलाकर मार डाला जाए। उन्होंने अपने कर्तव्य किए और यहोवा की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो गए। उन्होंने मंदिर में यहोवा से प्रार्थना की, और यहोवा का प्रकाशन प्राप्त करने के बाद, अर्थात् यहोवा के बोलने के बाद, उन्होंने जनसाधारण की अगुआई की और उन्हें सिखाया कि उन्हें उनके परमेश्वर, यहोवा के प्रति भय दिखाना चाहिए। यहोवा ने उनसे कहा कि उन्हें एक मंदिर और एक वेदी बनानी चाहिए, और यहोवा के समय पर, अर्थात् फसह के पर्व पर उन्हें यहोवा की सेवा के लिए बलि के रूप में वेदी पर रखने के लिए पहलौठे बछड़े और मेमने तैयार करने चाहिए, जिससे लोगों को नियंत्रण में रखा जा सके और उनके हृदय में यहोवा के लिए भय उत्पन्न किया जा सके। उनका इस व्यवस्था का पालन करना या न करना यहोवा के प्रति उनकी वफादारी का पैमाना बन गया। यहोवा ने उनके लिए सब्त का दिन भी नियत किया, जो उसकी सृष्टि की रचना का सातवाँ दिन था। सब्त के अगले दिन उसने पहला दिन बनाया, अर्थात् उनके द्वारा यहोवा की स्तुति करने, उसे चढ़ावा चढ़ाने और उसके लिए संगीत बजाने का दिन। इस दिन यहोवा ने सभी याजकों को एक-साथ बुलाकर वेदी पर रखे चढ़ावे को लोगों के खाने हेतु बाँटने के लिए कहा, ताकि वे यहोवा की वेदी के चढ़ावों का आनंद उठा सकें। यहोवा ने कहा कि वे धन्य हैं कि उन्होंने उसके साथ एक हिस्सा साझा किया, और कि वे उसके चुने हुए लोग हैं (जो कि इस्राएलियों के साथ यहोवा की वाचा थी)। यही कारण है कि आज तक भी इस्राएल के लोग यही कहते हैं कि यहोवा केवल उनका ही परमेश्वर है, वह अन्य-जाति राष्ट्रों का परमेश्वर नहीं है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, व्यवस्था के युग का कार्य

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 20

व्यवस्था के युग के दौरान, यहोवा ने मूसा को उन इस्राएलियों तक पहुँचाने के लिए अनेक आज्ञाएँ निर्धारित कीं, जो उसका अनुसरण करते हुए मिस्र के बाहर निकले थे। ये आज्ञाएँ यहोवा द्वारा इस्राएलियों को प्रदान की गई थीं, उनका मिस्र के लोगों से कोई संबंध नहीं था; वे इस्राएलियों को नियंत्रित करने के लिए थीं, उसने उनसे माँग करने के लिए इन आज्ञाओं का उपयोग किया। वे सब्त का पालन करते थे या नहीं, अपने माता-पिता का सम्मान करते थे या नहीं, मूर्तियों की आराधना करते थे या नहीं, इत्यादि—यही वे सिद्धांत थे, जिनसे उनके पापी या धार्मिक होने का आकलन किया जाता था। उनमें से कुछ ऐसे थे जो यहोवा की आग से जला दिए गए, कुछ ऐसे थे जो पत्थरों से मार डाले गए, और कुछ ऐसे थे जिन्होंने यहोवा का आशीष प्राप्त किया, इसका निर्धारण इस बात से किया जाता था कि उन्होंने इन आज्ञाओं का पालन किया या नहीं। जो सब्त का पालन नहीं करते थे, उन्हें पत्थरों से मार डाला गया। जो याजक सब्त का पालन नहीं करते थे, उन्हें यहोवा की आग में जला दिया गया। जो अपने माता-पिता का सम्मान नहीं करते थे, उन्हें भी पत्थरों से मार डाला गया। यह सब यहोवा द्वारा स्वीकृत था। यहोवा ने अपनी आज्ञाओं और व्यवस्थाओं को इसलिए स्थापित किया था, ताकि जब वह लोगों के जीवन की अगुआई करे, तो वे उसके वचन सुनकर उनके प्रति समर्पण करें, उसके विरुद्ध विद्रोह न करें। उसने नवजात मानव-जाति को नियंत्रण में रखने के लिए इन व्यवस्थाओं का उपयोग किया, जिससे वह अपने भविष्य के कार्य की नींव डाले। इसलिए, यहोवा द्वारा किए गए कार्य के आधार पर प्रथम युग को व्यवस्था का युग कहा गया। यद्यपि यहोवा ने बहुत-से कथन कहे और बहुत कार्य किया, किंतु उसने केवल लोगों का सकारात्मक ढंग से मार्गदर्शन किया और उन अज्ञानी लोगों को आचरण करना सिखाया, जीना सिखाया, और यहोवा के मार्ग को समझना सिखाया। उसके द्वारा किए गए कार्य का अधिकांश भाग लोगों से अपने मार्ग का पालन करवाना और अपनी व्यवस्थाओं का अनुसरण करवाना था। यह कार्य उन लोगों पर किया गया, जो कम भ्रष्ट थे; यह उनके स्वभाव का रूपांतरण या उनके जीवन का विकास करने की हद तक नहीं पहुँचा था। लोगों से व्यवस्थाओं का पालन करवाने के द्वारा उसने उन्हें बस अंकुश और नियंत्रण में किया। उस समय इस्राएलियों के लिए यहोवा मात्र मंदिर में विद्यमान परमेश्वर, स्वर्ग का परमेश्वर था। वह बादल का एक खंभा, आग का एक खंभा था। यहोवा का उद्देश्य मात्र लोगों से उन बातों का आज्ञापालन करवाना था जिन्हें आज लोग व्यवस्थाओं और आज्ञाओं के तौर पर जानते हैं—विनियम भी कह सकते हैं—क्योंकि यहोवा ने जो किया, वह उन्हें रूपांतरित करने के लिए नहीं था, बल्कि उन्हें और बहुत-सी वस्तुएँ प्रदान करने के लिए था, जो मनुष्य के पास होनी चाहिए, उन्हें व्यक्तिगत रूप से ये चीजें देनी थी, क्योंकि सृजित किए जाने के बाद मनुष्य के पास ऐसा कुछ नहीं था, जो उसके पास होना चाहिए। इसलिए, यहोवा ने लोगों को वे वस्तुएँ प्रदान कीं, जो पृथ्वी पर उनके जीवन के लिए उनके पास होनी चाहिए थीं, और ऐसा करके उन लोगों को, जिनकी यहोवा ने अगुआई की थी, उनके पूर्वजों, आदम और हव्वा से भी श्रेष्ठ बना दिया, क्योंकि जो कुछ यहोवा ने उन्हें प्रदान किया, वह उससे बढ़कर था जो उसने आरंभ में आदम और हव्वा को प्रदान किया था। इसके बावजूद, यहोवा ने इस्राएल में जो कार्य किया, वह केवल मानवजाति का मार्गदर्शन करने और उससे सृष्टिकर्ता को स्वीकृत करवाने के लिए था। उसने उन्हें जीता या रूपांतरित नहीं किया था, बल्कि मात्र उनका मार्गदर्शन किया था। यह व्यवस्था के युग में यहोवा का संपूर्ण कार्य था। यह इस्राएल की संपूर्ण धरती पर उसके कार्य की पृष्ठभूमि, उसकी असली कहानी और उसका सार है, जो मानव-जाति को यहोवा के नियंत्रण में रखने के लिए—उसके छह हज़ार वर्षों के कार्य का आरंभ है। इसी से उसकी छह हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना में और अधिक कार्य उत्पन्न हुआ।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, व्यवस्था के युग का कार्य

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 21

आरंभ में, व्यवस्था के पुराने विधान के युग के दौरान मनुष्य का मार्गदर्शन करना एक बच्चे के जीवन का मार्गदर्शन करने जैसा था। आरंभिक मानवजाति यहोवा की नवजात थी; वे इस्राएली थे। उन्हें इस बात की समझ नहीं थी कि परमेश्वर का भय कैसे मानें या पृथ्वी पर कैसे रहें। दूसरे शब्दों में, यहोवा ने मानवजाति का सृजन किया, अर्थात् उसने आदम और हव्वा का सृजन किया, किंतु उसने उन्हें यह समझने की क्षमता नहीं दी कि यहोवा का भय कैसे मानें या पृथ्वी पर यहोवा के नियमों का अनुसरण कैसे करें। यहोवा के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के बिना कोई इसे सीधे नहीं जान सकता था, क्योंकि आरंभ में मनुष्य के पास यह क्षमता नहीं थी। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि यहोवा परमेश्वर है, किंतु जहाँ तक इस बात का संबंध है कि उसका भय कैसे मानना है, किस प्रकार का आचरण उसका भय मानना कहा जा सकता है, किस प्रकार के मन के साथ व्यक्ति को उसका भय मानना है, या उसके प्रति भय में क्या चढ़ाना है, मनुष्य को इसका बिल्कुल भी पता नहीं था। मनुष्य केवल उस चीज का आनंद लेना जानता था जिसका यहोवा द्वारा सृजित सभी चीजों के बीच आनंद लिया जा सकता है, किंतु जहाँ तक इसकी बात है कि पृथ्वी पर व्यक्ति को कैसे जीना चाहिए जिससे कि वह वास्तव में “सृजित प्राणी” की उपाधि के योग्य बन सके, मनुष्य को इसका कोई ज्ञान नहीं था। किसी के द्वारा निर्देशित किए बिना, किसी के द्वारा अपना व्यक्तिगत रूप से मार्गदर्शन किए बिना, यह मानवजाति कभी भी उचित मानवीय जीवन न जी पाती, बल्कि केवल शैतान द्वारा गुप्त रूप से बंदी बना ली गई होती। यहोवा ने मानवजाति का सृजन किया, अर्थात्, उसने मानवजाति के पूर्वजों, हव्वा और आदम, का सृजन किया, किंतु उसने उन्हें और कोई मेधा या बुद्धि प्रदान नहीं की। यद्यपि वे पहले से ही पृथ्वी पर रह रहे थे, किंतु वे समझते लगभग कुछ नहीं थे। और इसलिए, मानवजाति का सृजन करने का यहोवा का कार्य केवल आधा ही समाप्त हुआ था, और पूर्ण रूप से पूरा नहीं हुआ था। उसने केवल मिट्टी से मनुष्य का एक नमूना बनाया था और उसे अपनी साँस दे दी थी, किंतु उसने मनुष्य को परमेश्वर का भय मानने का पर्याप्त संकल्प प्रदान नहीं किया था। आरंभ में मनुष्य के पास परमेश्वर का भय मानने या उससे डरने वाला हृदय नहीं था। मनुष्य केवल उसके वचनों को सुनना जानता था, किंतु पृथ्वी पर जीवन के बुनियादी ज्ञान और मानव-जीवन के सामान्य नियमों से वह अनभिज्ञ था। और इसलिए, यद्यपि यहोवा ने पुरुष और स्त्री का सृजन किया और सात दिन की परियोजना पूरी कर दी, किंतु उसने किसी भी प्रकार से मनुष्य के सृजन को पूरा नहीं किया, क्योंकि मनुष्य केवल एक भूसा था, और उसमें मनुष्य होने की वास्तविकता का अभाव था। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि यह यहोवा है, जिसने मानवजाति का सृजन किया है, किंतु उसे इस बात का कोई आभास नहीं था कि यहोवा के वचनों और नियमों का पालन कैसे किया जाए। और इसलिए, मानवजाति के सृजन के बाद, यहोवा का कार्य अभी पूर्ण रूप से पूरा नहीं हुआ था। उसे अभी भी मनुष्यों को अपने सामने लाने के लिए उनका पूरी तरह से मार्गदर्शन करना था, ताकि वे धरती पर एक-साथ रहने और उसका भय मानने में समर्थ हो जाएँ, और ताकि वे उसके मार्गदर्शन से धरती पर एक सामान्य मानव-जीवन के सही रास्ते पर प्रवेश करने में समर्थ हो जाएँ। केवल इसी रूप में मुख्यतः यहोवा के नाम से संचालित कार्य पूरी तरह से संपन्न हुआ था; अर्थात्, केवल इसी रूप में दुनिया का सृजन करने का यहोवा का कार्य पूरी तरह से समाप्त हुआ था। और इसलिए, मानवजाति का सृजन करने के बाद उसे पृथ्वी पर हजारों वर्षों तक मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन करना पड़ा, ताकि मानवजाति उसके आदेशों और नियमों का पालन कर सके और पृथ्वी पर सामान्य मानवीय क्रियाकलापों में भाग ले पाने में समर्थ हो जाए। केवल तभी यहोवा का कार्य पूर्णतः पूरा हुआ था।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 22

यीशु ने जो कार्य किया, वह उस युग में मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुसार था। उसका कार्य मानवजाति को छुटकारा दिलाना, उसे उसके पापों के लिए क्षमा करना था, और इसलिए उसका स्वभाव पूरी तरह से विनम्रता, धैर्य, प्रेम, धर्मपरायणता, सहनशीलता, दया और करुणामय प्यार से भरा था। वह मानवजाति के लिए भरपूर अनुग्रह और आशीष लाया, वह वे सभी चीजें लाया जिनका लोग संभवतः आनंद ले सकते थे। लोगों ने पूरी तरह से शांति और प्रसन्नता, उसकी सहनशीलता और प्रेम, उसकी दया और प्रेमपूर्ण दयालुता का आनंद लिया। उस समय लोगों के पास आनंद की चीजों की जिस प्रचुरता की पहुँच थी—उनके हृदय में शांति और सुरक्षा की भावना, उनकी आत्माओं में आश्वासन की भावना, और उद्धारकर्ता यीशु पर उनकी निर्भरता—इन सबका कारण वह युग था जिसमें वे रहते थे। अनुग्रह के युग में मनुष्य पहले ही शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका था, इसलिए समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाने का कार्य निभाने के लिए भरपूर अनुग्रह, अनंत सहनशीलता और धैर्य, और उससे भी बढ़कर, मानवजाति के पापों का प्रायश्चित करने के लिए पर्याप्त बलिदान की आवश्यकता थी, ताकि परिणाम हासिल किया जा सके। अनुग्रह के युग में मानवजाति ने जो देखा, वह मानवजाति के पापों के प्रायश्चित के लिए मेरा बलिदान मात्र था : यीशु। वे केवल इतना ही जानते थे कि परमेश्वर दयावान और सहनशील हो सकता है, और उन्होंने केवल यीशु की दया और करुणामय प्रेम ही देखा था। ऐसा पूरी तरह से इसलिए था, क्योंकि वे अनुग्रह के युग में जन्मे थे। इसलिए, उन्हें छुटकारा दिलाए जाने से पहले, उन्हें प्रचुर अनुग्रह का आनंद उठाना था, जो यीशु ने उन्हें प्रदान किए थे। केवल इसी तरह से उन्हें लाभ हो सकता था, उनके द्वारा अनुग्रह का आनंद उठाने के माध्यम से उन्हें उनके पापों को क्षमा किए जाने में सक्षम बनाया जा सकता था और उनके द्वारा यीशु की सहनशीलता और धैर्य का आनंद उठाने के माध्यम से उन्हें उनके पापों से छुटकारा पाने का अवसर दिया जा सकता था। केवल यीशु की सहनशीलता और धैर्य के माध्यम से ही वे क्षमा पाने और यीशु द्वारा दिए गए अनुग्रह की प्रचुरता का आनंद उठाने के योग्य बने। जैसा कि यीशु ने कहा था : मैं धार्मिकों को नहीं बल्कि पापियों को छुटकारा दिलाने, पापियों को उनके पापों के लिए क्षमा करवाने के लिए आया हूँ। यदि यीशु जब देह बना तब वह मनुष्य के लिए न्याय, शाप और मनुष्य के अपराधों के प्रति असहिष्णुता का स्वभाव लाया होता, तो मनुष्य को छुटकारा पाने का अवसर कभी न मिला होता, और वह हमेशा के लिए पापी रह गया होता। यदि ऐसा हुआ होता, तो छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना व्यवस्था के युग में ही रुक गई होती, और व्यवस्था का युग छह हज़ार वर्ष लंबा हो गया होता। मनुष्य के पाप अधिक विपुल और अधिक गंभीर हो गए होते, और मानवजाति के सृजन का कोई अर्थ न रह जाता। लोग केवल व्यवस्था के तहत यहोवा की सेवा करने में ही समर्थ हो पाते, परंतु उनके पाप प्रथम सृजित मनुष्यों से अधिक बढ़ गए होते। यीशु ने मनुष्यों को जितना अधिक प्रेम किया और उनके पापों को क्षमा करते हुए उन पर पर्याप्त दया और करुणामय प्रेम बरसाया, उतना ही अधिक उन्होंने यीशु द्वारा बचाए जाने की पात्रता हासिल की और इस प्रकार वे खोए हुए मेमने कहलाए जिन्हें यीशु ने बड़ी कीमत देकर वापस खरीदा। शैतान इस काम में हस्तक्षेप नहीं कर सकता था, क्योंकि यीशु अपने अनुयायियों के साथ इस तरह व्यवहार करता था, जैसे कोई स्नेहमयी माता अपने शिशु को अपने आलिंगन में लेकर करती है। वह उनसे क्रोधित नहीं हुआ या उसने उनसे बेहद घृणा नहीं की, बल्कि वह सांत्वना से भरा हुआ था; वह उनके बीच कभी भी क्रोध से नहीं भड़का; बल्कि उनके पाप सहन किए और उनकी मूर्खता और अज्ञानता के प्रति आँखें मूँद लीं, और यहाँ तक कहा कि “दूसरों को सत्तर गुना सात बार क्षमा करो।” इस प्रकार उसके हृदय ने दूसरों के हृदयों को प्रेरित और रूपांतरित किया, और केवल इसी तरह से लोगों ने उसकी सहनशीलता के माध्यम से अपने पापों के लिए क्षमा प्राप्त की।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, छुटकारे के युग के कार्य की वास्तविक कहानी

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 23

यद्यपि यीशु अपने देहधारण में पूरी तरह से दैहिक भावनाओं से रहित था, फिर भी उसने हमेशा अपने चेलों को दिलासा दी, उन्हें पोषण प्रदान किया, उनकी सहायता की और उन्हें सहारा दिया। उसने बहुत सारा कार्य किया, उसने बहुत अधिक कष्ट सहा और उसने कभी भी लोगों से बहुत ज्यादा माँगें नहीं कीं, बल्कि उनके पापों के प्रति हमेशा धैर्यवान और सहनशील रहा, इतना कि अनुग्रह के युग में लोग उसे स्नेह के साथ “प्यारा उद्धारकर्ता यीशु” कहते थे। उस समय के लोगों के लिए—सभी लोगों के लिए—यीशु के पास जो था और जो यीशु स्वयं था, वह था दया और करुणामय प्रेम। उसने कभी लोगों के अपराधों को स्मरण नहीं किया, और उनके प्रति उसका व्यवहार उनके अपराधों पर आधारित नहीं था। चूँकि वह एक भिन्न युग था, वह प्रायः लोगों को प्रचुर मात्रा में भोजन प्रदान करता था, ताकि वे पेट भरकर खा सकें। उसने उन सभी लोगों के साथ अनुग्रहपूर्वक व्यवहार किया जो उसका अनुसरण करते थे, उसने बीमारों को चंगा किया, दुष्टात्माओं को निकाला और मुर्दों को जिलाया। इस उद्देश्य से कि लोग उस पर विश्वास कर सकें और देख सकें कि जो कुछ भी उसने किया, सच्चाई और ईमानदारी से किया, उसने उन्हें यह दिखाते हुए कि उसके हाथों में मृतक भी पुनर्जीवित हो सकते हैं, एक सड़ती हुई लाश तक को पुनर्जीवित कर दिया। उसने हमेशा खामोशी से सहा और इस तरह उनके बीच छुटकारे का अपना कार्य किया। कहने का मतलब यह है कि सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले ही यीशु मानवता के पाप अपने ऊपर ले चुका था और मानवजाति के लिए एक पाप-बलि बन गया था। सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले ही उसने मानवजाति को छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से सलीब का मार्ग खोल दिया था। अंततः उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसने अपने आपको सलीब के वास्ते बलिदान कर दिया, और उसने अपनी सारी दया, करुणामय प्रेम और पवित्रता मानवजाति को प्रदान कर दी। वह मानवजाति के लिए हमेशा सहिष्णु रहा, उसने उससे कभी बदला नहीं लिया, बल्कि उसके पापों को क्षमा कर दिया, उसे पश्चात्ताप करने के लिए प्रोत्साहित किया, उसे धैर्य, सहनशीलता और प्रेम रखना, अपने पदचिह्नों का अनुसरण करना और सलीब के वास्ते स्वयं को बलिदान करना सिखाया। अपने भाई-बहनों के प्रति उसका प्रेम मरियम के प्रति प्रेम से भी बढ़कर था। उसने जो कार्य किया, उसमें उसने लोगों को चंगा करने और उनके भीतर की दुष्टात्माओं को निकालने को उसके सिद्धांत के रूप में अपनाया था, और यह सब कुछ उसके द्वारा छुटकारे के लिए था। वह जहाँ भी गया, उसने उन सभी के साथ अनुग्रहपूर्ण व्यवहार किया, जिन्होंने उसका अनुसरण किया। उसने गरीबों को अमीर बनाया, लँगड़ों को चलाया, अंधों को आँखें दीं, और बहरों को सुनने की शक्ति दी। यहाँ तक कि उसने सबसे अधम, बेसहारा लोगों, पापियों को भी अपने साथ एक ही मेज पर बैठने के लिए आमंत्रित किया, कभी उनका तिरस्कार नहीं किया, बल्कि हमेशा धैर्यवान रहा, उसने तो यह भी कहा : जब चरवाहा सौ में से एक भेड़ खो देता है, तो उस एक खोई हुई भेड़ को ढूँढ़ने के लिए वह निन्यानवे भेड़ों को छोड़ देता है, और जब वह उसे खोज लेता है, तो वह बहुत आनंदित होता है। वह अपने अनुयायियों से ऐसे ही प्रेम करता था, जैसे भेड़ अपने मेमनों से करती है। यद्यपि वे मूर्ख और अज्ञानी थे, और उसकी नजरों में पापी थे, और इतना ही नहीं, समाज के सबसे दीन-हीन सदस्य थे, फिर भी उसने उन पापियों को—उन लोगों को, जिनका दूसरे तिरस्कार करते थे—अपनी आँख का तारा समझा। चूँकि उसने उन्हें योग्य माना, इसलिए उसने उनके लिए, वेदी पर बलि चढ़ाए गए मेमने के समान अपना जीवन त्याग दिया। वह उनके बीच इस तरह गया, मानो वह उनका दास हो, और बिना शर्त उनका कहना मानते हुए उन्हें अपना उपयोग करने और अपनी बलि चढ़ाने दी। अपने अनुयायियों के लिए वह प्यारा उद्धारकर्ता यीशु था, परंतु ऊँचे मंच से लोगों को उपदेश देने वाले फरीसियों के प्रति उसने कोई दया और करुणामय प्रेम नहीं दिखाया, बल्कि उनसे बेहद घृणा की और विमुखता दिखाई। उसने फरीसियों के बीच अधिक काम नहीं किया, केवल कभी-कभार उन्हें उपदेश दिया और फटकारा; उनके बीच उसने छुटकारे का कार्य नहीं किया, न ही उसने उन्हें चिह्न और चमत्कार दिखाए। उसने अपनी समस्त दया और करुणामय प्रेम अपने अनुयायियों को प्रदान किया, सलीब पर चढ़ाए जाने के समय बिल्कुल अंत तक वह इन पापियों के वास्ते कष्ट सहता रहा, और जब तक उसने पूरी मानवता को छुटकारा नहीं दिला दिया, तब तक हर प्रकार का अपमान झेलता रहा। कुल मिलाकर यही उसका कार्य था।

यीशु द्वारा छुटकारा दिलाए बिना मानवजाति हमेशा के लिए पाप में रह रही होती और पाप की संतान और दुष्टात्माओं की वंशज बन जाती। इस तरह चलते हुए समस्त पृथ्वी शैतान का निवास-स्थान, उसके रहने की जगह बन जाती। परंतु छुटकारे के कार्य के लिए मानवजाति के प्रति दया और करुणामय प्रेम दर्शाने की जरूरत थी; केवल इस तरीके से ही मानवजाति क्षमा प्राप्त कर सकती थी और अंततः पूर्ण किए जाने और परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त किए जाने की पात्रता हासिल कर सकती थी। कार्य के इस चरण के बिना छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना आगे न बढ़ पाती। यदि यीशु को सलीब पर न चढ़ाया गया होता, यदि उसने केवल लोगों को चंगा ही किया होता और उनकी दुष्टात्माओं को निकाला ही होता, तो लोगों को उनके पापों के लिए पूर्णतः क्षमा नहीं किया जा सकता था। जो साढ़े तीन साल यीशु ने पृथ्वी पर कार्य करते हुए व्यतीत किए, उनमें उसने छुटकारे के अपने कार्य में से केवल आधा ही किया था; फिर, सलीब पर चढ़ाए जाने और पापी देह की छवि बनकर, शैतान को सौंपे जाकर उसने सलीब पर चढ़ाए जाने का काम पूरा किया और मानवजाति की नियति वश में कर ली। केवल शैतान के हाथों में सौंपे जाने के बाद ही उसने मानवजाति को छुटकारा दिलाया। साढ़े तैंतीस सालों तक उसने पृथ्वी पर कष्ट सहा; उसका उपहास उड़ाया गया, उसकी बदनामी की गई और उसे त्याग दिया गया, यहाँ तक कि उसके पास सिर रखने की भी जगह नहीं थी, आराम करने की कोई जगह नहीं थी और बाद में उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसका संपूर्ण अस्तित्व—एक पवित्र और निर्दोष शरीर—सलीब पर चढ़ा दिया गया। उसने हर संभव कष्ट सहे। जो सत्ता में थे, उन्होंने उसका मजाक उड़ाया और उसे चाबुक मारे, यहाँ तक कि सैनिकों ने उसके मुँह पर थूक भी दिया; फिर भी वह चुप रहा और अंत तक सहता रहा, बिना किसी शर्त के समर्पण करते हुए उसने मृत्यु तक कष्ट सहा, जिसके पश्चात उसने पूरी मानवजाति को छुटकारा दिला दिया। केवल तभी वह आराम का आनंद लेने आया। यीशु ने जो कार्य किया, वह केवल अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है; वह व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व नहीं करता, न ही वह अंत के दिनों के कार्य की जगह ले सकता है। यही अनुग्रह के युग, दूसरे युग, जिससे मानवजाति गुजरी है—छुटकारे के युग—में यीशु के कार्य का सार है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, छुटकारे के युग के कार्य की वास्तविक कहानी

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 24

यहोवा के कार्य के बाद यीशु मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने के लिए देहधारी हो गया। उसका कार्य अलग से किया गया कार्य नहीं था, बल्कि यहोवा के कार्य के आधार पर किया गया था। यह कार्य एक नए युग के लिए था, जिसे परमेश्वर ने व्यवस्था का युग समाप्त करने के बाद किया था। इसी प्रकार, यीशु का कार्य समाप्त हो जाने के बाद परमेश्वर ने अगले युग के लिए अपना कार्य जारी रखा, क्योंकि परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन सदैव आगे बढ़ रहा है। जब पुराना युग बीत जाता है, तो उसके स्थान पर नया युग आ जाता है, और एक बार जब पुराना कार्य पूरा हो जाता है, तो परमेश्वर के प्रबंधन को जारी रखने के लिए नया कार्य शुरू हो जाता है। यह देहधारण परमेश्वर का दूसरा देहधारण है, जो यीशु का कार्य पूरा होने के बाद हुआ है। निस्संदेह, यह देहधारण स्वतंत्र रूप से घटित नहीं होता; व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के बाद यह कार्य का तीसरा चरण है। हर बार जब परमेश्वर कार्य का नया चरण आरंभ करता है, तो हमेशा एक नई शुरुआत होती है और वह हमेशा एक नया युग लाता है। इसलिए परमेश्वर के स्वभाव, उसके कार्य करने के तरीके, उसके कार्य के स्थल, और उसके नाम में भी परिवर्तन होते हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि मनुष्य के लिए नए युग में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करना कठिन होता है। परंतु मनुष्य उसका कितना भी विरोध करे, परमेश्वर सदैव अपना कार्य करता रहता है और सदैव समस्त मानवजाति को आगे ले जाता रहता है। जब यीशु मनुष्य के संसार में आया तो उसने अनुग्रह का युग शुरू किया और व्यवस्था का युग समाप्त किया। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर एक बार फिर देहधारी हुआ और इस देहधारण के साथ उसने अनुग्रह का युग समाप्त किया और राज्य का युग शुरू किया। वे सब जो परमेश्वर के दूसरे देहधारण को स्वीकार करने में सक्षम हैं, राज्य के युग में ले जाए जाएँगे और इसके अलावा वे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर का मार्गदर्शन स्वीकार करने में सक्षम होंगे। यूँ तो यीशु मनुष्यों के बीच आया और उसने बहुत-सा कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया और मनुष्य की पाप-बलि के रूप में काम किया; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभावों से मुक्त नहीं किया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह बचाने के लिए केवल यीशु का पाप-बलि बनना और मनुष्य के पापों को वहन करना ही आवश्यक नहीं था, बल्कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए उसके स्वभावों से पूरी तरह छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करना आवश्यक था। और इसलिए मनुष्य के पापों के क्षमा किए जाने के बाद परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए देह में लौट आया और उसने ताड़ना तथा न्याय का कार्य आरंभ किया। यह कार्य मानवजाति को एक उच्चतर क्षेत्र में ले आया है। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में प्रकाश में जिएँगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 25

यदि लोग अनुग्रह के युग में अटके रहेंगे, तो वे कभी भी अपने भ्रष्ट स्वभावों से छुटकारा नहीं पाएँगे, परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव को जानने की बात तो दूर है! यदि लोग सदैव अनुग्रह की प्रचुरता में रहते हैं, परंतु उनके पास जीवन का वह मार्ग नहीं है, जो उन्हें परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने में समर्थ बनाता है, तो वे परमेश्वर पर अपने विश्वास में उसे वास्तव में कभी भी प्राप्त नहीं करेंगे। इस प्रकार का विश्वास वास्तव में दयनीय है। जब तुम इस पुस्तक को पूरा पढ़ लोगे, जब तुम राज्य के युग में देहधारी परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण का अनुभव कर लोगे, तब तुम महसूस करोगे कि अनेक वर्षों की तुम्हारी आशाएँ अंततः साकार हो गई हैं। तुम महसूस करोगे कि केवल अब तुमने परमेश्वर को वास्तव में आमने-सामने देखा है; केवल अब तुमने परमेश्वर के चेहरे को निहारा है, उसके व्यक्तिगत कथन सुने हैं, उसके कार्य की बुद्धिमत्ता को समझा है, और वास्तव में महसूस किया है वह कितना व्यावहारिक और सर्वशक्तिमान है। तुम महसूस करोगे कि तुमने ऐसी बहुत-सी चीजें पाई हैं, जिन्हें अतीत में लोगों ने न कभी देखा था, न ही प्राप्त किया था। इस समय, तुम स्पष्ट रूप से जान लोगे कि परमेश्वर पर विश्वास करना क्या होता है और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होना क्या होता है। निस्संदेह, यदि तुम अतीत के विचारों से चिपके रहते हो, और परमेश्वर के दूसरे देहधारण के तथ्य को अस्वीकार कर देते हो और उसे स्वीकार नहीं करते हो, तो तुम खाली हाथ रहोगे और कुछ नहीं पाओगे, और अंततः परमेश्वर का विरोध करने के दोषी ठहराए जाओगे। जो लोग सत्य के प्रति समर्पित होते हैं और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित होते हैं, वे दूसरे देहधारी परमेश्वर—सर्वशक्तिमान—के नाम के अधीन स्वीकार किए जाएँगे। वे परमेश्वर का व्यक्तिगत मार्गदर्शन स्वीकार करने में सक्षम होंगे, वे अधिक और उच्चतर सत्य और वास्तविक मानव जीवन प्राप्त करेंगे। वे उस दर्शन को निहारेंगे, जिसे अतीत के लोगों द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया था : “तब मैं ने उसे, जो मुझ से बोल रहा था, देखने के लिए अपना मुँह फेरा; और पीछे घूमकर मैं ने सोने की सात दीवटें देखीं, और उन दीवटों के बीच में मनुष्य के पुत्र सदृश एक पुरुष को देखा, जो पाँवों तक का वस्त्र पहिने, और छाती पर सोने का पटुका बाँधे हुए था। उसके सिर और बाल श्‍वेत ऊन वरन् पाले के समान उज्ज्वल थे, और उसकी आँखें आग की ज्वाला के समान थीं। उसके पाँव उत्तम पीतल के समान थे जो मानो भट्ठी में तपाया गया हो, और उसका शब्द बहुत जल के शब्द के समान था। वह अपने दाहिने हाथ में सात तारे लिए हुए था, और उसके मुख से तेज दोधारी तलवार निकलती थी। उसका मुँह ऐसा प्रज्‍वलित था, जैसा सूर्य कड़ी धूप के समय चमकता है” (प्रकाशितवाक्य 1:12-16)। यह दर्शन परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है, और उसके संपूर्ण स्वभाव की यह अभिव्यक्ति वर्तमान देहधारण में परमेश्वर के कार्य की अभिव्यक्ति भी है। ताड़ना और न्याय की निरंतर धारा में मनुष्य का पुत्र अपने कथनों के माध्यम से अपने अंतर्निहित स्वभाव को व्यक्त करता है और उन सभी को, जो उसकी ताड़ना और न्याय स्वीकार करते हैं, मनुष्य के पुत्र का वास्तविक चेहरा देखने देता है। यह वही चेहरा है जो यूहन्ना द्वारा देखे गए मनुष्य के पुत्र के चेहरे का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करता है। (निस्संदेह, यह सब उनके लिए अदृश्य होगा, जो राज्य के युग में परमेश्वर के कार्यों को स्वीकार नहीं करते।) परमेश्वर का वास्तविक चेहरा मनुष्य की भाषा द्वारा पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता; इसलिए परमेश्वर अपने अंतर्निहित स्वभाव को अभिव्यक्त करके मनुष्य को अपना वास्तविक चेहरा दिखाता है। अर्थात्, जिन सभी लोगों ने मनुष्य के पुत्र के अंतर्निहित स्वभाव को भली-भाँति समझा है, उन्होंने मनुष्य के पुत्र का वास्तविक चेहरा देखा है; क्योंकि परमेश्वर इतना महान है कि उसे मनुष्य की भाषा द्वारा पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता। एक बार जब मनुष्य राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण का अनुभव कर लेगा, तब वह यूहन्ना के वचनों का वास्तविक अर्थ जान लेगा, जो उसने दीवटों के बीच मनुष्य के पुत्र के बारे में कहे थे : “उसके सिर और बाल श्‍वेत ऊन वरन् पाले के समान उज्ज्वल थे, और उसकी आँखें आग की ज्वाला के समान थीं। उसके पाँव उत्तम पीतल के समान थे जो मानो भट्ठी में तपाया गया हो, और उसका शब्द बहुत जल के शब्द के समान था। वह अपने दाहिने हाथ में सात तारे लिए हुए था, और उसके मुख से तेज दोधारी तलवार निकलती थी। उसका मुँह ऐसा प्रज्‍वलित था, जैसा सूर्य कड़ी धूप के समय चमकता है।” उस समय तुम निस्संदेह जान जाओगे कि इतना कुछ कहने वाला यह साधारण देह निर्विवाद रूप से दूसरा देहधारी परमेश्वर है। इतना ही नहीं, तुम्हें वास्तव में अनुभव होगा कि तुम कितने धन्य हो, और तुम स्वयं को सबसे अधिक भाग्यशाली महसूस करोगे। क्या तुम इस आशीष को प्राप्त करने के इच्छुक नहीं हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 26

अंत के दिनों का कार्य वचन बोलना है। वचनों के माध्यम से मनुष्य में बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने से इन लोगों में अब जो परिवर्तन हुए हैं, वे उन परिवर्तनों से बहुत अधिक बड़े हैं, जो संकेत और चमत्कार स्वीकार करने से अनुग्रह के युग में लोगों में हुए थे। क्योंकि अनुग्रह के युग में हाथ रखकर और प्रार्थना करके दुष्टात्माओं को मनुष्य से निकाला जाता था, परंतु मनुष्य के भीतर भ्रष्ट स्वभाव तब भी बने रहते थे। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा कर दिया जाता था और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते थे, किंतु जहाँ तक यह प्रश्न है कि मनुष्य अपने भीतर के शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को कैसे छोड़ सकता है, तो उस पर अभी यह कार्य किया जाना बाकी था। मनुष्य को सिर्फ उसकी आस्था के कारण छुटकारा दिया गया था और उसके पाप क्षमा किए गए थे, किंतु मनुष्य की पापी प्रकृति नहीं मिटाई गई थी और वह अब भी उसके भीतर बनी हुई थी। मनुष्य के पाप परमेश्वर के देहधारण के माध्यम से क्षमा कर दिए गए थे, परंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य के भीतर अब पाप नहीं रहा था। मनुष्य के पाप पाप-बलि के माध्यम से क्षमा किए जा सकते थे, लेकिन जहाँ तक यह बात है कि मनुष्य को अब पाप न करने वाला कैसे बनाया जा सकता है, उसके भ्रष्ट स्वभावों और पापी प्रकृति को पूरी तरह से कैसे त्यागा जा सकता है और उसके जीवन स्वभाव को कुछ हद तक कैसे बदला जा सकता है, उसके पास इस समस्या को हल करने का कोई तरीका नहीं है। मनुष्य के पाप क्षमा कर दिए गए हैं और यह परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य के कारण है, लेकिन मनुष्य अभी भी अपने पुराने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों में ही जी रहा है। ऐसे में मनुष्य को उसके शैतानी भ्रष्ट स्वभावों से पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए, उसकी पापी प्रकृति पूरी तरह से त्याग दी जानी चाहिए, ताकि वह फिर कभी विकसित न हो, और उसके स्वभाव में रूपांतरण होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य जीवन में संवृद्धि के मार्ग को समझे, जीवन का मार्ग समझे और अपने स्वभाव को बदलने का तरीका समझे। साथ ही, इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है, ताकि धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदल सके और वह रोशनी की चमक में जी सके, ताकि वह जो कुछ भी करे वह परमेश्वर के इरादों के अनुसार हो, ताकि वह अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ सके और शैतान के अंधकार के प्रभाव से आजाद हो सके और परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह उबर सके। केवल तभी मनुष्य ने पूर्ण उद्धारकारी अनुग्रह प्राप्त किया होगा। जिस समय यीशु अपना कार्य कर रहा था, तब भी उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान कल्पित और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा उसे दाऊद का वंशज माना और कहा कि वह एक महान नबी है, उदार प्रभु है जिसने मनुष्य को उसके पापों से छुटकारा दिलाया। कुछ लोग अपनी आस्था के बल पर उसके वस्त्र के किनारे को छूकर ही चंगे हो गए; अंधे देख सके, यहाँ तक कि मृतक जीवित किए जा सके। किंतु मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए शैतानी भ्रष्ट स्वभावों का पता लगाने में असमर्थ रहा, न ही वह यह जानता था कि उन्हें कैसे त्यागा जाए। मनुष्य ने बहुत अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति की आस्था से पूरे परिवार को आशीष मिलना, बीमारी से चंगाई, इत्यादि। शेष मनुष्य के अच्छे कर्म और उसका धर्मात्मा जैसा रूप था; यदि कोई इनके आधार पर जी सकता था तो उसे एक मानक स्तर का विश्वासी माना जाता था। केवल इसी तरह के विश्वासी मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ था कि उन्हें छुटकारा दिला दिया गया था। परंतु अपने जीवन-काल में इन लोगों ने जीवन के मार्ग को बिल्कुल नहीं समझा था। उन्होंने सिर्फ इतना किया कि अपना स्वभाव बदलने के किसी मार्ग को अपनाए बिना बस एक निरंतर चक्र में पाप किए और उन्हें स्वीकार कर लिया : अनुग्रह के युग में मनुष्य की स्थिति ऐसी थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया है? नहीं! इसलिए, उस चरण का कार्य पूरा हो जाने के बाद भी न्याय और ताड़ना का कार्य बाकी रह गया था। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध करने और इस प्रकार उसे अनुसरण हेतु एक मार्ग प्रदान करने के लिए है। यह चरण फलदायक या अर्थपूर्ण न होता, यदि यह दुष्टात्माओं को निकालने के साथ जारी रहता, क्योंकि यह मनुष्य की पापी प्रकृति को उतार फेंकने में असफल रहता और मनुष्य अपने पापों की क्षमा पर ही रुक जाता। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए गए हैं, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले ही समाप्त हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। किंतु मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर रहते हैं, मनुष्य अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है और परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर वचन का उपयोग करके मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करता है और उसे उचित मार्ग के अनुसार अभ्यास करने के लिए प्रेरित करता है। इस चरण का कार्य पिछले चरण से अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक फलदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन का पोषण करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया होने में सक्षम बनाता है; कार्य का यह चरण कहीं अधिक संपूर्ण है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूर्ण किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना का पूर्णतः समापन किया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 27

अंत के दिनों के कार्य में वचनों की शक्ति चिह्नों और चमत्कारों के प्रदर्शन की शक्ति से कहीं अधिक है और वचन का अधिकार चिह्नों और चमत्कारों के अधिकार से कहीं बढ़कर है। वचन मनुष्य के हृदय में गहरे दबे सभी भ्रष्ट स्वभावों को उजागर कर देता है। तुम्हारे पास उनका खुद एहसास करने का कोई उपाय नहीं है। जब उन्हें वचन के माध्यम से उजागर किया जाता है, तो तुम स्वाभाविक रूप से उनका एहसास कर लोगे; तुम्हें उन्हें स्वीकारना होगा और तुम पूरी तरह से आश्वस्त हो जाओगे। क्या यह वचन का अधिकार नहीं है? यह आज वचन के कार्य द्वारा प्राप्त किया जाने वाला परिणाम है। इसलिए, बीमारी की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने से मनुष्य को उसके पापों से पूरी तरह से नहीं बचाया जा सकता, न ही चिह्नों और चमत्कारों के प्रदर्शन से उसे पूरी तरह से पूर्ण किया जा सकता है। चंगाई करने और दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार मनुष्य को केवल अनुग्रह प्रदान करता है, किंतु मनुष्य की देह अभी भी शैतान की है और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव अभी भी मनुष्य के भीतर बने हुए हैं। दूसरे शब्दों में, जिस मनुष्य को शुद्ध नहीं किया गया है, वह अभी भी पाप और गंदगी का है। केवल वचन के माध्यम से शुद्ध किए जाने के बाद ही मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया और पावनीकृत किया जा सकता है। जब मनुष्य के भीतर से दुष्टात्माओं को निकाला गया और उसे छुटकारा दिलाया गया, तो इसका अर्थ केवल इतना था कि उसे शैतान के हाथ से छीनकर परमेश्वर को लौटा दिया गया है। किंतु मनुष्य अभी तक परमेश्वर द्वारा शुद्ध नहीं किया गया या बदला नहीं गया है और वह भ्रष्ट बना हुआ है। मनुष्य के भीतर अब भी गंदगी, प्रतिरोध और विद्रोहशीलता मौजूद है; मनुष्य केवल परमेश्वर के छुटकारे के माध्यम से ही उसके पास लौटा है, किंतु उसे परमेश्वर का जरा-सा भी ज्ञान नहीं है और वह अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने और उसके साथ विश्वासघात करने में सक्षम है। मनुष्य को छुटकारा दिलाए जाने से पहले उसके अंदर शैतान के बहुत-से जहर पहले ही डाल दिए गए थे और हजारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद उसके भीतर एक ऐसी प्रकृति है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। इसलिए जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया तो यह छुटकारे के मामले से बढ़कर कुछ नहीं था। यानी मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर वापस खरीदा गया, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति नहीं हटाई गई। मनुष्य, जो इतना गंदा है, को परमेश्वर की सेवा करने योग्य होने से पहले परिवर्तन से होकर गुजरना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह जान जाएगा और वह पूरी तरह बदल पाएगा और शुद्ध हो पाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने योग्य हो सकता है। सारा वर्तमान कार्य इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य को शुद्ध किया और बदला जा सके; ऐसा इसलिए है ताकि वचन के न्याय और ताड़ना के माध्यम से और शोधन के जरिये मनुष्य अपनी भ्रष्टता छोड़ सके और शुद्ध किया जा सके। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय के कार्य का चरण भी है और साथ ही उद्धार-कार्य का दूसरा चरण भी है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाता है, और वचन द्वारा शोधन, न्याय और उजागर किए जाने से ही मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताएँ, धारणाएँ, मंशाएँ और व्यक्तिगत आशाएँ पूरी तरह से प्रकट होती हैं। हालाँकि मनुष्य को छुटकारा दिलाया जा चुका है और उसके पाप क्षमा किए जा चुके हैं, फिर भी इसे केवल इस तरह समझा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता और उसके साथ उसके अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। लेकिन मनुष्य पाप से मुक्त हुए बिना देह में रहता है और केवल पाप करता रह सकता है और निरंतर अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करता रह सकता है। यही वह जीवन है जो मनुष्य जीता है, पाप करने और क्षमा किए जाने का एक अंतहीन चक्र। अधिकतर लोग दिन में पाप करते हैं और शाम को उन्हें स्वीकार करते हैं। और इसलिए, हालाँकि पाप-बलि मनुष्य के लिए हमेशा के लिए प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से नहीं बचा सकती। उद्धार का केवल आधा कार्य पूरा हुआ है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव हैं। उदाहरण के लिए, जब लोगों को पता चला कि वे मोआब के वंशज हैं तो उन्होंने शिकायत की, जीवन का अनुसरण करना छोड़ दिया और पूरी तरह से नकारात्मक हो गए। क्या यह इस बात को नहीं दर्शाता कि मनुष्य अभी भी परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन पूरी तरह समर्पण करने में असमर्थ है? क्या ठीक यही मनुष्य के शैतानी भ्रष्ट स्वभाव नहीं हैं? जब तुम्हें ताड़ना का भागी नहीं बनाया गया था, तो तुमने अपने हाथ बाकी सबके हाथों से ऊँचे उठाए थे, यहाँ तक कि यीशु के हाथों से भी ऊँचे। और तुमने ऊँची आवाज में पुकारा था : “परमेश्वर के प्रिय पुत्र बनो! परमेश्वर के अंतरंग बनो! हम मर जाएँगे, पर शैतान के आगे नहीं झुकेंगे! बूढ़े शैतान के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़े लाल अजगर के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़ा लाल अजगर सदा-सदा के लिए सत्ता से गिर जाए! परमेश्वर हमें पूर्ण करे!” तुमने बाकी सबसे ऊँचा पुकारा था। किंतु फिर ताड़ना का समय आया और एक बार फिर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए गए। तुम्हारी पुकार बंद हो गई और तुम अपना संकल्प खो बैठे। यही मनुष्य की भ्रष्टता है; यह एक ऐसी चीज है जो पाप से ज्यादा गहरी है, जो शैतान द्वारा रोपी जाती है और मनुष्य के भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए है। मनुष्य के लिए अपने पापों से अवगत होना आसान नहीं है और उसके पास अपनी गहरी जमी हुई प्रकृति को पहचानने का कोई उपाय नहीं है। यह परिणाम केवल वचनों के न्याय के जरिये प्राप्त किया जा सकता है। केवल इसी प्रकार मनुष्य इस बिंदु से आगे धीरे-धीरे बदल सकता है। मनुष्य अतीत में इस प्रकार इसलिए चिल्लाता था, क्योंकि मनुष्य को अपने अंतर्निहित भ्रष्ट स्वभावों की कोई समझ नहीं थी। मनुष्य के भीतर ये अशुद्धियाँ मौजूद हैं। न्याय और ताड़ना की एक लंबी अवधि के दौरान मनुष्य तनाव के माहौल में जिया। क्या यह सब वचन के माध्यम से प्राप्त नहीं किया गया? क्या सेवाकर्ताओं के परीक्षण से पहले तुमने भी बहुत ऊँची आवाज में नहीं पुकारा था? “हम राज्य में प्रवेश कर गए हैं! वे सभी जो इस नाम को स्वीकार करते हैं, राज्य में प्रवेश कर गए हैं! सभी परमेश्वर के अनुग्रह के साझेदार बन गए हैं!” जब सेवाकर्ताओं का परीक्षण आया, तो तुमने पुकारना बंद कर दिया। बिल्कुल शुरुआत में सभी ने पुकारा, “परमेश्वर! तुम मुझे जहाँ कहीँ भी रखो, मैं तुम्हारे आयोजनों के प्रति समर्पण करूँगा।” परमेश्वर के ये वचन पढ़कर, कि “मेरा पौलुस कौन बनेगा?” लोगों ने कहा, “मैं तैयार हूँ!” फिर उन्होंने इन वचनों को देखा, “अय्यूब की आस्था कैसी थी?” और कहा, “मैं अय्यूब जैसी आस्था रखने के लिए तैयार हूँ। परमेश्वर, कृपया मेरा परीक्षण करो!” जब सेवाकर्ताओं का परीक्षण आया, तो वे तुरंत ढह गए और फिर मुश्किल से ही खड़े हो सके। इसके बाद थोड़ी-थोड़ी करके मनुष्य के दिलों की अशुद्धियाँ धीरे-धीरे घट गईं। क्या यह वचन के माध्यम से हासिल नहीं किया गया? इसलिए, आज तुम लोगों ने जो कुछ अनुभव किया है, वे वचन के माध्यम से हासिल किए गए परिणाम हैं, जो यीशु द्वारा चिह्न और चमत्कार दिखाकर हासिल किए गए परिणामों से भी बड़े हैं। तुम परमेश्वर की जो महिमा और स्वयं परमेश्वर का जो अधिकार देखते हो, वे मात्र सलीब पर चढ़ने, बीमारी को चंगा करने और दुष्टात्माओं को बाहर निकालने के माध्यम से नहीं देखे जाते, बल्कि उनसे भी बढ़कर उसके वचन के न्याय के माध्यम से देखे जाते हैं। यह तुम्हें दर्शाता है कि परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य में केवल चिह्न दिखाना, बीमारी को चंगा करना और दुष्टात्माओं को बाहर निकालना ही शामिल नहीं है, बल्कि परमेश्वर के वचन का न्याय परमेश्वर के अधिकार का प्रतिनिधित्व करने और उसकी सर्वशक्तिमत्ता प्रकट करने में अधिक सक्षम है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 28

राज्य के युग में परमेश्वर नए युग की शुरुआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने और उस संपूर्ण युग का काम करने के लिए वचनों का उपयोग करता है। यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर वचन के युग में कार्य करता है। वह देहधारी हुआ है और विभिन्न दृष्टिकोणों से बोलता है, जिससे मनुष्य सचमुच परमेश्वर को देखे, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, और उसकी बुद्धि और चमत्कार को देखे। परमेश्वर इस तरह कार्य करता है ताकि लोगों को जीतने, लोगों को पूर्ण बनाने और लोगों को निकाल देने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल करे। वचन के युग में कार्य करने के लिए वचनों के उपयोग का यही वास्तविक अर्थ है। वचनों के द्वारा लोग परमेश्वर के कार्यों को, परमेश्वर के स्वभाव को, मनुष्य के सार के साथ ही यह जान पाते हैं कि मनुष्य को किसमें प्रवेश करना चाहिए। वचन के युग में परमेश्वर जो भी कार्य करना चाहता है, वह सारा वचनों के जरिए पूरा होता है। वचनों के माध्यम से लोगों को प्रकट किया और निकाला जाता है और उनका परीक्षण किया जाता है। लोगों ने इन वचनों को देखा है, इन वचनों को सुना है और इन वचनों के अस्तित्व को पहचाना है। इसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करने लगे हैं, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि के साथ ही साथ मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेममय और बचाने वाले हृदय पर विश्वास करने लगे हैं। यद्यपि “वचन” शब्द साधारण और सरल है, पर देहधारी परमेश्वर के मुख से निकले वचन ब्रह्माण्ड को झकझोरते हैं; लोगों के हृदय को रूपांतरित करते हैं, उनकी धारणाओं और पुराने स्वभावों को रूपांतरित करते हैं और समस्त संसार के पुराने स्वरूप में परिवर्तन लाते हैं। युगों-युगों में केवल आज का परमेश्वर इस प्रकार से कार्य करता है और केवल वही इस प्रकार से बोलता है और इस प्रकार मनुष्य को बचाता है। इसके बाद से मनुष्य परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में, उसके वचनों की चरवाही और आपूर्ति में जीवन जीता है; सभी लोग वचनों के संसार में जीते हैं, परमेश्वर के वचनों के अभिशापों और आशीषों के बीच जीते हैं और अधिकतर लोग परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना के अधीन जीते हैं। ये वचन और यह कार्य सब कुछ मनुष्य के उद्धार, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने और पुरानी सृष्टि के संसार के मूल स्वरूप को बदलने के लिए हैं। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि वचनों के उपयोग से की, वह समस्त ब्रह्माण्ड में मनुष्य की अगुवाई वचनों के द्वारा करता है, वह वचनों के द्वारा उन्हें जीतता और उनका उद्धार करता है और अंत में वह वचनों के उपयोग से समस्त पुरानी दुनिया का अंत कर देगा और इस प्रकार अपनी संपूर्ण प्रबंधन योजना पूरी करेगा। राज्य के युग के शुरू से अंत तक, परमेश्वर अपना कार्य करने और अपने कार्यों का परिणाम प्राप्त करने के लिए वचन का उपयोग करता है। वह कौतुक या चमत्कार नहीं करता, बल्कि अपना कार्य केवल वचनों के जरिए करता है। इन वचनों के कारण सभी लोग संपोषण और आपूर्ति पाते हैं और ज्ञान और वास्तविक अनुभव प्राप्त करते हैं। वचन के युग में मनुष्य ने वास्तव में अति विशेष आशीष पाई है। मनुष्य को शरीर में कोई कष्ट नहीं होता और वह बस परमेश्वर के वचन की भरपूर आपूर्ति का आनंद उठाता है; उसे आँख मूँदकर खोजने या भाग-दौड़ करने की आवश्यकता नहीं और अपनी निश्चिंतता के बीच वह परमेश्वर के प्रकटन को निहारता है, उसे उसके मुख से बातें करते हुए सुनता है, वह प्राप्त करता है जो परमेश्वर आपूर्ति करता है, और उसे व्यक्तिगत रूप से अपना काम करते हुए देखता है। बीते युगों में मनुष्य को इन सब बातों का आनंद प्राप्त नहीं था और वे इन आशीषों को कभी प्राप्त नहीं कर सकते थे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 29

मनुष्यजाति, जो शैतान के द्वारा अत्यधिक भ्रष्ट कर दी गई है, नहीं जानती कि एक परमेश्वर भी है और इसने परमेश्वर की आराधना करनी बंद कर दी है। आरम्भ में, जब आदम और हव्वा को रचा गया था, तो यहोवा की महिमा और गवाही सर्वदा उपस्थित थी। परन्तु भ्रष्ट होने के पश्चात, मनुष्य ने उस महिमा और गवाही को खो दिया, क्योंकि हर किसी ने परमेश्वर से विद्रोह कर उसका भय मानना पूर्णतया बन्द कर दिया। आज की विजय का कार्य उस सम्पूर्ण गवाही और उस सम्पूर्ण महिमा को पुनः प्राप्त करने और सभी लोगों से परमेश्वर की आराधना करवाने के लिए है, ताकि सृजित प्राणियों के बीच गवाही हो; कार्य के इस चरण के दौरान यही किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्यजाति किस प्रकार जीती जानी है? मनुष्य को सम्पूर्ण रीति से कायल करने के लिए इस चरण के वचनों के कार्य का प्रयोग करके; उसे पूरी तरह यकीन दिलाने के लिए प्रकाशन, न्याय, ताड़ना और निर्मम शाप का प्रयोग करके; मनुष्य के विद्रोहीपन को उजागर करके और उसके विरोध का न्याय करके, ताकि वह मानवजाति की अधार्मिकता और मलिनता को जान सके और इस तरह इनका प्रयोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की विषमता के रूप में कर सके। मुख्यतः, मनुष्य को इन्हीं वचनों से जीता और पूर्णतः कायल किया जाता है। वचन मनुष्यजाति पर अंतिम रूप से विजय करने के साधन हैं और वे सभी जो परमेश्वर की विजय को स्वीकार करते हैं, उन्हें उसके वचनों के प्रहार और न्याय को भी स्वीकार करना चाहिए। बोलने की वर्तमान प्रक्रिया, जीतने की ही प्रक्रिया है। और लोगों को किस प्रकार सहयोग देना चाहिए? यह जानकर कि इन वचनों को कैसे खाना-पीना है और उनकी समझ हासिल करके। जहाँ तक यह बात है कि लोगों पर विजय कैसे पाई जाती है, इसे इंसान खुद नहीं कर सकता। तुम सिर्फ इतना कर सकते हो कि इन वचनों को खाने और पीने के द्वारा, अपनी भ्रष्टता और अशुद्धता, अपने विद्रोहीपन और अपनी अधार्मिकता को जानकर, परमेश्वर के समक्ष दण्डवत हो सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के इरादों को समझने के बाद अभ्यास कर लेते हो और अगर तुम्हारे पास दर्शन हों, और इन वचनों के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो सकते हो, और अपने मन से कोई चुनाव नहीं करते हो, तब तुम जीत लिए जाओगे और यह उन वचनों का नतीजा रहा होगा। मनुष्यजाति ने साक्ष्य क्यों खो दिया? क्योंकि किसी की भी परमेश्वर में आस्था नहीं है, क्योंकि लोगों के हृदयों में परमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है। मनुष्यजाति की विजय लोगों की आस्था की बहाली है। लोग हमेशा अंधाधुंध लौकिक संसार की ओर भागना चाहते हैं, वे अनेक आशाएँ रखते हैं, अपने भविष्य के लिए बहुत अधिक चाहते हैं और उनकी अनेक अनावश्यक मांगें हैं। वे हमेशा अपने शरीर के विषय में सोचते, शरीर के लिए योजनाएं बनाते रहते हैं, उनकी रुचि कभी भी परमेश्वर में विश्वास रखने के मार्ग की खोज में नहीं होती। उनके हृदय को शैतान ने छीन लिया है, उन्होंने परमेश्वर का भय मानने वाला अपना दिल खो दिया है और उनका हृदय शैतान पर ही केंद्रित रहता है। परन्तु मनुष्य की सृष्टि परमेश्वर द्वारा की गई थी। इसलिए मनुष्य वह गवाही खो चुका है; यानी वह परमेश्वर की महिमा को खो चुका है। मनुष्य को जीतने का उद्देश्य परमेश्वर के लिए मनुष्य के भय की महिमा को पुनः प्राप्त करना है। इसे इस प्रकार कहा जा सकता है : ऐसे अनेक लोग हैं जो जीवन का अनुसरण नहीं करते; यदि अनुसरण करने वाले कुछ हैं भी, तो उनकी संख्या को उँगलियों पर गिना जा सकता है। लोग सबसे ज्यादा अपने भविष्य के बारे में चिंतित रहते हैं और जीवन की ओर जरा-सा भी ध्यान नहीं देते। कुछ लोग परमेश्वर से विद्रोह और उसका विरोध करते हैं, उसकी पीठ पीछे उस पर दोष लगाते हैं और सत्य का अभ्यास नहीं करते। इन लोगों को फिलहाल अनदेखा कर दिया गया है; फिलहाल विद्रोह के इन पुत्रों का कुछ नहीं किया जाता है, लेकिन भविष्य में तुम विलाप करते और दाँत पीसते हुए अंधकार में रहोगे। जब तुम ज्योति में रह रहे होते हो तो उसके बहुमूल्य होने का अनुभव नहीं करते, परंतु जब तुम अंधेरी रात में रहने लगोगे, तब तुम इसकी बहुमूल्यता को जान जाओगे। तब तुम्हें अफसोस होगा। अभी तुम्हें अच्छा लगता है, परन्तु वह दिन आएगा जब तुम्हें अफसोस होगा। जब वह दिन आएगा और अंधकार नीचे उतरेगा और रोशनी फिर कभी नहीं होगी, तब इतनी देर हो चुकी होगी कि तुम्हारा अफसोस करना बेकार होगा। क्योंकि तुम अभी भी आज के कार्य को नहीं समझते हो, इसलिए अभी तुम्हारे पास जो समय है, उसे सँजोने में असफल हो। एक बार जब संपूर्ण ब्रह्मांड का कार्य आरंभ हो जाएगा अर्थात ये वचन जो मैं आज बोल रहा हूँ, साकार हो चुके होंगे, तो बहुत-से लोग अपने सिर पकड़कर दुःख के आँसू बहाएँगे। ऐसा करते समय, क्या वे रोते और दाँत पीसते हुए अंधकार में नहीं गिर चुके होंगे? जो लोग वास्तव में जीवन का अनुसरण करते हैं और जिन्हें पूर्ण किया गया है, उनका उपयोग किया जा सकता है, जबकि विद्रोह के समस्त पुत्र, जो उपयोग किए जाने के लिए अनुपयुक्त हैं, अंधकार में गिरेंगे। वे पवित्र आत्मा के कार्य से पूरी तरह वंचित होंगे, कुछ भी समझने में असमर्थ होंगे। इसलिए, वे दंड में फँस जाएँगे और रोएँगे। कार्य के इस चरण में यदि तुम अच्छी तरह से सज्जित हो और तुम जीवन में विकसित हो चुके हो, तब तुम उपयोग किए जाने के उपयुक्त हो। यदि तुम अच्छी तरह से सज्जित नहीं हो, तब अगर तुम्हें कार्य के अगले चरण के लिए बुलाया भी गया है, तो भी इस मुकाम पर इस्तेमाल के लिए अनुपयुक्त ही रहोगे, यदि तुम स्वयं को तैयार करना भी चाहोगे, तो भी तुम्हें दूसरा अवसर नहीं मिलेगा। जब परमेश्वर जा चुका होगा, तब तुम इस प्रकार का अवसर कहाँ प्राप्त कर पाओगे, जो परमेश्वर ने अभी तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत किया है? तब तुम वह प्रशिक्षण कहाँ प्राप्त कर पाओगे, जो परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध करवाया गया है? उस समय तक, परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से बात नहीं कर रहा होगा और न ही अपनी वाणी बोल रहा होगा; तुम मात्र वही चीजें पढ़ रहे होगे जो आज बोली जा रही हैं—तो फिर सरलता से समझ कैसे मिलेगी? भविष्य का जीवन किस प्रकार आज के जीवन के बराबर बन पाएगा? उस समय, तुम रोते और दाँत पीसते रह जाओगे, क्या यह पीड़ा में जीना नहीं होगा? अभी तुम्हें आशीष प्रदान किए जा रहे हैं; लेकिन तुम उनका आनंद उठाना नहीं जानते; तुम आशीष में जीवनयापन कर रहे हो; फिर भी तुम अनजान हो। यह प्रमाणित करता है कि तुम पीड़ा उठाने के लिए अभिशप्त हो! आज कुछ लोग विरोध करते हैं, कुछ विद्रोह करते हैं, और कुछ यह या वह करते हैं, मैं बस इसे अनदेखा करता हूँ—लेकिन यह मत सोचना कि मैं तुम सबके कार्यों से अनभिज्ञ हूँ। क्या मैं तुम सबके सार को नहीं समझता? तुम हमेशा मेरे खिलाफ क्यों खड़े रहते हो? क्या तुम अपने हित की खातिर जीवन और आशीष की खोज के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते? तुम्हारे अंदर आस्था का होना क्या तुम्हारे अपने हित में नहीं है? फिलहाल मैं केवल बोलकर विजय का कार्य कर रहा हूँ और जब विजय का यह कार्य पूरा हो जाएगा, तो तुम्हारे परिणाम का खुलासा हो जाएगा। क्या मुझे और स्पष्ट रूप से बताने की आवश्यकता है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 30

आज के विजय के कार्य का अभिप्राय यह खुलासा करना है कि मनुष्य का परिणाम क्या होगा। ऐसा क्यों कहा जाता है कि आज की ताड़ना और न्याय, अंत के दिनों के महान श्वेत सिंहासन के सामने का न्याय है? क्या तुम यह नहीं देखते हो? विजय का कार्य अन्तिम चरण क्यों है? क्या यह इस बात का खुलासा करने के लिए नहीं है कि मनुष्य के प्रत्येक वर्ग का परिणाम कैसा होगा? क्या यह प्रत्येक व्यक्ति को ताड़ना और न्याय के विजय कार्य के दौरान उसका असली स्वरूप दिखाने और फिर उसके प्रकार के अनुसार छाँटने के लिए नहीं है? यह कहने के बजाय कि यह मनुष्यजाति को जीतना है, यह कहना बेहतर होगा कि यह इस बात खुलासा करना है कि व्यक्ति के प्रत्येक वर्ग का परिणाम किस प्रकार का होगा। यह लोगों के पापों का न्याय करने और फिर लोगों के विभिन्न वर्गों को उजागर करने और इस प्रकार यह निर्णय करने के बारे में है कि वे दुष्ट हैं या धार्मिक। विजय-कार्य के पश्चात अच्छे को पुरस्कृत करने और बुरे को दंड देने का कार्य आता है। जो लोग पूर्णतः समर्पण करते हैं अर्थात जो पूर्ण रूप से विजय कर लिए गए हैं, उन्हें सम्पूर्ण कायनात में परमेश्वर के कार्य को फैलाने के अगले चरण में रखा जाएगा; जिन्हें विजय नहीं किया गया उनको अंधकार में रखा जाएगा और उन पर महाविपत्ति आएगी। इस प्रकार लोगों को अपनी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा, बुरों को बुरों की जमात में रखा जाएगा और उन्हें फिर कभी सूर्य का प्रकाश नसीब नहीं होगा और धार्मिकों को रोशनी प्राप्त करने और सर्वदा रोशनी में रहने के लिए अच्छे लोगों के साथ रखा जाएगा। सभी चीजों के परिणाम निकट हैं और लोगों के परिणाम साफ तौर पर उनकी आँखों के सामने दिखा दिए गए हैं। सभी चीजों को उनकी अपनी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा, तो फिर लोग प्रत्येक व्यक्ति को उसकी अपनी किस्म के अनुसार छाँटे जाने की पीड़ा से किस प्रकार बच सकते हैं? जब सभी चीजों के परिणाम निकट होते हैं, तब प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति के परिणामों का खुलासा किया जाता है और यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड (इसमें समस्त विजय-कार्य सम्मिलित है, जो वर्तमान कार्य से आरम्भ होता है) के विजय-कार्य के दौरान किया जाता है। सभी लोगों के परिणामों का खुलासा, न्याय के सिंहासन के सामने, ताड़ना के दौरान और अंत के दिनों के विजय-कार्य के दौरान किया जाता है। लोगों को उनकी अपनी किस्म के अनुसार छाँटना, उन्हें उनके मूल वर्ग में लौटाना नहीं है, क्योंकि संसार की रचना के समय जब मनुष्य को बनाया गया था, तब एक ही किस्म के मनुष्य थे, केवल पुरुष और स्त्री का विभाजन था। उस समय विभिन्न प्रकार के वर्ग नहीं थे। यह तो हजारों वर्षों की भ्रष्टता के पश्चात ही हुआ कि मनुष्य के अनेक वर्ग उत्पन्न हुए, जिनमें कुछ अशुद्ध आत्माओं की सत्ता के अंतर्गत हैं, कुछ दुष्ट दानवों की सत्ता के अंतर्गत हैं और कुछ ऐसे हैं जो जीवन के मार्ग का अनुसरण करते हैं और सर्वशक्तिमान के प्रभुत्व के अधीन हैं। इसी रीति से धीरे-धीरे लोगों के वर्ग अस्तित्व में आते हैं और इसी तरह लोग मनुष्य के विस्तृत परिवारों में से वर्गों में विभाजित होते हैं। समस्त लोगों के “पिता” भिन्न हो गए हैं; ऐसा नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति पूर्णतः सर्वशक्तिमान के प्रभुत्व के अधीन आता है, क्योंकि इंसान बहुत ही विद्रोही है। धार्मिक न्याय प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति के सच्चे रूप को उजागर करता है और कुछ भी छिपा नहीं रहने देता। प्रकाश में प्रत्येक व्यक्ति अपना वास्तविक चेहरा दिखाता है। इस बिंदु पर मनुष्य अब वैसा नहीं रहा जैसा वह आरंभ में था और उसके पूर्वजों की मूल समानता बहुत पहले ही लुप्त हो चुकी है, क्योंकि आदम और हव्वा के अनगिनत वंशज बहुत पहले से शैतान द्वारा बंदी बना लिए गए हैं, ताकि वे फिर कभी स्वर्गिक सूर्य को न देख सकें और क्योंकि लोग शैतान के हर प्रकार के विष से भर दिए गए हैं। इसीलिए, लोगों के लिए उनकी उपयुक्त मंजिलें हैं। इसके अलावा, उनके विभिन्न प्रकार के विषों के आधार पर उन्हें उनकी किस्मों में छाँटा जाता है, अर्थात आज उन्हें जिस हद तक जीता गया है उसके अनुसार अलग-अलग किया जाता है। मनुष्य का परिणाम संसार की सृष्टि के समय से ही पूर्वनियत नहीं किया गया था। क्योंकि आरंभ में मात्र एक ही वर्ग था, जिसे सामूहिक रूप से “मनुष्यजाति” पुकारा जाता था और मनुष्य को पहले शैतान के द्वारा भ्रष्ट नहीं किया गया था, सभी लोग परमेश्वर के प्रकाश में जीवनयापन करते थे और उन पर किसी भी प्रकार का अंधकार नहीं था। परन्तु बाद में जब मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया, तो सभी प्रकार और किस्म के लोग सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैल गए—सभी प्रकार और किस्म के लोग, जो उस परिवार से आए थे, जिसे सामूहिक रूप से “मनुष्यजाति” कहा जाता था, जो पुरुष और स्त्री से बनी थी। अपने सबसे पुराने पूर्वजों—एक पुरुष और एक स्त्री से बनी मानवजाति (अर्थात आरंभ में आदम और हव्वा, जो उनके सबसे पुराने पूर्वज थे) से अलग होने के लिए उन सभी का मार्गदर्शन उनके पूर्वजों के द्वारा किया गया था। उस समय, इस्राएली वे एकमात्र लोग थे, जिनका पृथ्वी पर जीवनयापन के लिए यहोवा के द्वारा मार्गदर्शन किया जा रहा था। विभिन्न प्रकार के लोग जो सम्पूर्ण इस्राएल (अर्थात मूल पारिवारिक कुल से) से अस्तित्व में आए थे, उन्होंने बाद में यहोवा की अगुआई को खो दिया। ये आरम्भिक लोग, जो मानव संसार के मामलों से पूरी तरह से अनभिज्ञ थे, वे उन क्षेत्रों में रहने के लिए अपने पूर्वजों के साथ हो लिए, जिन क्षेत्रों पर उन्होंने अधिकार किया था और आज तक ऐसा ही चला आ रहा है। इस तरह, वे आज भी अनजान हैं कि वे यहोवा से कैसे अलग हो गए और कैसे आज तक सभी प्रकार की अशुद्ध आत्माओं और दुष्टात्माओं के द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं। जो अब तक अत्यधिक गहन रूप से भ्रष्ट और विष से भरे हुए हैं—जिन्हें अंततः बचाया नहीं जा सकता—उनके पास अपने पूर्वजों, अशुद्ध आत्माओं, जिन्होंने उन्हें भ्रष्ट किया, उनके साथ जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा। वे लोग जिन्हें अंततः बचाया जा सकता है, वे मनुष्यजाति की उपयुक्त मंजिल पर पहुँच जाएँगे, अर्थात उस परिणाम पर, जिसे बचाए गए और जीते गए लोगों के लिए संरक्षित रखा गया है। उन सभी को बचाने के लिए सब कुछ किया जाएगा, जिन्हें बचाया जा सकता है—परंतु उन लोगों के लिए जो इस कदर सुन्न हैं कि उनका कोई इलाज ही नहीं है, उनके पास अपने पूर्वजों के पीछे-पीछे ताड़ना के अथाह कुंड में जाना ही एकमात्र विकल्प होगा। यह मत सोचो कि तुम्हारा परिणाम, आरंभ में ही पूर्वनियत कर दिया गया था और केवल इसका खुलासा अब किया गया है। यदि तुम ऐसा सोचते हो, तब क्या तुम भूल गए हो कि मनुष्य की आरंभिक रचना के दौरान, मनुष्य के किसी भी अलग शैतानी वर्ग की रचना नहीं की गई थी, आदम और हव्वा से बनी मात्र एक मनुष्यजाति (अर्थात मात्र पुरुष और स्त्री) को रचा गया था? मान लिया जाए कि आरंभ में तुम ही शैतान के वंशज होते, तो क्या यहोवा ने मनुष्य की अपनी रचना में एक शैतानी वर्ग को भी सम्मिलित कर लिया होता? क्या उसने ऐसा कुछ किया होता? उसने मनुष्य को अपनी गवाही के लिए बनाया था; उसने मनुष्य को अपनी महिमा के लिए रचा था। क्या वह जानबूझकर शैतान की संतान के ऐसे एक वर्ग की सृष्टि करता जो जानबूझकर उसका प्रतिरोध करे? यहोवा ऐसा कैसे कर सकता था? यदि उसने ऐसा किया होता तो कौन कहता कि वह धार्मिक परमेश्वर है? आज जब मैं यह बात कहता हूँ कि तुम सब में से कुछ लोग अंत में शैतान को दे दिए जाओगे, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम आरम्भ से ही शैतान के थे; बल्कि इसका अर्थ यह है कि तुम इतना गिर चुके हो कि यदि परमेश्वर ने तुम्हें बचाने का प्रयास किया भी है, तब भी तुम वह उद्धार पाने में असफल हो गए हो। तुम्हें शैतान के साथ वर्गीकृत करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। ऐसा केवल इसलिए है कि तुम उद्धार से परे हो; इसका कारण यह नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे प्रति अधार्मिक है और उसने जान-बूझकर तुम्हें शैतान का एक प्रतिरूप बनने के लिए पूर्वनियत किया है, फिर तुम्हें शैतान को सौंप देता है और जान-बूझकर चाहता है कि तुम्हें कष्ट पहुँचे। यह विजय के कार्य की वास्तविक कहानी नहीं है। यदि तुम ऐसा मानते हो तो तुम्हारी समझ बहुत ही एक पक्षीय है! अन्तिम चरण की विजय पाने का उद्देश्य लोगों को बचाना और साथ ही उनके परिणामों को प्रकट करना है। यह न्याय के द्वारा लोगों की पतित अवस्था को उजागर करना है और इस प्रकार उनसे पश्चात्ताप करवाना, उन्हें उठ खड़े होने के लिए प्रेरित करना और जीवन और जीवन के सही मार्ग का अनुसरण करवाना है। यह सुन्न और मन्दबुद्धि लोगों के हृदयों को जगाना और न्याय के द्वारा मनुष्य की भीतरी विद्रोहशीलता को प्रकट करना है। परंतु यदि लोग अभी भी पश्चात्ताप करने में असमर्थ हैं, अभी भी मानव जीवन में सही मार्ग का अनुसरण करने में असमर्थ हैं और अभी भी अपनी इन भ्रष्टताओं को उतार फेंकने में असमर्थ हैं, तो वे शैतान द्वारा निगल लिए जाने की वस्तुएँ बन जाएँगे, जो कि उद्धार से परे हैं। विजय-कार्य की महत्ता ऐसी है : लोगों को बचाना और साथ ही उनके परिणाम भी प्रकट करना। अच्छे परिणाम, बुरे परिणाम—वे सभी विजय-कार्य के द्वारा प्रकट किए जाते हैं। लोग बचाए जाएँगे या शापित होंगे, यह सब विजय-कार्य के दौरान प्रकट किया जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 31

अंत के दिन वे हैं जब सभी वस्तुएँ विजय के जरिए अपनी किस्म के अनुसार छाँटी जाएँगी। विजय, अंत के दिनों का कार्य है; दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति के पापों का न्याय करना, अंत के दिनों का कार्य है। अन्यथा, लोगों की छँटाई उनकी किस्म के अनुसार कैसे की जा सकेगी? तुम लोगों के बीच किस्म के अनुसार की जाने वाली छँटाई का कार्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ऐसे कार्य का आरंभ है। इसके पश्चात सभी देशों के लोगों और तमाम लोगों को भी विजय-कार्य को स्वीकार करना होगा। इसका अर्थ यह है कि सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति की अपनी किस्म के अनुसार छँटाई होगी और उसे न्याय के लिए न्याय के सिंहासन के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा। कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु इस ताड़ना और न्याय को सहने से बच नहीं सकती और न ही कोई व्यक्ति और वस्तु ऐसी है जिसकी किस्म के अनुसार छँटाई नहीं की जाती; प्रत्येक व्यक्ति की छँटाई की जाएगी, क्योंकि सभी चीजों के परिणाम निकट आ रहे हैं और समस्त स्वर्ग और पृथ्वी अपने अंत तक पहुँच गए हैं। मनुष्य उस दिन से कैसे बचेगा जिस दिन मानवीय अस्तित्व का अंत होगा? और इस प्रकार, तुम सब और कितनी देर तक अपने विद्रोही कार्य जारी रख सकते हो? क्या तुम लोगों का अंतिम दिन अभी ठीक तुम्हारे सामने नहीं है? वे जो परमेश्वर का भय मानते हैं और उसके प्रकट होने के लिए तरसते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता के प्रकटन के दिन को कैसे नहीं देख सकते? वे नेकी के लिए अन्तिम पुरस्कार कैसे नहीं प्राप्त कर सकते? क्या तुम वह व्यक्ति हो, जो भला करता है या वह जो बुरा करता है? क्या तुम वह हो जो धार्मिक न्याय को स्वीकार करता है और फिर समर्पण करता है या तुम वह हो जो धार्मिक न्याय को स्वीकार करता है फिर शापित किया जाता है? क्या तुम रोशनी में न्याय के सिंहासन के समक्ष जीते हो या तुम अंधकार के बीच रसातल में जीते हो? क्या तुम्हीं सबसे साफ तौर पर नहीं जानते हो कि तुम्हारा परिणाम बस पुरस्कार पाने का होगा या दंड का? क्या तुम सबसे साफ तौर पर नहीं जानते और गहराई से नहीं समझते हो कि परमेश्वर धार्मिक है? तो तुम्हारा आचरण और तुम्हारा हृदय किस प्रकार का है? आज जब मैं तुम्हें जीतता हूँ, तो क्या मुझे तुम्हें वास्तव में यह बताने की आवश्यकता है कि तुम्हारा आचरण भला है या बुरा? तुमने मेरे लिए कितना त्याग किया है? तुम मेरी आराधना कितनी गहराई से करते हो? क्या तुम स्वयं सबसे स्पष्ट नहीं जानते कि तुम मेरे प्रति कैसा व्यवहार करते हो? किसी और से ज्यादा खुद तुम्हें अच्छी तरह ज्ञात होना चाहिए कि तुम्हारा परिणाम भला क्या होगा! मैं तुम्हें सच कहता हूँ : मैंने केवल मनुष्यजाति को सृजित किया है और मैंने तुम्हें सृजित किया है; परंतु मैंने तुम लोगों को शैतान के हाथों में नहीं दिया और न ही मैंने जान-बूझकर तुम लोगों से अपने खिलाफ विद्रोह करवाया या तुम लोगों से अपना प्रतिरोध करवाया और इस प्रकार तुम्हें दंडित किया। क्या तुम्हें मिलने वाली ये सारी विपत्तियाँ इसलिए नहीं हैं कि तुम लोगों के हृदय बहुत कठोर हैं और तुम लोगों का आचरण बहुत घिनौना है? तो क्या जो परिणाम तुम्हें मिलेगा, वह भी तुम स्वयं निर्धारित करने में सक्षम नहीं हो? क्या तुम अपने हृदय में किसी से भी बेहतर नहीं जानते कि तुम्हारा परिणाम क्या होगा? मैं लोगों को इसलिए जीतता हूँ, क्योंकि मैं उन्हें प्रकट करना और बेहतर ढंग से तुम्हारा उद्धार करना चाहता हूँ। यह तुम से बुरा करवाने या जानबूझकर तुम्हें विनाश के नरक में ले जाने के लिए नहीं है। समय आने पर, तुम्हारी बड़ी पीड़ाएँ, तुम्हारा रोना और दाँत पीसना—क्या यह सब तुम्हारे पापों के कारण नहीं होगा? इस प्रकार, क्या तुम्हारी अपनी भलाई या तुम्हारी अपनी बुराई ही तुम्हारा सर्वोत्तम न्याय नहीं है? क्या यह उसका प्रमाण नहीं है जो सबसे अच्छी तरह खुलासा कर सकता है कि तुम्हारा परिणाम क्या होगा?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 32

अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर मुख्य रूप से अपने वचन बोलने आया है। वह पवित्रात्मा के दृष्टिकोण से, मनुष्य के दृष्टिकोण से, और तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से बोलता है; वह एक समयावधि के लिए एक तरीके का प्रयोग करते हुए, भिन्न-भिन्न तरीकों से बोलता है, और वह बोलने के इन तरीकों का उपयोग मनुष्य की धारणाओं को बदलने और मनुष्य के हृदय से अज्ञात परमेश्वर की छवि हटाने के लिए करता है। यही परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला मुख्य कार्य है। चूँकि मनुष्य मानता है कि जब परमेश्वर आएगा, तो वह बीमारों को चंगा करेगा, दुष्टात्माओं को निकालेगा, चमत्कार दिखाएगा और मनुष्य को भौतिक आशीष प्रदान करेगा, इसलिए परमेश्वर कार्य का—ताड़ना और न्याय के कार्य का—यह चरण पूरा करता है, ताकि मनुष्य की धारणाओं में मौजूद ऐसी बातों को निकाल सके, मनुष्य को परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता को जानने दे सके, मनुष्य के दिल से यीशु की मौजूदा छवि को हटाया जा सके और उसके स्थान पर परमेश्वर की नई छवि स्थापित की जा सके। एक बार जब मनुष्यों के दिलों में मौजूद परमेश्वर की छवि पुरानी पड़ जाती है, तब वह एक मूर्ति बन जाती है। जब यीशु आया और उसने कार्य का वह चरण पूरा किया, तब वह परमेश्वर की संपूर्णता का प्रतिनिधित्व नहीं करता था। उसने कुछ चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित किए, कुछ वचन बोले, और अंततः सलीब पर चढ़ा दिया गया। उसने परमेश्वर के एक भाग का प्रतिनिधित्व किया। वह परमेश्वर के समग्र रूप का प्रतिनिधित्व नहीं कर सका, बल्कि उसने परमेश्वर के कार्य के एक भाग को करने में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर बहुत महान, बहुत अद्भुत और अथाह है, और वह प्रत्येक युग में अपने कार्य का बस एक भाग ही करता है। इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के लिए जीवन के वचनों का पोषण देना; मनुष्य के प्रकृति सार और भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करना; और उसकी धर्म संबंधी धारणाओं, सामंती सोच, पुरानी पड़ चुकी सोच और ज्ञान और संस्कृति को मिटाना है। ये सभी चीजें परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर किए जाने के माध्यम से शुद्ध की जानी चाहिए। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों का नहीं, वचनों का उपयोग करता है। वह मनुष्य को प्रकट करने, उसका न्याय करने, उसे ताड़ना देने और उसे पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और मनोहरता देखने लगे, और परमेश्वर के स्वभाव को समझने लगे, और ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर के कर्मों को निहारे। व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा अपने वचनों से मूसा को मिस्र से बाहर ले गया, और उसने इस्राएलियों को कुछ वचन बोले; उस समय, परमेश्वर के कर्मों का अंश प्रकट किया गया था, परंतु चूँकि मनुष्य की काबिलियत सीमित थी और कोई भी चीज उसके ज्ञान को पूर्ण नहीं बना सकती थी, इसलिए परमेश्वर बोलता और कार्य करता रहा। अनुग्रह के युग में मनुष्य ने एक बार फिर परमेश्वर के कर्मों का अंश देखा। यीशु चिह्न और चमत्कार दिखा पाया, बीमारों को चंगा कर पाया और दुष्टात्माओं को निकाल पाया, और सलीब पर चढ़ पाया, जिसके तीन दिन बाद वह पुनर्जीवित हुआ और देह में मनुष्य के सामने प्रकट हुआ। परमेश्वर के बारे में मनुष्य इससे अधिक कुछ नहीं जानता। मनुष्य उतना ही जानता है, जितना परमेश्वर उस पर प्रकट करता है, और यदि परमेश्वर मनुष्य पर और अधिक न प्रकट करे, तो यह परमेश्वर के बारे में मनुष्य के परिसीमन की सीमा होगी। इसलिए परमेश्वर कार्य करता रहता है, ताकि उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान अधिक गहरा हो सके और वह धीरे-धीरे परमेश्वर के सार को जान जाए। अंत के दिनों में, परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए अपने वचनों का उपयोग करता है। परमेश्वर के वचनों द्वारा तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव उजागर किया जाता है, और तुम्हारी धर्म संबंधी धारणाओं को परमेश्वर की व्यावहारिकता से बदल दिया जाता है। अंत के दिनों में परमेश्वर मुख्य रूप से इन वचनों को पूरा करने के लिए देहधारी हुआ है, “वचन देह बन जाता है, वचन देह में आता है, और वचन देह में प्रकट होता है”, और यदि तुम्हें इसका पूरा ज्ञान नहीं है, तो तुम दृढ़ता से खड़े नहीं रह पाओगे। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर की मंशा मुख्य रूप से कार्य के उस चरण को पूरा करने की है, जिसमें वचन देह में प्रकट होता है, और यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना के कार्य का एक भाग है। इसलिए तुम लोगों का ज्ञान पूरा होना चाहिए; परमेश्वर चाहे जैसे कार्य करे, किंतु वह मनुष्य को अपनी सीमा निर्धारित नहीं करने देता। यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान यह कार्य न करता, तो उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान इससे आगे न जा पाता। तुम्हें बस इतना पता होगा कि परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया जा सकता है और वह सदोम को नष्ट कर सकता है, और यीशु मृतकों में से जी उठ सकता है और पतरस के सामने प्रकट हो सकता है...। परंतु तुम यह कभी नहीं कहोगे कि परमेश्वर के वचन सब कुछ संपन्न कर सकते हैं और मनुष्य को जीत सकते हैं। केवल परमेश्वर के वचनों का अनुभव करके ही तुम ऐसी ज्ञान की बातें बोल सकते हो। जितना अधिक तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव करोगे, उसके बारे में तुम्हारा ज्ञान उतना ही अधिक विस्तृत हो जाएगा और केवल तभी तुम परमेश्वर को अपनी धारणाओं में सीमित नहीं करोगे। मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करके ही उसे जानता है; परमेश्वर को जानने का कोई और सही मार्ग नहीं है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 33

कार्य के इस अंतिम चरण में परिणाम वचन के माध्यम से प्राप्त किए जाते हैं। वचन के माध्यम से मनुष्य अनेक रहस्यों और पिछली पीढ़ियों के दौरान किए गए परमेश्वर के कार्य को समझ जाता है; वचन के माध्यम से मनुष्य पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है; वचन के माध्यम से मनुष्य पिछली पीढ़ियों के द्वारा कभी न सुलझाए गए रहस्यों को, और साथ ही अतीत के समयों के नबियों और प्रेरितों के कार्य को और उनके कार्य करने के सिद्धांतों को समझ जाता है; वचन के माध्यम से मनुष्य स्वयं परमेश्वर के स्वभाव को भी समझ जाता है, वह मनुष्य की विद्रोहशीलता और प्रतिरोध को जान जाता है और वह अपने सार को भी जान जाता है। कार्य के इन चरणों और बोले गए सभी वचनों के माध्यम से मनुष्य आत्मा के कार्य को, देहधारी परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य को, और इससे भी बढ़कर, उसके संपूर्ण स्वभाव को जान जाता है। छह हजार वर्ष भर के परमेश्वर के प्रबंधन कार्य का तुम्हारा ज्ञान भी वचन के माध्यम से ही प्राप्त किया गया। क्या तुम्हारी पुरानी धारणाओं का ज्ञान और उन्हें अलग रखने में तुम्हारी सफलता भी वचन के माध्यम से प्राप्त नहीं की गई? पिछले चरण में यीशु ने चिह्न और चमत्कार दिखाए थे, किंतु इस चरण में कोई चिह्न और चमत्कार नहीं है। क्या तुम्हारी यह समझ भी, कि परमेश्वर चिह्न और चमत्कार क्यों नहीं दिखाता, वचन के माध्यम से ही प्राप्त नहीं की गई? इसलिए, इस चरण में बोले गए वचन पिछली पीढ़ियों के प्रेरितों और नबियों द्वारा किए गए कार्यों से बढ़कर हैं। यहाँ तक कि नबियों द्वारा की गई भविष्यवाणियाँ भी ऐसा परिणाम प्राप्त नहीं कर सकती थीं। नबियों ने केवल भविष्यवाणियाँ की थीं, उन्होंने यह कहा था कि भविष्य में क्या होगा, किंतु उस कार्य के बारे में नहीं कहा था जिसे परमेश्वर उस समय करना चाहता था। न ही उन्होंने मनुष्यों के जीवन में उनका मार्गदर्शन करने के लिए या उन्हें सत्य प्रदान करने के लिए या उन पर रहस्य प्रकट करने के लिए बोला था, और उन्हें जीवन प्रदान करने के लिए तो बिल्कुल भी नहीं बोला था। इस चरण में बोले गए वचनों में भविष्यवाणी और सत्य है, किंतु वे मुख्य रूप से मनुष्य को जीवन प्रदान करने का काम करते हैं। वर्तमान समय में वचन नबियों की भविष्यवाणियों से भिन्न हैं। यह कार्य का एक चरण है और यह मनुष्य के जीवन के लिए, मनुष्य का जीवन स्वभाव बदलने के लिए किया जाता है, न कि भविष्यवाणियाँ करने के लिए। प्रथम चरण यहोवा का कार्य था : उसका कार्य पृथ्वी पर मनुष्य के लिए परमेश्वर की आराधना करने हेतु एक मार्ग तैयार करना था। यह आरंभ करने का कार्य था और इसका उद्देश्य कार्य के लिए पृथ्वी पर एक मूल स्थान खोजना था। उस समय यहोवा ने इस्राएलियों को सब्त का पालन करना, अपने माता-पिता का आदर करना और एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्वक रहना सिखाया। इसका कारण यह था कि उस समय के लोग नहीं समझते थे कि मनुष्य का सार क्या है, न ही वे यह समझते थे कि पृथ्वी पर किस प्रकार रहना है। कार्य के प्रथम चरण में उसके लिए मनुष्यों के जीवन में उनकी अगुआई करना आवश्यक था। यहोवा ने जो कुछ उनसे कहा, वह सब मनुष्यों को पहले ज्ञात नहीं था या उनके पास नहीं था। उस समय परमेश्वर ने भविष्यवाणियाँ करने के लिए अनेक नबियों को खड़ा किया और उन सबने यहोवा की अगुआई में ऐसा किया। यह परमेश्वर के कार्य की मात्र एक मद थी। प्रथम चरण में परमेश्वर देहधारी नहीं हुआ, इसलिए उसने सभी जन-जातियों और राष्ट्रों को नबियों के माध्यम से निर्देश दिए। जब यीशु ने अपने समय में कार्य किया, तब वह उतना नहीं बोला, जितना कि वर्तमान समय में। अंत के दिनों में वचन के कार्य का यह चरण पिछले युगों और पीढ़ियों में कभी कार्यान्वित नहीं किया गया। यद्यपि यशायाह, दानिय्येल और यूहन्ना ने कई भविष्यवाणियाँ कीं, किंतु उनकी भविष्यवाणियाँ अब बोले जा रहे वचनों से बिल्कुल अलग हैं। उन्होंने जो कहा, वे केवल भविष्यवाणियाँ थीं, किंतु अब बोले जा रहे वचन भविष्यवाणियाँ नहीं हैं। यदि मैं आज जो कुछ कह रहा हूँ, उसे भविष्यवाणियों में बदल दूँ, तो क्या तुम लोग समझ पाने में सक्षम होगे? मान लो, जो कुछ मैंने कहा, वह उन मामलों के बारे में हो, जो मेरे जाने के बाद होंगे, तो तुम समझ कैसे प्राप्त कर सकोगे? वचन का कार्य यीशु के समय में या व्यवस्था के युग में कभी नहीं किया गया। शायद कुछ लोग कहेंगे, “क्या यहोवा ने भी अपने कार्य के समय में वचन नहीं बोले थे? क्या यीशु ने भी उस समय, जब वह कार्य कर रहा था, बीमारी की चंगाई करने, दुष्टात्माओं को निकालने और चिह्न एवं चमत्कार दिखाने के अतिरिक्त वचन नहीं बोले थे?” जो बातें बोली गईं, उनमें अंतर है। यहोवा द्वारा बोले गए वचनों का सार क्या था? वह केवल पृथ्वी पर मनुष्यों का जीवन जीने में मार्गदर्शन कर रहा था, जिसने जीवन के आध्यात्मिक मामलों को नहीं छुआ था। ऐसा क्यों कहा जाता है कि जब यहोवा बोला, तो वह सभी स्थानों के लोगों को निर्देश देने के लिए था? “निर्देश” शब्द का अर्थ है स्पष्ट रूप से बताना और सीधे आदेश देना। उसने मनुष्य को जीवन की आपूर्ति नहीं की, बल्कि उसने बस मनुष्य का हाथ पकड़ा और बहुत ज्यादा दृष्टांतों का सहारा लिए बिना उसे अपना भय मानना सिखाया। इस्राएल में यहोवा ने जो कार्य किया, वह मनुष्य की काट-छाँट करना या उसे अनुशासित करना या न्याय और ताड़ना प्रदान करना नहीं था, बल्कि उसका मार्गदर्शन करना था। यहोवा ने मूसा को आदेश दिया कि वह उसके लोगों से कहे कि वे जंगल में मन्ना इकट्ठा करें। प्रतिदिन सूर्योदय से पहले उन्हें केवल इतना मन्ना इकट्ठा करना था, जो उनके उस दिन के खाने के लिए पर्याप्त हो। मन्ना अगले दिन तक नहीं रखा जा सकता था, क्योंकि तब उसमें फफूँद लग जाती। उसने लोगों को डाँटा नहीं या उनकी प्रकृति उजागर नहीं की, न ही उसने उनके मत और विचार उजागर किए। उसने लोगों को बदला नहीं, बल्कि जीवन जीने में उनका मार्गदर्शन किया। उस समय के लोग बच्चों के समान थे, जो कुछ नहीं समझते थे और केवल कुछ मूलभूत यांत्रिक गतिविधियाँ करने में ही सक्षम थे, इसलिए यहोवा ने केवल जनसाधारण का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्थाएँ लागू की थीं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 34

परमेश्वर भिन्न-भिन्न युगों के अनुसार अपने वचन कहता है और अपना कार्य करता है, तथा भिन्न-भिन्न युगों में वह भिन्न-भिन्न वचन कहता है। परमेश्वर विनियमों का पालन नहीं करता, या एक ही कार्य को दोहराता नहीं है और न अतीत की बातों के प्रति मोह रखता है। वह ऐसा परमेश्वर है जो सदैव नया है और कभी पुराना नहीं होता, और वह हर दिन नए वचन बोलता है। तुम्हें उसका पालन करना चाहिए, जिसका आज पालन किया जाना चाहिए; यही मनुष्य की जिम्मेदारी और कर्तव्य है। यह महत्वपूर्ण है कि वर्तमान समय में अभ्यास परमेश्वर की रोशनी और वचनों के आस-पास केंद्रित हो। परमेश्वर विनियमों का पालन नहीं करता और अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता प्रकट करने के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलने में सक्षम है। यह मायने नहीं रखता कि वह आत्मा के परिप्रेक्ष्य से बोलता है या मनुष्य के या अन्य पुरुष के परिप्रेक्ष्य से—परमेश्वर सदैव परमेश्वर है, और तुम उसके मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से बोलने की वजह से यह नहीं कह सकते कि वह परमेश्वर नहीं है। परमेश्वर के विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलने के परिणामस्वरूप कुछ लोगों ने धारणाएँ विकसित कर ली हैं। ऐसे लोगों में परमेश्वर का कोई ज्ञान नहीं है, और उसके कार्य का कोई ज्ञान नहीं है। यदि परमेश्वर सदैव किसी एक ही परिप्रेक्ष्य से बोलता, तो क्या मनुष्य परमेश्वर को परिसीमित न कर देता? क्या परमेश्वर मनुष्य को इस तरह से कार्य करने दे सकता है? परमेश्वर चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य से बोले, उसके पास वैसा करने का प्रयोजन है। यदि परमेश्वर सदैव आत्मा के परिप्रेक्ष्य से बोलता, तो क्या तुम उसके साथ जुड़ने में सक्षम होते? इसलिए, तुम्हें पोषण प्रदान करने और वास्तविकता में तुम्हारा मार्गदर्शन करने के लिए कभी-कभी वह अन्य पुरुष के परिप्रेक्ष्य से भी बोलता है। परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उपयुक्त होता है। संक्षेप में, यह सब परमेश्वर द्वारा किया जाता है और तुम्हें इस पर संदेह नहीं करना चाहिए। वह परमेश्वर है, और इसलिए वह चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य से बोले, वह हमेशा परमेश्वर ही रहेगा। यह एक अडिग सत्य है। वह जैसे भी कार्य करे, वह फिर भी परमेश्वर है, और उसका सार नहीं बदलेगा! पतरस परमेश्वर से बहुत प्रेम करता था और वह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप इंसान था, किंतु परमेश्वर ने उसके प्रभु या मसीह होने की गवाही नहीं दी, क्योंकि किसी प्राणी का सार वही होता है, जो वह है, और वह कभी नहीं बदल सकता। अपने कार्य में परमेश्वर विनियमों का पालन नहीं करता, किंतु वह अपने कार्य को प्रभावी बनाने और अपने बारे में मनुष्य के ज्ञान को गहरा करने के लिए भिन्न-भिन्न तरीके उपयोग में लाता है। उसके कार्य करने के प्रत्येक तरीके के पीछे का उद्देश्य मनुष्य की उसे जानने में सहायता करना और मनुष्य को पूर्ण बनाना है। चाहे वह कार्य करने का कोई भी तरीका उपयोग में लाए, प्रत्येक तरीका मनुष्य को बनाने और उसे पूर्ण करने के लिए है। भले ही उसके तरीकों में से कोई एक तरीका बहुत लंबे समय तक चला हो, यह परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास को तपाकर दृढ़ बनाने के लिए है। इसलिए तुम लोगों के हृदयों में कोई संदेह नहीं होना चाहिए। ये सभी परमेश्वर के कार्य के चरण हैं, और तुम लोगों को इनके प्रति समर्पण करना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन से सब कुछ पूरा हो जाता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 35

परमेश्वर पृथ्वी पर मुख्य रूप से अपने वचन कहने आया है; तुम जिसके संपर्क में आते हो वह परमेश्वर का वचन है, तुम जो पढ़ते हो वह परमेश्वर का वचन है, तुम जो सुनते हो वह परमेश्वर का वचन है, तुम जिसका पालन करते हो वह परमेश्वर का वचन है, तुम जिसे अनुभव करते हो वह परमेश्वर का वचन है और इस बार के देहधारण में परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए मुख्य रूप से वचन का उपयोग करता है। वह संकेत और चमत्कार नहीं दिखाता, और विशेष रूप से वे कार्य नहीं करता, जिन्हें यीशु ने अतीत में किया था। यद्यपि वे परमेश्वर हैं, और दोनों देह हैं, किंतु उनकी सेवकाइयाँ एक-सी नहीं हैं। जब यीशु आया, तो उसने भी परमेश्वर के कार्य का एक भाग पूरा किया और कुछ वचन बोले—किंतु वह कौन-सा प्रमुख कार्य था, जो उसने संपन्न किया? उसने मुख्य रूप से सलीब पर चढ़ने का कार्य संपन्न किया। सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा करने और समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए वह पापी देह की छवि बन गया, और समस्त मानवजाति के पापों के लिए वह पाप-बलि बन गया। यही वह मुख्य कार्य है, जो उसने संपन्न किया। अंततः, बाद में आए लोगों के लिए उसने सलीब का मार्ग दिखाया। जब यीशु आया, तब वह मुख्य रूप से छुटकारे का कार्य पूरा करने के लिए था। उसने समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाया, और स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार मनुष्य तक पहुँचाया, और, इसके अलावा, वह स्वर्ग के राज्य का मार्ग लाया। परिणामस्वरूप, जो लोग बाद में आए, उन सभी ने कहा, “हमें सलीब के मार्ग पर चलना चाहिए, और स्वयं को सलीब के लिए बलिदान कर देना चाहिए।” निस्संदेह, आरंभ में यीशु ने भी मनुष्य से पश्चात्ताप करवाने और पाप स्वीकार करवाने के लिए कुछ अन्य कार्य भी किए और कुछ वचन भी कहे। किंतु फिर भी उसकी सेवकाई सलीब पर चढ़ने की ही थी, और उसने साढ़े तीन वर्ष जो मार्ग का उपदेश देने में खर्च किए, वे बाद में सलीब पर चढ़ने की तैयारी के लिए ही थे। यीशु ने जो कई बार प्रार्थनाएँ कीं, वे भी सूली पर चढ़ने के वास्ते ही थीं। उसने पृथ्वी पर जो सामान्य मानव-जीवन बिताया और जो साढ़े तैंतीस वर्ष वह जीया, वह मुख्य रूप से सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा करने के लिए था; वह इस कार्य को करने में उसे शक्ति प्रदान करने के लिए था। इसीलिए यह कहा जाता है कि परमेश्वर ने उसे सलीब पर चढ़ने का कार्य सौंपा। आज देहधारी परमेश्वर कौन-सा कार्य संपन्न करेगा? आज परमेश्वर मुख्य रूप से “वचन के देह में प्रकट होने” का कार्य पूरा करने के लिए देहधारी हुआ है। वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचन का उपयोग करता है और मनुष्य से वचन की काट-छाँट और वचन का शोधन स्वीकार करवाता है। अपने वचनों में वह तुम्हें आपूर्ति और जीवन प्राप्त करवाता है तथा तुम्हें अपने कार्य और कर्म देखने में सक्षम बनाता है। परमेश्वर तुम्हें ताड़ना देने और तुम्हारा शोधन करने के लिए वचन का उपयोग करता है और इस प्रकार यदि तुम्हें पीड़ा भी सहनी पड़ती है तो वह भी परमेश्वर के वचन के कारण है। आज परमेश्वर तथ्यों के साथ नहीं, बल्कि वचनों के साथ कार्य करता है। केवल जब उसके वचन तुम पर आ जाएँ, तभी पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य कर सकता है और तुम्हारे पीड़ा भुगतने या मिठास का स्वाद चखने का कारण बन सकता है। केवल परमेश्वर का वचन ही तुम्हें वास्तविकता में ला सकता है, और केवल परमेश्वर का वचन ही तुम्हें पूर्ण बनाने में सक्षम है। इसलिए, तुम्हें कम से कम यह समझना चाहिए : अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण बनाने और मनुष्य का मार्गदर्शन करने के लिए अपने वचन का उपयोग करना है। जो कुछ भी कार्य वह करता है, वह सब वचन के द्वारा किया जाता है; तुम्हें ताड़ना देने के लिए वह तथ्यों का उपयोग नहीं करता। ऐसे अवसर आते हैं, जब कुछ लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। परमेश्वर तुम्हारे लिए भारी असुविधा उत्पन्न नहीं करता, तुम्हारी देह को ताड़ना नहीं दी जाती, न ही यह कोई पीड़ा सहती है—किंतु जैसे ही उसका वचन तुम पर आता है और तुम्हारा शोधन करता है तो यह तुम्हारे लिए असहनीय होता है। क्या ऐसा नहीं है? सेवाकर्मियों के समय के दौरान परमेश्वर ने मनुष्य को अथाह कुंड में डालने के लिए कहा था। क्या मनुष्य वास्तव में अथाह कुंड में पहुँच गया? मनुष्य के शोधन के लिए वचनों के उपयोग के माध्यम से ही मनुष्य ने अथाह कुंड में प्रवेश कर लिया। इसलिए, अंत के दिनों में जब परमेश्वर देहधारी होता है, तब वह मुख्य रूप से सब कुछ संपन्न करने और सब कुछ प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है। केवल उसके वचनों में ही तुम उसका स्वरूप देख सकते हो; केवल उसके वचनों में ही तुम देख सकते हो कि वह स्वयं परमेश्वर है। जब देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, वह वचन बोलने के अलावा कोई अन्य कार्य नहीं करता—इसलिए तथ्यों की कोई आवश्यकता नहीं है; सिर्फ वचन ही काफी हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह मुख्य रूप से इसी कार्य को करने के लिए आया है, ताकि मनुष्य को अपने वचनों में अपनी महान सामर्थ्य और सर्वोच्चता देखने दे, ताकि मनुष्य को अपने वचनों में अपनी दीनता और अदृश्यता देखने दे, और मनुष्य को अपने वचनों में अपनी समग्रता जानने दे। जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, सब उसके वचनों में निहित है। उसकी बुद्धि और चमत्कारिकता उसके वचनों में है। इसमें तुम वे कई तरीके देख सकते हो, जिनसे परमेश्वर अपने वचन बोलता है। परमेश्वर ने इतने लंबे समय तक काम किया है और अधिकांशतः वह मनुष्य को पोषण प्रदान करता रहा है, उसे उजागर करता रहा है या उसकी काट-छाँट करता रहा है। वह मनुष्य को यूँ ही शाप नहीं देता और जब वह शाप देता भी है, तो वचन के द्वारा उसे शाप देता है। इसलिए, परमेश्वर के देहधारी होने के इस युग में, परमेश्वर को पुनः बीमारों की चंगाई करते और दुष्टात्माओं को निकालते हुए देखने की अपेक्षा मत करो और लगातार चिह्न खोजना बंद कर दो—वे किसी काम के नहीं हैं! वे संकेत मनुष्य को पूर्ण नहीं बना सकते! स्पष्ट रूप से कहूँ तो : आज देहधारी व्यावहारिक स्वयं परमेश्वर कुछ करता नहीं, केवल बोलता है। यही सत्य है! वह तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है और तुम्हें पोषित करने और सींचने के लिए वचनों का उपयोग करता है। वह कार्य करने के लिए भी वचनों का उपयोग करता है, और तथ्यों का स्थान लेने और तुम्हें अपनी व्यावहारिकता का ज्ञान कराने के लिए वचनों का उपयोग करता है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के इस तरीके को स्पष्ट रूप से देख लो, तो तुम्हारे नकारात्मक होने की संभावना नहीं रहेगी। नकारात्मक बातों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय तुम्हें केवल उन बातों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो सकारात्मक हैं—अर्थात्, इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर के वचन पूरे होते हैं या नहीं, या तथ्यों का आगमन होता है या नहीं, परमेश्वर अपने वचनों से मनुष्य को जीवन प्राप्त करवाता है, और यह सभी संकेतों में से महानतम संकेत है; और इतना ही नहीं, यह एक अविवादित तथ्य है। यह सर्वोत्तम प्रमाण है जिसके माध्यम से परमेश्वर को जानना है, और यह संकेतों से भी बड़ा संकेत है। केवल ये वचन ही मनुष्य को पूर्ण बना सकते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन से सब कुछ पूरा हो जाता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 36

जैसे ही राज्य का युग आरंभ हुआ, परमेश्वर ने अपने वचन जारी करने आरंभ कर दिए। भविष्य में ये वचन उत्तरोत्तर पूरे होते जाएँगे, और उस समय, मनुष्य का जीवन पहले ही परिपक्व हो गया होगा। परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करने के लिए वचन का उपयोग करता है; यह अधिक व्यावहारिक और अधिक आवश्यक है। मनुष्य के विश्वास को पूर्ण बनाने के उद्देश्य से वह अपना कार्य करने के लिए वचन के अलावा किसी चीज का उपयोग नहीं करता, क्योंकि आज वचन का युग है, और इसे मनुष्य की आस्था, संकल्प और सहयोग की आवश्यकता है। अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर का कार्य मनुष्य की सेवा और भरण-पोषण करने के लिए अपने वचन का उपयोग करना है। केवल जब देहधारी परमेश्वर अपने वचनों को बोलने का कार्य समाप्त कर लेगा, तभी वे पूरे होने शुरू होंगे। उसके बोलने के दौरान उसके वचन पूरे नहीं होते, क्योंकि जब वह देह के चरण में होता है, तो उसके वचन पूरे नहीं हो सकते। ऐसा इसलिए है, ताकि मनुष्य देख सके कि परमेश्वर देह है, और आत्मा नहीं, ताकि मनुष्य अपनी आँखों से परमेश्वर की व्यावहारिकता देख सके। जिस दिन उसका कार्य पूरा हो जाएगा, जब उसके द्वारा पृथ्वी पर जो शब्द कहे जाने चाहिए, वे कह दिए जाएँगे, तब उसके वचन पूरे होने आरंभ हो जाएँगे। अभी परमेश्वर के वचनों के पूरा होने का युग नहीं है, क्योंकि उसने अभी अपने वचन बोलना समाप्त नहीं किया है। इसलिए, जब तुम देखते हो कि परमेश्वर पृथ्वी पर अभी भी अपने वचन बोल रहा है, तो उसके वचनों के पूरे होने की प्रतीक्षा मत करो; जब परमेश्वर अपने वचन बोलना बंद कर देगा, और जब पृथ्वी पर उसका कार्य पूरा हो जाएगा, तभी उसके वचन पूरे होने शुरू होंगे। पृथ्वी पर वह जो वचन बोलता है, उनमें एक लिहाज से जीवन का पोषण है, और दूसरे लिहाज से भविष्यवाणी—उन चीजों की भविष्यवाणी, जो अभी आनी हैं, उन चीजों की भविष्यवाणी, जो की जाएँगी, और उन चीजों की भविष्यवाणी, जिन्हें अभी संपन्न किया जाना है। यीशु के वचनों में भी भविष्यवाणी थी। एक लिहाज से उसने जीवन का भरण-पोषण किया और दूसरे लिहाज से उसने भविष्यवाणी की। आज समवर्ती वचनों और तथ्यों की कोई बात नहीं है, क्योंकि जो मनुष्य द्वारा अपनी आँखों से देखा जा सकता है और जो तथ्य परमेश्वर द्वारा कार्यान्वित किए जाते हैं, उनके बीच बहुत बड़ा अंतर है। केवल इतना ही कहा जा सकता है कि एक बार जब परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाएगा, तो उसके वचन पूरे हो जाएँगे, और तथ्य वचनों के बाद आएँगे। अंत के दिनों के दौरान देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर वचन की सेवकाई करने के लिए आता है, और वचन की सेवकाई करने में वह केवल वचन बोलता है और अन्य बातों की परवाह नहीं करता। एक बार जब परमेश्वर का कार्य बदल जाएगा, तो उसके वचन पूरे होने शुरू हो जाएँगे। आज वचन पहले तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं; जब वह समस्त ब्रह्मांड में महिमा प्राप्त कर लेगा, उसका कार्य पूरा हो जाएगा, वे सभी वचन जो बोले जाने चाहिए, बोले जा चुके होंगे, और सभी वचन तथ्य बन चुके होंगे। अंत के दिनों में परमेश्वर पृथ्वी पर वचन की सेवकाई करने के लिए आया है, ताकि मानवजाति उसे जान सके और ताकि मानवजाति उसके वचनों से परमेश्वर का स्वरूप, उसकी बुद्धि और उसके सभी अद्भुत कर्म देख सके। राज्य के युग के दौरान परमेश्वर समस्त मानवजाति को जीतने के लिए मुख्य रूप से वचन का उपयोग करता है। भविष्य में उसके वचन हर धर्म, क्षेत्र, देश और संप्रदाय पर भी आएँगे; परमेश्वर वचनों का उपयोग जीतने के लिए, सभी लोगों को यह दिखाने के लिए करता है कि उसके वचन अधिकार और शक्ति वहन करते हैं—और इसलिए आज तुम केवल परमेश्वर के वचन का सामना करते हो।

परमेश्वर द्वारा इस युग में बोले गए वचन, व्यवस्था के युग के दौरान बोले गए वचनों से भिन्न हैं और वे अनुग्रह के युग के दौरान बोले गए वचनों से भी भिन्न हैं। अनुग्रह के युग में वचन का कार्य नहीं किया गया था; केवल पूरी मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर को क्रूस पर चढ़ाए जाने का उल्लेख था। बाइबल में केवल इस बात का जिक्र है कि यीशु को क्रूस पर क्यों चढ़ाया जाना था, क्रूस पर चढ़ाए जाने के दौरान उसे किस कष्ट का सामना करना पड़ा और मनुष्य को परमेश्वर के लिए कैसे क्रूस पर चढ़ाया जाना चाहिए। उस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया गया समस्त कार्य सलीब पर चढ़ने के आसपास केंद्रित था। राज्य के युग के दौरान देहधारी परमेश्वर उन सभी लोगों को जीतने के लिए वचन बोलता है, जो उस पर विश्वास करते हैं। यह “वचन का देह में प्रकट होना” है; परमेश्वर अंत के दिनों में इस कार्य को करने और वचन के देह में प्रकट होने का वास्तविक अर्थ संपन्न करने के लिए आया है। वह केवल वचन बोलता है, और तथ्यों का आगमन शायद ही कभी होता है। वचन के देह में प्रकट होने का यही मूल सार है, और जब देहधारी परमेश्वर अपने वचन बोलता है, तो यही वचन का देह में प्रकट होना और वचन का देह में आना है। “आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था, और वचन देह बन गया।” यह (वचन के देह में प्रकट होने का कार्य) वह कार्य है, जिसे परमेश्वर अंत के दिनों में संपन्न करेगा और यह उसकी संपूर्ण प्रबंधन योजना का अंतिम अध्याय है, इसलिए परमेश्वर को पृथ्वी पर आना ही है और अपने वचनों को देह में अभिव्यक्त करना ही है। वह जो आज किया जाता है, वह जिसे भविष्य में किया जाएगा, वह जिसे परमेश्वर द्वारा संपन्न किया जाएगा, मनुष्य का अंतिम गंतव्य, किन्हें बचाया जाएगा, किन्हें नष्ट किया जाएगा, आदि-आदि—यह समस्त कार्य, जिसे अंत में हासिल किया जाना चाहिए, सब स्पष्ट रूप से कहा गया है, और यह सब वचन के देह में प्रकट होने का वास्तविक अर्थ संपन्न करने के लिए है। प्रशासनिक आदेश और संविधान, जिन्हें पहले जारी किया गया था, किन्हें नष्ट किया जाएगा, कौन विश्राम में प्रवेश करेगा—ये सभी वचन पूरे होने चाहिए। यही वह कार्य है, जिसे देहधारी परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों में मुख्य रूप से संपन्न किया जाता है, ताकि लोग समझ सकें कि परमेश्वर द्वारा पूर्व-नियत लोग कहाँ के हैं और जो परमेश्वर द्वारा पूर्व-नियत नहीं हैं वे कहाँ के हैं, उसके लोगों और पुत्रों का वर्गीकरण कैसे किया जाएगा, इस्राएल का क्या होगा, मिस्र का क्या होगा—भविष्य में, इन वचनों में से प्रत्येक वचन संपन्न होगा। परमेश्वर के कार्य की गति तेज हो रही है। परमेश्वर मनुष्यों पर यह प्रकट करने के लिए वचनों को साधन के रूप में उपयोग करता है कि हर युग में क्या किया जाना है, अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर द्वारा क्या किया जाना है, और उसकी सेवकाई, जो की जानी है, और ये सब वचन, वचन के देह में प्रकट होने के वास्तविक अर्थ को संपन्न करने के उद्देश्य से हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन से सब कुछ पूरा हो जाता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 37

परमेश्वर पूरे ब्रह्मांड में अपना कार्य करता है। जो उस पर विश्वास करते हैं, उन सबको अवश्य ही उसके वचन स्वीकार करने चाहिए और उसके वचन खाने और पीने चाहिए; परमेश्वर द्वारा दिखाए गए संकेतों और चमत्कारों को देखकर कोई भी व्यक्ति परमेश्वर द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। युगों-युगों और पीढ़ियों से परमेश्वर ने मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए सदैव वचन का उपयोग किया है। इसलिए तुम लोगों को अपना समस्त ध्यान संकेतों और चमत्कारों पर नहीं लगाना चाहिए, बल्कि परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करने पर लगाना चाहिए। पुराने विधान के व्यवस्था के युग में परमेश्वर ने कुछ वचन कहे, और अनुग्रह के युग में यीशु ने भी बहुत-से वचन कहे। यीशु द्वारा बहुत-से वचन कहे जाने के बाद, बाद के प्रेरितों और शिष्यों ने लोगों को यीशु द्वारा जारी की गई आज्ञाओं के अनुसार अभ्यास करने में अगुआई की, और यीशु द्वारा कहे गए वचनों और उसके द्वारा बताए गए सिद्धांतों के अनुसार चीजों का अनुभव किया। अंत के दिनों में परमेश्वर वचन का उपयोग मुख्यतः मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करता है। वह मनुष्य को जबरन आश्वस्त करने के लिए चिह्नों और चमत्कारों का उपयोग नहीं करता; यह परमेश्वर के महान सामर्थ्य को प्रकट नहीं कर सकता। यदि परमेश्वर केवल चिह्न और चमत्कार दिखाता तो इससे परमेश्वर की व्यावहारिकता प्रकट न होती और इससे मनुष्य पूर्ण न बनाया जा सकता। परमेश्वर संकेतों और चमत्कारों से मनुष्य को पूर्ण नहीं बनाता, अपितु उसे सींचने और उसकी चरवाही करने के लिए वचन का उपयोग करता है, जिसके बाद मनुष्य परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पण कर सकता है और परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यही उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य और बोले जाने वाले वचनों का उद्देश्य है। परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए संकेत एवं चमत्कार दिखाने की विधि का उपयोग नहीं करता—वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों और कार्य की कई विधियों का उपयोग करता है। चाहे वह शोधन, काट-छाँट या वचनों का पोषण हो, मनुष्य को पूर्ण बनाने और उसे परमेश्वर के कार्य, उसकी बुद्धि और चमत्कारिकता का अधिक ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम बनाने के लिए परमेश्वर कई भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलता है। अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा युग का समापन करने के समय जब मनुष्य को पूर्ण किया जाएगा, तब वह संकेत और चमत्कार देखने योग्य हो जाएगा। जब तुम परमेश्वर को जान लेते हो और इस बात की परवाह किए बिना कि वह क्या करता है, उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम हो जाते हो, तब संकेत और चमत्कार देखकर तुम परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं बनाते। इस समय तुम भ्रष्ट हो और परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण करने में अक्षम हो—तुम क्या अपने को चिह्न और चमत्कार देखने योग्य समझते हो? जब परमेश्वर संकेत और चमत्कार दिखाता है, तो यह तब होता है, जब वह मनुष्य को दंड देता है, और तब भी, जब युग बदलता है, और इतना ही नहीं, जब युग का समापन होता है। जब परमेश्वर का कार्य सामान्य रूप से किया जा रहा हो, तो वह संकेत और चमत्कार नहीं दिखाता। संकेत और चमत्कार दिखाना उसके लिए बहुत ही आसान है, किंतु वह परमेश्वर के कार्य का सिद्धांत नहीं है, न ही वह परमेश्वर के मनुष्य के प्रबंधन का लक्ष्य है। यदि मनुष्य संकेत और चमत्कार देखते और उन्हें परमेश्वर की आध्यात्मिक देह भी प्रकट होती तो क्या सभी लोग परमेश्वर “में विश्वास” न करते? मैंने पहले कहा था कि पूर्व से विजेताओं का एक समूह प्राप्त किया जाएगा, ऐसे विजेताओं का जो महाक्लेश से निकलेंगे। इन वचनों का क्या अर्थ है? उनका अर्थ है कि ये जो लोग प्राप्त किए गए हैं, वे केवल न्याय, ताड़ना, काट-छाँट और सभी प्रकार के शोधन से गुजरने के बाद सचमुच ही समर्पणशील होते हैं। इन लोगों का विश्वास कल्पित नहीं, बल्कि व्यावहारिक है। उन्होंने कोई संकेत और चमत्कार या कोई अचंभा नहीं देखा है; वे ऊँचे शब्द और धर्म-सिद्धांत कहने या गहन अंतर्दृष्टियों को व्यक्त करने में सक्षम नहीं हैं; इसके बजाय, उनके पास वास्तविकता है और परमेश्वर के वचन हैं और परमेश्वर का व्यावहारिक और सच्चा ज्ञान है। क्या ऐसा समूह परमेश्वर के महान सामर्थ्य को प्रकट करने में अधिक सक्षम नहीं है? अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का कार्य व्यावहारिक कार्य है। यीशु के युग के दौरान, वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए नहीं, बल्कि छुटकारा दिलाने के लिए आया, और इसलिए उसने लोगों से अपना अनुसरण करवाने के लिए कुछ चमत्कार प्रदर्शित किए। क्योंकि वह मुख्य रूप से सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा करने आया था, और संकेत दिखाना उसकी सेवकाई का हिस्सा नहीं था। इस प्रकार के संकेत और चमत्कार ऐसे कार्य थे, जो उसके कार्य को कारगर बनाने के लिए किए गए थे; वे अतिरिक्त कार्य थे, और संपूर्ण युग के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। पुराने विधान के व्यवस्था के युग के दौरान भी परमेश्वर ने कुछ संकेत और चमत्कार दिखाए—किंतु आज परमेश्वर जो कार्य करता है, वह व्यावहारिक कार्य है, और वह अब निश्चित रूप से संकेत और चमत्कार नहीं दिखाएगा। यदि उसने संकेत और चमत्कार दिखाए, तो उसका व्यावहारिक कार्य अस्तव्यस्त हो जाएगा, और वह कोई और कार्य करने में असमर्थ होगा। यदि परमेश्वर कहता कि वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचन का उपयोग करेगा, लेकिन साथ ही संकेत और चमत्कार भी दिखाता, तो क्या इससे यह प्रकट हो पाता कि मनुष्य वास्तव में उस पर विश्वास करता है या नहीं? इसलिए परमेश्वर इस तरह की चीजें नहीं करता। मनुष्य के भीतर धर्म की अतिशय बातें हैं; अंत के दिनों में परमेश्वर मनुष्य के भीतर से सभी धार्मिक धारणाओं और अलौकिक बातों को बाहर निकालने, मनुष्य को परमेश्वर की व्यावहारिकता का ज्ञान कराने और परमेश्वर की वह छवि हटाने के लिए आया है, जो अज्ञात और काल्पनिक है और कहा जा सकता है कि उसका अस्तित्व ही नहीं है। और इसलिए, अब तुम्हारे लिए जो एकमात्र बहुमूल्य चीज है, वह है व्यावहारिकता का ज्ञान होना! सत्य सभी चीजों पर प्रबल है। आज तुम्हारे पास कितना सत्य है? क्या वे सब, जो संकेत और चमत्कार दिखाते हैं, परमेश्वर हैं? दुष्टात्माएँ भी संकेत और चमत्कार दिखा सकती हैं; तो क्या वे सब परमेश्वर हैं? परमेश्वर पर अपने विश्वास में मनुष्य जिसे खोजता है वह सत्य है, और वह जिसका अनुसरण करता है वह संकेतों और चमत्कारों के बजाय, जीवन है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन सबका यही लक्ष्य होना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन से सब कुछ पूरा हो जाता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 38

उस समय यीशु का कार्य समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाना था। उन सभी के पापों को क्षमा कर दिया गया था जो उसमें विश्वास करते थे; अगर तुम्हें उस पर विश्वास था, वह तुम्हें छुटकारा दिलाता था; यदि तुम उस पर विश्वास करते थे, तो तुम पाप के नहीं रह जाते थे, तुम अपने पापों से मुक्त हो जाते थे। यही बचाए जाने और विश्वास द्वारा उचित ठहराए जाने का अर्थ है। फिर भी विश्वासियों के अंदर परमेश्वर के प्रति विद्रोह और विरोध के भाव थे, जिन्हें अभी भी धीरे-धीरे हटाया जाना था। उद्धार का अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य पूरी तरह से यीशु द्वारा प्राप्त कर लिया गया है, बल्कि यह था कि मनुष्य अब पाप का नहीं रह गया था, उसे उसके पापों से मुक्त कर दिया गया था। अगर तुम उसमें विश्वास करते थे, तो तुम पाप के नहीं रह जाते थे। उस समय, यीशु ने बहुत-से ऐसे कार्य किए जो उसके शिष्यों की समझ से बाहर थे, और ऐसी बहुत-सी बातें कहीं जो लोगों की समझ में नहीं आयीं। इसका कारण यह है कि उस समय उसने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। इस प्रकार, यीशु के जाने के कई वर्ष बाद, मत्ती ने उसकी एक वंशावली बनायी और अन्य लोगों ने भी बहुत-से ऐसे कार्य किए जो मनुष्य की इच्छा के अनुसार थे। यीशु मनुष्य को पूर्ण करने और प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि कार्य का एक चरण संपन्न करने के लिए आया था : स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को आगे बढ़ाने और सूली पर चढ़ने का कार्य करने। इसलिए, एक बार जब यीशु को सूली पर चढ़ा दिया गया, तो उसके कार्य का पूरी तरह से अंत हो गया। किन्तु वर्तमान चरण में जो कि विजय का कार्य है, अधिक वचन बोले जाने चाहिए, अधिक कार्य किया जाना चाहिए और कई प्रक्रियाएँ होनी चाहिए। उसी तरह, यीशु और यहोवा के कार्यों के रहस्य भी प्रकट होने चाहिए, ताकि सभी लोगों को अपने विश्वास में समझ और स्पष्टता मिल जाए, क्योंकि यह अंत के दिनों का कार्य है, और अंत के दिन परमेश्वर के कार्य के समापन के दिन हैं, यह कार्य खत्म होने का समय है। कार्य का यह चरण तुम्हारे लिए यहोवा की व्यवस्था और यीशु के छुटकारे को एकदम स्पष्ट कर देगा, और यह मुख्य रूप से इसलिए है ताकि तुम परमेश्वर की छह हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना के पूरे कार्य को समझ सको और इस छह हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना की सारी महत्ता और सार समझ सको, और यीशु द्वारा किए गए सभी कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों का प्रयोजन और यहाँ तक कि बाइबल में अपने अंधे विश्वास और उसकी आराधना को भी समझ सको। तुम्हें इन सब को पूरी तरह से समझने में मदद करेगा। तुम यीशु द्वारा किए गए कार्य और परमेश्वर के आज के कार्य, दोनों को समझ जाओगे; तुम समस्त सत्य, जीवन और मार्ग को समझ लोगे और देख लोगे। यीशु द्वारा किए गए कार्य के चरण में, यीशु समापन कार्य किए बिना क्यों चला गया? क्योंकि यीशु के कार्य का चरण समापन का कार्य नहीं था। जब उसे सूली पर चढ़ाया गया, तब उसके वचनों का भी अंत हो गया था; उसके सूली पर चढ़ने के बाद उसका कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया था। वह वर्तमान चरण जैसा नहीं था, जिसमें वचनों के अंत तक बोले जाने और उसका समस्त कार्य समाप्त हो जाने के बाद ही परमेश्वर का कार्य समाप्त होगा। यीशु के कार्य के चरण के दौरान, ऐसे बहुत-से वचन थे जो अनकहे रह गए थे, या जो स्पष्ट रूप से नहीं बोले गए थे। फिर भी यीशु ने इस बात की परवाह नहीं की कि उसके वचन पूरी तरह से व्यक्त हो गए हैं या नहीं, क्योंकि उसकी सेवकाई कोई वचनों की सेवकाई नहीं थी, इसलिए सूली पर चढ़ाये जाने के बाद वह चला गया। कार्य का वह चरण मुख्यतः सूली पर चढ़ने के वास्ते था और वह वर्तमान चरण से भिन्न है। कार्य का यह चरण मुख्य रूप से समस्त कार्य का समापन करने, आखिरी साफ-सफाई करने और उसे अंत तक ले जाने के लिए है। यदि अंत तक वचन नहीं बोले गए, तो इस कार्य को पूरा करना असंभव होगा, क्योंकि कार्य के इस चरण में समस्त कार्य का समापन और उसे पूरा करने का काम वचनों के उपयोग से किया जाता है। उस समय यीशु ने ऐसा बहुत-सा कार्य किया, जो मनुष्य की समझ से बाहर था। वह चुपचाप चला गया और आज भी ऐसे बहुत-से लोग हैं जो उसके वचनों को नहीं समझते। उनकी समझ त्रुटिपूर्ण है, फिर भी वे उसे सही मानते हैं, और नहीं जानते कि वे गलत हैं। अंतिम चरण पूरी तरह से परमेश्वर के कार्य का अंत और इसका उपसंहार करेगा। सभी लोग परमेश्वर की प्रबंधन योजना को समझ और जान लेंगे। मनुष्य की धारणाएँ, उसके इरादे, उसकी भ्रामक समझ, यहोवा और यीशु के कार्यों के प्रति उसकी धारणाएँ, अविश्वासियों के बारे में उसके विचार और उसकी सभी विकृतियाँ ठीक कर दी जाएँगी। और मनुष्य जीवन में सभी सही मार्ग, परमेश्वर द्वारा किया गया समस्त कार्य और संपूर्ण सत्य समझ जाएगा। जब ऐसा होगा, तो कार्य का यह चरण समाप्त हो जाएगा। यहोवा का कार्य दुनिया का सृजन था, वह आरंभ था; कार्य का यह चरण कार्य का अंत है, और यह समापन है। आरंभ में, परमेश्वर का कार्य इस्राएल के चुने हुए लोगों के बीच किया गया था और यह सभी जगहों में से सबसे पवित्र जगह पर एक अभूतपूर्व कार्य था। कार्य का अंतिम चरण दुनिया का न्याय करने और युग को समाप्त करने के लिए सभी देशों में से सबसे गंदे देश में किया जा रहा है। पहले चरण में, परमेश्वर का कार्य सबसे प्रकाशमान स्थान पर किया गया था और अंतिम चरण सबसे अंधकारमय स्थान पर किया जाता है, और यह अंधकार भगा दिया जाएगा, रोशनी लाई जाएगी और सब लोगों पर विजय प्राप्त की जाएगी। जब इस सबसे गंदे और सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी और समस्त आबादी स्वीकार कर लेगी कि परमेश्वर होता है, जो कि सच्चा परमेश्वर है, और हर व्यक्ति पूरी तरह से कायल हो जाएगा, तब समस्त ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त करने का कार्य कार्यान्वित करने के लिए इस तथ्य का उपयोग किया जाएगा। कार्य का यह चरण प्रातिनिधिक है : एक बार इस युग का कार्य समाप्त हो गया, तो छह हजार वर्षों का प्रबंधन कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। जब सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों को जीत लिया जाएगा, तो कहने की जरूरत नहीं है कि बाकी सब जगह भी ऐसा ही होगा। इस तरह, केवल चीन में विजय का कार्य ही प्रातिनिधिक महत्व रखता है। चीन अंधकार की सभी शक्तियों का मूर्त रूप है और चीन के लोग उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो देह के हैं, शैतान के हैं, दैहिक हैं। चीनी लोग ही बड़े लाल अजगर द्वारा सबसे ज्यादा भ्रष्ट किए गए हैं, वही परमेश्वर के सबसे कट्टर विरोधी हैं, उन्हीं की मानवता सबसे अधम और सबसे गंदी है, इसलिए वे समस्त भ्रष्ट मानवता के आद्यरूप हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अन्य देशों में कोई समस्या नहीं है; मनुष्य की धारणाएँ समान हैं, यद्यपि इन देशों के लोग अच्छी काबिलियत वाले हो सकते हैं, किन्तु यदि वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो अवश्य ही वे उसका विरोध करते होंगे। यहूदियों ने भी परमेश्वर का विरोध और उससे विद्रोह क्यों किया? फरीसियों ने भी उसका विरोध क्यों किया? यहूदा ने यीशु के साथ विश्वासघात क्यों किया? उस समय, बहुत-से अनुयायी यीशु को नहीं जानते थे। यीशु को सूली पर चढ़ाये जाने और उसके फिर से जी उठने के बाद भी, लोगों ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया? क्या मनुष्य का विद्रोहीपन बिल्कुल समान नहीं है? बात बस इतनी है कि चीन के लोग इसके एक उदाहरण के रूप में पेश किए जाते हैं, जब उन पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी तो वे एक मॉडल और नमूना बन जाएँगे और दूसरों के लिए संदर्भ का काम करेंगे। मैंने हमेशा क्यों कहा है कि तुम लोग मेरी प्रबंधन योजना का केवल एक गौण अंग हो? चीन के लोगों में ही भ्रष्टता, अशुद्धता, अधार्मिकता, विरोध और विद्रोहशीलता सर्वाधिक पूर्णता से व्यक्त होती हैं और अपने विविध रूपों में प्रकट होती हैं। एक लिहाज से, वे खराब काबिलियत के हैं और दूसरे लिहाज से, उनका जीवन और उनकी मानसिकता पिछड़ी हुई है, उनकी आदतें, सामाजिक वातावरण, जिस परिवार में वे जन्मे हैं—सभी दयनीय और सर्वाधिक पिछड़े हैं। उनकी हैसियत भी निम्न है। इस स्थान पर कार्य प्रातिनिधिक है, एक बार जब यह परीक्षा-कार्य पूरी तरह से कार्यान्वित हो जाएगा, तो परमेश्वर का उसके ठीक बाद का कार्य अधिक आसान हो जाएगा। जब कार्य का यह चरण पूरा हो जाएगा, तब अगला कार्य बिल्कुल भी कठिन नहीं होगा। एक बार जब कार्य का यह चरण सम्पन्न हो जाएगा, तो बड़ी सफलता पूरी तरह प्राप्त हो चुकी होगी और समस्त ब्रह्माण्ड में विजय का कार्य पूर्ण अंत तक पहुँच चुका होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 39

अनुग्रह का युग यीशु के नाम से शुरू हुआ। जब यीशु ने अपनी सेवकाई आरंभ की, तो पवित्र आत्मा ने यीशु के नाम की गवाही देनी आरंभ कर दी, और यहोवा का नाम बोला जाना अब बंद हो गया; इसके बजाय, पवित्र आत्मा ने मुख्य रूप से यीशु के नाम से नया कार्य आरंभ किया। जो यीशु में विश्वास करते थे, उन लोगों की गवाही यीशु मसीह के लिए दी गई थी, और उन्होंने जो कार्य किया, वह भी यीशु मसीह के लिए था। पुराने विधान के व्यवस्था के युग के समापन का यह अर्थ था कि मुख्य रूप से यहोवा के नाम पर किया गया कार्य समाप्त हो गया है। तब से परमेश्वर का नाम यहोवा नहीं रहा; इसके बजाय उसे यीशु कहा गया, और यहाँ से पवित्र आत्मा ने मुख्य रूप से यीशु के नाम से कार्य करना आरंभ किया। इसलिए तुम अब भी यहोवा के वचनों को खाते और पीते हो, और अभी भी चीजों पर व्यवस्था के युग के कार्य को लागू करते हो—क्या तुम विनियमों को लागू नहीं कर रहे हो? क्या तुम अतीत में नहीं अटक गए हो? अब तुम लोग जानते हो कि अंत के दिन आ चुके हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि जब यीशु आए, तो वह अभी भी यीशु कहलाए? यहोवा ने इस्राएलियों से कहा था कि मसीहा आएगा, लेकिन जब वह आया, तो उसे मसीहा नहीं बल्कि यीशु कहा गया। यीशु ने कहा कि वह पुनः आएगा, और वह वैसे ही आएगा जैसे वह गया था। ये यीशु के वचन थे, किंतु क्या तुमने यीशु के जाने के तरीके को देखा था? यीशु एक सफेद बादल पर चढ़कर गया था, किंतु क्या ऐसा हो सकता है कि वह व्यक्तिगत रूप से एक सफेद बादल पर मनुष्य के बीच वापस आएगा? यदि ऐसा होता, तो क्या वह अभी भी यीशु नहीं कहलाता? जब यीशु पुनः आएगा, तब तक युग पहले ही बदल चुका होगा, तो क्या उसे अभी भी यीशु कहा जा सकता है? क्या परमेश्वर को केवल यीशु के नाम से ही जाना जा सकता है? क्या नए युग में उसे नए नाम से नहीं बुलाया जा सकता? क्या एक व्यक्ति की छवि और एक विशेष नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता में प्रतिनिधित्व कर सकते हैं? प्रत्येक युग में परमेश्वर नया कार्य करता है और उसे एक नए नाम से बुलाया जाता है; वह भिन्न-भिन्न युगों में एक ही कार्य कैसे कर सकता है? वह पुराने से कैसे चिपका रह सकता है? यीशु का नाम छुटकारे के कार्य के वास्ते लिया गया था तो क्या जब वह अंत के दिनों में लौटेगा, तब भी उसे उसी नाम से बुलाया जाएगा? क्या वह अभी भी छुटकारे का कार्य करेगा? ऐसा क्यों है कि यहोवा और यीशु एक ही हैं, फिर भी उन्हें भिन्न-भिन्न युगों में भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया जाता है? क्या यह इसलिए नहीं है, क्योंकि उनके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं? क्या केवल एक नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता में प्रतिनिधित्व कर सकता है? ऐसा होने पर परमेश्वर को भिन्न युग में भिन्न नाम से ही बुलाया जाना चाहिए और उसे युग को परिवर्तित करने और युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए उस नाम का उपयोग करना चाहिए। क्योंकि कोई भी एक नाम पूरी तरह से स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है और प्रत्येक नाम केवल परमेश्वर के उस स्वभाव का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है जो किसी निश्चित युग का निरूपक हो; उसे केवल उसके कार्य का प्रतिनिधित्व ही करना चाहिए। इसलिए समस्त युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए परमेश्वर ऐसे किसी भी नाम को चुन सकता है जो उसके स्वभाव के अनुकूल हो। चाहे वह यहोवा का युग हो या यीशु का, प्रत्येक युग का प्रतिनिधित्व एक नाम के द्वारा किया जाता है। अनुग्रह के युग का अंत हो चुका है, अंतिम युग आ चुका है और यीशु पहले ही आ चुका है। उसे अभी भी यीशु कैसे कहा जा सकता है? वह अभी भी मनुष्य के बीच यीशु की छवि में कैसे आ सकता है? क्या तुम भूल गए हो कि यीशु केवल नासरी की छवि से अधिक नहीं था? क्या तुम भूल गए हो कि यीशु केवल मानवजाति को छुटकारा दिलाने वाला था? वह अंत के दिनों में मनुष्य को जीतने और पूर्ण बनाने के कार्य का बीड़ा कैसे उठा सकता था? यीशु एक सफेद बादल पर सवार होकर चला गया—यह तथ्य है—किंतु वह मनुष्य के बीच एक सफेद बादल पर सवार होकर कैसे लौट सकता है और अभी भी यीशु कैसे कहलाया जा सकता है? यदि वह वास्तव में बादल पर आया होता तो मनुष्य उसे पहचानने में कैसे विफल रहता? क्या दुनिया भर के लोग उसे नहीं पहचानते? उस स्थिति में, क्या यीशु एकमात्र परमेश्वर नहीं होता? उस स्थिति में, परमेश्वर की छवि एक यहूदी की छवि होती, और इतना ही नहीं, वह हमेशा ऐसी ही रहती। यीशु ने कहा था कि वह उसी तरह से आएगा जैसे वह गया था, किंतु क्या तुम उसके वचनों का सही अर्थ जानते हो? क्या ऐसा हो सकता है कि ऐसा उसने तुम लोगों के इस समूह से कहा हो? तुम केवल इतना ही जानते हो कि वह उसी तरह से आएगा जैसे वह गया था, एक बादल पर सवार होकर, किंतु क्या तुम जानते हो कि स्वयं परमेश्वर वास्तव में अपना कार्य कैसे करता है? यदि तुम सच में देखने में समर्थ होते, तब यीशु के द्वारा बोले गए वचनों को कैसे समझाया जाता? उसने कहा था : जब अंत के दिनों में मनुष्य का पुत्र आएगा, तो उसे स्वयं ज्ञात नहीं होगा, फ़रिश्तों को ज्ञात नहीं होगा, स्वर्ग के दूतों को ज्ञात नहीं होगा, और समस्त मनुष्यों को ज्ञात नहीं होगा। केवल पिता को ज्ञात होगा, अर्थात् केवल आत्मा को ज्ञात होगा। जिसे स्वयं मनुष्य का पुत्र नहीं जानता, तुम उसे देखने और जानने में सक्षम हो? यदि तुम जानने और अपनी आँखों से देखने में समर्थ होते, तो क्या ये वचन व्यर्थ में बोले गए नहीं होते? और उस समय यीशु ने क्या कहा था? “उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत और न पुत्र, परन्तु केवल पिता। जैसे नूह के दिन थे, वैसा ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा। ... इसलिए तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी के विषय में तुम सोचते भी नहीं हो, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा।” जब वह दिन आएगा, तो स्वयं मनुष्य के पुत्र को उसका पता नहीं चलेगा। मनुष्य का पुत्र देहधारी परमेश्वर के देह को संदर्भित करता है, जो एक सामान्य और साधारण व्यक्ति है। जब स्वयं मनुष्य का पुत्र भी नहीं जानता, तो तुम कैसे जान सकते हो? यीशु ने कहा था कि वह वैसे ही आएगा, जैसे वह गया था। जब वह आता है, तो वह स्वयं भी नहीं जानता, तो क्या वह तुम्हें अग्रिम रूप में सूचित कर सकता है? क्या तुम उसका आगमन देखने में सक्षम हो? क्या यह एक मज़ाक नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 40

हर बार जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह अपना नाम, अपना लिंग, अपनी छवि और अपना कार्य बदल देता है; वह अपने कार्य को दोहराता नहीं है। वह ऐसा परमेश्वर है, जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता। जब वह पहले आया, तो उसे यीशु कहा गया; जब वह इस बार फिर से आता है, तो क्या उसे अभी भी यीशु कहा जा सकता है? जब वह पहले आया, तो वह पुरुष था; क्या वह इस बार फिर से पुरुष हो सकता है? जब वह अनुग्रह के युग के दौरान आया था, तो उसका कार्य सलीब पर चढ़ाया जाना था; जब वह फिर से आता है, तो क्या तब भी वह मानवजाति को पाप से छुटकारा दिला सकता है? क्या उसे फिर से सलीब पर चढ़ाया जा सकता है? क्या वह उसके कार्य की पुनरावृत्ति नहीं होगी? क्या तुम्हें नहीं पता था कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता? ऐसे लोग हैं, जो कहते हैं कि परमेश्वर सदैव अपरिवर्तनीय है। यह सही है, किंतु इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर का स्वभाव और सार अपरिवर्तनीय हैं। उसके नाम और कार्य में परिवर्तन से यह साबित नहीं होता कि उसका सार बदल गया है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और यह तथ्य कभी नहीं बदलेगा। यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, तो क्या यह संभव होगा कि उसकी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना समाप्त हो जाए? तुम केवल यह जानते हो कि परमेश्वर हमेशा अपरिवर्तनशील है, किंतु क्या तुम यह जानते हो कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता? यदि परमेश्वर का कार्य कभी नहीं बदला, तो क्या वह मानवजाति की आज के दिन तक अगुआई कर सकता था? यदि परमेश्वर हमेशा अपरिवर्तनीय होता, तो उसने पहले ही दो युगों का कार्य क्यों किया? उसका कार्य कभी आगे बढ़ने से नहीं रुकता, जिसका अर्थ है कि उसका स्वभाव मनुष्य के सामने धीरे-धीरे प्रकट होता है, और जो कुछ प्रकट होता है, वह उसका अंतर्निहित स्वभाव है। आरंभ में, परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य से छिपा हुआ था, उसने कभी भी खुलकर मनुष्य के सामने अपना स्वभाव प्रकट नहीं किया था, और मनुष्य को बस उसका कोई ज्ञान नहीं था। इस वजह से, वह धीरे-धीरे मनुष्य के सामने अपने स्वभाव को प्रकट करने हेतु अपने कार्य का उपयोग करता है, किंतु इस तरह कार्य करने का यह अर्थ नहीं है कि परमेश्वर का स्वभाव हर युग में बदलता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर के इरादे हमेशा बदलने से उसका स्वभाव लगातार बदल रहा है। बल्कि, उसके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं, इसलिए परमेश्वर अपने अंतर्निहित स्वभाव को समग्रता में लेता है और इसे क्रमशः मनुष्य के सामने प्रकट करता है, ताकि मनुष्य उसे जानने में समर्थ हो जाए। किंतु यह किसी भी भाँति इस बात का साक्ष्य नहीं है कि परमेश्वर का मूलतः कोई विशेष स्वभाव नहीं है और युगों के गुज़रने के साथ उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल गया है—इस प्रकार की समझ भ्रामक होगी। परमेश्वर मनुष्य पर अपना अंतर्निहित और विशेष स्वभाव—वह जो है—उसे प्रकट करता है और वह ऐसा युगों के गुज़रने के अनुसार करता है; किसी एक युग का कार्य परमेश्वर के समग्र स्वभाव को व्यक्त नहीं कर सकता। और इसलिए, “परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता” वचन उसके कार्य को संदर्भित करते हैं, और “परमेश्वर सदैव अपरिवर्तनीय है” ये वचन उसे संदर्भित करते हैं, जो अंतर्निहित रूप से परमेश्वर के पास है और जो वह है। इसके बावज़ूद, तुम छह-हज़ार-वर्ष के कार्य को एक बिंदु तक सीमित नहीं रख सकते, या उसे केवल मृत शब्दों के साथ सीमित नहीं कर सकते। मनुष्य की अज्ञानता ऐसी ही है। परमेश्वर इतना सरल नहीं है, जितना मनुष्य कल्पना करता है, और उसका कार्य किसी एक युग में रुका नहीं रह सकता। उदाहरण के लिए, यहोवा हमेशा परमेश्वर का नाम नहीं हो सकता; परमेश्वर यीशु के नाम से भी अपना कार्य कर सकता है। यह इस बात का संकेत है कि परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे की ओर प्रगति कर रहा है।

परमेश्वर हमेशा परमेश्वर है, और वह कभी शैतान नहीं बनेगा; शैतान हमेशा शैतान है, और वह कभी परमेश्वर नहीं बनेगा। परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर की चमत्कारिकता, परमेश्वर की धार्मिकता और परमेश्वर का प्रताप कभी नहीं बदलेंगे। उसका सार और उसके पास जो है और जो स्वयं है वह कभी नहीं बदलेगा। किंतु जहाँ तक उसके कार्य की बात है, वह हमेशा आगे बढ़ रहा है, हमेशा गहरा होता जा रहा है, क्योंकि वह हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता। हर युग में परमेश्वर एक नया नाम अपनाता है, हर युग में वह नया कार्य करता है, और हर युग में वह अपने सृजित प्राणियों को अपने नए इरादे और नया स्वभाव देखने देता है। यदि नए युग में लोग परमेश्वर के नए स्वभाव की अभिव्यक्ति देखने में असफल रहे, तो क्या वे उसे हमेशा के लिए सलीब पर नहीं टाँग देंगे? और ऐसा करके, क्या वे परमेश्वर को सीमित नहीं करेंगे? यदि परमेश्वर केवल एक पुरुष के रूप में देह में आए, तो लोग उसे पुरुष के रूप में, पुरुषों के परमेश्वर के रूप में परिभाषित करेंगे, और कभी विश्वास नहीं करेंगे कि वह महिलाओं का परमेश्वर है। तब पुरुष यह मानेंगे कि परमेश्वर पुरुषों के समान लिंग का है, कि परमेश्वर पुरुषों का प्रमुख है—लेकिन फिर महिलाओं का क्या? यह अनुचित है; क्या यह पक्षपातपूर्ण व्यवहार नहीं है? यदि यही मामला होता, तो वे सभी लोग जिन्हें परमेश्वर ने बचाया, उसके समान पुरुष होते, और एक भी महिला नहीं बचाई गई होती। जब परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया, तो उसने आदम को बनाया और उसने हव्वा को बनाया। उसने न केवल आदम को बनाया, बल्कि पुरुष और महिला दोनों को अपनी छवि में बनाया। परमेश्वर केवल पुरुषों का ही परमेश्वर नहीं है—वह महिलाओं का भी परमेश्वर है। परमेश्वर अंत के दिनों में कार्य के एक नए चरण में प्रवेश करता है। वह अपने स्वभाव को और अधिक प्रकट करेगा, और वह यीशु के समय की दया और प्रेमपूर्ण अनुकंपा नहीं होगी। चूँकि उसके पास करने के लिए नया कार्य है, इसलिए इस नए कार्य के साथ एक नया स्वभाव होगा। इसलिए, यदि यह कार्य आत्मा द्वारा किया जाता—यदि परमेश्वर देहधारी न बनता, और इसके बजाय आत्मा ने गड़गड़ाहट के माध्यम से सीधे बात की होती, जिससे मनुष्य के पास उससे संपर्क करने का कोई उपाय न होता, तो क्या मनुष्य उसके स्वभाव को जान पाता? यदि केवल आत्मा ने कार्य किया होता, तो मनुष्य के पास परमेश्वर के स्वभाव को जान सकने का कोई तरीका न होता। लोग परमेश्वर के स्वभाव को अपनी आँखों से केवल तभी देख सकते हैं, जब वह देह धारण करता है, जब वचन देह में प्रकट होता है, और वह अपना संपूर्ण स्वभाव देह के माध्यम से व्यक्त करता है। परमेश्वर वास्तव में और सच में मनुष्य के बीच रहता है। उसके पास एक रूप और छवि है; मनुष्य वास्तव में उसके स्वभाव के साथ जुड़ सकता है, उसके स्वरूप के साथ जुड़ सकता है; केवल इसी तरह से मनुष्य वास्तव में उसे जान सकता है। इसके साथ-साथ, परमेश्वर ने वह कार्य भी पूरा कर लिया है, जिसमें “परमेश्वर पुरुषों का परमेश्वर है और महिलाओं का परमेश्वर है,” और उसने देह में अपने कार्य की समग्रता को संपन्न कर लिया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 41

अपने समस्त प्रबंधन में परमेश्वर का कार्य पूर्णतः स्पष्ट है : अनुग्रह का युग अनुग्रह का युग है, और अंत के दिन अंत के दिन हैं। प्रत्येक युग के बीच सुस्पष्ट भिन्नताएँ हैं, क्योंकि प्रत्येक युग में परमेश्वर उस कार्य को करता है, जो उस युग का प्रतिनिधि होता है। अंत के दिनों का कार्य किए जाने के लिए, युग का अंत करने के लिए ज्वलन, न्याय, ताड़ना, कोप और विनाश होने आवश्यक हैं। अंत के दिन अंतिम युग को संदर्भित करते हैं। अंतिम युग के दौरान क्या परमेश्वर युग का अंत नहीं करेगा? युग समाप्त करने के लिए परमेश्वर को अपने साथ ताड़ना और न्याय लाने आवश्यक हैं। केवल इसी तरह से वह युग को समाप्त कर सकता है। यीशु ने मनुष्य के लिए प्रयास किया कि वह अस्तित्व में बना रहे, वह जीवित रहे और एक बेहतर तरीके से विद्यमान रह सके। उसने मनुष्य को पाप से बचाने, उसे निरंतर अनैतिकता में गिरते रहने से रोकने और रसातल व नरक में जीने से रोकने का प्रयास किया, और मनुष्य को रसातल व नरक से बचाने में मनुष्य को जीते रहने देने का प्रयास किया। अब अंत के दिन आ गए हैं। परमेश्वर मनुष्य का विनाश कर देगा और मानवजाति को पूरी तरह से नष्ट कर देगा, अर्थात्, वह मानवजाति की विद्रोहशीलता को रूपांतरित कर देगा। इस कारण से, अतीत के दयालु और प्रेममय स्वभाव के साथ परमेश्वर के लिए युग को समाप्त करना या प्रबंधऩ की अपनी छह-हजार-वर्षीय योजना को सफल बनाना असंभव होगा। हर युग में परमेश्वर के स्वभाव का एक विशिष्ट प्रतिनिधित्व होता है, और हर युग में ऐसा कार्य होता है, जिसे परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए। इसलिए, प्रत्येक युग में स्वयं परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य में उसके सच्चे स्वभाव की अभिव्यक्ति शामिल रहती है, और उसका नाम और उसका कार्य दोनों युग के साथ बदल जाते हैं—वे सब नए होते हैं। व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा के नाम से मानवजाति का मार्गदर्शन करने का कार्य किया गया था, और पृथ्वी पर कार्य का पहला चरण आरंभ किया गया था। इस चरण के कार्य में मंदिर और वेदी का निर्माण करना, इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्था का उपयोग करना और इस्राएल के लोगों के बीच कार्य करना शामिल था। इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करके उसने पृथ्वी पर अपने कार्य के लिए एक आधार का इंतजाम किया। इस आधार से उसने अपने कार्य का फैलाव इस्राएल से बाहर किया, जिसका अर्थ है कि इस्राएल से शुरू करके उसने अपने कार्य को बाहर फैलाया, जिससे बाद की पीढ़ियों को धीरे-धीरे पता चला कि यहोवा परमेश्वर था, और कि वह यहोवा ही था, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का निर्माण किया, और कि वह यहोवा ही था, जिसने सभी सृजित प्राणियों को बनाया था। उसने इस्राएल के लोगों के माध्यम से अपने कार्य को उनसे परे फैलाया। इस्राएल की भूमि पृथ्वी पर यहोवा के कार्य का पहला पवित्र स्थान थी, और इस्राएल की भूमि पर ही परमेश्वर ने पृथ्वी पर सबसे पहले कार्य किया। वह व्यवस्था के युग का कार्य था। अनुग्रह के युग के दौरान, यीशु परमेश्वर था, जिसने मनुष्य को बचाया। उसके पास जो था और जो वह था, वह अनुग्रह, प्रेमपूर्ण अनुकंपा, दयालुता, संयम, धैर्य, विनम्रता, प्रेम और नरमी था, और उसने जो इतना अधिक कार्य किया, वह मनुष्य के छुटकारे की खातिर किया। उसका स्वभाव दयालुता और प्रेमपूर्ण अनुकंपा का था, और चूँकि वह दयालु और प्रेममय था, इसलिए उसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ना पड़ा, यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर मनुष्य से उसी प्रकार प्रेम करता है, जैसे वह स्वयं से करता है, यहाँ तक कि उसने स्वयं को अपनी संपूर्णता में बलिदान कर दिया। अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यीशु था, अर्थात्, परमेश्वर ऐसा परमेश्वर था जिसने मनुष्य को बचाया, और वह एक दयालु और प्रेममय परमेश्वर था। परमेश्वर मनुष्य के साथ था। उसका प्रेम, उसकी दया और उसका उद्धार प्रत्येक व्यक्ति के साथ था। केवल यीशु के नाम और उसकी उपस्थिति को स्वीकार करके ही मनुष्य शांति और आनंद प्राप्त करने, उसका आशीष, उसके व्यापक और विपुल अनुग्रह तथा उसका उद्धार प्राप्त करने में समर्थ था। यीशु को सलीब पर चढ़ाने के माध्यम से, उसका अनुसरण करने वाले सभी लोगों को उद्धार प्राप्त हो गया और उनके पाप क्षमा कर दिए गए। अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यीशु था। दूसरे शब्दों में, अनुग्रह के युग का कार्य मुख्यतः यीशु के नाम से किया गया था। अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर को यीशु कहा गया। उसने पुराने विधान से परे नए कार्य का एक चरण शुरू किया, और उसका कार्य सलीब पर चढ़ाए जाने के साथ समाप्त हो गया। यह उसके कार्य की संपूर्णता थी। इसलिए, व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यहोवा था, और अनुग्रह के युग में यीशु के नाम ने परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। अंत के दिनों के दौरान उसका नाम सर्वशक्तिमान परमेश्वर—सर्वशक्तिमान है, जो अपने सामर्थ्य का उपयोग मनुष्य का मार्गदर्शन करने, मनुष्य को जीतने, मनुष्य को प्राप्त करने के लिए करते हुए अंततः युग का समापन करता है। हर युग में, कार्य के उसके हर चरण में, परमेश्वर का स्वभाव दिखता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 42

क्या यीशु का नाम—“परमेश्वर हमारे साथ”—परमेश्वर के स्वभाव की समग्रता का प्रतिनिधित्व कर सकता है? क्या यह पूरी तरह से परमेश्वर को स्पष्ट कर सकता है? यदि मनुष्य कहता है कि परमेश्वर को केवल यीशु कहा जा सकता है, और उसका कोई अन्य नाम नहीं हो सकता क्योंकि परमेश्वर अपना स्वभाव नहीं बदल सकता, तो ऐसे वचन वास्तव में ईशनिंदा हैं! क्या तुम मानते हो कि यीशु, हमारे साथ परमेश्वर, का नाम अकेले परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व कर सकता है? परमेश्वर को कई नामों से बुलाया जा सकता है, किंतु इन नामों में से एक भी ऐसा नहीं है, जो परमेश्वर का सब कुछ समाहित कर सकता हो, एक भी ऐसा नहीं है जो परमेश्वर का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व कर सकता हो। और इसलिए, परमेश्वर के कई नाम हैं, किंतु ये कई नाम परमेश्वर के स्वभाव को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर सकते, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव इतना समृद्ध है कि वह बस मनुष्य के जानने की सीमा से आगे है। मनुष्य की भाषा का उपयोग करके परमेश्वर को पूरी तरह से समाहित करने का मनुष्य के पास कोई तरीका नहीं है। मनुष्य परमेश्वर के स्वभाव के बारे में जो कुछ जानता है, उस सबको समाहित करने के लिए उसके पास सीमित शब्दावली है : महान, कुलीन, अद्भुत, अथाह, सर्वोच्च, पवित्र, धार्मिक, बुद्धिमान इत्यादि। इतनी सीमित शब्दावली उस थोड़े-से का भी वर्णन करने में असमर्थ है, जो मनुष्य ने परमेश्वर के स्वभाव के बारे में देखा है। समय के साथ कई अन्य लोगों ने ऐसे शब्दों को जोड़ा, जिनके बारे में उन्हें लगता था कि वे उनके हृदय के उत्साह का बेहतर ढंग से वर्णन करने में समर्थ हैं : परमेश्वर इतना महान है! परमेश्वर इतना पवित्र है! परमेश्वर इतना प्यारा है! आज, मनुष्य की ऐसी उक्तियाँ अपने चरम पर पहुँच गई हैं, फिर भी मनुष्य अभी भी स्वयं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में असमर्थ है। और इसलिए, मनुष्य की नज़रों में परमेश्वर के कई नाम हैं, मगर उसका कोई एक नाम नहीं है, और ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर का अस्तित्व इतना प्रचुर है, लेकिन मनुष्य की भाषा इतनी दरिद्र है। कोई एक शब्द या नाम विशेष परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व कर ही नहीं सकता, तो क्या तुमको लगता है कि उसका नाम नियत किया जा सकता है? परमेश्वर इतना महान और इतना पवित्र है—क्या तुम उसे हर युग में अपना नाम नहीं बदलने दोगे? इसलिए, हर युग में, जिसमें परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है, वह उस कार्य को समाहित करने के लिए, जिसे करने का वह इरादा रखता है, एक ऐसे नाम का उपयोग करता है, जो उस युग के अनुकूल होता है। वह उस युग के महत्व वाले इस विशेष नाम का उपयोग उस युग के अपने स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के लिए करता है। यह परमेश्वर द्वारा अपने स्वभाव को व्यक्त करने के लिए मनुष्य की भाषा का उपयोग करना है। फिर भी बहुत-से लोग, जिन्हें आध्यात्मिक अनुभव हो चुके हैं और जिन्होंने परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से देखा है, अभी भी महसूस करते हैं कि यह एक विशेष नाम परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है—आह, इसमें कुछ नहीं किया जा सकता—इसलिए मनुष्य अब परमेश्वर को किसी नाम से नहीं बुलाता, बल्कि उसे केवल “परमेश्वर” कहता है। यह ऐसा है, मानो मनुष्य का हृदय प्रेम से भरा हो, लेकिन वह विरोधाभासों से भी घिरा हो, क्योंकि मनुष्य नहीं जानता कि परमेश्वर की व्याख्या कैसे की जाए। परमेश्वर जो है, वह इतना प्रचुर है कि उसके वर्णन का कोई तरीका है ही नहीं। ऐसा कोई अकेला नाम नहीं है, जो परमेश्वर के स्वभाव की समग्रता को धारण कर सकता हो, और ऐसा कोई अकेला नाम नहीं है, जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है उसका वर्णन कर सकता हो। यदि कोई मुझसे पूछे, “तुम ठीक-ठीक किस नाम का उपयोग करते हो?” तो मैं उनसे कहूँगा, “परमेश्वर तो परमेश्वर है!” क्या यह परमेश्वर के लिए सर्वोत्तम नाम नहीं है? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव का सर्वोत्तम संपुटीकरण नहीं है? ऐसा होते हुए भी तुम लोग परमेश्वर के नाम की छानबीन में इतना प्रयास क्यों लगाते हो? क्यों खाना और सोना त्यागकर सिर्फ एक नाम के वास्ते अपना दिमाग़ हमेशा चलाना चाहिए? एक दिन आएगा, जब परमेश्वर यहोवा, यीशु या मसीहा नहीं कहलाएगा—वह केवल सृष्टिकर्ता होगा। उस समय वे सभी नाम, जो उसने पृथ्वी पर धारण किए हैं, समाप्त हो जाएँगे, क्योंकि पृथ्वी पर उसका कार्य समाप्त हो गया होगा, जिसके बाद उसका कोई नाम नहीं होगा। जब सभी चीजें सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन आती हैं, तो उसे किसी अत्यधिक उपयुक्त फिर भी अपूर्ण नाम की क्या आवश्यकता है? क्या तुम अभी भी परमेश्वर के नाम की छानबीन कर रहे हो? क्या तुम अभी भी कहने का साहस करते हो कि परमेश्वर को केवल यहोवा ही कहा जा सकता है? क्या तुम अभी भी कहने का साहस करते हो कि परमेश्वर को केवल यीशु कहा जा सकता है? क्या तुम परमेश्वर के विरुद्ध ईशनिंदा का पाप सहन करने में समर्थ हो? तुम्हें पता होना चाहिए कि मूल रूप से परमेश्वर का कोई नाम नहीं था। उसने केवल एक या दो या कई नाम धारण किए, क्योंकि उसके पास करने के लिए कार्य था और उसे मानवजाति का प्रबंधन करना था। चाहे उसे किसी भी नाम से बुलाया जाए—क्या उसने स्वयं उसे स्वतंत्र रूप से नहीं चुना? क्या इसे निर्धारित करने के लिए उसे तुम्हारी—एक सृजित प्राणी की—आवश्यकता होगी? जिस नाम से परमेश्वर को बुलाया जाता है, वह ऐसा नाम है जो मनुष्य के समझने की क्षमता के अनुरूप होता है, मानवजाति की भाषा के अनुसार होता है, किंतु यह नाम कुछ ऐसा नहीं है, जिसे मनुष्य सारांशित कर सकता हो। तुम केवल इतना ही कह सकते हो कि स्वर्ग में एक परमेश्वर है, कि वह परमेश्वर कहलाता है, कि वह महान सामर्थ्य वाला स्वयं परमेश्वर है, जो इतना बुद्धिमान, इतना उत्कृष्ट, इतना अद्भुत, इतना रहस्यमय, इतना सर्वशक्तिमान है, और फिर तुम इससे अधिक कुछ नहीं कह सकते; तुम बस इतना जरा-सा ही जान सकते हो। ऐसा होने पर, क्या मात्र यीशु का नाम ही स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जब अंत के दिन आते हैं, भले ही यह अभी भी परमेश्वर ही है जो अपना कार्य करता है, फिर भी उसके नाम को बदलना ही है, क्योंकि यह एक भिन्न युग है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 43

जब यीशु अपना कार्य करने के लिए आया, तो यह पवित्र आत्मा के निर्देशन के तहत था; उसने उस तरह किया, जिस तरह पवित्र आत्मा चाहता था, न कि पुराने विधान के व्यवस्था के युग के अनुसार या यहोवा के कार्य के अनुसार। यद्यपि यीशु जिस कार्य को करने के लिए आया था, वह यहोवा की व्यवस्थाओं या यहोवा की आज्ञाओं का पालन करना नहीं था, फिर भी उनका स्रोत एक ही था। जो कार्य यीशु ने किया, उसने यीशु के नाम का प्रतिनिधित्व किया, और उसने अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व किया; जहाँ तक यहोवा द्वारा किए गए कार्य की बात है, उसने यहोवा का प्रतिनिधित्व किया, और उसने व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व किया। उनका कार्य दो भिन्न-भिन्न युगों में एक ही आत्मा का कार्य था। जो कार्य यीशु ने किया, वह केवल अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व कर सकता था, और जो कार्य यहोवा ने किया, वह केवल पुराने विधान के व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व कर सकता था। यहोवा ने केवल इस्राएल और मिस्र के लोगों का, और इस्राएल से परे सभी राष्ट्रों का मार्गदर्शन किया। जब यीशु नए विधान के अनुग्रह के युग में कार्य कर रहा था, तब परमेश्वर ने यीशु के नाम से कार्य किया और युग का मार्गदर्शन किया। यदि तुम कहो कि यीशु का कार्य यहोवा के कार्य पर आधारित था, कि उसने कोई नया कार्य आरंभ नहीं किया, और कि उसने जो कुछ भी किया, वह यहोवा के वचनों के अनुसार, यहोवा के कार्य और यशायाह की भविष्यवाणियों के अनुसार था, तो यीशु देहधारी बना परमेश्वर नहीं होता। यदि उसने अपना कार्य इस तरह से किया होता, तो वह व्यवस्था के युग का एक प्रेरित या कार्यकर्ता रहा होता। यदि ऐसा ही होता, जैसा तुम कहते हो, तो यीशु एक युग का सूत्रपात नहीं कर सकता था, न ही वह कोई अन्य कार्य कर सकता था। इसी तरह से, पवित्र आत्मा को मुख्य रूप से अपना कार्य यहोवा के माध्यम से करना चाहिए, और यहोवा के माध्यम के अलावा, पवित्र आत्मा कोई नया कार्य नहीं कर सकता था। मनुष्य का यीशु के कार्य को इस तरह से समझना ग़लत है। यदि मनुष्य मानता है कि यीशु द्वारा किया गया कार्य यहोवा के वचनों और यशायाह की भविष्यवाणियों के अनुसार था, तो क्या यीशु देहधारी परमेश्वर था, या वह नबियों में से कोई एक था? इस दृष्टिकोण के अनुसार, कोई अनुग्रह का युग न होता, और यीशु देहधारी परमेश्वर न होता, क्योंकि उसने जो कार्य किया, वह अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था और केवल पुराने विधान के व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व कर सकता था। केवल एक नया युग ही हो सकता था, जब यीशु नया कार्य करने, नए युग का सूत्रपात करने, इस्राएल में पहले किए गए कार्य को भंग करने, और अपना कार्य यहोवा द्वारा इस्राएल में किए गए कार्य के अनुसार या उसके पुराने विनियमों के अनुसार या किन्हीं विनियमों को लागू करने के लिए नहीं, बल्कि उस नए कार्य को करने के लिए आया था, जो उसे करना चाहिए था। स्वयं परमेश्वर युग का सूत्रपात करने के लिए आता है, और स्वयं परमेश्वर युग का अंत करने के लिए आता है। युग का आरंभ और युग का समापन करने का कार्य करने में मनुष्य असमर्थ है। यदि आने के बाद यीशु यहोवा का कार्य समाप्त नहीं करता, तो यह इस बात का सबूत होता कि वह मात्र एक व्यक्ति है और परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है। ठीक इसलिए, क्योंकि यीशु आया और उसने यहोवा के कार्य का समापन किया, यहोवा के कार्य को जारी रखा और, इसके अलावा, उसने अपना स्वयं का कार्य, एक नया कार्य किया, इससे साबित होता है कि यह एक नया युग था, और कि यीशु स्वयं परमेश्वर था। उन्होंने कार्य के स्पष्ट रूप से भिन्न दो चरण पूरे किए। एक चरण मंदिर में कार्यान्वित किया गया, और दूसरा मंदिर के बाहर संचालित किया गया। एक चरण व्यवस्था के अनुसार मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन करना था, और दूसरा, पापबलि चढ़ाना था। कार्य के ये दो चरण स्पष्ट रूप से भिन्न थे; यह नए युग को पुराने से विभाजित करता है, और यह कहना पूर्णतः सही है कि ये दो भिन्न युग हैं! उनके कार्य का स्थान भिन्न था, उनके कार्य की विषय-वस्तु भिन्न थी, और उनके कार्य का उद्देश्य भिन्न था। इस तरह उन्हें दो युगों में विभाजित किया जा सकता है; नए और पुराने विधान नए और पुराने युगों को संदर्भित करते हैं। जब यीशु आया, तो वह मंदिर में नहीं गया, जिससे साबित होता है कि यहोवा का युग समाप्त हो गया था। उसने मंदिर में प्रवेश नहीं किया, क्योंकि मंदिर में यहोवा का कार्य पूरा हो गया था, और उसे फिर से करने की आवश्यकता नहीं थी, और उसे पुनः करना उसे दोहराना होता। केवल मंदिर को छोड़ने, एक नया कार्य शुरू करने और मंदिर के बाहर एक नया मार्ग खोलकर ही वह परमेश्वर के कार्य को उसके शिखर पर पहुँचा सकता था। यदि वह अपना कार्य करने के लिए मंदिर से बाहर नहीं गया होता, तो परमेश्वर का कार्य मंदिर की बुनियाद पर रुक गया होता, और फिर कभी कोई नए परिवर्तन नहीं होते। और इसलिए, जब यीशु आया तो उसने मंदिर में प्रवेश नहीं किया, और अपना कार्य मंदिर में नहीं किया। उसने अपना कार्य मंदिर से बाहर किया, और शिष्यों की अगुआई करते हुए स्वतंत्र रूप से अपना कार्य किया। अपना कार्य करने के लिए मंदिर से परमेश्वर के प्रस्थान का अर्थ था कि परमेश्वर की एक नई योजना है। उसका कार्य मंदिर के बाहर कार्यान्वित किया जाना था, और इसे नया कार्य होना था, जो अपने कार्यान्वयन के तरीके में अप्रतिबंधित था। जैसे ही यीशु आया, उसने पुराने विधान के युग के दौरान यहोवा के कार्य को समाप्त किया। यद्यपि उन्हें दो भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया गया, फिर भी यह एक ही आत्मा था, जिसने कार्य के दोनों चरण संपन्न किए, और जो कार्य किया गया वह सतत था। चूँकि नाम भिन्न था, और कार्य की विषय-वस्तु भिन्न थी, इसलिए युग भिन्न था। जब यहोवा आया, तो वह यहोवा का युग था, और जब यीशु आया, तो वह यीशु का युग था। और इसलिए, हर आगमन के साथ परमेश्वर को एक नाम से बुलाया जाता है, जो एक युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह एक नया मार्ग खोलता है; और हर नए मार्ग के लिए वह एक नया नाम अपनाता है। यह सब दर्शाता है कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता, और कि उसका कार्य आगे की दिशा में प्रगति करने से कभी नहीं रुकता। इतिहास हमेशा आगे बढ़ रहा है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है। उसकी छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना को अंत तक पहुँचने के लिए उसे आगे की दिशा में प्रगति करते रहना चाहिए। हर दिन उसे नया कार्य करना चाहिए, हर वर्ष उसे नया कार्य करना चाहिए; उसे नए मार्ग खोलने चाहिए, नए युगों का सूत्रपात करना चाहिए, और अधिक नया और अधिक बड़ा कार्य आरंभ करना चाहिए। इन सबके साथ, वह नए नाम और नया कार्य लाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 44

“यहोवा” वह नाम है जिसे मैंने इस्राएल में अपने कार्य के दौरान अपनाया था, और इसका अर्थ है इस्राएलियों (परमेश्वर के चुने हुए लोगों) का परमेश्वर, जो मनुष्य के प्रति दया दिखा सकता है, मनुष्य को शाप दे सकता है, और मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन कर सकता है; वह परमेश्वर, जिसके पास बड़ा सामर्थ्य है और जो बुद्धि से भरपूर है। “यीशु” इम्मानुएल है, जिसका अर्थ है वह पाप-बलि, जो प्रेमपूर्ण अनुकंपा से भरा है, दयालुता से भरपूर है, और मनुष्य को छुटकारा दिलाता है। उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, और वह अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह प्रबंधन योजना के केवल एक भाग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। अर्थात्, केवल यहोवा ही इस्राएल के चुने हुए लोगों का परमेश्वर, अब्राहम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, याकूब का परमेश्वर, मूसा का परमेश्वर और इस्राएल के सभी लोगों का परमेश्वर है। और इसलिए, यहूदी लोगों समेत उस समय के सभी इस्राएली यहोवा की आराधना करते थे। वे वेदी पर उसके लिए बलिदान करते थे और याजकीय लबादे पहनकर मंदिर में उसकी सेवा करते थे। वे यहोवा के पुनः प्रकट होने की आशा करते थे। केवल यीशु ही मानवजाति को छुटकारा दिलाने वाला है, और वह वो पाप-बलि है, जिसने मानवजाति को पाप से छुटकारा दिलाया है। कहने का तात्पर्य यह है कि यीशु का नाम अनुग्रह के युग से आया, और अनुग्रह के युग में छुटकारे के कार्य के कारण विद्यमान रहा। यीशु का नाम अनुग्रह के युग के लोगों को पुनर्जन्म दिए जाने और बचाए जाने के लिए अस्तित्व में आया, और वह पूरी मानवजाति के छुटकारे के लिए एक विशेष नाम है। इस प्रकार, “यीशु” नाम छुटकारे के कार्य को दर्शाता है और अनुग्रह के युग का द्योतक है। “यहोवा” नाम इस्राएल के उन लोगों के लिए एक विशेष नाम है, जो व्यवस्था के अधीन जिए थे। प्रत्येक युग में और कार्य के प्रत्येक चरण में मेरा नाम आधारहीन नहीं है, बल्कि प्रातिनिधिक मायने रखता है : प्रत्येक नाम एक युग का प्रतिनिधित्व करता है। “यहोवा” व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह सम्मानसूचक शब्द है, जिससे इस्राएल के लोग उस परमेश्वर को पुकारते थे जिसकी वे आराधना करते थे। “यीशु” अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है और उन सबके परमेश्वर का नाम है, जिन्हें अनुग्रह के युग के दौरान छुटकारा दिया गया था। यदि मनुष्य अब भी अंत के दिनों के दौरान उद्धारकर्ता यीशु के आगमन की अभिलाषा करता है, और उसके अब भी उसी छवि में आने की अपेक्षा करता है जो उसने यहूदिया में अपनाई थी, तो छह हज़ार सालों की संपूर्ण प्रबंधन योजना छुटकारे के युग में रुक गई होती, और आगे प्रगति न कर पाती। इतना ही नहीं, अंत के दिनों का आगमन कभी न होता, और युग का समापन कभी न किया जाता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उद्धारकर्ता यीशु सिर्फ मानवजाति के छुटकारे और उद्धार के लिए है। “यीशु” नाम मैंने अनुग्रह के युग के सभी पापियों की खातिर अपनाया था, और यह वह नाम नहीं है जिसके द्वारा मैं पूरी मानवजाति को समापन पर ले जाऊँगा। यद्यपि यहोवा, यीशु और मसीहा सभी मेरे आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं, किंतु ये नाम केवल मेरी प्रबंधन योजना के विभिन्न युगों के द्योतक हैं, और मेरी संपूर्णता में मेरा प्रतिनिधित्व नहीं करते। पृथ्वी पर लोग मुझे जिन नामों से पुकारते हैं, वे मेरे संपूर्ण स्वभाव और स्वरूप का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते। वे मात्र अलग-अलग नाम हैं, जिनके द्वारा मुझे विभिन्न युगों के दौरान पुकारा जाता है। और इसलिए, जब अंतिम युग—आखिरी युग—का आगमन होता है, तो मेरा नाम पुनः बदल जाएगा। मुझे यहोवा या यीशु नहीं कहा जाएगा, मसीहा तो कदापि नहीं—मुझे स्वयं सामर्थ्यवान और सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा, और इस नाम के तहत ही मैं समस्त युग का समापन करूँगा। एक समय मैं यहोवा के नाम से पुकारा जाता था, एक समय मुझे लोग मसीहा के रूप में भी जानते थे और एक समय लोग मुझे प्यार और सम्मान से उद्धारकर्ता यीशु भी कहते थे। आज मैं वह यहोवा या यीशु नहीं हूँ, जिसे लोग अतीत में जानते थे। बल्कि मैं वह परमेश्वर हूँ जो अंत के दिनों में वापस आया है, वह परमेश्वर जो युग का समापन करेगा; मैं स्वयं परमेश्वर हूँ, जो अपने संपूर्ण स्वभाव से भरा है और अधिकार, आदर और महिमा से भरा, पृथ्वी के छोर से उदित होता है। लोग कभी मेरे संपर्क में नहीं रहे हैं, उन्होंने मुझे कभी जाना नहीं है और वे मेरे स्वभाव से हमेशा अनभिज्ञ रहे हैं। संसार की रचना के समय से लेकर आज तक एक भी मनुष्य ने मुझे नहीं देखा है। यह वह परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान लोगों पर प्रकट होता है, किंतु उनके बीच छिपा हुआ है। वह सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से लबालब भरा हुआ, दहकते हुए सूर्य और धधकती हुई आग के समान, सच्चे और वास्तविक रूप में, लोगों के बीच निवास करता है। ऐसा एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जिसका मेरे वचनों द्वारा न्याय नहीं किया जाएगा, और ऐसा एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जिसे जलती आग के माध्यम से शुद्ध नहीं किया जाएगा। अंततः मेरे वचनों के कारण तमाम देश धन्य हो जाएँगे और मेरे वचनों के कारण टुकड़े-टुकड़े भी कर दिए जाएँगे। इस तरह अंत के दिनों में सभी लोग देखेंगे कि मैं ही वह उद्धारकर्ता हूँ जो वापस लौट आया है, और मैं ही वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ जो समस्त मानवजाति को जीतता है। और सभी देखेंगे कि मैं एक बार मनुष्य के लिए पाप-बलि था, किंतु अंत के दिनों में मैं धधकते सूर्य की ज्वाला बन गया हूँ जो सभी चीजों को जला देती है, और साथ ही मैं धार्मिकता का सूर्य बन गया हूँ जो सभी चीजों को प्रकट कर देता है। यह मेरा अंत के दिनों का कार्य है। मैं इस नाम को अपनाता हूँ और यह स्वभाव धारण करता हूँ ताकि सभी लोग देख सकें कि मैं धार्मिक परमेश्वर हूँ, दहकता हुआ सूर्य हूँ और धधकती हुई ज्वाला हूँ, और ताकि सभी मेरी, एक सच्चे परमेश्वर की आराधना कर सकें, और ताकि वे मेरे असली चेहरे को देख सकें : मैं केवल इस्राएलियों का परमेश्वर नहीं हूँ, और मैं केवल छुटकारा दिलाने वाला नहीं हूँ; बल्कि मैं समस्त आकाश, पृथ्वी और महासागरों के सारे प्राणियों का परमेश्वर हूँ।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, उद्धारकर्ता पहले ही एक “सफेद बादल” पर सवार होकर वापस आ चुका है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 45

यदि अंत के दिनों के दौरान उद्धारकर्ता का आगमन होता और उसे तब भी यीशु कहकर पुकारा जाता, और उसने दोबारा यहूदिया में जन्म लिया होता और वहीं अपना काम किया होता, तो इससे यह प्रमाणित होता कि मैंने केवल इस्राएल के लोगों की ही रचना की थी और केवल इस्राएल के लोगों को ही छुटकारा दिलाया था, और अन्य जातियों से मेरा कोई वास्ता नहीं है। क्या यह मेरे इन वचनों का खंडन न करता कि “मैं वह प्रभु हूँ जिसने आकाश, पृथ्वी और सभी वस्तुओं को बनाया है?” मैंने यहूदिया को छोड़ दिया और अन्य जातियों के बीच कार्य करता हूँ, क्योंकि मैं मात्र इस्राएल के लोगों का ही परमेश्वर नहीं हूँ, बल्कि सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर हूँ। मैं अंत के दिनों के दौरान अन्य जातियों के बीच प्रकट होता हूँ, क्योंकि मैं केवल इस्राएल के लोगों का परमेश्वर यहोवा नहीं हूँ, बल्कि, इससे भी बढ़कर, अन्य-जाति राष्ट्रों में भी मेरे चुने हुए सभी लोगों का सृष्टिकर्ता मैं ही हूँ। मैंने न केवल इस्राएल, मिस्र और लेबनान की रचना की, बल्कि इस्राएल से बाहर के सभी अन्य जाति के राष्ट्रों की भी रचना की। इस कारण, मैं सभी सृजित प्राणियों का प्रभु हूँ। मैंने इस्राएल का मात्र अपने कार्य के आरंभिक बिंदु के रूप में इस्तेमाल किया था, मैंने यहूदिया और गलील को छुटकारे के अपने कार्य के महत्वपूर्ण केंद्रों के रूप में इस्तेमाल किया था, और अब मैं एक अन्य जाति राष्ट्र को ऐसे आधार के रूप में इस्तेमाल करता हूँ, जहाँ से मैं पूरे युग का समापन करूँगा। मैंने कार्य के दो चरण इस्राएल में पूरे किए थे (ये दो चरण हैं व्यवस्था का युग और अनुग्रह का युग), और मैं कार्य के आगे के दो चरण (अनुग्रह का युग और राज्य का युग) इस्राएल के बाहर तमाम देशों में करता आ रहा हूँ। अन्य जाति के राष्ट्रों के बीच मैं विजय का कार्य करूँगा और इस तरह युग का समापन करूँगा। यदि मनुष्य मुझे हमेशा यीशु मसीह कहता है, किंतु यह नहीं जानता कि मैंने अंत के दिनों के दौरान एक नए युग की शुरुआत कर दी है और एक नया कार्य प्रारंभ कर दिया है, और यदि मनुष्य हमेशा मूर्खतापूर्ण ढंग से उद्धारकर्ता यीशु के आगमन का इंतज़ार करता रहता है, तो मैं कहूँगा कि ऐसे लोग वे हैं जो मुझ पर विश्वास नहीं करते; वे वो लोग हैं जो मुझे नहीं जानते, जो विश्वासी होने का दिखावा करते हैं। क्या ऐसे लोग उद्धारकर्ता यीशु का स्वर्ग से आगमन देख सकते हैं? वे मेरे आगमन का इंतज़ार नहीं करते, बल्कि यहूदियों के राजा के आगमन का इंतज़ार करते हैं। वे मेरे द्वारा इस पुराने गंदे संसार के विनाश की लालसा नहीं करते, बल्कि इसके बजाय यीशु के द्वितीय आगमन की लालसा करते हैं, जिसके पश्चात् उन्हें छुटकारा दिया जाएगा—वे यीशु द्वारा एक बार फिर से पूरी मानवजाति को इस अशुद्ध और अधार्मिक भूमि से छुटकारा दिलाए जाने की प्रतीक्षा करते हैं। ऐसे लोग अंत के दिनों के दौरान मेरे कार्य को पूरा करने वाले कैसे बन सकते हैं? मनुष्य की कामनाएँ मेरी इच्छाएँ पूरी करने या मेरा कार्य पूरा करने में अक्षम हैं, क्योंकि मनुष्य केवल उस कार्य की प्रशंसा करता है और उस कार्य से प्यार करता है, जिसे मैंने पहले किया है, और उसे कोई अंदाजा नहीं है कि मैं स्वयं परमेश्वर हूँ जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं होता, और केवल इतना जानता है कि मैं यहोवा और यीशु हूँ, बगैर किसी आभास के कि मैं ही अंत के दिनों का वह परमेश्वर हूँ, जो मानवजाति का समापन करेगा। वह सब, जिसके लिए मनुष्य तरसता है और जो वह जानता है, उसकी अपनी धारणाओं से आता है, जो मात्र वह है जिसे वह अपनी आँखों से देख सकता है। वह उस कार्य के अनुरूप नहीं है, जो मैं करता हूँ, बल्कि उससे असंगत है। यदि मेरा कार्य मनुष्य के विचारों के अनुसार किया जाता, तो यह कब समाप्त होता? कब मानवजाति विश्राम में प्रवेश करती? और कैसे मैं सातवें दिन, सब्त, में प्रवेश करने में सक्षम होता? मैं अपनी योजना के अनुसार और अपने लक्ष्य के अनुसार कार्य करता हूँ—मनुष्य के इरादों के अनुसार नहीं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, उद्धारकर्ता पहले ही एक “सफेद बादल” पर सवार होकर वापस आ चुका है

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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