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प्रभु यीशु ने फरीसियों को क्यों शाप दिया था? फरीसियों का सार क्या था?

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1. प्रभु यीशु ने फरीसियों को क्यों शाप दिया था? फरीसियों का सार क्या था?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"तुम भी अपनी परम्पराओं के कारण क्यों परमेश्‍वर की आज्ञा टालते हो? क्योंकि परमेश्‍वर ने कहा है, 'अपने पिता और अपनी माता का आदर करना', और 'जो कोई पिता या माता को बुरा कहे, वह मार डाला जाए।' पर तुम कहते हो कि यदि कोई अपने पिता या माता से कहे, 'जो कुछ तुझे मुझ से लाभ पहुँच सकता था, वह परमेश्‍वर को भेंट चढ़ाया जा चुका', तो वह अपने पिता का आदर न करे, इस प्रकार तुम ने अपनी परम्परा के कारण परमेश्‍वर का वचन टाल दिया। हे कपटियो, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यद्वाणी ठीक ही की है: 'ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझ से दूर रहता है। और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं'" (मत्ती 15:3-9)।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

"हे अंधे अगुवो, तुम पर हाय! जो कहते हो कि यदि कोई मन्दिर की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु यदि कोई मन्दिर के सोने की सौगन्ध खाए तो उससे बंध जाएगा। हे मूर्खो और अंधो, कौन बड़ा है; सोना या वह मन्दिर जिससे सोना पवित्र होता है? फिर कहते हो कि यदि कोई वेदी की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु जो भेंट उस पर है, यदि कोई उसकी शपथ खाए तो बंध जाएगा। हे अंधो, कौन बड़ा है; भेंट या वेदी जिससे भेंट पवित्र होती है? इसलिये जो वेदी की शपथ खाता है, वह उसकी और जो कुछ उस पर है, उसकी भी शपथ खाता है। जो मन्दिर की शपथ खाता है, वह उसकी और उसमें रहनेवाले की भी शपथ खाता है। जो स्वर्ग की शपथ खाता है, वह परमेश्‍वर के सिंहासन की और उस पर बैठनेवाले की भी शपथ खाता है।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम पोदीने, और सौंफ, और जीरे का दसवाँ अंश तो देते हो, परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात् न्याय, और दया, और विश्‍वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते। हे अंधे अगुवो, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊँट को निगल जाते हो।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर से तो मांजते हो परन्तु वे भीतर अन्धेर और असंयम से भरे हुए हैं। हे अंधे फरीसी, पहले कटोरे और थाली को भीतर से मांज कि वे बाहर से भी स्वच्छ हों।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं। इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम भविष्यद्वक्‍ताओं की कब्रें सँवारते और धर्मियों की कब्रें बनाते हो, और कहते हो, 'यदि हम अपने बापदादों के दिनों में होते तो भविष्यद्वक्‍ताओं की हत्या में उनके साझी न होते।' इससे तो तुम अपने पर आप ही गवाही देते हो कि तुम भविष्यद्वक्‍ताओं के हत्यारों की सन्तान हो। अत: तुम अपने बापदादों के पाप का घड़ा पूरी तरह भर दो। हे साँपो, हे करैतों के बच्‍चो, तुम नरक के दण्ड से कैसे बचोगे? इसलिये देखो, मैं तुम्हारे पास भविष्यद्वक्‍ताओं और बुद्धिमानों और शास्त्रियों को भेजता हूँ; और तुम उनमें से कुछ को मार डालोगे और क्रूस पर चढ़ाओगे, और कुछ को अपने आराधनालयों में कोड़े मारोगे और एक नगर से दूसरे नगर में खदेड़ते फिरोगे। जिससे धर्मी हाबिल से लेकर बिरिक्याह के पुत्र जकरयाह तक, जिसे तुम ने मन्दिर और वेदी के बीच में मार डाला था, जितने धर्मियों का लहू पृथ्वी पर बहाया गया है वह सब तुम्हारे सिर पर पड़ेगा। मैं तुम से सच कहता हूँ, ये सब बातें इस समय के लोगों पर आ पड़ेंगी" (मत्ती 23:13-36)।

"प्रधान याजकों और पुरनियों ने लोगों को उभारा कि वे बरअब्बा को माँग लें, और यीशु का नाश कराएँ। हाकिम ने उनसे पूछा, 'इन दोनों में से किस को चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये छोड़ दूँ?' उन्होंने कहा, 'बरअब्बा को।' पिलातुस ने उनसे पूछा, 'फिर यीशु को, जो मसीह कहलाता है, क्या करूँ?' सब ने उससे कहा, 'वह क्रूस पर चढ़ाया जाए!' हाकिम ने कहा, 'क्यों, उसने क्या बुराई की है?' परन्तु वे और भी चिल्‍ला-चिल्‍लाकर कहने लगे, 'वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।' जब पिलातुस ने देखा कि कुछ बन नहीं पड़ता परन्तु इसके विपरीत हुल्‍लड़ बढ़ता जाता है, तो उसने पानी लेकर भीड़ के सामने अपने हाथ धोए और कहा, 'मैं इस धर्मी के लहू से निर्दोष हूँ; तुम ही जानो।' सब लोगों ने उत्तर दिया, 'इसका लहू हम पर और हमारी सन्तान पर हो!' इस पर उसने बरअब्बा को उनके लिये छोड़ दिया, और यीशु को कोड़े लगवाकर सौंप दिया, कि क्रूस पर चढ़ाया जाए" (मत्ती 27:20-26)।

"यीशु ने उनसे कहा, 'यदि परमेश्‍वर तुम्हारा पिता होता, तो तुम मुझ से प्रेम रखते; क्योंकि मैं परमेश्‍वर की ओर से आया हूँ। मैं आप से नहीं आया, परन्तु उसी ने मुझे भेजा। तुम मेरी बात क्यों नहीं समझते? इसलिये कि तुम मेरा वचन सुन नहीं सकते। तुम अपने पिता शैतान से हो और अपने पिता की लालसाओं को पूरा करना चाहते हो। वह तो आरम्भ से हत्यारा है और सत्य पर स्थिर न रहा, क्योंकि सत्य उसमें है ही नहीं। जब वह झूठ बोलता, तो अपने स्वभाव ही से बोलता है; क्योंकि वह झूठा है वरन् झूठ का पिता है। परन्तु मैं जो सच बोलता हूँ, इसी लिये तुम मेरा विश्‍वास नहीं करते। तुम में से कौन मुझे पापी ठहराता है? यदि मैं सच बोलता हूँ, तो तुम मेरा विश्‍वास क्यों नहीं करते? जो परमेश्‍वर से होता है, वह परमेश्‍वर की बातें सुनता है; और तुम इसलिये नहीं सुनते कि परमेश्‍वर की ओर से नहीं हो'" (यूहन्ना 8:42-47)।

"हे साँप के बच्‍चो, तुम बुरे होकर कैसे अच्छी बातें कह सकते हो? क्योंकि जो मन में भरा है, वही मुँह पर आता है" (मत्ती 12:34)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

10. फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना

मरकुस 3:21-22 जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो वे उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे कि उसका चित ठिकाने नहीं है। शास्त्री भी जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, "उसमें शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।"

11. प्रभु यीशु की फरीसियों को डाँट

मत्ती 12:31-32 इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।

मत्ती 23:13-15 हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

ऊपर दो अलग अलग अंश हैं—आओ पहले हम पहले वाले पर एक नज़र डालें: फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना।

बाइबल में, फरीसियों के द्वारा स्वयं यीशु का और उसके द्वारा कही गई चीज़ों का मूल्यांकन यह था: "क्योंकि वे कहते थे, कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है। ...उसमें शैतान है, और वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है" (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाना रट्टू तोते की तरह बोलना या शून्य में कल्पना करना नहीं था—उसके कार्यों के बारे में जो कुछ उन्होंने देखा और सुना था उसके आधार पर यह प्रभु यीशु के बारे में उनका निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष दिखावे के रूप में न्याय के नाम पर लिया गया था और लोगों को ऐसा दिखता था मानो कि उन्हें अच्छे प्रमाणों से स्थापित किया गया है, किन्तु वह अहंकार जिसके साथ उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाया था उस पर काबू पाना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के लिए उनकी उन्मत्त ऊर्जा ने स्वयं उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं और उनके दुष्ट शैतानी चेहरे, और साथ ही परमेश्वर का विरोध करने के उनके द्वेषपूर्ण स्वभाव को भी उजागर कर दिया था। ये बातें जो उन्होंने प्रभु यीशु पर दोष लगाते हुए कही थीं वे उनकी खतरनाक महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर तथा सच्चाई के प्रति उनकी शत्रुता के कुरूप और द्वेषपूर्ण स्वभाव से प्रेरित थीं। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की खोज नहीं की, और ना ही उन्होंने जो कुछ उसने कहा या किया था उसके सार की खोज की। परन्तु जो कुछ उसने किया था उस पर उन्होंने बिना देखे, अधीरता से, सनक और जानबूझकर किए गए द्वेष के साथ आक्रमण किया और उसे बदनाम किया। यह यहाँ तक कि उसके आत्मा, अर्थात् पवित्र आत्मा, परमेश्वर के आत्मा को विवेकहीन तरीके से बदनाम करने की हद तक था। यही उनका मतलब था जब उन्होंने कहा था "उसका चित ठिकाने नहीं है," "बालज़बूल" और "दुष्टात्माओं का सरदार।" अर्थात्, उन्होंने कहा कि परमेश्वर का आत्मा बालज़बूल और दुष्टात्माओं का सरदार है। उन्होंने उस देह के कार्य को जिसे परमेश्वर के आत्मा ने पहना हुआ था पागलपन कहा। उन्होंने ना केवल बालज़बूल और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की, बल्कि उन्होंने परमेश्वर के कार्य की भी निंदा की। उन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी ईशनिंदा की। उनके प्रतिरोध का सार और परमेश्वर की ईशनिंदा पूरी तरह से शैतान के सार और परमेश्वर के प्रति दुष्टात्मा के प्रतिरोध और परमेश्वर की निंदा के समान था। वे न केवल भ्रष्ट मनुष्यों को दर्शाते थे, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा वे शैतान के मूर्त रूप थे। वे मनुष्यजाति के बीच शैतान के लिए एक माध्यम थे, और वे शैतान के सहअपराधी और सन्देशवाहक थे। उनकी ईशनिंदा का सार और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह की अवमानना हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ उनका संघर्ष, परमेश्वर के साथ उनकी प्रतिस्पर्धा, परमेश्वर की परीक्षा लेने की उनकी कभी न खत्म होने वाली इच्छा थी। परमेश्वर के उनके प्रतिरोध का सार और उसके प्रति उनकी शत्रुता का रवैया, और साथ ही उनके वचनों और उनके विचारों ने सीधे-सीधे परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की और उसे क्रोधित किया। इसलिए, जो कुछ उन्होंने कहा और किया था उसके लिए परमेश्वर ने एक उचित दण्ड का निर्धारण किया, और उनके कर्मों को पवित्र आत्मा के विरूद्ध पाप के रूप में निर्धारित किया। यह पाप इस संसार और आने वाले संसार में, दोनों में अक्षम्य है, बिल्कुल वैसे ही जैसा कि पवित्रशास्त्र का निम्नलिखित अंश कहता हैः "मनुष्य द्वारा की गई पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी" और "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" ...

... क्या तुम लोगों ने पवित्रशास्त्र के इन दोनों अंशों में किसी चीज़ पर ध्यान दिया? कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के क्रोध को देखते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर के स्वभाव के उस पक्ष को देखते हैं जो मनुष्यजाति से अपमान को सहन नहीं कर सकता है, और यह कि यदि लोग ऐसा कुछ करते हैं जिससे परमेश्वर की ईशनिंदा होती है, तो वे उसकी क्षमा को प्राप्त नहीं करेंगे। इस तथ्य के बावजूद कि लोग इन दोनों अंशों में परमेश्वर के क्रोध और उसकी असहिष्णुता को देखते और महसूस करते हैं, तब भी उसका रवैया सचमुच में उनकी समझ में नहीं आता है। ये दोनों अंश उन लोगों के प्रति परमेश्वर के सच्‍चे रवैये और दृष्टिकोण के निहितार्थ से युक्त हैं जो उसकी ईशनिंदा और उसे क्रोधित करते हैं। पवित्रशास्त्र का यह अंश उसके रवैये और दृष्टिकोण के सच्चे अर्थ को धारण करता हैः "जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।" जब लोग परमेश्वर की ईशनिंदा करते हैं, जब वे उसे क्रोधित करते, तो वह एक निर्णय जारी करता है, और यह निर्णय उसका अंतिम परिणाम होता है। यह बाइबल मे इस प्रकार से वर्णित हैः "इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी" (मत्ती 12:31), और "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय!" (मत्ती 23:13)।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से उद्धृत

यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। उन्होंने उस समय के यीशु के अनुकूल होने की खोज नहीं की, बल्कि नियम का अक्षरशः पालन कर्मठतापूर्वक किया, इस हद तक किया कि अंततः उन्होंने निर्दोष यीशु को, पुराने नियम की व्यवस्था का पालन न करने और मसीहा न होने का आरोप लगाते हुए, क्रूस पर चढ़ा दिया। उनका सारतत्व क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के अनुकूल होने के मार्ग की खोज नहीं की? उनमें पवित्रशास्त्र के हर एक वचन का जुनून सवार हो गया था, जबकि मेरी इच्छा और मेरे कार्य के चरणों और कार्य की विधियों पर कोई भी ध्यान नहीं दिया। ये वे लोग नहीं थे जो सत्य को खोज रहे थे, बल्कि ये वे लोग थे जो कठोरता से पवित्रशास्त्र के वचनों का पालन करते थे; ये वे लोग नहीं थे जो सत्य की खोज करते थे, बल्कि ये वे लोग थे जो बाइबल में विश्वास करते थे। दरअसल वे बाइबल के रक्षक थे। बाइबल के हितों की सुरक्षा करने, और बाइबल की मर्यादा को बनाये रखने, और बाइबल की प्रतिष्ठा को बचाने के लिए, वे यहाँ तक गिर गए कि उन्होंने दयालु यीशु को भी क्रूस पर चढ़ा दिया। यह उन्होंने सिर्फ़ बाइबल की रक्षा करने के लिए, और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक वचन के स्तर को बनाये रखने के लिए ही किया। इस प्रकार उन्होंने यीशु को, जिसने पवित्रशास्त्र के सिद्धान्त का पालन नहीं किया, मृत्यु दंड देने के लिये अपने भविष्य और पापबलि को त्यागना बेहतर समझा। क्या वे पवित्रशास्त्र के हर एक वचन के नौकर नहीं थे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए" से उद्धृत

स्मरण करें कि 2,000 वर्ष पहले यहूदियों द्वारा यीशु को सलीब पर चढ़ा दिए जाने के बाद क्या हुआ था। यहूदियों को इस्राएल से निर्वासित कर दिया गया था और वे दुनिया भर के देशों में भाग गए थे। कई लोगों को मार दिया गया था, और सम्पूर्ण यहूदी देश को अभूतपूर्व विनाश के अधीन कर दिया गया था। उन्होंने परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया था—जघन्य अपराध किया था—और परमेश्वर के स्वभाव को भड़काया था। उन्होंने जो किया था उसका उनसे भुगतान करवाया गया था, उनसे उनके कार्यों के परिणामों को भुगतने के लिए मजबूर किया गया था। उन्होंने परमेश्वर की निंदा की थी, परमेश्वर को अस्वीकार किया था, और इसलिए उनकी केवल एक ही नियति थी: परमेश्वर द्वारा दण्डित किया जाना। यही वह कड़वा परिणाम और आपदा है जो उनके शासक अपने देश और राष्ट्र पर लाए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है" से उद्धृत

फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया, क्या तुम लोग उसका कारण जानना चाहते हो? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे ज्यादा और क्या, उन्होंने केवल इस बात पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, मगर जीवन के इस सत्य की खोज नहीं की। इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं, क्यों उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है, और वे नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग कैसे कहते हो कि ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? वे यीशु का विरोध करते थे क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु के द्धारा कहे गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे, और क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। क्योंकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था, और कभी भी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने सिर्फ़ मसीहा के नाम को खोखली श्रद्धांजलि देने की गलती की, जबकि किसी न किसी ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत है: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, तुम मसीह नहीं हो जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण नहीं हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे, ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा" से उद्धृत

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