3. आप इस बात की गवाही देते हैं कि वचन देह में प्रकट होता है को व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर द्वारा प्रतिपादित किया गया था, फिर भी ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि ये वचन किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा बोले गए थे जिसे पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया गया था। तो आखिर, देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचनों और पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किसी व्यक्ति द्वारा कहे गए शब्दों के बीच क्या अंतर होता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

सत्य मनुष्य के संसार से आता है, किंतु मनुष्य के बीच सत्य मसीह द्वारा लाया जाता है। यह मसीह से, अर्थात् स्वयं परमेश्वर से उत्पन्न होता है और यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसमें मनुष्य समर्थ हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है

सत्य जीवन की सर्वाधिक व्यावहारिक सूक्ति है, और मानवजाति के बीच इस तरह की सूक्तियों में सर्वोच्च है। क्योंकि यही वह अपेक्षा है, जो परमेश्वर मनुष्य से करता है, और यही परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाने वाला कार्य है, इसीलिए इसे “जीवन की सूक्ति” कहा जाता है। यह कोई ऐसी सूक्ति नहीं है, जिसे किसी चीज में से संक्षिप्त किया गया है, न ही यह किसी महान हस्ती द्वारा कहा गया कोई प्रसिद्ध उद्धरण है। इसके बजाय, यह स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीजों के संप्रभु का मानवजाति के लिए कथन है; यह मनुष्य द्वारा किया गया कुछ वचनों का सारांश नहीं है, बल्कि परमेश्वर का अंतर्निहित जीवन है। और इसीलिए इसे “समस्त जीवन की सूक्तियों में उच्चतम” कहा जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं

परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन दिखने में भले ही सीधे-सादे या गहन हों, लेकिन वे सभी सत्य हैं, और मनुष्य के जीवन प्रवेश के लिए अपरिहार्य हैं; वे जीवन-जल के ऐसे झरने हैं, जो मनुष्य को आत्मा और देह दोनों से जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्‍य को जीवित रहने के लिए जरूरी चीजें मुहैया कराते हैं : उसके दैनिक जीवन के सिद्धांत और मत; उद्धार पाने का अनिवार्य मार्ग और साथ ही उस मार्ग के लक्ष्य और दिशा; हर वह सत्य जो उसमें परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के रूप में होना चाहिए; और हर वह सत्य जो यह बताए कि परमेश्वर के प्रति समर्पण कर उसकी आराधना कैसे की जाए। वे मनुष्य का अस्तित्व सुनिश्चित करने वाली गारंटी हैं, वे मनुष्य का दैनिक आहार हैं, और ऐसा मजबूत सहारा भी हैं, जो मनुष्य को सशक्त और अटल रहने में सक्षम बनाते हैं। वे सत्य वास्तविकता से संपन्‍न हैं जिससे सृजित मनुष्य सामान्य मानवता को जीता है, वे उस सत्य से संपन्‍न हैं, जिससे मनुष्य भ्रष्टता से मुक्त होता है और शैतान के जाल से बचता है, वे उस अथक शिक्षा, उपदेश, प्रोत्साहन और सांत्वना से संपन्‍न हैं, जो सृष्टिकर्ता सृजित मानवजाति को देता है। वे ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं जो मनुष्य को सभी सकारात्‍मक बातों को समझने के लिए मार्गदर्शन और प्रबोधन देते हैं, ये यह सुनिश्चित करने की गारंटी हैं कि मनुष्य उन सभी न्यायसंगत और नेक चीजों को जिए और धारण करे जो तमाम लोगों, घटनाओं और चीजों को मापने का मापदंड हैं और ऐसे सभी दिशानिर्देशों को भी जिए और प्राप्त करे जो मनुष्‍य को उद्धार और प्रकाश के मार्ग पर ले जाते हैं।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, प्रस्तावना

परमेश्वर के वचन को हरगिज मनुष्य का वचन नहीं ठहराया जा सकता मनुष्य के वचन को परमेश्वर का वचन हरगिज़ नहीं ठहराया जा सकता। परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया गया व्यक्ति देहधारी परमेश्वर नहीं है और देहधारी परमेश्वर एक ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया गया है। इसमें एक मूलभूत अंतर है। शायद ये वचन पढ़ने के बाद तुम इन्हें परमेश्वर के वचन नहीं मानते, बल्कि केवल उस प्रबुद्धता के रूप में मानते हो जो व्यक्ति ने हासिल की है। उस स्थिति में तुम बहुत अज्ञानी हो। परमेश्वर के वचन मनुष्य द्वारा हासिल प्रबोधन के समान कैसे हो सकते हैं? देहधारी परमेश्वर के वचन एक नया युग आरंभ करते हैं, समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करते हैं, रहस्य प्रकट करते हैं और मनुष्य को वह दिशा दिखाते हैं जो उसे नए युग में ग्रहण करनी है। मनुष्य जो प्रबुद्धता हासिल करता है, वह केवल कुछ साधारण अभ्यास या ज्ञान मात्र है। यह एक नए युग में समस्त मानवजाति को नहीं ले जा सकता या स्वयं परमेश्वर के रहस्य प्रकट नहीं कर सकता। आखिरकार, परमेश्वर परमेश्वर है और मनुष्य मनुष्य है। परमेश्वर में परमेश्वर का सार होता है और मनुष्य में मनुष्य का सार। यदि मनुष्य परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों को पवित्र आत्मा का साधारण प्रबोधन मानता है और प्रेरितों और नबियों के वचनों को परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से कहे गए वचन मानता है तो यह मनुष्य की गलती होगी। चाहे जो हो, तुम्हें कभी भी काले और सफेद को उलट-पुलट नहीं करना चाहिए, ऊँचे को नीचा नहीं समझना चाहिए, या गहरे को उथला नहीं कहना चाहिए; चाहे जो हो, तुम्हें कभी भी जानबूझकर उस बात का खंडन नहीं करना चाहिए जिसे तुम स्पष्ट रूप से सत्य जानते हो। जो भी यह विश्वास करता है कि परमेश्वर है, ऐसे हर व्यक्ति को समस्याओं की परख सही दृष्टिकोण से करनी चाहिए और परमेश्वर के नए कार्य और उसके नए वचनों को एक सृजित प्राणी की स्थिति से स्वीकार करना चाहिए; अन्यथा वह परमेश्वर द्वारा हटा दिया जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

मनुष्य के अभ्यास करने के तरीके और सत्य का उसका ज्ञान, ये सभी एक विशेष दायरे में लागू होते हैं। तुम यह नहीं कह सकते कि जिस मार्ग पर मनुष्य चलता है वह पूरी तरह से पवित्र आत्मा का इरादा है, क्योंकि मनुष्य को केवल पवित्र आत्मा द्वारा ही प्रबुद्ध किया जा सकता है और उसे पवित्र आत्मा से पूरी तरह से नहीं भरा जा सकता। जिन चीज़ों को मनुष्य अनुभव कर सकता है, वे सभी सामान्य मानवता के दायरे के भीतर हैं और वे सामान्य मानवीय बुद्धि में मौजूद विचारों की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ सकतीं। वे सभी लोग, जो सत्य वास्तविकता को जी सकते हैं, इस सीमा के भीतर अनुभव करते हैं। जब वे सत्य का अनुभव करते हैं, तो यह हमेशा पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध सामान्य मानवीय जीवन का अनुभव होता है; यह उस तरह से अनुभव करना नहीं है जो सामान्य मानवीय जीवन से भटक जाता है। वे अपने मानवीय जीवन को जीने की बुनियाद पर पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध किए गए सत्य का अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त, यह सत्य हर व्यक्ति के लिए अलग होता है, और इसकी गहराई उस व्यक्ति की अवस्था से संबंधित होती है। यह कहा जा सकता है कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसे व्यक्ति का सामान्य मानवीय जीवन है जो सत्य की खोज कर रहा है, और इसे ऐसा मार्ग कहा जा सकता है जिस पर पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध कोई सामान्य व्यक्ति चल चुका है। कोई यह नहीं कह सकता कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसा मार्ग है जिस पर पवित्र आत्मा चलता है। सामान्य मानवीय अनुभव में, क्योंकि जो लोग अनुसरण करते हैं वे एक समान नहीं होते, इसलिए पवित्र आत्मा का कार्य भी समान नहीं होता। इसके अतिरिक्त, क्योंकि जिन परिवेशों का लोग अनुभव करते हैं और उनके अनुभव की सीमाएँ एक समान नहीं होतीं, इसलिए उनके मन और विचारों के मिश्रण की वजह से, उनका अनुभव विभिन्न अंशों तक मिश्रित हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भिन्न व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार ही किसी सत्य को समझता है। सत्य के वास्तविक अर्थ की उसकी समझ पूर्ण नहीं होती और यह उसका केवल एक या कुछ ही पहलू होते हैं। मनुष्य सत्य के जिस दायरे का अनुभव करता है, वह प्रत्येक इंसान की परिस्थितियों के अनुरूप बदलता है। इस तरह, एक ही सत्य के बारे में विभिन्न लोगों द्वारा व्यक्त ज्ञान एक समान नहीं होता। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य के अनुभव की हमेशा सीमाएँ होती हैं और यह पवित्र आत्मा के इरादों को पूरी तरह से नहीं दर्शा सकता, और न ही मनुष्य के कार्य को परमेश्वर का कार्य समझा जा सकता, फिर चाहे जो कुछ मनुष्य द्वारा व्यक्त किया गया है, वह परमेश्वर के इरादों से बहुत बारीकी से मेल क्यों न खाता हो, भले ही मनुष्य का अनुभव पवित्र आत्मा द्वारा किए जाने वाले पूर्ण करने के कार्य के बेहद करीब ही क्यों न हो। मनुष्य केवल परमेश्वर का सेवक हो सकता है, जो केवल वही कार्य करता है जो परमेश्वर उसे सौंपता है। मनुष्य केवल पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध ज्ञान और व्यक्तिगत अनुभवों से प्राप्त सत्यों को ही व्यक्त कर सकता है। मनुष्य अयोग्य है और पवित्र आत्मा का निर्गम बनने की शर्तों को पूरा नहीं करता। वह यह कहने का हकदार नहीं है कि उसका कार्य परमेश्वर का कार्य है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

परमेश्वर जो सीधे व्यक्त करता है, सिर्फ वही सत्य है। पवित्र आत्मा का प्रबोधन केवल सत्य के अनुरूप है, क्योंकि पवित्र आत्मा लोगों को उनके आध्यात्मिक कद के अनुसार प्रबुद्ध करता है। वह लोगों से सीधे सत्य नहीं बोलता है। इसके बजाय, वह उन्हें प्रकाश देता है जिसे वे प्राप्त कर सकें। तुम्हें यह समझना होगा। अगर किसी व्यक्ति के पास परमेश्वर के वचनों पर कुछ अंतर्दृष्टि है और कुछ अनुभवजन्य ज्ञान है, तो क्या इसे सत्य माना जा सकता है? नहीं। ज्यादा से ज्यादा उसके पास सत्य की कुछ समझ है। पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के वचन परमेश्वर के वचनों का प्रतिनिधित्व नहीं करते, सत्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते, और वे सत्य नहीं हैं। ज्यादा से ज्यादा उस व्यक्ति के पास सत्य की कुछ समझ है, और उसे पवित्र आत्मा ने थोड़ा सा प्रबुद्ध बनाया है। अगर कोई व्यक्ति सत्य की कुछ समझ प्राप्त कर लेता है और फिर इसे दूसरों को प्रदान करता है, तो वह सिर्फ अपना अनुभवजन्य ज्ञान दूसरों को प्रदान कर रहा होता है। तुम यह नहीं कह सकते कि वह दूसरों तक सत्य की आपूर्ति कर रहा है। अगर तुम कहते हो कि वे सत्य पर संगति कर रहे हैं तो यह ठीक है; यह उचित वर्णन है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि तुम सत्य की अपनी समझ पर संगति करते हो; यह अपने आप में सत्य नहीं है। इसलिए तुम सिर्फ यह बोल सकते हो कि तुम कुछ अनुभवजन्य समझ पर संगति कर रहे हो; तुम यह कैसे कह सकते हो कि तुम सत्य की आपूर्ति कर रहे हो? सत्य की आपूर्ति करना कोई आसान बात नहीं है। यह वाक्य बोलने के योग्य कौन है? सिर्फ परमेश्वर ही लोगों तक सत्य की आपूर्ति करने में सक्षम है। क्या लोग सक्षम हैं? इसलिए तुम्हें इस मामले को स्पष्टता से देखना होगा। यह सिर्फ गलत वचनों के प्रयोग का मुद्दा नहीं है, सार यह है कि तुम तथ्यों के विरोध में जा रहे हो और उन्हें तोड़-मरोड़ रहे हो। जो तुम दावा कर रहे हो, वह बढ़ा-चढ़ाकर बोली गई बात है। लोगों में परमेश्वर के वचनों की कुछ अनुभवजन्य समझ हो सकती है, लेकिन तुम यह नहीं कह सकते कि उनके पास सत्य है, या कि वे सत्य के हैं। तुम ऐसा बिल्कुल नहीं कह सकते। चाहे लोग सत्य से कितनी भी समझ प्राप्त कर लें, तुम यह नहीं कह सकते कि उनके पास सत्य का जीवन है, यह कहना तो छोड़ ही दो कि वे सत्य के हैं। तुम ऐसा बिल्कुल नहीं कह सकते। लोग सिर्फ थोड़ा सा सत्य समझते हैं और उनके पास थोड़ा सा प्रकाश और अभ्यास के कुछ तरीके होते हैं। उनके पास सिर्फ समर्पण की कुछ वास्तविकता, और कुछ सच्चे परिवर्तन होते हैं। लेकिन तुम यह नहीं कह सकते कि उन्होंने सत्य प्राप्त कर लिया है। परमेश्वर सत्य व्यक्त करके लोगों को जीवन प्रदान करता है। परमेश्वर की यह भी अपेक्षा है कि लोग उसकी सेवा करने और उसे संतुष्ट करने के लिए सत्य समझें और सत्य प्राप्त करें। भले ही ऐसा दिन भी आए जब लोग परमेश्वर के कार्य का इस हद तक अनुभव कर लें कि वे वास्तव में सत्य प्राप्त कर चुके हों, तुम तब भी नहीं कह सकते कि लोग सत्य के हैं, यह कहना तो छोड़ ही दो कि लोगों के पास सत्य है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भले ही लोगों के पास वर्षों का अनुभव हो, तो भी उनकी सत्य प्राप्त करने की एक सीमा होगी और यह बहुत सतही है। सत्य बेहद गहरी और रहस्यमय चीज है; यह जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है। भले ही लोग पूरे जीवनकाल भर सत्य का अनुभव कर लें, जो उन्हें प्राप्त होगा वह बहुत सीमित होगा। लोग कभी भी पूर्ण सत्य प्राप्त करने, उसे पूरी तरह से समझने, या उसे पूरी तरह से जीने में सक्षम नहीं होंगे। परमेश्वर का यही मतलब है, जब वह कहता है कि लोग उसकी उपस्थिति में हमेशा बच्चे ही रहेंगे।

... सभी सत्य का अनुभव करते हैं, हर व्यक्ति के अनुभव करने की दशा अलग होती है। हर व्यक्ति जो सत्य से प्राप्त करता है वह भी अलग होता है। अगर तुम सभी लोगों की अनुभवजन्य समझ को मिला भी दो, तो भी यह पूरी तरह से सत्य के सार के स्तर तक नहीं पहुँचेगी। सत्य इतना गहरा और रहस्यमय होता है! मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि जो भी तुमने प्राप्त किया है और जो भी तुमने समझा है, वह सत्य की जगह नहीं ले सकता? जब लोग तुम्हारी कुछ अनुभवजन्य समझ पर तुम्हारी संगति सुनेंगे तो वे इसे समझ जाएँगे, और इसे पूरी तरह से समझने और प्राप्त करने के लिए उन्हें लंबे समय तक अनुभव लेने की आवश्यकता नहीं होगी। भले ही यह कुछ ज्यादा गहरा हो, उन्हें कई वर्षों के अनुभव की जरूरत नहीं होगी। लेकिन जहाँ तक सत्य की बात है, लोग अपने पूरे जीवनकाल में इसका पूरा अनुभव नहीं कर सकेंगे। भले ही तुम सभी को एक साथ जोड़ दो, वे भी इसे पूरा अनुभव नहीं कर सकेंगे। जैसे कि तुम देख सकते हो, सत्य बहुत गहरा और रहस्यमय होता है। सत्य की गहराई से व्याख्या करने में वचन अक्षम हैं। मनुष्य की भाषा में कहें तो सत्य ही मनुष्यों के लिए सार तत्व है। मनुष्य कभी भी इसे पूरी तरह से अनुभव करने में सक्षम नहीं होंगे और वे कभी भी सत्य को पूरी तरह जीने में सक्षम नहीं होंगे। ऐसा इसलिए कि भले ही लोग कई हजार वर्ष भी खपा दें, वे सत्य के एक तत्व का भी पूरी तरह अनुभव नहीं कर पाएँगे। चाहे लोगों के पास कितने ही वर्षों का अनुभव हो, जो सत्य वे समझेंगे और प्राप्त करेंगे वह सीमित होगा।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

सत्य स्वयं परमेश्वर का जीवन है; यह उसके स्वभाव, सार और जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, का प्रतिनिधित्व करता है। अगर तुम कहते हो कि कुछ अनुभवजन्य ज्ञान होने से तुमने सत्य पा लिया है, तो क्या तुमने पवित्रता प्राप्त कर ली है? तुम अभी भी भ्रष्टता प्रकट क्यों करते हो? तुम विभिन्न प्रकार के लोगों के बीच अंतर क्यों नहीं कर पाते? तुम परमेश्वर की गवाही क्यों नहीं दे पाते? अगर तुम कुछ सत्य समझते भी हो, तो भी क्या तुम परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते हो? क्या तुम परमेश्वर के स्वभाव को जी सकते हो? तुम्हारे पास एक सत्य के किसी निश्चित पहलू के बारे में कुछ अनुभवजन्य ज्ञान हो सकता है, और तुम अपने भाषण में उस पर थोड़ा प्रकाश डालने में सक्षम हो सकते हो, लेकिन तुम लोगों को जो प्रदान कर सकते हो, वह बेहद सीमित है और लंबे समय तक नहीं टिक सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि तुम्हारी समझ और तुम्हारे द्वारा प्राप्त किया गया प्रकाश सत्य के सार का प्रतिनिधित्व नहीं करते, और वे सत्य की संपूर्णता का प्रतिनिधित्व भी नहीं करते। वे सत्य के केवल एक पक्ष या एक छोटे-से पहलू का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे केवल एक स्तर हैं जिसे मनुष्य द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और जो अभी भी सत्य के सार से दूर है। यह थोड़ा-सा प्रकाश, प्रबुद्धता, अनुभवजन्य ज्ञान कभी सत्य का स्थान नहीं ले सकता। भले ही सभी लोगों ने सत्य का अनुभव कर कुछ परिणाम प्राप्त किए हों और उनके समस्त अनुभवजन्य ज्ञान को एक साथ रख दिया जाए, फिर भी वह उस सत्य की एक भी पंक्ति की संपूर्णता और सार तक नहीं पहुँच पाएगा। अतीत में कहा गया है, “मैं इसे मानव-संसार के लिए एक सूक्ति के साथ सारांशित करता हूँ : मनुष्यों में, कोई भी ऐसा नहीं है जो मुझे प्रेम करता है।” यह वाक्य सत्य, जीवन का सच्चा सार, सबसे गहन चीज, और स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति है। तुम अनुभवों से गुजरते हो और तीन वर्षों के अनुभव के बाद तुम्हें थोड़ी सतही समझ हो सकती है, और सात-आठ वर्षों के बाद तुम्हें थोड़ी और समझ हो सकती है, लेकिन यह समझ कभी सत्य की इस पंक्ति की जगह नहीं ले सकती। दो साल के बाद किसी और को थोड़ी समझ हो सकती है या दस साल बाद कुछ अधिक समझ हो सकती है या एक जीवनकाल के बाद अपेक्षाकृत ऊँची समझ हो सकती है, लेकिन तुम दोनों की साझा समझ सत्य की इस पँक्ति का स्थान नहीं ले सकती है। तुम दोनों के पास कितनी भी अंतर्दृष्टि, प्रकाश, अनुभव या ज्ञान हो, वे सत्य की इस पंक्ति की जगह कभी नहीं ले सकते। कहने का तात्पर्य यह है कि मानव-जीवन हमेशा मानव-जीवन होता है, और तुम्हारा ज्ञान कैसे भी सत्य, परमेश्वर के इरादों या परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप हो, वह सत्य का स्थान कभी नहीं ले सकता। लोगों के पास सत्य है, यह कहने का अर्थ यह होता है कि लोग वास्तव में सत्य को समझते हैं, परमेश्वर के वचनों की कुछ वास्तविकताओं को जीते हैं, परमेश्वर के बारे में कुछ वास्तविक ज्ञान रखते हैं, और परमेश्वर का उत्कर्ष कर उसकी गवाही दे सकते हैं। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि लोगों के पास पहले से ही सत्य है, क्योंकि सत्य बहुत गहन है। परमेश्वर के वचनों की सिर्फ एक पंक्ति का अनुभव करने में भी लोगों का पूरा जीवन लग सकता है, और कई जन्मों या हजारों वर्षों के अनुभव के बाद भी परमेश्वर के वचनों की एक भी पंक्ति का पूरी तरह से अनुभव नहीं किया जा सकता। यह स्पष्ट है कि सत्य को समझने और परमेश्वर को जानने की प्रक्रिया वास्तव में अंतहीन है, और इस बात की एक सीमा है कि लोग जीवन भर के अनुभव में कितना सत्य समझ सकते हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

पिछला: 2. आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु लौट आया है, कि वह देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, जो समूचे सत्य को व्यक्त कर रहा है जिससे मानव जाति को शुद्ध किया और बचाया जा सकता है, और यह कि वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को कर रहा है। तो हमें परमेश्वर की आवाज़ को कैसे पहचानना चाहिए, और हम यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु की वापसी है?

अगला: 4. नियम के युग में यशायाह, यहेजकेल और दानिय्येल जैसे भविष्यवक्ताओं द्वारा बताए गए परमेश्वर के शब्दों, और देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए परमेश्वर के वचनों में, क्या अंतर है?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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