4. मैं स्वीकार करता हूँ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचन सत्य हैं, लेकिन मेरा परिवार सीसीपी और धार्मिक समुदाय द्वारा फैलाई गई सभी झूठी बातों और भ्रांतियों में आ गया है। अंतिम दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य की जाँच करने से मुझे रोकने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर में अपने विश्वास के कारण अपने परिवार से नाता तोडना नहीं चाहता, लेकिन मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर में अपना विश्वास छोड़ना और परमेश्वर के उद्धार का अपना सुअवसर खोना भी नहीं चाहता हूँ। मेरे लिए क्या करना सही है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“जो माता या पिता को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं; और जो बेटा या बेटी को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं; और जो अपना क्रूस लेकर मेरे पीछे न चले वह मेरे योग्य नहीं” (मत्ती 10:37-38)

“धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के कारण सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है” (मत्ती 5:10)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

अगर मैं तुम लोगों के सामने अभी कुछ पैसे रखूँ और तुम्हें चुनने की आजादी दूँ—और अगर मैं तुम्हारी पसंद के लिए तुम्हारी निंदा न करूँ—तो तुममें से ज्यादातर लोग पैसे का चुनाव करेंगे और सत्य को छोड़ देंगे। तुममें से जो बेहतर होंगे, वे पैसे को छोड़ देंगे और अनिच्छा से सत्य को चुन लेंगे, जबकि इन दोनों के बीच वाले एक हाथ से पैसे को झपट लेंगे और दूसरे हाथ से सत्य को। इस तरह तुम्हारा असली रंग क्या स्वतः प्रकट नहीं हो जाएगा? सत्य और किसी ऐसी अन्य चीज के बीच, जिसके प्रति तुम लोग वफादार हो, तुम सभी ऐसा ही चुनाव करोगे और तुम्हारा रवैया ऐसा ही रहेगा। क्या ऐसा नहीं है? तुम लोगों में बहुत-से सही और गलत के बीच डगमगाए हैं, है ना? सकारात्मक और नकारात्मक, काले और सफेद, परिवार और परमेश्वर, संतानों और परमेश्वर, सद्भाव और बिगाड़, धन और गरीबी, रुतबा और मामूलीपन, समर्थन दिए जाने और ठुकरा दिए जाने इत्यादि के बीच सभी संघर्षों के दौरान तुम लोगों ने जो विकल्प चुने हैं उनके बारे में तुम लोग निश्चित ही अनजान नहीं हो! एक सौहार्दपूर्ण परिवार और टूटे हुए परिवार के बीच तुमने पहले को चुना और तुमने ऐसा बिना किसी संकोच के किया; धन-संपत्ति और कर्तव्य के बीच तुमने फिर से पहले को चुना, यहाँ तक कि तुममें किनारे पर वापस लौटने[क] की इच्छा भी नहीं रही; विलासिता और निर्धनता के बीच तुमने पहले को चुना; अपने बच्चों, पत्नियों और पतियों या मेरे बीच तुमने पहले को चुना; और धारणाओं और सत्य के बीच तुमने अब भी पहले को चुना। तुम लोगों के तरह-तरह के बुरे कर्मों को देखते हुए मेरा विश्वास तुम पर से बिल्कुल उठ गया है, मैं बिल्कुल स्तब्ध हूँ। तुम्हारे हृदय अप्रत्याशित रूप से इतने कठोर हैं कि उन्हें कोमल नहीं बनाया जा सकता। सालों तक मैंने अपने हृदय का जो खून खपाया है, उससे मुझे आश्चर्यजनक रूप से तुम्हारे परित्याग और विवशता से अधिक कुछ नहीं मिला, लेकिन तुम लोगों के प्रति मेरी आशाएँ हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती ही जाती हैं, क्योंकि मेरा दिन सबके सामने पूरी तरह से खुला हुआ है। फिर भी अब तुम लोग अंधेरी और बुरी चीजों का पीछा कर रहे हो और उनसे अपनी पकड़ ढीली करने से इनकार करते हो। तो फिर तुम्हारा परिणाम क्या होगा? क्या तुम लोगों ने कभी इस पर सावधानी से विचार किया है? अगर तुम लोगों को फिर से चुनाव करने को कहा जाए, तो तुम्हारा क्या रुख रहेगा? क्या अब भी तुम लोग पहले को ही चुनोगे? क्या अब भी तुम लोग निराशा और दर्दनाक शोक से मेरा प्रतिदान करोगे? क्या अब भी तुम्हारे हृदयों में जरा-सी ही गर्मजोशी होगी? क्या तुम अब भी इस बात से अनभिज्ञ रहोगे कि मेरे हृदय को सुकून पहुँचाने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो?

फुटनोट :

क. किनारे पर वापस लौटना : एक चीनी कहावत, जिसका मतलब है “अपने बुरे कामों से विमुख होना; अपने बुरे काम छोड़ना।”


हो सकता है तुम कहो कि यदि तुम्हारे पास आस्था नहीं होती तो तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय से पीड़ित न होते। परन्तु तुम्हें जानना चाहिए कि बिना आस्था के न केवल तुम इस प्रकार की ताड़ना प्राप्त करने या सर्वशक्तिमान से इस प्रकार की देखभाल प्राप्त करने में असमर्थ होते, बल्कि तुम सृष्टिकर्ता से मिलने के इस सुअवसर को भी सदा के लिए खो देते। तुम मनुष्यजाति के उद्गम को कभी भी नहीं जान पाते और न ही मानव जीवन की महत्ता को समझ पाते। भले ही तुम्हारी देह नष्ट हो जाती और तुम्हारी आत्मा अलग हो जाती, फिर भी तुम सृष्टिकर्ता के समस्त कार्यों को नहीं समझ पाते, तुम्हें इस बात का ज्ञान तो कभी न हो पाता कि मनुष्यजाति को बनाने के पश्चात सृष्टिकर्ता ने इस पृथ्वी पर कितने महान कार्य किए। उसके द्वारा बनाई गई इस मनुष्यजाति के एक सदस्य के रूप में क्या तुम इस प्रकार अज्ञानतावश अंधकार में गिरने और अनंत दंड की पीड़ा उठाने के लिए तैयार हो? यदि तुम स्वयं को आज की ताड़ना और न्याय से अलग करते हो, तो तुम्हें किसका सामना करना पड़ेगा? क्या तुम सोचते हो कि वर्तमान न्याय से एक बार अलग होकर तुम इस कष्ट भरे जीवन से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या यह सत्य नहीं है कि यदि तुम “इस स्थान” को छोड़ते हो, तो जिससे तुम्हारा सामना होगा, वह दानवों के द्वारा दी जाने वाली पीड़ादायक यातना या गंभीर नुकसान होगा? क्या तुम्हारा सामना असहनीय दिनों और रातों से हो सकता है? क्या तुम सोचते हो कि आज इस न्याय से बचकर, तुम भविष्य की उस पीड़ा को सदा के लिए टाल सकते हो? तुम्हारे मार्ग में क्या आएगा? क्या यह कोई स्वप्न-लोक होगा जिसकी तुम आशा करते हो? क्या तुम सोचते हो कि वास्तविकता से वैसे ही भागकर, जैसे तुम आज भाग रहे हो, तुम भविष्य की उस अनंत ताड़ना से बच सकते हो? क्या आज के बाद, तुम दोबारा इस प्रकार का अवसर और इस प्रकार का आशीष प्राप्त कर पाओगे? क्या तुम उन्हें तब खोज पाओगे जब आपदाएँ तुम पर आ पड़ेंगी? क्या तुम उन्हें खोज पाओगे, जब सम्पूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश करेगी? तुम्हारा वर्तमान खुशहाल जीवन और तुम्हारा छोटा-सा मैत्रीपूर्ण परिवार—क्या वे तुम्हारी भविष्य की अनन्त मंजिल की जगह ले सकते हैं? यदि तुम सच्ची आस्था रखते हो और यदि अपनी आस्था के कारण तुम्हें बहुत अधिक प्राप्त होता है, तो यह सबकुछ तुम्हें, एक सृजित प्राणी को, प्राप्त होना चाहिए और यह सब तुम्हारे पास पहले ही हो जाना चाहिए था। तुम्हारी आस्था और तुम्हारे जीवन के लिए ऐसी विजय से अधिक लाभकारी और कुछ नहीं है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)

तुम्हें सत्य के लिए कष्ट उठाने चाहिए, तुम्हें सत्य के लिए खुद को कुर्बान करना चाहिए, तुम्हें सत्य के लिए अपमान सहना चाहिए और तुम्हें और अधिक सत्य प्राप्त करने की खातिर और अधिक कष्ट सहना चाहिए। यही है जो तुम्हें करना चाहिए। पारिवारिक सामंजस्य का आनंद लेने की खातिर तुम्हें सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए और तुम्हें अस्थायी आनंद के लिए जीवन भर की गरिमा और सत्यनिष्ठा नहीं गँवानी चाहिए। तुम्हें उस सबका अनुसरण करना चाहिए जो खूबसूरत और अच्छा है और तुम्हें जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज्यादा अर्थपूर्ण है। अगर तुम ऐसा साधारण और सांसारिक जीवन जीते हो और तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए कोई लक्ष्य नहीं है, तो क्या यह अपना जीवन बर्बाद करना नहीं है? ऐसे जीवन से तुम क्या पा सकते हो? तुम्हें एक सत्य के लिए देह के सभी सुख त्याग देने चाहिए और थोड़े-से सुख के लिए सारे सत्य नहीं छोड़ने चाहिए। ऐसे लोगों में कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती; उनके होने का कोई अर्थ नहीं है!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान

परमेश्वर के वचनों में वे सिद्धांत कौन-से हैं जिनसे लोगों को एक-दूसरे के साथ पेश आने के लिए कहा जाता है? परमेश्वर जिससे प्रेम करता है उससे प्रेम करो, और जिससे वह घृणा करता है उससे घृणा करो। यही वह सिद्धांत है जिसका लोगों को पालन करना चाहिए। परमेश्वर सत्य का अनुसरण करने और उसकी इच्छा का पालन कर सकने वालों से प्रेम करता है; हमें भी ऐसे लोगों से प्रेम करना चाहिए। जो लोग परमेश्वर की इच्छा का पालन नहीं कर सकते, जो परमेश्वर से नफरत और उसके खिलाफ विद्रोह करते हैं—परमेश्वर ऐसे लोगों से घृणा करता है और हमें भी उनसे घृणा करनी चाहिए। परमेश्वर इंसान से यही अपेक्षा करता है। अगर तुम्हारे माता-पिता परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते, यदि वे अच्छी तरह जानते हैं कि परमेश्वर में आस्था रखना सही मार्ग है और यह उद्धार की ओर ले जा सकता है, फिर भी वे ग्रहणशील नहीं होते, बल्कि परमेश्वर में विश्वास करने वालों की आलोचना और निंदा भी करते हैं, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे सत्य से विमुख रहने वाले और नफरत करने वाले लोग हैं और इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे परमेश्वर का विरोध और उससे नफरत करते हैं—और बेशक परमेश्वर उनसे घृणा और नफरत करता है। क्या तुम ऐसे माता-पिता से घृणा कर सकते हो? वे परमेश्वर का विरोध करते और उसे बुरा-भला कहते हैं—ऐसे में वे निश्चित रूप से दानव और शैतान हैं। क्या तुम उनसे नफरत कर उन्हें धिक्कार सकते हो? ये सब वास्तविक प्रश्न हैं। यदि तुम्हारे माता-पिता तुम्हें परमेश्वर में विश्वास रखने से रोकें, तो तुम्हें उनके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार चलना चाहिए : परमेश्वर जिससे प्रेम करता है उससे प्रेम करो, और जिससे वह घृणा करता है उससे घृणा करो। अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु ने कहा था : “कौन है मेरी माता? और कौन हैं मेरे भाई?” “क्योंकि जो भी मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा के अनुसार चलेगा, वही मेरा भाई, मेरी बहिन और मेरी माँ है।” ये वचन अनुग्रह के युग में पहले से मौजूद थे, और अब परमेश्वर के वचन और भी अधिक स्पष्ट हैं : “परमेश्वर जिससे प्रेम करता है उससे प्रेम करो, और जिससे वह घृणा करता है उससे घृणा करो।” ये वचन बिल्कुल सीधे हैं, फिर भी लोग अक्सर इनका वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाते।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है

अय्यूब द्वारा प्रेम और घृणा का विभाजन

अय्यूब की मानवता का एक और पहलू उसके और उसकी पत्नी के बीच इस संवाद में प्रदर्शित होता है : “तब उसकी स्त्री उससे कहने लगी, ‘क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्वर का त्याग कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।’ उसने उससे कहा, ‘तू एक मूढ़ स्त्री की सी बातें करती है, क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?’” (अय्यूब 2:9-10)। वह जो यंत्रणा भुगत रहा था उसे देखकर, अय्यूब की पत्नी ने उसे इस यंत्रणा से बच निकलने में सहायता करने के लिए सलाह देने की कोशिश की, तो भी उसके “भले इरादों” को अय्यूब की स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई; इसके बजाय, उन्होंने उसका क्रोध भड़का दिया, क्योंकि उसने यहोवा परमेश्वर में उसकी आस्था और उसके प्रति उसके समर्पण को नकारा था, और यहोवा परमेश्वर के अस्तित्व को भी नकारा था। यह अय्यूब के लिए असहनीय था, क्योंकि उसने, दूसरों की तो बात ही छोड़ दें, स्वयं अपने को भी कभी ऐसा कुछ नहीं करने दिया था जो परमेश्वर का विरोध करता हो या उसे ठेस पहुँचाता हो। उस समय वह कैसे उदासीन रह सकता था जब उसने दूसरों को ऐसे वचन बोलते देखा जो परमेश्वर की निंदा और उसका अपमान करते थे? इस प्रकार उसने अपनी पत्नी को “मूढ़ स्त्री” कहा। अपनी पत्नी के प्रति अय्यूब का रवैया क्रोध और घृणा, और साथ ही भर्त्सना और फटकार का था। यह सटीक रूप से अय्यूब की मानवता का—प्रेम और घृणा के बीच अंतर करने का—स्वाभाविक प्रकाशन था, और उसकी खरी मानवता की सच्ची अभिव्यक्ति थी। अय्यूब में न्याय की एक समझ थी—ऐसी समझ जिसकी बदौलत वह बुराई की प्रवृत्तियों और ज्वार से नफ़रत करता था, और भ्रांतियों और विधर्मों, हास्यास्पद तर्कों और ऊटपटाँग कहावतों से नफरत, उनकी भर्त्सना और उन्हें अस्वीकार करता था, और वह स्वयं अपने, सही सिद्धांतों और रवैये को उस समय सच्चाई से थामे रह सका जब उसे भीड़ के द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था और उन लोगों द्वारा छोड़ दिया गया था जो उसके क़रीबी थे।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II

तुममें मेरा साहस होना चाहिए और जब अविश्वासी रिश्तेदारों का सामना करने की बात आए तो तुम्हारे पास सिद्धांत होने चाहिए। लेकिन मेरी खातिर तुम्हें किसी भी अंधकार की शक्ति के आगे झुकना नहीं चाहिए। तुम्हें पूर्ण मार्ग पर चलने के लिए मेरी बुद्धि पर निर्भर रहना चाहिए और शैतान की किसी भी साजिश को कामयाब नहीं होने देना चाहिए। अपने दिल को मेरे सम्मुख रखने के लिए जो बन पड़े वह सब करो, मैं तुम्हें दिलासा दूँगा और तुम्हारे दिल को शांति और आनंद प्रदान करूँगा। यह परवाह मत करो कि लोगों को तुम कैसे प्रतीत होते हो; क्या मुझे संतुष्ट करना अधिक मूल्य और महत्व नहीं रखता है? क्या यह तुम्हारे लिए इस तरह और भी अनंत और जीवनपर्यंत आनंद और शांति लेकर नहीं आएगा? तुम्हारा आज का कष्ट बताता है कि तुम्हारे भविष्य के आशीष कितने बड़े होंगे; वे अवर्णनीय हैं। तुम्हें जो आशीष प्राप्त होंगे, वे कितने बड़े होंगे, ये तुम नहीं जानते; तुम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। आज यह वास्तविक बन गया है; बिल्कुल वास्तविक! यह बहुत दूर नहीं है—क्या तुम उसे देख सकते हो? इसका हर अंतिम अंश मुझमें है; भविष्य कितना रोशन है! अपने आँसू पोंछो तथा और अधिक दुःख या दर्द महसूस मत करो। हर चीज का आयोजन मेरे हाथों से होता है और मेरा लक्ष्य यह है कि तुम लोगों को जल्द विजेता बनाऊँ और तुम्हें अपने साथ महिमा में ले चलूँ। तुम्हारे साथ जो सब होता है, उसके लिए तुममें इस तरह का आभार और प्रशंसा होनी चाहिए; इससे मुझे संतुष्टि मिलेगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 10

एक विश्वासी पति और अविश्वासी पत्नी के बीच मूल रूप से कोई संबंध नहीं होता और विश्वासी बच्चों और अविश्वासी माता-पिता के बीच कोई संबंध नहीं होता; ये दोनों तरह के लोग असंगत हैं। विश्राम में प्रवेश करने से पहले, लोगों में दैहिक, पारिवारिक स्नेह होता है, लेकिन एक बार जब वे विश्राम में प्रवेश कर जाते हैं, फिर दैहिक, पारिवारिक स्नेह जैसी कोई बात नहीं रह जाती। जो अपना कर्तव्य निभाते हैं वे अंतर्निहित रूप से उनके शत्रु हैं जो अपने कर्तव्य नहीं निभाते हैं; जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं और जो उससे घृणा करते हैं, वे आंतरिक रूप से एक दूसरे के विरोधी हैं। जो विश्राम में प्रवेश करेंगे और जो नष्ट किए जा चुके होंगे वे असंगत किस्म के सृजित प्राणी हैं। जो सृजित प्राणी अपने कर्तव्य निभाते हैं, वे बचे रहने में समर्थ होंगे, जबकि वे जो अपने कर्तव्य नहीं निभाते, वे विनाश के पात्र बनेंगे; यही नहीं, यह सब अनंत तक चलेगा। क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपने पति से प्रेम करती हो? क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपनी पत्नी से प्रेम करते हो? क्या तुम एक सृजित प्राणी के तौर पर अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपने अविश्वासी माता-पिता के प्रति संतानोचित आज्ञाकारिता दिखाते हो? क्या परमेश्वर में विश्वास करने के मामले में लोगों के दृष्टिकोण वास्तव में सही हैं या गलत? तुम वास्तव में परमेश्वर में विश्वास किसलिए करते हो? तुम वास्तव में क्या पाना चाहते हो? तुम वास्तव में परमेश्वर से कैसे प्रेम करते हो? जो लोग सृजित प्राणियों के रूप में अपने कर्तव्य अच्छे से नहीं निभा सकते और जो भरपूर प्रयास नहीं कर सकते, वे विनाश के पात्र बनेंगे। आज के लोगों के बीच दैहिक संबंध होते हैं, साथ ही खून के रिश्ते होते हैं, किंतु भविष्य में ये सब टूट जाएँगे। विश्वासी और अविश्वासी अंतर्निहित रूप से एक दूसरे के प्रति सुसंगत नहीं हैं; बल्कि वे परस्पर विरोधी हैं। जो विश्राम में हैं, वे सभी वो लोग होंगे जो यह विश्वास करते हैं कि कोई परमेश्वर है और परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं, जबकि वे जो परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं, वे सब नष्ट कर दिए गए होंगे। पृथ्वी पर परिवारों का अब और अस्तित्व नहीं होगा; तो माता-पिता या संतानों या पति-पत्नियों के बीच के रिश्ते कैसे हो सकते हैं? विश्वास और अविश्वास की असंगतता से ऐसे दैहिक संबंध पूरी तरह टूट चुके होंगे!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे

पिछला: 3. मैं स्वीकार करता हूँ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया जिसे प्रचारित करती है, वह सही मार्ग है, लेकिन चूँकि हमारी कलीसिया में लोगों को पादरियों और एल्डर्स द्वारा फैलाए गए झूठों और भ्रांतियों से धोखा दिया गया है, वे सभी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के विरोधी हैं। मुझे चिंता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार करने के बाद मुझे मेरी पुरानी कलीसिया के भाई-बहनों द्वारा अस्वीकार और निन्दित किया जाएगा। मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और मैं इन सब का सामना करने के लिए पर्याप्त साहसी नहीं हूँ—मुझे क्या करना चाहिए?

अगला: 1. पिछले कुछ वर्षों में हमारी कलीसिया में चीज़ें अधिकाधिक उजाड़ हो गई हैं। भाई-बहन अपना विश्वास और अपना प्रेम खो रहे हैं, वे अधिकाधिक नकारात्मक और कमज़ोर होते जा रहे हैं, और प्रचारक आध्यात्मिक रूप से बंजर हो गए हैं; उनके पास प्रचार करने के लिए कुछ नहीं है। हम सभी को लगता है कि हमने पवित्र आत्मा के कार्य को खो दिया है। हमने एक ऐसी कलीसिया की हर जगह खोज की है जिसमें पवित्र आत्मा का कार्य हो, लेकिन हम जिसे पाते हैं, वह अगले के समान ही उजाड़ होती है। ऐसे अकाल से हर संप्रदाय आक्रान्त क्यों है?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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