3. आज आपदाएँ बढ़ती गंभीरता और आवृत्ति के साथ हो रही हैं। ये संकेत बताते हैं कि बाइबल में जिनकी भविष्यवाणी की गई है, अंतिम दिनों की वे महान आपदाएँ शुरू होने वाली हैं। इन आपदाओं के बीच हम कैसे परमेश्वर की सुरक्षा हासिल कर, बचे रह सकते हैं?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर ने इस संसार की सृष्टि की, उसने इस मानवजाति को बनाया, और इतना ही नहीं, वह प्राचीन यूनानी संस्कृति और मानव-सभ्यता का वास्तुकार भी था। केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति को आराम देता है और केवल परमेश्वर ही रात-दिन इस मानवजाति की देखभाल करता है। मानव का विकास और प्रगति परमेश्वर की संप्रभुता से अविभाज्य हैं, और मानवजाति का इतिहास और भविष्य परमेश्वर के हाथों द्वारा की गई व्यवस्थाओं से बच नहीं सकता। यदि तुम एक सच्चे ईसाई हो, तो तुम निश्चित ही इस बात पर विश्वास करोगे कि किसी भी देश या राष्ट्र का उत्थान या पतन परमेश्वर की व्यवस्थाओं के अनुसार होता है। केवल परमेश्वर ही किसी देश या राष्ट्र के भाग्य को जानता है और केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति की दिशा नियंत्रित करता है। यदि मानवजाति अच्छा भाग्य पाना चाहती है, यदि कोई देश अच्छा भाग्य पाना चाहता है, तो सभी को परमेश्वर के सामने झुकना और उसकी आराधना करनी होगी और परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप करने और उसके सामने पाप कबूलने के लिए आना होगा, अन्यथा मनुष्य का भाग्य और गंतव्य एक अपरिहार्य विनाश बन जाएँगे।

पीछे मुड़कर उस समय को देखो, जब नूह ने जहाज बनाई थी : मानवजाति गहराई से भ्रष्ट थी और वह परमेश्वर के आशीषों से भटक गई थी, परमेश्वर द्वारा अब और उसकी देखभाल नहीं की जा रही थी और वे परमेश्वर के वादे खो चुके थे। लोग परमेश्वर की रोशनी के बिना अंधकार में रहते थे। फिर वे प्रकृति से व्यभिचारी बन गए और एक भद्दे स्तर तक भ्रष्ट हो गए। ऐसे लोग अब और परमेश्वर के वादे प्राप्त नहीं कर सकते थे; वे परमेश्वर का चेहरा देखने या परमेश्वर की वाणी सुनने के लायक नहीं थे, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया था, उन सब चीजों को किनारे कर दिया था, जो परमेश्वर ने उन्हें प्रदान की थीं, और वे परमेश्वर की शिक्षा के वचनों को भूल गए थे। उनके हृदय परमेश्वर से अधिकाधिक दूर भटक गए थे, बाद में वे इस हद तक भ्रष्ट हो गए कि उन्होंने अपना विवेक और मानवता ही खो दी और अधिक से अधिक बुरे होते गए। फिर वे मृत्यु की ओर चल पड़े और परमेश्वर के कोप और दंड के अधीन हो गए। केवल नूह ने परमेश्वर की आराधना की और बुराई से दूर रहा, और इसलिए वह परमेश्वर की वाणी और निर्देशों को सुनने में सक्षम था। उसने परमेश्वर के वचन के निर्देशानुसार जहाज बनाया, और सभी प्रकार के जीवित प्राणियों को उसमें एकत्र किया। और इस तरह, जब एक बार सब कुछ तैयार हो गया, तो परमेश्वर ने संसार को नष्ट करने का अपना कार्य शुरू कर दिया। केवल नूह और उसके परिवार के सात अन्य लोग इस विनाशलीला में जीवित बचे, क्योंकि नूह ने यहोवा की आराधना की थी और बुराई से दूर रहा था।

अब वर्तमान युग को देखो : नूह जैसे धार्मिक लोग, जो परमेश्वर की आराधना कर सके और बुराई से दूर रह सके, अब नहीं होते। फिर भी परमेश्वर अब भी इस मानवजाति के प्रति अनुग्रही है और वह इस अंतिम युग की मानवजाति के प्रति अभी भी उदारता दिखाता है। परमेश्वर उन लोगों की खोज कर रहा है जो उसके प्रकट होने की लालसा करते हैं। वह उन लोगों की खोज कर रहा है जो उसके वचनों को सुनते हैं, जो उसके आदेश को नहीं भूलते और अपना तन-मन उसे समर्पित करते हैं। वह उनकी खोज कर रहा है जो उसके सामने शिशुओं के समान समर्पित और प्रतिरोध न करने वाले हों। यदि तुम किसी भी बल से बाधित हुए बिना खुद को परमेश्वर के प्रति समर्पित करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे ऊपर अनुग्रह की दृष्टि डालेगा और तुम्हें अपने आशीष प्रदान करेगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है

परमेश्वर की दया और सहनशीलता प्राप्त करना मुश्किल नहीं है—लेकिन मनुष्य के लिए सच्चा पश्चात्ताप हासिल करना मुश्किल है

परमेश्वर नीनवे के लोगों से चाहे जितना भी क्रोधित रहा हो, लेकिन जैसे ही उन्होंने उपवास की घोषणा की और टाट ओढ़कर राख पर बैठ गए, उसका हृदय धीरे-धीरे नरम पड़ने लगा और उसने अपना मन बदलना शुरू कर दिया। उनसे यह घोषणा करने के एक क्षण पहले कि वह उनके नगर को नष्ट कर देगा—उनके द्वारा अपने पाप स्वीकार करने और पश्चात्ताप करने से पहले के क्षण तक भी—परमेश्वर अभी भी उनसे क्रोधित था। लेकिन जब उन्होंने पश्चात्ताप के एक के बाद एक अनेक कदम उठाए तो नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर का क्रोध धीरे-धीरे उनके प्रति दया और क्षमाशीलता में बदल गया। एक ही घटना में परमेश्वर के स्वभाव के इन दो पहलुओं के प्रकाशन में कोई विरोधाभास नहीं है। तो विरोध के न होने को कैसे समझना और जानना चाहिए? नीनवे के लोगों द्वारा पश्चात्ताप करने के पहले और बाद में परमेश्वर ने ये दो काफी अलग सार अभिव्यक्त और प्रकाशित किए, जिससे लोगों ने परमेश्वर का वह सार देखा जो वास्तविक है और कोई अपमान नहीं सहता है। परमेश्वर ने लोगों को निम्नलिखित बातें बताने के लिए अपने रवैये का उपयोग किया : ऐसा नहीं है कि परमेश्वर लोगों को सहन नहीं करता है या वह उन पर दया नहीं दिखाना चाहता है; बल्कि वे परमेश्वर के सामने शायद ही कभी सच्चा पश्चात्ताप करते हैं और उनका सचमुच अपने कुमार्ग को छोड़ना और हिंसा त्यागना एक दुर्लभ बात है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर मनुष्य से क्रोधित होता है, तो वह आशा करता है कि मनुष्य सच में पश्चात्ताप कर सकता है और वह मनुष्य का सच्चा पश्चात्ताप देखने की आशा करता है, और उस दशा में वह मनुष्य पर उदारता से अपनी दया और सहनशीलता बरसाता रहेगा। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य के बुरे कर्म परमेश्वर के कोप को जन्म देते हैं, जबकि परमेश्वर की दया और सहनशीलता उन लोगों पर बरसती है जो परमेश्वर की बात सुनते हैं और उसके सामने वास्तव में पश्चात्ताप करते हैं, जो अपने बुरे रास्तों को छोड़ देते हैं और अपने हाथों से हिंसा त्याग देते हैं। नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर के व्यवहार में उसका रवैया बहुत साफ तौर पर प्रकट हुआ था : परमेश्वर की दया और सहनशीलता पाना कठिन नहीं है; और वह इंसान से सच्चा पश्चात्ताप चाहता है। अगर लोग अपने बुरे तरीकों से दूर रहेंगे और हिंसा छोड़ देंगे, तो परमेश्वर उनके प्रति अपना हृदय और रवैया बदल लेगा।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II

मेरी दया उन पर अभिव्यक्त होती है जो मुझसे प्रेम करते हैं और स्वयं का त्याग करते हैं। इस बीच, कुकर्मियों को मिला दंड निश्चित रूप से मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण है, और उससे भी बढ़कर, मेरे क्रोध की गवाही है। जब आपदा आएगी, तो मेरा विरोध करने वाले सभी अकाल और महामारी के शिकार हो जाएँगे और विलाप करेंगे। जिन्होंने कई वर्षों तक मेरा अनुसरण किया है, लेकिन सभी तरह के बुरे कर्म किए हैं, वे अपने पापों का फल भुगतने से नहीं बचेंगे; वे भी लाखों वर्षों में कभी-कभार ही दिखने वाली आपदा में डुबा दिए जाएँगे, और वे लगातार आतंक और भय की स्थिति में जिएँगे। और मेरे वे अनुयायी, जिन्होंने मेरे प्रति परम निष्ठा दर्शाई है, वे आनंद लेंगे और गुणगान करेंगे, मेरी शक्ति की प्रशंसा करेंगे। वे बेफिक्र खुशी की अवर्णनीय मनोदशा का अनुभव करेंगे और ऐसे आनंद में रहेंगे जो मैंने मानवजाति को पहले कभी प्रदान नहीं किया है। क्योंकि मैं मनुष्य के अच्छे कर्मों को सँजोकर रखता हूँ और उसके बुरे कर्मों से घृणा करता हूँ। जबसे मैंने पहली बार मानवजाति की अगुआई करनी आरंभ की, तबसे मैं उत्सुकतापूर्वक मनुष्यों के ऐसे समूह को पाने की आशा करता रहा हूँ, जो मेरे साथ एकचित्त हों। इस बीच मैं उन लोगों को कभी नहीं भूलता, जो मेरे साथ एकचित्त नहीं हैं; अपने हृदय में मैं हमेशा उनसे नफरत करता हूँ, उन्हें बुरे कर्मों के जवाब देने को मजबूर करने के अवसर की प्रतीक्षा करता हूँ, जो कुछ ऐसा है जिसे देखकर मुझे खुशी होगी। अब अंततः मेरा दिन आ गया है, और मुझे अब और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है!

मेरा अंतिम कार्य केवल मनुष्यों को दंड देने के लिए ही नहीं है, बल्कि मनुष्य की मंजिल की व्यवस्था करने के लिए भी है। इससे भी अधिक, यह सभी लोगों से मेरे कर्म और कार्य स्वीकार करवाने की खातिर है। मैं हर एक मनुष्य को दिखा दूँगा कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है, और वह मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है, कि यह मनुष्य का कार्य नहीं है, और प्रकृति तो वह बिल्कुल भी नहीं है जिसने मानवजाति की रचना की है, और इसके बजाय यह मैं हूँ जो सभी चीजों में हर जीव का पोषण करता है। मेरे अस्तित्व के बिना मानवजाति केवल नष्ट होगी और आपदा का दंड भोगेगी। कोई भी मानव फिर कभी सुंदर सूर्य और चंद्रमा या हरे-भरे संसार को नहीं देखेगा; मानवजाति केवल काली, शीत रात्रि और मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी देखेगी। मैं ही मानवजाति का एकमात्र उद्धार हूँ। मैं ही मानवजाति की एकमात्र आशा हूँ, और इससे भी बढ़कर, मैं ही वह हूँ जिस पर संपूर्ण मानवजाति का अस्तित्व निर्भर करता है। मेरे बिना मानवजाति तुरंत अवरुद्ध हो जाएगी, मेरे बिना मानवजाति केवल बर्बाद कर देने वाला विनाश झेलेगी और सभी प्रकार के भूतों द्वारा कुचली जाएगी, इसके बावजूद कोई मुझ पर ध्यान नहीं देता। मैंने वह काम किया है जो किसी दूसरे के द्वारा नहीं किया जा सकता, और मैं केवल यह आशा करता हूँ कि मनुष्य कुछ अच्छे कर्मों से मुझे प्रतिफल दे सके। यद्यपि कुछ ही लोग मुझे प्रतिफल दे पाए हैं, फिर भी मैं मनुष्यों के संसार में अपनी यात्रा पूरी करूँगा और अपने उस कार्य का अगला कदम आरंभ करूँगा जो अभी खुलने वाला है, क्योंकि इन अनेक वर्षों में मनुष्यों के बीच मेरे आने-जाने की सारी भागदौड़ फलदायक रही है, और मैं अति प्रसन्न हूँ। मैं जिस चीज की परवाह करता हूँ, वह मनुष्यों की संख्या नहीं, बल्कि उनके अच्छे कर्म हैं। किसी भी स्थिति में, मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करोगे। तभी मुझे संतुष्टि होगी; अन्यथा तुम लोगों में से कोई भी उस आपदा के हमले से नहीं बचेगा। आपदा मेरे द्वारा शुरू की जाती है और निश्चित रूप से मेरे द्वारा ही आयोजित की जाती है। यदि तुम लोग मेरी नजरों में अच्छे दिखाई नहीं दे सकते, तो तुम लोग आपदा भुगतने से नहीं बच सकते।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो

एक के बाद एक सभी तरह की आपदाएँ आ पड़ेंगी; सभी देश और स्थान आपदाओं का सामना करेंगे : हर जगह महामारी, अकाल, बाढ़, सूखा और भूकंप हैं। ये आपदाएँ बस एक-दो जगहों पर नहीं आ रही हैं, न ही वे एक-दो दिनों में समाप्त होंगी, बल्कि वे अधिकाधिक बड़े क्षेत्र तक फैल जाएँगी और अधिकाधिक गंभीर होती जाएँगी। इस दौरान एक के बाद एक तमाम तरह के कीट-प्रकोप आएँगे, और हर जगह नरभक्षण की घटनाएँ होंगी। असंख्य देशों और लोगों पर यह मेरा न्याय है। मेरे पुत्रो! तुम लोगों को आपदाओं की पीड़ा या कठिनाई नहीं भुगतनी चाहिए। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग शीघ्र वयस्क हो जाओ और जितनी जल्दी हो सके, मेरे कंधों का बोझ उठा लो। तुम लोग मेरे इरादे क्यों नहीं समझते? आगे का काम अधिकाधिक दुरूह होता जाएगा। क्या तुम लोग वाकई मुझे अकेले इतना कठिन श्रम करने और सारी मेहनत करने के लिए छोड़ देना बर्दाश्त कर सकते हो? मैं स्पष्ट कहता हूँ : जिनके जीवन परिपक्व होंगे, वे शरण में लिए जाएँगे और वे पीड़ा या कठिनाई का सामना नहीं करेंगे; जिनके जीवन परिपक्व नहीं होंगे, उन्हें पीड़ा और नुकसान भुगतना पड़ेगा। मेरे वचन पर्याप्त स्पष्ट हैं, है न?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 65

भविष्य में तुम पर बड़े परीक्षण आ सकते हैं—किंतु आज यदि तुम परमेश्वर को सच्चे हृदय से प्रेम करते हो, और चाहे आगे कितनी भी बड़ी परीक्षाएँ हों, चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी होता जाए, तुम अपनी गवाही में अडिग रहते हो और परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम रहते हो, तब तुम्हारे हृदय को सांत्वना मिलेगी और भविष्य में चाहे कितने भी बड़े परीक्षण क्यों न आएँ, तुम निर्भय रहोगे। तुम लोग नहीं देख सकते कि भविष्य में क्या होगा; तुम लोग केवल आज की परिस्थितियों में ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो। तुम लोग कोई भी महान कार्य करने में अक्षम हो—तुम्हें वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचन अनुभव करके उसे संतुष्ट करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और तुम्हें एक मजबूत और जबरदस्त गवाही देनी चाहिए और इस प्रकार शैतान के लिए शर्मिंदगी लानी चाहिए। यद्यपि तुम्हारी देह को संतुष्टि नहीं मिली होगी और उसने पीड़ा हुई होगी, लेकिन तुमने परमेश्वर को संतुष्ट कर दिया होगा और तुम शैतान के लिए शर्मिंदगी लाए होगे। यदि तुम हमेशा इस तरह से अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे सामने एक मार्ग खोल देगा। किसी दिन जब कोई बड़ा परीक्षण आएगा, तो अन्य लोग गिर जाएँगे, लेकिन तुम तब भी अडिग रहने में समर्थ होगे : तुमने जो क़ीमत चुकाई है, उसकी वजह से परमेश्वर तुम्हारी रक्षा करेगा, ताकि तुम अडिग रह सको और गिरो नहीं। यदि, साधारणतया, तुम सत्य को अभ्यास में लाने और एक सच्चे परमेश्वर-प्रेमी हृदय से परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हो, तो परमेश्वर भविष्य के परीक्षणों के दौरान निश्चित रूप से तुम्हारी सुरक्षा करेगा। यद्यपि तुम मूर्ख और छोटे आध्यात्मिक कद और खराब काबिलियत वाले हो, तब भी परमेश्वर तुम्हारे खिलाफ पूर्वाग्रहपूर्ण नहीं होगा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम्हारी मंशाएँ सही हैं। मान लो कि आज, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हो—जब छोटे, ब्योरेवार मामलों की बात आती है तब उनमें भी पूरी सावधानी बरतते हो और सभी चीजों में परमेश्वर को संतुष्ट करते हो—तुम्हारे पास सच्चा परमेश्वर-प्रेमी हृदय है, तुम अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को देते हो और यद्यपि कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें तुम साफ-साफ देख नहीं सकते, लेकिन तुम अपनी मंशाओं को सुधारने और परमेश्वर के इरादों को खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आ सकते हो और तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सब कुछ करते हो। और यूँ तो हो सकता है कि तुम्हारे भाई-बहन तुम्हारा परित्याग कर दें, किंतु तुम्हारा हृदय परमेश्वर को संतुष्ट कर रहा है, और तुम देह के सुखों के लिए ललचा नहीं रहे हो। यदि तुम हमेशा इस तरह से अभ्यास करते हो, तो जब तुम्हारे ऊपर बड़े परीक्षण आएँगे तुम्हारी रक्षा की जाएगी।

लोगों की कौन-सी आंतरिक अवस्था परीक्षणों का लक्ष्य है? उनका लक्ष्य लोगों के भीतर के विद्रोही स्वभाव हैं, जो उन्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने से रोकते हैं। लोगों के भीतर बहुत सारी अशुद्धियाँ हैं, और बहुत-कुछ पाखंडपूर्ण है, और इसलिए परमेश्वर लोगों को शुद्ध बनाने के लिए उन्हें परीक्षणों का भागी बनाता है। किंतु यदि आज तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हो, तो भविष्य के परीक्षण तुम्हारे लिए पूर्णता होंगे। यदि तुम आज परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हो, तो भविष्य के परीक्षण तुम्हें लुभाएँगे, और तुम अनजाने में नीचे गिर जाओगे, और उस समय तुम अपनी सहायता करने में सक्षम नहीं होगे, क्योंकि तुम परमेश्वर के कार्य के साथ नहीं चल पाओगे और तुममें वास्तविक आध्यात्मिक कद नहीं होगा और इसलिए, यदि तुम भविष्य में अडिग रहने में समर्थ होना चाहते हो, परमेश्वर को बेहतर ढंग से संतुष्ट करना, और अंत तक उसका अनुसरण करना चाहते हो, तो आज तुम्हें एक मजबूत बुनियाद का निर्माण करना चाहिए। तुम्हें सभी चीजों में सत्य को अभ्यास में लाकर और उसके इरादों के प्रति विचारशील रहकर परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। यदि तुम हमेशा इस तरह से अभ्यास करते हो, तो तुम्हारे भीतर एक बुनियाद बनेगी, और परमेश्वर तुम्हारे भीतर ऐसे हृदय को प्रेरित करेगा जो परमेश्वर से प्रेम करेगा, और वह तुम्हें विश्वास देगा। किसी दिन जब कोई परीक्षण वास्तव में तुम पर आता है, तो तुम्हें कुछ पीड़ा का अनुभव अवश्य हो सकता है, और तुम एक निश्चित बिंदु तक परेशान महसूस कर सकते हो और तीव्र व्यथा से पीड़ित हो सकते हो, मानो तुम मर चुके हो—किंतु तुम्हारा परमेश्वर-प्रेमी हृदय नहीं बदलेगा, बल्कि और अधिक गहरा हो जाएगा। परमेश्वर के आशीष ऐसे ही होते हैं। आज परमेश्वर जो कुछ भी कहता और करता है, यदि तुम उसे समर्पित हृदय से स्वीकारने में समर्थ हो, तो तुम्हें निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा आशीष दिया जाएगा और इसलिए तुम ऐसे व्यक्ति होगे, जो परमेश्वर के आशीष और वादे प्राप्त करता है। यदि आज तुम अभ्यास नहीं करते, तो एक दिन जब तुम पर परीक्षण आएँगे, तो तुम विश्वास या प्रेममय हृदय से रहित होगे, और उस समय परीक्षण प्रलोभन बन जाएँगे; तुम शैतान के प्रलोभनों के बीच डूब जाओगे और तुम्हारे पास बच निकलने का कोई उपाय नहीं होगा। आज तुम किसी छोटे परीक्षण का सामना करने पर अडिग रहने में सक्षम हो सकते हो लेकिन जरूरी नहीं कि एक दिन किसी बड़े परीक्षण का सामना करने पर तुम अडिग रहने में सक्षम होगे। कुछ लोग खुद से काफी खुश होते हैं और सोचते हैं कि वे जितने अच्छे हो सकते हैं, उतने अच्छे हैं। यदि तुम ऐसे समय में और अधिक गहराई तक नहीं जाओगे और आत्मसंतुष्ट बने रहोगे, तो तुम खतरे में पड़ जाओगे। आज जब परमेश्वर बड़े परीक्षणों का कार्य नहीं कर रहा, तब तुम हर तरह से ठीक-ठाक दिखाई देते हो, किंतु जब परमेश्वर तुम्हारा परीक्षण करेगा, तो तुम पाओगे कि तुममें बहुत कमियाँ हैं, क्योंकि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और तुम बड़े परीक्षणों को सहने में अक्षम हो। यदि तुम वैसे ही बने रहते हो जैसे तुम हो और आगे बढ़ना बंद करके संतुष्ट महसूस करते हो, तो जब परीक्षण आएँगे, तुम गिर जाओगे। तुम लोगों को अक्सर देखना चाहिए कि तुम लोगों का आध्यात्मिक कद कितना छोटा है; केवल इसी तरह से तुम लोग प्रगति करोगे। यदि ऐसा केवल परीक्षण के दौरान होता है कि तुम देखते हो कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, कि तुम्हारी इच्छाशक्ति बहुत कमजोर है, कि तुम्हारे भीतर वास्तविक चीज बहुत कम है, और कि तुम परमेश्वर के इरादों के लिए अपर्याप्त हो—और यदि तुम केवल तभी इन बातों को महसूस करते हो, तो बहुत देर हो जाएगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है

जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान अडिग रहने में समर्थ हैं—यानी, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—वे लोग होंगे, जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; तो वे सभी जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुजरने के बाद ही उसके द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग, जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे, अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर ताड़ना और न्याय का कार्य मूलतः मानवता को शुद्ध करने और विश्राम के अंतिम दिन की खातिर करता है; अन्यथा मानवता का कोई भी सदस्य अपनी किस्म के अनुसार छांटा नहीं जा सकेगा या विश्राम में प्रवेश नहीं कर सकेगा। यह कार्य ही मानवता के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। परमेश्वर का शुद्धिकरण का कार्य ही मनुष्यों को उनकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा और उसका ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानवता के उन विद्रोही तत्वों को उजागर करेगा, और इस तरह बचाए जा सकने वालों को बचाए न जा सकने वालों से अलग करेगा और जो बचे रह सकते हैं उनसे उन्हें अलग करेगा जो बचे नहीं रह सकते हैं। इस कार्य के समाप्त होने पर जो लोग बचे रह सकते हैं वे सब शुद्ध किए जाएँगे और मानवता के उच्चतर क्षेत्र में प्रवेश करेंगे जहाँ वे पृथ्वी पर और अधिक अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का आनंद उठाएंगे; दूसरे शब्दों में, वे मानवता के विश्राम के दिन में प्रवेश करेंगे और परमेश्वर के साथ जिएंगे। जो बचे नहीं रह सकते हैं उनकी ताड़ना और उनका न्याय किए जाने के बाद उनके असली रूप पूरी तरह उजागर हो जाएँगे; उसके बाद वे सब के सब नष्ट कर दिए जाएँगे और शैतान के समान उन्हें पृथ्वी पर जीवित रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवता में इस किस्म के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ऐसे लोग अंतिम विश्राम की धरती पर प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं, न ही वे उस विश्राम के दिन में प्रवेश के योग्य हैं जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे, क्योंकि वे दंड के लक्ष्य हैं और वे धार्मिक लोग नहीं, बल्कि बुरे लोग हैं। उन्हें एक बार छुटकारा दिया गया था और उन्हें न्याय और ताड़ना भी दी गई थी; उन्होंने एक बार परमेश्वर के लिए मजदूरी भी की थी। लेकिन जब अंतिम दिन आएगा तो उन्हें अब भी अपनी बुराई के कारण और अपनी विद्रोहशीलता और असाध्यता के परिणामस्वरूप निकाल दिया और नष्ट कर दिया जाएगा; वे भविष्य के संसार में अब कभी नहीं जिएंगे और कभी भविष्य की मानवजाति के बीच नहीं रहेंगे। ... बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने के परमेश्वर के अंतिम कार्य के पीछे का एकमात्र उद्देश्य, सभी मनुष्यों को पूरी तरह शुद्ध करना है, ताकि वह पूरी तरह पावनीकृत मानवता को शाश्वत विश्राम में ला सके। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है; यह उसके समस्त प्रबंधन-कार्य का अंतिम चरण है। यदि परमेश्वर ने कुकर्मियों का नाश न किया, बल्कि उन्हें बचे रहने दिया तो सारी की सारी मानवजाति अभी भी विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थ होगी और परमेश्वर उसे एक अधिक अद्भुत क्षेत्र में नहीं ला पाएगा। ऐसा कार्य पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। जब उसका कार्य समाप्त होगा तो संपूर्ण मानवजाति पूर्णतः पावनीकृत हो जाएगी; केवल इसी तरीके से परमेश्वर शांतिपूर्वक विश्राम में रह सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे

पिछला: 2. पादरी हमसे अक्सर कहते हैं कि हालाँकि आपदा के बाद आपदा टूट पड़ती है, हमें डरना नहीं चाहिए, क्योंकि बाइबल हमें बताती है: “तेरे निकट हज़ार, और तेरी दाहिनी ओर दस हज़ार गिरेंगे; परन्तु वह तेरे पास न आएगा” (भजन संहिता 91:7)। अगर हमें प्रभु पर भरोसा है, और हम प्रार्थना करना, बाइबल पढ़ना और मिलकर सहभागिता करना जारी रखते हैं, तो आपदा हम पर नहीं आएगी। लेकिन कुछ धार्मिक याजक और ईसाई ऐसे भी हैं जो इन आपदाओं में मारे गए हैं। वे सभी बाइबल पढ़ते थे, प्रार्थना करते थे, और प्रभु की सेवा करते थे, तो परमेश्वर ने उनकी रक्षा क्यों नहीं की?

अगला: 1. आज की दुनिया वास्तव में निरंतर अधिक बुरी, और मानव जाति निरंतर अधिक भ्रष्ट, होते जा रही है। दुनिया में गिरावट आई है, नैतिकता खो गई है, अच्छे लोग जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं, उन्हें धौंस दिखाई जाती है, उत्पीड़ित किया और सताया जाता है, जबकि वे तलवे चाटने और गबन करने वाले लोग जो सभी तरह की बुराई करते हैं, समृद्ध होते जाते हैं। दुनिया इतनी अंधकारमय, इतनी दुष्ट क्यों है? मानव जाति का भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है—क्या मनुष्य के लिए परमेश्वर द्वारा नष्ट किए जाने का समय आ गया है?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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