1. आज की दुनिया वास्तव में निरंतर अधिक बुरी, और मानव जाति निरंतर अधिक भ्रष्ट, होते जा रही है। दुनिया में गिरावट आई है, नैतिकता खो गई है, अच्छे लोग जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं, उन्हें धौंस दिखाई जाती है, उत्पीड़ित किया और सताया जाता है, जबकि वे तलवे चाटने और गबन करने वाले लोग जो सभी तरह की बुराई करते हैं, समृद्ध होते जाते हैं। दुनिया इतनी अंधकारमय, इतनी दुष्ट क्यों है? मानव जाति का भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है—क्या मनुष्य के लिए परमेश्वर द्वारा नष्ट किए जाने का समय आ गया है?

1) दुनिया इतनी बुरी और दुष्ट क्यों है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“सारा संसार उस दुष्ट के वश में पड़ा है” (1 यूहन्ना 5:19)

“और दण्ड की आज्ञा का कारण यह है कि ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना क्योंकि उनके काम बुरे थे। क्योंकि जो कोई बुराई करता है, वह ज्योति से बैर रखता है, और ज्योति के निकट नहीं आता, ऐसा न हो कि उसके कामों पर दोष लगाया जाए” (यूहन्ना 3:19-20)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

कई हजार सालों की भ्रष्टता के दौरान, सब लोग सुन्न और मंदबुद्धि-वाले हो गए हैं; वे सब परमेश्वर का विरोध करने वाले दुष्ट दानव बन गए हैं, इस हद तक कि परमेश्वर के प्रति उनकी विद्रोहशीलता इतिहास की पुस्तकों में दर्ज की गई है और यहाँ तक कि लोग स्वयं भी अपने विद्रोही व्यवहार का पूरा लेखा-जोखा देने में असमर्थ हैं—क्योंकि वे शैतान द्वारा बहुत गहराई से भ्रष्ट कर दिए गए हैं और शैतान द्वारा रास्ते से इस तरह भटका दिए गए हैं कि वे नहीं जानते कि उन्हें किस ओर जाना है। यहाँ तक कि आज भी, लोग परमेश्वर के साथ विश्वासघात करते हैं। जब वे परमेश्वर को देखते हैं, तो वे उसके साथ विश्वासघात करते हैं और जब वे परमेश्वर को नहीं देख पाते, तब भी वे उसके साथ विश्वासघात करते हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो परमेश्वर के शापों और कोप को देखने के बाद भी उसके साथ विश्वासघात करते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य के विवेक ने अपना मूल कार्य खो दिया है और मनुष्य की अंतरात्मा ने भी अपना मूल कार्य खो दिया है। ... मनुष्य, जो ऐसी गंदी भूमि में जन्मा, समाज द्वारा गंभीर हद तक संक्रमित हो गया है, वह सामंती नैतिकता से अनुकूलित कर दिया गया है और उसने “उच्चतर शिक्षा संस्थानों” की शिक्षा प्राप्त की है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन को लेकर घटिया दृष्टिकोण, सांसारिक आचरण के घृणित फलसफे, नितांत मूल्यहीन अस्तित्व, नीच रीति-रिवाज और दैनिक जीवन—ये सभी चीजें मनुष्य के हृदय में गंभीर घुसपैठ करती रही हैं, उसकी अंतरात्मा को गंभीरता से नुकसान पहुँचाती और उस पर गंभीर प्रहार करती रही हैं। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से अधिकाधिक दूर होता जा रहा है और उसका अधिकाधिक विरोधी होता जा रहा है। मनुष्य का स्वभाव दिन-प्रतिदिन और अधिक नृशंस हो रहा है और एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग करता हो, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रति समर्पण करता हो और ऐसा व्यक्ति तो और भी नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रकटन की खोज करता हो। इसके बजाय, इंसान शैतान की सत्ता में अपने दिल के तृप्त होने तक सुख का अनुसरण करता है और कीचड़ में अपनी देह को भरपूर भ्रष्ट करता है। जो लोग अंधकार में जीते हैं उनमें सत्य सुनने के बाद भी इसका अभ्यास करने की कोई इच्छा नहीं होती है और यह देखने के बाद भी कि परमेश्वर पहले ही प्रकट हो चुका है वे खोजने की ओर उन्मुख नहीं होते हैं। ऐसी भ्रष्ट मानवजाति के पास उद्धार की कोई गुंजाइश कैसे हो सकती है? ऐसी पतित मानवजाति रोशनी में कैसे जी सकती है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है

यह भूमि जो हजारों सालों से मलिन रही है, असहनीय रूप से गंदी और असीम दुःखों से भरी हुई है, प्रेत यहाँ हर जगह बेकाबू दौड़ते हैं, चालें चलते हैं और धोखा देते हैं, निराधार आरोप लगाते हैं,[1] निर्दयी ढंग से क्रूर तरीके अपनाते हैं, इस भुतहा शहर को कुचलते हैं और इसे लाशों से पाटते हैं; सड़ांध जमीन पर छा जाती है और हवा में व्याप्त हो जाती है, और इस पर जबर्दस्त पहरेदारी[2] है। आसमान से परे की दुनिया कौन देख सकता है? दानव मनुष्य के पूरे शरीर को कसकर बांध देता है, उसकी दोनों आँखों पर पर्दा डाल देता है, उसके होंठों को मजबूती से बंद कर देता है। दानवों के राजा ने हजारों वर्षों तक उपद्रव किया है, और आज भी वह उपद्रव कर रहा है और इस भुतहा शहर पर बारीकी से नज़र रखे हुए है, मानो यह राक्षसों का एक अभेद्य महल हो; इस बीच रक्षक कुत्तों का यह झुंड बेहद गुस्सैल नजरों से घूरता है, वे इस बात से अत्यंत भयभीत रहते हैं कि कहीं परमेश्वर अचानक उन्हें पकड़कर समाप्त न कर दे, उन्हें सुख-शांति के स्थान से वंचित न कर दे। ऐसे भुतहा शहर के लोग परमेश्वर को कैसे देख सके होंगे? क्या वे कभी परमेश्वर की प्रियता और मनोहरता का आनंद ले सके होंगे? क्या वे कभी मानव-जगत के मामलों को समझ सकते हैं? उनमें से कौन परमेश्वर के उत्कट इरादों को समझ सकता है? फिर, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि देहधारी परमेश्वर पूरी तरह से छिपा रहता है : इस तरह के अंधकारमय समाज में, जहाँ राक्षस बेरहम और अमानवीय हैं, लोगों को निर्दयतापूर्वक मार डालने वाला दानवों का सरदार ऐसे परमेश्वर के अस्तित्व को कैसे सहन कर सकता है जो सुंदर, दयालु और पवित्र भी है? वह परमेश्वर के आगमन की सराहना और जय-जयकार कैसे कर सकता है? ये अनुचर! ये दया का प्रतिफल घृणा से चुकाते हैं, लंबे समय पहले ही ये परमेश्वर के साथ शत्रु की तरह पेश आने लगे थे, ये परमेश्वर का उत्पीड़न करते हैं, बेहद बर्बर हैं, इनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी सम्मान नहीं है, वे हमला करते हैं और लूटते हैं, वे सारी अंतरात्मा खो चुके हैं, वे अंतरात्मा के विरुद्ध कार्य करते हैं और निर्दोषों को ललचाकर उन्हें संवेदनशून्यता की अवस्था में पहुँचा देते हैं। प्राचीन संतों के कौन-से उत्तराधिकारी? कौन-से प्रिय अगुआ? वे सब के सब नीच हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं! उनके हस्तक्षेप ने स्वर्ग के नीचे की हर चीज को अँधेरे और अराजकता की स्थिति में छोड़ दिया है! कौन-सी धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के कौन-से वैध अधिकार और हित? ये सब बुराई को छिपाने की चालें हैं! किसने परमेश्वर के कार्य को अंगीकार किया है? किसने परमेश्वर के कार्य के लिए अपना जीवन अर्पित किया है या रक्त बहाया है? मनुष्य जो पीढ़ियों से माता-पिता से लेकर बच्चों तक एक अखंड क्रम में गुलाम रहे हैं, उन्होंने परमेश्वर को बेझिझक गुलाम बना लिया है—ऐसा कैसे हो सकता है कि इससे रोष न भड़के? दिल में हजारों वर्ष की घृणा भरी हुई है, हजारों साल का पाप दिल पर अंकित है—इससे कैसे न घृणा पैदा होगी? परमेश्वर का बदला लो, उसके शत्रु को पूरी तरह से समाप्त कर दो, उसे अब और बेकाबू न दौड़ने दो, और उसे अत्याचारी के रूप में शासन मत करने दो! यही समय है : मनुष्य बहुत पहले अपनी सभी शक्ति जुटा चुका है और वह इसके लिए अपने हृदय का सारा रक्त अर्पित करेगा और हर मूल्य चुकाएगा, ताकि वह इस दानव के घृणित चेहरे से नकाब उतार सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अपनी पीड़ा से उबरने और इस दुष्ट बूढ़े दानव से विद्रोह करने दे। परमेश्वर के कार्य को इतनी पूरी तरह क्यों बाधित करना? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालें क्यों चलना? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार एवं हित कहाँ हैं? निष्पक्षता कहाँ है? आराम कहाँ है? गर्मजोशी कहाँ है? परमेश्वर के जनों को छलने के लिए धोखे भरी चालों का उपयोग क्यों करना? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का इस्तेमाल क्यों करना? क्यों नहीं परमेश्वर को उस धरती पर स्वतंत्रता से घूमने दिया जाए जिसे उसने बनाया? क्यों परमेश्वर को इस हद तक खदेड़ा जाए कि उसके पास सिर रखने के लिए जगह भी न रहे? मनुष्यों की गर्मजोशी कहाँ है? लोगों के बीच उसका स्वागत कहाँ है? परमेश्वर में ऐसी तड़प क्यों पैदा की जाए? परमेश्वर को बार-बार पुकारने पर मजबूर क्यों किया जाए? परमेश्वर को उस बिंदु तक क्यों धकेल दिया जाए कि उसे अपने प्रिय पुत्र के लिए चिंता करनी पड़े? यह समाज इतना अंधकारपूर्ण है—इसके घिनौने रक्षक कुत्ते परमेश्वर को उस दुनिया में स्वतंत्रतापूर्वक आने-जाने क्यों नहीं देते जो उसने बनाई है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (8)

फुटनोट :

1. “निराधार आरोप लगाते हैं” उन तरीकों को संदर्भित करता है, जिनके द्वारा शैतान लोगों को नुकसान पहुँचाता है।

2. “जबर्दस्त पहरेदारी” दर्शाता है कि वे तरीके, जिनके द्वारा शैतान लोगों को यातना पहुँचाता है, बहुत ही शातिर होते हैं, और लोगों को इतना नियंत्रित करते हैं कि उन्हें हिलने-डुलने की भी जगह नहीं मिलती।


जो लोग दानवों के हैं वे स्वयं के लिए जीते हैं। उनके जीवन के दृष्टिकोण और नीति-वाक्य मुख्यतः शैतान की कहावतों से आते हैं, जैसे कि “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “मनुष्य धन के लिए मरता है, जैसे पक्षी भोजन के लिए मरते हैं,” और ऐसी अन्य भ्रांतियाँ। उन दानव राजाओं, महान हस्तियों और दार्शनिकों द्वारा बोले गए शब्द मनुष्य का जीवन बन गए हैं। विशेष रूप से, चीनी लोगों द्वारा “ऋषि” के रूप में प्रचारित किए जाने वाले कन्फ़्यूशियस के अधिकांश वचन, मनुष्य का जीवन बन गए हैं। ये बौद्ध धर्म और ताओवाद की मशहूर कहावतें, और प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा अक्सर दोहराई गई अनुकरणीय कहावतें हैं। ये सभी शैतान के फ़लसफों और शैतान की प्रकृति का सारांश हैं। वे शैतान की प्रकृति के सबसे अच्छे उदाहरण और स्पष्टीकरण भी हैं। ये विष, जिन्हें मनुष्य के हृदय में बैठा दिया गया है, सब शैतान से आते हैं, और उनमें से एक भी परमेश्वर से नहीं आता है। ये शैतानी वचन भी परमेश्वर के वचन के बिल्कुल विरुद्ध हैं। यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता परमेश्वर से आती है, और सभी नकारात्मक चीजें जो मनुष्य में विष भरती हैं, वे शैतान से आती हैं। इसलिए, तुम किसी व्यक्ति की प्रकृति को और वह किससे संबंधित है इस बात को उसके जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों को देखकर जान सकते हो। शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और गहरे प्रभाव के माध्यम से लोगों को भ्रष्ट करता है। उनके शैतानी शब्द मनुष्य का जीवन और प्रकृति बन गए हैं। “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए” एक प्रसिद्ध शैतानी कथन है जो हर किसी में रिस चुका है और यह उसका जीवन बन गया है। सांसारिक आचरण के फलसफों के कुछ अन्य शब्द हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान लोगों को शिक्षित करने, गुमराह करने और भ्रष्ट करने के लिए प्रत्येक देश की पारंपरिक संस्कृति का इस्तेमाल करता है, मानवजाति को विनाश की अतल खाई में गिराता है और अंत में, परमेश्वर द्वारा इसे नष्ट करा देता है क्योंकि वह शैतान की सेवा करती है और परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। कुछ लोग समाज में दशकों से लोक अधिकारी रहे हैं। कल्पना करो कि तुम उनसे यह सवाल पूछते हो: “यह देखते हुए कि तुम एक अधिकारी बन पाए और तुम्हारा इतना सुगम करियर हो सका तो वे कौन-सी मशहूर कहावतें हैं जिनके बल पर तुमने यह हासिल किया?” वे शायद कहेंगे, “मैं तो बस एक ही बात समझता हूँ: ‘अधिकारी उपहार देने वालों के लिए मुश्किलें खड़ी नहीं करते, और जो चापलूसी नहीं करते हैं वे कुछ भी हासिल नहीं करते हैं।’” उन्होंने अधिकारी बनने के लिए इसी शैतानी फलसफे का सहारा लिया। क्या ये शब्द ऐसे लोगों की प्रकृति के परिचायक नहीं हैं? पद हासिल करने के लिए गलत हथकंडों का सहारा लेना उनकी प्रकृति बन गया है। एक ऐसा अधिकारी बनना जो सबसे अलग दिखे और तेजी से तरक्की पाए, यही उनका लक्ष्य है। लोगों के जीवन, क्रियाकलापों और स्व-आचरण में शैतान के और भी बहुत-से ज़हर हैं। उदाहरण के लिए, उनके सांसारिक आचरण के फलसफे, उनके काम करने के हथकंडे और उनके सूत्रवाक्य, ये सभी बड़े लाल अजगर के ज़हर से भरे हैं, और ये सब शैतान से आते हैं। इस प्रकार, वे सभी चीजें जो लोगों की हड्डियों और खून में समाई हुई हैं, शैतान की हैं। वे सभी अधिकारी, जो शक्ति रखते हैं, और जो कामयाब हैं, उन सभी के पास सफलता के अपने रास्ते और रहस्य होते हैं। क्या ऐसे रहस्य उनकी प्रकृति के पूर्ण परिचायक नहीं हैं? वे दुनिया में बड़े-बड़े उपक्रमों को कार्यान्वित करने में सक्षम हैं, और कोई भी उनके पीछे की साजिशों और दुरभिसंधियों की असलियत को नहीं देख पाता है। इससे पता चलता है कि उनकी प्रकृति कितनी कपटी और दुर्भावनापूर्ण है। शैतान ने मनुष्य को गंभीर ढंग से भ्रष्ट कर दिया है। शैतान का विष हर व्यक्ति के रक्त में बहता है, और यह कहा जा सकता है कि मनुष्य की प्रकृति भ्रष्ट, दुष्ट, प्रतिरोधात्मक और परमेश्वर के विरोध में है, शैतान के फलसफों और विषों से भरी हुई और उनमें डूबी हुई है। यह पूरी तरह शैतान का प्रकृति-सार बन गया है। इसी कारण लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें

मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करते हुए इन सभी अलग-अलग अवधियों में चला है, फिर भी वह यह नहीं जानता है कि परमेश्वर सभी चीजों और जीवित प्राणियों के भाग्य पर संप्रभु है, न ही वह यह जानता है कि परमेश्वर सभी चीजों की कैसे योजना बनाता और निर्देशित करता है। इस बात को जानने में आज के मनुष्य और यहाँ तक कि अतीत के मनुष्य भी विफल रहे हैं। जहाँ तक कारण का सवाल है, ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि परमेश्वर के कर्म बहुत छिपे हुए हैं, न इसलिए कि परमेश्वर की योजना अभी तक साकार नहीं हुई है, बल्कि इसलिए है कि मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर से बहुत दूर हैं, उतनी दूर जहाँ मनुष्य “परमेश्वर का अनुसरण” करते हुए भी शैतान की सेवा में बना रहता है—और फिर भी उसे इसका पता नहीं होता। कोई भी सक्रिय रूप से परमेश्वर के पदचिह्नों और उसके प्रकटन को नहीं खोजता और कोई भी परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहने के लिए तैयार नहीं है। इसके बजाय वे इस दुनिया के और बुरी मानवजाति द्वारा अनुसरण किए जाने वाले अस्तित्व के नियमों के अनुकूल होने के लिए, उस शैतान, दुष्ट दानव द्वारा किए जाने वाले क्षरण को स्वीकारने को तैयार हैं। इस बिंदु पर, मनुष्य का हृदय और उसकी आत्मा ऐसा नजराना बन जाते हैं जो मनुष्य शैतान को पेश करता है और उसके आहार की वस्तु बन जाते हैं। इससे भी अधिक, मानव हृदय और आत्मा एक ऐसा स्थान बन जाते हैं, जिसमें शैतान रहता है और उसका उचित खेल का मैदान बन जाते हैं। इस प्रकार मनुष्य अनजाने में ही स्व-आचरण के सिद्धांतों की अपनी समझ खो देता है और मानव-अस्तित्व के मूल्य और महत्व के बारे में अपनी समझ खो देता है। परमेश्वर के नियम और परमेश्वर और मनुष्य के बीच की वाचा धीरे-धीरे मनुष्य के दिल में धुंधली पड़ती जाती है और वह परमेश्वर की तलाश करना या उस पर ध्यान देना बंद कर देता है। समय गुजरने के साथ मनुष्य ने परमेश्वर द्वारा उसे सृजित किए जाने के महत्व के बारे में अपनी समझ खो दी है और न ही वह परमेश्वर के मुख से निकलने वाले वचनों को और परमेश्वर से आने वाली सभी बातों को समझता है। मनुष्य फिर परमेश्वर की व्यवस्थाओं और विधानों का प्रतिरोध करना शुरू कर देता है और उसका दिल और आत्मा सुन्न हो जाते हैं...। परमेश्वर उस मनुष्य को खो देता है, जिसे उसने शुरू में बनाया था, और मनुष्य उस मूल को खो देता है जो मूल रूप से उसके पास था : यही इस मानवजाति की त्रासदी है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है

2) मानव जाति भ्रष्टाचार की ऊँचाई पर होने के कारण, क्या नष्ट कर दी जानी चाहिए?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“और परमेश्वर ने पृथ्वी पर जो दृष्‍टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था। तब परमेश्वर ने नूह से कहा, ‘सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उनको पृथ्वी समेत नष्‍ट कर डालूँगा’” (उत्पत्ति 6:12-13)

“जैसा नूह के दिनों में हुआ था, वैसा ही मनुष्य के पुत्र के दिनों में भी होगा। जिस दिन तक नूह जहाज पर न चढ़ा, उस दिन तक लोग खाते-पीते थे, और उनमें विवाह होते थे। तब जल-प्रलय ने आकर उन सब को नष्‍ट किया। और जैसा लूत के दिनों में हुआ था कि लोग खाते-पीते, लेन-देन करते, पेड़ लगाते और घर बनाते थे; परन्तु जिस दिन लूत सदोम से निकला, उस दिन आग और गन्धक आकाश से बरसी और सब को नष्‍ट कर दिया। मनुष्य के पुत्र के प्रगट होने के दिन भी ऐसा ही होगा” (लूका 17:26-30)

“कि दुष्‍ट जो घास के समान फूलते-फलते हैं, और सब अनर्थकारी जो प्रफुल्‍लित होते हैं, यह इसलिये होता है कि वे सर्वदा के लिये नष्‍ट हो जाएँ” (भजन संहिता 92:7)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

सब कुछ जो परमेश्वर करता है, उसकी योजना सटीकता के साथ बनाई जाती है। जब वह किसी चीज या परिस्थिति को घटित होते देखता है, तो उसकी दृष्टि में इसे नापने के लिए एक मापदंड होता है और यह मापदंड निर्धारित करता है कि इससे निपटने के लिए वह किसी योजना की शुरुआत करता है या नहीं या उसे इस चीज एवं परिस्थिति के साथ किस प्रकार निपटना है। वह उदासीन नहीं है या उसमें सभी चीजों के प्रति भावनाओं की कमी नहीं है। असल में इसका पूर्णतः विपरीत है। यहाँ एक पद है, जिसे परमेश्वर ने नूह से कहा था : “सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिए मैं उनको पृथ्वी समेत नष्‍ट कर डालूँगा।” जब परमेश्वर ने यह कहा तो क्या उसका मतलब था वह सिर्फ मनुष्यों का विनाश कर रहा था? नहीं! परमेश्वर ने कहा कि वह देह वाले सभी जीवित प्राणियों का विनाश करने जा रहा था। परमेश्वर ने विनाश क्यों चाहा? यहाँ परमेश्वर के स्वभाव का एक और प्रकाशन है; परमेश्वर की दृष्टि में, मनुष्य की भ्रष्टता के प्रति, सभी देहधारियों की अशुद्धता, उपद्रव और विद्रोहीपन के प्रति उसके धीरज की एक सीमा है। उसकी सीमा क्या है? यह ऐसा है जैसा परमेश्वर ने कहा था : “और परमेश्वर ने पृथ्वी पर जो दृष्‍टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था।” इस वाक्यांश “क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कोई भी जीवित प्राणी, इनमें परमेश्वर का अनुसरण करने वाले, वे जो परमेश्वर का नाम पुकारते थे, ऐसे लोग जो किसी समय परमेश्वर को होमबलि चढ़ाते थे, ऐसे लोग जो मौखिक रूप से परमेश्वर को स्वीकार करते थे और यहाँ तक कि परमेश्वर की स्तुति भी करते थे—जब एक बार उनका व्यवहार भ्रष्टता से भर गया और परमेश्वर की दृष्टि में आ गया, तो उसे उनका नाश करना होगा। यह परमेश्वर की सीमा थी। अतः परमेश्वर किस हद तक मनुष्य के प्रति और समस्त देह की भ्रष्टता के प्रति धैर्यवान बना रहा? उस हद तक जब सभी लोग, चाहे वे परमेश्वर के अनुयायी हों या अविश्वासी, सही मार्ग पर नहीं चल रहे थे। उस हद तक जब मनुष्य केवल नैतिक रूप से भ्रष्ट और बुराई से भरा हुआ नहीं था, बल्कि जहाँ ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करता हो, किसी ऐसे व्यक्ति के होने की तो बात ही छोड़ दीजिए जो विश्वास करता हो कि संसार परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है और परमेश्वर लोगों के लिए रोशनी और सही मार्ग ला सकता है। उस हद तक जहाँ मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व से घृणा करता था और परमेश्वर को अस्तित्व में नहीं रहने देता था। एक बार मनुष्य की भ्रष्टता इस बिंदु पर पहुँच गई तो परमेश्वर अपना धीरज बनाए नहीं रह सकता था। इसका स्थान क्या लेता? परमेश्वर के क्रोध और परमेश्वर के दंड का आगमन।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I

उत्पत्ति 19:1-11  साँझ को वे दो दूत सदोम के पास आए; और लूत सदोम के फाटक के पास बैठा था। उन को देखकर वह उनसे भेंट करने के लिए उठा, और मुँह के बल झुककर दण्डवत् कर कहा, “हे मेरे प्रभुओ, अपने दास के घर में पधारिए, और रात भर विश्राम कीजिए, और अपने पाँव धोइये, फिर भोर को उठकर अपने मार्ग पर जाइए।” उन्होंने कहा, “नहीं, हम चौक ही में रात बिताएँगे।” पर उसने उनसे बहुत विनती करके उन्हें मनाया; इसलिए वे उसके साथ चलकर उसके घर में आए; और उसने उनके लिए भोजन तैयार किया, और बिना खमीर की रोटियाँ बनाकर उनको खिलाईं। उनके सो जाने से पहले, सदोम नगर के पुरुषों ने, जवानों से लेकर बूढ़ों तक, वरन् चारों ओर के सब लोगों ने आकर उस घर को घेर लिया; और लूत को पुकारकर कहने लगे, “जो पुरुष आज रात को तेरे पास आए हैं वे कहाँ हैं? उनको हमारे पास बाहर ले आ कि हम उनसे भोग करें।” तब लूत उनके पास द्वार के बाहर गया, और किवाड़ को अपने पीछे बन्द करके कहा, “हे मेरे भाइयो, ऐसी बुराई न करो। सुनो, मेरी दो बेटियाँ हैं जिन्होंने अब तक पुरुष का मुँह नहीं देखा; इच्छा हो तो मैं उन्हें तुम्हारे पास बाहर ले आऊँ, और तुम को जैसा अच्छा लगे वैसा व्यवहार उनसे करो; पर इन पुरुषों से कुछ न करो; क्योंकि ये मेरी छत तले आए हैं।” उन्होंने कहा, “हट जा!” फिर वे कहने लगे, “तू एक परदेशी होकर यहाँ रहने के लिए आया, पर अब न्यायी भी बन बैठा है; इसलिए अब हम उनसे भी अधिक तेरे साथ बुराई करेंगे।” और वे उस पुरुष लूत को बहुत दबाने लगे, और किवाड़ तोड़ने के लिए निकट आए। तब उन अतिथियों ने हाथ बढ़ाकर लूत को अपने पास घर में खींच लिया, और किवाड़ को बन्द कर दिया। और उन्होंने क्या छोटे, क्या बड़े, सब पुरुषों को जो घर के द्वार पर थे, अन्धा कर दिया, अतः वे द्वार को टटोलते टटोलते थक गए।

उत्पत्ति 19:24-25  तब यहोवा ने अपनी ओर से सदोम और अमोरा पर आकाश से गन्धक और आग बरसाई; और उन नगरों को और उस सम्पूर्ण तराई को, और नगरों के सब निवासियों को, भूमि की सारी उपज समेत नष्‍ट कर दिया।

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मनुष्य के दृष्टिकोण से सदोम एक ऐसा नगर था, जो मनुष्य की कामना और दुष्टता को पूरी तरह से संतुष्ट कर सकता था। उस आकर्षक और मनमोहक नगर की संपन्नता ने हर रात चलने वाले संगीत और नृत्य के साथ मनुष्यों को सम्मोहन और उन्माद की ओर धकेल दिया। उसकी दुष्टता ने लोगों के हृदय कलुषित कर दिए और उन्हें अनैतिकता में फँसा दिया। वह एक ऐसा नगर था, जहाँ अशुद्ध और दुष्ट आत्माएँ बेधड़क मँडराया करती थीं; वह पाप और हत्या से सराबोर था और उसकी हवा में ख़ूनी एवं सड़ी हुई दुर्गंध समाई हुई थी। वह एक ऐसा नगर था, जिसने लोगों को आतंकित कर दिया था, ऐसा नगर जिससे कोई भी भय से सिकुड़ जाएगा। उस नगर में कोई भी व्यक्ति—पुरुष हो या स्त्री, जवान हो या बुज़ुर्ग—सच्चे मार्ग की खोज नहीं करता था; कोई भी प्रकाश की लालसा नहीं करता था या पाप से दूर नहीं जाना चाहता था। वे शैतान के नियंत्रण, भ्रष्टता और छल-कपट में जीवन बिताते थे। उन्होंने अपनी मानवता खो दी थी; उन्होंने अपनी संवेदनाएँ गँवा दी थीं, और उन्होंने मनुष्य के अस्तित्व का मूल उद्देश्य खो दिया था। उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध प्रतिरोध के असंख्य दुष्ट कर्मों को अंजाम दिया था; उन्होंने उसका मार्गदर्शन अस्वीकार किया था और उसकी इच्छा का विरोध किया था। ये उनके बुरे कार्य थे, जिन्होंने इन लोगों को, नगर को और उसके भीतर के हर एक जीवित प्राणी को कदम-दर-कदम विनाश के पथ पर पहुँचा दिया था।

यद्यपि ये दो अंश सदोम के लोगों की भ्रष्टता की सीमा का समस्त विवरण दर्ज नहीं करते, इसके बजाय वे नगर में परमेश्वर के दो सेवकों के आगमन के बाद उनके प्रति लोगों के आचरण को दर्ज करते हैं, तथापि एक साधारण-सा सत्य है जो प्रकट करता है कि सदोम के लोग किस हद तक भ्रष्ट एवं दुष्ट थे और वे किस हद तक परमेश्वर का प्रतिरोध करते थे। इससे नगर के लोगों के असली चेहरे और सार का भी खुलासा हो जाता है। इन लोगों ने न केवल परमेश्वर की चेतावनियों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, बल्कि वे उसके दंड से भी नहीं डरते थे। इसके विपरीत, उन्होंने परमेश्वर के कोप का उपहास किया। उन्होंने आँख मूँदकर परमेश्वर का प्रतिरोध किया। परमेश्वर ने चाहे जो भी किया या जैसे भी किया, उनका दुष्ट स्वभाव सघन ही हुआ, और उन्होंने बार-बार परमेश्वर का विरोध किया। सदोम के लोग परमेश्वर के अस्तित्व, उसके आगमन, उसके दंड, और उससे भी बढ़कर, उसकी चेतावनियों से विमुख थे। वे अत्यधिक अहंकारी थे। उन्होंने उन सभी लोगों को निगल लिया और नुकसान पहुँचाया, जिन्हें निगला और नुकसान पहुँचाया जा सकता था, और उन्होंने परमेश्वर के सेवकों के साथ भी कोई अलग बरताव नहीं किया। सदोम के लोगों द्वारा किए गए तमाम दुष्कर्मों के लिहाज से, परमेश्वर के सेवकों को नुकसान पहुँचाना तो बस उनकी दुष्टता का एक छोटा-सा अंश था, और इससे जो उनकी दुष्ट प्रकृति प्रकट हुई, वह वास्तव में विशाल समुद्र में पानी की एक बूँद से बढ़कर नहीं थी। इसलिए परमेश्वर ने उन्हें आग से नष्ट करने का फैसला किया। परमेश्वर ने नगर को नष्ट करने के लिए बाढ़ का इस्तेमाल नहीं किया, न ही उसने चक्रवात, भूकंप, सुनामी या किसी और तरीके का इस्तेमाल किया। इस नगर का विनाश करने के लिए परमेश्वर द्वारा आग का इस्तेमाल क्या सूचित करता है? इसका अर्थ था नगर का संपूर्ण विनाश, इसका अर्थ था कि नगर पृथ्वी और अस्तित्व से पूरी तरह से लुप्त हो गया था। यहाँ “विनाश” न केवल नगर के आकार और ढाँचे या बाहरी रूप के लुप्त हो जाने को संदर्भित करता है; बल्कि इसका अर्थ यह भी है कि पूरी तरह से मिटा दिए जाने के कारण नगर के भीतर के लोगों की आत्माएँ भी अस्तित्व में नहीं बचीं। सरल शब्दों में कहें तो, नगर से जुड़े सभी लोग, घटनाएँ और चीज़ें नष्ट कर दी गईं। उस नगर के लोगों के लिए कोई अगला जीवन या पुनर्जन्म नहीं होगा; परमेश्वर ने उन्हें अपनी सृष्टि की मानवजाति से हमेशा-हमेशा के लिए मिटा दिया। आग का इस्तेमाल इस बात का द्योतक है कि इस स्थान पर पाप पर अंकुश लग गया था और यह यहीं खत्म हुआ था; यह पाप अस्तित्व में नहीं रहेगा और न ही फैलेगा। इसका अर्थ था कि शैतान की दुष्टता ने अपनी उपजाऊ मिट्टी के साथ-साथ उस कब्रिस्तान को भी खो दिया था, जिसने उसे रहने और जीने के लिए एक स्थान दिया था। परमेश्वर और शैतान के बीच होने वाले युद्ध में परमेश्वर द्वारा आग का इस्तेमाल उसकी विजय की छाप है, जो शैतान पर अंकित की जाती है। मनुष्यों को भ्रष्ट करके और उन्हें निगलकर परमेश्वर का विरोध करने की शैतान की महत्वाकांक्षा में सदोम का विनाश एक बहुत भारी आघात है, और इसी प्रकार यह एक समय पर मानवता के विकास में एक अपमानजनक चिह्न है, जब मनुष्य ने परमेश्वर का मार्गदर्शन ठुकरा दिया था और अपने आपको बुराई के हवाले कर दिया था। इसके अतिरिक्त, यह परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के सच्चे प्रकाशन का एक अभिलेख है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II

मनुष्य चरम सीमा तक भ्रष्ट हो चुके थे। वे नहीं जानते थे कि परमेश्वर कौन है या वे स्वयं कहाँ से आए हैं। यदि तुम परमेश्वर का ज़िक्र भी करते, तो वे हमला कर देते, कलंक लगाते और ईश-निंदा करते। यहाँ तक कि जब परमेश्वर के सेवक उसकी चेतावनी को आगे प्रसारित करने आए थे, तब भी इन दुष्ट लोगों ने न केवल पश्चात्ताप का कोई चिह्न नहीं दिखाया और अपना बुरा आचरण नहीं त्यागा, बल्कि इसके विपरीत, उन्होंने मनमाने ढंग से परमेश्वर के सेवकों को नुकसान पहुँचाया। जो कुछ उन्होंने व्यक्त और प्रकट किया, वह परमेश्वर के प्रति उनकी चरम नफ़रत का प्रकृति सार था। हम देख सकते हैं कि परमेश्वर के विरुद्ध इन भ्रष्ट लोगों का प्रतिरोध उनके भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशन से कहीं अधिक था, बिल्कुल वैसे ही, जैसे यह तथ्यों की समझ की कमी के कारण की जाने वाली बदनामी और उपहास की एक घटना से अधिक था। उनके बुरे कर्म उनकी मूर्खता या अज्ञानता के कारण नहीं थे; उन्होंने ऐसा कार्य इसलिए नहीं किया कि उन्हें धोखा दिया गया था, और इसलिए तो निश्चित रूप से नहीं कि उन्हें गुमराह किया गया था। उनका आचरण एक घोर, निरंकुश तरीके से परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण होने व उसका विरोध करने और उसके खिलाफ हो-हल्ला मचाने के स्तर तक पहुँच गया था। निस्संदेह, इस प्रकार का मानव-व्यवहार परमेश्वर को क्रोधित करेगा, और यह उसके स्वभाव को क्रोधित करेगा—ऐसा स्वभाव, जिसे बिल्कुल नाराज नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए परमेश्वर ने सीधे और खुले तौर पर अपना कोप और प्रताप दिखाया; यह उसके धार्मिक स्वभाव का सच्चा प्रकाशन था। एक ऐसे नगर को सामने देख, जहाँ पाप उमड़ रहा था, परमेश्वर ने उसे यथासंभव तीव्रतम तरीके से नष्ट कर देना चाहा, ताकि उसके भीतर रहने वाले लोगों और उनके संपूर्ण पापों को पूरी तरह से मिटाया जा सके, उस नगर के लोगों का अस्तित्व समाप्त किया जा सके और उस स्थान के भीतर पाप को उठने से रोका जा सके। ऐसा करने का सबसे तेज और सबसे मुकम्मल तरीका था उसे आग से जलाकर नष्‍ट कर देना। सदोम के लोगों के प्रति परमेश्वर का रवैया परित्याग या उपेक्षा का नहीं था। इसके बजाय, इन लोगों को दंड देने, प्रहार करने और पूरी तरह से नष्ट कर देने के लिए वह अपने कोप, प्रताप और अधिकार का प्रयोग करना चाहता था। उनके प्रति अपने रवैये में परमेश्वर न केवल उनकी देह को नष्ट करना चाहता था, बल्कि उससे भी अधिक उनकी आत्माओं को नष्ट करना, उन्हें हमेशा के लिए मिटाना चाहता था। परमेश्वर की नजर में “अस्तित्व समाप्त होने” का यही अर्थ है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II

परमेश्वर मनुष्य से घृणा करता है क्योंकि मनुष्य उसके प्रति शत्रुभाव रखता है, लेकिन अपने हृदय में, मानवता के प्रति उसकी देखभाल, चिंता एवं दया कभी नहीं बदलती है। भले ही उसने मानवजाति को नष्ट किया, फिर भी उसका हृदय अपरिवर्तित रहता है। जब मानवजाति भ्रष्टता से भरपूर और परमेश्वर के प्रति गंभीर हद तक विद्रोही हो जाती है तो परमेश्वर को अपने स्वभाव और अपने सार के कारण और अपने सिद्धांतों के अनुसार इस मानवजाति को नष्ट करना पड़ता है। लेकिन अपने सार के कारण परमेश्वर अभी भी मानवजाति के लिए दया रखता है और यह तक चाहता है कि मानवजाति को वापस लाने के लिए विभिन्न तरीके इस्तेमाल करे ताकि वह जीना जारी रख सके। लेकिन, मनुष्य परमेश्वर का विरोध करता है, परमेश्वर से विद्रोह करना जारी रखता है और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने से इनकार करता है; अर्थात् मनुष्य परमेश्वर के अच्छे इरादों को स्वीकार करने से इनकार करता है—इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर उसे कैसे पुकारता है, स्मरण दिलाता है, उसे आपूर्ति करता है, उसकी सहायता करता है या उसे सहन करता है, मनुष्य न तो इसे समझता है, न इसका आभारी होता है, न ही उस पर कुछ ध्यान देता है। अपनी पीड़ा में परमेश्वर अभी भी मनुष्य को अपनी अधिकतम सहनशीलता प्रदान करना नहीं भूलता, वह इंतजार करता है कि मनुष्य अपना रास्ता पलटे। परमेश्वर जब अपनी हद तक पहुँच जाता है तो वह बेहिचक वह करता है जो उसे करना है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर जब मानवजाति को नष्ट करने की योजना बनाता है तो उस क्षण से लेकर मानवजाति को नष्ट करने के अपने कार्य की औपचारिक शुरुआत तक एक विशिष्ट समयावधि और एक प्रक्रिया होती है। यह प्रक्रिया मनुष्य के राह पलटने की खातिर होती है और यह वह अंतिम मौका होता है जो परमेश्वर मनुष्य को देता है। तो मानवजाति का विनाश करने से पहले इस अवधि में परमेश्वर क्या करता है? परमेश्वर बहुत सारा स्मरण दिलाने और नसीहत देने का कार्य करता है। चाहे परमेश्वर का हृदय कितनी भी पीड़ा एवं दुःख में हो, फिर भी वह मानवजाति पर अपनी देखभाल, चिंता और भरपूर दया करना जारी रखता है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I

मनुष्य की भ्रष्टता, गंदगी एवं उपद्रव के प्रति परमेश्वर के धीरज की एक सीमा है। जब वह उस सीमा तक पहुँच जाता है, तो वह और अधिक धीरज नहीं रखेगा और इसके बजाय वह अपने नए प्रबंधन और नई योजना को शुरू करेगा, जो उसे करना है उसे प्रारम्भ करेगा, अपने कर्मों और अपने स्वभाव के दूसरे पहलू को प्रकट करेगा। उसका यह कार्य यह दर्शाने के लिए नहीं है कि मनुष्य द्वारा कभी उसे नाराज़ नहीं किया जाना चाहिए या यह कि वह अधिकार एवं क्रोध से भरा हुआ है और यह इस बात को दर्शाने के लिए नहीं है कि वह मानवता का नाश कर सकता है। बात यह है कि उसका स्वभाव एवं उसका पवित्र सार इस प्रकार की मानवता को परमेश्वर के सामने जीवन बिताने हेतु और उसके प्रभुत्व के अधीन जीवन जीने हेतु न तो और अनुमति दे सकता है और न धीरज रख सकता है। इस प्रकार जब सारी मानवजाति उसके विरुद्ध है, जब सारी पृथ्वी पर ऐसा कोई नहीं है जिसे वह बचा सके, तो ऐसी मानवता के लिए उसके पास और अधिक धीरज नहीं होगा और वह बिना किसी संदेह के इस प्रकार की मानवता का नाश करने के लिए अपनी योजना को कार्यान्वित करेगा। परमेश्वर के द्वारा ऐसा कार्य उसके स्वभाव से निर्धारित होता है। यह एक आवश्यक परिणाम है और ऐसा परिणाम है, जिसे परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन प्रत्येक सृजित प्राणी को सहना होगा। क्या यह नहीं दर्शाता है कि इस वर्तमान युग में, परमेश्वर अपनी योजना को पूर्ण करने और उन लोगों को बचाने के लिए जिन्हें वह बचाना चाहता है और इंतज़ार नहीं कर सकता? इन परिस्थितियों में, परमेश्वर किस बात की सबसे अधिक परवाह करता है? इसकी नहीं कि किस प्रकार वे जो उसका बिल्कुल अनुसरण नहीं करते या वे जो उसका विरोध करते हैं, वे उससे कैसा व्यवहार करते हैं या उसका कैसे प्रतिरोध करते हैं, या मानवजाति किस प्रकार उस पर कलंक लगा रही है। वह केवल इसकी परवाह करता है कि वे लोग जो उसका अनुसरण करते हैं, वे जो उसकी प्रबंधन योजना में उसके उद्धार के विषय हैं, उन्हें उसके द्वारा पूरा किया गया है या नहीं, कि वे उसकी संतुष्टि के योग्य बन गए हैं या नहीं। जहाँ तक उसका अनुसरण करने वालों के अलावा अन्य लोगों की बात है, वह मात्र कभी-कभार ही अपने क्रोध को व्यक्त करने के लिए थोड़ा सा दंड देता है। उदाहरण के लिए : सुनामी, भूकंप, ज्वालामुखी का विस्फोट। ठीक उसी समय, वह उनको भी मजबूती से बचा रहा होता और देखरेख कर रहा होता है, जो उसका अनुसरण करते हैं और जिन्हें उसके द्वारा बचाया जाना है। परमेश्वर का स्वभाव यह है : एक ओर, वह उन लोगों के प्रति अधिकतम धीरज एवं सहनशीलता रख सकता है, जिन्हें वह पूर्ण बनाने का इरादा करता है और उनके लिए वह तब तक इंतज़ार कर सकता है, जब तक वह संभवतः कर सकता है; दूसरी ओर, परमेश्वर शैतान-जैसे लोगों से, जो उसका अनुसरण नहीं करते और उसका विरोध करते हैं, अत्यंत नफ़रत एवं घृणा करता है। यद्यपि वह इसकी परवाह नहीं करता कि ये शैतान-जैसे लोग उसका अनुसरण या उसकी आराधना करते हैं या नहीं, वह तब भी उनसे घृणा करता है, जबकि उसके हृदय में उनके लिए धीरज होता है और चूँकि वह इन शैतान-जैसे लोगों के अंत को निर्धारित करता है, इसलिए वह अपनी प्रबंधकीय योजना के चरणों के आगमन का भी इंतज़ार कर रहा होता है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I

मेरा कार्य केवल छह हजार वर्षों तक चलता है और मैंने समस्त मानवजाति पर उस दुष्ट का नियंत्रण भी छह हजार वर्षों तक ही चलते रहने की अनुमति दी है। इसलिए, अब समय पूरा हुआ। मैं अब और न तो जारी रखना चाहता हूँ और न ही विलंब करना चाहता हूँ : अंत के दिनों के दौरान मैं शैतान को परास्त कर दूँगा, मैं अपनी संपूर्ण महिमा वापस ले लूँगा और मैं पृथ्वी पर उन सभी आत्माओं को वापस ले लूँगा जो मेरी हैं, ताकि ये व्यथित आत्माएँ दुःख के सागर से बच सकें और इस प्रकार पृथ्वी पर मेरे समस्त कार्य का समापन होगा। इस दिन के बाद से मैं पृथ्वी पर फिर कभी देहधारी नहीं बनूँगा और फिर कभी मेरा आत्मा, जो सबका संप्रभु है, पृथ्वी पर कार्य नहीं करेगा। मैं पृथ्वी पर केवल एक मानवजाति की पुनर्रचना करूँगा, एक ऐसी मानवजाति जो पावनीकृत है और जो पृथ्वी पर मेरा विश्वासयोग्य शहर है। पर जान लो कि मैं संपूर्ण संसार को जड़ से नहीं मिटाऊँगा, न ही मैं समस्त मानवजाति का संहार करूँगा। मैं उस शेष तृतीयांश को रखूँगा—वह तृतीयांश जो मेरे द्वारा पूरी तरह से जीत लिया गया है और जो मुझसे प्रेम करता है और मैं इस तृतीयांश को पृथ्वी पर फलने-फूलने और बढ़ने दूँगा, ठीक वैसे जैसे इस्राएली व्यवस्था के तहत करते थे; उन्हें प्रचुर मात्रा में भेड़ें और मवेशी मिलेंगे जिनसे मैं उनका पोषण करता हूँ, साथ ही पृथ्वी की सारी समृद्धि मिलेगी। यह मानवजाति हमेशा मेरे साथ रहेगी, मगर यह आज की घोर रूप से गंदी मानवजाति नहीं होगी, बल्कि वह मानवजाति होगी जो मेरे द्वारा प्राप्त किए गए सभी लोगों का समूह है। इस प्रकार की मानवजाति शैतान द्वारा नष्ट, बाधित या घेरी नहीं जाएगी और वही एकमात्र मानवजाति होगी जो मेरे शैतान को हरा देने के बाद पृथ्वी पर जीना जारी रखेगी। यही वह मानवजाति है, जो आज मेरे द्वारा जीत ली गई है और जिसे मेरी प्रतिज्ञा हासिल है। और इसलिए, अंत के दिनों में जीती गई मानवजाति भी वही मानवजाति है जो बची रहेगी और जिसे मेरे अनंत आशीष प्राप्त होंगे। वे शैतान पर मेरी विजय का एकमात्र प्रमाण होंगे और शैतान से मेरे युद्ध का एकमात्र विजयोपहार। युद्ध के ये विजयोपहार मेरे द्वारा शैतान की सत्ता से बचाए गए हैं और ये मेरी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना की एकमात्र सारगर्भित निष्पत्ति और फल हैं। ये संपूर्ण ब्रह्मांड के हर राष्ट्र और संप्रदाय, हर स्थान और देश से हैं। ये भिन्न-भिन्न जातियों के हैं, भिन्न-भिन्न भाषाओं, रीति-रिवाजों और त्वचा के रंगों वाले हैं और ये विश्व के हर देश और संप्रदाय में और यहाँ तक कि संसार के हर कोने में भी फैले हैं। अंततः वे पूर्ण मानवजाति बनाने के लिए साथ आएँगे, लोगों का एक समूह, जिस तक शैतान की शक्तियाँ नहीं पहुँच सकतीं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कोई भी जो देह में है, क्रोध के दिन से नहीं बच सकता

पिछला: 3. आज आपदाएँ बढ़ती गंभीरता और आवृत्ति के साथ हो रही हैं। ये संकेत बताते हैं कि बाइबल में जिनकी भविष्यवाणी की गई है, अंतिम दिनों की वे महान आपदाएँ शुरू होने वाली हैं। इन आपदाओं के बीच हम कैसे परमेश्वर की सुरक्षा हासिल कर, बचे रह सकते हैं?

अगला: 2. आप गवाही देते हैं कि, अंतिम दिनों के दौरान, सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य को व्यक्त करता है और मनुष्य का न्याय और शुद्धिकरण करने का कार्य करता है। बिल्कुल अंत में, वह विजेताओं का एक समूह प्राप्त करेगा, और उसके बाद इस पुराने, दुष्ट युग को ध्वंस कर देगा, जिससे मनुष्य एक नए युग में अग्रसर होगा। क्या आप इस बारे में अधिक विस्तार से सहभागिता कर सकते हैं कि अंतिम दिनों के दौरान परमेश्वर इस पुराने, दुष्ट युग को कैसे नष्ट करता है?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

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