1. बाइबल प्रभु के प्रति गवाही है, और यह हमारी आस्था का आधार भी है। दो हज़ार वर्षों से, जिन लोगों ने भी प्रभु में विश्वास किया है, उन्होंने बाइबल के अनुसार ऐसा किया है। इसलिए हम मानते हैं कि बाइबल प्रभु का प्रतिनिधित्व करती है, कि प्रभु पर विश्वास करना बाइबल में विश्वास करना है, और बाइबल में विश्वास करना प्रभु में विश्वास करना है। हम कभी भी बाइबल से हट नहीं सकते। अगर हम बाइबल से हट जाते तो हम प्रभु पर विश्वास कैसे कर सकते थे? क्या आप कह रहे हैं कि हमारे समझने में कोई भूल है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते” (यूहन्ना 5:39-40)।
“मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता” (यूहन्ना 14:6)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
बहुत सालों से, लोगों के विश्वास (दुनिया के तीन मुख्य धर्मों में से एक, ईसाई धर्म) का परंपरागत साधन बाइबल पढ़ना ही रहा है; बाइबल से दूर जाना प्रभु में विश्वास करना नहीं है, बाइबल से दूर जाना एक पाखंड और विधर्म है, और यहाँ तक कि जब लोग अन्य पुस्तकें पढ़ते हैं, तो उन पुस्तकों की बुनियाद भी बाइबल की व्याख्या ही होनी चाहिए। कहने का अर्थ है कि, यदि तुम प्रभु में विश्वास करते हो तो तुम्हें बाइबल अवश्य पढ़नी चाहिए, और बाइबल के अलावा तुम्हें ऐसी किसी अन्य पुस्तक की आराधना नहीं करनी चाहिए, जिसमें बाइबल शामिल न हो। यदि तुम करते हो, तो तुम परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर रहे हो। जब से बाइबल अस्तित्व में आई है तभी से प्रभु में लोगों का विश्वास, बाइबल में विश्वास रहा है। यह कहने के बजाय कि लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, यह कहना बेहतर है कि वे बाइबल में विश्वास करते हैं; यह कहने के बजाय कि उन्होंने बाइबल पढ़नी आरंभ कर दी है, यह कहना बेहतर है कि उन्होंने बाइबल पर विश्वास करना आरंभ कर दिया है; और यह कहने के बजाय कि वे प्रभु के सामने लौट आए हैं, यह कहना बेहतर होगा कि वे बाइबल के सामने लौट आए हैं। इस तरह से, लोग बाइबल की आराधना ऐसे करते हैं मानो वह परमेश्वर हो और उसके साथ इस तरह से पेश आते हैं मानो वह उनका जीवन-रक्त हो और उसे खोना अपने जीवन को खोने के समान हो। लोग बाइबल को परमेश्वर जितना ही ऊँचा समझते हैं, और यहाँ तक कि कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो उसे परमेश्वर से भी ऊँचा समझते हैं। यदि लोगों के पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, यदि वे परमेश्वर को महसूस नहीं कर सकते, तो वे जीते रह सकते हैं—परंतु जैसे ही वे बाइबल को खो देते हैं, या बाइबल के प्रसिद्ध अध्याय और उक्तियाँ खो देते हैं, तो यह ऐसा होता है, मानो उन्होंने अपना जीवन खो दिया हो। और इसलिए, जैसे ही लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, वैसे ही वे बाइबल पढ़ना और उसे याद करना आरंभ कर देते हैं, और जितना ज्यादा वे बाइबल को याद कर पाते हैं, उतना ही ज्यादा यह साबित होता है कि वे प्रभु से प्रेम करते हैं और उनकी आस्था बहुत गहरी है। जिन्होंने बाइबल पढ़ी है और जो उसके बारे में दूसरों से बात कर सकते हैं, वे सभी सबसे अच्छे भाई-बहन हैं। इन सारे वर्षों में, प्रभु के प्रति लोगों की आस्था और वफादारी बाइबल की उनकी समझ की सीमा के अनुसार मापी गई है। अधिकतर लोग साधारणतः यह नहीं समझते कि उन्हें परमेश्वर पर विश्वास क्यों करना चाहिए, और न ही वे यह समझते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास कैसे किया जाए, और वे बाइबल के अध्यायों का गूढ़ार्थ निकालने के लिए आँख बंद करके सुराग ढूँढ़ने के अलावा कुछ नहीं करते। लोगों ने कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा का अनुसरण नहीं किया है; शुरुआत से ही उन्होंने हताशापूर्वक बाइबल का अध्ययन और अन्वेषण करने के अलावा और कुछ नहीं किया है, और किसी ने कभी बाइबल के बाहर पवित्र आत्मा का कोई अधिक नया कार्य नहीं पाया है। कोई कभी बाइबल से दूर नहीं जा सकता, न ही किसी ने कभी ऐसा करने की हिम्मत की है। लोगों ने इन सभी वर्षों में बाइबल का अध्ययन किया है, वे बहुत-सी व्याख्याओं के साथ सामने आए हैं, और उन्होंने बहुत-सा काम किया है; उनमें भी बाइबल के बारे में कई मतभेद हैं, जिस पर वे अंतहीन बहस करते हैं, इतनी कि आज दो हज़ार से ज़्यादा अलग-अलग संप्रदाय बन गए हैं। वे सभी कुछ श्रेष्ठ व्याख्याओं या बाइबल के अधिक गंभीर रहस्यों का पता लगाना चाहते हैं, और वे उसकी छानबीन करना चाहते हैं, और उसमें इस्राएल में यहोवा के कार्य की पृष्ठभूमि का या यहूदिया में यीशु के कार्य की पृष्ठभूमि का या और अधिक रहस्यों का पता लगाना चाहते हैं, जिनके बारे में कोई नहीं जानता। बाइबल के प्रति लोगों का दृष्टिकोण जुनून और विश्वास का है, और उनमें से कोई भी बाइबल के पीछे की असली कहानी या बाइबल के सार के बारे में पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो सकता। आज भी जब बाइबल की बात आती है, तो लोगों को अभी भी आश्चर्य का एक अवर्णनीय एहसास होता है, वे उसके प्रति और भी अधिक जुनूनी हो जाते हैं, उस पर और भी अधिक आस्था रखते हैं। आज, हर कोई बाइबल में अंत के दिनों के कार्य की भविष्यवाणियाँ ढूँढ़ना चाहता है, वह यह खोजना चाहता है कि अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर क्या कार्य करता है, और अंत के दिनों के क्या लक्षण हैं। इस तरह से, बाइबल की उनकी आराधना और अधिक उत्कट हो जाती है, और जितनी ज़्यादा वह अंत के दिनों के नज़दीक आती है, उतना ही ज़्यादा अंधविश्वास वे बाइबल की भविष्यवाणियों पर करने लगते हैं, विशेषकर उन पर, जो अंत के दिनों के बारे में हैं। बाइबल पर ऐसे अंधे विश्वास के साथ, बाइबल पर ऐसे भरोसे के साथ, उनमें पवित्र आत्मा के कार्य को खोजने की कोई इच्छा नहीं होती। अपनी धारणाओं के अनुसार, लोग सोचते हैं कि केवल बाइबल ही पवित्र आत्मा के कार्य को ला सकती है; केवल बाइबल में ही वे परमेश्वर के पदचिह्न खोज सकते हैं; केवल बाइबल में ही परमेश्वर के कार्य के रहस्य छिपे हुए हैं; केवल बाइबल—न कि अन्य पुस्तकें या लोग—परमेश्वर की हर चीज़ और उसके कार्य की संपूर्णता को स्पष्ट कर सकती है; बाइबल स्वर्ग के कार्य को पृथ्वी पर ला सकती है; और बाइबल युगों का आरंभ और अंत दोनों कर सकती है। इन धारणाओं के कारण लोगों का पवित्र आत्मा के कार्य को खोजने की ओर कोई झुकाव नहीं होता। अतः अतीत में बाइबल लोगों के लिए चाहे जितनी मददगार रही हो, वह परमेश्वर के नवीनतम कार्य के लिए एक बाधा बन गई है। बाइबल के बिना ही लोग अन्यत्र परमेश्वर के पदचिह्न खोज सकते हैं, किंतु आज उसके पदचिह्न बाइबल द्वारा “सीमित” कर दिए गए हैं और उसके नवीनतम कार्य को फैलाना दोगुना कठिन और एक दुःसाध्य संघर्ष बन गया है। यह सब बाइबल के प्रसिद्ध अध्यायों एवं उक्तियों, और साथ ही बाइबल की अनगिनत भविष्यवाणियों की वजह से है। बाइबल लोगों के मन में एक आदर्श बन चुकी है, वह उनके मस्तिष्क में एक पहेली बन चुकी है, और वे यह विश्वास करने में सर्वथा असमर्थ हैं कि परमेश्वर बाइबल के बाहर भी काम कर सकता है, वे यह विश्वास करने में असमर्थ हैं कि लोग बाइबल के बाहर भी परमेश्वर को पा सकते हैं, और यह विश्वास करने में तो वे बिल्कुल ही असमर्थ हैं कि परमेश्वर अंतिम कार्य में बाइबल से प्रस्थान कर सकता है और नए सिरे से शुरुआत कर सकता है। यह लोगों के लिए अचिंत्य है; वे इस पर विश्वास नहीं कर सकते, और न ही वे इसकी कल्पना कर सकते हैं। लोगों द्वारा परमेश्वर के अधिक नए कार्य को स्वीकार करने में बाइबल एक बहुत बड़ी बाधा बन गई है और उसने परमेश्वर के अधिक नए कार्य को फैलाना कठिन बना दिया है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (1)
मनुष्य जो भ्रष्ट हो चुके हैं, जो शैतान के जाल में जीते हैं, वे सभी देह में जीते हैं, स्वार्थपूर्ण अभिलाषाओं में जीते हैं और उनके मध्य एक भी व्यक्ति नहीं जो मेरे अनुरूप हो। जो कहते हैं कि वे मेरे अनुरूप हैं, वे सब अज्ञात मूर्तियों की आराधना करते हैं। भले ही वे मेरे नाम को पवित्र मानने का दावा करते हैं, पर वे उस रास्ते पर चलते हैं जो मेरे विपरीत जाता है, और उनके शब्द घमंड और आत्मविश्वास से भरे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सब स्वाभाविक रूप से मेरे विरोध में हैं और मेरे अनुरूप नहीं हैं। प्रतिदिन वे बाइबल में मेरे निशान ढूँढ़ते हैं, और यों ही “उपयुक्त” अंश तलाश लेते हैं, जिन्हें वे अंतहीन रूप से पढ़ते रहते हैं और उनका वाचन पवित्रशास्त्र के रूप में करते हैं। वे नहीं जानते कि मेरे अनुरूप कैसे बनें, न ही वे यह जानते हैं कि मेरे विरुद्ध होने का क्या अर्थ है। वे केवल पवित्रशास्त्रों को आँख मूँदकर पढ़ते रहते हैं। वे एक अज्ञात परमेश्वर को जिसे उन्होंने देखा ही नहीं है और आधारभूत रूप से देख भी नहीं सकते, बाइबल की सीमाओं के भीतर परिसीमित करते हैं, वे फुरसत के समय में बाइबल निकालकर पढ़ते हैं। वे मेरा अस्तित्व मात्र बाइबल के दायरे में ही सीमित मानते हैं, और वे मेरी बराबरी बाइबल से करते हैं; बाइबल के बिना मैं नहीं हूँ, और मेरे बिना बाइबल नहीं है। वे मेरे अस्तित्व या क्रियाकलापों पर कोई ध्यान नहीं देते, बल्कि पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर परम और विशेष ध्यान देते हैं। बहुत-से लोग तो यहाँ तक मानते हैं कि अपनी इच्छा से मुझे ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जो पवित्रशास्त्र द्वारा पहले से न कहा गया हो। वे पवित्रशास्त्र को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। कहा जा सकता है कि वे निरे शब्दों को बहुत महत्त्वपूर्ण समझते हैं, इस हद तक कि हर एक वचन जो मैं बोलता हूँ, वे उसे मापने और मेरी निंदा करने के लिए बाइबल के छंदों का उपयोग करते हैं। वे मेरे साथ अनुरूपता का मार्ग या सत्य के साथ अनुरूपता का मार्ग नहीं खोजते, बल्कि बाइबल के शब्दों के अनुरूप होने का मार्ग खोजते हैं और विश्वास करते हैं कि कोई भी चीज जो बाइबल के अनुसार नहीं है, बिना किसी अपवाद के, मेरा कार्य नहीं है। क्या ऐसे लोग फरीसियों के कर्तव्यपरायण वंशज नहीं हैं? यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। वे उस समय के यीशु के अनुरूप होने का प्रयास नहीं करते थे, बल्कि व्यवस्था के प्रत्येक अनुच्छेद के साथ इतनी गंभीरता से पेश आते थे कि—यीशु पर यह दोष लगाने के बाद कि वह पुराने नियम की व्यवस्था का पालन नहीं करता और मसीहा नहीं है—अंततः उन्होंने निर्दोष यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। उनका सार क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के साथ अनुरूपता के मार्ग की खोज नहीं की? वे केवल पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर ध्यान देते थे, जबकि मेरे इरादों और मेरे कार्य के चरणों और विधियों पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं, बल्कि पवित्रशास्त्र के शब्दों से ढिठाई से चिपकने वाले लोग थे; वे परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग नहीं, बल्कि बाइबल में विश्वास करने वाले लोग थे। अगर बात की तह में जाएँ तो वे बाइबल के ठेकेदार बन बैठे थे। बाइबल के हितों की रक्षा करने, बाइबल की गरिमा बनाए रखने और बाइबल की प्रतिष्ठा बचाने के लिए वे यहाँ तक चले गए कि उन्होंने दयालु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। ऐसा उन्होंने सिर्फ़ बाइबल का बचाव करने के लिए और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक शब्द का रुतबा बनाए रखने के लिए किया। इसलिए उन्होंने अपना भविष्य त्यागना और पापबलि को प्राप्त न करना पसंद किया ताकि पवित्रशास्त्र के नियमों के अनुरूप न होने के कारण यीशु को मृत्यु-दंड दे सकें। क्या वे लोग पवित्रशास्त्र के एक-एक शब्द के दास नहीं थे?
और आज के लोगों के बारे में क्या कहूँ? वे उस मसीह को, जो सत्य को प्रकट करने आया है, इस संसार से निकाल देना ज्यादा पसंद करेंगे, ताकि वे स्वर्ग में प्रवेश हासिल कर सकें और अनुग्रह प्राप्त कर सकें। वे बाइबल के हितों की रक्षा करने के लिए सत्य के आगमन को पूरी तरह से नकारना और बाइबल का चिरस्थायी अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए देह में लौटे मसीह को फिर से सूली पर चढ़ाना पसंद करेंगे। मनुष्य मेरा उद्धार कैसे प्राप्त कर सकता है, जब उसका हृदय इतनी अधिक दुर्भावना से भरा है और उसकी प्रकृति मेरे प्रति इतनी विरोधी है? मैं मनुष्य के मध्य रहता हूँ, फिर भी मनुष्य मेरे अस्तित्व के बारे में नहीं जानता। जब मैं मनुष्य पर अपना प्रकाश डालता हूँ, तब भी वह मेरे अस्तित्व से अनभिज्ञ रहता है। जब मैं मनुष्य पर अपना क्रोध बरसाता हूँ तो वह और भी अधिक मेरे अस्तित्व को नकारता है। मनुष्य शब्दों और बाइबल के साथ अनुरूपता खोजता है, फिर भी कोई भी मेरे सामने सत्य के साथ अनुरूपता का मार्ग खोजने नहीं आता। मैं स्वर्ग में रहूँ तो मनुष्य मेरा आदर करता है और स्वर्ग में मेरे अस्तित्व की विशेष चिंता करता है, लेकिन देह में रहूँ तो कोई मेरी परवाह नहीं करता, क्योंकि मैं जो मनुष्य के बीच रहता हूँ, अत्यंत महत्त्वहीन हूँ। जो लोग सिर्फ बाइबल के शब्दों के अनुरूप होने की खोज करते हैं और जो लोग सिर्फ एक अज्ञात परमेश्वर के अनुरूप होने की खोज करते हैं, वे मेरी दृष्टि में तुच्छ हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे मृत शब्दों की आराधना करते हैं और एक ऐसे परमेश्वर की आराधना करते हैं, जो उन्हें अथाह धन देने में सक्षम है; वे जिस परमेश्वर की पूजा करते हैं, वह ऐसा परमेश्वर है जो स्वयं को मनुष्य की दया पर रख देता है—ऐसा परमेश्वर, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। तो फिर, ऐसे लोग मुझसे क्या प्राप्त कर सकते हैं? मनुष्य की तुच्छता शब्दों से परे है। जो मेरे विरोध में हैं, जो मुझसे असीमित माँगें करते हैं, जिनमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं है, जो मेरे प्रति विद्रोही हैं—वे मेरे अनुरूप कैसे हो सकते हैं?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें मसीह के प्रति अनुरूपता का मार्ग खोजना चाहिए
बाइबल एक इतिहास की पुस्तक है और यदि तुमने अनुग्रह के युग के दौरान पुराने विधान को खाया और पीया होता और यदि तुम अनुग्रह के युग के दौरान पुराने विधान के समय में जो अपेक्षित था, उसे व्यवहार में लाए होते, तो यीशु ने तुम्हें अस्वीकार कर दिया होता और तुम्हारी निंदा की होती; यदि तुमने पुराने विधान को यीशु के कार्य में लागू किया होता, तो तुम एक फरीसी होते। यदि आज तुम पुराने और नए विधान को खाने और पीने के लिए एक-साथ रखोगे और अभ्यास करोगे, तो आज का परमेश्वर तुम्हारी निंदा करेगा; तुम पवित्र आत्मा के आज के कार्य में पिछड़ गए होगे! यदि तुम पुराने विधान और नए विधान को खाते और पीते हो, तो तुम पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हो! यीशु के समय में, यीशु ने अपने भीतर पवित्र आत्मा के कार्य के अनुसार यहूदियों की और उन सबकी अगुआई की थी, जिन्होंने उस समय उसका अनुसरण किया था। उसने जो कुछ किया, उसमें उसने बाइबल को आधार नहीं बनाया, बल्कि वह अपने कार्य के अनुसार बोला; उसने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया कि बाइबल क्या कहती है, और न ही उसने अपने अनुयायियों की अगुआई करने के लिए बाइबल में कोई मार्ग ढूँढ़ा। ठीक अपना कार्य आरंभ करने के समय से ही उसने पश्चात्ताप के मार्ग का प्रचार किया—एक ऐसा शब्द, जिसका पुराने विधान की असंख्य भविष्यवाणियों में बिल्कुल भी उल्लेख नहीं किया गया था। उसने न केवल बाइबल के अनुसार कार्य नहीं किया, बल्कि एक अधिक नए मार्ग की अगुआई भी की और अधिक नया कार्य किया। उपदेश देते समय उसने कभी बाइबल का उल्लेख नहीं किया। व्यवस्था के युग के दौरान, बीमारों को चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने के उसके चमत्कार करने में कभी कोई सक्षम नहीं हो पाया था। इसी तरह उसका कार्य, उसकी शिक्षाएँ, उसके भाषण का अधिकार और सामर्थ्य भी व्यवस्था के युग में किसी भी मनुष्य से परे थी। यीशु ने मात्र अपना अधिक नया काम किया, और भले ही बहुत-से लोगों ने बाइबल का उपयोग करते हुए उसकी निंदा की—और यहाँ तक कि उसे सलीब पर चढ़ाने के लिए पुराने विधान का उपयोग किया—फिर भी उसका कार्य पुराने विधान से आगे निकल गया; यदि ऐसा न होता, तो लोग उसे सलीब पर क्यों चढ़ाते? क्या यह इसलिए नहीं था, क्योंकि पुराने विधान में उसकी शिक्षाओं और बीमारों को चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने की उसकी सामर्थ्य के बारे में कुछ नहीं कहा गया था? उसका कार्य एक अधिक नए मार्ग की अगुआई करने के लिए था, वह जानबूझकर बाइबल के विरुद्ध लड़ाई करने या जानबूझकर पुराने विधान को अनावश्यक बना देने के लिए नहीं था। वह केवल अपनी सेवकाई करने और उन लोगों के लिए नया कार्य लाने के लिए आया था, जो उसके लिए लालायित थे और उसे खोजते थे। वह पुराने विधान की व्याख्या करने या उसके कार्य का समर्थन करने के लिए नहीं आया था। उसका कार्य व्यवस्था के युग को लगातार विकसित होने देने के लिए नहीं था। उसने इस बात पर कोई विचार नहीं किया कि बाइबल उसके कार्य का आधार थी या नहीं, बल्कि वह तो केवल वही कार्य करने के लिए आया था, जो उसे करना ही था; इसलिए, उसने पुराने विधान की भविष्यवाणियों की व्याख्या नहीं की, न ही उसने पुराने विधान के व्यवस्था के युग के वचनों के अनुसार कार्य किया। उसने इस बात को नज़रअंदाज़ किया कि पुराने विधान में क्या कहा गया है, उसने इस बात की परवाह नहीं की कि पुराना विधान उसके कार्य से सहमत है या नहीं, और उसने इस बात की परवाह नहीं की कि लोग उसके कार्य के बारे में क्या जानते हैं या कैसे उसकी निंदा करते हैं। वह बस वह कार्य करता रहा जो उसे करना चाहिए था, भले ही बहुत-से लोगों ने उसकी निंदा करने के लिए पुराने विधान के नबियों के पूर्वकथनों का उपयोग किया। लोगों को ऐसा प्रतीत हुआ, मानो उसके कार्य का कोई आधार नहीं था, और उसमें बहुत-कुछ ऐसा था, जो पुराने विधान के अभिलेखों से मेल नहीं खाता था। क्या यह मनुष्य की भ्रामकता नहीं थी? क्या परमेश्वर को अपने कार्य पर विनियम लागू करने की आवश्यकता है? और क्या परमेश्वर के कार्य का नबियों के पूर्वकथनों के अनुसार होना आवश्यक है? आखिरकार कौन बड़ा है : परमेश्वर या बाइबल? परमेश्वर को बाइबल के अनुसार कार्य करना क्यों आवश्यक है? क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर को बाइबल से आगे निकलने का कोई अधिकार न हो? क्या परमेश्वर बाइबल से दूर नहीं जा सकता और अन्य काम नहीं कर सकता? यीशु और उसके शिष्यों ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया? यदि उसे सब्त के अनुसार और पुराने विधान की आज्ञाओं के अनुसार अभ्यास करना था, तो आने के बाद यीशु ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया, बल्कि इसके बजाय क्यों उसने पाँव धोए, सिर ढका, रोटी तोड़ी और दाखरस पिया? क्या यह सब पुराने विधान की आज्ञाओं में अनुपस्थित नहीं है? यदि यीशु पुराने विधान का पालन करता था, तो उसने इन विनियमों को क्यों तोड़ा? तुम्हें पता होना चाहिए कि पहले कौन आया, परमेश्वर या बाइबल! सब्त का प्रभु होते हुए, क्या वह बाइबल का भी प्रभु नहीं हो सकता?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (1)
नए नियम की सुसमाचार की पुस्तकें यीशु को सूली पर चढ़ाए जाने के बीस से तीस साल बाद लिखी गई थीं। उससे पहले इस्राएल के लोग केवल पुराना नियम ही पढ़ते थे। दूसरे शब्दों में, अनुग्रह के युग की शुरुआत में लोग पुराना नियम ही पढ़ते थे। नया नियम केवल अनुग्रह के युग के दौरान ही प्रकट हुआ। यीशु के काम करने के समय नया नियम मौजूद नहीं था; लोगों ने उसके कार्य को उसके पुनर्जीवित होने और स्वर्गारोहण करने के बाद दर्ज किया। केवल तभी चार सुसमाचार और पौलुस व पतरस के धर्मपत्र और साथ ही प्रकाशितवाक्य की पुस्तक सामने आई। यीशु के स्वर्ग जाने के तीन सौ साल से अधिक समय के बाद आगामी पीढ़ियों ने चुनिंदा रूप से इन दस्तावेजों को उचित क्रम में एकत्र और संयोजित किया, तब जाकर बाइबल का नया नियम अस्तित्व में आया। केवल इस कार्य के पूरा होने के बाद ही नया नियम अस्तित्व में आया था; यह पहले मौजूद नहीं था। परमेश्वर ने वह सब कार्य किया था, और पौलुस और अन्य प्रेरितों ने विभिन्न स्थानों पर स्थित कलीसियाओं को बहुत-से धर्मपत्र लिखे थे। उनके बाद के लोगों ने उनके धर्मपत्रों को संयुक्त किया और पतमुस के द्वीप में यूहन्ना द्वारा देखे गए उसके सबसे बड़े दर्शन का ब्यौरा संलग्न किया, जिसमें अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य के बारे में भविष्यवाणी की गई थी। लोगों ने यह क्रम बनाया था, जो आज के कथनों से अलग है। आज जो दर्ज किया जा रहा है, वह परमेश्वर के कार्य के चरणों के अनुसार है; आज लोग जिसके संपर्क में आते हैं, वह परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाने वाला कार्य और उसके द्वारा व्यक्तिगत रूप से बोले गए वचन हैं। तुम्हें यानी कि मनुष्यजाति को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है; आत्मा से सीधे आने वाले वचनों को कदम-दर-कदम व्यवस्थित किया गया है और यह व्यवस्था लोगों के अभिलेखों की व्यवस्था से अलग है। कहा जा सकता है कि जो कुछ उन्होंने दर्ज किया है, वह उनकी शिक्षा के स्तर और मानवीय काबिलियत के अनुसार था। उन्होंने जो कुछ दर्ज किया, वे मानवीय अनुभव थे और प्रत्येक के पास दर्ज करने का अपना साधन था और उनकी अपनी समझ थी और प्रत्येक अभिलेख अलग था। इसलिए, यदि तुम बाइबल की परमेश्वर के रूप में आराधना करते हो, तो तुम बहुत ही ज़्यादा नासमझ और मूर्ख हो! तुम आज के परमेश्वर के कार्य को क्यों नहीं खोजते हो? केवल परमेश्वर का कार्य ही मनुष्य को बचा सकता है। बाइबल मनुष्य को नहीं बचा सकती, लोग हज़ारों सालों तक इसे पढ़ते रह सकते हैं और फिर भी उनमें ज़रा-सा भी परिवर्तन नहीं होगा, और यदि तुम बाइबल की आराधना करते हो, तो तुम्हें पवित्र आत्मा का कार्य कभी प्राप्त नहीं होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (3)
बाइबल की इस वास्तविकता को कोई नहीं जानता कि यह परमेश्वर के कार्य के ऐतिहासिक अभिलेख और उसके कार्य के पिछले दो चरणों की गवाही से बढ़कर और कुछ नहीं है, और इससे तुम्हें परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की कोई समझ हासिल नहीं होती। बाइबल पढ़ने वाला हर व्यक्ति जानता है कि इसमें व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के दो चरणों को दर्ज किया गया है। पुराना नियम सृष्टि के समय से लेकर व्यवस्था के युग के अंत तक इस्राएल के इतिहास और यहोवा के कार्य करने के तरीके को लिपिबद्ध करता है। पृथ्वी पर यीशु का कार्य, जो चार सुसमाचारों में है और पौलुस का कार्य नए नियम में दर्ज हैं; क्या ये ऐतिहासिक अभिलेख नहीं हैं? अतीत की चीज़ों को आज सामने लाना उन्हें इतिहास बना देता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी सच्ची और यथार्थ हैं, वे हैं तो इतिहास ही—और इतिहास वर्तमान को संबोधित नहीं कर सकता, क्योंकि परमेश्वर पीछे मुड़कर इतिहास नहीं देखता! तो यदि तुम केवल बाइबल को समझते हो और परमेश्वर आज जो कार्य करना चाहता है, उसके बारे में कुछ नहीं समझते और यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, किन्तु पवित्र आत्मा के कार्य की खोज नहीं करते, तो तुम्हें पता ही नहीं कि परमेश्वर को खोजने का क्या अर्थ है। यदि तुम इस्राएल के इतिहास का अध्ययन करने के लिए और परमेश्वर द्वारा समस्त स्वर्गों और पृथ्वी की सृष्टि के इतिहास पर शोध करने के लिए बाइबल पढ़ते हो, तो तुम परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते। किन्तु आज, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो और चूँकि तुम जीवन का अनुसरण करते हो, परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करते हो और मृत शब्दों और धर्म-सिद्धांतों या इतिहास की समझ का अनुसरण नहीं करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के वर्तमान इरादे खोजने चाहिए और पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा की तलाश करनी चाहिए। यदि तुम पुरातत्ववेत्ता होते तो तुम बाइबल पढ़ सकते थे—लेकिन तुम नहीं हो, तुम उनमें से एक हो जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं और अच्छा होगा कि तुम परमेश्वर के वर्तमान इरादों की खोज करो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (4)
आज मैं इस तरह से बाइबल का गहन-विश्लेषण कर रहा हूँ, लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि मैं इससे नफरत करता हूँ या संदर्भ के लिए इसके महत्व को नकारता हूँ। मैं तुम्हें बाइबल के अंतर्निहित मूल्य और इसकी उत्पत्ति के बारे में समझा रहा हूँ और इसे स्पष्ट कर रहा हूँ, ताकि तुम हमेशा अंधकार में न रहो। ऐसा इसलिए है क्योंकि बाइबल के बारे में लोगों के इतने अधिक विचार हैं और उनमें से अधिकांश गलत हैं; इस तरह बाइबल पढ़ना न केवल उन्हें वह प्राप्त करने से रोकता है जो उन्हें प्राप्त करना ही चाहिए, बल्कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह उस कार्य में भी बाधा डालता है जिसे मैं करना चाहता हूँ; यह भविष्य के कार्य में अत्यधिक गड़बड़ी पैदा करता है और इसमें दोष ही दोष हैं, लाभ तो कोई है ही नहीं। इस प्रकार, मैं तुम्हें बस बाइबल के सार और बाइबल के पीछे की असली कहानी समझने के लिए कह रहा हूँ। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि तुम बाइबल मत पढ़ो या तुम सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा करते फिरो कि यह मूल्यविहीन है, बल्कि मैं सिर्फ यह चाहता हूँ कि तुम्हारे पास बाइबल का सही ज्ञान और दृष्टिकोण हो। तुम्हारी दृष्टि एकतरफा न हो! यद्यपि बाइबल इतिहास की पुस्तक है जो मनुष्य के द्वारा लिखी गई थी, लेकिन इसमें कई ऐसे सिद्धांत भी लिपिबद्ध हैं जिनके अनुसार प्राचीन संत और नबी परमेश्वर की सेवा करते थे और साथ ही इसमें परमेश्वर की सेवा करने के अपेक्षाकृत हाल के दिनों के प्रेरितों के अनुभव भी दर्ज हैं—यह सब इन लोगों की वास्तविक अंतर्दृष्टि और ज्ञान था और यह सच्चे मार्ग का अनुसरण करने में इस युग के लोगों के लिए संदर्भ का काम कर सकता है। इस प्रकार, बाइबल को पढ़ने से लोग जीवन के अनेक मार्ग भी प्राप्त कर सकते हैं जो अन्य पुस्तकों में नहीं मिल सकते। ये मार्ग पवित्र आत्मा के कार्य के जीवन के मार्ग हैं जिनका अनुभव नबियों और प्रेरितों ने बीते युगों में किया था, बहुत से वचन काफी अनमोल हैं, जो लोगों की आवश्यकताओं के हिसाब से आपूर्ति कर सकते हैं। इस प्रकार, सभी लोग बाइबल पढ़ना पसंद करते हैं। क्योंकि बाइबल में इतना कुछ छिपा है, इसके प्रति लोगों के विचार महान आध्यात्मिक हस्तियों के किसी लेखन के प्रति उनके विचारों से भिन्न हैं। बाइबल पुराने और नए युग में यहोवा और यीशु की सेवा करने वाले लोगों के अनुभवों और ज्ञान का अभिलेख एवं संकलन है, और इसलिए बाद की पीढ़ियाँ इससे अत्यधिक प्रबुद्धता, रोशनी और अभ्यास करने के मार्ग प्राप्त करने में सक्षम रही हैं। बाइबल किसी भी महान आध्यात्मिक हस्ती के लेखन से उच्चतर है, तो उसका कारण यह है कि उनका समस्त लेखन बाइबल से ही लिया गया है, उनके समस्त अनुभव बाइबल से ही आए हैं और वे सभी बाइबल की व्याख्याएँ हैं। इसलिए, यद्यपि लोग किसी भी महान आध्यात्मिक हस्ती की पुस्तकों से पोषण प्राप्त कर सकते हैं, फिर भी वे बाइबल की ही आराधना करते हैं, क्योंकि यह उन्हें ऊँची और गहन प्रतीत होती है! यद्यपि बाइबल में पौलुस के धर्मपत्र और पतरस के धर्मपत्र जैसी जीवन के वचनों की कुछ पुस्तकों को एक साथ लाया गया है; यद्यपि ये पुस्तकें लोगों को पोषण और सहायता प्रदान कर सकती हैं, किन्तु फिर भी ये पुस्तकें अप्रचलित हैं और पुराने युग की हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी अच्छी हैं, वे केवल एक कालखंड के लिए ही उपयुक्त हैं, चिरस्थायी नहीं हैं। क्योंकि परमेश्वर का कार्य निरन्तर विकसित हो रहा है, यह केवल पौलुस और पतरस के समय पर ही नहीं रुक सकता, यानी यह हमेशा अनुग्रह के युग में ही बना नहीं रह सकता जिसमें यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया था। अतः, ये पुस्तकें केवल अनुग्रह के युग के लिए उपयुक्त हैं, अंत के दिनों के राज्य के युग के लिए नहीं। ये केवल अनुग्रह के युग के विश्वासियों को पोषण प्रदान कर सकती हैं, राज्य के युग के संतों को नहीं, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी अच्छी हैं, वे अब भी अप्रचलित ही हैं। यहोवा के सृष्टि के कार्य या इस्राएल के उसके कार्य के साथ भी ऐसा ही है : इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह कार्य कितना बड़ा था, यह अब भी अप्रचलित हो जाएगा, और वह समय अब भी आएगा जब यह व्यतीत हो जाएगा। परमेश्वर का कार्य भी ऐसा ही है : चाहे यह कितना भी महान हो, किन्तु एक समय आएगा जब यह समाप्त हो जाएगा; यह न तो सृष्टि के कार्य के बीच और न ही सलीब पर चढ़ाने के कार्य के बीच हमेशा बना रह सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सलीब पर चढ़ाने का कार्य कितना विश्वास दिलाने वाला था या शैतान को पराजित करने में यह कितना कारगर था, कार्य आख़िर कार्य ही है, और युग आख़िर युग ही हैं; कार्य हमेशा उसी नींव पर टिका नहीं रह सकता, न ही ऐसा हो सकता है कि समय कभी न बदले, क्योंकि सृष्टि थी और अंत के दिन भी अवश्य होंगे। यह अवश्यम्भावी है! इस प्रकार, आज नया नियम—प्रेरितों के धर्मपत्र और चार सुसमाचार—में जीवन के वचन इतिहास की पुस्तकें बन गए हैं, वे पुराने पंचांग बन गए हैं, और पुराने पंचांग लोगों को नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? चाहे ये पंचांग लोगों को जीवन प्रदान करने में कितने भी समर्थ हों, वे सलीब तक लोगों की अगुआई करने में कितने भी सक्षम हों, क्या वे पुराने नहीं हो गए हैं? क्या वे मूल्य से वंचित नहीं हैं? इसलिए, मैं कहता हूँ कि तुम्हें आँख बंद करके इन पंचांगों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। ये अत्यधिक पुराने हैं, ये तुम्हें नए कार्य में नहीं पहुँचा सकते, ये केवल तुम्हारे ऊपर बोझ लाद सकते हैं। केवल यही नहीं कि ये तुम्हें नए कार्य में और नए प्रवेश में नहीं ले जा सकते, बल्कि ये तुम्हें पुरानी धार्मिक कलीसियाओं में ले जाते हैं—और यदि ऐसा हो, तो क्या तुम परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में पीछे नहीं लौट रहे हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (4)
बाइबल कई हजार साल से मानव इतिहास का हिस्सा रही है। इतना ही नहीं, लोग इसे परमेश्वर की तरह मानते हैं, इस हद तक कि अंत के दिनों में वे इसका इस्तेमाल परमेश्वर की जगह लेने के लिए करते हैं, जिससे परमेश्वर अत्यंत घृणा करता है। इस प्रकार परमेश्वर ने अपने फुर्सत के समय में बाइबल के पीछे की वास्तविक कहानी और इसकी उत्पत्ति को स्पष्ट करना अनिवार्य समझा। अगर वह ऐसा न करता तो बाइबल लोगों के दिलों में परमेश्वर का स्थान लेना कायम रखती, और लोग परमेश्वर के कर्मों को मापने और दोषी ठहराने के लिए बाइबल के वचनों का इस्तेमाल करते रहते। बाइबल के सार, उसकी संरचना और उसकी कमियों की व्याख्या करके परमेश्वर किसी भी तरह से न तो बाइबल के अस्तित्व को नकार रहा था, न ही वह उसकी निंदा कर रहा था; बल्कि वह एक उपयुक्त और उचित व्याख्या प्रदान कर रहा था, जिससे बाइबल की मौलिक छवि बहाल हो, बाइबल के प्रति लोगों की भ्रांतिपूर्ण समझ दूर हो और सबको बाइबल का सही दृष्टिकोण मिले, ताकि वे अब बाइबल की आराधना न करें और अब भ्रमित न हों; जिसका तात्पर्य है कि, ताकि वे बाइबल में अपने अंधविश्वास को परमेश्वर में विश्वास और परमेश्वर की आराधना मानने की गलती न करें, इसकी असली पृष्ठभूमि और दोषों का सामना करने से भी भयभीत न हों। एक बार लोगों में बाइबल की विशुद्ध समझ पैदा हो जाए, तो वे बेहिचक इसे दरकिनार कर देंगे और परमेश्वर के नए वचनों को हिम्मत के साथ स्वीकार करेंगे। इन कुछ अध्यायों में परमेश्वर का यही लक्ष्य है। यहाँ परमेश्वर लोगों को जो सत्य बताना चाहता है वह यह है कि कोई भी सिद्धांत या तथ्य परमेश्वर के मौजूदा कार्य और वचनों की जगह नहीं ले सकता है और परमेश्वर का स्थान कोई चीज नहीं ले सकती है। अगर लोग बाइबल के फंदे से नहीं निकल सके, तो वे परमेश्वर के सामने कभी नहीं आ पाएँगे। अगर वे परमेश्वर के सामने आना चाहते हैं, तो उन्हें अपने दिल से हर वो चीज़ साफ करनी होगी, जो परमेश्वर की जगह ले सकती हो; तभी वे परमेश्वर के लिए संतोषजनक होंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कलीसियाओं के बीच जाकर बोले गए मसीह के वचन, परिचय