5. बाइबल परमेश्वर के कार्य की गवाही है। यह बाइबल के माध्यम से है कि वे सब जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, इसे स्वीकार करते हैं कि आकाश और पृथ्वी और सभी चीज़ें परमेश्वर द्वारा बनाई गईं थीं। यह बाइबल के कारण है कि वे परमेश्वर के कार्यों के आश्चर्य, महानता और सर्वशक्तिमानता को देखते हैं। इसके अतिरिक्त, बाइबल में परमेश्वर के कई वचन हैं और मनुष्य की अनुभवात्मक गवाहियाँ हैं जो मनुष्य के जीवन के लिए प्रावधान प्रदान करने में सक्षम हैं, और मनुष्य के लिए बहुत अधिक शिक्षाप्रद हैं। क्या हम बाइबल को पढ़ने से अनंत जीवन पा सकते हैं? या क्या बाइबल में अनंत जीवन का मार्ग नहीं है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते” (यूहन्ना 5:39-40)।
“मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता” (यूहन्ना 14:6)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
बाइबल को पढ़ने से लोग जीवन के अनेक मार्ग भी प्राप्त कर सकते हैं जो अन्य पुस्तकों में नहीं मिल सकते। ये मार्ग पवित्र आत्मा के कार्य के जीवन के मार्ग हैं जिनका अनुभव नबियों और प्रेरितों ने बीते युगों में किया था, बहुत से वचन काफी अनमोल हैं, जो लोगों की आवश्यकताओं के हिसाब से आपूर्ति कर सकते हैं। इस प्रकार, सभी लोग बाइबल पढ़ना पसंद करते हैं। क्योंकि बाइबल में इतना कुछ छिपा है, इसके प्रति लोगों के विचार महान आध्यात्मिक हस्तियों के किसी लेखन के प्रति उनके विचारों से भिन्न हैं। बाइबल पुराने और नए युग में यहोवा और यीशु की सेवा करने वाले लोगों के अनुभवों और ज्ञान का अभिलेख एवं संकलन है, और इसलिए बाद की पीढ़ियाँ इससे अत्यधिक प्रबुद्धता, रोशनी और अभ्यास करने के मार्ग प्राप्त करने में सक्षम रही हैं। बाइबल किसी भी महान आध्यात्मिक हस्ती के लेखन से उच्चतर है, तो उसका कारण यह है कि उनका समस्त लेखन बाइबल से ही लिया गया है, उनके समस्त अनुभव बाइबल से ही आए हैं और वे सभी बाइबल की व्याख्याएँ हैं। इसलिए, यद्यपि लोग किसी भी महान आध्यात्मिक हस्ती की पुस्तकों से पोषण प्राप्त कर सकते हैं, फिर भी वे बाइबल की ही आराधना करते हैं, क्योंकि यह उन्हें ऊँची और गहन प्रतीत होती है! यद्यपि बाइबल में पौलुस के धर्मपत्र और पतरस के धर्मपत्र जैसी जीवन के वचनों की कुछ पुस्तकों को एक साथ लाया गया है; यद्यपि ये पुस्तकें लोगों को पोषण और सहायता प्रदान कर सकती हैं, किन्तु फिर भी ये पुस्तकें अप्रचलित हैं और पुराने युग की हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी अच्छी हैं, वे केवल एक कालखंड के लिए ही उपयुक्त हैं, चिरस्थायी नहीं हैं। क्योंकि परमेश्वर का कार्य निरन्तर विकसित हो रहा है, यह केवल पौलुस और पतरस के समय पर ही नहीं रुक सकता, यानी यह हमेशा अनुग्रह के युग में ही बना नहीं रह सकता जिसमें यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया था। अतः, ये पुस्तकें केवल अनुग्रह के युग के लिए उपयुक्त हैं, अंत के दिनों के राज्य के युग के लिए नहीं। ये केवल अनुग्रह के युग के विश्वासियों को पोषण प्रदान कर सकती हैं, राज्य के युग के संतों को नहीं, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी अच्छी हैं, वे अब भी अप्रचलित ही हैं। यहोवा के सृष्टि के कार्य या इस्राएल के उसके कार्य के साथ भी ऐसा ही है : इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह कार्य कितना बड़ा था, यह अब भी अप्रचलित हो जाएगा, और वह समय अब भी आएगा जब यह व्यतीत हो जाएगा। परमेश्वर का कार्य भी ऐसा ही है : चाहे यह कितना भी महान हो, किन्तु एक समय आएगा जब यह समाप्त हो जाएगा; यह न तो सृष्टि के कार्य के बीच और न ही सलीब पर चढ़ाने के कार्य के बीच हमेशा बना रह सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सलीब पर चढ़ाने का कार्य कितना विश्वास दिलाने वाला था या शैतान को पराजित करने में यह कितना कारगर था, कार्य आख़िर कार्य ही है, और युग आख़िर युग ही हैं; कार्य हमेशा उसी नींव पर टिका नहीं रह सकता, न ही ऐसा हो सकता है कि समय कभी न बदले, क्योंकि सृष्टि थी और अंत के दिन भी अवश्य होंगे। यह अवश्यम्भावी है! इस प्रकार, आज नया नियम—प्रेरितों के धर्मपत्र और चार सुसमाचार—में जीवन के वचन इतिहास की पुस्तकें बन गए हैं, वे पुराने पंचांग बन गए हैं, और पुराने पंचांग लोगों को नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? चाहे ये पंचांग लोगों को जीवन प्रदान करने में कितने भी समर्थ हों, वे सलीब तक लोगों की अगुआई करने में कितने भी सक्षम हों, क्या वे पुराने नहीं हो गए हैं? क्या वे मूल्य से वंचित नहीं हैं? इसलिए, मैं कहता हूँ कि तुम्हें आँख बंद करके इन पंचांगों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। ये अत्यधिक पुराने हैं, ये तुम्हें नए कार्य में नहीं पहुँचा सकते, ये केवल तुम्हारे ऊपर बोझ लाद सकते हैं। केवल यही नहीं कि ये तुम्हें नए कार्य में और नए प्रवेश में नहीं ले जा सकते, बल्कि ये तुम्हें पुरानी धार्मिक कलीसियाओं में ले जाते हैं—और यदि ऐसा हो, तो क्या तुम परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में पीछे नहीं लौट रहे हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (4)
बहुत से लोग मानते हैं कि बाइबल को समझना और उसकी व्याख्या कर पाना सच्चे मार्ग को पाने के समान है—परन्तु वास्तव में, क्या बात इतनी सरल है? बाइबल की इस वास्तविकता को कोई नहीं जानता कि यह परमेश्वर के कार्य के ऐतिहासिक अभिलेख और उसके कार्य के पिछले दो चरणों की गवाही से बढ़कर और कुछ नहीं है, और इससे तुम्हें परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की कोई समझ हासिल नहीं होती। बाइबल पढ़ने वाला हर व्यक्ति जानता है कि इसमें व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के दो चरणों को दर्ज किया गया है। पुराना नियम सृष्टि के समय से लेकर व्यवस्था के युग के अंत तक इस्राएल के इतिहास और यहोवा के कार्य करने के तरीके को लिपिबद्ध करता है। पृथ्वी पर यीशु का कार्य, जो चार सुसमाचारों में है और पौलुस का कार्य नए नियम में दर्ज हैं; क्या ये ऐतिहासिक अभिलेख नहीं हैं? अतीत की चीज़ों को आज सामने लाना उन्हें इतिहास बना देता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी सच्ची और यथार्थ हैं, वे हैं तो इतिहास ही—और इतिहास वर्तमान को संबोधित नहीं कर सकता, क्योंकि परमेश्वर पीछे मुड़कर इतिहास नहीं देखता! तो यदि तुम केवल बाइबल को समझते हो और परमेश्वर आज जो कार्य करना चाहता है, उसके बारे में कुछ नहीं समझते और यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, किन्तु पवित्र आत्मा के कार्य की खोज नहीं करते, तो तुम्हें पता ही नहीं कि परमेश्वर को खोजने का क्या अर्थ है। यदि तुम इस्राएल के इतिहास का अध्ययन करने के लिए और परमेश्वर द्वारा समस्त स्वर्गों और पृथ्वी की सृष्टि के इतिहास पर शोध करने के लिए बाइबल पढ़ते हो, तो तुम परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते। किन्तु आज, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो और चूँकि तुम जीवन का अनुसरण करते हो, परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करते हो और मृत शब्दों और धर्म-सिद्धांतों या इतिहास की समझ का अनुसरण नहीं करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के वर्तमान इरादे खोजने चाहिए और पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा की तलाश करनी चाहिए। यदि तुम पुरातत्ववेत्ता होते तो तुम बाइबल पढ़ सकते थे—लेकिन तुम नहीं हो, तुम उनमें से एक हो जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं और अच्छा होगा कि तुम परमेश्वर के वर्तमान इरादों की खोज करो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (4)
शायद अब तुम जीवन प्राप्त करना चाहते हो या शायद तुम सत्य प्राप्त करना चाहते हो। जो भी हो, तुम परमेश्वर को खोजना चाहते हो, उस परमेश्वर को खोजना चाहते हो जिस पर तुम निर्भर रह सको, और जो तुम्हें अनंत जीवन प्रदान कर सके। यदि तुम अनंत जीवन प्राप्त करना चाहते हो, तो तुम्हें पहले अनंत जीवन के स्रोत को समझना चाहिए और पहले यह जानना चाहिए कि परमेश्वर ठीक कहाँ है। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि केवल परमेश्वर ही स्थिर जीवन है, और केवल परमेश्वर के पास ही जीवन का मार्ग है। चूँकि परमेश्वर स्थिर जीवन है, इसलिए वह अनंत जीवन है; चूँकि केवल परमेश्वर ही जीवन का मार्ग है, इसलिए स्वयं परमेश्वर ही अनंत जीवन का मार्ग है। अतः सबसे पहले तुम्हें यह समझना चाहिए कि परमेश्वर कहाँ है, और अनंत जीवन का यह मार्ग कैसे प्राप्त करें। अब हम इन दोनों विषयों पर अलग-अलग संगति करते हैं।
यदि तुम सचमुच अनंत जीवन का मार्ग प्राप्त करना चाहते हो, और यदि तुम उसे खोजने के लिए आतुर हो, तो पहले इस प्रश्न का उत्तर दो : आज परमेश्वर कहाँ है? शायद तुम उत्तर दो, “निस्संदेह, परमेश्वर स्वर्ग में रहता है—वह तुम्हारे घर में तो रहेगा नहीं, है न?” शायद तुम कह सकते हो कि परमेश्वर स्पष्टतः सारी चीजों में रहता है। या तुम कह सकते हो कि परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में रहता है, या परमेश्वर आध्यात्मिक क्षेत्र में है। मैं इनमें से किसी से भी इनकार नहीं करता, परंतु मुझे मुद्दा स्पष्ट कर देना चाहिए। यह कहना पूरी तरह सही नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य के हृदय में रहता है, किंतु यह पूरी तरह गलत भी नहीं है। इसका कारण यह है कि परमेश्वर के विश्वासियों में ऐसे लोग भी हैं जिनका विश्वास सच्चा है, और ऐसे लोग भी हैं जिनका विश्वास झूठा है, ऐसे लोग भी हैं जिन्हें परमेश्वर स्वीकृति देता है और ऐसे लोग भी हैं जिन्हें परमेश्वर स्वीकृति नहीं देता, ऐसे लोग भी हैं जो उसके लिए मनभावन होते हैं और ऐसे लोग भी हैं जिनसे वह घृणा करता है, और ऐसे लोग भी हैं जिन्हें वह पूर्ण बनाता है और ऐसे लोग भी हैं जिन्हें वह हटा देता है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि परमेश्वर बस कुछ ही लोगों के हृदय में रहता है, और ये लोग निस्संदेह वे हैं जो परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं, जिन्हें परमेश्वर स्वीकृति देता है, जो उसके लिए मनभावन होते हैं, और जिन्हें वह पूर्ण बनाता है। ये वे लोग हैं, जिनकी परमेश्वर द्वारा अगुआई की जाती है। चूँकि उनकी परमेश्वर द्वारा अगुआई की जाती है, इसलिए ये वे लोग हैं जो परमेश्वर का अनंत जीवन का मार्ग पहले ही सुन और देख चुके हैं। जिनका परमेश्वर में विश्वास झूठा है, जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं हैं, जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, जो परमेश्वर द्वारा हटा दिए जाते हैं—उन्हें परमेश्वर द्वारा अस्वीकृत किया जाना तय है, उनका जीवन के मार्ग से विहीन रहना तय है, और उनका इस बात से अनभिज्ञ रहना तय है कि परमेश्वर कहाँ है। इसके विपरीत, जिनके हृदय में परमेश्वर रहता है, वे जानते हैं कि वह कहाँ है। ये ही वे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर अनंत जीवन का मार्ग प्रदान करता है, और ये ही परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। अब क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर कहाँ है? परमेश्वर मनुष्य के हृदय में भी है और मनुष्य की बगल में भी है। वह न केवल आध्यात्मिक क्षेत्र में है, और सभी चीजों के ऊपर है, बल्कि उस पृथ्वी पर तो वह और भी अधिक है जिस पर मनुष्य रहता है। और इसलिए अंत के दिनों का आगमन परमेश्वर के कार्य के कदमों को नए क्षेत्र में ले आया है। परमेश्वर सभी चीजों में है, वह सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है, वह मनुष्य के सहारे के रूप में काम करते हुए मनुष्य के हृदय में भी है और इससे भी अधिक, वह मनुष्यों के बीच विद्यमान है। केवल इसी तरह से वह मनुष्य-जाति के लिए जीवन का मार्ग ला सकता है, और मनुष्य को जीवन के मार्ग में ला सकता है। परमेश्वर पृथ्वी पर आया है और मनुष्यों के बीच रहता है, ताकि मनुष्य जीवन का मार्ग प्राप्त कर सके और मनुष्य के अस्तित्व की खातिर भी। साथ ही, वह सभी चीजों में है, हर चीज को आदेश भी देता है, ताकि मनुष्य के बीच वह जो प्रबंधन करता है उसे सुगम बनाया जा सके। और इसलिए, यदि तुम केवल इस सिद्धांत को स्वीकार करते हो कि परमेश्वर स्वर्ग में है और मनुष्य के हृदय में है, किंतु मनुष्यों के बीच परमेश्वर के अस्तित्व के सत्य को स्वीकार नहीं करते, तो तुम कभी जीवन प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी सत्य का मार्ग प्राप्त करोगे।
स्वयं परमेश्वर ही जीवन और सत्य है और उसका जीवन और सत्य सह-अस्तित्व में हैं। जो लोग सत्य प्राप्त करने में असमर्थ हैं, वे निश्चित ही जीवन प्राप्त नहीं करेंगे। सत्य के मार्गदर्शन, सहारे और पोषण के बिना तुम जो कुछ भी प्राप्त करते हो वह केवल शब्द, धर्म-सिद्धांत और इससे भी अधिक मृत्यु है। परमेश्वर का जीवन सदा विद्यमान है, और उसका सत्य और जीवन साथ-साथ सह-अस्तित्व में हैं। यदि तुम सत्य का स्रोत नहीं पा सकते हो तो तुम जीवन का पोषण प्राप्त नहीं करोगे; यदि तुम जीवन का पोषण प्राप्त नहीं कर सकते हो तो तुम्हारे पास निश्चित ही कोई सत्य नहीं होगा, और कल्पनाओं और धारणाओं के अलावा तुम्हारे संपूर्ण अस्तित्व में तुम्हारी देह—तुम्हारी दुर्गंधित देह—के सिवाय कुछ भी नहीं होगा। यह जान लो कि महज किताबों के शब्द जीवन नहीं हो सकते हैं, इतिहास के अभिलेखों को सत्य के रूप में पूजित नहीं किया जा सकता और अतीत के विनियम परमेश्वर के वर्तमान वचनों का लेखा-जोखा नहीं हो सकते हैं, और परमेश्वर पृथ्वी पर आकर मनुष्य के बीच रहकर जो वचन अभिव्यक्त करता है केवल वही सत्य हैं, जीवन हैं, परमेश्वर के इरादे हैं और उसके कार्य करने का वर्तमान तरीका हैं। यदि तुम अतीत के युगों के दौरान परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों के अभिलेखों को लेते हो और आज उनका पालन करते हो तो यह तुम्हें पुरातत्ववेत्ता बना देता है, ऐसे में तुम्हें ऐतिहासिक धरोहरों के शोध का विशेषज्ञ कहना ही सबसे उपयुक्त होगा। तुम हमेशा परमेश्वर द्वारा विगत युगों में किए गए कार्य के चिह्नों पर विश्वास करते हो, तुम केवल पूर्व में मनुष्यों के बीच कार्य करते समय छोड़ी गई परमेश्वर की परछाई में विश्वास करते हो और केवल पिछले युगों में परमेश्वर द्वारा अपने अनुयायियों को बताए गए मार्ग में विश्वास करते हो, लेकिन तुम परमेश्वर के आज के कार्य की दिशा पर विश्वास नहीं करते, परमेश्वर के आज के महिमामय मुखमंडल में विश्वास नहीं करते और परमेश्वर द्वारा वर्तमान में व्यक्त किए जा रहे सत्य के मार्ग पर विश्वास नहीं करते। इसलिए तुम निर्विवाद रूप से एक दिवास्वप्नदर्शी हो जो पूरी तरह वास्तविकता से दूर है। यदि तुम अब भी उन शब्दों से चिपके रहते हो जो मनुष्य को जीने देने में समर्थ बनाने में अक्षम हैं तो तुम एक लाइलाज सड़ी-गली लकड़ी हो, क्योंकि तुम अत्यंत रूढ़िवादी, अत्यंत हठी, अत्यंत विवेकहीन हो!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है
अंत के दिनों का मसीह जीवन लाता है, और सत्य का स्थायी और शाश्वत मार्ग लाता है। यह सत्य वह मार्ग है, जिसके द्वारा मनुष्य जीवन प्राप्त करता है, और यही एकमात्र मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जाएगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह द्वारा प्रदान किया गया जीवन का मार्ग नहीं खोजते, तो तुम यीशु की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं करोगे, और स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश करने के योग्य कभी नहीं हो पाओगे, क्योंकि तुम इतिहास की कठपुतली और कैदी दोनों ही हो। जो लोग विनियमों से, शब्दों से और इतिहास की बेड़ियों से नियंत्रित होते हैं, वे न तो कभी जीवन प्राप्त कर पाएँगे और न ही जीवन का अनंत मार्ग प्राप्त कर पाएँगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे जो प्राप्त करते हैं वह सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन के जल के बजाय बस मैला पानी ही है, जिससे वे हजारों सालों से चिपके हुए हैं। जिन्हें जीवन के जल की आपूर्ति नहीं की जाती, वे हमेशा मुर्दे, शैतान के खिलौने और नरक की संतानें बने रहेंगे। फिर वे कैसे परमेश्वर के दर्शन कर सकते हैं? तुम केवल अतीत को पकड़े रखने की खोज में रहते हो, स्थिर खड़े रहने और चीजों को वैसे ही रखने की कोशिश करते हो और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को छोड़ने की खोज में नहीं रहते, इसलिए क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोधी नहीं होगे? परमेश्वर के कार्य के कदम उमड़ती लहरों और घुमड़ते गर्जनों की तरह जबरदस्त और शक्तिशाली हैं—फिर भी तुम निष्क्रियता से बैठकर तबाही का इंतजार करते हो, उससे चिपके रहते हो जो पुराना है और चीजों के अपनी गोद में आ गिरने की प्रतीक्षा करते हो। इस तरह, तुम्हें मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाला व्यक्ति कैसे माना जा सकता है? यह कैसे दिखा सकता है कि तुम जिस परमेश्वर को थामे हो, वह वही परमेश्वर है जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? और तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताबों के शब्द तुम्हें पार कराकर नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे परमेश्वर के कार्य के चरणों को खोजने में तुम्हारी अगुआई कैसे कर सकते हैं? और वे तुम्हें ऊपर स्वर्ग में कैसे ले जा सकते हैं? जिन्हें तुम अपने हाथों में थामे हो, वे केवल शब्द हैं, जो तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना दे सकते हैं, वे तुम्हें जीवन देने में सक्षम सत्य नहीं हैं। धर्मशास्त्र के शब्द जिन्हें तुम पढ़ते हो, वे केवल तुम्हारी जिह्वा को समृद्ध कर सकते हैं; वे बुद्धिमानी के शब्द नहीं हैं जो मानव जीवन को जानने में तुम्हारी मदद कर सकते हों, उनके तुम्हें पूर्णता की ओर ले जाने वाला मार्ग होने की बात तो दूर रही। क्या यह विसंगति तुम्हारे लिए चिंतन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें इसके भीतर समाहित रहस्यों के बारे में अंतर्दृष्टि नहीं देती है? क्या तुम अपने बल पर परमेश्वर से मिलने के लिए अपने आप को स्वर्ग भिजवाने में समर्थ हो? परमेश्वर के आए बिना, क्या तुम परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनंद मनाने के लिए अपने आप को स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? तो मेरा उपदेश यह है कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है—देखो कि अब अंत के दिनों में मनुष्य को बचाने का कार्य कौन कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी जीवन प्राप्त करोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है