2. प्रेरित पौलुस ने कहा, “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्‍वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है” (2 तीमुथियुस 4:7-8)। हमने कई वर्षों से प्रभु पर विश्वास किया है, और हर समय, हमने इस राह पर चलने और प्रभु के लिए काम करने में पौलुस का अनुकरण किया है। हमने सुसमाचार का प्रसार और कलीसियाओं का निर्माण किया है, और हम प्रभु के नाम और प्रभु के मार्ग के प्रति एकनिष्ठ रहे हैं। कोई संदेह नहीं है कि धार्मिकता का ताज़ हमारे लिए तैयार रखा जाएगा। जब तक हम प्रभु के लिए अपने प्रयास में परिश्रमी हैं और प्रभु की वापसी की प्रतीक्षा करने में सजग हैं, हमारा स्वर्ग के राज्य में सीधे ही स्वर्गारोहण किया जाएगा। क्या आप यह कह रहे हैं कि हम जो अभ्यास करते हैं उसमें कोई त्रुटि है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु!’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा, बल्कि वह करेगा जो मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा के अनुसार चलता है। उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?’ तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, ‘मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ’” (मत्ती 7:21-23)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

भले ही कोई व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास रखना शुरू करने के बाद से बड़ी संख्या में अच्छे व्यवहारों में संलग्न रहा हो, फिर भी वह कई चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता है, सत्य की समझ पा लेना तो दूर की बात है। फिर भी अपने कई अच्छे व्यवहारों के कारण उसे लगता है कि वह पहले से ही सत्य का अभ्यास कर रहा है, पहले ही परमेश्वर के प्रति समर्पण कर चुका है और पहले ही उसके इरादों को पूरा कर चुका है। जब तुम्हारे साथ कुछ भी घटित नहीं होता है, तो तुमसे जो कुछ कहा जाता है तुम वह सब करने में सक्षम होते हो और तुम बिना किसी संकोच और बिना किसी प्रतिरोध के अपना कर्तव्य करते हो। जब तुमसे सुसमाचार प्रचार करने के लिए कहा जाता है, तो तुम शिकायत नहीं करते और इस कठिनाई को सहन कर सकते हो और जब तुमसे दौड़-भाग करके कार्य करने या कोई खास काम पूरा करने को कहा जाता है, तो तुम वैसा करते हो। इस वजह से तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हो और सचमुच सत्य का अनुसरण करते हो। फिर भी अगर तुम्हारी गंभीरता से जाँच की जाए और पूछा जाए, “क्या तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है? ऐसे व्यक्ति हो जिसका स्वभाव बदल चुका है?”—अगर हर व्यक्ति को परमेश्वर के वचनों के सत्य की कसौटी पर तौला जाए—तो कहा जा सकता है कि मानक के अनुरूप कोई नहीं है, और सत्य सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करने में कोई सक्षम नहीं है। इसलिए सारी भ्रष्ट मानवजाति को आत्म-चिंतन करना चाहिए। मनुष्यों को उन स्वभावों पर चिंतन करना चाहिए जिनके अनुसार वे जीते हैं, शैतान के उन फलसफों, तर्कों, झूठों और भ्रांतियों पर चिंतन करना चाहिए जो उनके सारे व्यवहारों और कर्मों का आधार बनते हैं। उन्हें इसके मूल कारण पर चिंतन करना चाहिए कि वे अपने भ्रष्ट स्वभाव क्यों प्रकट करते हैं, उनके मनमाने ढंग से कार्य करने का सार क्या है, और वे किस लिए और किसके लिए जीते हैं। अगर इसे सत्य की कसौटी पर कसा जाए तो फिर सभी लोगों को निंदा झेलनी पड़ेगी। इसका कारण क्या है? इसका कारण यही है कि मानवजाति बहुत भ्रष्ट है। लोग सत्य को नहीं समझते, और वे सब के सब अपने भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार जीते हैं। उन्हें रत्तीभर भी आत्म-ज्ञान नहीं है, वे हमेशा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, अपनी प्राथमिकताओं और तौर-तरीकों के आधार पर कर्तव्य निभाते हैं, और परमेश्वर की सेवा करने के तरीके में धार्मिक सिद्धांतों का अनुकरण करते हैं। इतना ही नहीं, वे अभी भी मानते हैं कि वे आत्मविश्वास से भरे हैं, उनके कार्य बहुत ही उचित हैं, और अंत में उन्हें लगता है कि वे बहुत कुछ हासिल कर चुके हैं। इसका एहसास किए बिना ही वे सोचने लगते हैं कि वे पहले ही परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य कर रहे हैं और इन्हें बखूबी पूरे कर चुके हैं, कि वे पहले ही परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी कर चुके हैं और उसकी इच्छा के अनुसार चल रहे हैं। अगर तुम्हें ऐसा लगता है या अगर तुम सोचते हो कि परमेश्वर में कई वर्षों के विश्वास के दौरान तुम कुछ लाभ हासिल कर चुके हो, तो फिर तुम्हें ध्यानपूर्वक अपनी जाँच करने के लिए परमेश्वर के सामने और भी ज्यादा आना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर में विश्वास के इन वर्षों के दौरान अपनी यात्रा को देखना चाहिए और देखना चाहिए कि क्या तुम्हारे कार्य और कर्म सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हैं और साथ ही तुम्हारी कौन-सी अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर के विरोध में हैं, कौन-सी परमेश्वर के प्रति समर्पण में हैं, कौन-सी परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करती हैं, कौन-सी परमेश्वर की गवाही देने वाली हैं और किन क्षेत्रों में तुम परमेश्वर के ऋणी हो। तुम्हें इन सभी चीजों के बारे में स्पष्ट होना चाहिए—केवल तभी यह माना जा सकता है कि तुममें आत्म-जागरूकता है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है

परमेश्वर का अनुसरण करने वाले बहुत सारे लोग केवल इस बात से मतलब रखते हैं कि आशीष कैसे प्राप्त किए जाएँ या आपदा को कैसे टाला जाए। जैसे ही परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन का उल्लेख किया जाता है, वे चुप हो जाते हैं और सारी रुचि खो देते हैं। उन्हें लगता है कि इस प्रकार के उबाऊ मुद्दों को समझने से उनके जीवन की प्रगति में कोई मदद नहीं मिलेगी और न ही कोई लाभ प्राप्त होगा। परिणामस्वरूप, भले ही उन्होंने परमेश्वर के प्रबंधन के बारे में जानकारी सुनी हो, वे इसके साथ अगंभीर तरीके से पेश आते हैं। वे इसे स्वीकारने योग्य कोई खजाना नहीं मानते, न ही इसे समझने के लिए अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में इन लोगों का प्रयोजन बहुत सरल होता है और यह एक ही लक्ष्य के लिए होता है : आशीषित होना। ये लोग ऐसी किसी भी दूसरी चीज के लिए पूर्णतया उदासीन रहते हैं जो इस उद्देश्य से संबंध नहीं रखती। उनके लिए, परमेश्वर में विश्वास करने का सबसे वैध लक्ष्य आशीष प्राप्त करना है—यह उनकी आस्था का असली मूल्य है। यदि कोई चीज इस प्रयोजन को पूरा नहीं करती, तो चाहे जो भी हो वे उससे अप्रभावित रहते हैं। आज परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश लोगों का यही हाल है। उनका प्रयोजन और इरादा न्यायोचित प्रतीत होते हैं, क्योंकि जब वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते भी हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पित भी होते हैं और अपना कर्तव्य भी निभाते हैं। वे अपनी जवानी न्योछावर कर देते हैं, परिवार और आजीविका त्याग देते हैं, यहाँ तक कि दौड़-धूप करने के लिए वर्षों अपने घर से दूर बिताते हैं। अपने परम प्रयोजन के लिए वे अपनी रुचियाँ बदल डालते हैं, अपने जीवन का दृष्टिकोण बदल देते हैं, यहाँ तक कि अपने अनुसरण की दिशा तक बदल देते हैं, किंतु परमेश्वर पर अपने विश्वास करने के प्रयोजन को नहीं बदल सकते। वे अपनी आकांक्षाओं के प्रबंधन के लिए दौड़-धूप करते हैं; चाहे मार्ग कितना भी दूर क्यों न हो, और मार्ग में कितनी भी कठिनाइयाँ, खतरे और अवरोध क्यों न आएँ, वे दृढ़ रहते हैं और मृत्यु से नहीं डरते। इस तरह से अपने आप को समर्पित रखने के लिए उन्हें कौन-सी ताकत बाध्य करती है? क्या यह उनकी अंतरात्मा है? क्या यह उनका महान और कुलीन चरित्र है? क्या यह बुराई की शक्तियों से बिल्कुल अंत तक लड़ने का उनका दृढ़ संकल्प है? क्या यह प्रतिफल की आकांक्षा के बिना परमेश्वर के लिए गवाही देने की जो आस्था उनके पास है, वह है? क्या यह परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए सब कुछ बेहिचक त्याग देने की उनकी लगन है? या यह विलासितापूर्ण व्यक्तिगत माँगें हमेशा त्यागने की उनकी समर्पित भावना है? ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए, जिसने कभी परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य को नहीं समझा, उसका इतना सारा हृदय का रक्त खपाने में सक्षम होना एक बहुत बड़ा चमत्कार है! फिलहाल, आओ इसकी चर्चा न करें कि इन लोगों ने कितना कुछ दिया है। किंतु उनका व्यवहार हमारे गहन-विश्लेषण के बहुत योग्य है। उनके साथ इतनी निकटता से जुड़े उन लाभों के अतिरिक्त, परमेश्वर को कभी नहीं समझने वाले लोगों द्वारा उसके लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाने का क्या कोई अन्य कारण हो सकता है? यहाँ हमें एक ऐसी समस्या का पता चलता है जिसे मनुष्य पहले पता नहीं लगा सका है : परमेश्वर के साथ मनुष्य का संबंध केवल नग्न स्वार्थ पर आधारित है। यह आशीष लेने वाले और देने वाले के मध्य का संबंध है। स्पष्ट रूप से कहें तो यह एक कर्मचारी और एक नियोक्ता के मध्य का संबंध है। कर्मचारी केवल नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले प्रतिफल प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करता है। इस प्रकार के स्वार्थ आधारित संबंध में कोई आत्मीय स्नेह नहीं होता, केवल लेन-देन होता है। प्रेम करने या प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होती है। कोई समझ नहीं होती, केवल असहाय दबा हुआ आक्रोश और धोखा होता है। कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक अगम खाई होती है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है

मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्यों को आंकते हैं वह उनके व्यवहार पर आधारित होता है; जिनका व्यवहार अच्छा है वे धार्मिक हैं और जिनका व्यवहार घृणित है वे बुरे हैं। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्यों का न्याय करता है उसका आधार यह है कि क्या उनका सार परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है कि नहीं; जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है वह धार्मिक है और जो नहीं करता है वह शत्रु है और बुरा व्यक्ति है, फिर चाहे इस व्यक्ति का व्यवहार अच्छा हो या खराब और चाहे इस व्यक्ति की वाणी सही हो या गलत। कुछ लोग अच्छे कर्मों का उपयोग भविष्य में अच्छी मंज़िल प्राप्त करने के लिए करना चाहते हैं और कुछ लोग अच्छी वाणी का उपयोग एक अच्छी मंजिल हासिल करने में करना चाहते हैं। हर कोई यह गलत विश्वास करता है कि परमेश्वर लोगों के परिणाम उनके व्यवहार या वाणी के आधार पर निर्धारित करता है; इसलिए बहुत-से लोग अपने लिए क्षणिक अनुग्रह हथियाने के लिए इसका फायदा उठाना चाहते हैं। जो लोग आने वाले विश्राम के समय में जीवित बचेंगे उन सभी ने पीड़ा के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये सब वे लोग होंगे जिन्होंने अपने कर्तव्य अच्छे ढंग से निभा लिए होंगे और जिन्होंने सोच-समझकर परमेश्वर के प्रति समर्पण किया हुआ होगा। जो केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने के इरादे से सिर्फ सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं वे नहीं रहेंगे। प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम की व्यवस्था के लिए परमेश्वर के पास उचित मानक हैं; वह केवल यूँ ही किसी के शब्दों या आचरण के अनुसार ये निर्णय नहीं लेता, न ही वह एक अवधि के दौरान किसी के व्यवहार के अनुसार निर्णय लेता है। अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गई किसी सेवा की वजह से वह किसी के बुरे कर्मों के प्रति नर्मी कतई नहीं बरतेगा, न ही वह परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाने की थोड़ी-सी अवधि के कारण किसी को मृत्यु से बचाएगा। कोई भी अपनी बुराई के प्रतिफल से नहीं बच सकता है, न ही कोई अपने बुरे कर्मों को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि लोग वास्तव में अपने कर्तव्य अच्छे ढंग से निभा सकते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे अनंतकाल तक परमेश्वर के प्रति वफादार हैं और प्रतिफल की खोज नहीं करते हैं, फिर चाहे वे आशीष प्राप्त करें या दुख सहें। यदि लोग आशीष दिखाई देने पर परमेश्वर के लिए वफादार रहते हैं और आशीष न दिखाई देने पर अपनी वफादारी खो देते हैं और अगर ये लोग—जिन्होंने कभी परमेश्वर के लिए वफादारी से श्रम किया था—अंत में परमेश्वर की गवाही देने या अपने जिम्मे आए कर्तव्य अच्छे से निभाने में असमर्थ हैं तो ऐसे लोग अभी भी विनाश के पात्र होंगे। संक्षेप में, बुरे लोग हमेशा तक जीवित नहीं रह सकते, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग विश्राम के स्वामी होंगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे

कल्पना करो कि तुम परमेश्वर के लिए कार्य कर पाते हो, किंतु तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते हो और तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम नहीं कर सकते हो। इस ढंग से, तुमने न केवल सृजित प्राणी के अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया होगा, बल्कि तुम परमेश्वर द्वारा दोषी भी ठहराए जाओगे, क्योंकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास सत्य नहीं है, जो परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर सकता है और जो परमेश्वर से विद्रोह करता है। तुम परमेश्वर के लिए कार्य करने की ही परवाह करते हो, सत्य को अभ्यास में लाने या स्वयं को जानने की नहीं; तुम सृष्टिकर्ता को समझते या जानते नहीं हो, तुम सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पण या उससे प्रेम नहीं करते हो और तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के प्रति स्वाभाविक रूप से विद्रोही है। इन्हीं कारणों से ऐसे लोग सृष्टिकर्ता द्वारा पसंद नहीं किए जाते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है

लोग कहते हैं, “परमेश्वर एक धार्मिक परमेश्वर है। अगर मनुष्य अंत तक उसका अनुसरण करता रहे, तो वह निश्चित रूप से मनुष्य के प्रति निष्पक्ष होगा, क्योंकि वह सबसे धार्मिक है। यदि मनुष्य अंत तक उसका अनुसरण करता रहे, तो क्या वह मनुष्य को दरकिनार कर सकता है?” मैं सभी लोगों के प्रति निष्पक्ष हूँ और सभी लोगों का न्याय अपने धार्मिक स्वभाव से करता हूँ, फिर भी मैं लोगों से जो अपेक्षाएँ रखता हूँ उन सबमें उचित शर्तें शामिल होती हैं, और मैं जो अपेक्षा करता हूँ वह सभी लोगों के लिए पूरा करना जरूरी है, चाहे वे कोई भी हों। मैं इसकी परवाह नहीं करता कि तुम कितने वरिष्ठ हो या कितने अनुभवी हो; मैं सिर्फ इसकी परवाह करता हूँ कि तुम मेरे मार्ग का अनुसरण कर रहे हो या नहीं, सत्य के लिए तुममें प्रेम और प्यास है या नहीं। यदि तुममें सत्य की कमी है, और इसकी बजाय तुम मेरे नाम का अनादर करते हो, और मेरे मार्ग के अनुसार क्रिया-कलाप नहीं करते हो, कोई परवाह या चिंता किए बगैर सिर्फ अनुसरण मात्र कर रहे हो, तो मैं उस समय तुम पर प्रहार करूँगा और तुम्हारी बुराई के लिए तुम्हें दंड दूँगा, तब तुम्हारे पास कहने के लिए क्या होगा? क्या तुम यह कह पाओगे कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? यदि तुमने आज मेरे द्वारा बोले गए सभी वचनों का पालन किया है, तो तुम एक ऐसे इंसान हो जिसे मैं स्वीकृति देता हूँ। तुम कहते हो कि तुमने परमेश्वर का अनुसरण करते हुए हमेशा पीड़ा सही है, कि तुमने तूफानों के बीच उसका अनुसरण किया है और उसके साथ अच्छा और बुरा समय बिताया है, लेकिन तुमने परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों को नहीं जिया है; तुम हर दिन सिर्फ परमेश्वर के लिए भाग-दौड़ करना और उसके लिए स्वयं को खपाना चाहते हो, तुमने कभी भी एक अर्थपूर्ण जीवन जीने के बारे में नहीं सोचा है। तुम यह भी कहते हो, “चाहे जो हो, मैं मानता हूँ कि परमेश्वर धार्मिक है। मैं उसके लिए पीड़ा सहता हूँ, उसके लिए भाग-दौड़ करता हूँ और अपने आपको उसे समर्पित करता हूँ, और भले ही मेरे पास कोई उपलब्धियाँ न हो, फिर भी मैंने कठिनाई सही है; वह निश्चित ही मुझे याद रखेगा।” यह सच है कि परमेश्वर धार्मिक है, फिर भी इस धार्मिकता पर किसी अशुद्धता का दाग नहीं है : इसमें कोई मानवीय इच्छा नहीं है, और यह देह या मानवीय लेन-देनों से दूषित नहीं है। जो लोग विद्रोही हैं और विरोध में हैं, जो उसके मार्ग का पालन नहीं करते हैं, उन सबको दंडित किया जाएगा; न तो किसी को क्षमा किया जाएगा, न ही किसी को बख्शा जाएगा! कुछ लोग कहते हैं, “आज मैं तुम्हारे लिए भाग-दौड़ करता हूँ; अंत में क्या तुम मुझे थोड़ा-सा आशीष दे सकते हो?” इसलिए मैं तुमसे पूछता हूँ, “क्या तुमने मेरे वचनों का पालन किया है?” तुम जिस धार्मिकता की बात करते हो, वह एक लेन-देन पर आधारित है। तुम केवल यह सोचते हो कि मैं धार्मिक हूँ, कि मैं सब लोगों के प्रति निष्पक्ष हूँ, और जो बिल्कुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे वे सब निश्चित रूप से बचा लिए जाएँगे और मेरे आशीष प्राप्त करेंगे। “जो बिल्कुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे वे सब निश्चित रूप से बचा लिए जाएँगे,” मेरे इन वचनों का एक आंतरिक अर्थ है : जो लोग बिल्कुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे वे ऐसे लोग होंगे जिन्हें मेरे द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया जाएगा, वे ऐसे लोग हैं जो मेरे द्वारा जीते जाने के बाद, सत्य खोजते हैं और जिन्हें पूर्ण बनाया जाता है। तुम कितनी अपेक्षाएँ पूरी कर चुके हो? तुमने केवल अंत तक मेरा अनुसरण करने की अपेक्षा पूरी की है, लेकिन और क्या? क्या तुमने मेरे वचनों का पालन किया है? तुमने मेरी पाँच अपेक्षाओं में से एक को पूरा किया है, लेकिन बाकी चार को पूरा करने का तुम्हारा कोई इरादा नहीं है। तुमने बस सबसे सरल और आसान रास्ता ढूँढ़ लिया है और भाग्यशाली होने की उम्मीद के रवैये के साथ अनुसरण किया है। तुम्हारे जैसे इंसान के लिए मेरे धार्मिक स्वभाव का अर्थ सिर्फ ताड़ना और न्याय और धार्मिक प्रतिफल है; इसका अर्थ है बुरा काम करने वाले सभी लोगों के लिए धार्मिक दंड। जो लोग मेरे मार्ग का अनुसरण नहीं करते हैं उन सबको निश्चित ही दंड दिया जाएगा, भले ही वे बिल्कुल अंत तक अनुसरण करते रहें। यह परमेश्वर की धार्मिकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान

मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंजिल उसकी आयु, वरिष्ठता और उसके द्वारा सही गई पीड़ा की मात्रा के आधार पर निर्धारित नहीं करता और इस आधार पर तो और भी नहीं कि वह कितना दयनीय है, बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि उसके पास सत्य है या नहीं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि जो लोग परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते, वे सब निरपवाद रूप से दंडित किए जाएँगे। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे कोई व्यक्ति नहीं बदल सकता। इसलिए जो लोग दंडित किए जाते हैं, वे सब इस तरह परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और अपने अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में दंडित किए जाते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो

तुम्हें जानना ही चाहिए कि मैं किस प्रकार के लोगों को चाहता हूँ; वे जो गंदे हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, वे जो गंदे हैं उन्हें पवित्र भूमि को अपवित्र करने की अनुमति नहीं है। तुमने भले ही बहुत कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, किंतु अंत में तुम अब भी बुरी तरह मैले हो और यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय है कि तुम मेरे राज्य में प्रवेश करना चाहते हो! संसार की रचना से लेकर आज तक, मैंने अपने राज्य में उन्हें कभी ऐसा आसान प्रवेश नहीं दिया जो मेरी चापलूसी करते हैं। यह स्वर्गिक नियम है, और कोई इसे तोड़ नहीं सकता है! तुम्हें जीवन का अनुसरण करना ही चाहिए। आज, जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा वे उसी प्रकार के हैं जैसा पतरस था : ये वे लोग हैं जो स्वयं अपने स्वभाव में बदलाव लाने का अनुसरण करते हैं और जो परमेश्वर के लिए गवाही देने और सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार रहते हैं। केवल ऐसे लोगों को ही पूर्ण बनाया जाएगा। यदि तुम केवल पुरस्कारों की प्रत्याशा करते हो और स्वयं अपने जीवन स्वभाव को बदलने का अनुसरण नहीं करते, तो तुम्हारे सारे प्रयास व्यर्थ होंगे—यह अटल सत्य है!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है

पिछला: 1. आप कहते हैं कि हमें अंतिम दिनों के परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि केवल तभी हमारे भ्रष्ट शैतानी स्वभावों को शुद्ध और परिवर्तित किया जाएगा, और उसके बाद ही हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करेंगे। इसलिए, जैसा कि परमेश्वर द्वारा अपेक्षित है, हम विनम्र और सहनशील हैं, हम अपने शत्रुओं से प्रेम करते हैं, हम अपने क्रूस को सहन करते हैं, हम अपने शरीर को अनुशासित करते हैं, हम सांसारिक चीज़ों को त्यागते हैं, हम काम करते हैं और प्रभु के लिए प्रचार करते हैं, इत्यादि। क्या ये सभी वो परिवर्तन नहीं जो हमारे अंदर हुए हैं? क्या आप कह रहे हैं कि स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए यह फिर भी पर्याप्त नहीं है? मेरा मानना है कि जब तक हम इस तरह से प्रयास करते रहेंगे, हम पवित्र होने लगेंगे और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे।

अगला: 3. प्रभु यीशु ने कहा था, “जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु!’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा, बल्कि वह करेगा जो मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा के अनुसार चलता है। उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?’ तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, ‘मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ’(मत्ती 7:21-23)। जो लोग “हे प्रभु, हे प्रभु” कहते हैं, वे सभी परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उसकी सेवा करते हैं। उन्होंने हमेशा त्याग किया है, खुद को खपाया है और प्रभु के लिए कड़ी मेहनत की है, और उन्होंने सुसमाचार का प्रचार और कलीसियाओं का निर्माण किया है। यह सब करके क्या उन्होंने प्रभु की इच्छा का पालन नहीं किया है? जब प्रभु यीशु वापस आता है, तो वे प्रभु द्वारा सराहे क्यों नहीं जाएँगे, और क्यों इसके बजाय उन्हें बुराई करने वालों के रूप में निंदित किया जाएगा?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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