3. यदि हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंतिम दिनों के कार्य को स्वीकार करते हैं, तो हमें अनंत जीवन का मार्ग हासिल करने के लिए क्या करना चाहिए?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों का गहन-विश्लेषण करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर के प्रति समर्पण किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता जीनी चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभावों पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य परमेश्वर को कैसे अस्वीकार करता है, और भी अधिक इस तथ्य को उजागर करने पर केंद्रित हैं कि मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध एक विरोधी शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर कुछ वचनों में मनुष्य की प्रकृति को पूरी तरह नहीं समझाता है; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर और काट-छाँट करने की इन विभिन्न विधियों को साधारण वचनों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; बल्कि उजागर और काट-छाँट करने के इस कार्य को करने में उस सत्य का उपयोग किया जाता है जो मनुष्य के पास बिल्कुल भी नहीं होता है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य की समझ पैदा करने का काम करता है। न्याय के कार्य ने मनुष्य को परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों के बारे में काफी समझ प्राप्त करने में सक्षम बनाया है जो उसकी समझ से परे होते हैं। इसने मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार और अपनी भ्रष्टता की जड़ को समझने और जानने, साथ ही अपने कुरूप चेहरे का पता लगाने में सक्षम बनाया है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन को उन सभी के लिए उद्घाटित करने का कार्य है जो उसमें आस्था रखते हैं। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है। अगर तुम इन सत्यों को महत्वपूर्ण नहीं समझते, अगर तुम हमेशा उनसे बचने की कोशिश करते हो या उनके बाहर कोई नया रास्ता खोजने की कोशिश करते हो, तो मैं कहूँगा कि तुम घोर पापी हो। अगर तुम्हारा परमेश्वर में विश्वास है, फिर भी तुम सत्य को नहीं खोजते या परमेश्वर के इरादों को नहीं खोजते, न ही उस वचन से प्यार करते हो, जो तुम्हें परमेश्वर के निकट लाता है, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो न्याय से बचने की कोशिश कर रहा है, और यह कि तुम एक कठपुतली और ग़द्दार हो, जो महान श्वेत सिंहासन से भागता है। परमेश्वर ऐसे किसी भी विद्रोही को नहीं छोड़ेगा, जो उसकी आँखों के नीचे से बचकर भागता है। ऐसे मनुष्य और भी अधिक कठोर दंड पाएँगे। जो लोग परमेश्वर का न्याय प्राप्त करने के लिए उसके सम्मुख आते हैं और इसके अलावा शुद्ध किए जा चुके हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर के राज्य में रहेंगे। बेशक, यह कुछ ऐसा है, जो भविष्य से संबंधित है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है
आज की विजय का कार्य उस सम्पूर्ण गवाही और उस सम्पूर्ण महिमा को पुनः प्राप्त करने और सभी लोगों से परमेश्वर की आराधना करवाने के लिए है, ताकि सृजित प्राणियों के बीच गवाही हो; कार्य के इस चरण के दौरान यही किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्यजाति किस प्रकार जीती जानी है? मनुष्य को सम्पूर्ण रीति से कायल करने के लिए इस चरण के वचनों के कार्य का प्रयोग करके; उसे पूरी तरह यकीन दिलाने के लिए प्रकाशन, न्याय, ताड़ना और निर्मम शाप का प्रयोग करके; मनुष्य के विद्रोहीपन को उजागर करके और उसके विरोध का न्याय करके, ताकि वह मानवजाति की अधार्मिकता और मलिनता को जान सके और इस तरह इनका प्रयोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की विषमता के रूप में कर सके। मुख्यतः, मनुष्य को इन्हीं वचनों से जीता और पूर्णतः कायल किया जाता है। वचन मनुष्यजाति पर अंतिम रूप से विजय करने के साधन हैं और वे सभी जो परमेश्वर की विजय को स्वीकार करते हैं, उन्हें उसके वचनों के प्रहार और न्याय को भी स्वीकार करना चाहिए। बोलने की वर्तमान प्रक्रिया, जीतने की ही प्रक्रिया है। और लोगों को किस प्रकार सहयोग देना चाहिए? यह जानकर कि इन वचनों को कैसे खाना-पीना है और उनकी समझ हासिल करके। जहाँ तक यह बात है कि लोगों पर विजय कैसे पाई जाती है, इसे इंसान खुद नहीं कर सकता। तुम सिर्फ इतना कर सकते हो कि इन वचनों को खाने और पीने के द्वारा, अपनी भ्रष्टता और अशुद्धता, अपने विद्रोहीपन और अपनी अधार्मिकता को जानकर, परमेश्वर के समक्ष दण्डवत हो सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के इरादों को समझने के बाद अभ्यास कर लेते हो और अगर तुम्हारे पास दर्शन हों, और इन वचनों के प्रति पूरी तरह से समर्पित हो सकते हो, और अपने मन से कोई चुनाव नहीं करते हो, तब तुम जीत लिए जाओगे और यह उन वचनों का नतीजा रहा होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (1)
परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन बाहरी तौर पर देखने में चाहे सरल हों या गहन, वे सब ऐसे सत्य हैं जो मनुष्य के जीवन प्रवेश के लिए अपरिहार्य हैं; वे जीवनदायी जल के ऐसे स्रोत हैं जो मनुष्य को आत्मा और देह दोनों में जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्य को जीवित रहने के लिए जरूरी चीजें मुहैया कराते हैं; जैसे कि उसके दैनिक जीवन में स्व-आचरण के नियम और सिद्धांत; उद्धार पाने का अनिवार्य मार्ग और साथ ही उद्धार पाने के लिए लक्ष्य और दिशा; हर वह सत्य जो उसमें परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के रूप में होना चाहिए; और हर वह सत्य कि मनुष्य परमेश्वर के प्रति कैसे समर्पण करे और कैसे उसकी आराधना करे। वे मनुष्य के जीवित बने रहने की गारंटी हैं, वे मनुष्य की दैनिक रोटी हैं और वे ऐसा मजबूत सहारा भी हैं जो मनुष्य को सशक्त होने और अडिग रहने में सक्षम बनाता है। परमेश्वर के वचन उस सत्य वास्तविकता से संपन्न हैं, जिससे सृजित मानवजाति सामान्य मानवता को जीती है, वे उस सत्य से समृद्ध हैं, जिससे मानवता भ्रष्टता से मुक्त होती है और शैतान के फंदे से निकलती है, वे उस गंभीर और धैर्यपूर्ण शिक्षा, प्रोत्साहन, उत्साहवर्धन और सांत्वना से संपन्न हैं, जो सृष्टिकर्ता सृजित मानवता को देता है। वे ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं जो मनुष्य को सभी सकारात्मक चीजों को समझने का मार्गदर्शन और प्रबोधन देते हैं; वे यह सुनिश्चित करने की गारंटी हैं कि मनुष्य वह सब जिएगा और हासिल करेगा जो न्यायसंगत, सुंदर और अच्छा है, वे ऐसे मापदंड हैं जिनसे सभी लोगों, घटनाओं और चीजों को मापा जाता है और वे मार्गदर्शक चिह्न भी हैं जो मनुष्य को उद्धार की तरफ और रोशनी के मार्ग पर ले जाते हैं। केवल परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों में ही मनुष्य को सत्य और जीवन की आपूर्ति की जा सकती है; केवल इनसे ही मनुष्य की समझ में आ सकता है कि सामान्य मानवता क्या है, सार्थक जीवन क्या है, वास्तविक सृजित प्राणी क्या है, परमेश्वर के प्रति वास्तविक समर्पण क्या है; केवल इनसे ही मनुष्य को समझ में आ सकता है कि उसे परमेश्वर की परवाह किस तरह करनी चाहिए, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य कैसे निभाना चाहिए और एक वास्तविक मनुष्य की समानता कैसे प्राप्त करनी चाहिए; केवल इनसे ही मनुष्य को समझ में आ सकता है कि सच्ची आस्था और सच्ची आराधना क्या है; केवल इनसे ही मनुष्य समझ पाता है कि स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों का संप्रभु कौन है; केवल इनसे ही मनुष्य समझ सकता है कि समस्त सृष्टि का संप्रभु किन तरीकों से सृष्टि पर शासन कर उसकी अगुआई और उसका पोषण करता है; और केवल इनसे ही मनुष्य उन साधनों को समझ-बूझ सकता है जिनसे समस्त सृष्टि के संप्रभु का वजूद है, जिनसे वह स्वयं को अभिव्यक्त और कार्य करता है। परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों से अलग मनुष्य के पास परमेश्वर के वचनों और सत्य का कोई वास्तविक ज्ञान या अंतदृष्टि नहीं होती। ऐसा व्यक्ति पूरी तरह से एक ज़िंदा लाश, पूरा घोंघा होता है, और सृष्टिकर्ता से संबंधित किसी भी ज्ञान का उससे कोई वास्ता नहीं होता। परमेश्वर की दृष्टि में, ऐसे व्यक्ति ने कभी उस पर विश्वास नहीं किया है, न कभी उसका अनुसरण किया है, और इसलिए परमेश्वर न तो उसे अपना विश्वासी मानता है और न ही अपना अनुयायी, एक सच्चा सृजित प्राणी मानना तो दूर की बात रही।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, प्रस्तावना
जीवन का अनुसरण करने में, तुम्हें दो बातों पर जरूर ध्यान देना चाहिए : पहली, परमेश्वर के वचनों के भीतर के सत्य को समझना; दूसरी, परमेश्वर के वचनों के भीतर स्वयं को समझना। ये दो बातें सबसे बुनियादी हैं। परमेश्वर के वचनों के बाहर कोई जीवन या सत्य नहीं है। अगर तुम परमेश्वर के वचन के भीतर सत्य नहीं खोजते हो, तो फिर तुम उसे खोजने कहाँ जा सकते हो? दुनिया में सत्य कहाँ है? क्या दुनिया भर के अखबार और मीडिया परमेश्वर के वचनों की रिपोर्ट करते हैं? क्या दुनिया भर के राजनीतिक दल परमेश्वर की गवाही देते हैं? क्या दुनिया के किसी भी देश में खुले तौर पर परमेश्वर के वचनों का प्रसार करना साध्य कार्य है? बिल्कुल नहीं। यही वजह है कि दुनिया में कोई सत्य नहीं है, संसार में बस राक्षस, शैतान का राज है, और इसी वजह से दुनिया अँधेरी और बुरी है। ऐसी कौन-सी जगह है, जहाँ लेशमात्र भी सत्य मौजूद है? परमेश्वर के वचनों में सत्य समझने का सबसे महत्वपूर्ण भाग है : परमेश्वर को उसके ही वचनों के भीतर समझना, उसके वचनों के भीतर मानव जीवन को समझना, अपनी सच्ची समझ होना और उसके वचनों के भीतर मानव के अस्तित्व का अर्थ खोजना, और सत्य के अन्य पहलुओं को जानना। समस्त सत्य परमेश्वर के वचनों के भीतर ही है। तुम सत्य में तब तक प्रवेश नहीं कर सकते जब तक कि परमेश्वर के वचनों के जरिए प्रवेश न किया जाए। केवल परमेश्वर के वचनों का अनुभव करके और उनका अभ्यास करके ही तुम सत्य की समझ प्राप्त कर सकते हो, और सही मायनों में सत्य समझने का अर्थ है परमेश्वर के वचनों को समझना। यह सबसे बुनियादी बात है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति स्वभाव में बदलाव ला सकता है
परमेश्वर के वचनों के भीतर वे सत्य हैं जो लोगों के पास होने चाहिए, वे चीजें हैं जो लोगों के लिए सबसे अधिक लाभदायक और सहायक हैं। वे ऐसे टॉनिक और पोषण हैं जिनकी तुम लोगों के शरीर को आवश्यकता है, वे ऐसी चीजें हैं जो लोगों को अपनी सामान्य मानवता बहाल करने में मदद करती हैं और वे ऐसे सत्य हैं जिनसे लोगों को लैस होना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के वचनों का जितना अधिक अभ्यास करोगे, तुम लोगों का जीवन उतनी ही तेजी से विकसित होगा; तुम लोग परमेश्वर के वचनों का जितना अधिक अभ्यास करोगे, सत्य तुम लोगों के लिए उतना ही स्पष्ट होता जाएगा। जैसे-जैसे तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, तुम लोग आध्यात्मिक क्षेत्र की चीजों को अधिक स्पष्ट रूप से देखोगे और तुम लोगों के पास शैतान पर विजय पाने के लिए अधिक शक्ति होगी। बहुत-सा सत्य जो तुम लोग नहीं समझते हो, वह तब स्पष्ट हो जाएगा जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करोगे। अधिकांश लोग केवल परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक पहलू को समझने से संतुष्ट हो जाते हैं और अनुभव करने और अभ्यास में गहराई तक जाने के बजाय स्वयं को धर्म-सिद्धांतों से लैस करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं—क्या यह फरीसियों का तरीका नहीं है? क्या कोई ऐसा करके “परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में रखना” वाक्यांश की वास्तविकता प्राप्त कर सकता है? लोगों का जीवन केवल परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने से ही विकसित हो सकता है; यह केवल उन्हें पढ़ने से विकसित नहीं होता। यदि तुम मानते हो कि जब तक तुम परमेश्वर के वचनों को समझते हो तब तक तुम्हारे पास जीवन और आध्यात्मिक कद होगा, तो तुम्हारी समझ दोषपूर्ण है। परमेश्वर के वचनों को वास्तव में समझना तब प्राप्त होता है जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो; तुम्हें यह समझना चाहिए कि “केवल सत्य का अभ्यास करके ही इसे कभी भी समझा जा सकता है।” आज, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, तुम केवल यह कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के वचनों से अवगत हो, लेकिन तुम यह नहीं कह सकते कि तुम उन्हें समझते हो। कुछ लोग कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति को सत्य का अभ्यास करने से पहले सत्य को समझना चाहिए, लेकिन यह बात आंशिक रूप से ही सही है, यह पूरी तरह से सही नहीं है। इससे पहले कि तुम्हें किसी निश्चित सत्य का ज्ञान हो, वह तब होता है जब तुमने उस सत्य का अनुभव नहीं किया होता है। किसी धर्मोपदेश में इसके बारे में सुनकर यह महसूस करना कि तुम उस सत्य को समझते हो, वास्तव में इसे समझना नहीं है—यह केवल उस सत्य के शाब्दिक पहलू पर अधिकार करना है, उसमें निहित सच्चे अर्थ को समझे बिना। सत्य की केवल सतही परत को जानने का अर्थ यह नहीं है कि तुम वास्तव में सत्य को समझते हो या तुम्हें इसका ज्ञान है; सत्य का सच्चा अर्थ इसका अनुभव करने से आता है। इसलिए, केवल सत्य का अनुभव करने पर ही तुम इसे समझ सकते हो, और केवल अनुभव के माध्यम से ही तुम इसके छिपे हुए हिस्सों को समझ सकते हो। सत्य के संकेतार्थों को समझने और सत्य के सार को समझने के लिए तुम्हारा अपने अनुभव को गहरा करना ही एकमात्र तरीका है। इसलिए, केवल जब तुम्हारे पास सत्य होता है तभी तुम दुनिया भर में स्वतंत्र रूप से घूमने में सक्षम होते हो। यदि तुम्हारे पास सत्य नहीं है, तो बहुत से धार्मिक लोगों को अपनी बात मनवाने की तो बात ही छोड़ दो—यहाँ तक कि तुम्हारे परिवार के सदस्य भी तुम्हारी बात नहीं मानेंगे। सत्य के बिना तुम एक उड़ते हुए हिमकण की तरह हो, लेकिन सत्य के साथ तुम प्रसन्न और मुक्त रह सकते हो और कोई तुम पर आक्रमण नहीं कर सकता। कोई सिद्धांत कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह सत्य को परास्त नहीं कर सकता। सत्य के साथ, तुम स्वर्ग और पृथ्वी को उलट-पुलट कर सकते हो और पहाड़ों और समुद्रों को हिला सकते हो; सत्य के बिना, भुनगे भी तुम्हारे शहर को भेद सकते हैं। यह एक स्पष्ट तथ्य है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए
सटीक रूप से, अपने विश्वास में पतरस के मार्ग को अपनाने का अर्थ है, सत्य को खोजने के मार्ग पर चलना, जो वास्तव में स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने का मार्ग भी है। केवल पतरस के मार्ग पर चलने के द्वारा ही कोई परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर होगा। किसी को भी इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तव में कैसे पतरस के मार्ग पर चलना है साथ ही कैसे इसे अभ्यास में लाना है। पहले तो, किसी को भी अपने स्वयं के इरादों, अनुचित प्रयासों, और यहाँ तक कि अपने परिवार और अपनी स्वयं की देह की सभी चीजों को एक ओर रखना होगा। एक व्यक्ति को पूर्ण हृदय से समर्पित अवश्य होना चाहिए, अर्थात्, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों में सत्य और उसकी आकांक्षाओं की खोज पर अवश्य ध्यान केंद्रित करना चाहिए, और हर चीज में परमेश्वर के इरादों को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह अभ्यास की सबसे बुनियादी और प्राणाधार पद्धति है। यह वही था जो पतरस ने यीशु को देखने के बाद किया था, और केवल इस तरह से अभ्यास करने से ही कोई सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर के वचन के प्रति हार्दिक समर्पण में मुख्यतः परमेश्वर के वचनों में सत्य और उसके आकांक्षाओं की खोज करना, परमेश्वर के इरादों को समझने पर ध्यान केंद्रित करना, और परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझना व और अधिक प्राप्त करना शामिल है। परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और धर्म-विद्या का ज्ञान प्राप्त करने पर तो उसका ध्यान और भी केंद्रित नहीं था। इसके बजाय, उसने सत्य को समझने और परमेश्वर के इरादों पर पकड़ बनाने पर, साथ ही परमेश्वर के स्वभाव और मनोहरता का ज्ञान प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया। पतरस ने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट दशाओं, मनुष्य के प्रकृति सार और मनुष्य की वास्तविक कमियों को जानने का भी प्रयास किया। केवल इसी तरीके से वह परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उसकी अपेक्षाओं को आसानी से पूरा कर सकता था। जब परमेश्वर के वचनों की बात आती थी तो पतरस के पास बहुत-से सटीक अभ्यास थे। यह परमेश्वर के इरादों के सर्वाधिक अनुरूप था, और यह वो सर्वोत्तम तरीका था जिससे कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए सहयोग कर सकता था। परमेश्वर के भेजे हुए सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करते समय पतरस मनुष्य का न्याय और उसे उजागर करने वाले परमेश्वर के हर वचन और मनुष्य से उसकी माँगों के हर वचन से सख्ती से अपना मिलान करता था, स्वयं को जाँचता था और परमेश्वर के वचनों का अर्थ ठीक-ठीक समझने का प्रयास करता था। यीशु उससे जो कुछ कहता था, उस पर वह गंभीरता से मनन करता था, हर वचन को मन में दृढ़ता से धारण करता था—और इस तरीके से बहुत अच्छे परिणाम मिलते थे। इस तरीके से अभ्यास कर उसने परमेश्वर के वचनों के जरिए स्वयं को जान लिया और वह न केवल मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट दशाओं और कमियों को जान गया, बल्कि वह मनुष्य के सार और प्रकृति को भी जान गया। खुद को वास्तव में जानना यही होता है। परमेश्वर के वचनों से पतरस ने एक ओर अपने बारे में सच्चा ज्ञान हासिल किया और दूसरी ओर उसने देखा परमेश्वर द्वारा व्यक्त धार्मिक स्वभाव, जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, परमेश्वर के अपने कार्य के लिए इरादे और मानवजाति से परमेश्वर की माँगें। इन वचनों से उसने परमेश्वर को सच में जाना, उसका स्वभाव और उसका सार उसे पता चला; जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, वे बातें उसने जानीं और समझीं, साथ ही परमेश्वर की मनोहरता और मनुष्य से परमेश्वर की माँगें भी जानीं। भले ही परमेश्वर ने उस समय उतना नहीं बोला, जितना आज वह बोलता है, किन्तु पतरस में इन पहलुओं में परिणाम उत्पन्न हुआ था। यह एक दुर्लभ और बहुमूल्य चीज थी। पतरस सैकड़ों परीक्षणों से गुजरा; उसका कष्ट सहना व्यर्थ नहीं गया। न केवल उसने परमेश्वर के वचनों और कार्यों से स्वयं को जाना बल्कि उसने परमेश्वर को भी जान लिया। इसके साथ ही, परमेश्वर के वचनों में पतरस ने विशेष रूप से मनुष्य से परमेश्वर की माँगों पर और उन पहलुओं पर ध्यान दिया जिनमें मनुष्य को परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए ताकि वह परमेश्वर के इरादे के अनुसार हो सके, और वह इन बातों में अत्यधिक प्रयास लगाने में समर्थ रहा और उनमें उसे पूरी स्पष्टता प्राप्त हुई। उसके जीवन प्रवेश के लिए यह अत्यंत लाभकारी था। परमेश्वर के वचनों का चाहे कोई भी पहलू हो, अगर वे वचन जीवन के रूप में कार्य करने योग्य थे और सत्य थे, तो पतरस उन्हें अपने हृदय में उकेर लेता था, जहाँ वह अक्सर उन पर विचार करता और उन्हें समझता था। यीशु के वचनों को सुनकर, वह उन्हें अपने हृदय में उतार सका, जिससे पता चलता है कि उसका ध्यान विशेष रूप से परमेश्वर के वचनों पर ही था, और अंत में उसने वास्तव में परिणाम प्राप्त कर लिए। अर्थात्, वह परमेश्वर के वचनों को कुशलतापूर्वक अभ्यास में ला सका, वह सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य सटीक ढंग से कर सका, वह पूरी तरह परमेश्वर की इच्छाओं के अनुसार कार्य कर सका और अपने निजी मतों और कल्पनाओं का त्याग कर सका। इस तरीके से पतरस ने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश किया।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें
यदि कोई अपना कर्तव्य करते हुए परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है, और अपने शब्दों और क्रियाकलापों में सिद्धांत पर चलता है और सत्य के समस्त पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश करता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के कार्य और उसके वचनों ने उन पर पूरी तरह से प्रभाव प्राप्त कर लिया है : परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन गए हैं, और उन्होंने सत्य प्राप्त कर लिया है, और वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में समर्थ हैं। इसके बाद, उनके देह की प्रकृति—अर्थात्, उनके अस्तित्व की मूल नींव—हिलकर अलग हो जाएगी और ढह जाएगी। जब लोग परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में धारण कर लेंगे, केवल तभी वे नए लोग बनेंगे। अगर परमेश्वर के वचन लोगों का जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, उसका प्रकाशन और मानवता से उसकी अपेक्षाएँ, और मानव जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि वे प्राप्त करें, लोगों का जीवन बन जाते हैं, अगर लोग इन वचनों और सत्यों के अनुसार जीते हैं, तो वे परमेश्वर के वचनों द्वारा पूर्ण बनाए जाते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पुनर्जन्म लेते हैं और नए लोग बन गए हैं। यह वह मार्ग है जिसके द्वारा पतरस ने सत्य का अनुसरण किया। यह पूर्ण बनाए जाने का मार्ग है। पतरस परमेश्वर के वचनों द्वारा पूर्ण बनाया गया था, उसने परमेश्वर के वचनों से जीवन प्राप्त किया, परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य उसका जीवन बन गया, और तब जाकर वह ऐसा व्यक्ति बन गया जिसने सत्य को प्राप्त किया।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें