1. प्रभु यीशु ने कहा था, “मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं” (यूहन्ना 10:27)। जब प्रभु लौटकर आएगा, तो वह अपनी बातों को कहेगा और अपनी भेड़ों की तलाश में जाएगा। प्रभु के लौटने की प्रतीक्षा करने में परमेश्वर की आवाज़ की तलाश करना महत्वपूर्ण है, लेकिन हम परमेश्वर की आवाज़ और इंसान की आवाज़ के बीच अंतर करने में असमर्थ हैं। कृपया हमारे साथ इस पर सहभागिता करें।
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“यीशु ने उससे कहा, ‘मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता’” (यूहन्ना 14:6)।
“क्योंकि परमेश्वर का मार्ग जीवित, और शक्तिशाली, और किसी भी दोधारी तलवार से अधिक तेज़ है, जो प्राण और आत्मा को, और गाँठ-गाँठ और गूदे-गूदे को अलग करके आर-पार छेदता है, और हृदय के विचारों और मंशाओं को जाँचता है” (इब्रानियों 4:12)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
सत्य मनुष्य के संसार से आता है, किंतु मनुष्य के बीच सत्य मसीह द्वारा लाया जाता है। यह मसीह से, अर्थात् स्वयं परमेश्वर से उत्पन्न होता है और यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसमें मनुष्य समर्थ हो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है
सत्य जीवन का सर्वाधिक व्यावहारिक सिद्धांत है और मानवजाति के लिए सर्वोच्च जीवन का नीति-वाक्य है। चूँकि यही वह अपेक्षा है जो परमेश्वर मनुष्य से करता है और यही परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाने वाला कार्य है, इसलिए इसे “जीवन-सिद्धांत” कहा जाता है। यह किसी चीज से सारांशित किया गया कोई नीति-वाक्य नहीं है, न ही यह किसी महान हस्ती द्वारा कहा गया कोई प्रसिद्ध उद्धरण है। इसके बजाय, यह स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीजों के संप्रभु का मानवजाति के लिए कथन है; यह मनुष्य द्वारा किया गया कुछ वचनों का सारांश नहीं है, बल्कि परमेश्वर का अंतर्निहित जीवन है। इसलिए इसे “सर्वोच्च जीवन-सिद्धांत” कहा जाता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं
परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन बाहरी तौर पर देखने में चाहे सरल हों या गहन, वे सब ऐसे सत्य हैं जो मनुष्य के जीवन प्रवेश के लिए अपरिहार्य हैं; वे जीवनदायी जल के ऐसे स्रोत हैं जो मनुष्य को आत्मा और देह दोनों में जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्य को जीवित रहने के लिए जरूरी चीजें मुहैया कराते हैं; जैसे कि उसके दैनिक जीवन में स्व-आचरण के नियम और सिद्धांत; उद्धार पाने का अनिवार्य मार्ग और साथ ही उद्धार पाने के लिए लक्ष्य और दिशा; हर वह सत्य जो उसमें परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के रूप में होना चाहिए; और हर वह सत्य कि मनुष्य परमेश्वर के प्रति कैसे समर्पण करे और कैसे उसकी आराधना करे। वे मनुष्य के जीवित बने रहने की गारंटी हैं, वे मनुष्य की दैनिक रोटी हैं और वे ऐसा मजबूत सहारा भी हैं जो मनुष्य को सशक्त होने और अडिग रहने में सक्षम बनाता है। परमेश्वर के वचन उस सत्य वास्तविकता से संपन्न हैं, जिससे सृजित मानवजाति सामान्य मानवता को जीती है, वे उस सत्य से समृद्ध हैं, जिससे मानवता भ्रष्टता से मुक्त होती है और शैतान के फंदे से निकलती है, वे उस गंभीर और धैर्यपूर्ण शिक्षा, प्रोत्साहन, उत्साहवर्धन और सांत्वना से संपन्न हैं, जो सृष्टिकर्ता सृजित मानवता को देता है। वे ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं जो मनुष्य को सभी सकारात्मक चीजों को समझने का मार्गदर्शन और प्रबोधन देते हैं; वे यह सुनिश्चित करने की गारंटी हैं कि मनुष्य वह सब जिएगा और हासिल करेगा जो न्यायसंगत, सुंदर और अच्छा है, वे ऐसे मापदंड हैं जिनसे सभी लोगों, घटनाओं और चीजों को मापा जाता है और वे मार्गदर्शक चिह्न भी हैं जो मनुष्य को उद्धार की तरफ और रोशनी के मार्ग पर ले जाते हैं।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, प्रस्तावना
परमेश्वर के वचन को हरगिज मनुष्य का वचन नहीं ठहराया जा सकता और मनुष्य के वचन को तो परमेश्वर का वचन हरगिज नहीं ठहराया जा सकता। परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया गया व्यक्ति देहधारी परमेश्वर नहीं है और देहधारी परमेश्वर एक ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया गया है। इसमें एक मूलभूत अंतर है। शायद ये वचन पढ़ने के बाद तुम इन्हें परमेश्वर के वचन नहीं मानते, बल्कि केवल उस प्रबुद्धता के रूप में मानते हो जो किसी व्यक्ति ने हासिल की है। उस स्थिति में तुम बहुत अज्ञानी हो। परमेश्वर के वचन मनुष्य द्वारा हासिल प्रबोधन के समान कैसे हो सकते हैं? देहधारी परमेश्वर के वचन एक नया युग आरंभ करते हैं, समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करते हैं, रहस्य प्रकट करते हैं और मनुष्य को वह दिशा दिखाते हैं जो उसे नए युग में ग्रहण करनी है। मनुष्य जो प्रबुद्धता हासिल करता है, वह केवल कुछ साधारण अभ्यास या ज्ञान मात्र है। यह एक नए युग में समस्त मानवजाति को नहीं ले जा सकता या स्वयं परमेश्वर के रहस्य प्रकट नहीं कर सकता। आखिरकार, परमेश्वर परमेश्वर है और मनुष्य मनुष्य है। परमेश्वर में परमेश्वर का सार होता है और मनुष्य में मनुष्य का सार। यदि मनुष्य परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों को पवित्र आत्मा का साधारण प्रबोधन मानता है और प्रेरितों और नबियों के वचनों को परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से कहे गए वचन मानता है तो यह मनुष्य की गलती होगी।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना
मनुष्य की संगति परमेश्वर के वचन से भिन्न होती है। जब लोग संगति करते हैं, तब वे अपनी व्यक्तिगत अंतर्दृष्टि और अनुभव के बारे में ही संगति करते हैं, और परमेश्वर के कार्य के आधार पर उनकी अंतर्दृष्टि और अनुभव को व्यक्त करते हैं। उनकी जिम्मेदारी यह है कि परमेश्वर के कार्य करने या बोलने के पश्चात् वे पता लगायें कि उन्हें इसमें से किसका अभ्यास करना चाहिए और किसमें प्रवेश करना चाहिए, और फिर इसे अनुयायियों को प्रदान कर दें। इसलिए, मनुष्य का कार्य उसके प्रवेश और अभ्यास का प्रतिनिधित्व करता है। निस्संदेह, ऐसा कार्य मानवीय सबक और अनुभव या कुछ मानवीय विचारों के साथ मिश्रित होता है। पवित्र आत्मा चाहे जैसे कार्य करे, चाहे वह मनुष्य पर कार्य करे या देहधारी परमेश्वर में, कर्मी हमेशा वही व्यक्त करते हैं जो वे होते हैं। यद्यपि कार्य पवित्र आत्मा ही करता है, फिर भी मनुष्य अंतर्निहित रूप से जैसा होता है कार्य उसी पर आधारित होता है, क्योंकि पवित्र आत्मा बिना आधार के कार्य नहीं करता। दूसरे शब्दों में, पवित्र आत्मा शून्य के आधार पर कार्य नहीं करता—वह हमेशा वास्तविक परिस्थितियों और असली स्थितियों के अनुसार कार्य करता है। केवल इसी तरह से मनुष्य के स्वभाव को रूपान्तरित किया जा सकता है और उसकी पुरानी धारणाओं एवं पुराने विचारों को बदला जा सकता है। जो कुछ मनुष्य देखता है, अनुभव करता है और कल्पना कर सकता है, वह उसी को व्यक्त करता है; अगर वह कोई धर्म-सिद्धांत या धारणा ही हो तो भी, वह उसके मन की पहुँच के भीतर ही होता है। चाहे मनुष्य के कार्य का आकार कुछ भी हो, यह उसके अनुभव के दायरे से परे नहीं जा सकता, न ही जो वह देखता है, या जिसकी वह कल्पना या जिसका विचार कर सकता है, उससे बढ़कर हो सकता है। परमेश्वर जो व्यक्त करता है वह उसका स्वरूप है, और यह मनुष्य की पहुँच से परे है, अर्थात्, मनुष्य की सोच से परे है। वह संपूर्ण मानवजाति की अगुवाई करने के अपने कार्य को व्यक्त करता है, इसका मानवीय अनुभव के विवरणों से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह उसके अपने प्रबंधन से संबंधित है। मनुष्य जो व्यक्त करता है वह उसका अपना अनुभव है, जबकि परमेश्वर अपने अस्तित्व को व्यक्त करता है, जो कि उसका अंतर्निहित स्वभाव है और मनुष्य की पहुँच से परे है। मनुष्य का अनुभव उसकी अंतर्दृष्टि और वह ज्ञान है जो उसने परमेश्वर द्वारा अपने अस्तित्व की अभिव्यक्ति के आधार पर प्राप्त किया है। ऐसी अंतर्दृष्टि और ज्ञान मनुष्य का अस्तित्व कहलाता है, और वे मनुष्य के अंतर्निहित स्वभाव और उसकी काबिलियत के आधार पर व्यक्त होते हैं—इसीलिए इन्हें मनुष्य का अस्तित्व कहा जाता है। जो कुछ मनुष्य देखता और अनुभव करता है वह उसकी संगति कर पाता है। अतः कोई भी व्यक्ति उस पर संगति नहीं कर सकता जिसका उसने अनुभव नहीं किया है या देखा नहीं है या जिस तक उसका मन नहीं पहुँच पाता है, वे ऐसी चीज़ें हैं जो उसके भीतर नहीं हैं। यदि जो कुछ मनुष्य व्यक्त करता है वह ऐसी चीज है जो उसने अनुभव नहीं की है, तो यह उसकी कल्पना या धर्म-सिद्धांत है। संक्षेप में, ऐसे शब्दों में कोई वास्तविकता नहीं होती। यदि तुम समाज की चीजों से कभी संपर्क में न आते, तो तुम समाज के जटिल संबंधों की स्पष्ट संगति करने में समर्थ नहीं होते। यदि तुम्हारा कोई परिवार न होता परन्तु अन्य लोग पारिवारिक मुद्दों के बारे में बात करते, तो तुम उनकी अधिकांश बातों को नहीं समझ पाते। इसलिए, जो कुछ मनुष्य संगति करता है और जिस कार्य को वह करता है, वे उसके भीतरी अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य
परमेश्वर का अधिकार और पहचान परमेश्वर के वचनों में स्पष्ट रूप से प्रकट हुई है। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर कहता है “मेरी वाचा तेरे साथ बन्धी रहेगी, इसलिए तू ... हो जाएगा। ... मैं ने तुझे ठहरा दिया ... मैं तुझे बनाऊँगा...,” तो “तू हो जाएगा” और “मैं बनाऊँगा” जैसे वाक्यांश, जिनके शब्दों में परमेश्वर की पहचान और अधिकार निहित है, एक दृष्टि से सृष्टिकर्ता की विश्वसनीयता का संकेत हैं; तो दूसरी दृष्टि से, वे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए गए विशेष वचन हैं, जिनमें सृष्टिकर्ता की पहचान है—साथ ही वे परंपरागत शब्दावली का हिस्सा हैं। अगर कोई कहता है कि वह आशा करता है कि दूसरा व्यक्ति अत्यंत फलवंत हो, उसे जाति-जाति का मूल बनाया जाए, और उसके वंश में राजा उत्पन्न हों, तो यह निस्संदेह एक तरह की इच्छा है, कोई वादा या आशीष नहीं। इसलिए, लोग यह कहने की हिम्मत नहीं करते कि “मैं तुम्हें फलाँ-फलाँ बनाऊँगा, तुम फलाँ-फलाँ होगे” क्योंकि वे जानते हैं कि उनके पास ऐसा सामर्थ्य नहीं है; यह उन पर निर्भर नहीं है, और अगर वे ऐसी बातें कहते भी हैं, तो उनके शब्द उनकी इच्छा और महत्वाकांक्षा से प्रेरित कोरी बकवास होंगे। अगर किसी को लगता है कि वह अपनी इच्छा पूरी नहीं कर सकता, तो क्या वह इतने भव्य स्वर में बोलने की हिम्मत करता है? हर कोई अपने वंशजों के लिए शुभ कामना करता है, और आशा करता है कि वे उत्कृष्टता प्राप्त करें और बड़ी सफलता का आनंद लें। “उनमें से किसी का सम्राट बनना कितना बड़ा सौभाग्य होगा! अगर कोई राज्यपाल होता, तो वह भी अच्छा होता—बस वे कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति हों!” ये सभी लोगों की इच्छाएँ हैं, लेकिन लोग केवल अपने वंशजों के लिए आशीषों की कामना ही कर सकते हैं, लेकिन अपने किसी भी वादे को पूरा या साकार नहीं कर सकते। अपने दिल में हर कोई स्पष्ट रूप से जानता है कि उसके पास ऐसी चीजें हासिल करने का सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि उसके बारे में हर चीज उसके नियंत्रण से बाहर है, इसलिए वे दूसरों के भाग्य को नियंत्रित कैसे कर सकते हैं? परमेश्वर इस तरह के वचन इसलिए कह सकता है, क्योंकि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है, और वह मनुष्य से किए गए सभी वादे पूरे और साकार करने और मनुष्य को दिए गए सभी आशीष साकार करने में सक्षम है। मनुष्य को परमेश्वर ने सृजित किया था, और परमेश्वर के लिए किसी मनुष्य को अत्यंत फलवंत बनाना बच्चों का खेल होगा; किसी के वंशजों को समृद्ध बनाने के लिए सिर्फ उसके एक वचन की आवश्यकता होगी। उसे खुद कभी ऐसी चीज के लिए पसीना नहीं बहाना पड़ेगा, या अपने दिमाग को तकलीफ नहीं देनी पड़ेगी, या इसके लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा; यही है परमेश्वर का सामर्थ्य, यही है परमेश्वर का अधिकार।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
मनुष्य के कार्य में उसके अनुभव के बहुत-से तत्व होते हैं; मनुष्य वही व्यक्त करता है जैसा उसका स्वरूप होता है। अपना कार्य करने में परमेश्वर भी वही व्यक्त करता है जो उसका स्वरूप है, परंतु उसका अस्तित्व मनुष्य से भिन्न है। मनुष्य का अस्तित्व मनुष्य के अनुभव और जीवन का प्रतिनिधि है (जो कुछ मनुष्य अपने जीवन में अनुभव करता या जिससे सामना होता है, या जो उसके सांसारिक आचरण के फलसफे हैं), और भिन्न-भिन्न परिवेशों में रहने वाले लोग भिन्न-भिन्न अस्तित्व व्यक्त करते हैं। क्या तुम्हारे पास सामाजिक अनुभव है और तुम वास्तव में किस प्रकार अपने परिवार में रहते और उसके भीतर कैसे अनुभव करते हो, इसे तुम्हारी अभिव्यक्ति में देखा जा सकता है, जबकि तुम देहधारी परमेश्वर के कार्य से यह नहीं देख सकते कि उसके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं। वह मनुष्य के सार को अच्छी तरह से जानता है और सभी प्रकार के लोगों के विभिन्न अभ्यास उजागर कर सकता है। इतना ही नहीं, वह मनुष्यों के भ्रष्ट स्वभाव और विद्रोही व्यवहार भी उजागर कर सकता है। वह दुनिया के लोगों के बीच नहीं रहता, परंतु वह नश्वर लोगों की प्रकृति और दुनिया के लोगों की समस्त भ्रष्टता से अवगत है। यही उसका अस्तित्व है। यद्यपि वह दुनिया के साथ व्यवहार नहीं करता, लेकिन वह दुनिया से निपटने के तमाम नियम जानता है, क्योंकि वह मानवीय प्रकृति को पूरी तरह से समझता है। वह आत्मा के आज के और अतीत के, दोनों कार्यों के बारे में जानता है जिन्हें मनुष्य की आँखें नहीं देख सकतीं और कान नहीं सुन सकते। इसमें बुद्धि शामिल है जो कि सांसारिक आचरण का फलसफा नहीं है और वह चमत्कार है जिनकी थाह पाना मनुष्य के लिए कठिन है। यही उसका अस्तित्व है, लोगों के लिए खुला भी और उनसे छिपा हुआ भी है। वह जो कुछ व्यक्त करता है, वह असाधारण मनुष्य का अस्तित्व नहीं है, बल्कि आत्मा के अंतर्निहित गुण और अस्तित्व हैं। वह दुनिया भर में यात्रा नहीं करता परंतु उसकी हर चीज़ को जानता है। वह “वन-मानुषों” के साथ संपर्क करता है जिनके पास कोई ज्ञान या अंतर्दृष्टि नहीं होती, परंतु वह ऐसे वचन व्यक्त करता है जो ज्ञान से ऊँचे और महान हस्तियों के वचनों से ऊपर होते हैं। वह ऐसे मंदबुद्धि और संवेदनशून्य लोगों के समूह में रहता है जिनमें मानवता नहीं है और जो मानव-जीवन को या मानवता के मानदंडों को नहीं समझते, परंतु वह मानवजाति से सामान्य मानवता का जीवन जीने के लिए कह सकता है, साथ ही वह मानवजाति की नीच और अधम मानवता को उजागर भी करता है। यह सब कुछ उसका अस्तित्व ही है, किसी भी रक्त-माँस के इंसान के अस्तित्व की तुलना में अधिक ऊँचा। उसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह उस कार्य को करने के लिए जो उसे करने की जरूरत है और भ्रष्ट मानवजाति के सार को पूरी तरह से उजागर करने के लिए जटिल, बोझिल और पतित सामाजिक जीवन का अनुभव करने का अतिरिक्त कदम उठाए। पतित सामाजिक जीवन उसके देह को “विकसित” नहीं कर सकता। उसका कार्य और उसके वचन केवल मनुष्य के विद्रोहीपन को उजागर करते हैं और संसार से निपटने के लिए मनुष्य को अनुभव और सबक प्रदान नहीं करते। जब वह मनुष्य को जीवन की आपूर्ति करता है तो उसे समाज या मनुष्य के परिवार की जाँच-पड़ताल करने की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य को उजागर करना और न्याय करना उसकी देह के अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह लंबे समय तक मनुष्य के विद्रोहीपन को जानने और मनुष्य की भ्रष्टता से घृणा करने के बाद उसका मनुष्य की अधार्मिकता उजागर करना है। जो भी कार्य वह करता है, वह सब मनुष्य के सामने उसका स्वभाव प्रकट करता है और उसके अस्तित्व को व्यक्त करता है। केवल वही इस कार्य को कर सकता है; इस कार्य को रक्त-माँस का व्यक्ति नहीं कर सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य