36. पर्यवेक्षण के प्रतिरोध पर चिंतन

मी हुई, चीन

2021 में मैं कलीसिया के सिंचन कार्य के लिए जिम्मेदार थी। उस दौरान अगुआ हमारे काम की निगरानी और जाँच करते थे और अक्सर हमारी प्रगति के बारे में पूछताछ करते थे कि हमें अपना कर्तव्य निभाने में कोई समस्या या मुश्किल तो नहीं आ रही है। पहले तो मैं सक्रियता से जवाब देती थी, लेकिन धीरे-धीरे मैं अधीर हो गई और सोचने लगी, “हमेशा हमारे काम की जाँच होना बहुत बड़ी परेशानी है। क्या पता हमारा कितना समय बर्बाद होता है? क्या इससे मेरे काम के नतीजों पर असर नहीं पड़ेगा? अगर मेरे नतीजे खराब रहे तो क्या अगुआ मुझे बर्खास्त नहीं कर देंगे?” ऐसे विचारों के साथ मैं अगुआओं द्वारा इस तरह का पर्यवेक्षण करने को लेकर बहुत प्रतिरोधी हो गई।

अगुआओं ने एक बार हमारे काम की स्थिति समझने के लिए एक पत्र भेजा, जिसमें सवाल पूछे गए थे कि उस महीने कितने लोगों ने सुसमाचार स्वीकार किया था, कितने नवागंतुकों ने नियमित रूप से सभाएँ नहीं की और क्यों, उनकी मौजूदा धार्मिक धारणाएँ क्या हैं और हमने उन्हें सुलझाने के लिए कैसे संगति की। सवालों की उस श्रृंखला को देखकर मैं परेशान हो गई और सोचने लगी, “इतनी सारी सामग्री देनी है और मुझे इसके लिए सिंचनकर्ताओं के साथ समीक्षा और चर्चा करनी पड़ेगी। इससे बहुत समय बर्बाद होगा!” इसलिए मैंने अपने दिल में प्रतिरोध किया, “काम के बारे में इतने विस्तृत सवाल पूछने से हमारा बहुत समय बर्बाद होता है! फिर अगर हमारे सिंचन कार्य के नतीजे खराब आए तो तुम कहोगे कि मैंने वास्तविक कार्य नहीं किया और मुझमें कार्यक्षमता नहीं है?” जब मैंने देखा कि मेरे काम की सहयोगी बहनें भी परेशान हैं तो मैंने सोचा, “अगर उन्हें भी लगता है कि यह समय की बर्बादी है तो एक टीम के रूप में हम अगुआओं को सुझाव दे सकते हैं। फिर शायद भविष्य में जब अगुआ काम की जाँच करेंगे तो वे ऐसे विशिष्ट प्रश्न नहीं पूछेंगे और मेरे काम में कम कमियाँ उजागर होंगी।” इसलिए मैंने आधे मजाक, आधे गंभीर लहजे में कहा, “अगुआओं को सचमुच हमारी परवाह है कि वे हमारे काम के बारे में इतने विस्तृत प्रश्न पूछते हैं।” मेरे इतना कहते ही एक बहन तुरंत बोल पड़ी, “बारीक से बारीक विवरण तक!” यह सुनकर कि मैं और बहन एक ही बात सोच रहे थे, मैंने हँसते हुए कहा, “हम सभी पहले ही काफी व्यस्त हैं। इन सवालों को समझना और उनका जवाब देना बहुत ज्यादा परेशानी भरा है। क्या इससे हमारे सिंचन कार्य की प्रभावशीलता पर असर नहीं पड़ेगा?” अन्य बहनों को सहमति में सिर हिलाते हुए देखकर मुझे मन ही मन खुशी हुई, “ऐसा लगता है कि उन सभी को इससे आपत्ति है। बाद में हम एक साथ मिलकर अगुआओं को सुझाव दे सकते हैं। इस तरह वे हमेशा हमारे काम की जाँच नहीं करेंगे।” मेरे उकसाने पर जब भी अगुआ हमारे काम के बारे में जानने की कोशिश करते तो काम के मेरे सहयोगी परेशान दिखते और अगर वे जवाब देते भी तो अनिच्छा से कुछ ही वाक्यों में निपटा देते थे। वे काम में आने वाली समस्याओं और विचलनों का विस्तृत सारांश नहीं देते थे इसलिए अगुआ हमारे काम के मुद्दों को न तो समझ पाते थे और न ही उनसे ठीक तरह से निपट पाते थे। नतीजतन हमारे सिंचन कार्य में कभी सुधार नहीं हुआ।

एक और बार अगुआओं ने पाया कि हमने सिंचनकर्ताओं को विकसित करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है और उस काम के महत्व के बारे में संगति करने के लिए पत्र भेजा और हमें कुछ अच्छे अभ्यास के तरीके बताए। पत्र में यह भी ध्यान दिलाया गया था कि हम विकसित करने के कार्य की जिम्मेदारी नहीं ले रहे थे, कार्यान्वयन में देरी कर रहे थे और हमारी दक्षता बहुत कम थी, जिसने न केवल भाई-बहनों को प्रशिक्षण से वंचित किया, बल्कि सिंचन कार्य को भी सीधे प्रभावित किया। अगुआ चाहते थे कि हम इसे एक महत्वपूर्ण मुद्दे की तरह देखें और अपेक्षा जताई कि हम कुछ नवागंतुकों को सिंचन का अभ्यास करने के लिए जल्दी से विकसित करें। पत्र देखने के बाद मुझे प्रतिरोध महसूस हुआ : “यह बहुत ज्यादा अपेक्षा करना है। इन नए लोगों ने अभी-अभी अपने कर्तव्य में प्रशिक्षण लेना शुरू किया है। तुम्हें लगता है कि उनको विकसित करना इतना आसान है? तुम्हें लोगों को विकसित करने का अनुभव है, लेकिन तुम हमें अपने मानक पर नहीं रख सकते!” लेकिन फिर मैंने सोचा, “अगर मैं सीधे शिकायत करती हूँ तो क्या अगुआ सोचेंगे कि मुझमें कार्यक्षमता नहीं है? मैं ऐसा नहीं होने दे सकती! मुझे उन्हें यह समझाना होगा कि हमारी पूरी टीम ही यह अपेक्षा पूरी नहीं कर सकती। इस तरह अगुआ हमारे साथ कुछ नहीं कर सकते और अगर वे इस मुद्दे को आगे बढ़ाते भी हैं तो इसमें सिर्फ मैं ही शामिल नहीं हूँ।” मैंने भौंहें सिकोड़ते हुए और थोड़ी कठिनाई के साथ कहा, “अगुआओं की अपेक्षा थोड़ी ज्यादा है और उनसे हमारे अनुभव की तुलना नहीं हो सकती।” मेरे इतना कहते ही एक-एक करके दूसरी बहनों ने स्वीकृति में सिर हिलाया। उनमें से एक ने कहा, “अगुआ ऊँची काबिलियत वाले लोग हैं और बहुत कुशलता से काम करते हैं। हम उनसे तुलना कैसे कर सकते हैं?” एक और ने कहा, “अगुआ हमसे बहुत ज्यादा अपेक्षा कर रहे हैं। हम आगे जाकर यह काम कैसे कर सकते हैं?” सभी को ऐसा ही महसूस करते देखकर मुझे बहुत खुशी हुई और मैंने सोचा, “अब अगुआ हमारे साथ कुछ नहीं कर पाएँगे। आखिरकार वे हमारी पूरी टीम को तो बर्खास्त नहीं कर सकते!” अगले दिन मैंने अगुआओं को एक जवाबी पत्र भेजा जिसमें हमारे कर्तव्य निर्वहन में आने वाली सभी मुश्किलों का वर्णन किया गया था ताकि वे हमारी स्थिति समझ सकें। पत्र के अंत में मैंने जानबूझकर एक पंक्ति लिख दी जिसमें कहा गया था कि, “अभी हमारे काम के यही नतीजे हैं और इन्हें सुधारना आसान नहीं है।” मैंने पत्र में “हमारा” शब्द पर जोर दिया था ताकि अगुआओं को पता चले कि यह हमारी सामूहिक राय है। इस तरह वे अब हमसे इतनी अधिक अपेक्षाएँ नहीं रखेंगे। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि अगली सभा के दौरान अगुआओं ने मुझे काट-छाँट कर उजागर कर दिया और कहा कि कर्तव्य करते समय मैंने जिम्मेदारी नहीं उठाई और सुधार करने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने कहा कि मैंने नकारात्मकता प्रकट की, गुट बनाया और बहनों को अपने साथ मिलकर विरोध करने के लिए उकसाया, कि मैंने नवागंतुकों को विकसित करने में देर की और कलीसिया के काम में बाधा डाली और मैंने समूह में जरा भी सकारात्मक भूमिका नहीं निभाई। आखिरकार उन्होंने मुझे बर्खास्त कर दिया।

बर्खास्त किए जाने के बाद मुझे बहुत पश्चात्ताप और तकलीफ हुई। मुझे पता था कि मैंने परेशानी खड़ी की है, बुराई की है और परमेश्वर को नाराज किया है। समस्याओं का सामना होने पर मैंने सत्य की तलाश नहीं की और ऐसी धारणाएँ फैलाईं, जिससे हर कोई नकारात्मकता और निष्क्रियता की अवस्था में रहने लगा। मैंने वाकई कलीसिया के काम में बाधा डाली। बाद में जब मैंने अपनी स्थिति पर आत्म-चिंतन किया तो मुझे परमेश्वर के वचनों का यह अंश मिला : “चूँकि अपने दिलों में मसीह-विरोधी हमेशा मसीह के दिव्य सार पर संदेह करते हैं और हमेशा एक अवज्ञाकारी स्वभाव रखते हैं, इसलिए जब मसीह उन्हें कुछ कार्य करने को कहता है, तो वे हमेशा उन कार्यों की पड़ताल और उन पर चर्चा करते हैं, लोगों से यह तय करने के लिए कहते हैं कि ये कार्य सही हैं या गलत। क्या यह एक गंभीर समस्या है? (हाँ।) वे इन चीजों को सत्य के प्रति समर्पण के दृष्टिकोण से नहीं लेते; इसके बजाय, वे इन्हें परमेश्वर के प्रति विरोध के दृष्टिकोण से लेते हैं। यही मसीह-विरोधियों का स्वभाव है। जब वे मसीह की आज्ञाएँ और कार्य-व्यवस्थाएँ सुनते हैं, तो वे उन्हें स्वीकार कर उनके प्रति समर्पण नहीं करते, बल्कि चर्चा करना शुरू कर देते हैं। और वे किस बात पर चर्चा करते हैं? क्या वे इस बात पर चर्चा करते हैं कि समर्पण का अभ्यास कैसे किया जाए? (नहीं।) वे यह चर्चा करते हैं कि मसीह के वचन और आज्ञाएँ सही हैं या गलत, और जाँच करते हैं कि उन्हें कार्यान्वित किया जाना चाहिए या नहीं। क्या उनका रवैया वास्तव में इन चीजों को कार्यान्वित करना चाहने का होता है? नहीं—वे ज्यादा लोगों को प्रोत्साहित करना चाहते हैं कि वे उनकी तरह बनें, इन चीजों को न करें। और क्या इन्हें न करना समर्पण के सत्य का अभ्यास करना है? बिल्कुल भी नहीं। तो वे क्या कर रहे हैं? (विरोध।) न केवल वे खुद परमेश्वर का विरोध कर रहे हैं, बल्कि वे सामूहिक विरोध भी चाहते हैं। यह उनके कर्मों की प्रकृति है, है न? सामूहिक विरोध : सबको अपने जैसा बनाना, सबको अपने जैसा सोचने, अपने जैसा कहने, अपने जैसा निर्णय करने पर मजबूर करना, मसीह के निर्णय और आज्ञाओं का सामूहिक रूप से विरोध करना। मसीह-विरोधियों की यही कार्य-प्रणाली होती है। मसीह-विरोधियों का विश्वास यह होता है, ‘जब हर कोई अपराधी हो तो कानून लागू नहीं किया जा सकता’ और इसलिए वे दूसरों को भी उनके साथ मिलकर परमेश्वर का विरोध करने के लिए बढ़ावा देते हैं, और सोचते हैं कि ऐसा होने पर परमेश्वर का घर उन पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। क्या यह बेवकूफी नहीं है? मसीह-विरोधियों की परमेश्वर का विरोध करने की क्षमता अत्यंत सीमित है, वे बिल्कुल अकेले हैं। इसलिए वे लोगों को सामूहिक रूप से परमेश्वर का विरोध करने के लिए भर्ती करने की कोशिश करते हैं, और अपने दिलों में सोचते हैं कि ‘मैं लोगों के एक समूह को गुमराह करूँगा और उन्हें अपनी तरह सोचने और कार्य करने के लिए प्रेरित करूँगा। हम एक-साथ मसीह के वचनों को नकारेंगे, और परमेश्वर के वचनों को बाधित करेंगे, और उन्हें क्रियान्वित होने से रोकेंगे। और जब कोई मेरे कार्य की जाँच करने आएगा, तो मैं कहूँगा कि सबने इसे इसी तरह करने का फैसला किया था—और फिर हम देखेंगे कि तुम इसे कैसे सँभालते हो। मैं इसे तुम्हारे लिए नहीं करने वाला, मैं इसे पूरा नहीं करने वाला—और देखते हैं, तुम मेरे साथ क्या करते हो!’ ... क्या ये चीजें, जो मसीह-विरोधियों में प्रकट होती हैं, घृणित नहीं हैं? (ये बेहद घृणित हैं।) और कौन-सी चीज इन्हें घृणित बनाती है? ये मसीह-विरोधी परमेश्वर के घर में सत्ता हथियाना चाहते हैं, मसीह के वचनों को उनके द्वारा क्रियान्वित नहीं किया जा सकता, वे इन्हें क्रियान्वित नहीं करेंगे। निस्संदेह, एक अन्य प्रकार की स्थिति में भी लोग मसीह के वचनों के प्रति समर्पण करने में असमर्थ रहते हैं : कुछ लोगों की काबिलियत कम होती है, वे परमेश्वर के वचन सुनकर उन्हें समझ नहीं पाते, और नहीं जानते कि उन्हें कैसे कार्यान्वित किया जाए; भले ही तुम उन्हें सिखा दो कि कैसे क्रियान्वित करना है, फिर भी वे नहीं कर पाते। यह एक अलग मामला है। जिस विषय पर हम अभी संगति कर रहे हैं, वह है मसीह-विरोधियों का सार, जो इस बात से संबंधित नहीं है कि लोग काम करने में सक्षम हैं या नहीं, या उनकी काबिलियत कैसी है; यह मसीह-विरोधियों के स्वभाव और सार से संबंधित है। वे पूरी तरह से मसीह, परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं और सत्य सिद्धांतों का विरोध करते हैं। उनमें जरा भी समर्पण नहीं होता, केवल विरोध होता है। एक मसीह-विरोधी ऐसा ही होता है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद दस : वे सत्य का तिरस्कार करते हैं, सिद्धांतों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाते हैं और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की उपेक्षा करते हैं (भाग चार))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे अपने कार्यकलापों की गंभीर प्रकृति का एहसास हुआ, खासकर जब परमेश्वर के वचन उजागर करते हैं कि कैसे मसीह-विरोधियों में परमेश्वर के प्रति समर्पण का रवैया नहीं होता और वे कभी भी परमेश्वर की अपेक्षाएँ और परमेश्वर के घर की कार्य व्यवस्थाएँ नहीं स्वीकारते। उनके दिल प्रतिरोध और टकराव से लबालब होते हैं और वे दूसरों को गुमराह करते हैं और विरोध करने के लिए एकजुट करते हैं। इन दिनों किए गए अपने कामों पर विचार करते हुए मैंने पाया कि मेरी प्रकृति भी उनके जैसी थी। जब अगुआओं ने हमारे काम की विस्तार से जाँच की तो मैंने परेशानी नहीं उठानी चाही और चिंतित हो गई कि इससे मेरा वह समय बर्बाद हो रहा है जिसे मैं अपना कर्तव्य निभाने में लगा सकती थी, इससे काम के नतीजे प्रभावित होंगे। मैं इसे स्वीकार नहीं कर पाई, इसलिए मैंने अगुआओं के खिलाफ पूर्वाग्रही राय फैलाई और अपनी टीम की बहनों से मिलीभगत करके उन्हें एकजुट होकर विरोध करने के लिए उकसाया। जब अगुआओं ने ध्यान दिलाया कि हमारी प्रगति धीमी है और नतीजे कम आ रहे हैं और बताया कि हम कैसे अपनी कार्य कुशलता सुधार सकते हैं तो मैंने प्रतिरोध किया, बहस की और समर्पण नहीं किया। मुझे लगा कि अगुआओं की अपेक्षाएँ बहुत ज्यादा हैं और वे हमारी वास्तविक मुश्किलें नहीं समझते। जब वे हमारी कार्यकुशलता बेहतर बनाने के तरीकों पर संगति कर रहे थे तो मैंने उनकी बात नहीं सुनी। अगुआओं को पीछे हटने, अपनी अपेक्षाएँ घटाने और यह समझने के लिए कि काम के खराब नतीजे सिर्फ मेरी वजह से नहीं थे, मैंने भाई-बहनों के बीच यह विचार फैलाया था कि अगुआओं की अपेक्षाएँ बहुत ज्यादा हैं, ताकि उन्हें भी लगे कि अगुआ हमारे लिए चीजें मुश्किल बना रहे हैं और मैंने उन्हें अपने साथ मिलकर उनका विरोध करने के लिए उकसाया। मैं बहुत धोखेबाज थी और मैंने गुप्त उद्देश्यों और शैतानी चालों से भरी बातें कहीं, अपना उद्देश्य पाने के लिए अन्य लोगों का इस्तेमाल किया। अगुआ हमारे काम की विस्तृत समझ चाहते थे ताकि समस्याओं और विचलनों को जल्दी से खोजकर सुधारा जा सके, हमें अधिक प्रभावी ढंग से काम करने में मदद मिल सके और नवागंतुकों को जल्द से जल्द विकसित किया जा सके ताकि वे अपना कर्तव्य निभा सकें। अगुआ परमेश्वर की अपेक्षाओं और कलीसिया की व्यवस्थाओं के अनुसार विशिष्ट कार्य कर रहे थे। लेकिन मैंने समर्पण तो किया ही नहीं, बल्कि मैंने विरोध किया। इससे अगुआओं के लिए चीजें मुश्किल नहीं हो रही थीं, बल्कि कलीसिया के काम और परमेश्वर की अपेक्षाओं का विरोध हो रहा था और मैं पूरी तरह परमेश्वर के खिलाफ खड़ी थी। मैंने सबको गुमराह किया और अपना पक्ष लेने के लिए उकसाया ताकि वे मेरी तरह सोचें और वही बातें कहें जो मैंने कही थीं, साथ मिलकर कलीसिया की व्यवस्थाओं का विरोध करें। मैंने मसीह-विरोधी का स्वभाव प्रकट किया था और शैतान के सेवक की भूमिका निभाई थी! मैंने भाई-बहनों को गुमराह करने के लिए नकारात्मक बातें की जिसके नतीजे में हर कोई प्रगति करने के बारे में सोचना बंद कर बैठा और यथास्थिति से संतुष्ट रहने लगा, हर दिन अपने कर्तव्य को अनमने ढंग से निपटाने लगा और सिंचन कार्य से हमेशा खराब नतीजे मिलने लगे। मैं कलीसिया के काम में बाधा और गड़बड़ी डालकर बुराई कर रही थी। जब मुझे इसका एहसास हुआ तो मैं डरने लगी। अगर मैं ऐसे ही करती रहती तो मैं और भी बुराई करती, अंततः मसीह-विरोधी बन जाती और बेनकाब करके निकाल दी जाती। मैंने परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, यह तुम्हारी धार्मिकता का साफ प्रकाशन है कि मुझे बर्खास्त कर दिया गया। तुम्हारे वचनों द्वारा उजागर किए जाने और न्याय करने के माध्यम से मैं अपना मसीह-विरोधी स्वभाव बेहतर ढंग से समझ पाई हूँ। मेरी बर्खास्तगी के जरिए तुमने मेरी रक्षा की और इससे भी बढ़कर तुमने मुझे बचाया। मैं तुम्हारी आभारी हूँ!”

इसके बाद मुझे परमेश्वर के वचनों के दो और अंश मिले, जिन्होंने मानवजाति के भ्रष्ट स्वभाव के इस पहलू को उजागर किया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मसीह-विरोधी अक्सर लोगों को गुमराह करने के लिए सिद्धांतों का समूह फैला देते हैं, और वे चाहे कोई भी कार्य क्रियान्वित करें, अंतिम निर्णय उन्हीं का होता है, वे पूरी तरह से सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं। मसीह-विरोधियों की अभिव्यक्तियों के आधार पर देखें तो वास्तव में उनका स्वभाव क्या है? क्या वे सकारात्मक चीजों और सत्य से प्यार करने वाले लोग हैं? क्या उनमें परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण है? (नहीं।) उनका सार सत्य से विमुख होने और नफरत करने का है। यही नहीं, वे इतने अहंकारी होते हैं कि अपनी सारी तार्किकता खो बैठते हैं, उनमें वह बुनियादी जमीर और विवेक भी नहीं होता जो लोगों में होना चाहिए। ऐसे लोग इंसान कहलाने लायक नहीं हैं। उन्हें केवल शैतान की जमात का कहा जा सकता है; वे दानव हैं। जो सत्य को रत्ती भर भी नहीं स्वीकारता वह दानव है—इसमें कोई संदेह नहीं है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद दस : वे सत्य का तिरस्कार करते हैं, सिद्धांतों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाते हैं और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की उपेक्षा करते हैं (भाग चार))। “सत्य का अभ्यास करने और मसीह के प्रति समर्पण करने को लेकर मसीह-विरोधियों के दिल में क्या रवैया होता है? एक शब्द में कहें तो : विरोध। वे विरोध करते रहते हैं। और इस विरोध में निहित स्वभाव कैसा होता है? इसे कौन-सी चीज जन्म देती है? अवज्ञा इसे जन्म देती है। स्वभाव की बात करें तो यह सत्य से विमुखता है, यह उनके दिलों में अवज्ञा का होना है, यह उनकी समर्पण करने की इच्छा न रखना है। और इसलिए जब परमेश्वर का घर एक ही व्यक्ति द्वारा निर्णय लिए जाने के बजाय अगुआओं और कार्यकर्ताओं को मिलजुलकर सहयोग करना सीखने और चर्चा करने का तरीका सीखने के लिए कहता है तो मसीह-विरोधी अपने दिलों में क्या सोचते हैं? ‘लोगों के साथ हर बात पर चर्चा करने में बहुत परेशानी होती है! मैं इन चीजों के बारे में निर्णय ले सकता हूँ। दूसरों के साथ काम करना, इस पर उनके साथ बात करना, सिद्धांत के अनुसार काम करना—कितना कायराना और शर्मनाक है!’ मसीह-विरोधी सोचते हैं कि वे सत्य को समझते हैं, उन्हें सब कुछ स्पष्ट है, काम करने की उनकी अपनी अंतर्दृष्टियाँ और तरीके हैं, और इसलिए वे दूसरों के साथ सहयोग करने में अक्षम होते हैं, वे लोगों के साथ किसी चीज पर चर्चा नहीं करते, वे सब कुछ अपने तरीके से करते हैं और किसी और के सामने नहीं झुकते! मसीह-विरोधी भले ही अपने मुँह से यही कहते हैं कि वे समर्पण करने और दूसरों के साथ सहयोग करने को तैयार हैं लेकिन उनके जवाब बाहर से चाहे कितने भी अच्छे लगते हों, उनके शब्द चाहे कितने भी कर्णप्रिय हों, वे अपनी विद्रोही दशा और अपना शैतानी स्वभाव बदलने में असमर्थ रहते हैं। अंदर से वे भयंकर विरोधी होते हैं—किस हद तक? अगर ज्ञान की भाषा में समझाया जाए, तो यह एक ऐसी घटना है जो दो अलग-अलग प्रकृति की चीजें एक-साथ रखने पर घटित होती है : प्रतिकर्षण, जिसकी व्याख्या हम ‘विरोध’ के रूप में कर सकते हैं। मसीह-विरोधियों का ठीक यही स्वभाव होता है : ऊपरवाले का विरोध। उन्हें ऊपरवाले का विरोध करना अच्छा लगता है और वे किसी का आज्ञा पालन नहीं करते(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद दस : वे सत्य का तिरस्कार करते हैं, सिद्धांतों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाते हैं और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की उपेक्षा करते हैं (भाग चार))। परमेश्वर कहता है कि सत्य से घृणा करना और परमेश्वर का विरोध करना मसीह-विरोधी का प्रकृति सार है और मुझे एहसास हुआ कि मैं मसीह-विरोधी का स्वभाव प्रकट कर रही थी। मैं अगुआओं के पर्यवेक्षण से परेशान थी और उसका प्रतिरोध कर रही थी। मुझे लगा कि इससे हमारा समय बर्बाद हो रहा है और वे हमारे काम के नतीजों को बेहतर बनाने के लिए कहकर हमसे बहुत ज्यादा अपेक्षाएँ रख रहे थे। मैंने आज्ञा का पालन नहीं करना चाहा और विरोध जारी रखा। दरअसल अगुआ हमारे कार्य में समस्याओं और विचलनों की ओर इशारा कर रहे थे और मुझे इसे स्वीकारना चाहिए था और काम के ऐसे खराब नतीजों के अंतर्निहित कारणों पर गंभीरता से आत्म-चिंतन करना चाहिए था : क्या यह कर्तव्य निर्वहन के प्रति मेरा लापरवाह रवैया था या मैं चीजों की असलियत नहीं जान पा रही थी और भाई-बहनों की मुश्किलों और समस्याओं को सुलझाने के लिए सत्य का उपयोग नहीं कर पा रही थी। कारण जानने के बाद मुझे जल्दी से हालात सुधारने चाहिए थे और खुद को बदलना चाहिए था। लेकिन मैंने सत्य नहीं स्वीकारा या जरा भी आत्म-चिंतन नहीं किया और अपने कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं करने के लिए मैंने खुद को दोष नहीं दिया या मुझे अपराध-बोध नहीं हुआ। बर्खास्त होने से बचने के लिए मैंने अगुआओं का विरोध करने के लिए मिलीभगत कर सभी को उकसाने की हर संभव कोशिश की। परमेश्वर चाहता है कि अगुआ काम की जाँच और निगरानी करें, जो सकारात्मक बात है। लेकिन मैंने प्रतिरोध और विरोध किया। बाहर से ऐसा लग रहा था कि मैं अगुआओं का विरोध कर रही थी, लेकिन असलियत में मैं सत्य से विमुख थी और सकारात्मक चीजों से नफरत करती थी और कलीसिया के काम में बाधा डाल रही थी और गड़बड़ी फैला रही थी। यह देखकर कि मैं सत्य से कितनी विमुख थी और यहाँ तक कि परमेश्वर का विरोध भी कर रही थी, मुझे एहसास हुआ कि मेरा शैतानी स्वभाव कितना भयानक था! मैंने कुछ ऐसे मसीह-विरोधियों के बारे में सोचा जिन्हें कलीसिया से निष्कासित कर दिया गया था। जब उनकी मदद की गई, उन्हें सुधारा गया और उनकी काट-छाँट की गई तो उन्होंने कभी सत्य नहीं स्वीकारा या आत्म-चिंतन नहीं किया। अगर कोई उनके काम की निगरानी करता या उन्हें सुझाव देता तो वे अपमानित महसूस करने के कारण गुस्से में आ जाते और फिर वे उस व्यक्ति को दुश्मन के रूप में देखते। वे हठपूर्वक चिल्लाते और बड़बड़ाते रहते, अंत तक विरोध करते और यहाँ तक कि बुराई भी करते जिससे कलीसिया के काम को गंभीर नुकसान पहुँचता, फिर भी उन्हें कोई पछतावा नहीं होता। आखिरकार उन्हें कलीसिया द्वारा निष्कासित कर दिया गया। यह सब उनकी मसीह-विरोधी प्रकृति के कारण हुआ, जो सत्य से विमुख थी और उससे घृणा करती थी। क्या मैंने उन मसीह-विरोधियों जैसा ही स्वभाव प्रकट नहीं किया? अगर मैं पश्चात्ताप नहीं करती तो देर-सवेर मुझे भी परमेश्वर द्वारा बेनकाब किया और निकाल दिया जाता।

बाद में मैंने यह भी सोचा : मैंने अगुआओं के पर्यवेक्षण का विरोध करने के लिए बहनों को क्यों उकसाया था? इसका मूल कारण क्या था? मैं अपनी खोज में परमेश्वर के वचनों के इस अंश पर आई : “इससे पहले कि लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करें और सत्य को समझें, शैतान की प्रकृति नियंत्रण सँभाल लेती है और उन पर भीतर से प्रभुत्व जमाती है। उस प्रकृति में विशिष्ट रूप से क्या शामिल होता है? उदाहरण के लिए, तुम स्वार्थी क्यों हो? तुम अपने रुतबे की रक्षा क्यों करते हो? तुम अपनी भावनाओं से इतने प्रभावित क्यों होते हो? तुम उन अधार्मिक और बुरी चीजों को क्यों पसंद करते हो? तुम्हें ऐसी चीजें पसंद आने का आधार क्या है? ये चीजें कहाँ से आती हैं? तुम इन्हें पसंद और स्वीकार क्यों करते हो? अब तक, तुम सब लोगों ने यह समझ लिया है : मुख्य कारण यह है कि मनुष्य के भीतर शैतान के जहर भरे हैं। तो शैतान के जहर क्या हैं? इन्हें कैसे व्यक्त किया जा सकता है? उदाहरण के लिए, यदि तुम पूछते हो, ‘लोगों को कैसे जीना चाहिए? लोगों को किसलिए जीना चाहिए?’ तो सभी जवाब देंगे, ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।’ बस यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है। शैतान का फलसफा और तर्क लोगों का जीवन बन गए हैं। लोग चाहे जिसका भी अनुसरण करें, वास्तव में वे यह अपने लिए ही करते हैं—और इसलिए वे सभी अपने लिए जीते हैं। ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए’—यही मनुष्य का जीवन-दर्शन है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। ये शब्द पहले ही भ्रष्ट इंसान की प्रकृति बन गए हैं, और वे भ्रष्ट इंसान की शैतानी प्रकृति की सच्ची तस्वीर हैं। यह शैतानी प्रकृति पूरी तरह से भ्रष्ट मानवजाति के अस्तित्व का आधार बन चुकी है। कई हजार सालों से वर्तमान दिन तक भ्रष्ट मानवजाति ने शैतान के इस जहर के अनुसार जीवन जिया है। शैतान का हर काम अपनी आकांक्षाओं, महत्वाकांक्षाओं और उद्देश्यों के लिए होता है। वह परमेश्वर से आगे जाना चाहता है, परमेश्वर से मुक्त होना चाहता है और परमेश्वर द्वारा रची गई सभी चीजों पर नियंत्रण पाना चाहता है। आज लोग शैतान द्वारा इस हद तक भ्रष्ट कर दिए गए हैं। उन सभी में शैतानी प्रकृति है, उनमें परमेश्वर को नकारने और उसका विरोध करने की प्रवृत्ति होती है और वे अपने भाग्य का नियंत्रण अपने हाथों में रखना चाहते हैं; वे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का विरोध करने की कोशिश करते हैं। उनकी महत्वाकांक्षाएँ और आकांक्षाएँ पहले से ही बिल्कुल शैतान की महत्वाकांक्षाओं और आकांक्षाओं जैसी हैं। इसलिए, मनुष्यों की प्रकृति शैतान की प्रकृति है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मेरे ऐसे बर्ताव का मुख्य कारण मेरी शैतानी प्रकृति, मेरे भीतर का शैतानी स्वभाव था। मैं उस शैतानी फलसफे के अनुसार जीती थी जो कहता है, “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए” और मैं अविश्वसनीय रूप से स्वार्थी और धोखेबाज बन गई थी। मेरी सारी कथनी और करनी खुद को बचाने और अपने हितों की रक्षा के लिए थी। मुझे डर था कि जब अगुआ हमारे काम की निगरानी करेंगे और उन्हें मेरे काम करने के तरीके में कोई समस्या मिलेगी तो मुझे बर्खास्त कर दिया जाएगा। इसलिए मैंने अगुआओं के खिलाफ साजिश रची, उनके विरुद्ध असंतोष के बीज बोए और भाई-बहनों को अपने पक्ष में करके उन्हें मेरे साथ एकजुट होकर अगुआओं की निगरानी का विरोध करने के लिए उकसाया। जिससे अगुआओं को पता चल जाए कि सिर्फ मेरी ही कार्यकुशलता कम नहीं है, बल्कि यह सामूहिक समस्या है। अपने रुतबे की रक्षा के लिए मैंने सोचा कि अगुआओं से कैसे निपटना है और खुद को कैसे बचाना है, जिससे कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचा। जितना मैंने आत्म-चिंतन किया, उतना ही मुझे अपनी मानवता की कमी महसूस हुई। मुझे अपने दिल में गहरा पश्चात्ताप हुआ और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! मैंने बुराई की है और कलीसिया के काम में बाधा डाली है। मैं पूरी तरह से पश्चात्ताप करने, अगुआओं का पर्यवेक्षण और मार्गदर्शन स्वीकारने और सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य ईमानदारी से निभाने के लिए तैयार हूँ।”

परमेश्वर के वचन पढ़ने के माध्यम से मुझे बाद में समझ में आया कि अगुआओं के पर्यवेक्षण और मार्गदर्शन को सही तरीके से कैसे देखना है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यूँ तो आज बहुत-से लोग कर्तव्य निभाते हैं, लेकिन कम ही लोग सत्य का अनुसरण करते हैं। बहुत कम लोग अपने कर्तव्य करने के दौरान सत्य का अनुसरण करते हुए सत्य वास्तविकता में प्रवेश करते हैं; अधिकांश लोगों के काम करने के तरीके में तब भी कोई सिद्धांत नहीं होते, वे अब भी सच्चाई से परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते; वे केवल यह दावा करते हैं कि उन्हें सत्य से प्रेम है, सत्य का अनुसरण करने और सत्य के लिए प्रयास करने के इच्छुक हैं, लेकिन पता नहीं उनका यह संकल्प कितने दिनों तक टिकेगा। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, उनमें किसी भी समय या स्थान पर भ्रष्ट स्वभाव का प्रकाशन हो सकता है। उनमें अपने कर्तव्य के प्रति किसी जिम्मेदारी की भावना नहीं होती, वे अक्सर अनमने होते हैं, मनमर्जी से कार्य करते हैं, यहाँ तक कि काट-छाँट भी स्वीकार करने में अक्षम होते हैं। जैसे ही वे नकारात्मक और कमजोर होते हैं, वे अपने कार्य त्यागने में प्रवृत्त हो जाते हैं—ऐसा अक्सर होता रहता है, यह सबसे आम बात है; सत्य का अनुसरण न करने वाले लोगों का व्यवहार ऐसा ही होता है। और इसलिए, जब लोगों को सत्य की प्राप्ति नहीं होती, तो वे भरोसेमंद और विश्वास योग्य नहीं होते। उनके भरोसेमंद न होने का क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि जब उन्हें कठिनाइयों या असफलताओं का सामना करना पड़ता है, तो बहुत संभव है कि वे गिर पड़ें, और नकारात्मक और कमजोर हो जाएँ। जो व्यक्ति अक्सर नकारात्मक और कमजोर हो जाता है, क्या वह भरोसेमंद होता है? बिल्कुल नहीं। लेकिन जो लोग सत्य समझते हैं, वे अलग ही होते हैं। जो लोग वास्तव में सत्य की समझ रखते हैं, उनके भीतर निश्चित ही परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाला हृदय होता है और जिन लोगों में परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय होता है, केवल वही लोग भरोसेमंद होते हैं; जिनमें परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं होता, वे लोग भरोसेमंद नहीं होते। जिनमें परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं होता, उनके प्रति कैसा रवैया अपनाया जाना चाहिए? उन्हें प्रेमपूर्वक सहायता और सहारा देना चाहिए। जब वे कर्तव्य कर रहे हों, तो उनका अधिक अनुवर्तन करना चाहिए और उन्हें अधिक मदद और निर्देश दिए जाने चाहिए; तभी यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि वे अपना कार्य प्रभावी ढंग से कर पाएँ। और ऐसा करने का उद्देश्य क्या है? मुख्य उद्देश्य परमेश्वर के घर के काम को बनाए रखना है। दूसरा मकसद है समस्याओं की तुरंत पहचान करना, तुरंत उनका पोषण करना, उन्हें सहारा देना, या उनकी काट-छाँट करना, भटकने पर उन्हें सही मार्ग पर लाना, उनके दोषों और कमियों की भरपाई करना। यह लोगों के लिए फायदेमंद है; इसमें दुर्भावनापूर्ण कुछ भी नहीं है। लोगों का पर्यवेक्षण करना, प्रेक्षण करना, और उन्हें समझने की कोशिश करना—यह सब उन्हें परमेश्वर में विश्वास के सही रास्ते में प्रवेश करने में मदद करने के लिए है, ताकि वे परमेश्वर के कहे के मुताबिक और सिद्धांत के अनुसार अपना कर्तव्य कर सकें, ताकि उन्हें किसी प्रकार की गड़बड़ियाँ करने और विघ्न उत्पन्न करने से रोका जा सके, ताकि उन्हें व्यर्थ का कार्य करने से रोका जा सके। ऐसा करने का उद्देश्य पूरी तरह से उनके प्रति और परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति उत्तरदायित्व दिखाने के लिए है; इसमें कोई दुर्भावना नहीं है(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (7))। “परमेश्वर का घर उन लोगों का पर्यवेक्षण, अवलोकन और उन्हें समझने का प्रयास करता है जो कर्तव्य करते हैं। क्या तुम लोग परमेश्वर के घर का यह सिद्धांत स्वीकारने में सक्षम हो? (हाँ।) अगर तुम परमेश्वर के घर द्वारा तुम्हारा पर्यवेक्षण करना, अवलोकन करना और तुम्हें समझने का प्रयास करना स्वीकार सकते हो, तो यह बहुत बढ़िया बात है। यह तुम्हारा कर्तव्य अच्छे से निभाने में, मानक-स्तरीय ढंग से कर्तव्य कर पाने में और परमेश्वर के इरादे पूरे करने में तुम्हारे लिए मददगार है। यह बिना किसी भी नकारात्मक पक्ष के तुम्हें फायदा पहुँचाता है और तुम्हारी मदद करता है। एक बार जब तुम इस सिद्धांत को समझ गए हो तो क्या तुममें अब अपने अगुआओं, कार्यकर्ताओं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की निगरानी के खिलाफ प्रतिरोध या सतर्कता की कोई भावना होनी चाहिए? भले ही कभी-कभी कोई तुम्हें समझने का प्रयास करता हो, तुम्हारा अवलोकन करता हो और तुम्हारे कार्य का पर्यवेक्षण करता हो, यह व्यक्तिगत रूप से लेने वाली बात नहीं है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि जो कार्य अब तुम्हारे हैं, जो कर्तव्य तुम निभाते हो, और कोई भी कार्य जो तुम करते हो, वे किसी एक व्यक्ति के निजी मामले या व्यक्तिगत कार्य नहीं हैं; वे परमेश्वर के घर के कार्य से संबंधित हैं और परमेश्वर के कार्य के एक भाग से संबंध रखते हैं। इसलिए, जब कोई तुम्हारा थोड़ा-सा पर्यवेक्षण या प्रेक्षण करता है या तुम्हें गहराई से समझने की कोशिश करता है, तुम्हारे साथ खुले दिल से बातचीत करने और यह पता लगाने की कोशिश करता है कि इस दौरान तुम्हारी दशा कैसी रही है, यहाँ तक कि कभी-कभी जब उसका रवैया थोड़ा कठोर होता है, और तुम्हारी थोड़ी काट-छाँट करता है, अनुशासित करता और धिक्कारता है, तो वह यह सब इसलिए करता है क्योंकि उसका परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति एक कर्तव्यनिष्ठ और जिम्मेदारी भरा रवैया होता है। तुम्हें कोई नकारात्मक विचार नहीं रखना चाहिए और तुम्हें नकारात्मक भावनाओं के साथ प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए। अगर तुम दूसरों की निगरानी, निरीक्षण और समझने की कोशिश को स्वीकार कर सकते हो, तो इसका क्या मतलब है? यह कि अपने दिल में तुम परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार करते हो। अगर तुम लोगों के द्वारा अपने पर्यवेक्षण, प्रेक्षण और तुम्हें समझने के प्रयासों को स्वीकार नहीं करते और यहाँ तक कि तुम इसका विरोध करते हो—तो क्या तुम परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार करने में सक्षम हो? परमेश्वर की जाँच-पड़ताल लोगों के तुम्हें समझने से ज्यादा विस्तृत, गहन और सटीक होती है; परमेश्वर की अपेक्षाएँ कहीं अधिक विशिष्ट, कठोर और गहन होती हैं। अगर तुम परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा पर्यवेक्षण किया जाना भी स्वीकार नहीं कर सकते, तो क्या तुम्हारे ये दावे कि तुम परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार कर सकते हो, खोखले शब्द नहीं हैं? परमेश्वर की जाँच-पड़ताल और परीक्षा स्वीकार करने में सक्षम होने के लिए तुम्हें पहले परमेश्वर के घर, अगुआओं और कार्यकर्ताओं, या भाई-बहनों द्वारा पर्यवेक्षण स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (7))। परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मुझे एहसास हुआ कि हमारे भीतर शैतानी भ्रष्ट स्वभाव के कारण हम अक्सर मनमर्जी से अपना कर्तव्य निभाते हैं। और हमारे गंभीर घटियापन और आलस के चलते हम अपना कर्तव्य निभाते समय अक्सर लापरवाह होते हैं, नतीजे पाने का प्रयास नहीं करते और कई क्षेत्रों में सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं। इसलिए हमें अपने काम में अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा अधिक पर्यवेक्षण और जाँच की आवश्यकता होती है ताकि सुनिश्चित हो सके कि कलीसिया के काम की हर मद सुचारू रूप से आगे बढ़े। अगुआओं और कार्यकर्ताओं से परमेश्वर यही अपेक्षा करता है—यही उनका काम है। मुझे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के पर्यवेक्षण और मार्गदर्शन के अधीन होना चाहिए था और उन्हें स्वीकारना चाहिए था। मेरा नजरिया भी गलत था, मुझे लगा कि अगुआओं के निरंतर पर्यवेक्षण और विस्तृत पूछताछ से वह समय बर्बाद होगा जिसका उपयोग हम अपना कर्तव्य निभाने में कर सकते हैं, जिससे हमारे काम के नतीजे प्रभावित होंगे। लेकिन असल में अगुआ हमारे काम की विस्तृत समझ चाहते थे ताकि समस्याओं का पता लगाया जा सके, उन्हें सुलझाने में हमारी मदद की जा सके और विचलन सुधारे जा सकें, जिससे हमारा काम अधिक प्रभावी हो सके। यह समय की बर्बादी नहीं थी। उदाहरण के लिए एक बार जब अगुआ हमारे काम की जाँच कर रहे थे तो उन्होंने पाया कि नवागंतुकों के सिंचन में हम में देखभाल और धैर्य की भावना की कमी थी और उनसे हमारी अपेक्षाएँ बहुत ज्यादा थीं। इससे कुछ नवागंतुक नकारात्मक हो गए और उन्होंने अपना कर्तव्य नहीं किया। हमें अपने कर्तव्य करने के दौरान अपने विचलनों का एहसास केवल अगुआओं की संगति और मार्गदर्शन के माध्यम से हुआ। उसके बाद हमने नवागंतुकों की मुश्किलों की ओर निर्देशित परमेश्वर के वचन खोजे ताकि उनके साथ संगति की जा सके, ताकि वे अपने कर्तव्य को करने का अर्थ समझ सकें और हमने उनके असल आध्यात्मिक कद के आधार पर उनके कर्तव्यों के लिए उचित व्यवस्था की। उसके बाद नवागंतुकों की अवस्था में सुधार हुआ और वे सामान्य रूप से अपना कर्तव्य करने में सक्षम हो सके। मैंने देखा कि अगुआओं के पर्यवेक्षण और मार्गदर्शन ने न सिर्फ हमारे काम के नतीजों को नकारात्मक रूप से प्रभावित नहीं किया, बल्कि हमें अपने कर्तव्य करने के लिए सिद्धांत समझने में भी मदद मिली। ये सभी हमारे काम के बारे में अगुआओं और कार्यकर्ताओं से पर्यवेक्षण और मार्गदर्शन स्वीकारने के लाभ थे। मैं समझ गई कि अगुआओं और कार्यकर्ताओं से पर्यवेक्षण स्वीकारना कलीसिया के काम के प्रति एक जिम्मेदार रवैया है और अपने कर्तव्य को करने में अभ्यास का जरूरी सिद्धांत है।

कुछ समय बाद अगुआओं ने मुझे नवागंतुकों के सिंचन कार्य को जारी रखने के लिए कहा और मेरा दिल परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता से भर गया। उसके बाद जब भी अगुआओं ने जाँच की और काम के बारे में मार्गदर्शन दिया तो मैं इतनी प्रतिरोधी नहीं हुई। मैं अगुआओं द्वारा खोजे गए मुद्दों को जोड़ सकी और अपने साथी भाई-बहनों के साथ मिलकर उन पर सक्रियता से चर्चा कर पाई और हमने अपने कर्तव्य में विचलन का सारांश दिया। जैसे-जैसे हमने मौजूदा मुद्दों को और अधिक स्पष्टता से देखा, हमारा काम धीरे-धीरे अधिक प्रभावी होता गया। मुझे वाकई लगा कि अपने कर्तव्य निर्वहन में अच्छे नतीजे पाने के लिए हमें अगुआओं और कार्यकर्ताओं से पर्यवेक्षण और मार्गदर्शन स्वीकारना चाहिए, सत्य के प्रति स्वीकृति का रवैया अपनाना चाहिए और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए। परमेश्वर का धन्यवाद!

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