69. माँ को कैंसर होने का पता चलने के बाद

यांग चेन, चीन

जून 2023 में सुसमाचार कार्य की जरूरतों के चलते मुझे अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ना था। मुझे पता था कि मैं कुछ समय तक वापस नहीं आ पाऊँगी, इसलिए मैंने सोचा कि मैं घर जाऊँगी, अपने माता-पिता को बताऊँगी और इस दौरान कुछ कपड़े भी ले आऊँगी। जब मैं घर पहुँची तो मैंने देखा कि मेरी माँ की बांह में एक ट्यूब लगी थी और उनका चेहरा काफी पीला लग रहा था। मैंने उससे पूछा कि उसे क्या हुआ है तो उसने कहा कि यह कोई बड़ी परेशानी नहीं है और एक छोटी-सी सर्जरी से ठीक हो जाएगी। लेकिन यह कुछ ज्यादा ही गंभीर बात लग रही थी, इसलिए मैंने उसे मेडिकल रिकॉर्ड दिखाने के लिए कहा। रिकॉर्ड में लिखा था कि उसे तीन तरह के घातक ट्यूमर थे। मैं चौंक गई, मेरी माँ को कैंसर था! ये घातक ट्यूमर थे—क्या वह वास्तव में ठीक हो सकती है? अगर इलाज कारगर न रहा तो क्या होगा? मेरे पिता ने मुझसे कहा, “तुम्हारी माँ अभी कीमोथेरेपी करवा रही है और उसके इलाज की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कीमोथेरेपी कैसी चलती है।” मुझे पता था कि यह सब परमेश्वर की अनुमति से हो रहा था और मैं शिकायत नहीं कर सकती थी, इसलिए मैंने अपने हृदय की रक्षा करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की। फिर मेरे पिता ने मुझे बताया कि जब मेरी माँ अस्पताल में बीमार थी तो कैसे मेरा छोटा भाई उसकी देखभाल करने के लिए वहाँ पर था और यहाँ तक कि उसने माँ के मेडिकल बिलों का भुगतान करने के लिए एक और नौकरी भी शुरू कर दी थी। यह सुनकर मैं बहुत व्यथित थी। मैं घर की बड़ी बेटी थी और मुझे ही यह सब सँभालना चाहिए था। लेकिन इसके बजाय मैं कोई भी मदद करने में असमर्थ थी। क्या मेरे माता-पिता यह सोचेंगे कि मुझमें अंतरात्मा की कमी है, मैं संतानोचित नहीं हूँ और उन्होंने मुझे बेकार में ही पाला है? मेरी माँ ने मुझे दिलासा देते हुए कहा, “तुम चिंता मत करो और मत डरो। हम कब तक जीवित रहेंगे यह सब परमेश्वर पर निर्भर है। तुम बस उस पर ध्यान दो जो तुम्हें करना है और मेरी चिंता मत करो।” माँ की बात सुनकर, मैं वहीं रुकना चाहती थी और उनकी देखभाल करना चाहती थी, लेकिन कलीसिया में इतना ज्यादा काम था कि मुझे पता था कि मैं ज्यादा देर घर पर नहीं रह सकती थी। अपनी माँ को ऐसे देखकर, मैं बोल ही नहीं पाई कि मैंने घर से दूर जाकर अपना कर्तव्य निभाने की योजना बनाई है, इसलिए मैं अंततः बिना कुछ बोले ही वहाँ से जल्दी से निकल गई।

रास्ते में मैं बस यही सोच रही थी कि मेरी माँ अस्पताल में बीमार है और उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है और मेरा छोटा भाई मेरी माँ के मेडिकल बिलों का भुगतान करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। मैंने इस बारे में जितना ज्यादा सोचा, उतना ही बुरा महसूस हुआ। मुझे लगा कि बेटी होने के नाते मुझे माँ की बीमारी के समय उसकी देखभाल करनी चाहिए, लेकिन मैं उसकी देखभाल तो कर नहीं पा रही थी, उसकी मदद तो और भी नहीं कर पा रही थी। अगर दूसरे लोग इस बारे में सुनेंगे तो वे मेरे बारे में क्या कहेंगे? क्या वे कहेंगे कि मुझमें अंतरात्मा की कमी है और मैं कृतघ्न हूँ? क्या मेरा छोटा भाई मेरे बारे में शिकायत करेगा? मैं जितना ज्यादा सोचती, उतना ही बुरा महसूस करती और मैं घर छोड़ने और अपना कर्तव्य निभाने का संकल्प पूरी तरह से खो बैठी। मैंने अपने हृदय में परमेश्वर से कहा, “हे परमेश्वर, मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़कर नहीं जा सकती। मेरी माँ को कैंसर है और अगर मैं अभी चली गई तो शायद मैं उसे फिर कभी न देख पाऊँ! मैं यहीं अपना कर्तव्य निभाऊँगी, इस तरह जब मेरे पास खाली समय होगा तो मैं अपनी माँ से मिल सकती हूँ।” उसके बाद मैं अब भी अपना कर्तव्य निभा रही थी, लेकिन मैं अपने मन को शांत नहीं कर पा रही थी। मैं सोचती रही, “मेरी माँ अब कैसी होगी?” मैं घर जाकर उससे मिलने के लिए समय निकालना चाहती थी। मुझे पता था कि मेरी दशा ठीक नहीं है, इसलिए मैंने पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचनों की तलाश की। मुझे यह अंश मिला : “हर अवधि और हर चरण में कलीसिया में कुछ विशेष चीजें घटित होती हैं जो लोगों की धारणाओं के विपरीत होती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बीमार हो जाते हैं, अगुआ और कार्यकर्ता बर्खास्त हो जाते हैं, कुछ लोग प्रकट कर दिए और निकाल दिए जाते हैं, कुछ को जिंदगी और मौत की परीक्षा का सामना करना पड़ता है, कुछ कलीसियाओं में बुरे लोग और मसीह-विरोधी भी होते हैं जो बाधाएँ खड़ी करते हैं, वगैरह। ये चीजें समय-समय पर होती रहती हैं, लेकिन ये संयोगवश बिल्कुल नहीं होती हैं। ये सभी चीजें परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के परिणाम हैं। एक बहुत शांत अवधि में अचानक कई घटनाएँ या असामान्य चीजें घटित हो सकती हैं, जो या तो तुम लोगों के आस-पास हो सकती हैं या व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों के साथ हो सकती हैं और ऐसी घटनाएँ लोगों के जीवन की सामान्य व्यवस्था और सामान्य क्रम को तोड़ देती हैं। बाहर से, ये चीजें लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप नहीं होती हैं, लोग नहीं चाहते कि उनके साथ ऐसी चीजें हों या वे इन्हें घटित होते देखना नहीं चाहते हैं। तो क्या इन चीजों के घटित होने से लोगों को फायदा होता है? ... कुछ भी संयोग से नहीं होता; परमेश्वर हर चीज पर संप्रभुता रखता है और सब कुछ घटित होने की अनुमति देता है। यूँ तो लोग इसे सैद्धांतिक स्तर पर समझ और स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन जब उनके साथ कोई खास घटना घटती है तो वे यह नहीं जानते कि क्या यह कोई ऐसी चीज है जिस पर परमेश्वर संप्रभुता का प्रयोग कर रहा है या उसने इसकी अनुमति दी है और वे यह भी नहीं जानते कि इसे परमेश्वर से कैसे स्वीकार करें या उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति कैसे समर्पण करें। क्या यह एक व्यावहारिक समस्या नहीं है? इसी विषय में वे सत्य छिपे हैं जो लोगों को खोजने चाहिए और वे सत्य सिद्धांत निहित हैं जो उन्हें समझने चाहिए। यदि लोग केवल सैद्धांतिक रूप से परमेश्वर की संप्रभुता को स्वीकारते हैं, पर इसकी वास्तविक समझ नहीं रखते और उनकी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं का समाधान नहीं हुआ है, तो चाहे उन्होंने कितने ही वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा हो और चाहे उन्होंने कितनी ही चीजों का अनुभव किया हो, फिर भी वे अंत में सत्य प्राप्त नहीं कर पाएँगे(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (11))। परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मुझे एहसास हुआ कि लोग अपने जीवन के विभिन्न चरणों में कठिन परिस्थितियों का सामना करेंगे। हो सकता है कि लोग ऐसी परिस्थितियों का सामना न करना चाहें, लेकिन इनमें परमेश्वर का इरादा होता है। अगर हम सत्य की खोज नहीं करते, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में जीते हैं, परमेश्वर को गलत समझकर उसके बारे में शिकायत करते हैं तो इन परिस्थितियों से सबक सीखना मुश्किल होगा। अपनी माँ के बीमार पड़ने से मैं सबक सीख सकती थी। मुझे सत्य खोजना और आत्म-चिंतन करना चाहिए था। मैंने विचार किया कि जब मैंने सुना कि मेरी माँ को कैंसर है तो कैसे मुझे चिंता हुई कि इलाज काम नहीं करेगा। मुझे यह भी चिंता थी कि अगर मैं अस्पताल में कीमोथेरेपी करवाते समय उसकी देखभाल नहीं करूँगी तो वह दुखी हो जाएगी। क्या उसे लगेगा कि उसने मुझे बेकार में ही पाला है? इसी चिंता में मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ने का सारा संकल्प तुरंत गँवा बैठी। यहाँ तक कि मैंने अपने दिल में परमेश्वर से बहस भी की। मुझे लगा कि अब मुझे यहीं रुक कर अपनी माँ की देखभाल करनी चाहिए क्योंकि वह बीमार है और मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर नहीं छोड़ सकती। मेरे लगाव बहुत गहरे थे और इसके समाधान के लिए मुझे सत्य खोजना था।

बाद में मैंने पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचनों के प्रासंगिक अंशों की तलाश की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “गैर-विश्वासी दुनिया में एक कहावत है : ‘कौए अपनी बूढ़ी हो रहीं माँओं को खाना खिलाते हैं और मेमने अपनी माँओं का दूध पीने के लिए घुटने टेकते हैं।’ एक कहावत यह भी है : ‘जो व्यक्ति संतानोचित नहीं है, वह किसी पशु से बदतर है।’ ये कहावतें कितनी आडंबरपूर्ण लगती हैं! असल में, पहली कहावत में जिन परिघटनाओं का जिक्र है—‘कौए अपनी बूढ़ी हो रहीं माँओं को खाना खिलाते हैं और मेमने अपनी माँओं का दूध पीने के लिए घुटने टेकते हैं’—वे सचमुच होती हैं, वे तथ्य हैं। लेकिन वे सिर्फ प्राणी जगत में पाई जाने वाली परिघटनाएँ हैं। वे महज एक प्रकार के नियम हैं जिन्हें परमेश्वर ने विभिन्न जीवित प्राणियों के लिए बनाया है। मनुष्य सहित सभी प्रकार के जीवित प्राणी इस नियम का पालन करते हैं, और यह आगे पुष्टि करता है कि सभी जीवित प्राणी परमेश्वर द्वारा बनाए गए हैं। कोई भी जीवित प्राणी न तो इस नियम को तोड़ सकता है, न इसके पार जा सकता है। ... लोग ऐसी बातें क्यों करते हैं? इस वजह से कि समाज में और लोगों के समुदायों में ऐसे विभिन्न विचार और आमतौर पर अपनाए गए दृष्टिकोण हैं जो गलत होते हैं। इन चीजों से लोगों के प्रभावित हो जाने, क्षय होने और सड़-गल जाने के बाद उनके भीतर माता-पिता और बच्चे के रिश्ते की व्याख्या करने और उससे निपटने के अलग-अलग तरीके पैदा होते हैं, और आखिरकार वे अपने माता-पिता से लेनदारों जैसा बर्ताव करते हैं—ऐसे लेनदार जिनका कर्ज वे पूरी जिंदगी नहीं चुका सकेंगे। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने माता-पिता के निधन के बाद पूरी जिंदगी अपराधी महसूस करते हैं, इस बात के लिए अपराध बोध महसूस करते हैं कि वे अपने माता-पिता की दयालुता का बदला नहीं चुका पाए, क्योंकि कभी उन्होंने कुछ ऐसा काम किया जिससे उनके माता-पिता खुश नहीं हुए या वे उस राह पर नहीं चले जो उनके माता-पिता चाहते थे। मुझे बताओ, क्या यह अनावश्यक नहीं है? लोग अपनी भावनाओं के बीच जीते हैं, तो इन भावनाओं से उपजने वाले तरह-तरह के विचारों से ही वे अतिक्रमित और परेशान हो सकते हैं। लोग एक ऐसे माहौल में जीते हैं जो भ्रष्ट मानवजाति की विचारधारा से रंगा होता है, इसलिए वे विभिन्न भ्रामक विचारों से अतिक्रमित और परेशान होते हैं, जो उनके जीवन को थकाऊ और दूसरे जीवित प्राणियों से कम सरल बना देता है। लेकिन अभी चूँकि परमेश्वर कार्यरत है और लोगों को इन तमाम तथ्यों का सत्य बताने और उन्हें सत्य समझने योग्य बनाने के लिए सत्य व्यक्त कर रहा है, इसलिए सत्य को समझ लेने के बाद ये भ्रामक विचार और दृष्टिकोण तुम पर बोझ नहीं बनेंगे और फिर तुम उन्हें मार्गदर्शक के रूप में इस्तेमाल नहीं करोगे जो तुम्हें बताए कि अपने माता-पिता के साथ तुम्हें अपना रिश्ता कैसे सँभालना चाहिए। तब तुम जीवन में सुकून महसूस करोगे। जीवन में सुकून महसूस करने का यह अर्थ नहीं है कि तुम यह नहीं जानते कि तुम्हारी जिम्मेदारियाँ और दायित्व क्या हैं—तुम अब भी ये चीजें जानते हो। यह बस इस पर निर्भर करता है कि तुम अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों से पेश आने के लिए कौन-से परिप्रेक्ष्य और तरीके चुनते हो। एक रास्ता भावनाओं की राह पकड़ना और इन चीजों के साथ एक भावना-प्रेरित तरीके के आधार पर पेश आना और उन तरीकों, विचारों और दृष्टिकोणों के आधार पर पेश आना है जिनकी ओर मनुष्य को शैतान ले जाता है। दूसरा रास्ता इन चीजों से परमेश्वर द्वारा मनुष्य को सिखाए गए वचनों के आधार पर निपटना है। लोग जब शैतान के भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों के अनुसार इन मामलों को सँभालते हैं तो वे बस अपनी भावनाओं की उलझनों में ही जी सकते हैं और वे कभी भी सही-गलत में फर्क नहीं कर पाते हैं। इन हालात में, वे केवल जाल में फँसकर जी सकते हैं, वे हमेशा ‘तुम सही हो, मैं गलत। तुमने मुझे ज्यादा दिया है, मैंने तुम्हें कम दिया। तुम कृतघ्न हो। तुम हद से बाहर जा चुके हो’ के मामलों में उलझे रहते हैं, इत्यादि—वे खुद को निकाल नहीं पाते। हालाँकि, लोगों के सत्य समझने के बाद वे अपने भ्रामक विचारों, दृष्टिकोणों और अपनी भावनाओं के जाल से खुद को छुड़ा लेते हैं और जब वे इन मामलों को फिर से देखते हैं, सबकुछ कहीं अधिक सरल हो जाता है। अगर तुम सत्य सिद्धांतों के किसी पहलू या किसी ऐसे विचार और नजरिए का पालन करते हो जो सही है और परमेश्वर से आता है, तो तुम जीवन में वास्तव में सुकून महसूस करोगे। तुम अपने माता-पिता से अपने रिश्ते को कैसे सँभालते हो, इसमें अब न तो जनमत रुकावट बनेगा, न तुम्हारे जमीर की जागरूकता और न ही तुम्हारी भावनाओं का बोझ; इसके बजाय, ये सत्य सिद्धांत तुम्हें इस योग्य बना देंगे कि तुम इस रिश्ते का सही और तार्किक ढंग से सामना कर सको और इसे सँभाल सको। अगर तुम परमेश्वर द्वारा मनुष्य को दिए गए सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हो, तो भले ही लोग पीठ पीछे तुम्हारी आलोचना करें, फिर भी तुम अपने दिल की गहराई में शांति और सुरक्षित महसूस करोगे और अप्रभावित रहोगे। कम-से-कम अपने दिल की गहराई में तुम खुद को धिक्कारोगे नहीं, खुद को यह नहीं कहोगे कि तुम एक बेपरवाह एहसान-फरामोश या अब और यह महसूस नहीं करोगे कि तुम्हारी अंतरात्मा तुम्हें कोस रही है। यह इसलिए कि तुम यह जान लोगे कि तुम्हारे सारे कार्य परमेश्वर द्वारा तुम्हें सिखाए गए तरीकों के अनुसार किए जाते हैं, तुम परमेश्वर के वचनों को सुनते और उनके प्रति समर्पण करते हो, और उसके मार्ग का अनुसरण करते हो। परमेश्वर के वचन सुनना और उसके मार्ग पर चलना ही अंतरात्मा की वह भावना है जो लोगों में सबसे ज्यादा होनी चाहिए। ये चीजें कर सकने पर ही तुम एक सच्चे व्यक्ति होगे। अगर तुमने यह नहीं किया है तो तुम एक बेपरवाह एहसान-फरामोश हो। क्या बात यही नहीं है? (यही है।)” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (17))। परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मुझे एहसास हुआ कि मैं इतनी दुखी इसलिए थी क्योंकि मेरे विचार भ्रामक थे, जैसे “संतानोचित धर्मनिष्ठा का गुण सबसे ऊपर रखना चाहिए” और “जो व्यक्ति संतानोचित नहीं है, वह किसी पशु से बदतर है,” शैतान ने ये विचार मेरे मन में भर दिए थे, वे मेरे मन के अंदर गहराई से जड़ जमा चुके थे। मुझे लगा कि अगर मैं अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित नहीं हो सकती तो इसका मतलब है कि मैं एक कृतघ्न, गैर-संतानोचित बेटी हूँ। मुझे लगा कि मुझे पालना मुश्किल रहा होगा, खासकर इसलिए कि मैं ऐसे युग में पैदा हुई थी जहाँ लड़कों और पुरुषों को श्रेष्ठ माना जाता था, जिसका मतलब था कि मेरी माँ को बहुत अपमान और तिरस्कार सहना पड़ा था क्योंकि मैं लड़की थी, लेकिन वह मुझे मेरे छोटे भाई से भी ज्यादा प्यार करती थी। वह मेरी आस्था और कर्तव्य का भी खास तौर से समर्थन करती थी। वह जानती थी कि मेरा लगाव बहुत गहरा है, इसलिए अगर घर पर कुछ होता था तो वह मुझे नहीं बताती थी, उसे डर था कि कहीं मेरा ध्यान भंग न हो जाए और मेरे कर्तव्य पर असर न पड़े। चाहे भावनात्मक दृष्टिकोण से या वित्तीय दृष्टिकोण से, मेरी माँ ने मेरा बहुत साथ दिया और वह अक्सर मुझे अपना कर्तव्य उचित तरीके से करने के लिए प्रोत्साहित करती थी। यह सब सोचकर और कैसे उसके बीमार होने पर मैं उसकी देखभाल करने के लिए उसके पास नहीं रह सकी, मुझे बहुत दुख हुआ। मैंने हमेशा सोचा कि उनकी बेटी होने के नाते, अगर मैं उनका सम्मान नहीं करती या जब वे बीमार होते हैं तो उनकी देखभाल नहीं करती तो यह उनके प्रति गैर-संतानोचित, कृतघ्न व्यवहार होगा। इसलिए मुझे उनका सामना करने पर अपराध बोध और शर्म महसूस हुई। मैं शैतानी जहर से गहराई तक प्रभावित हो चुकी थी! अगर मैं इसे लगाव और पारंपरिक विचारों के नजरिए के चश्मे से देखती रहती तो मुझे यह वैचारिक बोझ उठाना पड़ता, यह सोचकर कि मैं अपनी माँ की देखभाल न करने की वजह से गैर-संतानोचित हूँ। यह जीने का एक बहुत ही थकाऊ और दयनीय तरीका होता। मुझे सक्रिय रूप से यह सब त्यागना था और लोगों और चीजों को परमेश्वर के वचनों में सत्य के अनुरूप देखना सीखना था, तभी मैं खुद को इस पीड़ा से मुक्त कर पाती।

बाद में आध्यात्मिक भक्ति के दौरान मुझे परमेश्वर के वचनों का यह अंश मिला। इससे मुझे अपने माता-पिता के साथ अपने रिश्ते से पेश आने के बारे में अधिक स्पष्टता मिली। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “एक बच्चे के तौर पर तुम्हें समझना चाहिए कि तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे लेनदार नहीं हैं। अगर तुम अपने माता-पिता की दयालुता का कर्ज चुकाने पर ही ध्यान देते हो यह ऐसे बहुत सारे कर्तव्यों के आड़े आएगा जो तुम्हें निभाने चाहिए। ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जो तुम्हें अपने जीवन में अवश्य ही करनी चाहिए और तुम्हारे लिए वांछनीय ये कर्तव्य ऐसी चीजें हैं जो एक सृजित प्राणी को करनी चाहिए और जो तुम्हें सृष्टिकर्ता ने सौंपी हैं और इनका तुम्हारे माता-पिता के उपकार का कर्ज चुकाने के साथ कोई लेना-देना नहीं है। अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा दिखाना, उनका कर्ज चुकाना, उनके उपकार का बदला चुकाना—इन चीजों का तुम्हारे जीवन के उद्देश्य से कोई लेना-देना नहीं है। यह भी कहा जा सकता है कि तुम्हारे लिए अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा दिखाना, उनका कर्ज चुकाना या उनके प्रति अपनी कोई भी जिम्मेदारी पूरी करना जरूरी नहीं है। दो टूक शब्दों में कहें तो जब तुम्हारे हालात इजाजत दें, तुम यह थोड़ा-बहुत कर सकते हो और अपनी थोड़ी-सी जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकते हो; जब हालात इजाजत न दें तो तुम्हें ऐसा करने के लिए खुद को मजबूर करने की जरूरत नहीं है। अगर तुम अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा दिखाने की अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सकते हो तो यह कोई बड़ी गलती नहीं है, यह बस तुम्हारे जमीर और नैतिक न्याय के थोड़ा खिलाफ है और कुछ लोग तुम्हारी निंदा करेंगे—बस इतना ही। लेकिन कम से कम, यह सत्य के खिलाफ नहीं है। अगर यह अपना कर्तव्य निभाने और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने की खातिर है तो तुम परमेश्वर द्वारा अनुमोदित तक किए जाओगे। इसलिए जहाँ तक अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होने की बात है, अगर तुम सत्य को समझते हो और लोगों के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझते हो तो भले ही तुम्हारी स्थितियाँ तुम्हें माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होने की अनुमति न दें, तुम्हारा जमीर तुम्हें नहीं कोसेगा। अब जबकि तुम लोग सत्य के इस पहलू को समझ चुके हो तो क्या तुम्हारे दिल स्थिर महसूस नहीं करते हैं? (हाँ।) कुछ लोग कहते हैं : ‘यूँ तो परमेश्वर मुझे दोषी नहीं ठहराएगा, लेकिन अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्य न निभा पाने के कारण मेरा जमीर मुझे कचोटता है और मैं बेचैन रहता हूँ।’ ऐसे में तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, तुम अभी भी सत्य को नहीं समझते और इस मामले के सार को आर-पार नहीं देख सकते। तुम यह नहीं समझते कि मनुष्य की नियति परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन है और तुम परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं को स्वीकार करने को तैयार नहीं हो। तुम्हारे पास हमेशा अपना संकल्प और अपनी अनुभूतियाँ होती हैं और तुम हमेशा अपने माता-पिता के साथ रहकर अपने संतानोचित कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहते हो। तुम्हारा अपना संकल्प और अनुभूतियाँ तुम्हें निर्देशित और नियंत्रित कर रही हैं; वे तुम्हारा जीवन बन गई हैं। अगर तुम अपने संकल्प और अपनी अनुभूतियों के आधार पर काम करना चुनते हो तो तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर रहे हो या उसके प्रति समर्पण नहीं कर रहे हो, तुम सत्य के साथ विश्वासघात कर रहे हो। तुम्हारी परिस्थितियाँ और तुम्हारा परिवेश स्पष्ट रूप से तुम्हें अपने माता-पिता के साथ रहकर अपने संतानोचित कर्तव्य अच्छे से निभाने की अनुमति नहीं देते, लेकिन तुम फिर भी हमेशा खुद को अपने माता-पिता का कर्जदार महसूस करते हो और अपने दिल में तुम इन चीजों को कभी त्याग नहीं पाते हो। यह एक चीज को साबित करता है : तुम सत्य को स्वीकार नहीं करते। सैद्धांतिक स्तर पर तुम यह तो मानते हो कि परमेश्वर के वचन सही हैं, लेकिन तुम उन्हें सत्य के रूप में स्वीकार नहीं करते और उन्हें अपने क्रियाकलापों के सिद्धांतों के रूप में इस्तेमाल नहीं करते हो। इसलिए तुम अपने माता-पिता के साथ जैसे पेश आते हो, कम से कम उससे आँकें तो तुम सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति नहीं हो। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इस मामले में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास नहीं करते हो, बल्कि अपनी अनुभूतियों और अपने जमीर की अपेक्षाओं को पूरा करने पर तुले रहते हो, अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित कर्तव्य निभाने और उनकी दयालुता का बदला चुकाने पर जोर देते हो। यूँ तो परमेश्वर यह विकल्प चुनने के लिए तुम्हें दोषी नहीं ठहराता है, लेकिन अंत में इसके परिणामस्वरूप तुम्हारे जीवन को ही नुकसान होगा(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (17))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मेरे मन में बहुत अधिक स्पष्टता आ गई। मैंने देखा कि जिस तरह से मेरे माता-पिता ने मेरा पालन-पोषण किया था, वह सब परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के कारण था। मेरी माँ का दयालु व्यवहार वास्तव में परमेश्वर का अनुग्रह था। आस्था में प्रवेश करने के बाद मेरी माँ ने मेरा बहुत समर्थन किया ताकि मैं शांति से अपना कर्तव्य निभा सकूँ। बाहरी तौर पर यह मेरी माँ की दयालुता लग सकती है, लेकिन वास्तव में यह इसलिए था क्योंकि परमेश्वर मेरा आध्यात्मिक कद जानता था और वह मेरी जरूरतों के अनुसार व्यवस्था करता था। यह मेरी माँ का कर्तव्य और जिम्मेदारी थी कि वह मेरी आस्था में मेरा साथ दे। परमेश्वर कहता है कि हमारे माता-पिता हमारे लेनदार नहीं हैं, अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित होना सिर्फ एक जिम्मेदारी और दायित्व है, न कि लोगों के रूप में हमारा मिशन। अगर परिस्थितियाँ सही हैं तो हम उनकी देखभाल कर सकते हैं और उनके प्रति संतानोचित धर्मनिष्ठा दिखा सकते हैं, लेकिन अगर परिस्थितियाँ सही नहीं हैं और हम ऐसा नहीं कर पाते तो यह कोई अपमान की बात नहीं है, क्योंकि इस जीवन में हमें बहुत-सी चीजें करनी हैं। हमारे पास ऐसे कर्तव्य हैं जो हमें सृजित प्राणियों के रूप में करने चाहिए और हम सिर्फ अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित धर्मनिष्ठा दिखाने के लिए नहीं जी सकते। ऐसे कई गैर-विश्वासी भी हैं जो अपने करियर और परिवार के कारण अपने माता-पिता से बहुत समय तक दूर रहते हैं और अपने माता-पिता की देखभाल करने में असमर्थ होते हैं, लेकिन लोग यह बात समझते हैं और उनकी निंदा या उनका उपहास नहीं करते। जहाँ तक मेरी बात है, मैं अपने माता-पिता के प्रति कृतज्ञता में डूबी हुई थी और अक्सर उनकी देखभाल करने के लिए उनके साथ नहीं रह पाने के कारण व्यथित और खुद को दोषी महसूस करती थी और यहाँ तक कि अपने कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ने का विकल्प भी नहीं चुनती थी। मेरे लगाव बहुत तीव्र थे! हम ऐसे समय में थे जब सुसमाचार बहुत फैल रहा था और कलीसिया के एक अगुआ के रूप में मुझे परमेश्वर के इरादे के प्रति और भी अधिक विचारशील होना चाहिए था। मुझे अपने भाई-बहनों की परमेश्वर के अंत के दिनों के सुसमाचार की गवाही देने के लिए अगुआई करनी चाहिए और भी अधिक लोगों को परमेश्वर की आवाज सुनने और अंत के दिनों में उसका उद्धार प्राप्त करने देना चाहिए। यह मेरा कर्तव्य और मेरी जिम्मेदारी थी। लेकिन इसके बजाय मैंने माना कि अपने माता-पिता की देखभाल करना और उनका सम्मान करना सबसे महत्वपूर्ण काम है जो मैं कर सकती हूँ। मैं वर्षों से विश्वासी थी और परमेश्वर के वचनों को बहुत खाती-पीती थी, लेकिन जब असली स्थिति का सामना करना पड़ा तो मैं परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने, अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने या सत्य सिद्धांतों का इस्तेमाल कर स्थिति को सँभालने में असमर्थ थी। मैं विश्वासघात कर रही थी और सत्य को स्वीकार करने में नाकाम हो रही थी! मुझे एहसास हुआ कि अगर मैं इस पारंपरिक सोच और विचारों के अनुसार जीना जारी रखती हूँ और परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप नहीं करती हूँ और अपना कर्तव्य अच्छे से नहीं निभाती हूँ तो मैं अंततः बेनकाब कर दी जाऊँगी और निकाल दी जाऊँगी। मैंने अपने हृदय में परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! मेरी माँ की बीमारी ने मेरे अविश्वासी दृष्टिकोण को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है। अब मैं देख पा रही हूँ कि मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और मुझमें सत्य वास्तविकता की कमी है। अब मैं समझ गई हूँ कि अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित धर्मनिष्ठा दिखाना मेरा मिशन नहीं है। एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को अच्छे से निभाना मेरा सच्चा मिशन और जिम्मेदारी है। मैं अपने भ्रामक विचारों को त्यागने और अपनी माँ की बीमारी को तुम्हारे हाथों में सौंपने के लिए तैयार हूँ। चाहे कुछ भी हो, मैं अपना कर्तव्य निभाती रहूँगी और शैतान की हँसी का पात्र नहीं बनूँगी।” प्रार्थना के बाद मैं कहीं अधिक सहज हो गई और खुद को मिला कर्तव्य अच्छे से निभाने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करने के लिए तैयार थी।

कुछ समय बाद मैंने एक चीनी चिकित्सा पद्धति के डॉक्टर से सलाह ली और उनसे मेरी माँ का इलाज करने के लिए कहा। डॉक्टर ने कहा, “कैंसर पहले ही उसके पूरे शरीर में फैल चुका है और इसका इलाज नहीं किया जा सकता है। मैं बस इतना कर सकता हूँ कि उसे एक पखवाड़े तक जड़ी-बूटियाँ दूँ और देखूँ कि क्या असर होता है।” जब मैंने देखा कि वह किस निष्कर्ष पर पहुँचा तो मेरा दिल बैठ गया। मैंने सोचा कि जब मैं घर आई थी और अपनी माँ को खाँसते हुए देखा था तो मैं उसे कभी अस्पताल नहीं ले गई थी और बस उसे कुछ चीनी जड़ी-बूटियाँ लाकर दे दी थीं और इतना ही किया था। अगर मैं उसे शुरू में ही अस्पताल ले जाती और उसका इलाज जल्दी करवाती तो क्या हालात ऐसे ही होते? जितना अधिक मैंने सोचा, मैं उतनी ही अधिक व्यथित और अपराध बोध से भर गई और मैं बहुत हताश हो गई। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह मुझे उस दशा से बाहर निकलने के लिए मार्गदर्शन करे। बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा : “तुम्हारे माता-पिता का गंभीर रूप से बीमार पड़ना या किसी बड़ी विपत्ति का सामना करना ऐसी चीज है जो उन्हें अनुभव करनी ही है। मनुष्य के जीवन में जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु का अनुभव करना और छोटी-बड़ी तरह-तरह की बातों का सामना करना बहुत सामान्य है। अगर तुम एक वयस्क हो तो तुम्हें इन मामलों को शांत और सही ढंग से देखना चाहिए। अपने माता-पिता की देखभाल न कर पाने के कारण खुद को बहुत ज्यादा दोष मत दो या बहुत ज्यादा कर्जदार महसूस मत करो और इससे भी बढ़कर, इस मामले में बहुत ज्यादा ऊर्जा मत लगाओ, जिससे तुम्हारे सत्य के अनुसरण और तुम्हारे कर्तव्य के उचित निर्वहन पर असर पड़े। कुछ लोग सोचते हैं कि माता-पिता अपने बच्चों की याद सताने के कारण बीमार पड़ते हैं। क्या ऐसा है? कुछ लोगों के बच्चे साल भर उनके साथ रहते हैं, फिर भी क्या वे बीमार नहीं पड़ते हैं? लोगों को जीवन में कब और कौन-सी बीमारियाँ होती हैं, यह सब परमेश्वर के हाथ के आयोजन हैं और इसका इससे कोई लेना-देना नहीं है कि उनके बच्चे उनके साथ हैं या नहीं। अगर परमेश्वर ने तुम्हारे माता-पिता के भाग्य में बीमार पड़ना तय नहीं किया है तो अगर तुम उनके साथ नहीं भी हो तो भी उन्हें कुछ नहीं होगा। अगर उनके जीवन में किसी बीमारी या बड़ी विपत्ति का सामना करना तय है तो तुम उनके साथ रहकर भी इसमें क्या बदल सकते हो? वे फिर भी इसे टाल नहीं पाएँगे, है न? (हाँ।) बस इतना है कि उनके बच्चे होने के नाते चूँकि तुम्हारा अपने माता-पिता के साथ खून का रिश्ता है तो जब तुम उनके बीमार होने के बारे में सुनोगे तो तुम परेशान हो जाओगे। यह बहुत सामान्य है। लेकिन तुम्हें इस पर मनन करने की जरूरत नहीं है कि अपने माता-पिता को उनके दर्द से कैसे छुटकारा दिलाया जाए या उनकी मुश्किलें कैसे हल की जाएँ क्योंकि वे बीमारी या बड़ी विपत्ति का सामना कर रहे हैं। तुम्हारे माता-पिता इस तरह की चीजों का अनुभव कई बार कर चुके हैं। अगर परमेश्वर उन्हें इन मसलों से छुटकारा दिलाने के लिए किसी परिवेश का आयोजन करता है तो देर-सबेर वे पूरी तरह से गायब हो जाएँगे। अगर ये मुद्दे उनके लिए जीवन की बाधाएँ हैं और ये ऐसी चीजें हैं जिनका उन्हें अनुभव करना ही है, तो वे उनसे बच नहीं सकते और यह परमेश्वर पर निर्भर है कि उन्हें कब तक इनका अनुभव करना है; लोग इसे बदल नहीं सकते हैं। अगर तुम अपनी ताकत के भरोसे इन मसलों को हल करना चाहते हो और उनके कारणों और परिणामों का विश्लेषण और जाँच करना चाहते हो तो यह एक मूर्खतापूर्ण विचार है और यह अनावश्यक है। तुम्हें इस तरह से पेश नहीं आना चाहिए। तुम्हें उनकी मदद के लिए लोगों को खोजने या सबसे अच्छे डॉक्टर खोजने या सबसे अच्छे अस्पताल के बिस्तर का बंदोबस्त करने में बहुत ज्यादा ऊर्जा खर्च करने की जरूरत नहीं है—तुम्हें इन सब चीजों को करने में अपना दिमाग खपाने की जरूरत नहीं है। अगर तुम्हारे पास सच में कुछ ज्यादा ऊर्जा है, तो तुम्हें अभी जो कर्तव्य निभाना है उसे बढ़िया ढंग से करना चाहिए। तुम्हारे माता-पिता का अपना अलग भाग्य है। कोई भी उस उम्र से बच नहीं सकता जब उसे मरना है। तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे भाग्य के विधाता नहीं हैं, और उसी तरह से तुम अपने माता-पिता के भाग्य के विधाता नहीं हो। अगर उनके भाग्य में उन्हें कुछ होना लिखा है, तो तुम उस बारे में क्या कर सकते हो? व्याकुल होकर और समाधान खोजकर तुम कौन-सा प्रभाव हासिल कर सकते हो? इससे कुछ भी हासिल नहीं हो सकता; यह परमेश्वर के इरादों पर निर्भर करता है। अगर परमेश्वर उन्हें इस दुनिया से ले जाना चाहता है ताकि तुम्हें घर की कोई चिंता न रहे और तुम शांत मन से अपना कर्तव्य निभा सको तो क्या तुम इसमें दखल दे सकते हो? क्या तुम परमेश्वर के सामने शर्तें रख सकते हो? इस समय तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। अगर कोई समाधान निकालने के लिए अपना दिमाग खपाता है, जाँच करता है, विश्लेषण करता है और खुद को दोष देता है, अपने माता-पिता के प्रति अपराध-बोध महसूस करता है तो क्या ये ऐसे विचार और क्रियाकलाप हैं जो एक व्यक्ति के होने चाहिए? (नहीं।) ये तमाम अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर और सत्य के प्रति समर्पण के अभाव की हैं; ये अतार्किक, बुद्धिहीन और परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। लोगों में ये अभिव्यक्तियाँ नहीं होनी चाहिए। क्या तुम समझे? (हाँ।)” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (17))। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर योजना बनाता है कि लोग किन कठिनाइयों का सामना करेंगे और अपनी आवश्यकताओं और आध्यात्मिक कद के आधार पर उन्हें कितनी पीड़ा सहनी होगी। जैसे लोग कब किसी खास परिस्थिति का सामना करेंगे और उन्हें कितने समय तक सहना होगा, यह सब परमेश्वर द्वारा शासित और व्यवस्थित है। इसमें से कुछ भी मानवजाति द्वारा तय नहीं किया जा सकता है, इन चीजों का विश्लेषण महज इंसानी नजरिए से बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए। लोगों को परमेश्वर से स्वीकार करना और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना सीखना चाहिए। मेरी माँ की बीमारी को ही लो, ऊपरी तौर पर ऐसा लग सकता है कि उसकी हालत इसलिए बिगड़ गई क्योंकि उसे जल्दी अस्पताल नहीं ले जाया गया, लेकिन वास्तव में यह उसकी किस्मत थी। मनुष्य का जीवन और उसकी मृत्यु पूरी तरह से परमेश्वर के हाथ में है। अगर परमेश्वर अनुमति नहीं देता है तो बड़े पैमाने पर होने वाले महाविनाश भी लोगों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। जैसे कि मेरे पिता एक भयानक कार दुर्घटना के शिकार हो गए, सभी सहयात्री बुरी तरह घायल हो गए लेकिन मेरे पिता को बस हल्की चोटें आईं और वह सबसे जल्दी ठीक हो गए। अपने जीवन में हम अपने मिशन पूरे कर रहे हैं। अगर किसी ने जीवन में अपना मिशन पूरा कर लिया है तो वह परमेश्वर की बनाई योजना के अनुसार इस दुनिया से चला जाएगा। अगर उन्होंने अपना मिशन पूरा नहीं किया है तो चाहे उन्हें कितनी भी कठिनाई का सामना करना पड़े, वे सुरक्षित रूप से इससे बाहर निकल जाएँगे। मेरी माँ की बीमारी काफी गंभीर थी और डॉक्टर ने कहा था कि वह ठीक नहीं हो सकती, लेकिन वह कितने समय तक जीवित रहेगी, यह कोई साधारण व्यक्ति तय नहीं कर सकता, यह परमेश्वर के नियंत्रण में होगा और वही इसकी व्यवस्था करेगा। मैं इतनी दुखी इसलिए थी क्योंकि मैं परमेश्वर से असाधारण इच्छाएँ और माँगें कर रही थी और मैं हमेशा चाहती थी कि मेरी माँ ठीक हो जाए। जैसे ही चीजें मेरे हिसाब से नहीं होती थीं, मैं नकारात्मक और दुखी हो जाती थी। यह सब इसलिए था क्योंकि मैं परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जानती थी और परमेश्वर के सामने समर्पण नहीं कर सकती थी। परमेश्वर के इरादे को समझने के बाद, मैंने उससे प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! यह तय करना मेरा काम नहीं है कि मेरी माँ कैसे ठीक होगी या वह कितने समय तक जीवित रहेगी। मुझे अपनी माँगों को एक तरफ रख देना चाहिए और चाहे कुछ भी हो मैं समर्पण करने के लिए तैयार हूँ।” प्रार्थना के बाद मुझे शांति और सुकून का एहसास हुआ। फिर मैंने प्रभु यीशु के वचनों का यह अंश पढ़ा : “यदि कोई मेरे पास आए, और अपने पिता और माता और पत्नी और बच्‍चों और भाइयों और बहिनों वरन् अपने प्राण को भी अप्रिय न जाने, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता(लूका 14:26)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अगर अपने माता-पिता के लिए तुम्हारा प्यार परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम से अधिक है तो तुम परमेश्वर का अनुसरण करने योग्य नहीं हो, तुम उसके अनुयायियों में शामिल नहीं हो। यह भी कहा जा सकता है कि तुम एक विजेता नहीं हो और परमेश्वर तुम्हें नहीं चाहता है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (17))। परमेश्वर ने कहा है कि जो लोग अपने माता-पिता को उससे ज्यादा प्रेम करते हैं, वे उसके अनुयायी होने के योग्य नहीं हैं। मुझे शैतान द्वारा मेरे अंदर डाले गए इन भ्रामक विचारों के अनुसार जीना बंद करना होगा। मुझे अलग तरह से जीना शुरू करना होगा, परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार लोगों और चीजों को देखना और आचरण और कार्य करना होगा। अब मैंने धीरे-धीरे अपने कर्तव्य में मन लगाना शुरू कर दिया है। मुझे अभी भी कभी-कभी अपनी माँ के बारे में चिंता होती है, लेकिन फिर मुझे लगता है कि उसके जीवन में, वह जिन परिस्थितियों का सामना करती है और जिस पीड़ा से उसे गुजरना पड़ता है वह सब परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत और आयोजित है। यह सब परमेश्वर पर निर्भर करता है कि मेरी माँ कब तक जीवित रहेगी और कैसे विदा लेगी, यह तय करना मेरे हाथ में नहीं है। जैसे-जैसे मुझे यह एहसास हुआ, मेरा मन और अधिक शांत हो गया। हाल ही में मुझे पता चला कि मेरी माँ की हालत अब स्थिर है और इस बीमारी के माध्यम से उसने कुछ सबक सीखे हैं। यह समाचार सुनकर मैं बहुत भावुक हो गई और परमेश्वर में अपनी आस्था की कमी के लिए शर्मिंदा भी हुई। मैंने हाल ही में घर से दूर कर्तव्य निभाने के लिए सक्रिय रूप से आवेदन किया है।

इस अनुभव के माध्यम से मुझे अपनी घातक कमजोरी की समझ हुई है और मैंने उन भ्रामक विचारों का भी भेद पहचाना है जो हमेशा से मेरे मन में थे। मैं अब इन विचारों के अनुसार नहीं जिऊँगी और माता-पिता के साथ अपने रिश्ते से उचित ढंग से पेश आ सकती हूँ। यह सब परमेश्वर के मार्गदर्शन के कारण है।

पिछला: 68. शोहरत और रुतबे से मिला दर्द

अगला: 70. मैं दूसरों की समस्याएँ उजागर करने से क्यों डरती हूँ?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

संबंधित सामग्री

2. शुद्धिकरण का मार्ग

आली, संयुक्त राज्य अमेरिकामुझे 1990 में प्रभु यीशु के नाम का बपतिस्मा दिया गया था और 1998 तक मैं कलीसिया की सहकर्मी बन गयी थी। पवित्र आत्मा...

37. आवारा पुत्र की वापसी

लेखिका: रूथ, अमेरिकामैं दक्षिणी चीन के एक छोटे-से शहर में पैदा हुई। मेरी मॉम की तरफ के खानदान में पड़नानी के ज़माने से परमेश्वर में विश्वास...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें