92. नकली अगुआ को बचाने का परिणाम
अक्टूबर 2020 के अंत में वास्तविक कार्य न करने पर मैं अगुआ पद से बर्खास्त हो गई और अपनी स्थानीय कलीसिया लौट गई। सीसीपी द्वारा गिरफ्तारी के कारण मेरे घर पर सुरक्षा से जुड़ी कुछ समस्याएँ थीं, इसलिए मैं कुछ समय तक सभाओं में शामिल नहीं हो सकी। मैं बहुत नकारात्मक और कमजोर थी। मेरे गाँव में रहने वाली बहन ली यान एक दूसरी कलीसिया की अगुआ थी। मैं उसकी अगुआई वाली कलीसिया की सदस्य नहीं थी, फिर भी जब हम मिलते तो वह मेरा हाल पूछती, मेरी मदद के लिए परमेश्वर के वचन पढ़कर सुनाती थी। उसने मुझे नकली अगुआ के तौर पर बर्खास्त होने के लिए नीचा नहीं दिखाया, इसके लिए मैं उसकी आभारी थी, वह मेरी मदद भी करती थी। मैंने सोचा : “अगर उसे कभी कोई समस्या हुई, तो मैं जरूर मदद करूँगी।”
कुछ महीने बाद मैंने कलीसिया में स्वच्छता का काम सँभाला और ली यान के साथ बहुत काम किया। मैंने देखा कि निजी मामलों की वजह से वो अक्सर सभाओं में देर से आती थी, सभाओं के दौरान भी लापरवाह रहती थी और परमेश्वर के वचनों की संगति बहुत कम करती थी। जब भाई-बहन छद्म-विश्वासियों, मसीह-विरोधियों या बुरे लोगों के भेद की पहचान न कर पाते, तब वो सत्य सिद्धांतों पर उनके साथ संगति नहीं करती थी। मैंने कलीसिया के उपयाजक से यह भी सुना कि वह छोटी-छोटी बातों को लेकर अपनी साथी बहन से अक्सर झगड़ती थी, इस कारण सभाएँ सामान्य रूप से नहीं हो पाती थीं। यह सुनकर मुझे काफी गुस्सा आया। मैंने सोचा कि एक अगुआ होकर ली यान ने वास्तविक काम नहीं किया, कलीसियाई जीवन भी बाधित कर रही थी और इससे दूसरों के जीवन प्रवेश और कलीसिया के कार्य में देरी होगी। मैंने उससे संगति की और बताया कि वह वास्तविक काम नहीं कर रही थी। उसे चेताया भी कि अगर वह ऐसे ही करती रही, तो वह नकली अगुआ बन जाएगी। पर उसे तो मानो कोई परवाह ही नहीं थी, उसने कहा : “तो ठीक है, मैं नकली अगुआ हूँ। चूँकि मैं सत्य पर संगति नहीं कर रही, तो तुम क्यों नहीं करती?” इसके बाद मैंने देखा कि कलीसिया के कुछ सदस्य नकारात्मकता फैला रहे थे और कलीसियाई जीवन को बहुत बाधित कर रहे थे। मैंने ली यान से उनके बारे में लोगों का आकलन जानने को कहा ताकि पता चले कि क्या वे छद्म-विश्वासी थे और उन्हें हटा दिया जाना चाहिए। लेकिन वह व्यस्त होने का बहाना बनाती रही और उसे टालती रही, जिससे वे सदस्य कलीसियाई जीवन में बाधा डालते रहे। यह देखकर कि वह कलीसिया के काम को कितने हल्के में ले रही है, मैंने उसे फिर से उसकी समस्या बताई, लेकिन उसने फिर भी वापस बहस की और अपना बचाव किया। मैंने देखा कि ली यान लगातार वास्तविक काम करने में असफल रहती थी, संगति और मार्गदर्शन स्वीकार नहीं करती थी और कलीसिया के कार्य में पहले ही देरी कर चुकी थी। सिद्धांतों के आधार पर मुझे लगा कि उसके नकली अगुआ होने की काफी आशंका है, इसलिए मैं उसकी स्थिति की रिपोर्ट उच्च अगुआओं को देना चाहती थी। लेकिन फिर मैंने सोचा, “जब मैं नकारात्मक थी तब उसने मेरी मदद की थी, बहुत अच्छा व्यवहार किया था। अगर उसे पता चला कि मैंने उसकी रिपोर्ट उच्च अगुआओं से की थी, तो क्या वह मेरे प्रति मन में गलत धारणा बना लेगी? अगर उसे बर्खास्त कर दिया जाता है, तो क्या वह कहेगी कि मुझमें जमीर नहीं है? अगर मैं अभी उसकी रिपोर्ट न करूँ, थोड़ी और संगति करूँ, तो शायद वह बदल जाएगी।” मैंने उसके साथ कलीसिया में स्वच्छता कार्य के महत्व पर संगति की और इस पर भी कि कर्तव्य के प्रति उसका रवैया कैसा होना चाहिए। लेकिन कुछ समय बाद भी ली यान वास्तविक काम नहीं कर रही थी, अभी तक उसने उन सदस्यों का आकलन नहीं करवाया था। मैंने यह भी सुना कि ली यान अपने काम में गैर-जिम्मेदार थी, कलीसिया में संसाधन प्रबंधन की देख-रेख करने में विफल थी, जिसकी वजह से काफी सामान खराब हो गया और कलीसिया को गंभीर वित्तीय नुकसान हुआ। उसके बाद उसने आत्म-चिंतन नहीं किया, ऊपर से यह कहते हुए दूसरों पर दोष मढ़ दिया कि दूसरों ने चीजों को ठीक से नहीं रखा। मैंने देखा कि उसने कोई वास्तविक काम नहीं किया। वह कलीसिया के काम को हल्के में लेती थी, और वह आलोचना स्वीकार नहीं करती थी। जब कलीसिया के काम में रुकावटें आईं और उसकी संपत्ति को नुकसान पहुँचा, तब भी उसने कसूरवार महसूस नहीं किया। क्या यह नकली अगुआ की निशानी नहीं थी? लेकिन मैंने समय पर उसकी समस्याओं की रिपोर्ट नहीं दी। इसका एहसास हुआ, तो मुझे काफी अपराध-बोध हुआ। मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश देखा : “तुम सभी कहते हो कि तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील हो और कलीसिया की गवाही को बनाए रखोगे, लेकिन वास्तव में तुममें से कौन परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहा है? अपने आप से पूछो : क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहता है? क्या तुम परमेश्वर के लिए धार्मिकता का अभ्यास कर सकते हो? क्या तुम मेरे लिए खड़े होकर बोल सकते हो? क्या तुम दृढ़ता से सत्य का अभ्यास कर सकते हो? क्या तुममें शैतान के सभी दुष्कर्मों के विरुद्ध लड़ने का साहस है? क्या तुम अपनी भावनाओं को किनारे रख सकोगे और मेरे सत्य की खातिर शैतान को उजागर कर सकोगे? क्या तुम मेरे इरादों को स्वयं में पूरा होने दे सकोगे? महत्वपूर्ण क्षणों में क्या तुमने अपने दिल को समर्पित किया है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो मेरी इच्छा के अनुसार चलता है? अक्सर स्वयं से ये सवाल पूछो और अक्सर इनके बारे में सोचो” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 13)। मुझे लगा जैसे परमेश्वर के वचन मुझे फटकार रहे हैं। खासकर जब मैंने उस हिस्से को देखा जिसमें लिखा है : “क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहता है? क्या तुम परमेश्वर के लिए धार्मिकता का अभ्यास कर सकते हो?” “क्या तुममें शैतान के सभी दुष्कर्मों के विरुद्ध लड़ने का साहस है?” मुझे बहुत शर्म आई, मैंने खुद को दोषी महसूस किया। परमेश्वर आशा करता है कि हम उसके इरादे पर ध्यान दें, कलीसिया के काम में गड़बड़ करने और बाधा डालने वाले लोगों को तुरंत बेनकाब करें और रोकें ताकि कलीसिया के हितों की रक्षा हो। मैं ली यान को काफी समय से जानती थी, मैंने देखा था कि उसने वास्तविक काम नहीं किया, आलोचना स्वीकार नहीं की। मैं अच्छी तरह जानती थी कि अगर उसे बर्खास्त न किया गया, तो कलीसिया के कार्य और भाई-बहनों के जीवन प्रवेश, दोनों का ही नुकसान होगा। लेकिन उसने मेरी जो मदद की थी उस बारे में सोचा तो मुझे चिंता हुई कि उसे पता चला कि मैंने रिपोर्ट की थी तो वह मुझसे नफरत करेगी और कहेगी कि मुझमें जमीर नहीं है। अपना रिश्ता बचाने के लिए मैं उसकी समस्याओं की रिपोर्ट नहीं करना चाहती थी, यह देखकर भी कि वह वास्तविक कार्य नहीं करती, जिससे कई छद्म-विश्वासियों को तुरंत कलीसिया से बाहर नहीं निकाला जा सका और वे कलीसियाई जीवन में लगातार बाधा डालते रहे। मैं कितनी स्वार्थी और नीच थी! सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करके, एक नकली अगुआ का पक्ष लेकर और उसे बचाकर और उसे कलीसियाई जीवन में विघ्न डालने देकर क्या मैं इस नकली अगुआ की ढाल नहीं बन गई थी और उसके बुरे कामों में सहभागी नहीं हो गई थी? इसका एहसास होने पर मुझे खुद से घृणा हुई कि मैंने समय पर ली यान की रिपोर्ट नहीं की। मैंने तुरंत अगुआओं को रिपोर्ट करने का फैसला किया।
यह करने के बाद उच्च अगुआओं ने मुझे ली यान के बारे में भाई-बहनों का आकलन इकट्ठा करने को कहा, ताकि उसके अब तक के लगातार कार्य-प्रदर्शन के आधार पर यह तय किया जा सके कि उसे बर्खास्त किया जाए या नहीं। अगुआओं ने यह भी कहा कि अगर तय हुआ कि वह नकली अगुआ है, तो मुझे उनके साथ जाकर ली यान को बर्खास्त करना होगा। उच्च अगुआओं की बात सुनकर मुझे हिचक हुई, सोचा : “मेरे बर्खास्त होने के बाद ली यान ने मेरी बहुत मदद की थी। अगर मैंने उसे उजागर किया और दूसरों को उसका भेद पहचानने में मदद की, तो वह कहेगी कि मुझमें जमीर नहीं है।” मैं बहुत दुविधा में थी और उसे उजागर नहीं करना चाहती थी। मैंने देखा कि मेरी दशा ठीक नहीं थी, तो मैंने अपनी शंकाओं के समाधान के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की। मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा : “परमेश्वर पर विश्वास न रखने वाले प्रतिरोधियों के सिवाय भला शैतान कौन हैं, राक्षस कौन हैं और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं? क्या ये वे लोग नहीं, जो परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं? क्या ये वे नहीं, जो आस्था होने का दावा तो करते हैं, परंतु जिनके पास सत्य नहीं है? क्या ये वे लोग नहीं, जो सिर्फ आशीष पाने की फिराक में रहते हैं जबकि परमेश्वर के लिए गवाही देने में असमर्थ हैं? तुम अभी भी इन राक्षसों के साथ घुलते-मिलते हो और उनसे अंतरात्मा और प्रेम से पेश आते हो, लेकिन क्या यह शैतान के प्रति दया दिखाने के बराबर नहीं है? क्या तुम राक्षसों की जमात में नहीं हो? यदि लोग इस बिंदु तक आ गए हैं और अच्छाई-बुराई में भेद नहीं कर पाते और परमेश्वर के हृदय को खोजने की इच्छा किए बिना या परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय मानने में असमर्थ रहते हुए आँख मूँदकर प्रेम और दया दर्शाते रहते हैं तो उनका परिणाम और भी अधिक खराब होगा। जो भी व्यक्ति देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता, वह परमेश्वर का शत्रु है। यदि तुम परमेश्वर के शत्रुओं के प्रति अंतरात्मा और प्रेम से व्यवहार कर सकते हो, तो क्या तुममें न्याय की भावना की कमी नहीं है? यदि तुम उनके साथ संगत हो जिनसे मैं घृणा करता हूँ और जिनका मैं विरोध करता हूँ, तुम तब भी उनके प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हो और निजी भावनाएँ दिखाते हो, तो क्या तुम विद्रोही नहीं हो? क्या तुम जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर रहे हो? क्या ऐसे व्यक्ति में असल में सत्य होता है? यदि लोग परमेश्वर के शत्रुओं के प्रति अंतरात्मा रखते हैं, राक्षसों के प्रति प्रेम रखते हैं और शैतान के लिए दया रखते हैं तो क्या वे जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी पैदा नहीं कर रहे हैं?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। परमेश्वर के वचनों ने हृदय को छू लिया। अंश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जो लोग सत्य खोजते हैं, कलीसिया के कार्य को बनाए रखते हैं, उनसे प्रेम से व्यवहार करना चाहिए, जबकि वे जो सत्य से विमुख हैं और कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करते और बाधा डालते हैं, उनसे घृणा करनी चाहिए और उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए। मैंने स्पष्ट रूप से देखा कि ली यान वास्तविक काम नहीं कर रही थी और कलीसिया के काम में गड़बड़ी और बाधा डाल रही थी, फिर भी मैंने उसके लिए नर्मी बरती और तुरंत उसकी रिपोर्ट नहीं की। फिर जब उसे बेनकाब करने, पहचानने और सबक सीखने में दूसरों की मदद का समय आया, तब मैं चिंताओं में डूब गई कि वह मुझसे नफरत करेगी और कहेगी कि मैं कृतघ्न धोखेबाज हूँ। इसीलिए मैंने अपने जमीर से विश्वासघात किया, उसका बचाव किया और उसे पनाह दी। मुझमें सच में मानवता की कमी थी। परमेश्वर के प्रति मेरी वफादारी कहाँ थी? क्या मैं शैतान की सहभागी नहीं बन गई हूँ? परमेश्वर के पोषण का इतना आनंद लेते हुए भी मैंने जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया। कलीसिया के कार्य और भाई-बहनों के जीवन प्रवेश को बाधित होते देखना मुझे ठीक लगा, बस मेरे निजी हितों की रक्षा हो जाए। मेरे अंदर जमीर और मानवता की इतनी कमी थी! अगर मैं पश्चात्ताप करने और सत्य का अभ्यास जारी रखने में असफल रही, तो परमेश्वर मुझे ठुकरा कर निकाल देगा।
फिर मैंने परमेश्वर के वचनों के कुछ और अंश पढ़े : “अगर परमेश्वर तुम्हें बचाना चाहता है, तो चाहे वह ऐसा करने के लिए किसी की भी सेवाओं का उपयोग करे, तुम्हें पहले परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहिए और इसे परमेश्वर से स्वीकारना चाहिए। तुम्हें अपनी कृतज्ञता सिर्फ लोगों के प्रति निर्देशित नहीं करनी चाहिए, कृतज्ञता में किसी को अपना जीवन अर्पित करने की तो बात ही छोड़ दो। यह एक गंभीर भूल है। महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर का आभारी हो, और तुम इसे परमेश्वर की ओर से स्वीकारो” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (7))। “किसी जरूरतमंद व्यक्ति की सही समय और स्थान पर मदद करना एक बहुत ही सामान्य घटना है। यह मानवजाति के प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी भी है। यह बस एक तरह की जिम्मेदारी और दायित्व है। परमेश्वर ने लोगों को सृजित करते समय ऐसी सहजवृत्तियाँ दी थीं। ... लोगों की मदद करना और उनके प्रति दया दिखाना इंसानों के लिए लगभग अनायास बात है, यह मानवीय सहजवृत्ति के दायरे में आता है, और ऐसी चीज है जिसे करने में लोग पूरी तरह से सक्षम हैं। इसे दयालुता जितना ऊँचा दर्जा देने की कोई आवश्यकता नहीं। लेकिन बहुत-से लोग दूसरों की मदद को दयालुता के बराबर समझते हैं और यह सोचते हुए इसके बारे में हमेशा बात करते रहते हैं और लगातार इसका बदला चुकाते रहते हैं कि अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उनमें जमीर नहीं है। वे खुद को हिकारत से देखते हैं और तुच्छ समझते हैं, यहाँ तक कि इस बात की चिंता भी करते हैं कि उन्हें जनमत द्वारा फटकार लगाई जाएगी। क्या इन बातों की चिंता करना जरूरी है? (नहीं।) ऐसे बहुत-से लोग हैं जो इससे आगे नहीं देख पाते और इस मुद्दे से निरंतर बेबस रहते हैं। सत्य सिद्धांतों को न समझना यही है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (7))। हाँ। परमेश्वर सृष्टिकर्ता है; वह सभी चीजों का संप्रभु है और उनका आयोजन करता है। जब मैं सबसे ज्यादा कमजोर और नकारात्मक बिंदु पर थी, तब ऐसा लगा था कि ली यान अपनी मदद और संगति से मेरे साथ अच्छा व्यवहार कर रही थी, लेकिन असल में यह परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था थी, न कि मेरे प्रति उसकी परवाह। मुझे इसे परमेश्वर की ओर से स्वीकार कर उसका धन्यवाद करना चाहिए था, ली यान को श्रेय नहीं देना था। साथ ही ली यान एक कलीसिया अगुआ थी, असल में उसका कर्तव्य था भाई-बहनों को सहारा देना और उनके जीवन प्रवेश की समस्याओं को हल करना। जब ली यान ने मेरा साथ दिया, मेरे साथ परमेश्वर के वचनों की संगति की, तो वह सिर्फ अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रही थी और यह उसका कर्तव्य था। साथ ही भाई-बहनों के साथ प्यार से पेश आना, एक-दूसरे की मदद करना, सहारा देना यह परमेश्वर की अपने चुने लोगों से माँग है। मुझे ली यान की मदद को परमेश्वर की ओर से स्वीकार कर उसके प्रति आभार प्रकट करना चाहिए था। इसके बजाय मैंने भ्रमवश इसे ली यान की देखभाल समझ लिया। मैं बार-बार अपने दिल में उसकी दयालुता को याद करती रही। मैंने अपनी व्यक्तिगत भावनाओं की वजह से बार-बार उसका बचाव किया। साफ पता था कि वह नकली अगुआ थी, लेकिन मैंने रिपोर्ट कर उसे बेनकाब नहीं किया। मैं बहुत ज़्यादा भ्रमित थी! मुझे परमेश्वर के इरादे पर विचार करना चाहिए था, सत्य सिद्धांतों पर टिके रहकर कलीसिया के कार्य की रक्षा के लिए नकली अगुआ को उजागर करना चाहिए था। जमीर और मानवता रखने वाले इंसान को ऐसा ही करना चाहिए। अगर ली यान सत्य को स्वीकारने वाली इंसान होती, तो काट-छाँट और उजागर किए जाने पर वह आत्म-चिंतन करती और खुद को समझ पाती, अपनी भ्रष्टता और कमियों को साफ तौर पर देखती, पश्चात्ताप करती और खुद में बदलाव लाती। इससे उसे भी फायदा होता। अगर वह सत्य को स्वीकारने वाली इंसान नहीं है और काट-छाँट किए जाने के बाद उसने पश्चात्ताप नहीं किया, तो इससे यह खुलासा होगा कि वह सत्य नहीं खोजती और उसे समय रहते बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए। यह कलीसिया के काम और दूसरों के जीवन प्रवेश, दोनों के लिए मददगार होगा। चीजों पर मेरा नजरिया बेतुका था : मैं हमेशा मानती थी कि लोगों की काट-छाँट कर उन्हें बेनकाब करना उन्हें अपमानित करना और चोट पहुँचाना है। मैं एक बहुत सकारात्मक चीज को नकारात्मक मान रही थी। नतीजतन, मैं इस भ्रामक धारणा से विवश होकर ली यान की समस्याओं को उजागर करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। मैं वाकई सत्य नहीं समझ पाई, मैं बहुत दयनीय थी। यह सब समझने के बाद मैंने राहत महसूस की और अपनी जिम्मेदारी से बचना छोड़ दिया।
कुछ दिनों के बाद ली यान के लगातार प्रदर्शन की जाँच करने पर कलीसिया ने तय किया कि वह नकली अगुआ थी, उसे बर्खास्त कर दिया गया। बर्खास्त होने पर उसने आत्म-चिंतन नहीं किया और न ही खुद को जाना, बल्कि शिकायत की कि उसके साथ अन्याय हुआ है। तर्क दिया कि वह वर्षों से अगुआ थी, उसने दुनिया में पैसे बनाने का मौका भी छोड़ दिया और अनगिनत कष्ट सहे, इसीलिए उसे लगा कि कलीसिया ने उसके साथ अन्याय किया। उसके बाद उस पर दौलत का जुनून सवार हो गया, उसने पैसे कमाने के लिए नौकरी कर ली थी और वह सभाओं में नियमित नहीं आती थी। उसकी बर्खास्तगी के बाद कलीसिया ने नया अगुआ चुनने के लिए चुनाव कराए, छद्म-विश्वासियों को हटा दिया गया, कलीसियाई जीवन में अब कोई व्यवधान नहीं रहा और कलीसिया के कार्य की विभिन्न मदें सुचारू रूप से आगे बढ़ने लगीं। यह सब देखकर मुझे और भी सुकून मिला। मैं बहुत खुश थी कि मैं इस स्थिति में सत्य की खोज कर सकी, समय रहते समस्याओं को पहचान कर अपना कर्तव्य पूरा कर सकी।
बाद में जब मैं ली यान से मिली, उसने मुझ पर भड़कते हुए कहा : “मैं तुम्हारा चेहरा नहीं देखना चाहती! अब सब कह रहे हैं कि मैं नकली अगुआ हूँ, तुमने ही उनसे यह कहा था। मुझे तुमसे नफरत है!” उसकी यह बात सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा, लेकिन मैंने जो कुछ उच्च अगुआओं को बताया था, वह तथ्यात्मक था। वह नकली अगुआ थी जिसे उजागर कर रिपोर्ट की जानी चाहिए थी। यह पूरी तरह से परमेश्वर के इरादे के अनुरूप था। लेकिन यह सुनकर इतना दुख क्यों हुआ कि वह मुझसे नफरत करती है? मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिसने मुझे समस्या की जड़ की थोड़ी-बहुत समझ प्रदान की। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “यूँ तो लोग अक्सर परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, उनका प्रार्थना-पाठ करते और उन पर मनन करते हैं, फिर भी लोगों और चीजों को देखने, साथ ही आचरण करने और काम करने के उनके बुनियादी नजरिए और सिद्धांत अभी भी पारंपरिक संस्कृति के नियंत्रण में हैं और शायद ही कभी सत्य पर आधारित होते हैं। इसलिए लोगों के दिलों में पारंपरिक संस्कृति अभी भी मुख्य स्थान पर काबिज है और लोगों के विचार और दृष्टिकोण बिना किसी खास बदलाव के अभी भी पारंपरिक संस्कृति से प्रभावित, बाधित और नियंत्रित होते हैं। उनके लिए पारंपरिक संस्कृति से पीछा छुड़ाना और बचकर निकलना उतना ही असंभव है जितना लोगों का अपनी ही परछाइयों से पीछा छुड़ाना और बचकर निकलना है। ऐसा क्यों है? क्योंकि लोग पारंपरिक संस्कृति और शैतान द्वारा मनुष्य के मन में बैठाए गए विभिन्न विचारों और मतों को अपने दिल की गहराइयों से अनावृत, गहन-विश्लेषित या उजागर नहीं कर सकते; वे इन चीजों को पहचान नहीं सकते, इनकी असलियत देख या इनसे विद्रोह नहीं कर सकते, इन्हें त्याग नहीं सकते; वे उस तरह लोगों और चीजों को नहीं देख सकते, उस तरह आचरण व कार्य नहीं कर सकते, जिस तरह परमेश्वर लोगों से कहता है या जिस तरह से वह सिखाता और समझाता है। इस वजह से आज भी ज्यादातर लोग कैसे विकट हालात में जी रहे हैं? उस परिस्थिति में, जिसमें उनके दिलों की गहराई में परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों और चीजों को देखने, आचरण और कार्य करने, परमेश्वर के इरादों के विरुद्ध न जाने या सत्य के खिलाफ न जाने की इच्छा रहती है, फिर भी, प्रतिरोध की क्षमता न होते हुए भी और न चाहते हुए भी, वे अभी भी शैतान द्वारा सिखाए गए तरीकों के अनुसार ही लोगों से बातचीत करते हैं, आचरण करते हैं और मामले सँभालते हैं। लोग भीतर से सत्य की लालसा रखते हैं, परमेश्वर के प्रति एक जबरदस्त इच्छा रखना चाहते हैं, परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों और चीजों को देखना, आचरण और कार्य करना चाहते हैं और सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करना चाहते हैं, फिर भी चीजें हमेशा उनकी इच्छा के विपरीत ही होती हैं। अपने प्रयास दोगुने करने के बाद भी उन्हें जो परिणाम मिलते हैं, वे उनकी इच्छा के अनुसार नहीं होते। सकारात्मक चीजों को प्रेम कर पाने के लिए लोग चाहे कैसे भी संघर्ष करें, कितना भी प्रयास करें, कितना भी संकल्प और इच्छा करें, अंत में वे वास्तविक जीवन में जिस सत्य का अभ्यास पाते हैं और जिस सत्य की कसौटी का पालन कर पाते हैं, वे बहुत दुर्लभ हैं। लोगों के दिलों की गहराई में यही चीज उन्हें सबसे अधिक परेशान करती है। इसका क्या कारण है? मुख्य कारण यह है कि पारंपरिक संस्कृति लोगों को जो विभिन्न विचार और दृष्टिकोण सिखाती है वे अभी भी उनके दिलों में काबिज होते हैं और उनके शब्दों, कर्मों, विचारों और साथ ही उनके आचरण तथा कार्य करने की पद्धतियों और तरीकों को नियंत्रित करते हैं। इसलिए लोगों को पारंपरिक संस्कृति का गहन-विश्लेषण करने और उसे बेनकाब करने, उसका भेद पहचानने और उसकी असलियत देखने और आखिरकार उसे हमेशा के लिए त्याग देने की एक प्रक्रिया से गुजरना होगा और लोगों को इस समस्या को पूरी तरह से हल करने के लिए लगातार सत्य खोजना होगा। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मामला है और यह एक ऐसा मुद्दा भी है जिसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पारंपरिक संस्कृति पहले ही लोगों के दिलों पर कब्जा कर चुकी है और उन पर शासन करने वाली चीज बन गई है—आज तक यह लोगों के विचारों और दृष्टिकोणों, उनके शब्दों और क्रियाकलापों और उनके आचरण और चीजों को सँभालने के तरीके को नियंत्रित और प्रभावित करती है और उनसे अनचाहे ही सत्य का उल्लंघन, परमेश्वर से विद्रोह और परमेश्वर का प्रतिरोध कराती है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, मनुष्य को सत्य का अनुसरण क्यों करना चाहिए)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं पारंपरिक सांस्कृतिक मूल्यों और शैतानी फलसफों के सहारे जी रही थी जैसे “एक बूँद पानी की दया का बदला झरने से चुकाना चाहिए” और “दयालुता का बदला कृतज्ञतापूर्वक लौटाना चाहिए।” मैंने इन विचारों को अपने आचरण के लिए सिद्धांत समझ लिया। मेरा मानना था कि मुझे उनकी रक्षा करनी और प्रतिदान करने के लिए सर्वोत्तम प्रयास करना चाहिए जो मेरे प्रति दयालु थे और जिन्होंने मेरे लिए अच्छे काम किए थे फिर चाहे वे अच्छे लोग हों या बुरे, उन्होंने सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य किया हो या नहीं। भले ही उन्होंने बुराई की हो और कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी की और बाधा डाली हो, मुझे उन्हें बचाना चाहिए, ऐसा नहीं करूँगी तो मुझमें जमीर और मानवता की कमी होगी। क्योंकि मैं इन शैतानी फलसफों और भ्रामकता से विवश थी इसीलिए यह साफ देखने के बावजूद भी कि ली यान वास्तविक काम न करने वाली नकली अगुआ थी, मैंने उसे उजागर कर रिपोर्ट करने में देरी की क्योंकि उसने पहले मेरी मदद की थी। मैं हमेशा उसे एक और मौका देना, उसके प्रति उदार, दयालु और प्रेमपूर्ण रहना चाहती थी। मैंने इस पर ध्यान नहीं दिया कि इससे कलीसिया के कार्य और भाई-बहनों के जीवन प्रवेश को कोई नुकसान पहुँचा था या नहीं। मैं एक नकली अगुआ के दुष्ट कार्यों को सहन कर रही थी और शैतान की ओर खड़ी होकर परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह और उसका प्रतिरोध कर रही थी। मैंने देखा कि सार में ये पारंपरिक मूल्य वो भ्रांतियाँ और दानवी शब्द हैं, जिनसे शैतान लोगों को गुमराह और भ्रष्ट करता है। ये वे सिद्धांत नहीं हैं जिनके अनुसार हमें आचरण करना चाहिए। ऐसे विचारों के साथ जीना मुझे और भी अधिक हास्यास्पद और बेतुका बनाता जाता। मेरे विचार ज्यादा उलझ जाएँगे, अच्छे-बुरे का भेद नहीं पहचान पाऊँगी और मैं सत्य का उल्लंघन कर परमेश्वर का विरोध ही करूँगी।
एक दिन मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा : “कभी-कभी जमीर का प्रभाव भावनाओं से बाधित और प्रभावित होता है और नतीजतन उसके निर्णय सत्य सिद्धांतों से टकराते हैं। इस प्रकार, हम एक तथ्य स्पष्ट रूप से देख सकते हैं : व्यक्ति के जमीर का प्रभाव सत्य के मानक से कमतर होता है, और कभी-कभी लोग अपने जमीर के आधार पर कार्य करते हुए सत्य का उल्लंघन कर देते हैं। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, लेकिन सत्य से नहीं जीते, बल्कि अपने जमीर के आधार पर कार्य करते हो, तो क्या तुम बुराई और परमेश्वर का विरोध कर सकते हो? तुम वास्तव में कुछ बुरी चीजें करने में सक्षम होगे—यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि अपने जमीर के आधार पर काम करना कभी गलत नहीं होता। यह दर्शाता है कि अगर व्यक्ति परमेश्वर को संतुष्ट करना और उसके इरादों के अनुरूप होना चाहता है, तो केवल अपने जमीर के आधार पर कार्य करना बहुत ही अपर्याप्त है। परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने के लिए व्यक्ति को सत्य के आधार पर कार्य करना चाहिए” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (2))। हाँ। हम सभी में जमीर होना चाहिए, लेकिन यह सत्य नहीं है, न उसका स्थान ले सकता है। अगर हम सत्य का अनुसरण न करके केवल अपने जमीर के अनुसार कार्य और आचरण करें, तो हम सत्य के खिलाफ जाकर परमेश्वर का प्रतिरोध करने लग सकते हैं। परमेश्वर कहता है कि हम उससे प्यार करें जिससे उसे प्यार है और उससे नफरत करें जिससे उसे नफरत है। इसी सिद्धांत के अनुसार हमें दूसरों के साथ व्यवहार करना चाहिए। अगर भाई-बहन सत्य का अनुसरण करते हैं, तो फिर चाहे उन्होंने मुझ पर दया दिखाई हो या नहीं, समस्याओं का सामना करने पर मुझे प्यार से उनकी मदद करनी चाहिए। अगर वे बुरे कर्म करते हैं या अगर वे नकली अगुआ, बुरे व्यक्ति या मसीह-विरोधी हैं, तो फिर चाहे उन्होंने मेरे प्रति कितनी भी भलाई दिखाई हो, मुझे सत्य सिद्धांतों के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए और उन्हें उजागर करके रिपोर्ट करनी चाहिए। इसीलिए जब ली यान ने कलीसिया के काम में गड़बड़ी की और बाधा डाली और सत्य बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया, उसके साथ कितनी ही संगति की और मदद की पर वह पश्चात्ताप कर बदल न सकी, तो मुझे अपने तथाकथित “जमीर” के कारण उसका पक्ष लेकर उसे बचाना नहीं चाहिए, बल्कि सत्य सिद्धांतों के अनुसार उसे उजागर करके उसकी रिपोर्ट करनी चाहिए। ऐसा न करके मैं भाई-बहनों को और कलीसिया के कार्य को ज्यादा नुकसान पहुँचा रही थी। यह समझना प्रबोधक था, मुझे दूसरों के साथ व्यवहार करने का अभ्यास और सिद्धांतों का मार्ग प्राप्त हुआ। बाद में ली यान बर्खास्त होने से बहुत विद्रोही और असंतुष्ट थी, वह धन-दौलत के पीछे भागने लगी, उसने सभाओं में आना छोड़ दिया, बल्कि वह दूसरों के बीच भी नकारात्मकता फैलाने लगी, उसने कलीसियाई जीवन में बाधा डालना जारी रखा, उसने संगति और काट-छाँट स्वीकारने से इनकार कर दिया। उसे सिद्धांत के अनुसार हटा दिया जाना चाहिए। इस बार मैंने उसे फिर से बचाने की कोशिश नहीं की, इसके बजाय अगुआओं की मदद की ताकि वो उसके बारे में भाई-बहनों के मूल्यांकन एकत्र कर पायें। 80% से अधिक भाई-बहनों की स्वीकृति के साथ ली यान को कलीसिया से निकाल दिया गया।
यह सब अनुभव करने के बाद ही मुझे एहसास हुआ कि शैतानी फलसफों के साथ जीना सत्य के अभ्यास में बाधा डालता है यहाँ तक कि कलीसिया के काम में भी गड़बड़ी और बाधा डाल सकता है। जो लोग लोगों और चीज़ों को देखने, कार्य करने और आचरण करने में परमेश्वर के वचनों का पालन करते हैं, सिर्फ उन्हीं में सही मायने में मानवता होती है और वे कलीसिया के कार्य की रक्षा कर परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो सकते हैं। परमेश्वर के वचनों ने मेरी भ्रामक मान्यताओं को सुधारा और दूसरों से पेश आने के सिद्धांत समझने में मेरी मदद की।