18. मैं शांति से अपनी कमियों का सामना कर सकती हूँ

मैं बचपन से ही हकलाती हूँ। आमतौर पर तो इतना नहीं हकलाती थी, लेकिन अगर आस-पास बहुत सारे लोग इकट्ठा हो जाते तो मैं घबरा जाती और बोलते समय हकलाने लगती। जब मेरे माँ-बाप ने देखा कि मैं धाराप्रवाह नहीं बोलती, तो उन्होंने कहा, “क्या तुम थोड़ा और धीरे नहीं बोल सकती? कोई तुम्हें टोकने की कोशिश नहीं कर रहा है।” यह मेरे आत्मसम्मान पर चोट थी और मैं ज्यादा नहीं बोलना चाहती थी। स्कूल जाने लगी तब भी ऐसा ही होता था। जब शिक्षक कोई सवाल पूछते और मुझे जवाब देने को कहते, तो घबराहट के कारण मैं उन सवालों का भी जवाब न दे पाती जिनका जवाब मुझे पता होता और मेरी हकलाहट और बढ़ जाती। इससे दूसरे छात्र भी मेरी आवाज की नकल करने लगे। जब मैं जूनियर हाई स्कूल में थी, तो मैं क्लास मॉनिटर थी। एक बार मैंने टीचर को आते देखा। मैं घबरा गई और जब मैंने सबको खड़े होने को कहा तो मैं फिर से हकलाने लगी। मुझे हकलाते देख मेरे सहपाठी और टीचर सब जोर-जोर से हंसने लगे। मुझे बहुत शर्म आई और समझ नहीं आया कि कहाँ मुँह छिपाऊँ। हीनभावना के कारण मैं शायद ही कभी घर से बाहर निकलती और शायद ही कभी बोलती थी। जब मैंने परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू किया तो भाई-बहनों ने देखा कि मुझे हकलाने की समस्या है और मैं ज्यादा संगति नहीं कर पाती, तो उन्होंने मुझे प्रोत्साहित करते हुए कहा, “अपने हकलाने की चिंता मत करो। बस थोड़ा धीरे बोलो; जितना हम समझ सकें उतना काफी है।” भाई-बहनों के प्रोत्साहन से मैंने संगति का अभ्यास करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे मैं भाई-बहनों को जानने लगी और बोलते समय मेर घबराना कम होता गया। वक्त के साथ मुझे मुक्ति और स्वतंत्रता का एहसास होने लगा जो पहले कभी नहीं हुआ था।

हालाँकि मैंने गौर किया कि सभा और संगति करते समय भाई-बहन अक्सर मुझसे पूछते, “तुमने अभी क्या कहा? मुझे समझ नहीं आया। एक बार और दोहरा सकती हो?” शुरू में एक दो बार तो मैंने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन उन्हें अक्सर ऐसा कहते हुए सुन, मुझे डर लगने लगा कि वे मुझे नीची नजर से देखेंगे और कहेंगे कि मैं इतनी बड़ी होकर भी हकलाती हूँ, साफ बोल भी नहीं पाती। संगति करते समय मैं बहुत घबरा जाती जिससे मेरी हकलाहट और बढ़ जाती। मुझे बहुत शर्म आती और इस बात की फिक्र होती कि भाई-बहन मुझे निकम्मी और बेकार समझेंगे। तो सोचा आगे से अब मैं किसी सभा में नहीं बोलूँगी। मुझे डर था कि भाई-बहन कहेंगे कि मैं साफ नहीं बोल पाती इसलिए मेरी बात उन्हें समझ नहीं आती। एक बार जब हम सभा कर रहे थे और परमेश्वर के वचन खा और पी रहे थे, तो मुझे कुछ ज्ञान प्राप्त हुआ और मैंने संगति करना चाहा, लेकिन जैसे ही मुझे अपने हकलाने का ख्याल आया, तो शब्द मेरे होठों तक पहुँचकर रुक गए और मेरी संगति करने की हिम्मत नहीं हुई। मुझे लगा जैसे मैं कोई अजनबी हूँ। भाई-बहन अपनी बातें साफ तौर पर कह पाते थे, लेकिन मैं कैसे कहूँ? मैं तो साफ बोल भी नहीं पाती; क्या परमेश्वर को मेरे जैसे इंसान की जरूरत है भी? धीरे-धीरे सभाओं में बोलने की मेरी इच्छा कम होती गई। पहले तो मैंने परमेश्वर के वचनों को खा-पी कर थोड़ी रोशनी हासिल की थी, लेकिन अब तो मैं उनमें से किसी पर भी संगति नहीं कर सकती थी। सभाएँ इतनी धीमी होतीं कि मुझे उनसे कोई लाभ या आनंद न मिलता। हर सभा में ऐसा लगता जैसे मैं किसी वध-स्थल में मचान पर खड़ी हूँ। सभाओं के दौरान जब तक जरूरी न हो, मैं संगति नहीं करती थी और अगर वाकई कोई विकल्प न होता, तो मैं बेमन से बस कुछ शब्द बोलकर संगति कर देती। मैं बेहद दबी हुई और दुखी महसूस करती, यहाँ तक कि मुझे परमेश्वर से भी शिकायत थी, उसे गलत समझती और सोचती, “बाकी लोग इतना साफ और धाराप्रवाह कैसे बोल लेते हैं, जबकि मैं धाराप्रवाह तो क्या बोलूँगी, मैं तो हकलाती भी हूँ? मैं दूसरे भाई-बहनों की तरह धाराप्रवाह कैसे बोलूँ ताकि लोग मेरा मजाक न उड़ाएँ?”

फिर कलीसिया के चुनाव में भाई-बहनों ने मुझे अगुआ चुन लिया। मैंने सोचा, “अगर मैं अगुआई का कर्तव्य निर्वहन करूँगी तो मुझे ज्यादा लोगों से बातचीत करनी पड़ेगी। क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि और भी भाई-बहनों को मेरे हकलाने की समस्या का पता चल जाएगा? छोड़ो, यह मुझसे नहीं होगा; मैं बार-बार शर्मिंदगी नहीं उठा सकती।” यह सोचकर मैंने यह कर्तव्य ठुकरा दिया। बाद में, मेरी अगुआ ने मेरे साथ संगति की और आखिरकार मैं बेमन से सहमत हो गई। हालाँकि हकलाने के कारण मुझे हमेशा यही लगता रहा कि मैं बाकी भाई-बहनों से कमतर हूँ, मैं नकारात्मकता में जीने लगी थी और उससे बाहर नहीं निकल पा रही थी। दिनभर आलस्य बना रहता था। मैं सभाओं के दौरान अपने अंदर ऊर्जा नहीं ला पाती थी और संगति करने की इच्छा नहीं होती थी। जब कभी भाई-बहनों को कोई कठिनाई आती तो मैं समझ जाती कि उन्हें कैसे हल करना चाहिए, लेकिन मुझे डर रहता कि मैं बोलते समय हकलाना शुरू कर दूँगी और वे मुझे नीची नजर से देखेंगे, तो यह सोचकर मैं संगति नहीं करना चाहती थी। मैंने बस अपनी साथीदार बहन को समस्या बताकर उससे समस्या हल करने को कहती। एक बहन ने देखा कि मैं सभाओं में संगति नहीं करती तो उसने मुझसे पूछा कि क्या समस्या है, मैंने उसे अपने हकलाने के कारण हीन महसूस करने की बात बता दी। उस बहन ने मुझे प्रोत्साहित करते हुए कहा, “हर किसी में कमियाँ होती हैं, लेकिन सत्य की खोज पर उनका कोई असर नहीं होता। तुम्हारा हकलाना घबराहट के कारण है। बोलते समय परमेश्वर पर भरोसा रखो और घबराओ मत। अगर तुम थोड़ा धीरे बोलोगी तो भाई-बहन समझ लेंगे।” उस बहन की बातें सुनकर मुझे थोड़ी तसल्ली हुई। परमेश्वर ने इस बहन के जरिए मेरी मदद की, अब मुझे अपने हकलाने के कारण नकारात्मक नहीं होना चाहिए। मैं अपनी अवस्था को बदलने और अपनी कमियों का सामना करने को तैयार थी।

बाद में अन्य बहनों ने भी मेरे साथ संगति की। मुझे एहसास हुआ कि मैं लोगों से बातचीत करते समय घबरा जाती हूँ क्योंकि मुझे डर होता है कि लोग कहेंगे कि मैंने खराब संगति की। यह सब मुझे अपनी इज्जत गँवाने डर के कारण हुआ था। मैंने अपनी अवस्था को परमेश्वर के सामने रखा और प्रार्थना की कि वह इस समस्या को समझने में मेरा मार्गदर्शन करे। एक दिन अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “सत्य की खोज करने के बजाय, अधिकतर लोगों के अपने तुच्छ एजेंडे होते हैं। अपने हित, इज्जत और दूसरे लोगों के मन में जो स्थान या प्रतिष्ठा वे रखते हैं, उनके लिए बहुत महत्व रखते हैं। वे केवल इन्हीं चीजों को सँजोते हैं। वे इन चीजों पर मजबूत पकड़ बनाए रखते हैं और इन्हें ही बस अपना जीवन मानते हैं। और परमेश्वर उन्हें कैसे देखता या उनसे कैसे पेश आता है, इसका महत्व उनके लिए गौण होता है; फिलहाल वे उसे नजरअंदाज कर देते हैं; फिलहाल वे केवल इस बात पर विचार करते हैं कि क्या वे समूह के मुखिया हैं, क्या दूसरे लोग उनकी प्रशंसा करते हैं और क्या उनकी बात में वजन है। उनकी पहली चिंता उस पद पर कब्जा जमाना है। जब वे किसी समूह में होते हैं, तो प्रायः सभी लोग इसी प्रकार की प्रतिष्ठा, इसी प्रकार के अवसर तलाशते हैं। अगर वे अत्यधिक प्रतिभाशाली होते हैं, तब तो शीर्षस्थ होना चाहते ही हैं, लेकिन अगर वे औसत क्षमता के भी होते हैं, तो भी वे समूह में उच्च पद पर कब्जा रखना चाहते हैं; और अगर वे औसत क्षमता और योग्यताओं के होने के कारण समूह में निम्न पद धारण करते हैं, तो भी वे यह चाहते हैं कि दूसरे उनका आदर करें, वे नहीं चाहते कि दूसरे उन्हें नीची निगाह से देखें। इन लोगों की इज्जत और गरिमा ही होती है, जहाँ वे सीमा-रेखा खींचते हैं : उन्हें इन चीजों को कसकर पकड़ना होता है। भले ही उनमें कोई सत्यनिष्ठा न हो, और न ही परमेश्वर की मान्यता या अनुमोदन हो, मगर वे उस आदर, रुतबे और सम्मान को बिल्कुल नहीं खो सकते जिसके लिए उन्होंने दूसरों के बीच कोशिश की है—जो शैतान का स्वभाव है। मगर लोग इसके प्रति जागरूक नहीं होते। उनका विश्वास है कि उन्हें इस इज्जत की रद्दी से अंत तक चिपके रहना चाहिए। वे नहीं जानते कि ये बेकार और सतही चीजें पूरी तरह से त्यागकर और एक तरफ रखकर ही वे असली इंसान बन पाएंगे। यदि कोई व्यक्ति जीवन समझकर इन त्यागे जाने योग्य चीजों को बचाता है तो उसका जीवन बर्बाद हो जाता है। वे नहीं जानते कि दाँव पर क्या लगा है। इसीलिए, जब वे कार्य करते हैं तो हमेशा कुछ छिपा लेते हैं, वे हमेशा अपनी इज्जत और रुतबे को बचाने की कोशिश करते हैं, वे इन्हें पहले रखते हैं, वे केवल अपने झूठे बचाव के लिए, अपने उद्देश्यों के लिए बोलते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं, अपने लिए करते हैं। वे हर चमकने वाली चीज के पीछे भागते हैं, जिससे सभी को पता चल जाता है कि वे उसका हिस्सा थे। इसका वास्तव में उनसे कोई लेना-देना नहीं होता, लेकिन वे कभी पृष्ठभूमि में नहीं रहना चाहते, वे हमेशा अन्य लोगों द्वारा नीची निगाह से देखे जाने से डरते हैं, वे हमेशा दूसरे लोगों द्वारा यह कहे जाने से डरते हैं कि वे कुछ नहीं हैं, कि वे कुछ भी करने में असमर्थ हैं, कि उनके पास कोई कौशल नहीं है। क्या यह सब उनके शैतानी स्वभावों द्वारा निर्देशित नहीं है? जब तुम इज्जत और रुतबे जैसी चीजें छोड़ने में सक्षम हो जाते हो, तो तुम अपने भीतर अधिक निश्चिंत और अधिक मुक्त हो पाते हो; तुम ईमानदार होने की राह पर कदम रख देते हो। लेकिन कई लोगों के लिए इसे हासिल करना आसान नहीं होता। मिसाल के लिए, जब कैमरा दिखता है, तो लोग आगे आने के लिए धक्कामुक्की करने लगते हैं; वे कैमरे में दिखना पसंद करते हैं, जितनी ज्यादा कवरेज, उतनी बेहतर; वे पर्याप्त कवरेज न मिलने से डरते हैं और उसे प्राप्त करने का अवसर पाने के लिए हर कीमत चुकाते हैं। क्या यह सब उनके शैतानी स्वभावों द्वारा निर्देशित नहीं है? ये उनके शैतानी स्वभाव हैं। तो तुम्हें कवरेज मिल जाती है—फिर क्या? लोग तुम्हारे बारे में अच्छी राय रखते हैं—तो क्या? वे तुम्हारी आराधना करते हैं—तो क्या? क्या इनमें से कोई भी चीज साबित करती है कि तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता है? इसमें से किसी भी चीज का कोई मूल्य नहीं है। जब तुम इन चीजों पर काबू पा लेते हो—जब तुम इनके प्रति उदासीन हो जाते हो और इन्हें महत्वपूर्ण नहीं समझते, जब इज्जत, अभिमान, रुतबा और लोगों की सराहना तुम्हारे विचारों और व्यवहार को अब नियंत्रित नहीं कर पाते, तुम्हारे कर्तव्य निभाने के तरीके को तो बिल्कुल भी नियंत्रित नहीं करते—तब तुम्हारा कर्तव्य निर्वहन और भी प्रभावी हो जाता है, और भी शुद्ध हो जाता है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर ने जो उजागर किया उससे मुझे समझ आया कि लोगों में चाहे कितनी भी काबिलियत हो, वे दूसरों के दिलों में जगह बनाना चाहते हैं और चाहते हैं कि लोग उन्हें नीची नजर से न देखें। भले ही मुझे हकलाने की समस्या थी, लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि लोग मुझे नीची नजर से देखें। चूँकि मैं साफ नहीं बोल पाती थी, तो जब भाई-बहन मुझसे पूछते थे कि मैंने अपनी संगति के दौरान क्या कहा, तो मुझे यही लगता कि वे मुझे नीची नजर से देख रहे हैं। इससे मुझमें हीनभावना आ गई और मैं इतनी नकारात्मक हो गई कि मेरी इच्छा अपना काम करने की भी नहीं होती थी। मुझे अपनी इज्जत गँवाने की बहुत चिंता रहती थी! बचपन से ही मेरे माँ-बाप ने और स्कूली शिक्षा ने मेरे मन में यह शैतानी जहर भर दिया कि “जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है” और “एक व्यक्‍ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवज करता जाता है” और इसने मेरे दिल में गहरी जड़ें जमा लीं। इन बातों से मेरे मन में यह विश्वास जम गया कि इंसान को अपने स्वाभिमान की रक्षा करनी चाहिए और ऐसा काम नहीं करना चाहिए कि दूसरे उसे नीची नजर से देखें। जब मैं अविश्वासियों से बातचीत करती थी तो वे मेरे हकलाने का मजाक उड़ाते थे। मैं न तो घर से बाहर नहीं निकलती थी और न ही अनावश्यक बोलती थी ताकि कोई मुझे नीची नजर से न देखे। अगर बोलती भी तो सिर्फ दो-चार वाक्य या फिर बस मुस्कुरा देती और सिर हिला देती। अगर मैं भाई-बहनों से बातचीत करते समय हकलाती, तो मन ही मन यही अटकलें लगाती “वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे?” “वे मेरे बारे में क्या कहेंगे?” मुझे हमेशा यही लगता कि सब मुझे नीची नजर से देखते हैं, इस कारण मैं बहुत पीड़ा और दबाव में रहती थी। परमेश्वर के वचन खाते-पीते समय मुझे थोड़ी-सी समझ-बूझ हासिल होती थी, लेकिन मुझे यही डर रहता कि संगति करते समय मैं हकला जाऊँगी और भाई-बहन मुझे नीची नजर से देखेंगे, इसलिए मैं संगति न करती। साथ ही मैं विवेकहीन होकर परमेश्वर से माँग करती कि वह हकलाने की समस्या से मुझे छुटकारा दिलाए, बल्कि इसे काम न करने के बहाने के रूप में इस्तेमाल करती। जब भाई-बहनों को कठिनाई आती, तो मैं संगति कर उन्हें दूर करने में उनकी मदद न करती; मैंने उन कर्तव्यों का निर्वहन नहीं किया था जो एक सृजित प्राणी को करना चाहिए। मेरे पास कोई कारण नहीं था; मैं परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह कर रही थी। भले ही लोग मेरा सम्मान करें और मैं अपने शानदार सम्मान का मजा लूँ, लेकिन उससे होगा क्या? इससे मेरे जीवन स्वभाव में तो कोई बदलाव आएगा नहीं, मुझे यही चिंता सताएगी कि इन चीजों ने मेरे सम्मान पर कैसे असर डाला और मुझे परमेश्वर से और दूर ले गईं। अंत में, परमेश्वर मुझे ठुकराकर हटा देगा। इस बात का एहसास होने पर कि अपने अभिमान की रक्षा करने से मुझे बहुत नुकसान होगा, मैंने यह सोचना छोड़ दिया कि भाई-बहन मेरे बारे में क्या सोचते हैं। मैं केवल यही सोचने लगी कि अपना कर्तव्य अच्छे से कैसे निभाऊँ।

एक दिन मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “कुछ समस्याएँ ऐसी होती हैं जिन्हें लोग हल नहीं कर सकते हैं। मिसाल के तौर पर, हो सकता है कि तुम दूसरों से बात करते समय घबरा जाते हो; जब तुम्हें स्थितियों का सामना करना पड़ता है तो हो सकता है कि तुम्हारे पास अपने विचार और नजरिये होते हों, लेकिन तुम उन्हें स्पष्टता से कह नहीं पाते हो। जब बहुत सारे लोग मौजूद होते हैं तो तुम विशेष रूप से घबरा जाते हो; तुम बेतुके ढंग से बोलते हो और तुम्हारा मुँह कँपकँपाता है। कुछ लोग तो हकलाते भी हैं; दूसरे लोगों के मामले में, अगर विपरीत लिंग के सदस्य मौजूद होते हैं तो वे और भी कम बोधगम्य होते हैं, उन्हें यह पता ही नहीं होता है कि क्या कहना है या क्या करना है। क्या इस पर काबू पाना आसान है? (नहीं।) कम-से-कम थोड़े समय में तुम्हारे लिए इस दोष पर काबू पाना आसान नहीं है क्योंकि यह तुम्हारी जन्मजात स्थितियों का हिस्सा है। अगर कई महीनों के अभ्यास के बाद भी तुम घबराते हो तो घबराहट दबाव में बदल जाएगी, जो तुम्हें बोलने, लोगों से मिलने, सभाओं में हिस्सा लेने या धर्मोपदेश देने से डराकर तुम्हें नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगी और ये डर तुम्हें कुचल देंगे। तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम इस मुद्दे पर सोच-विचार कर सकते हो और दूसरों से इस बारे में बात कर सकते हो; देखो कि जब दूसरे लोगों के सामने यह समस्या आती है तो उनकी मानसिकता क्या होती है और वे इसे कैसे सुलझाते हैं और फिर तुम्हें भी इसी तरह से अभ्यास करना चाहिए। ... अगर तुम्हें लगता है कि एक महीने के प्रशिक्षण के बाद भी तुम्हारी स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं हुआ है और तुम्हारे दिल में ऐसा दबाव भी पैदा हो गया है जिससे तुम और ज्यादा घबरा जाते हो, जो तुम्हारे सामान्य कार्य, जीवन और कर्तव्य के निर्वहन को प्रभावित करता है तो तुम्हें प्रशिक्षण जारी रखने की जरूरत नहीं है। अगर तुम अपना कर्तव्य सामान्य रूप से कर पाते हो तो इतना ही काफी है। बस अपने कर्तव्य को अच्छी तरह निभाने पर ध्यान केंद्रित करो—यह सही है। उस कमी, उस दोष को अपने दिल में रखो, खामोशी से परमेश्वर से प्रार्थना करो और फिर बोलने और लोगों से मिलने-जुलने के लिए उपयुक्त अवसर ढूँढ़ो, हर शब्द को साफ-साफ, सुव्यवस्थित और स्पष्ट ढंग से बोलकर तुम जो भी कहना चाहते हो उसे व्यक्त करो। इस तरह तुम्हारी कमी, यह दोष, धीरे-धीरे सुधर जाएगा। संभव है कि एक-दो वर्ष बाद तुम उम्र के साथ ज्यादा परिपक्व हो जाओ और अपने आस-पास के लोगों से ज्यादा परिचित हो जाओ और उनकी नजर, राय और जब सभी एक साथ होते हैं तो उस दौरान बना माहौल अब तुम्हारे लिए दबाव, बंधन या बेबसी पैदा न करे—तब हो सकता है कि इन लोगों के बीच तुम्हारा दोष काबू में आ जाए और दूर हो जाए। इसी प्रकार के व्यक्ति में इस दोष का सबसे गंभीर रूप होता है; वह सिर्फ ऐसे परिवेशों में लंबे समय तक तपतपा कर और प्रशिक्षण लेकर ही इसे दूर कर पाता है। यकीनन, ऐसे लोग भी हैं जो तीन से पाँच महीने की छोटी अवधि में धीरे-धीरे इस दोष को दूर कर लेते हैं। वे आम परिस्थितियों में दूसरों से मिलते-जुलते और बातचीत करते समय घबराते नहीं हैं, सिवाय तब जब उन्हें बड़े अवसरों का सामना करना पड़ता है। इसलिए अगर तुम इस कमी, इस दोष पर थोड़े समय में काबू पा सकते हो तो ऐसा करो। अगर इस पर काबू पाना कठिन है तो इसे लेकर परेशान मत होओ, इससे संघर्ष मत करो और खुद को चुनौती मत दो। यकीनन, अगर तुम इस पर काबू नहीं पा सकते हो तो तुम्हें नकारात्मक महसूस नहीं करना चाहिए। अगर तुम अपने जीवनकाल में इसे कभी दूर न कर पाओ तो भी परमेश्वर तुम्हारी निंदा नहीं करेगा क्योंकि यह तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव नहीं है। तुम्हारा मंच पर आने का भय, तुम्हारी घबराहट और डर—ये अभिव्यक्तियाँ तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव को नहीं दर्शाती हैं; चाहे वे जन्मजात हों या जीवन में बाद के परिवेश के कारण पैदा हुई हों, हद-से-हद वे एक कमी हैं, तुम्हारी मानवता का एक दोष हैं। अगर तुम इसे लंबे समय में, यहाँ तक कि अपने जीवनकाल में भी नहीं बदल पाते हो तो भी इसके बारे में सोचते मत रहो, इसे खुद को बेबस मत करने दो और न ही तुम्हें इसके कारण नकारात्मक बनना चाहिए क्योंकि यह तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव नहीं है; इसे बदलने का प्रयास करने या इससे संघर्ष करने का कोई फायदा नहीं है। अगर तुम इसे बदल नहीं पाते हो तो इसे स्वीकार कर लो, इसे मौजूद रहने दो और इसके साथ सही ढंग से पेश आओ क्योंकि तुम इस कमी, इस दोष के साथ-साथ जी सकते हो—तुममें इसका होना परमेश्वर के अनुसरण और अपने कर्तव्य निर्वहन को प्रभावित नहीं करता है। अगर तुम सत्य स्वीकार कर सकते हो और अपनी पूरी क्षमता से अपने कर्तव्य कर सकते हो तो तुम अभी भी बचाए जा सकते हो; यह तुम्हारे द्वारा सत्य स्वीकार करने और तुम्हारे उद्धार प्राप्त करने को प्रभावित नहीं करता है। इसलिए तुम्हें अक्सर अपनी मानवता में किसी कमी या दोष से बेबस नहीं होना चाहिए और न ही तुम्हें अक्सर नकारात्मक और हतोत्साहित होना चाहिए या यहाँ तक कि न अपने कर्तव्य छोड़ने चाहिए और न सत्य का अनुसरण करना छोड़ना चाहिए और न उसी कारण से बचाए जाने का मौका खोना चाहिए। ऐसा करना बिल्कुल भी उचित नहीं है; ऐसा कोई बेवकूफ, जाहिल व्यक्ति ही करेगा(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। परमेश्वर के वचनों में जैसा कहा गया है, मैं बिल्कुल वैसी ही थी। आजीवन हकलाने की समस्या के कारण, लोगों की भीड़ आस-पास देखकर मैं घबरा जाती जिससे मेरी हकलाहट बढ़ जाती थी। जब लोग मुझे नीची नजर से देखते, तो मेरे आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती थी और मैं अपने तरीके से अपनी हकलाहट को ठीक करना चाहती थी। लेकिन मेरी इच्छा के अनुसार वैसा हुआ नहीं तो मैं और अधिक नकारात्मक होती चली गई और नौबत यहाँ तक आ गई कि अपने कर्तव्य-निर्वहन में भी मेरा मन नहीं लगता था। मुझे यहाँ तक शिकायत हुई कि परमेश्वर ने मेरी हकलाने की समस्या दूर करने में मेरी मदद नहीं की। अब मैं समझ गई कि मेरा हकलाना एक पैदाइशी बीमारी है और इसे मैं सिर्फ इसलिए दूर नहीं कर सकती क्योंकि मैं ऐसा चाहती हूँ। हकलाना कोई चिंता का कारण नहीं है; यह कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है जो सत्य की मेरी खोज में बाधा डाल रहा हो। यह सिर्फ मेरी एक कमी है और अगर मैं इसे सही नजरिए से देखूँ तो कोई दिक्कत नहीं है। अगर भाई-बहन मेरी बात न समझ पाएँ और कोई सुझाव दें तो मुझे शांति से उनकी बात सुनकर उस बात को दोहरा देना चाहिए या धीरे बोलना चाहिए। अपने हकलाने से मुझे इतना नकारात्मक नहीं होना चाहिए कि मैं अपना कर्तव्य-निर्वहन न करूँ। संक्षेप में, किसी को अपनी कमियों को लेकर चिंता नहीं करनी चाहिए। अगर वे उससे उबर सकते हैं तो उबरना चाहिए वरना उन्हें अपनी समस्या का शांति से सामना करते हुए, संगति जारी रखनी चाहिए और अपने कर्तव्य का निर्वहन उचित ढंग से करना चाहिए। हकलाने से विवश होने की कोई आवश्यकता नहीं है। पहले मैं अपनी हकलाने की समस्या को सही ढंग से नहीं समझ पाई थी। मुझे लगता था कि हकलाने का मतलब है कि मैं बेकार हूँ, बोझ हूँ, अपना कर्तव्य नहीं निभा सकती और परमेश्वर को मेरे जैसे व्यक्ति की जरूरत नहीं है। लेकिन इस पूरे समय में, कलीसिया ने कभी भी हकलाने की वजह से मुझे अपने कर्तव्य-निर्वहन के अधिकार से वंचित नहीं किया। वो तो मैं ही इस कमी को सही तरीके से नहीं समझ पाई थी, हमेशा खुद को इसमें उलझाए रखती थी। जब मैं इसे दूर नहीं कर पाई तो नकारात्मक हो गई और शिकायत करने लगी। दरअसल, जब मैंने जानबूझकर हकलाने में कोई बदलाव नहीं किया और थोड़ा धीरे बोलने लगी तो भाई-बहनों को मेरी बात समझ आने लगी और मैं अपना कार्य सामान्य ढंग से करने लगी। वैसा बिल्कुल नहीं था जैसा मैंने सोचा था, कि मैं अपने हकलाने की वजह से अपना कार्य नहीं कर पाऊँगी। जीवनभर मैं अपनी हकलाने की समस्या से परेशान रही। मेरे सहपाठी मुझ पर हंसते थे और मेरे माता-पिता भी मुझे पसंद नहीं करते थे। उनके ठंडे और भेदभावपूर्ण व्यवहार के कारण मैं आत्मसम्मान से नहीं जी पा रही थी। लेकिन जब मैंने परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू किया तो परमेश्वर ने भाई-बहनों के जरिए मेरी मदद कर मुझे प्रोत्साहित किया और जब मैं नकारात्मक और दुखी थी तो उसने अपने वचनों से मेरा मार्गदर्शन किया जिससे मैं इस नकारात्मकता से उबर पाई। अब मैं अपने अनुभव से अच्छी तरह समझ गई हूँ कि परमेश्वर मनुष्य से बेहद प्रेम करता है। लेकिन मैंने हमेशा परमेश्वर को लेकर शिकायत की और उसे गलत समझा; मैं उसकी बेहद ऋणी हूँ। यह सोचकर मैंने परमेश्वर के समक्ष आकर प्रार्थना की, “हे परमेश्वर! तेरे वचनों से मैंने जाना कि कमियाँ होना कोई चिंता का विषय नहीं है, न ही इसका मतलब यह है कि मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा सकती। मैं अपनी कमियों को शांत मन से देखने, तेरे आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होने, अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने और तुझे संतुष्ट करने को तैयार हूँ।”

एक दिन अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े : “लोगों को परमेश्वर के कार्य के बारे में ये धारणाएँ और कल्पनाएँ त्याग देनी चाहिए। विशिष्ट रूप से बात करें तो इसका अभ्यास कैसे किया जाना चाहिए? श्रेष्ठ गुणों या प्रतिभाओं के पीछे मत भागो और अपनी काबिलियत या मूल-प्रवृत्तियों को बदलने का प्रयास मत करो, बल्कि अपनी अंतर्निहित स्थितियों—जैसे कि काबिलियत, क्षमताओं और मूल-प्रवृत्तियों—के तहत परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाओ और हर चीज परमेश्वर की माँग के अनुसार करो। परमेश्वर ऐसी किसी चीज की माँग नहीं करता है जो तुम्हारी क्षमताओं या काबिलियत से परे हो—तुम्हें भी अपने लिए चीजें कठिन नहीं बनानी चाहिए। अगर तुम जो समझते हो और जो प्राप्त कर सकते हो उसके आधार पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करते हो और तुम्हारी खुद की स्थितियाँ जिसकी अनुमति देती है उसी के अनुसार तुम अभ्यास करते हो, तो यह ठीक है(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। “अगर तुम्हारी मानवता का विवेक सामान्य है तो तुम्हें अपनी कमियों और दोषों का सही तरीके से सामना करना चाहिए; तुम्हें उन्हें मान और स्वीकार लेना चाहिए। यह तुम्हारे लिए फायदेमंद है। उन्हें स्वीकारने का मतलब उनसे बेबस होना नहीं है और न ही इसका मतलब उनके कारण अक्सर नकारात्मक होना है, बल्कि इसका मतलब उनसे बेबस न होना है, यह पहचानना है कि तुम भ्रष्ट मानवजाति के एक साधारण सदस्य हो जिसमें अपने खुद के दोष और कमियाँ हैं और कुछ भी शेखी बघारने लायक नहीं है, कि यह परमेश्वर ही है जो लोगों को उनका कर्तव्य निभाने के लिए उन्नत करता है और परमेश्वर उनमें अपने वचन और जीवन को क्रियान्वित करने का इरादा रखता है, ताकि वे उद्धार प्राप्त कर सकें और शैतान के प्रभाव से बच सकें—कि यह पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा लोगों को उन्नत करना है। दोष और कमियाँ हर किसी में होती हैं। तुम्हें अपने दोषों और कमियों को अपने साथ मौजूद रहने देना चाहिए; उनसे मत बचो या उन्हें मत छिपाओ और उनके कारण अक्सर अंदर से दमित महसूस मत करो या यहाँ तक कि उनके कारण हमेशा हीन महसूस मत करो। तुम हीन नहीं हो; अगर तुम पूरे दिल से, पूरी शक्ति से, पूरे मन से और अपनी पूरी क्षमता से अपना कर्तव्य निभा सकते हो और तुम्हारा दिल ईमानदार है तो परमेश्वर के सामने तुम सोने जितने बेशकीमती हो। अगर अपना कर्तव्य निभाते हुए तुम कीमत नहीं चुका सकते और तुममें निष्ठा नहीं है तो अगर तुम्हारी जन्मजात स्थितियाँ औसत व्यक्ति से बेहतर भी हों, तो भी तुम परमेश्वर के सामने बेशकीमती नहीं हो, तुम्हारी कीमत रेत के एक कण जितनी भी नहीं है(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। परमेश्वर के वचन पढ़कर सब कुछ स्पष्ट हो गया। हर इंसान में कमियाँ और दोष होते हैं। कमी होना कोई समस्या नहीं है, इंसान को इसे भूलकर इसकी सही समझ विकसित करनी चाहिए। मेरी हकलाने की समस्या परमेश्वर द्वारा निर्धारित की गई थी, इसे बदलने की कोशिश करके मुझे अपने लिए हालात मुश्किल नहीं बनाने चाहिए थे। मेरे लिए इतना ही काफी था कि मेरा हृदय निर्मल और सच्चा हो और मैं अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा और लगन से निभाऊँ। पहले मुझे यह डर रहता था कि अगर मैं बोलते समय हकलाई तो भाई-बहन मुझे नीची नजर से देखेंगे, इसलिए मैं इस हकलाने की समस्या से छुटकारा पाना चाहती थी। अब मुझे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होकर अपनी कमियों को सही तरीके से समझना था। मुझे एक बहन के अनुभव की याद आई जिसके बारे में मैंने पहले सुना था। उसके हकलाने की समस्या तो मुझसे भी बदतर थी, हमेशा बोलते समय हकलाती थी और उसकी बातें समझना बेहद मुश्किल होता था। उस समय एक कलीसिया कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा गिरफ्तारियों से परेशान थी और उसका सारा काम ठप्प पड़ा था। भाई-बहनों की हिम्मत नहीं थी वहाँ जाने की, लेकिन इस बहन ने खुद आगे बढ़कर कलीसिया में जाकर मदद करने की हिम्मत दिखाई। कुछ लोगों ने सोचा, “वह तो साफ बोल भी नहीं पाती, वहाँ जाकर क्या मदद करेगी?” लेकिन उस बहन की हकलाहट उसके काम में बाधा नहीं बनी। उसने कलीसिया पहुँचकर अगुआ से स्थिति के बारे में जानकारी ली। उसने देखा कि सारे भाई-बहन डर और खौफ के साए में जी रहे हैं, उसने एक-एक कर सबके साथ संगति की। यह देखकर कि बहन बहुत साफ ढंग से नहीं बोल पा रही है, अगुआ ने संगति में शामिल होने की पहल की। इस बहन द्वारा कार्य की बारीकी से जाँच और उसकी निगरानी करने से, अगुआओं और कर्मियों के मन में जिम्मेदारी की भावना पैदा हुई और भाई-बहन सामान्य रूप से अपना कार्य करने लगे। हालाँकि यह बहन बोलते समय हकलाती थी, लेकिन वह इससे विवश नहीं हुई और अपने कार्य में परिणाम लाने में सफल रही। मुझे भी इस बहन की तरह बनना चाहिए और सच्चे दिल से अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। इस तरह परमेश्वर का मार्गदर्शन प्राप्त करना आसान होगा। यह समझ लेने पर, मुझे पता था कि मुझे अपनी कमियों के कारण डरना नहीं है। महत्वपूर्ण यह था कि उनका सही तरीके से सामना किया जाए और अपनी काबिलियत के मुताबिक मैं जो हासिल कर सकती हूँ, उसके अनुसार जी जान से काम करूँ।

अब जब मैं भाई-बहनों की अवस्था में सुधार लाने के लिए काम और उनके साथ संगति कर रही हूँ, तो मैं अब अपनी हकलाहट से विवश नहीं होती। अब चाहे किसी की भी समस्या हो, मैं आवश्यकतानुसार उसकी काट-छाँट करती हूँ और जरूरी हो तो संगति कर उनकी मदद भी करती हूँ। संगति करते समय मैं अपने अनुभवों के आधार पर उनकी समस्याओं को दूर करने के लिए परमेश्वर के प्रासंगिक वचन ढूँढती हूँ, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने से जो भी समझ मुझे हासिल हुई है उससे संगति करती हूँ। कभी-कभी मैं चिंतित हो जाती हूँ और हकलाने लगती हूँ, तो मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि वह मेरा मार्गदर्शन करे ताकि मैं अपने अभिमान के हाथों विवश न हो जाऊँ। फिर मैं धीरे-धीरे बोलने लगती हूँ ताकि भाई-बहन समझ सकें और मैं काम को सही ढंग से कर सकूँ। जब भाई-बहन देखते हैं कि मैं हकला रही हूँ, तो वे मुझे नीची नजर से नहीं देखते जैसा कि मुझे लगता था, वे तो यहाँ तक कहते हैं कि उन्हें मेरी संगति से एक मार्ग मिल गया है। कभी-कभी जब उच्च-स्तरीय अगुआ मेरे काम की जाँच करता है तो मैं घबराकर हकलाने लगती हूँ, उस समय मैं इस कमी को सहज ढंग से लेती हूँ और बोलते-बोलते ही मेरी घबराहट दूर हो जाती है।

इतने बरसों तक मैं अपनी हकलाने की समस्या से ग्रस्त रही। मैं हीन और दबी हुई महसूस करती थी। इस यात्रा के दौरान, मुझे अच्छे से समझ आ गया, परमेश्वर इस बात को महत्व नहीं देता कि कोई इंसान अच्छा वक्ता है या नहीं। वह चाहता है कि हमारा हृदय निर्मल और सच्चा हो। बाह्य तौर पर कितनी भी कमियाँ हों, अगर इंसान पूरी लगन से अपना कर्तव्य निभा सकता है, तो वह परमेश्वर के इरादे के अनुरूप है। जैसा कि परमेश्वर के वचन कहते हैं : “दोष और कमियाँ हर किसी में होती हैं। तुम्हें अपने दोषों और कमियों को अपने साथ मौजूद रहने देना चाहिए; उनसे मत बचो या उन्हें मत छिपाओ और उनके कारण अक्सर अंदर से दमित महसूस मत करो या यहाँ तक कि उनके कारण हमेशा हीन महसूस मत करो। तुम हीन नहीं हो; अगर तुम पूरे दिल से, पूरी शक्ति से, पूरे मन से और अपनी पूरी क्षमता से अपना कर्तव्य निभा सकते हो और तुम्हारा दिल ईमानदार है तो परमेश्वर के सामने तुम सोने जितने बेशकीमती हो(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))

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