64. मेरा बीमार होना परमेश्वर का आशीष था
अप्रैल 2017 में, मैं शारीरिक जाँच के लिए अस्पताल गया और पता चला कि मुझे हेपेटाइटिस बी है। मेरा ट्रांसएमिनेस लेवल 220 U/L तक पहुँच गया था और मेरा हेपेटाइटिस बी सक्रिय था। कलीसिया ने मेरी हालत को ध्यान में रखते हुए, मुझे इलाज के लिए घर भेजने की व्यवस्था की। अपना सामान बाँधते समय, मैंने अपने सहयोगी दो भाइयों को देखा, जो काम पर चर्चा करते हुए हँस-बोल रहे थे। मुझे बड़ी मायूसी हुई और मैंने सोचा, “अब जबकि परमेश्वर का कार्य लगभग समाप्ति पर है, यह हमारे लिए अपना कर्तव्य निभाने और अच्छे कर्म तैयार करने का एक निर्णायक समय है। लेकिन इसके बजाय, मैं ठीक होने के लिए घर जा रहा हूँ। अगर मैं एक-दो साल घर पर रहा और कोई कर्तव्य नहीं कर पाया, तो मैं अच्छे कर्म कैसे तैयार कर पाऊँगा? जब महाविनाश आएँगे, तो मैं निश्चित रूप से उनमें फँस जाऊँगा। अगर मैं मर गया, तो क्या परमेश्वर में मेरा विश्वास व्यर्थ नहीं चला जाएगा? परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने के एक साल से भी कम समय में, मैंने अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ दिया था। कलीसिया ने मुझे जो भी कर्तव्य सौंपे, मैंने कभी उनमें आनाकानी नहीं की और हमेशा उन्हें बेहतर ढंग से करने की पूरी कोशिश की। खासकर, पिछले छह महीनों से मैं संपादन का कर्तव्य कर रहा था। मैं अक्सर सुबह जल्दी उठता और देर रात तक जागता था। जब भी मुश्किलें आईं, मैं कभी पीछे नहीं हटा और उसमें शामिल पेशेवर कौशल को सीखने के लिए कड़ी मेहनत की। मैंने अपने कर्तव्यों में कुछ नतीजे भी हासिल किए थे। मैं अपना कर्तव्य निभाने में इतना उत्साही और सक्रिय रहा था, तो फिर परमेश्वर ने मेरी रक्षा क्यों नहीं की? उसने मुझे यह बीमारी क्यों होने दी?” मैं सच में यह समझ नहीं पा रहा था। सिर उठाकर उन दो भाइयों को देखते हुए, मुझे रश्क हुआ कि वे कितने स्वस्थ हैं और अब भी यहाँ अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, मैं वह जगह छोड़कर घर लौटने वाला था जहाँ मैं अपना कर्तव्य निभा रहा था। मुझे लगा कि मेरा भविष्य बहुत अंधकारमय है, और मैं बेहद निराश था, मेरा पूरा शरीर सुन्न और कमजोर महसूस हो रहा था। जब मैंने सोचा कि यह परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण है और मानवजाति के लिए उद्धार का एकमात्र मौका है, मैं सौभाग्यशाली था कि इस समय में जी रहा हूँ, तो मैं सचमुच यूँ ही छोड़ने को तैयार नहीं था। घर पहुँचकर मुझे तुरंत इलाज करवाना होगा और बीमारी ठीक होते ही अपने कर्तव्य पर लौट आना होगा। इस तरह, मैं और अधिक अच्छे कर्म तैयार करूँगा और मेरे बचाए जाने की आशा भी अधिक होगी।
घर लौटने के बाद, मैंने सुना कि चीनी दवा हेपेटाइटिस बी के इलाज में बहुत प्रभावी है, इसलिए मैंने तुरंत अपने पिता से मेरे लिए कुछ दवाएँ लाने के लिए कहा। मैंने अपने कर्तव्य से संबंधित तकनीकों को सीखना भी जारी रखा, यह सोचते हुए कि बीमारी ठीक होने के बाद, मैं फिर से बाहर जाकर अपना कर्तव्य निभा सकूँगा। मैं डॉक्टर के कहे अनुसार समय पर अपनी दवा लेता रहा, इस उम्मीद में कि मैं जल्दी ठीक हो जाऊँगा। एक महीने बाद, मैं बड़ी उम्मीद के साथ जाँच के लिए अस्पताल गया। जाँच रिपोर्ट मिलने के बाद, मैंने पाया कि मेरे ट्रांसएमिनेस लेवल में कोई कमी नहीं आई थी। मुझे इस पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं हो रहा था और मैंने सोचा, “मैंने इस पूरे महीने समय पर दवा ली है। मेरी हालत में जरा भी सुधार क्यों नहीं हुआ है? परमेश्वर ने मुझे आशीष क्यों नहीं दिया?” कुछ समय बाद, अगस्त महीने के आसपास, एक बहन ने मुझे जंगली अजमोदा नामक एक पौधे के बारे में बताया, जिसका इस्तेमाल कुछ लोगों ने हेपेटाइटिस बी को ठीक करने के लिए किया था। यह सुनकर मैं बहुत उत्साहित हुआ। हालाँकि बहन ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि यह पौधा बहुत जहरीला है और अगर इसे ठीक से संसाधित नहीं किया गया तो यह जानलेवा हो सकता है, फिर भी मैं इसे आजमाना चाहता था। मैंने सोचा कि अगर इससे मेरी बीमारी ठीक हो सकती है तो यह जोखिम उठाना सार्थक है। अप्रत्याशित रूप से, इसे लेने का कोई असर नहीं हुआ और मैं बहुत कष्ट में था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है। उसके बाद, मैं नकारात्मकता में डूब गया। मेरी प्रार्थनाओं में कहने के लिए कुछ नहीं होता था, वे बहुत उदासीन होती थीं; मैंने परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना कम कर दिया, मैं उन तकनीकों को नहीं सीखना चाहता था जिनका मैं पहले अध्ययन करता रहा था और मेरा मन ही नहीं लगता था।
नवंबर के आसपास, एक भाई मेरे लिए एक नुस्खा लेकर आया, यह कहते हुए कि यह विशेष रूप से हेपेटाइटिस बी के इलाज के लिए है। मैं इसे आजमाने के लिए उत्सुक था, लेकिन जब मुझे जंगली अजमोदा से अपने पिछले असफल इलाज की याद आई, तो मैंने मन ही मन सोचा, “क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं केवल दवा पर ध्यान केंद्रित कर रहा हूँ और शायद ही कभी प्रार्थना करता हूँ? ऐसा लगता है कि इलाज के दौरान, मुझे परमेश्वर से और अधिक प्रार्थना करने की जरूरत है। शायद जब परमेश्वर मेरा सच्चा दिल देखेगा, तो वो मुझे आशीष देगा और मेरी बीमारी ठीक कर देगा।” मैंने जल्दी से वह नुस्खा लिया और दवा लेने चला गया। दवा चाहे कितनी भी कड़वी क्यों न हो, मैंने उसे सहन किया और पी लिया। इस दौरान मैंने कई बार परमेश्वर से प्रार्थना की, उसे बताया कि मैं बाहर जाकर अपना कर्तव्य निभाना चाहता हूँ और लगन से सत्य का अनुसरण करना चाहता हूँ। मैं ऐसे “सच्चे” रवैये से परमेश्वर के दिल को छूना चाहता था, ताकि वह मुझे आशीष दे और मैं अपनी बीमारी से उबर जाऊँ। एक महीने बाद, जब मैं जाँच रिपोर्ट लेने गया, तो डॉक्टर ने कहा, “हमने तुम्हारी दो बार जाँच की है। तुम्हारा वायरल लोड बहुत ज्यादा है। तुम्हारा ट्रांसएमिनेस लेवल तो 1,200 से भी ज्यादा है!” मैंने मन ही मन सोचा, “200 से ज्यादा का ट्रांसएमिनेस लेवल ही पहले बहुत गंभीर था। एक हजार से ज्यादा के लेवल का क्या मतलब हो सकता है?” मैं वहीं जड़वत खड़ा रह गया, मुझे याद आया कि किसी ने कहा था कि अगर हेपेटाइटिस बी को ठीक से नियंत्रित न किया जाए, तो यह सिरोसिस या लिवर कैंसर का भी कारण बन सकता है। क्या मुझे भी लिवर कैंसर हो जाएगा? जब मैंने यह सोचा, तो मैं बेहद डरा हुआ और असहाय महसूस करने लगा। मैंने सोचा कि पिछले महीने मैंने अपनी बीमारी को ठीक करने के लिए परमेश्वर से कितनी बार प्रार्थना की थी, लेकिन अब, न केवल मेरी हालत में सुधार नहीं हुआ, बल्कि यह और भी खराब हो गई थी। यह निश्चित रूप से कोई संयोग नहीं था कि मैं बार-बार नाकाम हो रहा था। इतने समय से, मैं बस ठीक होना चाहता था और सोचता था कि चूँकि मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए बेहतर होना चाहता हूँ, इसलिए यह उचित है। लेकिन मैंने इस बारे में कभी नहीं सोचा था कि यह परमेश्वर के इरादों के अनुसार है या नहीं। मैं सोचने लगा, “मेरी हालत के अचानक बिगड़ने में शायद परमेश्वर का इरादा हो। मैं अड़ियल होकर और पश्चात्ताप किए बिना नहीं रह सकता। मुझे प्रार्थना करनी होगी, परमेश्वर का इरादा खोजना होगा और अपना सबक सीखना होगा।” इसलिए, मैंने अपने दिल में सच्चाई से परमेश्वर को पुकारा, “हे परमेश्वर, मेरी हालत बिगड़ने में तेरी अनुमति है। भले ही मैं अभी नहीं समझ पा रहा हूँ कि ऐसा क्यों हो रहा है, मैं अपने दिल में जानता हूँ कि मैं जिसका अनुसरण कर रहा हूँ वह निश्चित रूप से तुम्हारे इरादे के अनुसार नहीं है। मेरी अगुआई कर ताकि मैं तुम्हारे इरादे को समझ सकूँ और तुम्हारे खिलाफ विद्रोह न करूँ।” मैं अस्पताल में एक सीढ़ी पर गुमसुम बैठा, अपने दिल में लगातार परमेश्वर को पुकार रहा था। अचानक मुझे परमेश्वर के कुछ वचन याद आए जो मैंने पहले पढ़े थे : “वह सब जो परमेश्वर करता है सचमुच आवश्यक है और असाधारण महत्व रखता है, क्योंकि वह मनुष्य में जो कुछ करता है उसका सरोकार उसके प्रबंधन और मनुष्यजाति के उद्धार से है। स्वाभाविक रूप से, परमेश्वर ने अय्यूब में जो कार्य किया वह भी कोई भिन्न नहीं है, फिर भले ही परमेश्वर की नजरों में अय्यूब पूर्ण और खरा था” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II)। अय्यूब ने अपनी सारी संपत्ति और बच्चे खो दिए और उस पर बीमारी आ पड़ी, जिससे उसके शरीर को अत्यधिक पीड़ा हुई। सांसारिक लोगों के परिप्रेक्ष्य से, अय्यूब के साथ जो हुआ वह अच्छी बात नहीं बल्कि बुरी बात थी। लेकिन अय्यूब परमेश्वर का भय मानता था। उसने परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं की, वह समर्पण कर सका और उसने परमेश्वर के नाम की स्तुति की। अय्यूब को परीक्षणों का अनुभव करने के बाद परमेश्वर की कुछ समझ हासिल हुई, उसकी आस्था बढ़ गई, उसने और अधिक परमेश्वर का भय माना और तब परमेश्वर उसके सामने प्रकट हुआ। यह कितना बड़ा आशीष था! जब मैंने इस पर विचार किया, तो मुझे एहसास हुआ कि चाहे कितनी भी बड़ी बीमारी या विपत्ति क्यों न आ पड़े या कितना भी कष्ट क्यों न सहना पड़े, अगर तुम सत्य का अनुसरण कर सको और परमेश्वर का इरादा खोज सको, तो तुम अंततः उससे सत्य प्राप्त करोगे और कुछ लाभ पाओगे। परमेश्वर के इरादे नेक होते हैं और वह किसी के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहता। परमेश्वर के इरादे को समझने के बाद, मेरे दिल की गहराई से एक गर्मजोशी का एहसास हुआ। मेरे असहाय और भयभीत दिल को सुकून आया और वह धीरे-धीरे शांत हो गया। मुझे अय्यूब का अनुकरण करना था, समर्पण का रवैया अपनाना था और प्रार्थना करके परमेश्वर का इरादा खोजना था। मुझे विश्वास था कि परमेश्वर मेरी अगुआई करेगा।
अस्पताल का माहौल बहुत शोरगुल वाला था, इसलिए मैं उठा और पास के जंगल में चला गया। जंगल में चलते हुए, मैं फिर से अपनी हालत के बारे में चिंता करने लगा। मैंने सोचा, “इस महीने, मेरा ट्रांसएमिनेस लेवल तेजी से बढ़कर 1,000 से ऊपर पहुँच गया है। अगर यह इसी दर से बढ़ता रहा और यह सच में लिवर कैंसर में बदल गया, तो क्या मेरा सब कुछ खत्म नहीं हो जाएगा? क्या परमेश्वर इस बार सच में मेरी जान लेने वाला है?” जब मैंने मरने के बारे में सोचा, तो मैंने अवचेतन रूप से अपने दिल में प्रतिरोध किया, यह सोचते हुए, “परमेश्वर मुझे क्यों मारना चाहता है? मैं अभी जवान हूँ! क्या मेरी जिंदगी शुरू होते ही खत्म होने वाली है? अगर मैंने परमेश्वर में विश्वास न किया होता, तो क्या मैं इस तरह के परीक्षण से बच जाता? क्या मैं इस बीमारी से बच जाता? भले ही मुझे बचाया नहीं जा सकता, कम-से-कम मैं कुछ और साल तो जी सकता था!” उस पल, मेरे दिल की धड़कन रुक सी गई। मैंने सोचा, “क्या मैं परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं कर रहा हूँ?” मैंने जल्दी से परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं तेरे बारे में शिकायत नहीं करना चाहता, लेकिन मेरा दिल लगातार मौत के विचार से बाधित है। इस मामले को सही ढंग से देखने में मेरी अगुआई करो।” प्रार्थना करने के बाद, मुझे एक भजन याद आया जो मैं अक्सर गाता था, जिसका शीर्षक था “सृजित प्राणी को परमेश्वर के आयोजन की दया पर होना चाहिए” :
1 परमेश्वर तुमसे चाहे कुछ भी माँगे, तुम्हें बस अपनी पूरी ताकत इसमें लगाने की जरूरत है, और मुझे आशा है कि इन अंतिम दिनों में तुम परमेश्वर के समक्ष उसके प्रति अपना लगन दिखाओगे। जब तक तुम सिंहासन पर बैठे परमेश्वर की संतुष्ट मुस्कराहट देख सकते हो, तो भले ही यह तुम्हारी मृत्यु का नियत समय ही क्यों न हो, आँखें बंद करते समय भी तुम्हें हँसना और मुस्कराना चाहिए। जब तक तुम जीवित हो, तुम्हें परमेश्वर के लिए अपना अंतिम कर्तव्य निभाना चाहिए।
2 अतीत में, पतरस को परमेश्वर के लिए क्रूस पर उलटा लटका दिया गया था; परंतु तुम्हें इन अंतिम दिनों में परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, और उसके लिए अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर देनी चाहिए। कोई सृजित प्राणी परमेश्वर के लिए क्या कर सकता है? तुम्हें पहले से ही अपने आपको परमेश्वर को सौंप देना चाहिए, ताकि वह अपनी इच्छा के अनुसार तुम्हारी योजना बना सके। जब तक इससे परमेश्वर खुश और प्रसन्न होता हो, तो उसे तुम्हारे साथ जो चाहे करने दो। मनुष्य को शिकायत के शब्द बोलने का क्या अधिकार है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों के खुलासे, अध्याय 41
मैं धीरे-धीरे वह भजन गुनगुनाने लगा और अनजाने में मेरी आँखों से आँसू बह निकले। परमेश्वर ने मुझे अपने घर में लाकर मुझ पर अनुग्रह किया। मैंने उसके बहुत-से वचन पढ़े हैं और जानता हूँ कि मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया है, कैसे शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट किया गया, कैसे परमेश्वर कदम-दर-कदम मानवजाति को बचाता आ रहा है और अंत के दिनों में परमेश्वर लोगों को कैसे शुद्ध और परिवर्तित करता है। अपना कर्तव्य निभाने में, मैंने पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और अगुआई का अनुभव किया और कुछ सत्यों को भी समझा। मैंने परमेश्वर से इतना कुछ पाया था, लेकिन मैं उसके प्रति बिल्कुल भी आभारी नहीं था। अब जब मेरी हालत बिगड़ गई थी, तो मैंने परमेश्वर के बारे में शिकायत की और यहाँ तक कि उसमें विश्वास करने पर पछताने के विचार भी मेरे मन में आए। क्या यह सचमुच परमेश्वर का दिल तोड़ने जैसा नहीं था? क्या यह विश्वासघात नहीं था? इस दुनिया में रहने वाला हर कोई बीमार पड़ता है और परमेश्वर में विश्वास न करने वाले कितने ही लोग गंभीर बीमारियों और कैंसर से पीड़ित हैं। फिर भी, मैं शिकायत करता रहा, यह सोचते हुए कि अगर मैंने परमेश्वर में विश्वास न किया होता, तो शायद मुझे यह बीमारी न होती। मैं पूरी तरह से विवेकहीन था! भले ही मुझे यह बीमारी हो गई थी, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उसने अपने वचनों से मुझे प्रबुद्ध किया और रास्ता दिखाया, मुझे राहत और सहारा दिया। परमेश्वर को अपने सहारे के रूप में पाकर, मैं अविश्वासियों की तुलना में कहीं ज्यादा खुश महसूस कर रहा था। इसके अलावा, मैं एक सृजित प्राणी हूँ। परमेश्वर ने मुझे बनाया है, अगर वह मेरी जान वापस भी ले ले, तो भी मुझे उसके बारे में शिकायत नहीं करनी चाहिए और परमेश्वर में विश्वास करने पर तो कभी पछताना ही नहीं चाहिए। मुझे समर्पण करना चाहिए। फिर मैंने परमेश्वर से समर्पण की प्रार्थना की और मुझे बहुत सुकून महसूस हुआ। मुझे अब मरने का डर नहीं था।
एक सभा में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा, जिससे मुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव की कुछ समझ मिली। परमेश्वर कहता है : “चूँकि आज के लोगों में अय्यूब जैसी मानवता नहीं है, तो उनका प्रकृति सार, और परमेश्वर के प्रति उनकी मनोवृत्ति क्या है? क्या वे परमेश्वर का भय मानते हैं? क्या वे बुराई से दूर रहते हैं? वे जो परमेश्वर का भय नहीं मानते और बुराई से दूर नहीं रहते हैं उनके बारे में केवल तीन शब्दों में बताया जा सकता है : ‘परमेश्वर के शत्रु।’ तुम लोग ये तीन शब्द अक़्सर कहते हो, किंतु उनका वास्तविक अर्थ तुम लोगों ने कभी नहीं जाना है। ‘परमेश्वर के शत्रु’ शब्दों का एक सारगर्भित पक्ष है : वे यह नहीं कह रहे हैं कि परमेश्वर मनुष्य को शत्रु के रूप में देखता है, बल्कि यह कि मनुष्य परमेश्वर को शत्रु के रूप में देखता है। पहला, जब लोग परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ करते हैं, तब उनमें से किसके पास अपने लक्ष्य, इरादे और महत्वाकांक्षाएँ नहीं होती हैं? उनका एक भाग भले ही परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करता है और परमेश्वर के अस्तित्व को देख चुका होता है, फिर भी वे इरादे परमेश्वर में उनके विश्वास में अब भी समाए होते हैं और परमेश्वर में विश्वास करने में उनका अंतिम लक्ष्य आशीष पाना और उससे अपनी मनचाही चीजें प्राप्त करना होता है। लोगों के जीवन अनुभवों में, वे प्रायः मन ही मन सोचते हैं : ‘मैंने परमेश्वर के लिए अपने परिवार और जीविका का त्याग कर दिया है, और उसने मुझे क्या दिया है? मुझे हिसाब करना चाहिए और इसकी पुष्टि करनी चाहिए—क्या मैंने हाल ही में कोई आशीष प्राप्त किया है? मैंने इस दौरान बहुत कुछ खपाया है, मैं बहुत दौड़ा-भागा हूँ, मैंने बहुत कष्ट सहा है—क्या परमेश्वर ने इस दौरान मेरे प्रदर्शन के बदले में मुझसे कोई वादा किया है? क्या उसने मेरे अच्छे कर्म याद रखे हैं? मेरा परिणाम क्या होगा? क्या मैं आशीष प्राप्त कर सकता हूँ? ...’ अपने हृदय में प्रत्येक व्यक्ति बार-बार ऐसे जोड़-तोड़ करता है और परमेश्वर से चीजों की माँग करते हुए लगातार प्रेरणाएँ, महत्वाकांक्षाएँ और लेन-देन की मानसिकता रखता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य अपने हृदय में लगातार परमेश्वर की परीक्षा लेता रहता है और परमेश्वर के बारे में साजिशें रचता रहता है, अपने परिणाम के लिए परमेश्वर के साथ लगातार ‘मामले पर बहस’ करता रहता है और परमेश्वर से बयान माँगने और यह देखने की कोशिश करता है कि परमेश्वर उसे वह चीज देगा या नहीं जो वह चाहता है। परमेश्वर का अनुसरण करने के साथ ही साथ, मनुष्य परमेश्वर को परमेश्वर नहीं मानता। मनुष्य ने परमेश्वर के साथ हमेशा सौदेबाजी करने की कोशिश की है, उससे अनवरत चीजों की माँग की है और हर कदम पर उस पर दबाव डालते हुए, एक इंच दिए जाने पर एक मील लेने की कोशिश की है। परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करते हुए साथ ही साथ, मनुष्य उसके साथ तर्क-वितर्क भी करता है, और यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो परीक्षण आने पर या अपने आप को किन्हीं खास स्थितियों में पाने पर अक्सर कमजोर, नकारात्मक होते हैं और अपने कार्य में ढिलाई करते हैं और परमेश्वर के बारे में शिकायतों से भरे होते हैं। मनुष्य ने जब पहले-पहल परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ किया था, उसी समय से मनुष्य ने परमेश्वर को एक अक्षय पात्र, एक सर्व-उपयोगी उपकरण माना है और अपने आपको परमेश्वर का सबसे बड़ा साहूकार माना है, मानो परमेश्वर से आशीष और वादे माँगना उसका जन्मजात अधिकार और दायित्व है, जबकि मनुष्य की रक्षा, परवाह और उसकी आपूर्ति करना परमेश्वर की जिम्मेदारियाँ हैं जो परमेश्वर को पूरी करनी चाहिए। ऐसी है ‘परमेश्वर में विश्वास’ के तीन शब्दों की मूलभूत समझ, उन सब लोगों की जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं और ऐसी है परमेश्वर में विश्वास की अवधारणा की उनकी गहनतम समझ। मनुष्य के प्रकृति सार से लेकर उसके व्यक्तिपरक अनुसरण तक, ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमेश्वर के भय से संबंधित हो। परमेश्वर में विश्वास करने में मनुष्य के लक्ष्य का परमेश्वर की आराधना के साथ कोई लेना-देना नहीं हो सकता। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य ने परमेश्वर में अपने विश्वास में परमेश्वर का भय मानने और उसकी आराधना करने का इरादा कभी नहीं किया है और कभी भी यह नहीं समझा है कि परमेश्वर में विश्वास करने के लिए ऐसी चीजों की आवश्यकता है। ऐसी दशा के आलोक में, मनुष्य का सार स्पष्ट है। यह सार क्या है? यह सार यह है कि मनुष्य का हृदय दुर्भावनापूर्ण, कुटिल और धोखेबाज है, वह निष्पक्षता, धार्मिकता और सकारात्मक चीजों से प्रेम नहीं करता है और यह तिरस्करणीय और लोभी है। मनुष्य का हृदय परमेश्वर के लिए पूरी तरह से बंद हो चुका है; वह इसे परमेश्वर को बिल्कुल भी नहीं देता है। परमेश्वर ने मनुष्य का सच्चा हृदय कभी नहीं देखा है, न ही उसकी मनुष्य द्वारा कभी आराधना की गई है। परमेश्वर चाहे जितनी बड़ी कीमत चुकाए, या वह चाहे जितना अधिक कार्य करे, या वह मनुष्य का चाहे जितना भरण-पोषण करे, मनुष्य इन सबके प्रति अंधा और उदासीन ही बना रहता है। मनुष्य ने कभी परमेश्वर को अपना हृदय नहीं दिया है, वह अपना हृदय अपने पास ही रखना, स्वयं अपने निर्णय लेना चाहता है—जिसका निहितार्थ यह है कि मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलना या परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना नहीं चाहता है, न ही वह परमेश्वर के रूप में परमेश्वर की आराधना करना चाहता है। ऐसी है आज मनुष्य की दशा” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II)। परमेश्वर ने उन लोगों के इरादों और तरीकों को उजागर किया है जो उससे सौदा करने की कोशिश में उस पर विश्वास करते हैं। परमेश्वर कहता है कि ऐसे लोगों का सार नीच, लालची, विश्वासघाती और कपटी होता है। परमेश्वर के वचनों के लहजे और शब्द इस तरह के लोगों के प्रति घृणा और नफरत से भरे हुए हैं, मैंने परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता को महसूस किया। जब मैंने परमेश्वर के प्रति उनके व्यवहार की तुलना अपने व्यवहार से की, तो मैंने देखा कि मैंने भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार किया था। जब मुझे पता चला कि अंत के दिनों में, परमेश्वर इस युग को समाप्त करने के लिए काम करने आया है और जो लोग परमेश्वर द्वारा बचाए जाएँगे, वे जीवित रह सकेंगे और अनंत आशीषों का आनंद लेने के लिए राज्य में प्रवेश करेंगे, तो मैं उन आशीषों को तत्परता से पाना चाहता था जो परमेश्वर मनुष्य को देगा, इसलिए मैंने परमेश्वर में विश्वास करने का फैसला किया। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, मैंने उत्साह से अनुसरण किया और एक साल के भीतर मैं पूरे समय अपना कर्तव्य निभाने लगा। मैंने कई मुश्किलों के बावजूद संपादन का कर्तव्य निभाने से मुँह नहीं मोड़ा और पेशेवर कौशल का अध्ययन करने के लिए पहल की, जिसमें बहुत मेहनत की। मैंने सोचा कि चूँकि मैं अपना कर्तव्य निभाने में इतना सक्रिय था, परमेश्वर मुझे जरूर पसंद करेगा और स्वीकृति देगा, जिससे भविष्य में मुझे आशीष पाने की अच्छी उम्मीद होगी। जब मुझे सक्रिय हेपेटाइटिस बी का पता चला, तो मैंने अपने दिल में परमेश्वर के बारे में शिकायत की और सोचा कि परमेश्वर को मुझे बीमार नहीं होने देना चाहिए था क्योंकि मैं अपना कर्तव्य निभाने में इतना सक्रिय था। मैंने सोचा कि अगर मैं ठीक होने के लिए घर गया, तो मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगा और भविष्य में मुझे आशीष नहीं मिलेंगे, इसलिए मैं बहुत दुखी था। घर लौटने के बाद, मैंने अपनी बीमारी को ठीक करने के लिए हर संभव तरीका आजमाया और उम्मीद की कि परमेश्वर मुझे जल्दी ठीक कर देगा। जब मेरी हालत में सुधार नहीं हुआ बल्कि और बिगड़ गई, तो मैं बेहद व्यथित और निराश महसूस करने लगा। मैं अब प्रार्थना करना, परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना या संपादन की तकनीकें सीखना नहीं चाहता था और नकारात्मकता में जी रहा था। बाद में, मैंने परमेश्वर से झूठी प्रार्थनाएँ कीं, यह कहते हुए कि मेरे जीवन की प्रगति धीमी थी क्योंकि मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा रहा था। मेरा असली मतलब परमेश्वर से अपनी बीमारी दूर करने के लिए कहना था ताकि मैं अपना कर्तव्य निभाता रह सकूँ। असल में, मैं बाहर जाकर अपना कर्तव्य परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि अपने भविष्य के गंतव्य की खातिर निभाना चाहता था। मुझे डर था कि अगर मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा पाया, तो मेरा कोई अच्छा गंतव्य नहीं होगा, लेकिन जब मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, तो मैंने कहा कि मैं सत्य का अनुसरण करने और उसे संतुष्ट करने के लिए अपना कर्तव्य निभाना चाहता हूँ। क्या मैं खुलेआम परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश नहीं कर रहा था? मैंने देखा कि परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने का मेरा इरादा केवल उससे आशीषें और लाभ प्राप्त करना था। मैंने बस परमेश्वर से सौदेबाजी करने और माँगें रखने की कोशिश की और मुझमें बिल्कुल भी सच्चाई नहीं थी। मुझे परमेश्वर ने बनाया था और मेरे पास जो कुछ भी है वह परमेश्वर से आता है। मैं भाग्यशाली था कि मैंने परमेश्वर का उद्धार स्वीकार किया—यह सब परमेश्वर का प्रेम है—लेकिन मेरे मन में उसके प्रति बिल्कुल भी कृतज्ञता नहीं थी। मैंने परमेश्वर से सौदेबाजी करने, उसे धोखा देने और उसका इस्तेमाल करने की भी कोशिश की। मुझमें जरा भी जमीर या विवेक नहीं था। मैं कितना नीच था! मुझमें बिल्कुल भी मानवता नहीं थी! अगर परमेश्वर में मेरा विश्वास हमेशा उससे सौदेबाजी करने के प्रयासों से मिलावटी रहता, तो वह मुझे कभी स्वीकृति नहीं देता, चाहे मैं कितने भी कर्तव्य क्यों न करूँ। मेरा स्वार्थी भ्रष्ट स्वभाव बिल्कुल भी नहीं बदला था और मैं अभी भी एक स्वार्थी, नीच, दुष्ट और कपटी व्यक्ति था। जब मैं ऐसा था तो मुझे कैसे बचाया जा सकता था? मैंने सोचा कि कैसे पौलुस ने बहुत सारा काम किया था और बहुत कष्ट सहे थे। लेकिन उसने बिल्कुल भी सत्य का अनुसरण नहीं किया और उसके भ्रष्ट स्वभाव में जरा-सा भी बदलाव नहीं आया। उसने तो परमेश्वर से मुकुट की माँग करने के लिए अपने काम और खुद को खपाने को पूँजी के रूप में इस्तेमाल किया, यह कहते हुए, “मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है” (2 तीमुथियुस 4:8)। इसका मतलब यह था कि अगर परमेश्वर पौलुस को मुकुट नहीं देता तो वह धार्मिक नहीं होता। उसने खुलेआम परमेश्वर के खिलाफ शोर मचाया, जिसने परमेश्वर के स्वभाव को नाराज किया और उसे परमेश्वर द्वारा शापित और दंडित किया गया। जब मैंने इस पर विचार किया, तो मैं डर गया और मुझे एहसास हुआ कि केवल आशीषों का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर में विश्वास करने के गंभीर परिणाम होते हैं। तभी मैं समझा कि मुझे यह बीमारी होने देने में परमेश्वर का नेक इरादा था। मैं कई सालों से परमेश्वर में विश्वास कर रहा था लेकिन मैंने कभी सत्य का अनुसरण नहीं किया; मैंने केवल आशीषों का अनुसरण किया था और परमेश्वर से सौदेबाजी करने की कोशिश की थी। परमेश्वर नहीं चाहता था कि मैं गलत रास्ते पर चलता रहूँ और बर्बाद हो जाऊँ, इसलिए उसने बीमारी का इस्तेमाल करके मेरे रास्ते में रुकावट खड़ी कर दी, आशीषों का अनुसरण करने के मेरे अशुद्ध इरादों का खुलासा किया, मुझे शांत होने और गहराई से आत्मचिंतन करने के लिए मजबूर किया ताकि मैं समय रहते अपने अनुसरण के पीछे के गलत परिप्रेक्ष्य को बदल सकूँ। अगर मुझे यह बीमारी न हुई होती, तो मैं बस खुद को बिल्कुल भी नहीं समझ पाता। तब जाकर मैं परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे को समझा और अचानक, परमेश्वर के बारे में मेरी पिछली गलतफहमियाँ और शिकायतें गायब हो गईं। इसके बजाय, मेरा दिल उसके प्रति कृतज्ञता से भर गया। मुझे एहसास हुआ कि भविष्य में मैं अब परमेश्वर से कोई माँग नहीं कर सकता, चाहे मेरी बीमारी ठीक हो या न हो। इसके बजाय, मुझे ठीक से परमेश्वर में विश्वास करना और उसके प्रति समर्पण करना होगा। कुछ दिनों बाद, मेरे पिता मुझे इलाज के लिए अस्पताल ले गए। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं नहीं जानता कि आज अस्पताल जाने पर मुझे किस स्थिति का सामना करना पड़ेगा। लेकिन मुझे विश्वास है कि हर चीज में तुम्हारे नेक इरादे हैं। मेरी हालत चाहे जैसी भी हो, मैं तुम्हारे प्रति समर्पण करने को तैयार हूँ।” डॉक्टर मेरी जाँच के नतीजे देखकर हैरान रह गया और उसने कहा कि मेरी हालत काफी गंभीर थी। मेरे लिवर को नुकसान पहुँचा था और मुझमें हेपेटाइटिस बी का वायरस बहुत ज्यादा था, इसलिए मुझे तत्काल इलाज की जरूरत थी। यह सुनने के बाद, मैं थोड़ा चिंतित हुआ, लेकिन मुझे जल्द ही एहसास हो गया कि मेरी बीमारी ठीक हो सकती है या नहीं, यह परमेश्वर के हाथों में है। मुझे बस सब कुछ सहज भाव से स्वीकार करना था और इलाज कराना था। जहाँ तक इस सवाल की बात है कि भविष्य में क्या होगा, मैं उसे परमेश्वर को सौंपने को तैयार था। जब मैंने यह सोचा, तो मुझे सुकून महसूस हुआ।
बाद में, मेरे मन में अक्सर एक बेचैनी रहती थी, यह सोचते हुए, “मैं हर दिन घर पर ही रहता हूँ और अपना कर्तव्य नहीं निभा सकता। क्या मैं बेकार नहीं हो जाऊँगा? अगर मैं अपना कर्तव्य निभाने में असफल रहा तो परमेश्वर मुझे स्वीकृति नहीं देगा।” मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उसे खोजा। एक दिन मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और मुझे अभ्यास का मार्ग मिला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मनुष्य के कर्तव्य और उसे आशीष होंगे या हाय का सामना करना होगा, इन दोनों के बीच कोई सह-संबंध नहीं है। कर्तव्य वह है, जो मनुष्य के लिए निभाना आवश्यक है; यह उसकी स्वर्ग द्वारा प्रेषित वृत्ति है, उसे प्रतिफल खोजे बिना, और बिना शर्तों या बहानों के इसे करना चाहिए। केवल इसे अपना कर्तव्य निभाना कहा जा सकता है। आशीष प्राप्त होना उन आशीषों को संदर्भित करता है जिनका कोई व्यक्ति तब आनंद लेता है जब उसे न्याय का अनुभव करने के बाद पूर्ण बनाया जाता है। हाय का सामना करना उस सज़ा को संदर्भित करता है जो एक व्यक्ति को तब मिलती है जब ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद भी लोगों का स्वभाव नहीं बदलता—अर्थात् जब उन्हें पूर्ण नहीं बनाया जाता। लेकिन इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उन्हें आशीष प्राप्त होते हैं या हाय का सामना करना पड़ता है, सृजित प्राणियों को अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए; वह करते हुए, जो उन्हें करना ही चाहिए और वह करते हुए, जिसे करने में वे सक्षम हैं। यह तो कम से कम व्यक्ति को, परमेश्वर का अनुसरण करने वाले व्यक्ति को करना ही चाहिए” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर)। “अगर परमेश्वर में अपनी आस्था और सत्य के अनुसरण में तुम यह कहने में सक्षम हो, ‘इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर कोई बीमारी या अप्रिय घटना मुझपर आने दे—परमेश्वर चाहे कुछ भी करे—मुझे समर्पण करना चाहिए और एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी जगह पर रहना चाहिए। अन्य सभी चीजों से पहले मुझे सत्य के इस पहलू—समर्पण—को अभ्यास में लाना चाहिए, मुझे इसे कार्यान्वित करना और परमेश्वर के प्रति समर्पण की वास्तविकता को जीना ही चाहिए। साथ ही, परमेश्वर ने जो आदेश मुझे दिया है और जो कर्तव्य मुझे करना चाहिए, मुझे उनका परित्याग नहीं करना चाहिए। यहाँ तक कि अंतिम साँस लेते हुए भी मुझे अपने कर्तव्य पर डटे रहना चाहिए,’ तो क्या यह गवाही देना नहीं है? जब तुम्हारा इस तरह का संकल्प होता है और तुम्हारी इस तरह की मनोदशा होती है, तो क्या तब भी तुम परमेश्वर के बारे में शिकायत करोगे? नहीं, तुम ऐसा नहीं करोगे। ऐसे समय में तुम मन ही मन सोचोगे, ‘परमेश्वर ने मुझे यह साँस दी है, उसने इन तमाम वर्षों में मेरा पोषण और मेरी रक्षा की है, उसने मुझे बहुत-से दर्द से बचाया है और मुझे बहुत-सा अनुग्रह और बहुत-से सत्य दिए हैं। मैंने ऐसे सत्यों और रहस्यों को समझा है, जिन्हें लोग कई पीढ़ियों से नहीं समझ पाए हैं। मैंने परमेश्वर से इतना कुछ पाया है, इसलिए मुझे भी परमेश्वर का कर्ज चुकाना चाहिए! पहले, मेरा आध्यात्मिक कद छोटा था, मुझमें कोई बेहतर समझ नहीं थी और मैं हमेशा ऐसे काम करता था जो परमेश्वर को ठेस पहुँचाते थे। संभव है कि भविष्य में मुझे परमेश्वर का ऋण चुकाने का और कोई अवसर न मिले। मेरे पास जीने के लिए चाहे जितना भी समय बचा हो, मुझे अपनी थोड़ी-सी शक्ति भी अर्पित करनी चाहिए और मैं जो कुछ भी करने में सक्षम हूँ, वह सब परमेश्वर को अर्पित करना चाहिए, ताकि परमेश्वर देख सके कि इतने वर्षों तक मेरा भरण-पोषण करना व्यर्थ नहीं गया है, बल्कि उसका फल मिला है, और ताकि मैं परमेश्वर को सांत्वना दे सकूँ और अब उसे ठेस न पहुँचाऊँ या निराश न करूँ।’ यह कैसा लगता है? यह मत सोचो कि खुद को कैसे बचाया जाए या कैसे भागा जाए, यह सोचते हुए, ‘यह बीमारी कब ठीक होगी? जब यह ठीक हो जाएगी, तो मैं अपना कर्तव्य करने और समर्पित रहने की पूरी कोशिश करूँगा। बीमार होने पर मैं कैसे समर्पित रह सकता हूँ? मैं एक सृजित प्राणी का कर्तव्य कैसे निभा सकता हूँ?’ जब तक तुम्हारी एक भी साँस चल रही है, क्या तुम अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम नहीं हो? जब तक तुम्हारी एक भी साँस चल रही है, क्या तुम परमेश्वर का अनादर न करने में सक्षम हो? जब तक तुम्हारी एक भी साँस चल रही है, जब तक तुम्हारा मन स्पष्ट है, क्या तुम परमेश्वर के बारे में शिकायत न करने में सक्षम हो? (हाँ।)” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल परमेश्वर के वचन बार-बार पढ़ने और सत्य पर चिंतन-मनन करने से ही अनुसरण का मार्ग मिल सकता है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मेरा दिल उज्ज्वल हो गया और मैं समझ गया कि हमारे कर्तव्य का इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि हम धन्य होते हैं या दुर्भाग्य झेलते हैं। अपना कर्तव्य निभाना सृजित प्राणियों के रूप में हमारी जिम्मेदारी और मिशन है; यह बस वही है जो हमें करना चाहिए। अपनी धारणाओं में, मैं यह मानता था कि जब तक मैं और अधिक कर्तव्य निभाऊँगा, मुझे अंततः परमेश्वर से आशीष मिलेंगे। मैंने सोचा कि यह ठीक वैसा ही है जैसे अविश्वासी अपने मालिक के लिए काम करते हैं : वे जितना अधिक काम करते हैं, उन्हें उतना ही अधिक वेतन मिलता है। वास्तव में, परमेश्वर ने कभी नहीं कहा कि जब तक हम अपने कर्तव्य निभाते हैं और अधिक कर्तव्य निभाते हैं, वह हमें स्वीकृति और आशीष देगा। यह पूरी तरह से मेरी धारणाओं और कल्पनाओं पर आधारित था और सत्य के अनुरूप बिल्कुल भी नहीं था। अपना कर्तव्य निभाना हमारे लिए परमेश्वर में अपने विश्वास में सत्य का अनुसरण करने और बचाए जाने का एक तरीका है। अगर हम अपना कर्तव्य निभाते हैं लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करते, गलत रास्ता अपनाते हैं और हमारे भ्रष्ट स्वभावों में कोई बदलाव नहीं होता है, तो चाहे हम कितने भी कर्तव्य क्यों न करें, परमेश्वर हमें कभी भी स्वीकृति नहीं देगा। उदाहरण के लिए, मुझे परमेश्वर में विश्वास करते हुए अब कई साल हो गए थे और मैं इस पूरे समय कलीसिया में कर्तव्य निभाता रहा था। लेकिन मैंने अपने भ्रष्ट स्वभाव का समाधान करने के लिए परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। अपना कर्तव्य निभाने का मेरा इरादा हमेशा परमेश्वर से आशीषें प्राप्त करना था, मेरे स्वार्थी और लालची भ्रष्ट स्वभाव में बिल्कुल भी बदलाव नहीं आया था। जब मुझ पर बीमारी आई और मेरी जान को खतरा हुआ, तो मैं परमेश्वर के बारे में भुनभुनाने और शिकायत करने से खुद को रोक नहीं सका। क्या यह परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और प्रतिरोध करना नहीं था? अगर मैं अभी भी सत्य का अनुसरण नहीं करता हूँ, तो अंततः मेरे स्वभाव में बदलाव नहीं आएगा, मैं परमेश्वर के प्रति कोई सच्चा समर्पण या भय बिल्कुल भी नहीं दिखाऊँगा और मैं कोई गवाही नहीं दूँगा। उस स्थिति में, चाहे मैं कितनी भी कोशिश करूँ या कितने भी कर्तव्य निभाऊँ, यह सब व्यर्थ होगा और मुझे बचाया नहीं जा सकेगा। मैंने अय्यूब के बारे में सोचा। उसके युग में, परमेश्वर ने बहुत काम नहीं किया था, न ही उसने मनुष्य को बहुत कुछ सौंपा था। अय्यूब का जीवन मुख्य रूप से चरवाही में बीता, लेकिन उसके दिल में परमेश्वर के लिए एक जगह थी; उसके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल था। अपने जीवन में, वह अक्सर परमेश्वर का इरादा खोजता था और उसने कभी ऐसा कुछ नहीं किया जिससे परमेश्वर नाराज हो। यहाँ तक कि जब उस पर परीक्षण आए और उसने अपनी संपत्ति और बच्चे खो दिए, यहाँ तक कि जब उसका शरीर असहनीय रूप से दर्दनाक फोड़ों से ढक गया, तब भी उसने कभी परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं की। वह फिर भी परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उसके नाम की स्तुति करने में सक्षम था। अय्यूब का वास्तविक जीवन शैतान पर परमेश्वर की विजय की गवाही बन गया और उसे परमेश्वर की स्वीकृति मिली। मैं हमेशा डरता था कि मैं और अधिक कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगा और हटा दिया जाऊँगा। यह मेरी धारणा थी। मेरी बीमारी के कारण मैं जो कर्तव्य निभा सकता था, वे सीमित थे। परमेश्वर मेरी स्थिति से पूरी तरह वाकिफ था। उदाहरण के लिए, कुछ भाई-बहन जेल में होने के कारण अपने कर्तव्य नहीं निभा सकते, लेकिन परमेश्वर ने कभी नहीं कहा है कि वह उन्हें स्वीकृति नहीं देता। परमेश्वर लोगों को इस आधार पर नहीं मापता कि वे कितने कर्तव्य करते हैं; इसके बजाय, वह देखता है कि वे किस रास्ते पर चलते हैं और क्या उनके भ्रष्ट स्वभावों में बदलाव आता है। अब मुझे बस स्वीकार करना और समर्पण करना था, परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए। मैंने परमेश्वर के वचनों का यह विशेष अंश पढ़ा : “यह मत सोचो कि खुद को कैसे बचाया जाए या कैसे भागा जाए, यह सोचते हुए, ‘यह बीमारी कब ठीक होगी? जब यह ठीक हो जाएगी, तो मैं अपना कर्तव्य करने और समर्पित रहने की पूरी कोशिश करूँगा। बीमार होने पर मैं कैसे समर्पित रह सकता हूँ? मैं एक सृजित प्राणी का कर्तव्य कैसे निभा सकता हूँ?’ जब तक तुम्हारी एक भी साँस चल रही है, क्या तुम अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम नहीं हो? जब तक तुम्हारी एक भी साँस चल रही है, क्या तुम परमेश्वर का अनादर न करने में सक्षम हो? जब तक तुम्हारी एक भी साँस चल रही है, जब तक तुम्हारा मन स्पष्ट है, क्या तुम परमेश्वर के बारे में शिकायत न करने में सक्षम हो?” परमेश्वर के वचनों से मैं समझा कि जब परमेश्वर हमसे अपना कर्तव्य निभाने की अपेक्षा करता है, तो इसका मतलब सत्य का अभ्यास करना और उसके लिए गवाही देना है। वह लोगों से अपने लिए मेहनत नहीं करवाना चाहता। भले ही मैं अपनी बीमारी से कभी ठीक न होऊँ और मैं फिर कभी अपना कर्तव्य निभाने के लिए बाहर न जा सकूँ, अगर मैं आशीषें पाने के अपने इरादे को छोड़ सकूँ, परमेश्वर से सौदेबाजी करना बंद कर सकूँ और स्वेच्छा से उसके प्रति समर्पण कर सकूँ, चाहे मुझे आशीषें मिलें या दुर्भाग्य, यह भी एक कर्तव्य है जो मुझे परमेश्वर के सामने करना चाहिए। भविष्य में मेरी बीमारी की स्थिति कैसी भी हो, मुझे लगन से परमेश्वर में विश्वास करना और सत्य का अनुसरण करना जारी रखना चाहिए। जब मैं यह समझ गया, तो मेरा दिल सचमुच उज्ज्वल हो गया और मुझे अब इस बात की चिंता नहीं रही कि मैं अपनी बीमारी से ठीक हो पाऊँगा या नहीं। वह एहसास भारी बेड़ियों को उतार फेंकने जैसी राहत और हल्केपन का था।
उसके बाद, मैंने हर दिन अपने लिए एक योजना बनाई। मैं अपनी भक्ति करता, परमेश्वर के वचनों को खाता और पीता, भजन गाता, संपादन की तकनीकें सीखता और एक बहुत ही संतुष्टिपूर्ण जीवन जी रहा था। बाद में, मैंने सुसमाचार का प्रचार करने के लिए धर्मोपदेश लिखने का भी अभ्यास किया। इससे पहले कि मुझे पता चलता, मैं अपनी बीमारी के बारे में भूल चुका था और कभी-कभी सुबह उठने पर मैं अपनी दवा लेना भी भूल जाता था। जल्द ही एक महीना बीत गया और फिर से जाँच का समय आ गया। मैं अब घबराया हुआ नहीं था और मुझे अब यह उम्मीद भी नहीं थी कि मेरी बीमारी ठीक हो जाएगी; मैं जानता था कि चाहे यह ठीक हो या न हो, मुझे सबक सीखने थे। मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की और शांति से जाँच करवाई। जब मैं जाँच रिपोर्ट लेने गया, तो मैंने देखा कि मेरा ट्रांसएमिनेस लेवल घटकर 34 U/L हो गया था! मुझे डर था कि मैंने गलत पढ़ लिया है, इसलिए मैंने उसे फिर से ध्यान से पढ़ा। यह सचमुच 34 U/L था! मेरे लिवर की कार्यप्रणाली सामान्य हो गई थी और मेरे हेपेटाइटिस बी वायरस का लेवल भी सामान्य सीमा के भीतर आ गया था। अस्पताल से बाहर निकलने तक मुझे विश्वास नहीं हो रहा था; यह एक सपने जैसा लग रहा था। यह वही महीना था जब मैंने अपनी दवा सबसे कम नियमितता से ली थी। कई बार तो मैं लगातार दो दिनों तक अपनी दवा लेना भी भूल गया था, लेकिन मेरी बीमारी मुझे पता चले बिना ही ठीक हो गई थी। यह बात मेरे दिल में पक्की हो गई कि यह परमेश्वर का कर्म था। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर की मुट्ठी में होते हैं और उसके जीवन की हर चीज परमेश्वर की दृष्टि में रहती है। चाहे तुम यह सब मानो या न मानो, एक-एक चीज चाहे वह सजीव हो या मृत, वह परमेश्वर के विचारों के अनुसार ही हटेगी, बदलेगी, नई बनेगी और ओझल होगी। परमेश्वर इसी तरह सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है)। परमेश्वर के वचनों से, मैंने महसूस किया कि सभी चीजें, चाहे जीवित हों या मृत, परमेश्वर के हाथों में हैं और वे सभी परमेश्वर के विचारों के अनुसार बदलती हैं। वे किसी अन्य कारक से प्रभावित नहीं होतीं। यह परमेश्वर का अधिकार है। उदाहरण के लिए, मेरी बीमारी ठीक हो सकती है या नहीं, यह परमेश्वर के हाथों में था। जब मैं एक गलत दशा में जी रहा था, तो चाहे मैंने अपनी बीमारी का कितना भी इलाज किया, वह सुधरने के बजाय और बिगड़ती ही गई। लेकिन जब मुझे खुद की कुछ समझ मिली और मेरी दशा में कुछ बदलाव आया, तो मैं अनियमित रूप से दवा लेने के बावजूद जल्दी ठीक हो गया। परमेश्वर इतना सर्वशक्तिमान है और उसके कर्म कितने चमत्कारी हैं! मैंने तहे दिल से परमेश्वर की स्तुति की। यह बीमारी लगभग एक साल तक बनी रही और उस दौरान मैंने बहुत कष्ट सहे। लेकिन इस अनुभव के माध्यम से मुझे परमेश्वर के अधिकार की कुछ समझ मिली और परमेश्वर में मेरी आस्था बढ़ गई, इसलिए मुझे लगा कि यह बीमारी झेलना सार्थक था!
इस बीमारी के माध्यम से, मैंने परमेश्वर में अपनी आस्था में आशीषों का अनुसरण करने के अपने अशुद्ध इरादों को समझा और मैंने अपना घिनौना पक्ष भी स्पष्ट रूप से देखा : मैं स्वार्थी और नीच था। मैंने देखा कि परमेश्वर ने जो कुछ भी किया वह मुझे शुद्ध करने, मुझे परमेश्वर में आस्था के सही रास्ते पर ले जाने और मुझे मानवता और विवेक के साथ जीने देने के लिए था। यह बीमारी परमेश्वर में मेरी आस्था के मार्ग में एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आई। मैंने सचमुच अनुभव किया कि मुझ पर इस बीमारी का आना परमेश्वर का आशीष था और मैं तहे दिल से परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ!