63. मैं बोझ क्यों नहीं उठाना चाहती थी
जनवरी 2024 में जिला अगुआ ने मुझे पत्र लिखा और सिंचन टीम का अगुआ बनने के लिए कहा। मैंने थोड़ी उलझन महसूस की और सोचा, “सिंचन टीम के अगुआ के रूप में, मुझ पर करीब एक दर्जन कलीसियाओं के सिंचन कार्य की जिम्मेदारी होगी। यह बहुत व्यस्तता और थकान भरा होगा! अभी मैं सिर्फ दो कलीसियाओं के लिए जिम्मेदार हूँ, इसलिए यह ज्यादा थकाऊ नहीं है। यह ऐसे ही ठीक है। इसके अलावा, मुझे सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस है। पहले, मुझे सर्वाइकल डिस्क हर्नियेशन था जिसने मेरी नसों को दबा दिया था और मेरे आधे शरीर को सुन्न कर दिया था, दिमाग तक खून की आपूर्ति कम हो गई थी, अक्सर चक्कर आना, अनिद्रा और दिल में दर्द होता था। यूँ तो अब मैं बेहतर महसूस करती हूँ, लेकिन इतनी सारी कलीसियाओं में सिंचन कार्य के लिए जिम्मेदार होना कितनी चिंता की बात होगी! अतीत में, अक्सर देर तक जागने की वजह से मुझे कुछ बीमारियाँ हो गई थीं। सिंचन टीम के अगुआ के कर्तव्य में काम का भारी बोझ होता है। क्या होगा अगर मैं ज्यादा काम करने से बीमार पड़ गई? नहीं, मुझे होशियार रहना होगा। मुझे अपने कर्तव्य निभाने में बहुत ज्यादा गंभीर नहीं होना चाहिए।” जब मैंने यह सोचा, तो मैंने अगुआ से कहा, “मेरी काम करने की क्षमता खराब है और मैं इतना काम नहीं ले सकती। किसी अधिक उपयुक्त व्यक्ति को ढूँढ़ना बेहतर होगा।” कुछ दिन बाद अगुआ ने मेरे साथ संगति करने के लिए यह कहते हुए मुझे फिर से पत्र लिखा, “तुम भी देख सकती हो कि हमारे सिंचन कार्य के नतीजे अच्छे नहीं हैं। बहुत सारे सिंचनकर्ताओं ने अभी प्रशिक्षण शुरू ही किया है। वे कार्य से परिचित नहीं हैं और उन्हें अभी भी विकसित किए जाने की जरूरत है। तुम एक लंबे समय से यह कर्तव्य निभाती आ रही हो और तुम्हें इसका कुछ अनुभव है। इस समय, तुम्हें परमेश्वर के इरादे के प्रति विचारशील होना चाहिए और यह बोझ उठाना चाहिए। हमसे परमेश्वर की अपेक्षाएँ ऊँची नहीं हैं। अगर हम अपना भरसक प्रयास करते हैं तो वह संतुष्ट होगा।” बहन का पत्र पढ़ने के बाद मुझे बहुत अपराध-बोध महसूस हुआ। कलीसिया में बहुत सारे नए लोग शामिल हो रहे थे और हमें सिंचन कार्य करने के लिए लोगों की वास्तव में जरूरत थी। मुझे अपने दैहिक हितों को त्याग देना चाहिए और यह कर्तव्य संभाल लेना चाहिए।
मैंने सोचा कि कैसे परमेश्वर ने नूह और परमेश्वर द्वारा उसे दिए गए आदेश के प्रति उसके रवैये के बारे में संगति की थी, इसलिए मैंने वह अंश पढ़ने के लिए ढूँढ़ा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जहाज बनाने के दौरान जिस पहली चीज का नूह को सामना करना पड़ा, वह थी अपने परिवार की नासमझी, उनकी नुक्ताचीनी, शिकायतें, यहाँ तक कि बदनामी भी। दूसरी चीज थी आसपास के लोगों—उसके रिश्तेदारों, दोस्तों और सभी तरह के दूसरे लोगों द्वारा उसे बदनाम किया जाना, उसका उपहास उड़ाया जाना और आलोचना किया जाना। लेकिन नूह का केवल एक ही रवैया था और वह था परमेश्वर के वचनों का पालन करना, उन्हें अंत तक पूरा करना और इससे कभी न डगमगाना। नूह ने क्या तय किया था? ‘जब तक मैं जीवित हूँ, जब तक मैं चल-फिर सकता हूँ, तब तक मैं परमेश्वर के आदेश को नहीं छोड़ सकता।’ जहाज के निर्माण के महान उद्यम को पूरा करने के लिए यही उसकी प्रेरणा थी, परमेश्वर की आज्ञा मिलने और उसके वचन सुनने के बाद यही उसका रवैया था। तमाम तरह की परेशानियों, कठिन स्थितियों और चुनौतियों का सामना करते हुए, नूह कभी पीछे नहीं हटा। यहाँ तक कि जब उसके कुछ अधिक कठिन इंजीनियरिंग कार्य बार-बार विफल हुए और चीजें क्षतिग्रस्त हुईं, तो भले ही नूह ने अपने दिल में परेशान और चिंतित महसूस किया, फिर भी जब वह परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचता, जब वह परमेश्वर के आदेश के हर एक शब्द के बारे में और यह सोचता कि कैसे परमेश्वर ने उसे ऊँचा उठाया है, तो अक्सर बेहद प्रेरित महसूस करता : ‘मैं हार नहीं मान सकता, परमेश्वर ने मुझे जो आज्ञा दी है और जो कार्य मुझे सौंपा है, मैं उसे छोड़ नहीं सकता; यह परमेश्वर का आदेश है और चूँकि मैंने इसे स्वीकार किया है, मैंने परमेश्वर के वचन और उसकी वाणी सुनी है, चूँकि मैंने इसे परमेश्वर से स्वीकार किया है, तो मुझे पूरी तरह से समर्पण करना चाहिए और यही वह है जिसे मनुष्य को हासिल करना चाहिए।’ इसलिए चाहे उसे कैसी भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, किसी भी तरह के उपहास या बदनामी का सामना करना पड़ा, उसका शरीर कितना भी कमजोर हुआ, कितना भी थका, लेकिन उसने परमेश्वर द्वारा सौंपा गया काम नहीं छोड़ा, उसने परमेश्वर की कही हर बात और आज्ञा को लगातार दिलो-दिमाग में रखा। चाहे उसके परिवेश जैसे भी बदले, चाहे उसने कैसी भी भयंकर कठिनाइयों का सामना किया, उसे भरोसा था कि इनमें से कुछ भी हमेशा नहीं रहेगा, कि केवल परमेश्वर के वचन ही कभी भी समाप्त नहीं होंगे और केवल वही जो परमेश्वर ने करने की आज्ञा दी है, निश्चित रूप से पूरा होगा। नूह को परमेश्वर में सच्ची आस्था थी और उसमें वह समर्पण था जो उसमें होना चाहिए था, उसने वह जहाज बनाना जारी रखा जिसके निर्माण के लिए परमेश्वर ने उसे आदेश दिया था। दिन गुजरते गए, साल गुजरते गए और नूह बूढ़ा हो गया, लेकिन उसका विश्वास कम नहीं हुआ, परमेश्वर का आदेश पूरा करने के उसके रवैये और दृढ़-संकल्प में कोई बदलाव नहीं आया। यद्यपि ऐसा भी समय आया जब उसका शरीर थकने लगा और उसने शक्तिहीन महसूस किया, वह बीमार पड़ गया, दिल से वह कमजोर हो गया, लेकिन परमेश्वर के आदेश को पूरा करने और उसके वचनों के प्रति समर्पण करने का उसका संकल्प और दृढ़ता कम नहीं हुई। जिन वर्षों में नूह ने जहाज बनाया, उनमें वह परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों को सुनने और उनके प्रति समर्पण करने का अभ्यास कर रहा था, वह उस महत्वपूर्ण सत्य का अभ्यास भी कर रहा था जो परमेश्वर का आदेश पूरा करने के लिए एक सृजित प्राणी और साधारण व्यक्ति को अवश्य करना चाहिए” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, अनुपूरक तीन : कैसे नूह और अब्राहम ने परमेश्वर के वचनों का पालन किया और उसके प्रति समर्पण किया (भाग दो))। नूह के अनुभव ने मुझे वास्तव में द्रवित कर दिया। मैंने देखा कि जब परमेश्वर ने नूह को जहाज बनाने की आज्ञा दी, तो नूह का दिल निष्कपट था। उसने परमेश्वर के वचन सुने और परमेश्वर के प्रति समर्पण किया। यहाँ तक कि जब जहाज बनाने के विशाल काम से सामना हुआ, तो उसने इससे इनकार नहीं किया या बचने की कोशिश नहीं की और उसने कभी यह नहीं कहा कि वह इतना बूढ़ा हो चुका है कि जहाज नहीं बना सकता है। इसके बजाय, उसने अपने हाथ में मौजूद कार्य को विवेकपूर्वक त्याग दिया और जहाज बनाने के लिए विभिन्न साजोसामान तैयार करने लगा। जहाज बनाते समय नूह को बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके अलावा, वह अधिकाधिक बूढ़ा होता जा रहा था। जब वह बहुत अधिक कार्य करता था तो थक जाता था और चूर हो जाता था और वह बीमारी से भी पीड़ित था, लेकिन जहाज बनाने का उसका संकल्प कभी नहीं डगमगाया। वह परमेश्वर के आदेश को हर समय अपने मन में रखता था और आखिरकार जहाज पूरा करने के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहता था। उससे अपनी तुलना करने पर मैंने वास्तव में शर्मिंदगी और अपराध-बोध महसूस किया। मैंने परमेश्वर के इतने सारे वचन सुने थे और कलीसिया ने मुझे बहुत सालों तक विकसित किया था। सिंचन कार्य के नतीजे अच्छे नहीं थे और अगुआ ने मुझे इसके लिए जिम्मेदारी लेने को कहा, लेकिन मैं इसे स्वीकार नहीं करना चाहती थी। मुझे चिंता थी कि मेरा शरीर भारी कार्यभार के तनाव और मानसिक थकान को झेल नहीं पाएगा और मेरी बीमारियाँ और बिगड़ जाएंगी, इसलिए मैंने मना करने के लिए विभिन्न बहाने ढूँढ़ लिए। अगर मुझमें थोड़ा भी विवेक होता, तो मैं शर्तों या कारणों पर चर्चा किए बिना यह कर्तव्य संभाल लेती। लेकिन मैं कर्तव्य को एक बोझ मानती थी और खुद को थकाने के डर से चिंता नहीं करना चाहती थी या दिमाग नहीं खपाना चाहती थी। मेरे पास परमेश्वर के प्रति समर्पणशील दिल बिल्कुल भी नहीं था, उसके इरादे के प्रति विचारशील होना तो दूर की बात है। मैं वास्तव में नूह से बहुत पीछे थी! परमेश्वर का इरादा समझने के बाद मैं समर्पण करने, देह से विद्रोह करने और अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने के लिए तैयार थी। इसके बाद मैंने अगुआ को उत्तर लिखा कि मैं यह कर्तव्य निभाने के लिए तैयार हूँ।
बाद में मैंने आत्म-चिंतन किया, पूछा, “मैं निरंतर अपनी देह का ख्याल करती थी और यहाँ तक कि मैंने अपने कर्तव्य से इनकार कर दिया, तो कौन सा भ्रष्ट स्वभाव मुझे नियंत्रित कर रहा था?” तभी, अगुआ ने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश भेजा : “बहुत सालों से जिन विचारों पर लोगों ने अपने अस्तित्व के लिए भरोसा रखा था, वे उनके दिलों को इस स्थिति तक दूषित कर रहे हैं कि वे विश्वासघाती, डरपोक और नीच हो गए हैं। न केवल उनमें इच्छाशक्ति या संकल्प की कमी है, बल्कि वे लालची, अभिमानी और मनमौजी भी हो गए हैं। उनमें स्वयं से परे जाने के संकल्प का पूरी तरह से अभाव है और इन अंधकारपूर्ण प्रभावों के बंधनों से मुक्त होने का तो लेशमात्र भी साहस नहीं है। लोगों के विचार और जीवन इतने सड़ चुके हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने के पीछे के उनके परिप्रेक्ष्य अभी भी असहनीय रूप से घिनौने हैं और यहाँ तक कि सुनने में भी पूरी तरह से आपत्तिजनक हैं। लोग पूरी तरह से कायर, शक्तिहीन, नीच और कमजोर हैं। वे अंधकार की शक्तियों से बेहद घृणा नहीं करते, वे प्रकाश और सत्य के लिए प्रेम महसूस नहीं करते; इसके बजाय, वे उन्हें निष्कासित करने की पूरी कोशिश करते हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?)। परमेश्वर उजागर करता है कि जब लोग शैतान द्वारा भ्रष्ट हो जाते हैं, तो वे तरह-तरह के शैतानी विष से भर जाते हैं। वे अपने कार्यों और स्व-आचरण में उन विचारों पर निर्भर रहते हैं जो शैतान ने उनके अंदर डाले हैं, जैसे “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “खुद से अच्छे से पेश आओ,” इत्यादि। चूँकि मैं जीवित रहने के इन शैतानी नियमों के अनुसार जीती थी, इसलिए मैं अधिकाधिक स्वार्थी और नीच बन गई और अपनी कथनी-करनी में सिर्फ अपने हितों की परवाह करती थी। मैं अच्छी तरह जानती थी कि सिंचनकर्ताओं को विकसित करने के लिए कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं है और नए लोगों की समस्याओं का समाधान तुरंत नहीं हो पा रहा था, जिसने सिंचन कार्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया था। लेकिन, मैं बस आसान काम चुनना चाहती थी और भारी कार्य से जी चुराना चाहती थी और यह बोझ नहीं उठाना चाहती थी। मैं हमेशा हल्के कर्तव्य चुनना चाहती थी। मुझे लगा कि एक बीमार व्यक्ति होने के नाते मुझे अपनी सेहत का ध्यान रखना था और मैं अब खुद से अत्यधिक कार्य नहीं करवा सकती। मुझे इस बात का पछतावा भी था कि अतीत में देर तक जागने के कारण मुझे कुछ बीमारियाँ हो गई थीं। अब मुझे होशियार बनना था और मैं अपने कर्तव्य करने में बहुत ज्यादा गंभीर नहीं हो सकती थी। मैं हर मोड़ पर अपनी देह की परवाह करती थी; मैंने अपना कर्तव्य टालने के लिए कपटपूर्वक ढेर सारे बहाने भी दिए, कलीसिया के कार्य की जरा भी परवाह नहीं की और परमेश्वर के इरादों के प्रति कोई विचारशीलता नहीं दिखाई। मैं सचमुच स्वार्थी और नीच थी, मुझमें कोई मानवता नहीं थी! अतीत में, मैंने यहाँ तक प्रार्थना की थी और संकल्प लिया था कि मैं हमेशा अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाऊँगी और हर समय परमेश्वर को संतुष्ट करूँगी। लेकिन अब जब मुझे थोड़ी-सी बीमारी और पीड़ा हुई तो मैं देह के प्रति विचारशील हो गई और कार्य करने का अपना संकल्प गँवा बैठी। मुझे एहसास हुआ कि मैंने परमेश्वर से जो भी बातें कही थीं, वे सब झूठ और धोखा थीं और उनमें परमेश्वर के प्रति कोई वफादारी नहीं थी। अतीत में मैं कर्तव्य निभाने के अर्थ के बारे में नए लोगों के साथ संगति भी करती थी, मैं कहती थी, “अपना कर्तव्य निभाना अहम है। तुम सत्य प्राप्त कर सकते हो और बचाए जा सकते हो। अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाने के लिए पीड़ा सहना सार्थक है!” लेकिन, जब कर्तव्य सामने आया तो मैं देह के प्रति विचारशील हो गई और पीड़ा नहीं सहना चाहती थी। क्या नए लोगों के साथ मेरी संगति सिर्फ शब्द और धर्म-सिद्धांत नहीं थी? मेरे जैसे किसी इंसान के लिए, जिसके पास जरा भी वास्तविकता नहीं है, अभी भी परमेश्वर द्वारा बचाए जाने और परमेश्वर का आशीष पाने की चाहत रखना बेहद शर्मनाक था! जब मैं यह समझ गई तो मैंने खुद को परमेश्वर का ऋणी महसूस किया और इसलिए उससे प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं अब तुम्हारा दिल और नहीं दुखाना चाहती। मैं अपनी बीमारियाँ तुम्हारे हाथों में सौंपने के लिए तैयार हूँ, बिना इस बात पर विचार किए कि भविष्य में क्या होगा। मैं अपना दिल अपने कर्तव्य में लगाने और कार्य संभालने के लिए तैयार हूँ।”
इसके बाद, अगुआ ने मुझसे कहा कि मैं सिंचनकर्ताओं के कर्तव्यों में समस्याओं और विचलनों का सारांश तैयार करूँ और साथ ही, नए लोगों की समस्याएँ इकट्ठी करूँ और उनका समाधान करने के लिए परमेश्वर के वचन ढूँढ़ूँ। अचानक, मेरे सामने बहुत सारी चीजें थीं और उस पर भी, मुझे अभी भी सुसमाचार का प्रचार करने में प्रयुक्त धर्मोपदेश लिखने थे। मुझे और भी ज्यादा दबाव महसूस हुआ और मेरा दिल हर दिन तनाव में रहता था। जैसे ही मैं एक काम खत्म करती, करने के लिए दूसरा काम आ जाता और मुझे चिंता होने लगी, “इस सारे काम के लिए समय और मानसिक प्रयास की जरूरत है। अगर मैं ये सब अच्छे से करती हूँ, तो मेरे पास आराम करने के लिए ज्यादा समय नहीं बचेगा। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो क्या मेरा शरीर इसे झेल पाएगा? क्या मेरी बीमारियाँ और गंभीर हो जाएँगी?” इस समय, मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा ठीक नहीं थी और मैं फिर से शरीर के प्रति विचारशील होना और अपने कर्तव्यों से जी चुराना चाह रही थी। यह परमेश्वर के प्रति वफादार होना नहीं था! मैंने सोचा कि कैसे हमसे परमेश्वर की अपेक्षाएँ ऊँची नहीं हैं। अगर लोग अपनी शारीरिक क्षमताओं के दायरे में अपनी भरसक कोशिश करते हैं तो यही काफी है। परमेश्वर लोगों से यह नहीं कहता कि उसके लिए वे खुद को निचोड़ दें या काम कर-करके खुद को मार डालें। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “परमेश्वर ने तुम्हें अतिमानव या महान हस्ती बनने के लिए नहीं कहा है, न ही उसने तुम्हें आकाश में उड़ने के लिए पंख दिए हैं। उसने तुम्हें केवल दो हाथ और दो पैर दिए, जिनसे तुम कदम-दर-कदम जमीन पर चल सकते हो और जरूरत पड़ने पर दौड़ सकते हो। परमेश्वर ने तुम्हारे जो आंतरिक अंग बनाए हैं, वे भोजन को पचाने और अवशोषित करने के लिए हैं, वे तुम्हारे पूरे शरीर को पोषण देते हैं, इसलिए तुम्हें दिन में तीन बार भोजन करने की दिनचर्या का पालन करना चाहिए। परमेश्वर ने तुम्हें स्वतंत्र इच्छा, सामान्य मानवता की सोच, जमीर और विवेक दिया है जो एक इंसान के पास होना चाहिए। अगर तुम इन चीजों का अच्छी तरह से और सही ढंग से उपयोग करते हो, शरीर को जीवित रखने के नियमों का पालन करते हो, अपने स्वास्थ्य की उचित देखभाल करते हो, दृढ़ता से वह सब करते हो जो परमेश्वर तुमसे चाहता है, और वह सब हासिल करते हो जिसकी परमेश्वर तुमसे अपेक्षा करता है, तो इतना काफी है और यह बहुत आसान है। क्या परमेश्वर ने तुमसे कार्य स्वीकार करने और मरते दम तक अपना सर्वश्रेष्ठ करने का प्रयास करने को कहा है? क्या उसने तुम्हें खुद को कष्ट देने के लिए कहा है? (नहीं।) परमेश्वर ऐसी चीजों की अपेक्षा नहीं करता। लोगों को खुद को कष्ट नहीं देना चाहिए, बल्कि उनके पास सामान्य ज्ञान होना चाहिए और उन्हें शरीर की विभिन्न आवश्यकताओं को ठीक से पूरा करना चाहिए। प्यास लगने पर पानी पियो, भूख लगने पर खाना खाओ, थके होने पर आराम करो, देर तक बैठे रहने के बाद व्यायाम करो, बीमार पड़ने पर डॉक्टर के पास जाओ, दिन में तीन बार भोजन करने के नियम का पालन करो और सामान्य मानवता का जीवन जीते रहो। बेशक तुम्हें अपने कर्तव्य भी सामान्य तरीके निभाते रहना चाहिए। अगर तुम्हारे कर्तव्यों में कुछ पेशेवर ज्ञान शामिल है जिसे तुम नहीं समझते, तो तुम्हें अध्ययन करके उसका अभ्यास करना चाहिए। यह सामान्य जीवन है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (12))। परमेश्वर हमसे कहता है कि हम जीवन में सामान्य समझ रखें और अपने शरीरों की जरूरतों के साथ सही ढंग से पेश आएँ। जब हम भूखे हों तो हमें भोजन करना चाहिए और जब हम थके हुए हों तो आराम करना चाहिए; जब हम अपना कर्तव्य करते हुए लंबे समय तक बैठते हैं और असहज महसूस करते हैं, तो हमें उठकर व्यायाम करना चाहिए; जब हम बीमार हों, तो हमें डॉक्टर को दिखाना चाहिए। परमेश्वर में विश्वास करते समय हम अवास्तविक रवैया नहीं अपना सकते और हम शरीर के प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकते। अतीत में, मैं हमेशा यह मानती थी कि मुझे बहुत सारी बीमारियाँ होने का कारण मेरा भारी कार्यभार और अपना कर्तव्य करते समय बहुत चिंता करना था। लेकिन वास्तव में, परमेश्वर यह नहीं चाहता कि लोग मरते दम तक हाड़-तोड़ मेहनत करें। इसके बजाय, वह चाहता है कि लोग अपने कर्तव्य करते समय काम और आराम के बीच संतुलन बनाए रखें। पहले, मैं अपने काम और आराम की समय-सारिणी ठीक से बनाना नहीं जानती थी। मैं अपने कार्य में हमेशा टालमटोल करती थी और अदक्ष थी और मैं लगातार देर तक जागती थी, शरीर के प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन करती थी और बीमार पड़ जाती थी। यह मेरी अपनी मूर्खता के कारण था और कर्तव्य करने से थकने का नतीजा नहीं था। अब, मैं अपना समय ठीक से व्यवस्थित कर सकती हूँ। दिन में मैं अपनी कार्य दक्षता को भरसक सुधारने की कोशिश करती थी और रात में देर तक नहीं जागती थी। उसके बाद, मैंने अपने कामों को उनके महत्व के अनुसार छाँटा और उन्हें एक-एक करके किया। एक महीने बाद मैं इस कर्तव्य की अभ्यस्त हो गई। एक तरफ, मैं सिंचनकर्ताओं को विकसित करती थी; दूसरी तरफ, मैं वास्तव में कुछ नए लोगों का सिंचन और उनकी समस्याएँ हल करती थी। बाकी समय में, मैं धर्मोपदेश और अनुभवजन्य गवाही के लेख लिखती थी। कभी-कभी, जब मैं लंबे समय तक कंप्यूटर पर बैठने के बाद असहज महसूस करती थी, तो मैं कुछ व्यायाम कर लेती थी। यूँ तो इस तरीके से अपना कर्तव्य निभाना थोड़ा थकाऊ था, लेकिन मेरी हालत और नहीं बिगड़ी और मैं अपना कर्तव्य कुशलतापूर्वक कर पा रही थी। हर दिन बहुत ही संतोषजनक होता था और मेरा दिल सुकून और सहज महसूस करता था।
मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश भी पढ़ा और एहसास किया कि जीवन को सार्थक बनाने के लिए कैसे जीना चाहिए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “व्यक्ति के जीवन का मूल्य क्या है? क्या यह केवल खाने, पीने और मनोरंजन जैसे दैहिक सुखों की खातिर है? (नहीं, ऐसा नहीं है।) तो फिर यह क्या है? अपने विचार साझा करो। (एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाना, किसी व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम यह लक्ष्य हासिल करना चाहिए।) सही कहा। मुझे बताओ, यदि जीवन भर किसी व्यक्ति के दैनिक विचार और क्रियाकलाप केवल बीमारी और मृत्यु से बचने, अपने शरीर को स्वस्थ और बीमारियों से मुक्त रखने और दीर्घायु होने की कोशिश पर केंद्रित होते हैं, तो क्या इस ढंग से जीने में कोई मूल्य, कोई अर्थ है? (नहीं।) इस ढंग से जीने में कोई मूल्य नहीं है। तो, किसी व्यक्ति के जीवन का क्या मूल्य होना चाहिए? अभी-अभी, किसी ने एक सृजित प्राणी के कर्तव्य को अच्छी तरह निभाने का जिक्र किया था, जो एक विशिष्ट पहलू है। क्या इसके अलावा कुछ और भी है? मुझे अपनी उन इच्छाओं के बारे में बताओ जो तुममें आम तौर पर प्रार्थना करते या संकल्प लेते समय होती हैं। (हमारे लिए परमेश्वर की व्यवस्थाओं और आयोजनों के प्रति समर्पण करना।) (परमेश्वर ने हमारे लिए जो भूमिका पूर्वनियत की है उसे अच्छी तरह से निभाना, और अपने मिशन और जिम्मेदारी को पूरा करना।) और कुछ? एक ओर, यह सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाने के बारे में है। दूसरी ओर, यह हर उस चीज को अच्छे ढंग से करने के बारे में है जिसे करने की तुममें क्षमता है और जो तुम पूरा कर सकते हो; यह कम से कम उस बिंदु तक पहुँचने के बारे में है जहाँ तुम्हारी अंतरात्मा तुम्हें दोषी नहीं ठहराती है, जहाँ तुम अपनी अंतरात्मा के साथ शांति से रह सकते हो और दूसरों की नजरों में स्वीकार्य पाए जा सकते हो। इसे एक कदम आगे बढ़ाएँ तो चाहे तुम किसी भी परिवार में पैदा हुए हो, चाहे तुम्हारी शैक्षिक पृष्ठभूमि या काबिलियत जो भी हो, अपने पूरे जीवनभर तुम्हें इस बारे में मनन करना ही चाहिए कि जीवन में लोगों के समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण सत्य क्या हैं—उदाहरण के लिए, लोगों को किस प्रकार के मार्ग पर चलना चाहिए, साथ ही उन्हें कैसे जीना चाहिए ताकि उनके पास सार्थक जीवन हों। तुम्हें कम से कम जीवन के असली मूल्य का थोड़ा-सा पता लगाना चाहिए; तुम इस जीवन को व्यर्थ नहीं जी सकते हो और तुम इस पृथ्वी पर व्यर्थ नहीं आ सकते हो। दूसरे संदर्भ में, अपने जीवनकाल के दौरान तुम्हें अपना मिशन पूरा करना चाहिए; यह सबसे महत्वपूर्ण है। हम किसी बड़े मिशन, कर्तव्य या जिम्मेदारी को पूरा करने की बात नहीं करेंगे; लेकिन कम से कम, तुम्हें कुछ तो हासिल करना चाहिए। ... आओ, हम लोगों के लिए ऊँचे मानक न रखें। एक ऐसी स्थिति पर विचार करें जहाँ व्यक्ति को ऐसे कार्य का सामना करना पड़ता है जो उसे अपने जीवनकाल में करना चाहिए या वह करना चाहता है। अपना स्थान पाने के बाद, वह अपनी स्थिति पर अडिग रहता है, अपनी जगह पर टिका रहता है, अपने हृदय का पूरा रक्त और अपनी सारी ऊर्जा खपा देता है, जिस चीज पर काम करना चाहिए और जिसे पूरा करना चाहिए उसे अच्छे से करता है और समाप्त करता है। जब वह अंत में हिसाब देने के लिए परमेश्वर के सामने खड़ा होता है, तो वह अपेक्षाकृत संतुष्ट महसूस करता है, उसके दिल में कोई आत्मग्लानि या पछतावा नहीं होता है। उसे सुकून महसूस होता है और उसे लगता है कि उसने कुछ प्राप्त किया है, उसने एक मूल्यवान जीवन जिया है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (6))। जब मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया, तो मैं समझ गई कि किसी व्यक्ति के जीवन का मूल्य और अर्थ यह है कि मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के कार्य के दौरान एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाया जाए, अपनी क्षमता के अनुसार परमेश्वर के कार्य और वचनों की गवाही दी जाए और परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करने के लिए और अधिक लोगों को परमेश्वर के सामने लाया जाए। यही वह बात है जो परमेश्वर को सबसे ज्यादा खुश करती है। यूँ तो अपना कर्तव्य निभाने से कभी-कभी तुम्हारी देह को थोड़ी पीड़ा हो सकती है, लेकिन इस प्रक्रिया के भीतर सत्य का अनुसरण करने के माध्यम से, तुम बहुत सारे सत्य सिद्धांतों को समझ सकते हो और बहुत सारी चीजों की असलियत देख सकते हो; तुम अपनी खुद की भ्रष्टता और कमियों को भी समझ सकते हो, धीरे-धीरे बदलाव हासिल कर सकते हो और आखिरकार बचाए जा सकते हो। यह कितनी बड़ी बात है! अगर मैं सिर्फ यह सोचूँगी कि कैसे एक अविश्वासी की तरह विभिन्न तरीकों से अपनी सेहत को कायम या सुरक्षित रखूँ तो भले ही मेरा शरीर जीवन शक्ति और सेहत से परिपूर्ण रहे, अंत में, अगर मैंने अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से नहीं निभाया तो सब खोखला रहेगा। मेरे जीवन का कतई कोई मूल्य नहीं होगा। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “लोगों का पूरा जीवन परमेश्वर के हाथों में हैं और अगर परमेश्वर के सामने लिया गया उनका संकल्प नहीं होता, तो मनुष्यों की इस खोखली दुनिया में व्यर्थ रहने के लिए कौन तैयार होता? कोई क्यों परेशानी उठाता? दुनिया में अंदर और बाहर भागते हुए, अगर वो परमेश्वर के लिए कुछ न करे, तो क्या उसका पूरा जीवन व्यर्थ नहीं चला जाएगा? यहाँ तक कि अगर परमेश्वर तुम्हारे कर्मों को उल्लेखनीय नहीं मानता, तो भी क्या तुम अपनी मौत के क्षण में संतुष्टि की एक मुस्कान नहीं दोगे? तुम्हें सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, नकारात्मक दिशा में पीछे नहीं जाना चाहिए—क्या यह बेहतर अभ्यास नहीं है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों के खुलासे, अध्याय 39)। यह सच है। लोगों को जीवित रहते हुए परमेश्वर के लिए कुछ करना चाहिए। वे व्यर्थ नहीं जी सकते। अगर तुम देह में जीते हो, खाते, पीते और मजे करते हो, तो तुम अपना चाहे जितना अच्छे से ख्याल क्यों न रखो, सब व्यर्थ है। तुम सृष्टिकर्ता को नहीं जानते हो और तुमने एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे से नहीं निभाया है। इस तरह जीने का कोई अर्थ नहीं है। अब, आपदाएँ और गंभीर होती जा रही हैं और परमेश्वर का कार्य अपने अंत के करीब पहुँचने वाला है। अपना कर्तव्य निभाने के लिए ज्यादा अवसर नहीं बचे हैं, इसलिए मुझे अब अपना कर्तव्य निभाने के अवसर को सँजोना चाहिए। मैं जिन सत्य सिद्धांतों को समझती हूँ उन्हें सिंचनकर्ताओं के साथ साझा करना चाहिए ताकि वे सत्य को समझ सकें, सिद्धांतों पर पकड़ बना सकें और नए लोगों का ज्यादा प्रभावी ढंग से सिंचन कर सकें। मुझे बिना किसी पछतावे के, वह सब करने का प्रयास करना है जो मैं कर सकती हूँ। भले ही भविष्य में मेरी बीमारियाँ वास्तव में और बिगड़ जाएँ, मुझे समर्पण करना सीखना होगा और अपनी बीमारियाँ परमेश्वर के हाथों में सौंपनी होंगी, उसके आयोजन और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना होगा।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा, जिसने बीमारी के बारे में मेरी शंकाओं और चिंताओं को हल कर दिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यदि तुम सच में मानते हो कि सब कुछ परमेश्वर के हाथ में है, तो तुम्हें यह विश्वास करना चाहिए कि ये सभी चीजें—चाहे गंभीर बीमारियाँ, बड़ी बीमारियाँ, छोटी बीमारियाँ हों या फिर किसी की शारीरिक स्थिति कैसी है—परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन आती हैं, और यह कि किसी गंभीर बीमारी का उभरना और किसी निश्चित उम्र में किसी का स्वास्थ्य कैसा है, ये ऐसी चीजें नहीं हैं जो संयोग से होती हैं। यह एक प्रकार की सकारात्मक और सटीक समझ है। क्या यह सत्य के अनुरूप है? (हाँ।) यह सत्य के अनुरूप है, यह सत्य है। तुम्हें इसे स्वीकार करना चाहिए और इस मामले पर तुम्हारा रवैया और दृष्टिकोण रूपांतरित हो जाने चाहिए। और एक बार जब ये चीजें रूपांतरित हो जाती हैं तो किस चीज का समाधान हो जाता है? क्या तुम्हारी संताप, व्याकुलता और चिंता की भावनाओं का समाधान नहीं हो जाता है? कम-से-कम, बीमारी के बारे में तुम्हारी संताप, व्याकुलता और चिंता की नकारात्मक भावनाएँ संज्ञानात्मक स्तर पर हल हो जाती हैं। क्योंकि इस सत्य ने तुम्हारे विचारों और दृष्टिकोणों को रूपांतरित कर दिया है, इसलिए यह तुम्हारी नकारात्मक भावनाओं का समाधान कर देता है। यह एक पहलू है: कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है या नहीं, उसे कौन-सी गंभीर बीमारी होती है और जीवन के प्रत्येक चरण में उसका स्वास्थ्य कैसा होता है, इसे मनुष्य के संकल्प से नहीं बदला जा सकता है, बल्कि यह सब परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत है। ... आओ ... बीमारी के बारे में बात करें; यह कुछ ऐसा है जिसका अनुभव अधिकतर लोग अपने जीवनकाल में करेंगे। इसलिए, किसी निश्चित समय या किसी निश्चित उम्र में किसी को किस तरह की बीमारी का अनुभव करना है और उसका स्वास्थ्य कैसा रहेगा, ये सभी चीजें परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित हैं और लोग इन चीजों का फैसला खुद नहीं कर सकते हैं; ठीक उसी तरह जैसे जब कोई पैदा होता है तो वह इसका फैसला खुद नहीं कर पाता है। तो क्या जिन चीजों के बारे में तुम फैसला नहीं ले सकते, उनको लेकर तुम्हारा संतप्त, व्याकुल और चिंतित महसूस करना बेवकूफी नहीं है? (है।) लोगों को उन चीजों को सुलझाने में लगना चाहिए जिन्हें वे खुद सुलझा सकें, और जो चीजें वे नहीं सुलझा सकते, उनके लिए उन्हें परमेश्वर की प्रतीक्षा करनी चाहिए; लोगों को चुपचाप समर्पण करना चाहिए और परमेश्वर से विनती करनी चाहिए कि वह उनकी रक्षा करे—लोगों की मानसिकता ऐसी ही होनी चाहिए। जब रोग सचमुच जकड़ ले और मृत्यु सचमुच करीब हो, तो लोगों को समर्पण करना चाहिए, परमेश्वर के खिलाफ शिकायत या विद्रोह नहीं करना चाहिए, या ऐसी चीजें नहीं कहनी चाहिए जो परमेश्वर की ईशनिंदा करती हों या उस पर हमला करती हों। इसके बजाय, लोगों को सृजित प्राणियों के रूप में अपना उचित स्थान ग्रहण करना चाहिए और वह सब अनुभव और महसूस करना चाहिए जो परमेश्वर से आता है—उन्हें अपने लिए चीजों को खुद चुनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यह तुम्हारे जीवन को समृद्ध करने वाला एक विशेष अनुभव हो सकता है और यह अनिवार्य रूप से कोई बुरी चीज नहीं है, है न? इसलिए बीमारी की बात आने पर, जब लोगों के बीमारी के उद्गम से जुड़े गलत विचारों और दृष्टिकोणों का सबसे पहले समाधान होता है, तब उन्हें इसके बारे में अब कोई चिंता नहीं होगी। यही नहीं, लोगों के पास ज्ञात-अज्ञात चीजों पर नियंत्रण करने की कोई शक्ति नहीं है, न ही वे इन्हें नियंत्रित करने में सक्षम हैं क्योंकि ये तमाम चीजें परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं। लोगों के पास जो रवैया और अभ्यास का सिद्धांत होना चाहिए, वह है प्रतीक्षा और समर्पण करना। समझने से लेकर अभ्यास करने तक सब-कुछ सत्य सिद्धांतों के अनुरूप किया जाना चाहिए—यह सत्य का अनुसरण करना है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (4))। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि किसी व्यक्ति के जीवन के हर चरण में उसकी सेहत, उसे क्या बीमारी होगी और क्या वे बीमारियाँ गंभीर बन जाएंगी, परमेश्वर इन चीजों पर संप्रभु है और इन्हें नियत करता है। इनमें से कोई भी चीज ऐसी नहीं है जिसे लोग नियंत्रित कर सकें और चिंताएँ और शंकाएँ किसी काम की नहीं हैं। जब तुम्हारे साथ बीमारियाँ घटित होती हैं, तो तुम्हें यह सीखना चाहिए कि उनसे सही ढंग से कैसे पेश आना है और तुम्हें परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। अतीत में, मैं अक्सर अपनी बीमारियों को लेकर चिंतित और परेशान रहती थी और नकारात्मक भावनाओं के बीच जीती थी। ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझती थी। मुझे यह करना चाहिए कि मैं सामान्य रूप से जिऊँ और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभाऊँ। जहाँ तक यह सवाल है कि क्या मेरी हालत और बिगड़ेगी, यह परमेश्वर पर निर्भर है। मेरी चिंताएँ और शंकाएँ अनावश्यक हैं और मूर्खता और अज्ञानता की अभिव्यक्ति हैं। भले ही किसी दिन मेरी हालत सचमुच और बिगड़ जाए, इसमें परमेश्वर की अनुमति होगी और मुझे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। मुझे याद आया कि कैसे जब अय्यूब पर परीक्षण आए और उसका शरीर पीड़ादायक फोड़ों से ढक गया, तो वह इसे परमेश्वर से स्वीकार कर पाया और उसने परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं की। वह शांत होकर इसका सामना कर पाया और आखिरकार परमेश्वर के प्रति अपनी गवाही में अडिग रहा। जब मुझे यह ख्याल आया तो मैं बहुत शर्मिंदा हो गई और मैं अपनी चिंताएँ और शंकाएँ छोड़ने, अपनी बीमारियाँ परमेश्वर के हाथों में सौंपने और अपना दिल अपने कर्तव्य में समर्पित करने के लिए तैयार थी। जब मुझे जरूरत होती है तो मैं इलाज करवाती हूँ और अपने खाली समय में व्यायाम करती हूँ। जब मैं इस तरह अभ्यास करती हूँ, तो मेरा दिल काफी अधिक सहज और मुक्त होता है और मैं अब अपनी बीमारियों से बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं होती हूँ।
अपने कर्तव्य में इस बदलाव के जरिए मैंने बहुत सारे सबक सीखे और महसूस किया कि एक सृजित प्राणी के रूप में, मुझे हर समय अपने कर्तव्यों पर बने रहना चाहिए। साथ ही, मैं यह भी समझ गई कि मानव जीवन का मूल्य परमेश्वर के वचनों का पालन करना और समर्पित होकर अपना कर्तव्य निभाना है। सिर्फ इसी तरीके से जीने से व्यक्ति निष्कपट और खरा बन सकता है और कोई पछतावा नहीं रख सकता है।