83. क्या मेरी बेटी के लिए मेरा प्यार सच्चा है?
मैं देहात में बड़ी हुई, और मेरे माता-पिता ने ज्यादा पढ़ाई नहीं की थी, इसलिए उनके पास सुबह से शाम तक खेतों में कड़ी मेहनत करने के अलावा कोई चारा नहीं था। मेरे पिता अक्सर मुझसे कहते थे, “हमारे परिवार में, केवल तुम्हारे चाचा ने कड़ी मेहनत से पढ़ाई करके खुद को लायक बनाया और शहर में एक बड़े अधिकारी बने। मैंने बचपन में मन लगाकर पढ़ाई नहीं की, इसलिए अब मैं केवल खेती करके गुजारा कर सकता हूँ। तुम्हें भविष्य में मन लगाकर पढ़ाई करनी होगी—मेरी तरह बिना किसी भविष्य के मत रह जाना।” जब मैंने अपने चाचा को एक शानदार गाड़ी में गाँव लौटते देखा, और हर कोई उनका गुणगान कर रहा था और उन्हें प्रशंसा की नजरों से देख रहा था, तो मैंने उन्हें अत्यधिक सराहा। फिर मैंने देखा कि गाँव वाले मेरे पिता के साथ कितना रूखा व्यवहार करते थे, और मुझे एहसास हुआ कि केवल पढ़ाई करके ही कोई व्यक्ति आगे बढ़ सकता है और जहाँ भी जाए सम्मान पा सकता है। मैंने संकल्प लिया कि मुझे कड़ी मेहनत से पढ़ाई करनी है ताकि मैं भविष्य में दूसरों से ऊपर उठ सकूँ और दूसरों की प्रशंसा पा सकूँ। मैंने कड़ी मेहनत से पढ़ाई की, दूसरों की तुलना में कई गुना ज्यादा मेहनत की, लेकिन हाई स्कूल प्रवेश परीक्षा में मेरा प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा और मुझे केवल एक साधारण वोकेशनल स्कूल में दाखिला मिला। इससे भी ज्यादा अप्रत्याशित बात यह थी कि जब मैंने ग्रेजुएशन पूरा किया, तो सरकार ने छंटनी, कर्मचारियों को कम करना और दक्षता-संचालित नीतियाँ लागू कर दीं, और इससे पहले कि मैं आधिकारिक रूप से काम शुरू करती मुझे मानो निकाल दिया गया। ऐसा लगा जैसे मुझ पर आसमान टूट पड़ा हो और मुझे अब जीवन में दूसरों से ऊपर उठने की कोई उम्मीद नहीं थी। मेरी शादी के बाद, मेरे पति ने अपनी औसत पढ़ाई-लिखाई के कारण एक मजदूर के रूप में काम किया, और हमारा जीवन स्तर साधारण था। अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को देखकर, मैंने देखा कि शिक्षा और डिग्रियों वाले लोग शानदार और ऊँचे दर्जे का जीवन जीते हैं, और बड़ी-बड़ी जगहों पर आते-जाते हैं। इसके साथ खुद की तुलना की तो मुझे और भी ज्यादा शिद्दत से महसूस हुआ कि उच्च स्तर की शिक्षा के बिना, कोई भी इस समाज में सफल नहीं हो सकता, और मेरा जीवन हमेशा ऐसा ही रहेगा। इसलिए मुझे लगा कि भविष्य में, मुझे अपने बच्चे को अच्छी तरह शिक्षित करना होगा और उसे उच्च स्तर की डिग्री हासिल करने में मदद करनी होगी, ताकि वह हमारे खानदान का नाम रोशन कर सके। इस तरह, मेरा भी मान बढ़ेगा।
जब मेरी बेटी चार साल की थी, तो मैंने परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार किया। उस समय, मैं सप्ताह में दो बार सभाओं में जाती थी, और बाकी समय, मैं अपनी बेटी के साथ अंग्रेजी के फ्लैशकार्ड देखती, क्लासिक कविताएँ सुनाती, और उसे साधारण जोड़-घटाव सिखाती। मैं चाहती थी कि उसमें बचपन से ही पढ़ाई के प्रति लगाव पैदा हो। जब वह तीसरी कक्षा में थी, तो मैंने उसे अंग्रेजी और गणित का ट्यूशन देना शुरू किया, इस उम्मीद में कि उसके ग्रेड उसके साथियों से बेहतर होंगे ताकि भविष्य में, उसे एक अच्छे विश्वविद्यालय में दाखिला मिल सके, अच्छी नौकरी मिल सके और वह एक शानदार और सफल जीवन जी सके। मैं अक्सर अपनी बेटी से कहती थी कि वह मन लगाकर पढ़ाई करे ताकि वह भविष्य में दूसरों से ऊपर उठ सके। वह हर बार मुझे उलझन में देखती, ऐसा लगता था कि वह केवल आधा ही समझ पा रही है, लेकिन वह मेरी बात बेमन से मान लेती थी। कभी-कभी जब मैं देखती कि वह पढ़ाई करते-करते ऊब गई है, तो मैं धैर्य से समझाती कि उसे पढ़ने की जरूरत क्यों है, और केवल अच्छे नंबरों से ही उसका भविष्य और नौकरी के अवसर अच्छे हो सकते हैं। उसके चेहरे पर बेबसी का भाव देखकर, मैं मन ही मन सोचती, “अपने बच्चे को अच्छी तरह शिक्षित करना माता-पिता की जिम्मेदारी और दायित्व है। हो सकता है कि वह अभी मुझे न समझे, लेकिन जब वह बड़ी होगी, तो वह मेरे श्रमसाध्य इरादों को समझ जाएगी।”
पाँचवीं कक्षा में, मेरी बेटी के गणित के नंबर बहुत खराब थे। हालाँकि उसके शिक्षक ने सब्र से चीजें समझाईं, उसके सहपाठियों ने उसे पढ़ने में मदद की, और उसने खुद से अभ्यास करने की बहुत कोशिश की, फिर भी उसके परीक्षा परिणाम असंतोषजनक रहे। कभी-कभी तो वह फेल भी हो जाती थी। यह देखकर, मैं बेहद चिंतित हो गई और अपनी बेटी से सख्ती से कहा, “अच्छे नंबरों के बिना, तुम्हें अपने मनचाहे स्कूल में दाखिला नहीं मिलेगा और तुम किसी लायक नहीं रहोगी। दूसरों की नजरों में, तुम कुछ भी नहीं रहोगी और तुम्हारा पूरा जीवन असफल होगा। तुम्हें जल्द से जल्द अपने गणित के नंबर सुधारने का कोई रास्ता खोजना होगा, चाहे कुछ भी हो जाए। अगर नहीं, तो मैं तुम्हें आसानी से नहीं छोड़ूँगी।” मेरी बेटी ने सहमकर मुझे देखा, इतनी डरी थी कि बोल नहीं पा रही थी, उसका चेहरा डर के मारे सफेद पड़ गया था। उसे इस तरह देखकर, मैं थोड़ी नरम पड़ गई—वह कड़ी मेहनत कर रही थी, और उसके गणित के नंबर खराब इसलिए नहीं थे कि उसने सीखने से मना किया था। मैं सोचने लगी कि क्या मैंने बहुत ज्यादती कर दी है। लेकिन फिर मैंने सोचा, “अगर मैं अभी सख्ती नहीं करूँगी, तो हो सकता है कि बाद में उसे अच्छी नौकरी पाने के मौके न मिलें। उसका कोई भविष्य ही न हो इससे बेहतर होगा कि वह अभी मुझसे नफरत करे।” इधर-उधर पूछताछ करने के बाद, मैंने अपनी बेटी को ट्यूशन देने के लिए कई सालों के अनुभव वाले एक शिक्षक को ढूँढ़ लिया। जब उसकी ट्यूशन का समय होता, तो मैं अपना काम एक तरफ रख देती और साथ में सुनती भी थी। मैं उन हिस्सों को नोट कर लेती जो मेरी बेटी को समझ नहीं आते थे, और जब हम घर पहुँचते, तो मैं उसे फिर से उन पर काम करवाती। जब वह फिर भी उन्हें नहीं कर पाती, तो मैं गुस्सा हो जाती और उसे ज़ोर से डांटते हुए कहती, “क्या तुम्हें लगता है कि अगर तुम ऐसे ही रही तो तुम्हें उच्च रैंकिंग वाले हाई स्कूल में दाखिला मिलेगा?” मेरी बेटी डर के मारे सिमट गई, आहत होकर उसकी आँखों में आँसू भर आए। मेरा दिल पसीज गया और मैंने सोचा, “शायद मुझे बस चीजों को अपने हिसाब से चलने देना चाहिए—वह जितना सीख सकती है उतना सीखे। क्या होगा अगर इस सारे दबाव के कारण वह अवसाद में डूब जाए?” लेकिन फिर मैंने तुरंत सोचा, “अभी उसकी शिक्षा में ढील देने का सीधा असर उसके भविष्य पर पड़ेगा। मुझे माता-पिता के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।” इसलिए मैं अपनी बेटी पर पढ़ाई के लिए दबाव डालती रही। मेरी बेटी शुरू से ही अंतर्मुखी थी, और मेरे द्वारा डाले गए दबाव के कारण, उसका आत्मविश्वास और भी गिर गया। बुरे सपनों के कारण वह अक्सर चौंककर जाग जाती थी, उसके ग्रेड और भी गिर गए और हमारे रिश्ते में दिनोंदिन दूरी आती गई। यह देखकर मैं बहुत चिंतित हो गई। एक तरफ, मुझे चिंता थी कि उसके खराब ग्रेड उसके भविष्य को प्रभावित करेंगे, लेकिन दूसरी तरफ, मेरा दिल उसके लिए दुखता भी था और मुझे उस पर इतना दबाव डालने का अपराधबोध भी होता था। ये परस्पर विरोधी भावनाएँ आपस में उलझी हुई थीं और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। मैं सोचती रही, “क्या अपनी बेटी के साथ ऐसा व्यवहार करना प्यार है? अगर यह है, तो क्या इससे उसे आज़ाद और सहज महसूस नहीं होना चाहिए? लेकिन मैं स्पष्ट रूप से महसूस कर सकती हूँ कि वह और दुखी हो गई है और उसका आत्मविश्वास गिर गया है। न केवल उसके ग्रेड में सुधार नहीं हुआ है—वे और भी गिर गए हैं, और अब वह बुरे सपनों से चौंककर जाग जाती है। क्या अपने बच्चे को शिक्षित करने का मेरा तरीका गलत हो सकता है?” मुझे नहीं पता था कि क्या करना है, इसलिए मैं प्रार्थना करती रही, परमेश्वर से मेरा मार्गदर्शन करने को कहा कि मैं अपनी समस्याएँ समझ सकूँ।
एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और मुझे अपनी दशा के बारे में कुछ समझ मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “वास्तव में, मनुष्य की आकांक्षाएँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, उसकी इच्छाएँ चाहे कितनी भी यथार्थपरक क्यों न हों या वे कितनी भी उचित क्यों न हों, वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है और वह सब जो मनुष्य खोजता है, वह अटूट रूप से दो शब्दों से जुड़ा है। ये दो शब्द हर व्यक्ति के लिए उसके संपूर्ण जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर बैठाना चाहता है। वे दो शब्द कौन-से हैं? वे हैं ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ।’ शैतान एक बहुत ही सौम्य तरीका चुनता है, एक ऐसा तरीका जो मनुष्य की धारणाओं के बहुत ही अनुरूप है और जो बहुत आक्रामक नहीं है, ताकि वह लोगों से अनजाने में ही जीवित रहने के अपने साधन और नियम स्वीकार करवा ले, जीवन लक्ष्य और जीवन की दिशाएँ विकसित करवा ले और जीवन की आकांक्षाएँ रखवाने लगे। अपने जीवन की आकांक्षाओं के बारे में लोगों के वर्णन कितने ही आडंबरपूर्ण क्यों न लगते हों, ये आकांक्षाएँ हमेशा ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ’ के इर्द-गिर्द घूमती हैं। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति—या वास्तव में कोई भी व्यक्ति—जीवन भर जिन सारी चीजों का पीछा करता है वे केवल इन दो शब्दों से जुड़ी होती हैं : ‘प्रसिद्धि’ और ‘लाभ।’ लोगों को लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास ऊँचे रुतबे और अपार धन-संपत्ति का आनंद लेने और जीवन का आनंद लेने के लिए पूँजी आ जाती है। उन्हें लगता है कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए तो उनके पास वह पूँजी होती है जिसका इस्तेमाल वे सुख खोजने और देह के उच्छृंखल आनंद में लिप्त रहने के लिए कर सकते हैं। लोग जिस प्रसिद्धि और लाभ की कामना करते हैं उसकी खातिर वे खुशी से और अनजाने में, अपने शरीर, दिल और यहाँ तक कि अपनी संभावनाओं और नियतियों समेत वह सब जो उनके पास है, शैतान को सौंप देते हैं। वे ऐसा बिना किसी हिचकिचाहट के करते हैं, बिना एक पल के संदेह के करते हैं और उनके पास कभी जो कुछ था उसे वापस लेने की जागरूकता के बिना करते हैं। लोग जब इस प्रकार खुद को शैतान को सौंप देते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं तो क्या वे खुद पर कोई नियंत्रण बनाए रख सकते हैं? कदापि नहीं। वे पूरी तरह से और शत-प्रतिशत शैतान से नियंत्रित होते हैं। वे पूरी तरह से और सर्वथा इस दलदल में धँस जाते हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ रहते हैं” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे यह समझने में मदद की कि इतने सालों से, मैं वास्तव में पूरी तरह से शैतान के धोखे में जी रही थी। मुझे याद आया कि कैसे बचपन से ही मेरे माता-पिता ने मेरे दिमाग में ये बातें बिठाई थीं, और मैंने “आदमी ऊपर की ओर जाने के लिए संघर्ष करता है; पानी नीचे की ओर बहता है” और “भीड़ से ऊपर उठो और अपने पूर्वजों का नाम करो” को अपने अनुसरण के लक्ष्य के रूप में ले लिया था। ऊपर उठने के लिए, मैंने छात्र रहते हुए दूसरों की तुलना में कई गुना कड़ी मेहनत की, लेकिन मैं अपनी हाई स्कूल प्रवेश परीक्षा में फेल हो गई और बाद में अच्छी नौकरी पाने में असमर्थ रही। इस प्रकार, मैं खुद से आशा रखना छोड़ने लगी और मैंने जीवन में आत्मविश्वास खो दिया। अपनी बेटी के पैदा होने के बाद, मैंने अपनी सारी उम्मीदें उस पर लगा दीं। पढ़ाई में उसकी रुचि विकसित करने के लिए, मैंने उसे छोटी उम्र से ही ज्ञान देना शुरू कर दिया, और परिणामस्वरूप, उसने बचपन की खुशी खो दी। जब उसने स्कूल जाना शुरू किया और मैंने देखा कि उसके गणित के नंबर खराब थे, तो मैंने उसके ग्रेड सुधारने के लिए उसे ट्यूशन लेने के लिए मजबूर किया, और जब उसमें सुधार नहीं हुआ, तो मैं गुस्सा हो गई और उसे डांटा। मैं उसे समझती नहीं थी और उसके प्रति बिल्कुल भी दयालु नहीं थी। क्योंकि मैं उस पर दबाव डालती रही, इसलिए उसका कोमल दिल भारी तनाव से बोझिल हो गया, और हम एक-दूसरे से और भी दूर होते चले गए। बाहर से, ऐसा लगता था कि मैं यह सब उसकी भलाई के लिए कर रही हूँ, लेकिन सच में, मैं अपने अधूरे सपने उस पर थोप रही थी, उसे मेरी ओर से उन्हें पूरा करने के लिए मजबूर कर रही थी और उसे वह साधन मान रही थी जिससे मैं ऊपर उठ सकूँ। मुझमें वास्तव में मानवता की कमी थी! यह सब महसूस करते हुए, मुझे गहरा पछतावा हुआ। मैं शैतान द्वारा मूर्ख बनना और नुकसान उठाना जारी नहीं रखना चाहती थी।
मैंने खोजना जारी रखा और मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “कोई व्यक्ति अपने जन्म, परिपक्व होने, या अपने विवाह से चाहे कितना ही असंतुष्ट क्यों न हो, हर एक व्यक्ति जो इनसे होकर गुज़र चुका है, जानता है कि वह यह चुनाव नहीं कर सकता कि उसे कहाँ और कब जन्म लेना है, उसका रूप-रंग कैसा होगा, उसके माता-पिता कौन होंगे और कौन उसका जीवनसाथी होगा, वरन वह केवल स्वर्ग की इच्छा को स्वीकार कर सकता है। फिर भी जब लोगों के लिए अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करने का समय आता है, तो वे अपने जीवन के प्रथम हिस्से की उन सभी इच्छाओं को पूरा करने का भार अपने वंशजों पर डाल देते हैं जिन्हें वे स्वयं पूरा करने में असफल रहे थे। ऐसा वे इस उम्मीद में करते हैं कि उनकी संतान उनके जीवन के प्रथम हिस्से की समस्त निराशाओं की भरपाई कर देगी। ... लोग यह जानते हैं कि उनमें योग्यता का अभाव है और वे इस जीवन में कुछ नहीं कर पाए हैं, और उनके पास भीड़ से ऊपर उठने का न तो दूसरा अवसर होगा, न फिर ऐसी कोई आशा होगी और यह भी कि उनके पास अपने भाग्य को स्वीकार करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं होगा। और इसलिए, वे अपनी समस्त आशाओं, अपनी अतृप्त इच्छाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने का भार अगली पीढ़ी पर डाल देते हैं, इस उम्मीद से कि उनकी संतान उनके सपनों को पूरा करने और उनकी इच्छाओं को साकार करने में उनकी सहायता कर सकती है; कि उनके बेटे-बेटियाँ परिवार के नाम को गौरवान्वित करेंगे, प्रमुख रुतबा हासिल करेंगे या समृद्ध या प्रसिद्ध बनेंगे। संक्षेप में, वे अपने बच्चों को बहुत ऊँचाई पर पहुँचते देखना चाहते हैं। लोगों की योजनाएँ और कल्पनाएँ उत्तम होती हैं; क्या वे नहीं जानते कि अपने बच्चों की संख्या, अपने बच्चों का रंग-रूप, योग्यताएँ इत्यादि तय करना उन पर निर्भर नहीं है, अपने बच्चों का भाग्य अपने हाथ में होना तो दूर की बात है? मनुष्य अपने भाग्य के स्वामी नहीं हैं, फिर भी वे युवा पीढ़ी के भाग्य को बदलने की आशा करते हैं; वे स्वयं अपने भाग्य से बचकर नहीं निकल सकते, फिर भी वे अपने बेटे-बेटियों के भाग्य में हेर-फेर करने की कोशिश करते हैं। क्या वे अपने आप को अपनी क्षमता से बढ़कर नहीं आँक रहे हैं? क्या यह मनुष्य की मूर्खता और अज्ञानता नहीं है?” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। “कोई किस पेशे में संलग्न होता है, वह अपनी आजीविका के लिए क्या करता है और जीवन में उसके पास कितना धन होता है, यह उसके माता-पिता, उसकी प्रतिभा या उसके प्रयासों और महत्वाकांक्षाओं पर निर्भर नहीं करता—यह सृष्टिकर्ता की पूर्वनियति पर निर्भर करता है” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। परमेश्वर के वचनों ने मेरी असल दशा को उजागर कर दिया। मैंने वाकई अपनी अधूरी इच्छाएँ अपनी बेटी पर डाल दी थीं, इस उम्मीद में कि वह दूसरों से अलग दिखेगी और मेरी इच्छाएँ पूरी करेगी। इसलिए मैंने अपने प्रयासों से उसकी नियति को नियंत्रित करने के लिए हर संभव कोशिश की। दरअसल, हर व्यक्ति की नियति परमेश्वर के हाथों में है, लेकिन मैं परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं पहचानती थी। मैं “ज्ञान तुम्हारा भाग्य बदल सकता है” और “किसी व्यक्ति की नियति उसी के हाथ में होती है” जैसे भ्रामक विचारों के सहारे जी रही थी, और मैं हमेशा अपनी बेटी के भविष्य को नियंत्रित करना चाहती थी। मैंने अपने आस-पास के उन सभी मजदूरों के बारे में सोचा जिनके पास ज्ञान था, फिर भी इसके कारण उनकी नियति नहीं बदली थी। मैं इसका एक प्रमुख उदाहरण थी। मैंने हमेशा ज्ञान के माध्यम से अपनी नियति बदलने की कोशिश की, लेकिन ग्रेजुएशन के बाद मुझे तुरंत निकाल दिया गया, और मुझे नौकरी पाने या जो मैंने पढ़ा था उसका उपयोग करने का मौका भी नहीं मिला। मैंने देखा कि किसी व्यक्ति की नियति उसके अपने हाथों में नहीं होती, और फिर भी मैंने भ्रम में रहकर अपनी बेटी की नियति को नियंत्रित करने की कोशिश की। मैं कितनी अहंकारी और अज्ञानी थी और मैंने वास्तव में खुद को बहुत ज्यादा आंका था! मेरी बेटी की नियति और करियर परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत हैं, और ये ऐसी चीजें नहीं हैं जिन्हें मानवीय प्रयास या पढ़ाई से बदला जा सके। मैंने अपने पति के दोस्त के बारे में सोचा, जिसने केवल प्राइमरी स्कूल तक पढ़ाई करने के बावजूद, पूरे देश में कई चेन स्टोर खोलने में कामयाबी हासिल की, और कई कॉलेज ग्रेजुएट वहाँ नौकरी माँगते हैं। इस साफ अंतर ने मुझे और भी स्पष्ट रूप से दिखा दिया कि ज्ञान किसी व्यक्ति की नियति नहीं बदल सकता, और मुझे अपनी बच्ची की पढ़ाई को स्वाभाविक रूप से चलने देना चाहिए। उसके बाद, मैंने अपनी बेटी को अपनी माँगों के अनुसार पढ़ाई करने के लिए मजबूर नहीं किया, और मैंने उसे रटने वाली कक्षाओं में दाखिला दिलाना भी बंद कर दिया। इसके बजाय, मैंने उसे लेकर हर बात को परमेश्वर के हाथों में सौंप दिया। मैंने अपनी बेटी को सुसमाचार का प्रचार भी किया। जब भी उसके पास समय होता, वह अपनी उम्र के भाई-बहनों के साथ सभा में शामिल होती, और उसकी मानसिक दशा में सुधार होता रहा।
बाद में, मैंने परमेश्वर के नवीनतम वचन पढ़े और मैंने अपनी समस्याओं को और अधिक स्पष्ट रूप से देखा। मुझे यह भी समझ में आ गया कि माता-पिता को वास्तव में अपने बच्चों के प्रति क्या जिम्मेदारियाँ निभानी चाहिए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “माता-पिता की व्यक्तिपरक चेतना के भीतर, उनके पास अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सभी प्रकार की धारणाएँ, योजनाएँ और निर्धारण होते हैं, नतीजतन, वे इन उम्मीदों को विकसित करते हैं। इन उम्मीदों से संचालित होकर, माता-पिता अपने बच्चों से अभिनय, नृत्य, चित्रकला और इसी तरह के विभिन्न कौशल सीखने की अपेक्षा करते हैं, यह सोचते हुए कि जब बच्चे प्रतिभाशाली व्यक्ति बन जाएँगे, तब उनके लिए दूसरों के अधीन रहने के बजाय उनसे ऊपर उठना, निम्न-स्तरीय अधीनस्थों के बजाय उच्च-रैंकिंग अधिकारी बनना, प्रबंधक, कार्यकारी और सीईओ बनना, फॉर्च्यून ग्लोबल 500 कंपनियों में काम करना वगैरह आसान हो जाएगा। ये सभी माँ-बाप के व्यक्तिपरक विचार हैं। ... ये माता-पिता अपनी पसंद और इच्छाओं के अनुसार पूरी तरह से अपने बच्चों पर उम्मीदें थोप रहे हैं। क्या यह व्यक्तिपरक नहीं है? (हाँ।) इसे व्यक्तिपरक कहना तो फिर भी अच्छा है—यह वास्तव में क्या है? इस व्यक्तिपरकता की एक और व्याख्या क्या है? क्या यह स्वार्थ नहीं है? क्या यह जबरदस्ती नहीं है? (हाँ।) तुम्हें एक निश्चित पेशा पसंद है, तुम एक अधिकारी बनना चाहोगे, अमीर बनना चाहोगे, समाज में प्रतिष्ठित और सफल होना चाहोगे, इसलिए तुम अपने बच्चों को भी ऐसा व्यक्ति बनाना और ऐसे रास्ते पर चलाना चाहते हो। लेकिन यह कहना मुश्किल है कि क्या वे भविष्य में वह काम कर पाएँगे या क्या वह काम वास्तव में उनके लिए उपयुक्त है। और फिर, उनकी नियति वास्तव में क्या है? परमेश्वर उन पर कैसे संप्रभु होगा और उनके लिए व्यवस्थाएँ कैसे करेगा? क्या तुम ये बातें जानते हो? कुछ लोग कहते हैं : ‘मुझे उन बातों की परवाह नहीं है। जब तक यह कुछ ऐसा है जो माता या पिता के रूप में मुझे पसंद है, तो यह ठीक है। चूँकि मुझे यह पसंद है, मैं उनसे इस तरह की अपेक्षाएँ रखता हूँ।’ क्या यह बहुत स्वार्थी होना नहीं है? (हाँ।) अच्छे से कहें तो यह बहुत व्यक्तिपरक है, यह केवल खुद की सुनना है, लेकिन यह वास्तव में क्या है? यह बहुत स्वार्थी होना है! ये माता-पिता अपने बच्चों की काबिलियत या प्रतिभाओं पर विचार नहीं करते और वे उन व्यवस्थाओं की परवाह नहीं करते जो परमेश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति की नियति और जीवन के लिए की हैं। वे इन बातों पर विचार नहीं करते, वे ख्याली पुलाव के चलते केवल अपनी मर्जी से अपनी पसंद और योजनाओं को अपने बच्चों पर थोपते हैं। कुछ लोग कहते हैं : ‘यदि मैं ये व्यवस्थाएँ नहीं करता, तो उनका भविष्य प्रभावित होगा। वे युवा और भोले हैं और जब तक वे समझेंगे, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। माता-पिता के रूप में, मुझे अपने बच्चों की चिंता करनी है और उनके लिए सब कुछ व्यवस्थित करना है। यह माता-पिता की जिम्मेदारी है!’ इस कथन में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन यदि तुम्हारी योजनाएँ और व्यवस्थाएँ वैसी नहीं हैं जिनकी तुम्हारे बच्चों को ज़रूरत है, बल्कि वे चीजें हैं जो तुम उन पर थोपते हो, तो यह उचित नहीं है। ... भले ही उनके माँ-बाप उन्हें छोटी उम्र से ही सिखाएँ, ‘लोगों के साथ मेलजोल करते समय तुम्हें उन्हें सब कुछ नहीं बताना चाहिए,’ वे इसे सिर्फ एक तरह का धर्म-सिद्धांत मानकर चलेंगे। वे अपने माँ-बाप की सलाह के आधार पर तभी सही मायने में कार्य करने में सक्षम होंगे, जब वे इसे पूरी तरह से समझ लेंगे। जब वे अपने माँ-बाप की सलाह को नहीं समझते, तो चाहे उनके माँ-बाप उन्हें कितना भी सिखाने की कोशिश कर लें, यह उनके लिए बस एक प्रकार का खोखला सिद्धांत ही होगा। इसलिए, जब कुछ माता-पिता सोचते हैं, ‘यह समाज बहुत प्रतिस्पर्धी है और लोग बहुत अधिक दबाव में जीते हैं; यदि मैं कम उम्र से ही अपने बच्चों की शिक्षा की गति नहीं बढ़ाता और उन्हें ठोस ज्ञान प्राप्त नहीं कराता, तो उन्हें भविष्य में कष्ट और कठिनाई झेलनी पड़ेगी,’ तो क्या यह विचार मान्य है? (नहीं।) तुम अपने बच्चों को यह दबाव जल्दी झेलने के लिए मजबूर कर रहे हो ताकि वे भविष्य में शायद उस कठिनाई को कम झेलें, तुम उन्हें उस उम्र से यह दबाव सहन करने के लिए मजबूर कर रहे हो जहाँ वे अभी भी कुछ नहीं समझते। क्या वास्तव में ऐसा है कि वे इस दबाव को सहन करने के कारण कुछ बन जाएँगे? यदि वे कोई उचित कौशल या ज्ञान प्राप्त करने में असफल रहते हैं, तो क्या यह सब बेकार नहीं हो जाएगा? उन्हें कम उम्र से दबाव सहन करने के लिए मजबूर करना उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद नहीं है। यदि इससे कुछ बीमारियाँ और परिणाम होते हैं, तो क्या यह उन्हें नुकसान पहुँचाना नहीं है? क्या तुम वास्तव में यह उनके भले के लिए कर रहे हो? यह जरूरी नहीं कि उनका न समझना एक बुरी बात हो। कम-से-कम वे कुछ साल आरामदायक, सरल और खुशहाल तरीके से जी सकते हैं। यदि कम उम्र से ही वे इन चीजों की असलियत समझ सकें और इन दबावों को सहन करना शुरू कर दें, तो यह जरूरी नहीं कि उनके लिए एक अच्छी बात होगी” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि अपनी बेटी के लिए मेरा प्यार कितना संकीर्ण और स्वार्थी था। ऊपर उठने का अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए, मैंने उस पर एकतरफा अपने विचार थोपे, उसकी क्षमताओं या काबिलियत पर विचार किए बिना उसके भविष्य के लिए योजनाएँ बनाईं, और उसे पढ़ाई करने के लिए मजबूर करने हेतु बलपूर्वक तरीकों का इस्तेमाल किया, दबाव और पाबंदियाँ लगाईं। जब मैंने देखा कि उसके ग्रेड में सुधार नहीं हो रहा है, तो मैं उस पर ऐसे चिल्लाई जैसे मेरा दिमाग खराब हो गया हो, जिससे वह और गुमसुम हो गई और मैंने उसे न आज़ादी दी और न खुलकर सांस लेने दिया। मैंने जो कुछ भी किया वह उसे रोक रहा था और बाँध रहा था। मुझे शोहरत और लाभ से प्यार था और मैं हमेशा दूसरों से ऊपर उठना चाहती थी, इसलिए जब मेरी अपनी इच्छाएँ पूरी नहीं हो सकीं, तो मैंने उन्हें अपनी बेटी पर थोप दिया, उसे मेरी इच्छाएँ पूरी करने के लिए मजबूर किया, और उस पर पढ़ाई के लिए अत्यधिक दबाव डाला। मैंने खुद को उसकी जगह रखकर कभी यह विचार नहीं किया कि उसे क्या पसंद है या वह किस चीज में अच्छी है। जब मैंने देखा कि मेरे दबाव के कारण वह और भी अंतर्मुखी होती जा रही है और हीन महसूस कर रही है, फिर भी मैं इस बात पर अड़ी रही कि वह मेरी उम्मीदों पर खरी उतरे, जिससे वह लगातार पीड़ा में जीती रही। मैं सचमुच क्रूर और स्वार्थी थी! मेरी बेटी अभी छोटी थी, उस उम्र में जब वह मजे करना चाहती थी, फिर भी मैंने जबरन उसके अंदर शैतानी फलसफे और नियम भर दिए थे, उसे ऐसे दबाव और दर्द सहने के लिए मजबूर किया जो उसे नहीं सहने चाहिए थे। मैंने अपनी बेटी के साथ जो किया वह बिल्कुल भी प्यार नहीं था, बल्कि एक प्रकार का मानसिक नुकसान था। अगर मैं अपनी बेटी से सच्चा प्यार करती और उसकी जिम्मेदारी लेती, तो मुझे उसकी रुचियों और क्षमताओं के अनुसार उसे शिक्षित करना चाहिए था, उसे सही मार्गदर्शन देना चाहिए था न कि अपनी इच्छाएँ उस पर थोपनी चाहिए थीं। अपने कार्यों पर विचार करते हुए, मुझे गहरा पछतावा हुआ, और मुझे एहसास हुआ कि मुझमें मानवता नहीं है। मैं अब उस पर ये अनुचित उम्मीदें नहीं थोप सकती थी।
उसके बाद से, परमेश्वर के वचन पढ़ने के माध्यम से, मुझे समझ में आ गया कि एक माँ के रूप में मुझे क्या जिम्मेदारी निभानी चाहिए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “माँ-बाप की अपने बच्चों से की जाने वाली अपेक्षाओं के सार का गहन-विश्लेषण करके हम देख सकते हैं कि ये अपेक्षाएँ स्वार्थपूर्ण हैं, ये मानवता के विरुद्ध हैं और इनका माँ-बाप की जिम्मेदारियों से कोई लेना-देना नहीं है। जब माँ-बाप अपने बच्चों पर तमाम तरह की अपेक्षाएँ और माँगें थोपते हैं तो वे उन पर बहुत ही ज्यादा अतिरिक्त दबाव डाल देते हैं—यह उनके द्वारा अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं है। तो वे कौन-सी जिम्मेदारियाँ हैं जो माता-पिता को निभानी चाहिए? उन्हें कम से कम अपने बच्चों को ऐसे ईमानदार लोग होना सिखाना चाहिए जो सत्य बोलते हों और ईमानदार ढंग से चीजें करते हों और उन्हें दयालु होना और खराब चीजें न करना सिखाना चाहिए, उन्हें एक सकारात्मक दिशा में मार्गदर्शन देना चाहिए। ये उनकी सबसे बुनियादी जिम्मेदारियाँ हैं। इसके अलावा उन्हें अपने बच्चों की काबिलियत और परिस्थितियों के अनुसार उनका मार्गदर्शन व्यावहारिक ज्ञान, कौशल आदि के अध्ययन में करना चाहिए। अगर माता-पिता परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और सत्य को समझते हैं तो उन्हें अपने बच्चों से परमेश्वर के वचन पढ़वाने चाहिए और सत्य स्वीकार कराना चाहिए ताकि वे सृष्टिकर्ता को जान सकें और यह समझ सकें कि लोग परमेश्वर द्वारा रचे गए हैं और परमेश्वर इस ब्रह्मांड में विद्यमान है; उन्हें परमेश्वर से प्रार्थना करने और परमेश्वर के वचन खाने-पीने में अपने बच्चों का मार्गदर्शन करना चाहिए ताकि वे कुछ सत्यों को समझ सकें, ताकि जब वे बड़े हों तो वे परमेश्वर में विश्वास कर लें, परमेश्वर का अनुसरण करें और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभा सकें, न कि सांसारिक प्रवृत्तियों का पीछा करें, विभिन्न जटिल अंतरवैयक्तिक संबंधों में फँस जाएँ और इस संसार की विभिन्न बुरी प्रवृत्तियों द्वारा बहकाए जाएँ, भ्रष्ट और नष्ट किए जाएँ। वास्तव में यही वे जिम्मेदारियाँ हैं जो माता-पिता को पूरी करनी चाहिए। माता-पिता के रूप में उन्हें ये जिम्मेदारियाँ निभानी चाहिए कि वे अपने बच्चों के बालिग होने से पहले उन्हें सकारात्मक मार्गदर्शन और उपयुक्त सहायता प्रदान करें, साथ ही उनके दैनिक जीवन की आवश्यकताओं के संबंध में उनकी शारीरिक देखभाल भी समय पर करें। अगर बच्चे बीमार हो जाते हैं तो उनके माता-पिता को जरूरत के अनुसार उनका इलाज करवाना चाहिए; यह सोचकर कि बच्चों के स्कूली कार्य में देरी होगी, उन्हें बच्चों को स्कूल नहीं भेजते रहने चाहिए और इलाज टालते नहीं रहना चाहिए। जब बच्चों को स्वास्थ्य लाभ करने की जरूरत हो तो उन्हें स्वास्थ्य लाभ करने देना चाहिए और जब उन्हें आराम की जरूरत हो तो उन्हें आराम करने देना चाहिए। अपने बच्चों का स्वास्थ्य सुनिश्चित करना अनिवार्य है; यदि बच्चे स्कूली कार्य में पीछे रह जाते हैं तो माता-पिता इसकी भरपाई का उपाय बाद में कर सकते हैं। ये वे जिम्मेदारियाँ हैं जो माता-पिता को अच्छे से निभानी चाहिए। एक ओर उन्हें ठोस ज्ञान प्राप्त करने में अपने बच्चों की जरूर मदद करनी चाहिए; दूसरी ओर उन्हें अपने बच्चों का मार्गदर्शन और उन्हें शिक्षित जरूर करना चाहिए ताकि वे सही मार्ग पर चलें और उन्हें उनका मानसिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करना चाहिए ताकि वे समाज की अस्वस्थ प्रवृत्तियों और बुरी प्रथाओं से प्रभावित न हों। साथ ही उन्हें यह भी जरूर सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके बच्चे उचित रूप से व्यायाम करें ताकि उनका शारीरिक स्वास्थ्य बना रहे। यही वे चीजें हैं जो माता-पिता को करनी चाहिए, बजाय इसके कि वे अपने बच्चों पर जबरन कोई अव्यावहारिक अपेक्षाएँ या माँगें थोपें। जब यह बात आती है कि बच्चों को अपनी आत्मा के लिए भी और अपने शारीरिक जीवन में भी किन चीजों की जरूरत है तो माता-पिता को अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए। उन्हें अपने बच्चों को कुछ सामान्य जानकारी भी देनी चाहिए, जैसे उन्हें ठंडा नहीं, गरम आहार लेना चाहिए, जब मौसम सर्द हो तो उन्हें गरम कपड़े पहनने चाहिए ताकि सर्दी-जुकाम न हो और उन्हें अपनी सेहत की देखभाल करना सिखाना चाहिए। इसके अलावा, जब बच्चों के मन में भविष्य को लेकर कुछ बचकाने, अपरिपक्व ख्याल आते हैं या कोई अतिवादी विचार उत्पन्न होता है तो यह पता चलते ही माता-पिता को उन्हें तुरंत सही मार्गदर्शन देना चाहिए, इन बचकानी फंतासियों और अतिवादी चीजों को दुरुस्त करना चाहिए ताकि उनके बच्चे जीवन में सही मार्ग पर चल सकें। यह अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करना है। एक तरह से अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने का मतलब है अपने बच्चों के जीवन की देखभाल करना, वहीं दूसरी तरह से इसका मतलब है अपने बच्चों के विचारों को मार्गदर्शन देना और सुधारना और उन्हें उनके विचारों और दृष्टिकोणों के बारे में सही मार्गदर्शन देना” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। “जैसे-जैसे उनके बच्चे बड़े होते हैं, माता-पिता को जिन जिम्मेदारियों और दायित्वों को पूरा करना चाहिए, वे हैं अपने बच्चों को जीवन में सही दिशा की ओर मार्गदर्शन और मदद करना, न कि उन पर दबाव या बेड़ियाँ डालना, उन पर बोझ डालना और अपने बच्चों के विकल्पों में हस्तक्षेप करना या उन पर अपनी उम्मीदें थोपना तो बिल्कुल नहीं है। इसके बजाय, जब उनके बच्चे बड़े हो रहे हों, तो माता-पिता को अपने बच्चों की काबिलियत, पसंद और लक्ष्यों के आधार पर उचित मदद प्रदान करनी चाहिए। चाहे उनके बच्चों का व्यक्तित्व और काबिलियत कैसी भी हो, माता-पिता को उन्हें जीवन में सही रास्ते पर ले जाना चाहिए। माता-पिता को अपने बच्चों की कमियों की भरपाई करने में मदद करनी चाहिए और अपने बच्चों को एक सकारात्मक दिशा में विकसित करने के लिए अगुआई और मार्गदर्शन करना सीखना चाहिए। जब उनके बच्चे सामाजिक प्रवृत्तियों की कुछ गलत चीजों से गुमराह और बाधित होते हैं, तो माता-पिता को तुरंत आध्यात्मिक मार्गदर्शन और व्यवहार संबंधी निर्देश देना चाहिए और सुधार करना चाहिए। जहाँ तक ये प्रश्न हैं कि क्या उनके बच्चे पढ़ने को तैयार हैं, वे पढ़ाई में कितने अच्छे हैं, ज्ञान और कौशल सीखने में उन्हें कितनी रुचि है, बड़े हो कर वे क्या कर सकते हैं, ये उनकी स्वाभाविक जन्मजात क्षमताओं और पसंद और उनकी रुचियों के झुकाव के अनुरूप होने चाहिए, जिससे वे अपनी परवरिश की प्रक्रिया के दौरान स्वस्थ, स्वतंत्र और मजबूती से बड़े हो सकें। यही वह जिम्मेदारी है जो माता-पिता को पूरी करनी चाहिए। इसके अलावा, यह वह रवैया है जो माता-पिता को अपने बच्चों के विकास, पढ़ाई और करियर के प्रति रखना चाहिए, बजाय इसके कि अपने बच्चों पर अपनी इच्छाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, पसंद और अभिलाषाएँ थोपें ताकि वे उसे साकार करने में जुट जाएँ” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (16))। परमेश्वर के वचनों से, मैंने सीखा कि माता-पिता की जिम्मेदारी अपने बच्चों का मार्गदर्शन उनकी काबिलियत और खूबियों के आधार पर करना है कि वे सामान्य रूप से सीखें, उनके बढ़ने के दौरान समस्याएँ आने पर सकारात्मक और सक्रिय मार्गदर्शन देना है, जब वे कुछ गलत करते हैं तो उन्हें अनुशासित करना है, और उन्हें सकारात्मक और नकारात्मक चीजों के बीच अंतर करना सिखाना है। जहाँ तक बच्चे के भविष्य के जीवन का सवाल है, वह किस तरह का इंसान बनेगा या वह कौन-सा करियर अपनाएगा, ये सब परमेश्वर की संप्रभुता और इंतज़ाम के भीतर हैं, और माता-पिता को परमेश्वर की संप्रभुता को स्वीकार करना चाहिए और उसके प्रति समर्पित होना चाहिए। एक बार जब मैंने अपनी जिम्मेदारी समझ ली, तो मुझे पता चल गया कि अपनी बेटी को कैसे शिक्षित करना है। जब मेरी बेटी स्कूल के काम में व्यस्त नहीं होती थी, तो हम साथ में परमेश्वर के वचन पढ़ते थे और भजन सुनते थे। जब उसे अपनी पढ़ाई में समस्याएँ होती थीं, तो मैं उसे शांति से पढ़ाती थी और उसे यह भी कहती थी कि दबाव महसूस न करे। अप्रत्याशित रूप से, मेरी बेटी के ग्रेड में थोड़ा सुधार हुआ। बाद में, मैंने देखा कि मेरी बेटी को पेंटिंग करना पसंद है, इसलिए मैंने उसका दाखिला पेंटिंग क्लास में करा दिया। उसने अपने शौक विकसित किए और उसकी मानसिक दशा में भी सुधार हुआ। मेरी बेटी और मैं भी एक-दूसरे के करीब आ गए।
एक दिन स्कूल के बाद, अपनी बेटी को लेकर घर लौटते समय, मैंने एक माँ को अपनी बेटी पर चिल्लाते हुए देखा, जो उसके खराब ग्रेड के लिए उसकी आलोचना कर रही थी। छोटी लड़की डर के मारे काँप रही थी। उस पल, मेरी बेटी ने धीरे से मेरे कान में फुसफुसाकर कहा, “माँ, परमेश्वर के उद्धार के लिए धन्यवाद, अब मैं कष्ट में नहीं हूँ। पहले तुम भी मेरे साथ उतनी ही सख्त थीं, लेकिन अब तुम वैसी नहीं हो और तुम एक अच्छी माँ बन गई हो।” उसकी इस बात ने मेरे दिल को छू लिया और मैं लगभग रो पड़ी। मेरा दिल परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता से भर गया। यह परमेश्वर के वचन ही थे जिन्होंने मुझे एहसास कराया कि मानव की नियति परमेश्वर के हाथों में है। इससे भी बढ़कर, यह उसके वचन ही थे जिन्होंने मुझे दिखाया कि अपने बच्चों के प्रति माता-पिता की सच्ची जिम्मेदारी क्या है। मैंने अब अपनी बेटी को पढ़ाई के लिए मजबूर नहीं किया, और इसने मुझे उसकी नजरों में एक अच्छी माँ बना दिया। मैंने धीरे से अपनी बेटी से कहा, “हम दोनों को परमेश्वर के उद्धार के लिए उसका धन्यवाद करना चाहिए।”
मेरी बेटी अब नर्सिंग स्कूल में पढ़ रही है, और हालाँकि हम कभी-कभी भविष्य के रोजगार के मुद्दों पर चर्चा करते हैं, लेकिन मेरा दिल शांत है और मेरा मानना है कि सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है। मेरे बच्चे की रोजगार की स्थिति चाहे जो भी हो, मैं परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होने के लिए तैयार हूँ। यह बदलाव और ये लाभ सब परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन के कारण थे। परमेश्वर का धन्यवाद!