99. अपने कर्तव्य से इनकार करने के बाद का चिंतन

वू यू, चीन

पिछले कुछ वर्षों में मैं कलीसिया में स्वच्छता कार्य करती रही हूँ और मैंने कुछ पर्यवेक्षकों को एक के बाद एक बर्खास्त होते और कुछ को बहिष्कृत होते देखा है। खास तौर पर, सफाई के काम के लिए जिम्मेदार दो पूर्व पर्यवेक्षकों में बहुत अच्छी काबिलियत और कार्यक्षमता थी, और उनकी जिम्मेदारियों का दायरा भी व्यापक था। वे दो-तीन साल तक पर्यवेक्षक रहे थे, लेकिन उन्हें बर्खास्त कर दिया गया क्योंकि उन्होंने वास्तविक कार्य नहीं किया और सत्य को स्वीकार नहीं किया। नतीजतन, मुझे लगा कि पर्यवेक्षक बनना बहुत खतरनाक है। पर्यवेक्षक होने का मतलब है कि तुम्हारी जिम्मेदारियों का दायरा बड़ा होता है और तुम्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अगर तुम इसे अच्छी तरह से नहीं करते हो, तो तुम कलीसिया के काम में गड़बड़ी और बाधा डालते हो और अपने पीछे अपराध छोड़ जाते हो, इसलिए बर्खास्त किए जाने या बेनकाब होने और हटाए जाने की आशंका बनी रहती है। मैंने सोचा कि एक टीम सदस्य बनना बेहतर है क्योंकि इसमें जोखिम कम होता है और ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं होती, लेकिन फिर भी उद्धार की आशा रहती है। अगस्त 2023 की शुरुआत में पर्यवेक्षक को अपना कर्तव्य करने के लिए कहीं और जाना पड़ा और उसने मुझसे उसका काम सँभालने के लिए कहा। मैंने मन ही मन सोचा, “एक टीम सदस्य होने के नाते अंतिम जाँच करने और कार्य का मार्गदर्शन करने के लिए एक प्रभारी व्यक्ति होता है, इसलिए मैं कोई बड़ी बुराइयाँ नहीं करूँगी और तब बेनकाब होकर नहीं हटाई जाऊँगी। पर्यवेक्षक होना अलग बात है। आपको पूरे कार्य के लिए जिम्मेदारी लेनी पड़ती है और आप कई समस्याओं के सामने पड़ जाते हैं और बड़ी जिम्मेदारियाँ उठाते हैं। अगर मैं चीजों को ठीक से न सँभाल पाई और कलीसिया के कार्य में गड़बड़ की, तो मैं अपने पीछे अपराधों का एक सिलसिला छोड़ूँगी। अगर मैं बहुत सारे बुरे कर्म करती हूँ, तो क्या मैं बेनकाब होकर हटा नहीं दी जाऊँगी और अपने उद्धार का मौका नहीं गँवा दूँगी? टीम का सदस्य होना बेहतर है, ताकि मुझे कोई बड़ी जिम्मेदारी न उठानी पड़े। यह सुरक्षित और महफूज है और उसमें मुझे उद्धार की आशा है।” जब मैंने यह सोचा, तो मैंने यह बहाना बनाकर मना कर दिया कि मेरी काबिलियत औसत है, मेरी कार्यक्षमता सीमित है और मैं विकसित करने के लायक नहीं हूँ। उसके बाद पर्यवेक्षक ने मुझे दो बार और पत्र लिखकर इस बारे में सोचने को कहा। मैं दुविधा में पड़ गई, “इसे स्वीकार न करना अवज्ञा है, लेकिन अगर मैं इसे स्वीकार करूँ तो, स्वच्छता के कार्य में चूँकि हर मोड़ पर सिद्धांत शामिल होते हैं, अगर मैंने चीजों को ठीक से नहीं सँभाला और सिद्धांतों का उल्लंघन किया, तो मैं अपने पीछे अपराध और बुरे कर्म छोड़ जाऊँगी। अगर वे मामूली हुए, तो मुझे बर्खास्त कर दिया जाएगा, लेकिन अगर वे गंभीर हुए, तो मुझे निष्कासित भी कर दिया जाएगा। न केवल मेरी प्रतिष्ठा और रुतबे को नुकसान होगा, बल्कि हो सकता है कि मेरा कोई अच्छा परिणाम या मंजिल भी न हो।” बहुत सोचने के बाद, मैंने मना कर दिया। जब मैं पर्यवेक्षक से मिली, तो उसने मुझसे कहा, “तुम्हें भाई-बहनों से सबसे ज्यादा वोट मिले थे। तुम्हें परमेश्वर का इरादा खोजना चाहिए।” मेरे पास कहने को कुछ नहीं था। ऐसा लगा जैसे मेरे दिल को दो तरफ खींचा जा रहा हो और मैंने बार-बार परमेश्वर से प्रार्थना की, “प्रिय परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि मुझ पर आए इस मामले में, मुझे समर्पण करना चाहिए, पर मैं समर्पण कर ही नहीं पा रही हूँ। मुझे डर है कि मैं पर्यवेक्षक के रूप में अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभा पाऊँगी, कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी और बाधा पैदा करूँगी और मुझे बेनकाब करके हटा दिया जाएगा। मुझे नहीं पता कि इस कठिन परिस्थिति से बचने के लिए मुझे किन सत्यों में प्रवेश करना चाहिए। मेरी तुमसे विनती है कि मेरी अगुआई करो!”

एक बार मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिसने वास्तव में मेरे दिल को छू लिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम्हें अंतरात्मा के अनुसार कार्य कैसे करना चाहिए? सच्चे दिल से कार्य करना, परमेश्वर की दया, परमेश्वर-प्रदत्त इस जीवन और उद्धार पाने के इस परमेश्वर-प्रदत्त अवसर के योग्य बनना। क्या यह तुम्हारी अंतरात्मा का प्रभाव है? जब तुम्हारे पास यह न्यूनतम मानक—अंतरात्मा—होती है तो तुम सुरक्षित हो जाओगे और तुम गंभीर त्रुटियां नहीं करोगे। फिर तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने वाली चीजें करने या अपना कर्तव्य त्यागने की उतनी संभावना नहीं होगी, न ही तुम्हारे द्वारा अनमने ढंग से काम किए जाने की उतनी संभावना होगी। तुम अपने रुतबे, प्रसिद्धि और लाभ और अपने बचाव के रास्ते के लिए षड्यंत्र करने में भी इतने प्रवृत्त नहीं होगे। अंतरात्मा यही भूमिका निभाती है। अंतरात्मा और विवेक दोनों ही व्यक्ति की मानवता के घटक होने चाहिए। ये दोनों सबसे बुनियादी और सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं। वह व्यक्ति कैसा होता है जिसके पास जमीर नहीं होता और सामान्य मानवता का विवेक नहीं होता? सामान्यतया, वह एक ऐसा व्यक्ति है जिसमें मानवता नहीं है और वास्तव में भयानक मानवता का व्यक्ति है। अधिक विशिष्ट रूप से, ऐसे लोगों में कौन-सी विशेषताएँ पाई जाती हैं? मानवता से रहित होने की उनकी कौन-सी विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ हैं? (वे स्वार्थी और नीच हैं।) स्वार्थी और नीच लोग अपने क्रियाकलापों में लापरवाह होते हैं और अगर चीजें उन्हें व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नहीं करतीं तो वे उन्हें चलने देते हैं। वे परमेश्वर के घर के हितों के बारे में नहीं सोचते हैं, न ही वे परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाते हैं। जब अपने कर्तव्य निभाने या परमेश्वर की गवाही देने की बात आती है तो उनमें बोझ या जिम्मेदारी की कोई भावना नहीं होती है। ... क्या इस तरह के व्यक्ति में जमीर और विवेक होता है? (नहीं।) क्या जमीर और विवेक से रहित कोई व्यक्ति इस तरह से कार्य करने के लिए आत्म-धिक्कार महसूस करता है? वह आत्म-धिक्कार महसूस नहीं करता है; इस तरह के व्यक्ति का जमीर किसी काम का नहीं होता। ऐसे लोगों को कभी भी अपने जमीर से धिक्कार महसूस नहीं होता है, तो क्या वे पवित्र आत्मा के धिक्कार या अनुशासन को महसूस कर सकते हैं? नहीं, वे नहीं कर सकते(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना हृदय परमेश्वर को देकर व्यक्ति सत्य प्राप्त कर सकता है)। परमेश्वर कहता है कि जिन लोगों में अंतरात्मा या विवेक नहीं होता, वे विशेष रूप से स्वार्थी और नीच होते हैं। वे केवल अपने हितों के बारे में सोचते हैं, कलीसिया के कार्य के बारे में नहीं सोचते और कलीसिया के कार्य के प्रति कोई बोझ नहीं उठाते, न ही जिम्मेदारी की भावना रखते हो। विचार करने पर मुझे एहसास हुआ कि मैं भी ठीक इसी तरह की इंसान थी। जब मेरे भाई-बहनों ने मुझे चुना, तो मुझे यह कर्तव्य स्वीकार कर लेना चाहिए था। लेकिन मुझे डर था कि इस कर्तव्य को निभाने की जिम्मेदारी बहुत बड़ी होगी कि अगर मैंने इसे अच्छी तरह से नहीं किया तो मेरे पीछे अपराध रह जाएँगे, और अगर मैंने बुराई की, तो मुझे बर्खास्त कर निकाल दिया जाएगा : न केवल मेरी प्रतिष्ठा और रुतबे को नुकसान पहुँचेगा, बल्कि अपने अच्छे परिणाम और मंज़िल को भी खोने का खतरा होगा। इसलिए, मैंने यह बहाना बनाकर मना कर दिया कि मेरी काबिलियत औसत है, मेरी कार्यक्षमता खराब है, और मैं विकसित करने के लायक नहीं हूँ। पर्यवेक्षक ने मुझसे कई बार संगति करने के लिए पत्र लिखा लेकिन मैं मना करने के बहाने ढूँढ़ती रही। मैंने केवल अपने हितों के बारे में सोचा और इस कर्तव्य को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। मुझमें सचमुच जमीर और विवेक की कमी थी! मैं अब और इस तरह स्वार्थी और नीच जीवन नहीं जीना चाहती थी, इसलिए मैंने यह कर्तव्य स्वीकार कर लिया।

कुछ महीने बाद मेरा काम बदलकर मुझे टीम सदस्य बना दिया गया क्योंकि मेरी कमजोर काबिलियत के कारण मैं इस काम के लिए उपयुक्त नहीं थी। बाद में अगुआओं ने पत्र लिखकर बताया कि एक टीम में लोगों को हटाने से संबंधित सामग्री को व्यवस्थित करने वालों की कमी है और उनकी सिद्धांतों पर पूरी तरह से पकड़ नहीं है। उन्होंने मुझे वहाँ जाकर टीम अगुआ बनने और उनकी मदद करने के लिए कहा। मैंने मन ही मन सोचा, “अगर मैं लोगों को हटाने से संबंधित सामग्री को ठीक से व्यवस्थित नहीं कर पाई और किसी को गलत ढंग से निरूपित किया, तो मुझे इसकी जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। अगर मैं कुछ भी साफ-साफ नहीं देख पाई और सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए काम किया, जिससे मेरे पीछे अपराध और बुरे कर्म रह गए, तो मैं बर्खास्त किए जाने और निकाल दिए जाने के करीब होऊँगी। टीम का सदस्य बने रहना ज्यादा सुरक्षित है।” इसलिए, मैंने इसे फिर से यह बहाना बनाकर टाल दिया कि मेरी काबिलियत खराब है, मेरी कार्यक्षमता खराब है, और मैं विकसित किए जाने के लायक नहीं हूँ। बाद में, अगुआओं ने मेरे साथ संगति करने के लिए लिखा और बताया कि मेरे बार-बार अपने कर्तव्य को ठुकराने की प्रकृति सत्य को स्वीकारने से इनकार करने की थी। मुझे स्पष्ट रूप से एहसास हुआ कि अगुआओं की संगति परमेश्वर की ओर से एक अनुस्मारक और चेतावनी थी और मुझे दुख और ग्लानि हुई, “मैंने इतने सालों से परमेश्वर में विश्वास किया है, तो मैं बिल्कुल भी क्यों नहीं बदली? मैं इतनी अड़ियल क्यों हूँ?” मुझे एहसास हुआ कि अगर मैंने इस दशा को तुरंत हल करने के लिए सत्य नहीं खोजा तो यह अवस्था बहुत खतरनाक होगी, इसलिए मैंने अपनी अवस्था से संबंधित परमेश्वर के वचन खोजे। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “कुछ लोग अपना कर्तव्य निभाते हुए जिम्मेदारी लेने से डरते हैं। यदि कलीसिया उन्हें कोई काम देती है, तो वे पहले इस बात पर विचार करेंगे कि इस कार्य के लिए उन्हें कहीं उत्तरदायित्व तो नहीं लेना पड़ेगा, और यदि लेना पड़ेगा, तो वे उस कार्य को स्वीकार नहीं करेंगे। किसी कर्तव्य को करने के लिए उनकी शर्तें होती हैं, पहली, वह आराम से किया जाने वाला काम होना चाहिए; दूसरी, वह व्यस्त रखने या थका देने वाला न हो; और तीसरी, चाहे वे कुछ भी करें, वे कोई जिम्मेदारी नहीं लेंगे। केवल इन्हीं शर्तों के साथ वे कोई कर्तव्य हाथ में लेते हैं। ऐसा व्यक्ति किस प्रकार का होता है? क्या ऐसा व्यक्ति धूर्त और कपटी नहीं होता? वह छोटी से छोटी जिम्मेदारी भी नहीं उठाना चाहता। उन्हें यहाँ तक डर लगता है कि पेड़ों से झड़ते हुए पत्ते कहीं उनकी खोपड़ी न तोड़ दें। ऐसा व्यक्ति क्या कर्तव्य कर सकता है? परमेश्वर के घर में उनका क्या उपयोग हो सकता है? परमेश्वर के घर का कार्य शैतान से युद्ध करने के कार्य के साथ-साथ राज्य के सुसमाचार फैलाने से भी जुड़ा होता है। ऐसा कौन-सा कर्तव्य है जिसमें उत्तरदायित्व न हो? क्या तुम लोग कहोगे कि अगुआ होना जिम्मेदारी का काम है? क्या उसकी जिम्मेदारियाँ भी बड़ी नहीं होतीं और क्या उसे और ज्यादा जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए? चाहे तुम सुसमाचार का प्रचार करते हो, गवाही देते हो, वीडियो बनाते हो या कुछ और करते हो—इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्या करते हो—जब तक इसका संबंध सत्य सिद्धांतों से है, तब तक उसमें उत्तरदायित्व होंगे। यदि तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन में कोई सिद्धांत नहीं हैं, तो उसका असर परमेश्वर के घर के कार्य पर पड़ेगा और यदि तुम जिम्मेदारी लेने से डरते हो, तो तुम कोई कर्तव्य नहीं कर सकते। जो व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाने में जिम्मेदारी लेने से डरता है, क्या वह कायर है या उसके स्वभाव में कोई समस्या है? तुम्हें इसका भेद पहचानना आना चाहिए। वास्तव में, यह कायरता का मुद्दा नहीं है। जब अमीर बनने की बात आती है या जब वह अपने फायदे के लिए कुछ कर रहा होता है, तो वह इतना साहसी कैसे हो जाता है? वह इन चीजों के लिए कोई भी जोखिम उठा लेगा। लेकिन जब वह कलीसिया के लिए, परमेश्वर के घर के लिए काम करता है, तो वह बिल्कुल भी कोई जोखिम नहीं उठाता। ऐसे लोग स्वार्थी और नीच होते हैं, सबसे ज्यादा कपटी होते हैं। कर्तव्य निर्वहन में जिम्मेदारी न उठाने वाला व्यक्ति परमेश्वर के प्रति जरा भी निष्ठावान नहीं होता, उसकी वफादारी की तो बात ही क्या। किस तरह का व्यक्ति जिम्मेदारी उठाने की हिम्मत करता है? किस प्रकार के इंसान में भारी बोझ उठाने का साहस होता है? जो व्यक्ति परमेश्वर के घर के कार्य में सबसे अहम पल में बहादुरी से अगुआई करता है और आगे बढ़ता है, जो सबसे महत्वपूर्ण और अहम कार्य में बहादुरी से भारी बोझ उठाता है और कठिनाइयाँ सहने तथा खतरे का सामना करने से नहीं डरता है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के प्रति वफादार होता है, मसीह का अच्छा सैनिक होता है। क्या बात ऐसी है कि लोग कर्तव्य की जिम्मेदारी लेने से इसलिए डरते हैं, क्योंकि उन्हें सत्य की समझ नहीं होती? नहीं; समस्या उनकी मानवता में होती है। उनमें न्याय या जिम्मेदारी की भावना नहीं होती, वे स्वार्थी और नीच लोग होते हैं; वे परमेश्वर के सच्चे विश्वासी नहीं होते और वे लेशमात्र भी सत्य स्वीकार नहीं करते। सिर्फ इसी कारण से उन्हें बचाया नहीं जा सकता है। ... अगर अपने साथ कोई चीज घटित होने पर तुम हमेशा अपनी रक्षा करते हो और अपने लिए पिछला दरवाजा और बचने का रास्ता खोलकर रखते हो, तो क्या तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो? यह सत्य का अभ्यास करना नहीं है—यह धूर्त होना है। अब तुम परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभा रहे हो। कोई कर्तव्य निभाने का पहला सिद्धांत क्या है? वह यह है कि पहले तुम्हें अपने पूरे दिल से भरसक प्रयास करते हुए वह कर्तव्य निभाना चाहिए और इस प्रकार परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करनी चाहिए। यह एक सत्य सिद्धांत है, जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए। पिछला दरवाजा और बचने का रास्ता खुला रखकर अपनी रक्षा करना अविश्वासियों के अभ्यास का सिद्धांत और उनका सर्वोच्च फलसफा है। सभी चीजों में, पहले अपने बारे में सोचना, अपने हितों को सबसे ऊपर रखना और दूसरों के बारे में न सोचना, यह मानना कि परमेश्वर के घर के हितों और दूसरों के हितों का खुद से कोई लेना-देना नहीं है, पहले अपने हितों के बारे में सोचना और फिर बचने का रास्ता सोचना—क्या एक अविश्वासी ऐसा ही नहीं होता? एक अविश्वासी ठीक ऐसा ही होता है। इस तरह का व्यक्ति कर्तव्य निभाने के अयोग्य है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग एक))। परमेश्वर के वचनों पर मनन करते हुए लगा जैसे दिल को बेध दिया गया हो। परमेश्वर ने उजागर किया है कि जो लोग स्वार्थी, नीच और चालाक होते हैं, वे जवाबदेह ठहराए जाने से डरते हैं। जब कोई बात उन पर आती है तो वे हमेशा अपने हितों के बारे में सबसे पहले सोचते हैं और कलीसिया के हितों की रक्षा करने के बजाय अपने लिए बच निकलने का रास्ता छोड़ने के बारे में लगातार सोचते रहते हैं। वे बिल्कुल भी कोई जिम्मेदारी लेना ही नहीं चाहते। इस प्रकार के व्यक्ति सत्य को स्वीकार नहीं करते और उनमें कोई मानवता नहीं होती। वे परमेश्वर की नजर में अविश्वासी होते हैं और वे कर्तव्य निभाने के लायक नहीं हैं। मैं बिल्कुल इसी प्रकार की इंसान थी। परमेश्वर का घर कई साल से मुझे स्वच्छता कार्य करने के लिए विकसित कर रहा था और मैंने कुछ प्रासंगिक सिद्धांतों में महारत हासिल कर ली थी और समस्याओं से निपटने के कुछ रास्ते समझ लिए थे। जब अगुआओं ने तय किया कि मैं टीम अगुआ बनूँ, तो मुझे चिंता थी कि अगर मैंने काम अच्छी तरह से नहीं किया तो मुझे जवाबदेह ठहराया जाएगा। अपने हितों की रक्षा के लिए मैंने कई तरह के कारण और बहाने ढूँढ़े, जैसे कि मेरी काबिलियत खराब थी और मेरी कार्यक्षमता खराब थी, ताकि मैं टालमटोल करके बच सकूँ। मैं अच्छी तरह से जानती थी कि कलीसिया के काम को क्या चाहिए, और यह भी कि मैं एक उपयुक्त उम्मीदवार थी, लेकिन मैंने चालें चलीं और मैं टीम अगुआ नहीं बनना चाहती थी या कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती थी क्योंकि मैं अपने परिणाम और मंजिल के बारे में सोच रही थी। वे अविश्वासी जिनके लिए लाभ पहले आता है वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें हमेशा अपने हितों के लिए हिसाब-किताब करते और योजना बनाते हैं; वे वही करते हैं जो उनके लिए फायदेमंद होता है। मेरे सारे खयाल और विचार भी मेरे अपने फायदे के लिए थे और जब जिम्मेदारी वाला काम मेरे सामने आता, तो मैं चालें चलती थी और पीछे हट जाती थी। मुझमें परमेश्वर के प्रति जरा भी वफादारी या समर्पण नहीं था और मैं किसी अविश्वासी या छद्म-विश्वासी से अलग नहीं थी। मैं सचमुच कर्तव्यों को निभाने के योग्य नहीं थी! जब मुझे यह बात समझ में आई तो मैं पछतावे और धिक्कार से भर गई।

बाद में मैंने आत्म-चिंतन किया : इतने सालों से परमेश्वर में विश्वास करने के बावजूद मैं लगातार अपने कर्तव्य से क्यों मुकरना चाहती थी? समस्या की जड़ क्या थी? एक दिन मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “मसीह-विरोधी कभी परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं का पालन नहीं करते और वे हमेशा अपने कर्तव्य, प्रसिद्धि, फायदे और रुतबे को अपने आशीष प्राप्त करने की आशा और अपने भावी गंतव्य के साथ निकटता से जोड़ते हैं, मानो अगर उनकी प्रतिष्ठा और रुतबा खो गया तो उन्हें आशीष और पुरस्कार प्राप्त करने की कोई उम्मीद नहीं रहेगी और उन्हें यह अपना जीवन खोने जैसा लगता है। वे सोचते हैं, ‘मुझे सावधान रहना है, मुझे लापरवाह नहीं होना चाहिए! परमेश्वर के घर, भाई-बहनों, अगुआओं और कार्यकर्ताओं, यहाँ तक कि परमेश्वर पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता। मैं उनमें से किसी पर भरोसा नहीं कर सकता। जिस व्यक्ति पर तुम सबसे ज्यादा भरोसा कर सकते हो और जो सबसे ज्यादा विश्वसनीय है, वह तुम खुद हो। अगर तुम अपने लिए योजनाएँ नहीं बना रहे, तो तुम्हारी परवाह कौन करेगा? तुम्हारे भविष्य पर कौन विचार करेगा? कौन इस पर विचार करेगा कि तुम्हें आशीष मिलेंगे या नहीं? इसलिए, मुझे अपने लिए सावधानीपूर्वक योजनाएँ बनानी होंगी और गणनाएँ करनी होंगी। मैं गलती नहीं कर सकता या थोड़ा भी लापरवाह नहीं हो सकता, वरना अगर कोई मेरा फायदा उठाने की कोशिश करेगा तो मैं क्या करूँगा?’ इसलिए, वे परमेश्वर के घर के अगुआओं और कार्यकर्ताओं से सतर्क रहते हैं, और डरते हैं कि कोई उनका भेद पहचान लेगा या उनकी असलियत जान लेगा, और फिर उन्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा और आशीष पाने का उनका सपना नष्ट हो जाएगा। वे सोचते हैं कि आशीष प्राप्त करने की आशा रखने के लिए उन्हें अपनी प्रतिष्ठा और रुतबा बरकरार रखना चाहिए। मसीह-विरोधी आशीष प्राप्ति को स्वर्ग से भी अधिक बड़ा, जीवन से भी बड़ा, सत्य के अनुसरण, स्वभावगत परिवर्तन या व्यक्तिगत उद्धार से भी अधिक महत्वपूर्ण, और अपने कर्तव्य को उचित ढंग से निभाने और मानक-स्तरीय सृजित प्राणी होने से भी अधिक महत्वपूर्ण मानता है। वह सोचता है कि एक मानक-स्तरीय सृजित प्राणी होना, अपना कर्तव्य उचित ढंग से करना और बचाया जाना सब तुच्छ चीजें हैं, जो मुश्किल से ही उल्लेखनीय हैं या टिप्पणी के योग्य हैं, जबकि आशीष प्राप्त करना उनके पूरे जीवन में एकमात्र ऐसी चीज होती है, जिसे कभी नहीं भुलाया जा सकता। उनके सामने चाहे जो भी आए, चाहे वह कितना भी बड़ा या छोटा क्यों न हो, वे इसे आशीष प्राप्ति होने से जोड़ते हैं और अत्यधिक सतर्क और चौकस होते हैं, और वे हमेशा अपने बच निकलने का मार्ग रखते हैं(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद बारह : जब उनके पास कोई रुतबा नहीं होता या आशीष पाने की आशा नहीं होती तो वे पीछे हटना चाहते हैं)। परमेश्वर ने उजागर किया कि मसीह-विरोधी कलीसिया द्वारा उनके लिए व्यवस्थित कर्तव्य के प्रति मुख्य रूप से इसलिए समर्पण नहीं कर सकते क्योंकि वे आशीषें पाने को बहुत ज्यादा महत्व देते हैं। मसीह-विरोधी किसी और पर नहीं बल्कि खुद पर भरोसा करते हैं। उनका मानना है कि वे सिर्फ खुद पर ही भरोसा कर सकते हैं, कि सिर्फ वे ही हैं जो सचमुच अपना ख्याल रखेंगे और उन्हें हर मोड़ पर सावधान और सतर्क रहना होगा, इस बात से भयभीत कि परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना उनकी आशीषों के लिए हानिकारक होगा और आशीष पाने के उनके सपनों को नष्ट कर देगा। मैंने चिंतन किया कि क्या मेरा व्यवहार एक मसीह-विरोधी जैसा नहीं था? मैं आशीष पाने को बहुत महत्व देती थी। कलीसिया ने मुझे एक पर्यवेक्षक और फिर एक टीम अगुआ बनाने की व्यवस्था की, लेकिन मैं सतर्क रहते और हिसाब-किताब करते हुए, अपने परिणाम और मंज़िल के बारे में सोचे बिना नहीं रह सकी। मैंने सोचा कि एक पर्यवेक्षक या टीम अगुआ के कर्तव्य निभाने में बड़ी जिम्मेदारियाँ शामिल होती हैं और अगर मैंने काम अच्छी तरह से नहीं किया तो मेरे पीछे अपराध रह जाएँगे। अगर ये गंभीर हुए तो मुझे बेनकाब किया और निकाला भी जा सकता है। दूसरी ओर, सामान्य टीम के सदस्यों की जिम्मेदारी कम होती है, और भले ही मैं कोई खास श्रेय हासिल नहीं करूँगी, पर मैं अपने पीछे अपराध भी नहीं छोड़ूँगी और बेनकाब की और निकाली नहीं जाऊँगी। मैं बस यही सोचती थी कि जो भी मेरे लिए फायदेमंद हो, वही करूँ और मैंने कलीसिया के हितों का जरा भी ध्यान नहीं रखा। मैं एकदम से शैतानी जहरों के भरोसे जी रही थी, जैसे “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “श्रेय की लालसा नहीं, पर दोष से दूरी भली,” और “सावधानी ही सुरक्षा की जननी है।” मुझे लगता था कि अपने हितों के बारे में सोचना बिल्कुल स्वाभाविक है—ऐसा न करना मूर्खता होगी। परमेश्वर का इरादा था कि वह मुझे एक पर्यवेक्षक और एक टीम अगुआ बनकर और अधिक प्रशिक्षण पाने दे और सिद्धांतों के अनुसार काम करने के लिए सत्य खोजने में समर्थ होने दे। लेकिन मैंने अपने विकृत दृष्टिकोण के आधार पर परमेश्वर पर संदेह किया था। मुझे लगता था कि मुझे पर्यवेक्षक बनाना मुझे बेनकाब करने और हटाने का एक तरीका है। मैंने परमेश्वर को दुनिया के उन रुतबे और शक्ति वाले लोगों की तरह समझा, जो जरूरी नहीं कि लोगों के प्रति निष्पक्ष और धार्मिक हों ये समझा कि जो लोग जरा-सी भी गलती करते हैं उन्हें निकाल दिया जाएगा। क्या यह परमेश्वर की ईशनिंदा नहीं है? मैं कितनी धोखेबाज और दुष्ट थी! परमेश्वर में विश्वास करना और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना पूरी तरह से स्वाभाविक और न्यायसंगत है और यह एक ऐसी जिम्मेदारी है जिससे मैं मुँह न मोड़ने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। मगर मुझे शैतानी जहरों ने नुकसान पहुँचाया था और मैं स्वार्थी, दुष्ट और धोखेबाज बन गई थी। मैंने अपने हितों की रक्षा के लिए बार-बार अपना कर्तव्य ठुकराया, और परमेश्वर के इरादों के प्रति जरा भी विचारशीलता नहीं दिखाई। इन शैतानी फलसफों के अनुसार जीने से मैं परमेश्वर का और अधिक प्रतिरोध ही करती और अंततः परमेश्वर द्वारा मुझे ठुकरा कर हटा दिया जाता। जब मैं यह बात समझ गई तो पछतावे और धिक्कार से भर गई, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “प्रिय परमेश्वर, मैं बहुत स्वार्थी, नीच, दुष्ट और धोखेबाज हूँ। जब से मैंने तुम पर विश्वास करना शुरू किया है, मैंने सिर्फ आशीषों का अनुसरण किया है और तुम्हारे इरादों या कलीसिया के कार्य के बारे में कभी नहीं सोचा। हे परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करने और गलत रास्ते पर चलना बंद करने को तैयार हूँ।”

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े, और उन सिद्धांतों के बारे में कुछ समझ हासिल की जिनके अनुसार परमेश्वर का घर लोगों के साथ व्यवहार करता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कुछ लोग यह नहीं मानते कि परमेश्वर का घर लोगों के साथ निष्पक्ष रूप से पेश आता है। वे यह नहीं मानते कि परमेश्वर के घर में परमेश्वर का और सत्य का शासन चलता है। उनका मानना है कि व्यक्ति चाहे कोई भी कर्तव्य क्यों न करता हो, अगर उसमें कोई समस्या उत्पन्न होती है, तो परमेश्वर का घर तुरंत उस व्यक्ति से निपटेगा, उसे कर्तव्य करने की उसकी योग्यता से वंचित कर देगा, उसे दूर भेज देगा या फिर उसे कलीसिया से ही निकाल देगा। क्या मामला वाकई ऐसा ही है? निश्चित रूप से नहीं। परमेश्वर का घर हर व्यक्ति के साथ सत्य सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करता है। परमेश्वर सभी के साथ धार्मिकता से व्यवहार करता है। वह केवल यह नहीं देखता कि व्यक्ति ने किसी एक घटना में कैसा व्यवहार किया है; वह उस व्यक्ति के प्रकृति सार, उसके इरादों और उसके रवैये को देखता है। खासतौर से वह यह देखता है कि जब कोई व्यक्ति गलती करता है तब क्या वह अपने बारे में चिंतन कर सकता है, क्या उसे ग्लानि होती है और क्या वह परमेश्वर के वचनों के आधार पर समस्या के सार की असलियत देख सकता है जिससे वह सत्य को समझने लगे, अपने आपसे घृणा करने लगे और सच में पश्चात्ताप करे। यदि किसी व्यक्ति में सही रवैया नहीं है और वह पूरी तरह से व्यक्तिगत इरादों से दूषित है, यदि वह कपटी साजिशों से भरा हुआ है और भ्रष्ट स्वभावों के सिवाय और कुछ भी प्रकट नहीं करता है और यदि समस्याएँ उत्पन्न होने पर वह दिखावे, कुतर्क और खुद को सही ठहराने तक का सहारा लेता है और अपनी गलतियाँ मानने से हठपूर्वक इनकार करता है, तो ऐसे व्यक्ति को बचाया नहीं जा सकता है। वह सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता है और वह उचित व्यक्ति नहीं है; वह पूरी तरह से बेनकाब हो चुका है। जो सत्य को लेशमात्र भी स्वीकार नहीं कर सकते हैं वे मूलतः छद्म-विश्वासी होते हैं और उन्हें केवल हटाया जा सकता है। ... अच्छा बताओ, अगर किसी व्यक्ति ने कोई गलती की है, लेकिन वह सही समझ प्राप्त कर लेता है और पश्चात्ताप करने को तैयार है, तो क्या परमेश्वर का घर उसे एक अवसर नहीं देगा? जैसे-जैसे परमेश्वर की छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना समापन की ओर बढ़ रही है, ऐसे बहुत-से कर्तव्य हैं जिन्हें पूरा करने की जरूरत है। लेकिन अगर तुम में कोई अंतरात्मा और विवेक नहीं है और तुम अपने उचित काम पर ध्यान नहीं देते हो, अगर तुमने कोई कर्तव्य करने का अवसर प्राप्त किया है, लेकिन तुम उसे सँजोना नहीं जानते, सत्य का जरा भी अनुसरण नहीं करते और सबसे अनुकूल समय अपने हाथ से निकल जाने देते हो तो तुम्हारा खुलासा हो जाएगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गई कि परमेश्वर के घर में सत्य और धार्मिकता का राज है। परमेश्वर का घर सिद्धांतों के अनुसार लोगों को बर्खास्त करता और हटाता है और किसी एक निश्चित समय या किसी एक निश्चित मामले में किसी के व्यवहार के कारण उसका मनमाने ढंग से निपटान नहीं किया जाएगा। यह सब लोगों के निरंतर व्यवहार, सत्य को स्वीकार करने के प्रति उनके रवैये और इस बात पर आधारित होता है कि उन्होंने सच्चा पश्चात्ताप किया है या नहीं। अगर कोई व्यक्ति लगातार कलीसिया के काम में गड़बड़ी और बाधा डालता है, और दूसरों की मदद के बावजूद पश्चात्ताप नहीं करता या बदलता नहीं है, तो उसे बर्खास्त किया और हटा दिया जाएगा। हालाँकि यदि कोई व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाते समय भ्रष्ट स्वभाव का खुलासा करता है या कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधा डालता है, लेकिन तुरंत चिंतन कर सकता है, समझ सकता, पश्चात्ताप और परिवर्तन कर सकता है, तो परमेश्वर का घर उसे कर्तव्य निभाने के दूसरे अवसर प्रदान करेगा। मैंने सोचा कि कैसे जब से मैंने स्वच्छता कार्य करना शुरू किया है, मैंने सिद्धांतों को न समझने के कारण काम में गड़बड़ी की और बाधा डाली थी, और नतीजतन अपराध किया था। लेकिन परमेश्वर के घर ने मेरे अपराधों के कारण मुझे बर्खास्त नहीं किया या हटाया नहीं, बल्कि मेरे साथ संगति की और मेरी मदद की। बाद में, चूँकि मैं पश्चात्ताप करने को तैयार थी, मुझे कर्तव्य करते रहने दिया गया। जिन लोगों को बर्खास्त किया और हटाया गया, उसका कारण यह नहीं था कि वे टीम अगुआ या पर्यवेक्षक के रूप में कर्तव्य निभा रहे थे, बल्कि इसलिए कि वे गलत रास्ते पर चल रहे थे। उन्होंने अपराध किया था, लेकिन उन्होंने काट-छाँट स्वीकार नहीं की और पश्चात्ताप नहीं किया। केवल तभी उन्हें बर्खास्त किया और हटाया गया। मैंने टीम की एक बहन के बारे में सोचा जो पर्यवेक्षक नहीं थी। लेकिन अपना कर्तव्य निभाते हुए वह साथ काम करने वाली बहनों से प्रसिद्धि और लाभ के लिए प्रतिस्पर्धा करती थी और उनकी पीठ पीछे उन्हें नुकसान पहुँचाती थी। इससे कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधा पड़ी और संगति के बाद भी उसने पश्चात्ताप नहीं किया। अंततः उसे बर्खास्त कर दिया गया। साथ ही, दो पिछली पर्यवेक्षकों को इसलिए नहीं बर्खास्त किया गया था कि उन पर बड़ी जिम्मेदारियाँ थीं, बल्कि इसलिए था क्योंकि उन्होंने लगातार सत्य का अनुसरण नहीं किया और वास्तविक कार्य नहीं किया। जब उनकी काट-छाँट की गई या उनके भाई-बहनों ने उनकी मदद करने के लिए संगति की, तो उन्होंने सच में पश्चात्ताप या बदलाव नहीं किया। उनकी बर्खास्तगी का इससे कोई लेना-देना नहीं था कि उन्होंने क्या कर्तव्य किए या उनकी जिम्मेदारियाँ कितनी बड़ी थीं। मुझे एहसास हुआ कि मेरा यह मानना कि टीम अगुआ होना खतरनाक है क्योंकि इसमें बहुत बड़ी जिम्मेदारी शामिल है और टीम का सदस्य होना अपेक्षाकृत सुरक्षित होता है, भ्रामक और बेतुका था और सत्य सिद्धांत के अनुरूप नहीं था। परमेश्वर के घर ने मुझे कर्तव्य निभाने का अवसर दिया और परमेश्वर का इरादा था कि मैं अपने सामने आने वाले लोगों, घटनाओं और चीजों में सत्य की खोज करूँ और सत्य सिद्धांतों पर ज्यादा पकड़ बनाऊँ और उन्हें समझूँ। मुझे इस दुर्लभ अवसर को सँजोना चाहिए था और अपना कर्तव्य स्वीकार करना चाहिए था।

बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े, और अभ्यास का एक मार्ग पाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तो फिर, एक ईमानदार व्यक्ति को कैसे व्यवहार करना चाहिए? उसे परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए, जो कर्तव्य उसे निभाना है उसके प्रति समर्पित होना चाहिए और परमेश्वर के इरादों को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। यह कई तरीकों से व्यक्त होता है : एक तरीका है अपने कर्तव्य को ईमानदार हृदय के साथ स्वीकार करना, अपने दैहिक हितों के बारे में न सोचना, और इसके प्रति अधूरे मन का न होना या अपने लाभ के लिए साजिश न करना। ये ईमानदारी की अभिव्यक्तियाँ हैं। दूसरा है अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने के लिए अपना तन-मन झोंक देना, परमेश्वर के घर द्वारा तुम्हें सौंपे गए कामों को ठीक से करना, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने कर्तव्य में अपना हृदय और प्रेम लगा देना। अपना कर्तव्य निभाते हुए एक ईमानदार व्यक्ति की ये अभिव्यक्तियाँ होनी चाहिए(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। “मनुष्य के कर्तव्य और उसे आशीष होंगे या हाय का सामना करना होगा, इन दोनों के बीच कोई सह-संबंध नहीं है। कर्तव्य वह है, जो मनुष्य के लिए निभाना आवश्यक है; यह उसकी स्वर्ग द्वारा प्रेषित वृत्ति है, उसे प्रतिफल खोजे बिना, और बिना शर्तों या बहानों के इसे करना चाहिए। केवल इसे अपना कर्तव्य निभाना कहा जा सकता है। ... तुम्हें अपना कर्तव्य आशीष प्राप्त करने की खातिर नहीं निभाना चाहिए और तुम्हें हाय का सामना करने के भय से अपना कर्तव्य निभाने से इनकार भी नहीं करना चाहिए। मैं तुम लोगों को यह बात बता दूँ : मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का निर्वाह ऐसी चीज है, जो उसे करनी ही चाहिए और यदि वह अपना कर्तव्य नहीं निभाता है, तो यह उसकी विद्रोहशीलता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर)। परमेश्वर कहता है कि ईमानदार लोग परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो सकते हैं और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करने में अपना दिल और अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं। वे अपने लिए तिकड़म नहीं करते या अपने हितों को लेकर फायदे और नुकसान के बारे में नहीं सोचते। इसके अलावा कर्तव्य एक जिम्मेदारी है जिससे मुँह न मोड़ने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं और इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि हमें क्या आशीष मिलते हैं या हम क्या दुर्भाग्य झेलते हैं। हमें दुर्भाग्य के डर से कर्तव्य से इनकार नहीं करना चाहिए, न ही हमें आशीषों की खातिर कर्तव्य स्वीकार करना चाहिए। यह बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है कि लोग अपने कर्तव्य पूरे करें। यह समझने के बाद मुझे अपने कर्तव्य के प्रति कैसा व्यवहार करना है, यह पता चल गया। हालाँकि मेरी काबिलियत और कार्य क्षमता औसत है, एक सृजित प्राणी के रूप में मुझे जो करना है वह करना ही चाहिए। अपना कर्तव्य निभाते हुए जो चीजें मैं नहीं समझती, उनके बारे में मैं और खोज सकती हूँ, और अपनी काबिलियत और योग्यता के दायरे में उस कर्तव्य को पूरा करने की पूरी कोशिश कर सकती हूँ, जो मुझे पूरा करना चाहिए। मेरा रवैया ऐसा ही होना चाहिए। अपने पिछले कर्जों की भरपाई करने के लिए, मैंने सक्रिय रूप से अपने भाई-बहनों को सफाई सामग्री व्यवस्थित करने में मदद करने की पेशकश की, और अगुआ सहमत हो गए। हालाँकि मैंने अभी तक बहुत अधिक प्रवेश या परिवर्तन हासिल नहीं किया है, इस बार बेनकाब होने के द्वारा, मैंने अपनी आस्था में अपने अनुसरण के परिप्रेक्ष्यों के बारे में कुछ समझ हासिल की है, मैंने सीखा है कि परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाने के लिए अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से कैसे निभाऊँ और मैं परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होने की इच्छुक हूँ। परमेश्वर का धन्यवाद!

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